27-10-2022, 02:15 PM
"ये क्या बात हुई?? हम शादी कर रहे हैं या मजाक, ये क्या कोई तरीका है, जो मन आया वो कह दिया। वे लड़के वाले हैं तो क्या कोई भी मनमानी चलेगी?? आपने सीधे तौर से मना क्यों नहीं कर दिया ?? गुस्से में अखिल जी यानी कि नीतिका के पिताजी उसकी मां से बात कर रहे थे जिन्होंने अभी थोड़ी ही देर पहले आद्विक की दादी और नीतू दीदी से बात की थी।
विभाजी (नीतिका की मां) बस चुप थीं क्योंकि उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि अभी इस वक्त क्या बोलें।
अखिल जी (फिर से गुस्से में)- ठीक है उनके लड़के को नहीं मिलना है नीकू से, ना सही, लेकिन मेरी बेटी का क्या?? अगर वो मिलना चाहे तो, इतना सा तो उसका हक है ना??
विभाजी (धीमे से)- लड़के के दादाजी की तबियत खराब है और फिर हो सकता है, नीकू भी ना मिलना चाहती हो अभी लड़के से ?? लड़के की तरह शायद वो भी यही सोच रही हो कि हमने जो भी सुना समझा और खोजा होगा वो उसके लिए अच्छा होगा।
विभाजी (फिर से थोड़ा रुक कर)- या......ये भी हो सकता है कि ये लोग भावी की शादी में ही एक दूसरे को देख चुके हों.....
अखिल जी (अब भी गुस्से में)- मुझे कुछ भी नहीं पता बस मेरी बेटी की किसी भी भावनाओं को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। उसने अगर संपूर्ण तरीके से यह हक हमें दिया है तो आप ये मत भूलिए कि हमारी जिम्मेदारी और दुगनी हो गई है।
अखिल जी (फिर से)- हां..... एक बात और..... ये मंदिरों में शादी करने वाली बात.... मुझे नहीं लगता कि ये सही है, हमारी एक ही बेटी है, हजारों सपने हैं हमारे उसकी शादी को लेकर, यूं बस जैसे तैसे किसी के पल्ले नहीं बांध सकता मैं अपने जिगर के टुकड़े को।
विभाजी (शांति से)- आपकी सारी बातें सही हैं, मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि बस हमारी किसी जिद में अपनी बच्ची के लिए आया इतना अच्छा रिश्ता ना निकल जाए....... (थोड़ा रुक कर)....... और यकीन मानिए यहां बात पैसे वालों की नहीं है बल्कि सुखी संपन्न होने के साथ ही उनका संस्कारी होना मैटर करता है। वे जितना ही सुलझे दिमाग के होंगे, उतना ही अपनी नीकू को समझने की कोशिश करेंगे, और अपनी बच्ची खुश रहेगी। इतने संपन्न होने के साथ ही ऐसे सुलझे लोग कम ही मिलते हैं, ये मत भूलिए आप.....
दोनों काफी देर तक इन्हीं सब बातों पर विचार विमर्श करते रहे जिसकी थोड़ी थोड़ी आवाज नीतिका के कानों में भी पड़ती रही। वो भी अब मन ही मन कुछ फैसला कर रही थी।
रात को सोने के पहले जब हर रोज की तरह निखिल जी अपनी बेटी को कमरे में देखने गए तो देखा वो शांति से अपनी स्टडी टेबल पर बैठी हाथों में पेन लिए काफी गहराई से कुछ सोच रही थी।
अखिल जी (प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए)- क्या बेटा, कहां खोई है, कोई उलझन है क्या ??
नीतिका अचानक पापा को सामने देख थोड़ा हड़बड़ा गई लेकिन फिर मुस्कुराने लगी।
नीतिका - नहीं पापा, कुछ तो नहीं.... बस यूं ही...
