19-04-2025, 12:12 PM
(This post was last modified: 13-10-2026, 09:25 PM by Puja3567853. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
जब मेरी उत्तेजना बढ़ गई तो मेरी सिसकारियाँ, चीख़ों में बदलने लगी- ऊफ, मर गई बाबा, थोड़ा और ज़ोर से धक्का मार, बाबा आज तो मुझे मार दो, उफ़्फ़ बाबा ऐसा आनंद तो आज तक नहीं आया, बाबा और ज़ोर से, और तेज़, और तेज़’
पता नहीं मैं आनन्द में क्या क्या बड़बड़ा रही थी।
साधू ने अपने दोनों पाँव पीछे को मोड़े, अपने दोनों हाथों के जोड़ कर उँगलियों को आपस में फंसा कर एक अजीब सा आसन बनाया और उसके बाद साधू ने अपनी स्पीड और तेज़ कर दी।
साधू धड़ाधड़ मुझे चोद रहे थे, मेरी चूत से निकालने वाली पानी की झाग बन गई थी जिस कारण चुदाई में ‘फ़च फ़च, पिच पिच’ की आवाज़ आ रही थी।
मैंने नीचे से कमर उचकानी शुरु की, मेरा बदन पसीने से भीगा पड़ा था और ऊपर से साधू के बदन का पसीना भी चू कर मेरे बदन पे गिर रहा था।
5-6 मिनट बाद मैं तो बुरी तरह से झड़ी, मेरा दिल कर रहा था कि इसी आनन्द में अगर जान भी निकल जाए तो कोई गम नहीं।
मगर साधू उसी रफ्तार से लगे रहे।
मैं निढाल होकर लेटी थी, पर साधू धाड़-धाड़ अपने लण्ड से मेरी चूत की पिटाई कर रहे थे।
मैंने पूछा- बाबा, ये जो आपने आसन सा बनाया है इसका क्या फायदा?
‘इस आसन से पुरुष जितनी देर चाहे संभोग कर सकता है, ना तो उसका लंड ढीला पड़ेगा ना ही उसका वीर्यपात होगा।’ साधू ने बताया।
‘वाह, यह तो बहुत कमाल की बात है।’ मैंने कहा।
साधू लगे रहे।
साधू की रगड़ाई से मेरा फिर से मन उत्तेजित होने लगा, मेरी चूत फिर से पानी छोड़ने लगी।
‘देखा बेटी, तुम फिर से तैयार हो गई, अगर पुरुष दो तीन बार स्त्री को सखलित न करे तो उसका कोई फायदा नहीं।’
साधू साथ की साथ प्रवचन भी करते जा रहे थे।
इस बार मुझे भी झड़ने में 15 मिनट से ज़्यादा लगे।
मगर यह बात मैंने देखी, साधू को न थकान हुई, न उनका सांस फूला, वो बड़े आराम से करते रहे।
जब मैं दूसरी बार स्खलित होकर, निढाल हो कर नीचे लेटी थी तो मैंने कहा- बाबा अब बस करो, मेरी पूरी तसल्ली हो चुकी है, अब तो जैसे चूत में दर्द सा होने लगा, अब आप भी स्खलित हो जाओ, और मेरी चूत को अपने आशीर्वाद से भर दो।
साधू बोले- बेटी, अभी मैं तुमको 2 बार और स्खलित कर सकता हूँ, मैंने अपने शरीर को ऐसे ढाला है कि जब तक मैं न चाहूँ, मैं स्खलित नहीं होऊँगा।
‘नहीं बाबा, अब नहीं, अब तो दर्द सा होने लगा है।’ मैंने अपनी कही।
सच तो यह था कि मेरी तो फटी पड़ी थी, ऐसी चुदाई तो मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक नहीं भोगी थी।
साधू ने मेरी पूरी तसल्ली करवा दी थी।
उसके बाद साधू ने अपना आसन खोला और बस फिर तो 2 मिनट भी नहीं लगे, साधू के वीर्य का तो जैसे बांध ही टूट गया हो, उनके लण्ड से निकलती पिचकारियों से मेरा तो सारा बदन भर गया।
