28-01-2025, 03:27 PM
मैं और खाला पूरे गांव से चुद गई
हम लोग किराए की कार लेकर औरंगाबाद जा रहे थे.
गाड़ी में बस मैं और खाला थे.
रास्ते में बहुत सारे गाँव पड़ते थे जिनकी हरियाली देख कर जन्नत का अहसास होता था.
गाड़ी चलाते चलाते जब हम लोग थक गए तो पानी पीने और थोड़ा आराम करने के लिए रास्ते में एक खेत के किनारे रुक गए.
आस पास के सभी खेतों में जुताई चल रही थी और हर खेत में चार पांच आदमी दिखाई पड़ रहे थे.
इतने सारे मजबूत मर्द देखकर मेरी खाला की चूत पनियाने लगी और उसके अरमान जागने लगे.
मैं हंसती हुई बोली- अगर ये सारे मर्द एक साथ आपको चोद डालें तो आपको कैसा लगेगा?
खाला बोली- अरे, ये ख़्याल मुझे क्यों नहीं आया?
मैं बोली- तो अभी भी देर क्या है? मौसम भी है, मौका भी है और आसपास इतने सारे लंड भी है, चुदवा लो जिससे भी जी चाहे!
खाला बोली- जिससे जी चाहे उससे नहीं, मुझे तो सबसे चुदवाना है।
मैं बोली- लेकिन ये होगा कैसे?
खाला बोली- शबनम तू बस देखती जा मेरा कमाल, आज तो बदल जाएगी तेरी भी चाल!
तब खाला कार से नीचे उतरी और उधर ही टहलने लगी.
एक खूबसूरत औरत को देख कर कुछ मजदूर भी पलट कर खाला को देखने लगे थे.
कुछ देर में खाला उस तरफ मुड़ी जिस तरफ मजदूर खड़े थे और अनजान बनती हुई अपनी सलवार उतार कर सड़क के किनारे मूतने लगी.
अब और भी मजदूर खाला को देखने लगे थे.
गाड़ी में बस मैं और खाला थे.
रास्ते में बहुत सारे गाँव पड़ते थे जिनकी हरियाली देख कर जन्नत का अहसास होता था.
गाड़ी चलाते चलाते जब हम लोग थक गए तो पानी पीने और थोड़ा आराम करने के लिए रास्ते में एक खेत के किनारे रुक गए.
आस पास के सभी खेतों में जुताई चल रही थी और हर खेत में चार पांच आदमी दिखाई पड़ रहे थे.
इतने सारे मजबूत मर्द देखकर मेरी खाला की चूत पनियाने लगी और उसके अरमान जागने लगे.
मैं हंसती हुई बोली- अगर ये सारे मर्द एक साथ आपको चोद डालें तो आपको कैसा लगेगा?
खाला बोली- अरे, ये ख़्याल मुझे क्यों नहीं आया?
मैं बोली- तो अभी भी देर क्या है? मौसम भी है, मौका भी है और आसपास इतने सारे लंड भी है, चुदवा लो जिससे भी जी चाहे!
खाला बोली- जिससे जी चाहे उससे नहीं, मुझे तो सबसे चुदवाना है।
मैं बोली- लेकिन ये होगा कैसे?
खाला बोली- शबनम तू बस देखती जा मेरा कमाल, आज तो बदल जाएगी तेरी भी चाल!
तब खाला कार से नीचे उतरी और उधर ही टहलने लगी.
एक खूबसूरत औरत को देख कर कुछ मजदूर भी पलट कर खाला को देखने लगे थे.
कुछ देर में खाला उस तरफ मुड़ी जिस तरफ मजदूर खड़े थे और अनजान बनती हुई अपनी सलवार उतार कर सड़क के किनारे मूतने लगी.
अब और भी मजदूर खाला को देखने लगे थे.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