अखिल जी (कुछ सोच कर)- बेटा, तुम्हें किसी भी चीज के लिए परेशान होने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, मैं सब देख लूंगा।
नीतिका (भावुक होकर प्यार से)- मैं जानती हूं पापा, तभी तो आप वर्ल्ड के बेस्ट पापा हैं।
दोनों ने यूं ही थोड़ी देर और बातें की फिर अखिल जी भी उठ कर उसे गुड नाईट बोलते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगे वो दो कदम चले ही थे कि नीतिका की बात सुन कर हैरानी से रुक गए।
नीतिका (धीमे से)- पापा, मुझे उनकी शर्त मंजूर है.....
अखिल जी (हैरानी से)- पर.... नीकू.....
नीतिका (शांति से)- हां पापा, अगर आप लोगों को सही लगे तो मुझे भी कोई परेशानी नहीं है।
अखिल जी (कुछ सोच कर)- तुम लड़के से मिली हो..??
नीतिका - नहीं पापा, लेकिन मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि आपलोगों से ज्यादा अच्छी चीज मेरे लिए कोई और खोज ही नहीं सकता..... यहां तक कि मैं भी नहीं...।
अखिल जी - लेकिन नीकू.....
नीतिका (शांति से)- पापा अगर आप दोनों संतुष्ट हैं तो बांकी किसी भी चीज से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, सच मानिए। और रही बात शादी के नाम पर ढेरों ताम -झ़ाम की, तो मुझे भी किसी भी नजरिए से ये बिलकुल भी सही नहीं लगता कि इंसान के जिंदगी भर के मेहनत की कमाई को इस नाम पर पानी की तरह बहाया जाए कि लोगों को अच्छा लगाना है, नहीं पापा।
नीतिका (फिर से)- शादी, दो परिवारों का एक पवित्र गठबंधन है जिसमें शरीक होने का हक भी उन्हीं अपनों को है जो सच में आपके करीब हैं ना कि इस समाज के नाम पर हर किसी को.... जो लोग दिल से आपके करीब नहीं हैं पापा, तो क्या फर्क पड़ता है कि वे हमारी खुशियों में शरीक हुए या नहीं, हमारे घर आए या नहीं, हमारे यहां कुछ खाया या नहीं..... इससे कहीं ज्यादा अच्छी चीज तो ये है ना पापा कि इन पैसों से हम किसी गरीब के लिए कुछ करें जिनकी जिंदगी सच में बदल सकती है।
आज अखिल जी अपनी बेटी की इतनी बड़ी बड़ी बातों से बिल्कुल हैरान थे, उन्हें ये समझ कर भावुक और गर्व महसूस हो रहा था कि कब उनकी बेटी इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला।
अखिल जी (नीतिका के सिर पर हाथ फेरते हुए)- अब तो सच में मेरी बेटी बड़ी हो गई है, भगवान करे तुम हमेशा -हमेंशा खुश रहो।
इतना कह कर अखिल जी कमरे से बाहर निकल गए और दूसरी ओर नीतिका भी उसी कुर्सी से सिर टिकाए और आंखें बंद किए कुछ सोचने लगी।
"अब तक आपको जितना समझ पाई हूं, आप जरूर एक सुलझी सोच के इंसान हैं जिन्हें दिखावे से कहीं ज्यादा अपनों के भावनाओं की कद्र है। भरोसा इसी बात का है कि और कुछ हो ना हो हमारे रिश्ते में एक दूसरे के लिए सम्मान जरूर होगा और अपनी जिंदगी के इस आने वाले अनजाने सफर पर हम दोनों साथ साथ होंगे।" कुछ सोच कर नीतिका खुद से बोल रही थी।