मैंने आज तक किसी पुरुष का इतना वीर्यपात होते नहीं देखा था।
जो वीर्य मेरे चेहरे और स्तनों पे गिरा था वो तो मैंने चाट ही लिया और साधू का लण्ड मुँह में लेकर भी चूसा, उसमें भी साधू ने एक दो बार मेरे मुँह में अपने वीर्य की पिचकारी मारी।
उसके बाद न जाने कितनी देर हम दोनों नंगे ही लेटे रहे।
फिर मैं उठी- बाबा, मैं नहाना चाहती हूँ।
तो साधू मुझे अपनी झोंपड़ी के पीछे ले गए वहाँ उन्होंने पानी भर के रखा था।
वहाँ हम दोनों खुले जंगल में एक साथ नीले आसमान के नीचे नहाये।
नहाने के बाद झोंपड़ी के अंदर आए और मैंने हम दोनों के लिए खाना बनाया।
हम दोनों सारा समय नंगे ही रहे।
खाना खाकर दोपहर बाद हमने फिर एक लंबी पारी खेली और इस साधू ने मुझे तीन बार स्खलित किया।
उसके बाद तो यह हर रोज़ का खेल हो गया।
धीरे धीरे साधू ने मेरे सारे छेद खोल दिये।
मैंने कभी गाँड में नहीं किया था, पर साधू ने मेरे आगे पीछे ऊपर नीचे हर छेद में लंड घुसा दिया।
हर रोज़ साधू किसी नए आसन में मुझे भोगते, उन्होंने तो पूर काम शास्त्र भी मुझे समझा दिया।
अब तो मेरा दिल करता था का सब कुछ छोड़ छाड़ के साधू के पास ही आ बसूँ।
हम अक्सर जंगल में बिल्कुल नंगे घूमते, जहाँ दिल करता वहाँ संभोग करते।
थोड़ी दूर पे एक छोटा सा झरना था, वहाँ पे जाकर नंगे नहाते।
यह समझो कि मैंने साधू के साथ अपने हनीमून का भरपूर आनन्द लिया।
साधू ने भी मुझे जी भर के प्यार दिया।
जिस दिन वापिस आना था मैं साधू से लिपट कर बहुत रोई।
मैं करीब 10 दिन वहाँ रही और इन दस दिनों में करीब 50 से ज़्यादा बार स्खलित हुई।
साधू ने मेरी ऐसी संतुष्टि करवाई । मैंने वापिस रांची आकर एक महीने बाद मैं गर्भवती हो गई। मैं अपने पहले बच्चे को जन्म देकर इस दुनिया में लाना चाहती थी मगर इस दुनिया, समाज में सम्मान खोने के डर से मैंने उसे पैदा तो किया मगर किसी और को सौंप दिया। यह दुनिया और समाज के लोग मेरे दुसरे बच्चे को मेरा पहला बच्चा मान रहे हैं।
पता नहीं मैं आनन्द में क्या क्या बड़बड़ा रही थी।
साधू ने अपने दोनों पाँव पीछे को मोड़े, अपने दोनों हाथों के जोड़ कर उँगलियों को आपस में फंसा कर एक अजीब सा आसन बनाया और उसके बाद साधू ने अपनी स्पीड और तेज़ कर दी।
साधू धड़ाधड़ मुझे चोद रहे थे, मेरी चूत से निकालने वाली पानी की झाग बन गई थी जिस कारण चुदाई में ‘फ़च फ़च, पिच पिच’ की आवाज़ आ रही थी।
मैंने नीचे से कमर उचकानी शुरु की, मेरा बदन पसीने से भीगा पड़ा था और ऊपर से साधू के बदन का पसीना भी चू कर मेरे बदन पे गिर रहा था।
5-6 मिनट बाद मैं तो बुरी तरह से झड़ी, मेरा दिल कर रहा था कि इसी आनन्द में अगर जान भी निकल जाए तो कोई गम नहीं।
मगर साधू उसी रफ्तार से लगे रहे।
मैं निढाल होकर लेटी थी, पर साधू धाड़-धाड़ अपने लण्ड से मेरी चूत की पिटाई कर रहे थे।
मैंने पूछा- बाबा, ये जो आपने आसन सा बनाया है इसका क्या फायदा?