यूं ही दोनों पक्षों के राजी होने के बाद चूंकि ज्यादा कुछ खास तैयारियों की जरूरत नहीं थी और ना ही ज्यादा रुकने की ही कोई वजह थी तो आखिर कर आद्विक और नीतिका का रिश्ता तय हो गया और इनकी शादी अगले रविवार को उसी शहर के पुराने शंकर -पार्वती के मंदिर में होना तय हो गया। हां अखिल जी के ज्यादा जोर देने की वजह से ही उनकी शादी के ही अगले दिन दोनों ही पक्षों के लिए एक कम्बाइंड रिसेप्शन पार्टी भी रखी गई ताकि दुनिया -समाज वालों का भी उन्हें आशीर्वाद मिल जाए।
दोनों ही पक्षों ने शादी इतने सीधे -साधे तौर से होने के बाद भी उन्होंने अपनी अपनी तैयारियां शुरू कर दीं। जहां अखिल और विभा जी अपनी बेटी की कोई भी जरूरत बांकी नहीं छोड़ना चाहते थे वहीं आद्विक के घरवाले और खास कर उसके दादा दादी और उसकी दीदी हर एक छोटी से छोटी चीज का ध्यान रख रहे थे।
इन सबमें ना तो बहुत ही ज्यादा खुशी नीतिका के चेहरे पर झलक रही थी और ना ही आद्विक के... जहां एक ओर आद्विक के लिए ये रिश्ता सिर्फ अपने दादा -दादी की खुशियों के लिए एक वजह थी जो उनके खुद के बेटे बहु यानी कि सुबोध और सुनीता जी नहीं दे पाईं थीं वहीं दूसरी ओर नीतिका के लिए भी बस अपने मां बाप की इच्छा और खुशियों का सम्मान रखना था।
एक रोज आद्विक अपने कमरे में बैठा कुछ कर रहा था कि सच्चिदानंद जी भी आ कर वहीं पास में बैठ गए।
आद्विक (थोड़ी हैरानी से)- अरे दादू..... आप यहां ???
दादाजी (प्यार से)- क्यों भाई, अब अपने पोते के पास भी नहीं आ सकता क्या ??
आद्विक - plz दादू, आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं??
दादाजी (कुछ सोच कर)- बेटा, कोई जबरदस्ती नहीं है इस या किसी और रिश्ते की, हां, लड़की अच्छी शांत, सीधी और सुलझी हुई है तो हमें पसंद आ गई। फिर भी तू अगर खुद से मिलना चाहे, देखना चाहे या बात करना चाहे, तो हम उनसे अब भी बात कर सकते हैं, कोई परेशानी नहीं होगी।
आद्विक (एक लंबी सांस लेते हुए)- नहीं दादू, इसकी कोई जरूरत नहीं है। मुझे आप दोनों के फैसले और पसंद पर भरोसा है।
दादाजी - लेकिन बेटा.....
आद्विक - आप निश्चिंत रहिए, मुझे कोई दिक्कत नही है...
दादाजी (कुछ सोचते हुए मुस्कुरा कर)- लगता है अब मेरा आदि सच में बड़ा हो गया है...
दादाजी भी ठीक है कह कर थोड़ी ही देर में वहां से चले गए और आद्विक यूं ही सिर एक ओर टिकाए कुछ सोचने लगा।
"नहीं जानता तुम कौन होगी, या कैसी होगी, हां लेकिन एक बात तो बिलकुल सच है कि ये शादी मेरे लिए एक जिंदगी भर का समझौता है और कुछ भी नहीं, ये तुम जितना जल्दी समझ जाओ उतना ही अच्छा होगा। एक पति होने की सारी जिम्मेदारियां उठाने की पूरी कोशिश रहेगी मेरी लेकिन मैं वो अपनी खुशी से करूंगा या फिर अपनों की खुशी के लिए इसका जवाब सच में मेरे पास नहीं होगा।......... (थोड़ा रुक कर)....... वैसे भी जिस रिश्ते में पसंद या नापसंद की कोई बात ही नहीं आई हो, उसमें कैसी भावनाएं या फिर कैसा जुड़ाव......!!!!" आद्विक खुद में सोचता हुआ बोल रहा था कि तभी उसे हर दिन की तरह बगल वाले कमरे से अपने भैया भाभी के आपस के बहस की जोर जोर की आवाजें आने लगीं और उसने फिर से आंखें बंद कर लीं।
एक रोज सुबह सुबह...............
"ओह मां, ये क्या हरकत है शुभी (नीतिका के छोटे भाई का प्यार का नाम), दिमाग खराब है क्या तुम्हारा?? क्यों नहीं सोने दे रहे हो?? आज सच में पापा को तुम्हारी सारी हरकतें बताऊंगी, देखना.......।" बोलती हुई परेशान हो कर नीतिका अपने बंद आंखों में ही अपने बाल ठीक करते हुए बोल पड़ी क्योंकि किसी ने जोर से उसके बाल खींच कर उसे उठाया था।
"ओहो..... तो मैडम विक्टोरिया यहां सोती रहें चैन से और इतना सारा काम, वो क्या अकेली मैं ही करूंगी??? जी नहीं, मेरी शादी में तुमने मुझसे भी कम काम नहीं कराए थे जो तेरी बारी आने पर तुझे छोड़ दूं। चल उठ....." मुंह बना कर हंसते हुए भव्या बोल पड़ी।
"भावी तुम........." उछलती हुई दोनों सहेलियां एक दूसरे के गले लग गईं।"
नीतिका (भावुक हो कर)- भावी, सच में बहुत -बहुत मिस किया तुझे, thanku आखिर तू आ गई।
भव्या (थोड़ा नाराज होते हुए)- तू और मुझे मिस करती थी, है ना .......?? हुंह.... इसीलिए इस एक महीने में मुश्किल से गिन कर एक -दो कॉल या चार या पांच मैसेज.... मेरे शक्ल पर बेवकूफ लिखा है जो तेरी बात मान लूं।
नीतिका (धीरे से) - नहीं यार, तुझे पता है, ऐसी कोई बात नहीं है, हां बस न्यूली वेडेड कपल को बार -बार कॉल करके परेशान करना अच्छा नहीं लगता था।
भव्या (जान कर चिढ़ाती हुई)- हां, हां, ये सीधा बोल ना, जीजू के खयाल छोड़ेंगे तब ना किसी और का कुछ सोचेगी??
नीतिका भव्या की बातों से बिल्कुल चुप थी जो भव्या भी बड़े गौर से समझने की कोशिश कर रही थी।
भव्या (कुछ सोच कर थोड़ा गंभीरता से)- क्या हुआ नीकू, तू इतनी बुझी हुई क्यों है?? परसों तेरी शादी है पागल..... और एक बात ये बता तूने लड़के से मिलने तक से मना क्यों कर दिया और फिर ये शादी भी इतने सिंपल तरीके से करने की जिद...... जबकि मैं तुझे जितना जानती और समझती हूं तुझे तो इन ढेर सारी रस्मों रिवाजों का कितना शौक है।
नीतिका (शांत हो कर)- नहीं भावी ऐसी कोई बात नहीं है, बस पता नहीं दिल में एक अजीब सा सन्नाटा है कि जैसे जिंदगी में कोई बहुत बड़ी हलचल मचने वाली है। रही बात लड़के से मिलने या मिलाने की, तो तू ये अच्छे से जानती है कि इन चीजों में मैं पहले से ही थोड़ी कच्ची हूं, समझ नहीं आया कि क्या करना चाहिए या क्या नहीं, फिर जब शांति से सोचा तो लगा कि जब मां -पापा दोनों की पसंद है तो अच्छा ही होगा, बांकी जो आगे किस्मत लिख दे।
भावी (प्यार से)- नीकू, plz इतना मत सोच, खुद को रिलैक्स रख..... मैंने जितना उनके बारे में दर्श से सुना है वो बहुत अच्छे हैं। दर्श तो कहते हैं कि तुम्हारी दोस्त को उससे ज्यादा अच्छा जीवनसाथी मिल ही नहीं सकता।
नीतिका चुपचाप भव्या की बात सुन रही थी।
भव्या (फिर से)- देख, देखने में तो सुपर कूल हैं, तू जानती ही है, हां मैंने तो ये भी सुना है कि अपने परिवार पर जान छिड़कते हैं वो तो अपनी बीवी को कितना मानेंगे ये सोच। (कुछ सोच कर)-दर्श और वे बेस्ट फ्रेंड हैं लेकिन एक बस ये बात अजीब है कि मैं भी अब तक उनसे बस एक बार रिसेप्शन में मिली हूं फिर उसके बाद कभी नहीं। उनका या उनके घरवालों का हमारे घर आना जाना काफी कम ही होता है।
भव्या अब तक इस बात से बिल्कुल ही अंजान थी कि नीतिका ने अब तक आद्विक को ठीक से देखा तक नहीं है, यहां तक कि तस्वीर में भी। भव्या आगे कुछ और बोलती कि उसका फोन बजने लगा और वो उठा कर एक साइड में चली गई। उसका चमकता चेहरा ही बता रहा था कि वो दर्श की कॉल थी तो नीतिका बस उसके चेहरे को देख फिर से यूं ही कुछ सोचने लगी।
थोड़ी देर में नीतिका की मां के जोर देने पर दोनों सहेलियां शॉपिंग के लिए चली गईं।
उधर आज काफी दिनों बाद दर्श और आद्विक अपनी पुरानी पसंदीदा जगह "चाचा की चाय" वाली दुकान पर बैठे थे।
दर्श - क्या हो गया है तुझे आज कल ???