‘इस आसन से पुरुष जितनी देर चाहे संभोग कर सकता है, ना तो उसका लंड ढीला पड़ेगा ना ही उसका वीर्यपात होगा।’ साधू ने बताया।
‘वाह, यह तो बहुत कमाल की बात है।’ मैंने कहा।
साधू लगे रहे।
साधू की रगड़ाई से मेरा फिर से मन उत्तेजित होने लगा, मेरी चूत फिर से पानी छोड़ने लगी।
‘देखा बेटी, तुम फिर से तैयार हो गई, अगर पुरुष दो तीन बार स्त्री को सखलित न करे तो उसका कोई फायदा नहीं।’
साधू साथ की साथ प्रवचन भी करते जा रहे थे।
इस बार मुझे भी झड़ने में 15 मिनट से ज़्यादा लगे।
मगर यह बात मैंने देखी, साधू को न थकान हुई, न उनका सांस फूला, वो बड़े आराम से करते रहे।
जब मैं दूसरी बार स्खलित होकर, निढाल हो कर नीचे लेटी थी तो मैंने कहा- बाबा अब बस करो, मेरी पूरी तसल्ली हो चुकी है, अब तो जैसे चूत में दर्द सा होने लगा, अब आप भी स्खलित हो जाओ, और मेरी चूत को अपने आशीर्वाद से भर दो।
साधू बोले- बेटी, अभी मैं तुमको 2 बार और स्खलित कर सकता हूँ, मैंने अपने शरीर को ऐसे ढाला है कि जब तक मैं न चाहूँ, मैं स्खलित नहीं होऊँगा।
‘नहीं बाबा, अब नहीं, अब तो दर्द सा होने लगा है।’ मैंने अपनी कही।
सच तो यह था कि मेरी तो फटी पड़ी थी, ऐसी चुदाई तो मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक नहीं भोगी थी।
साधू ने मेरी पूरी तसल्ली करवा दी थी।
उसके बाद साधू ने अपना आसन खोला और बस फिर तो 2 मिनट भी नहीं लगे, साधू के वीर्य का तो जैसे बांध ही टूट गया हो, उनके लण्ड से निकलती पिचकारियों से मेरा तो सारा बदन भर गया।
मैंने आज तक किसी पुरुष का इतना वीर्यपात होते नहीं देखा था।
जो वीर्य मेरे चेहरे और स्तनों पे गिरा था वो तो मैंने चाट ही लिया और साधू का लण्ड मुँह में लेकर भी चूसा, उसमें भी साधू ने एक दो बार मेरे मुँह में अपने वीर्य की पिचकारी मारी।
उसके बाद न जाने कितनी देर हम दोनों नंगे ही लेटे रहे।
फिर मैं उठी- बाबा, मैं नहाना चाहती हूँ।
तो साधू मुझे अपनी झोंपड़ी के पीछे ले गए वहाँ उन्होंने पानी भर के रखा था।
वहाँ हम दोनों खुले जंगल में एक साथ नीले आसमान के नीचे नहाये।
नहाने के बाद झोंपड़ी के अंदर आए और मैंने हम दोनों के लिए खाना बनाया।
हम दोनों सारा समय नंगे ही रहे।
खाना खाकर दोपहर बाद हमने फिर एक लंबी पारी खेली और इस साधू ने मुझे तीन बार स्खलित किया।
उसके बाद तो यह हर रोज़ का खेल हो गया।
धीरे धीरे साधू ने मेरे सारे छेद खोल दिये।
मैंने कभी गाँड में नहीं किया था, पर साधू ने मेरे आगे पीछे ऊपर नीचे हर छेद में लंड घुसा दिया।
हर रोज़ साधू किसी नए आसन में मुझे भोगते, उन्होंने तो पूर काम शास्त्र भी मुझे समझा दिया।
अब तो मेरा दिल करता था का सब कुछ छोड़ छाड़ के साधू के पास ही आ बसूँ।
हम अक्सर जंगल में बिल्कुल नंगे घूमते, जहाँ दिल करता वहाँ संभोग करते।
थोड़ी दूर पे एक छोटा सा झरना था, वहाँ पे जाकर नंगे नहाते।
यह समझो कि मैंने साधू के साथ अपने हनीमून का भरपूर आनन्द लिया।
साधू ने भी मुझे जी भर के प्यार दिया।
जिस दिन वापिस आना था मैं साधू से लिपट कर बहुत रोई।
मैं करीब 10 दिन वहाँ रही और इन दस दिनों में करीब 50 से ज़्यादा बार स्खलित हुई।
साधू ने मेरी ऐसी संतुष्टि करवाई । मैंने वापिस रांची आकर एक महीने बाद मैं गर्भवती हो गई। मैं अपने पहले बच्चे को जन्म देकर इस दुनिया में लाना चाहती थी मगर इस दुनिया, समाज में सम्मान खोने के डर से मैंने उसे पैदा तो किया मगर किसी और को सौंप दिया। यह दुनिया और समाज के लोग मेरे दुसरे बच्चे को मेरा पहला बच्चा मान रहे हैं।


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