आद्विक - क्यों, बिल्कुल भला चंगा तो हूं।
दर्श (कुछ सोच कर)- देख आदि, तेरे बांकी दोस्तों को तू ये कहानियां बता, मुझे नहीं।
दर्श (फिर से)- जो लड़का अपनी एक जींस भी पच्चीस दुकानों में चक्कर लगा कर पसंद करता है उसने एक बार भी उससे मिलने की कोई जिद नहीं की......। जो लड़का जिंदगी भर लव मैरिज की बात करता रहा वो आज अचानक ऐसे सीधे शांत तरीके से किसी से भी शादी करने को तैयार हो गया, ये सब कुछ अजीब नहीं है ??
आद्विक (शांति से)- नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं है। तुझे पता है ना दादू -दादी मेरे लिए क्या हैं...। फिर अगर उसे उन्होंने इतने भरोसे से मेरे लिए चुना है तो यही सही।
आद्विक (फिर से)- मुझे पता है कि इस रिश्ते का कोई खास भविष्य नहीं है लेकिन....... (थोड़ा रुक कर) वैसे भी, अच्छा ही है ना, उनका ये भ्रम भी दूर हो जाएगा.....
दर्श (उसकी बात बीच में काटता हुआ)- ऐसे क्यों बोल रहा है?? लड़की सच में अच्छी है।
आद्विक (हंसते हुए)- जो भी हो... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। हां वैसे एक बात सोच कि बिना मिले, बिना जाने, किस बात पर वे लोग इस शादी के लिए राजी हो गए, (थोड़ा रुक कर)..... यही सोच कर ना, कि लड़का बहुत पैसे वाला है। बेटी पूरी जिंदगी ऐश करेगी।
दर्श (थोड़ा गुस्से में)- क्यों, तुझे उस लड़की को बिना देखे, बिना मिले ये सब कैसे समझ आ गया...??? भगवान है तू कि यहां बैठे हुए तूने सब जान लिया..??
दर्श (फिर से)- जितना मैं उस लड़की को जानता और समझता हूं ना, सच में आज के वक्त में उतना शांत और समझदार होना बहुत बड़ी बात है।
आद्विक (थोड़ा चिढ़ कर)- बस कर अब उसका पुराण, अच्छी है या बुरी, अब फर्क क्या पड़ता है, शादी तो कर ही रहा हूं ना, हां जब असलियत सामने आए तो दुखी मत होना।
दर्श -अपनी सोच पर तू पछताएगा, देखना....।
आद्विक (हंसते हुए)- देखेंगे...... खैर अभी से इस बात पर क्यों बहस करनी, वैसे भी काफी दिनों बाद मिले हैं चल शहर की ही एक तफ़री मारते हैं।
दोनों थोड़ी देर में गाड़ी में बैठ निकल गए।
विभाजी (नीतिका की मां) बस चुप थीं क्योंकि उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि अभी इस वक्त क्या बोलें।
अखिल जी (फिर से गुस्से में)- ठीक है उनके लड़के को नहीं मिलना है नीकू से, ना सही, लेकिन मेरी बेटी का क्या?? अगर वो मिलना चाहे तो, इतना सा तो उसका हक है ना??
विभाजी (धीमे से)- लड़के के दादाजी की तबियत खराब है और फिर हो सकता है, नीकू भी ना मिलना चाहती हो अभी लड़के से ?? लड़के की तरह शायद वो भी यही सोच रही हो कि हमने जो भी सुना समझा और खोजा होगा वो उसके लिए अच्छा होगा।
विभाजी (फिर से थोड़ा रुक कर)- या......ये भी हो सकता है कि ये लोग भावी की शादी में ही एक दूसरे को देख चुके हों.....
अखिल जी (अब भी गुस्से में)- मुझे कुछ भी नहीं पता बस मेरी बेटी की किसी भी भावनाओं को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। उसने अगर संपूर्ण तरीके से यह हक हमें दिया है तो आप ये मत भूलिए कि हमारी जिम्मेदारी और दुगनी हो गई है।
अखिल जी (फिर से)- हां..... एक बात और..... ये मंदिरों में शादी करने वाली बात.... मुझे नहीं लगता कि ये सही है, हमारी एक ही बेटी है, हजारों सपने हैं हमारे उसकी शादी को लेकर, यूं बस जैसे तैसे किसी के पल्ले नहीं बांध सकता मैं अपने जिगर के टुकड़े को।
विभाजी (शांति से)- आपकी सारी बातें सही हैं, मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि बस हमारी किसी जिद में अपनी बच्ची के लिए आया इतना अच्छा रिश्ता ना निकल जाए....... (थोड़ा रुक कर)....... और यकीन मानिए यहां बात पैसे वालों की नहीं है बल्कि सुखी संपन्न होने के साथ ही उनका संस्कारी होना मैटर करता है। वे जितना ही सुलझे दिमाग के होंगे, उतना ही अपनी नीकू को समझने की कोशिश करेंगे, और अपनी बच्ची खुश रहेगी। इतने संपन्न होने के साथ ही ऐसे सुलझे लोग कम ही मिलते हैं, ये मत भूलिए आप.....
दोनों काफी देर तक इन्हीं सब बातों पर विचार विमर्श करते रहे जिसकी थोड़ी थोड़ी आवाज नीतिका के कानों में भी पड़ती रही। वो भी अब मन ही मन कुछ फैसला कर रही थी।
रात को सोने के पहले जब हर रोज की तरह निखिल जी अपनी बेटी को कमरे में देखने गए तो देखा वो शांति से अपनी स्टडी टेबल पर बैठी हाथों में पेन लिए काफी गहराई से कुछ सोच रही थी।
अखिल जी (प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए)- क्या बेटा, कहां खोई है, कोई उलझन है क्या ??
नीतिका अचानक पापा को सामने देख थोड़ा हड़बड़ा गई लेकिन फिर मुस्कुराने लगी।
नीतिका - नहीं पापा, कुछ तो नहीं.... बस यूं ही...
अखिल जी (कुछ सोच कर)- बेटा, तुम्हें किसी भी चीज के लिए परेशान होने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, मैं सब देख लूंगा।
नीतिका (भावुक होकर प्यार से)- मैं जानती हूं पापा, तभी तो आप वर्ल्ड के बेस्ट पापा हैं।
दोनों ने यूं ही थोड़ी देर और बातें की फिर अखिल जी भी उठ कर उसे गुड नाईट बोलते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगे वो दो कदम चले ही थे कि नीतिका की बात सुन कर हैरानी से रुक गए।
नीतिका (धीमे से)- पापा, मुझे उनकी शर्त मंजूर है.....
अखिल जी (हैरानी से)- पर.... नीकू.....
नीतिका (शांति से)- हां पापा, अगर आप लोगों को सही लगे तो मुझे भी कोई परेशानी नहीं है।
अखिल जी (कुछ सोच कर)- तुम लड़के से मिली हो..??
नीतिका - नहीं पापा, लेकिन मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि आपलोगों से ज्यादा अच्छी चीज मेरे लिए कोई और खोज ही नहीं सकता..... यहां तक कि मैं भी नहीं...।
अखिल जी - लेकिन नीकू.....
नीतिका (शांति से)- पापा अगर आप दोनों संतुष्ट हैं तो बांकी किसी भी चीज से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, सच मानिए। और रही बात शादी के नाम पर ढेरों ताम -झ़ाम की, तो मुझे भी किसी भी नजरिए से ये बिलकुल भी सही नहीं लगता कि इंसान के जिंदगी भर के मेहनत की कमाई को इस नाम पर पानी की तरह बहाया जाए कि लोगों को अच्छा लगाना है, नहीं पापा।
नीतिका (फिर से)- शादी, दो परिवारों का एक पवित्र गठबंधन है जिसमें शरीक होने का हक भी उन्हीं अपनों को है जो सच में आपके करीब हैं ना कि इस समाज के नाम पर हर किसी को.... जो लोग दिल से आपके करीब नहीं हैं पापा, तो क्या फर्क पड़ता है कि वे हमारी खुशियों में शरीक हुए या नहीं, हमारे घर आए या नहीं, हमारे यहां कुछ खाया या नहीं..... इससे कहीं ज्यादा अच्छी चीज तो ये है ना पापा कि इन पैसों से हम किसी गरीब के लिए कुछ करें जिनकी जिंदगी सच में बदल सकती है।
आज अखिल जी अपनी बेटी की इतनी बड़ी बड़ी बातों से बिल्कुल हैरान थे, उन्हें ये समझ कर भावुक और गर्व महसूस हो रहा था कि कब उनकी बेटी इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला।
अखिल जी (नीतिका के सिर पर हाथ फेरते हुए)- अब तो सच में मेरी बेटी बड़ी हो गई है, भगवान करे तुम हमेशा -हमेंशा खुश रहो।
इतना कह कर अखिल जी कमरे से बाहर निकल गए और दूसरी ओर नीतिका भी उसी कुर्सी से सिर टिकाए और आंखें बंद किए कुछ सोचने लगी।
"अब तक आपको जितना समझ पाई हूं, आप जरूर एक सुलझी सोच के इंसान हैं जिन्हें दिखावे से कहीं ज्यादा अपनों के भावनाओं की कद्र है। भरोसा इसी बात का है कि और कुछ हो ना हो हमारे रिश्ते में एक दूसरे के लिए सम्मान जरूर होगा और अपनी जिंदगी के इस आने वाले अनजाने सफर पर हम दोनों साथ साथ होंगे।" कुछ सोच कर नीतिका खुद से बोल रही थी।
यूं ही दोनों पक्षों के राजी होने के बाद चूंकि ज्यादा कुछ खास तैयारियों की जरूरत नहीं थी और ना ही ज्यादा रुकने की ही कोई वजह थी तो आखिर कर आद्विक और नीतिका का रिश्ता तय हो गया और इनकी शादी अगले रविवार को उसी शहर के पुराने शंकर -पार्वती के मंदिर में होना तय हो गया। हां अखिल जी के ज्यादा जोर देने की वजह से ही उनकी शादी के ही अगले दिन दोनों ही पक्षों के लिए एक कम्बाइंड रिसेप्शन पार्टी भी रखी गई ताकि दुनिया -समाज वालों का भी उन्हें आशीर्वाद मिल जाए।
दोनों ही पक्षों ने शादी इतने सीधे -साधे तौर से होने के बाद भी उन्होंने अपनी अपनी तैयारियां शुरू कर दीं। जहां अखिल और विभा जी अपनी बेटी की कोई भी जरूरत बांकी नहीं छोड़ना चाहते थे वहीं आद्विक के घरवाले और खास कर उसके दादा दादी और उसकी दीदी हर एक छोटी से छोटी चीज का ध्यान रख रहे थे।
इन सबमें ना तो बहुत ही ज्यादा खुशी नीतिका के चेहरे पर झलक रही थी और ना ही आद्विक के... जहां एक ओर आद्विक के लिए ये रिश्ता सिर्फ अपने दादा -दादी की खुशियों के लिए एक वजह थी जो उनके खुद के बेटे बहु यानी कि सुबोध और सुनीता जी नहीं दे पाईं थीं वहीं दूसरी ओर नीतिका के लिए भी बस अपने मां बाप की इच्छा और खुशियों का सम्मान रखना था।
एक रोज आद्विक अपने कमरे में बैठा कुछ कर रहा था कि सच्चिदानंद जी भी आ कर वहीं पास में बैठ गए।
आद्विक (थोड़ी हैरानी से)- अरे दादू..... आप यहां ???
दादाजी (प्यार से)- क्यों भाई, अब अपने पोते के पास भी नहीं आ सकता क्या ??
आद्विक - plz दादू, आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं??
दादाजी (कुछ सोच कर)- बेटा, कोई जबरदस्ती नहीं है इस या किसी और रिश्ते की, हां, लड़की अच्छी शांत, सीधी और सुलझी हुई है तो हमें पसंद आ गई। फिर भी तू अगर खुद से मिलना चाहे, देखना चाहे या बात करना चाहे, तो हम उनसे अब भी बात कर सकते हैं, कोई परेशानी नहीं होगी।
आद्विक (एक लंबी सांस लेते हुए)- नहीं दादू, इसकी कोई जरूरत नहीं है। मुझे आप दोनों के फैसले और पसंद पर भरोसा है।
दादाजी - लेकिन बेटा.....
आद्विक - आप निश्चिंत रहिए, मुझे कोई दिक्कत नही है...
दादाजी (कुछ सोचते हुए मुस्कुरा कर)- लगता है अब मेरा आदि सच में बड़ा हो गया है...
दादाजी भी ठीक है कह कर थोड़ी ही देर में वहां से चले गए और आद्विक यूं ही सिर एक ओर टिकाए कुछ सोचने लगा।
"नहीं जानता तुम कौन होगी, या कैसी होगी, हां लेकिन एक बात तो बिलकुल सच है कि ये शादी मेरे लिए एक जिंदगी भर का समझौता है और कुछ भी नहीं, ये तुम जितना जल्दी समझ जाओ उतना ही अच्छा होगा। एक पति होने की सारी जिम्मेदारियां उठाने की पूरी कोशिश रहेगी मेरी लेकिन मैं वो अपनी खुशी से करूंगा या फिर अपनों की खुशी के लिए इसका जवाब सच में मेरे पास नहीं होगा।......... (थोड़ा रुक कर)....... वैसे भी जिस रिश्ते में पसंद या नापसंद की कोई बात ही नहीं आई हो, उसमें कैसी भावनाएं या फिर कैसा जुड़ाव......!!!!" आद्विक खुद में सोचता हुआ बोल रहा था कि तभी उसे हर दिन की तरह बगल वाले कमरे से अपने भैया भाभी के आपस के बहस की जोर जोर की आवाजें आने लगीं और उसने फिर से आंखें बंद कर लीं।
एक रोज सुबह सुबह...............
"ओह मां, ये क्या हरकत है शुभी (नीतिका के छोटे भाई का प्यार का नाम), दिमाग खराब है क्या तुम्हारा?? क्यों नहीं सोने दे रहे हो?? आज सच में पापा को तुम्हारी सारी हरकतें बताऊंगी, देखना.......।" बोलती हुई परेशान हो कर नीतिका अपने बंद आंखों में ही अपने बाल ठीक करते हुए बोल पड़ी क्योंकि किसी ने जोर से उसके बाल खींच कर उसे उठाया था।
"ओहो..... तो मैडम विक्टोरिया यहां सोती रहें चैन से और इतना सारा काम, वो क्या अकेली मैं ही करूंगी??? जी नहीं, मेरी शादी में तुमने मुझसे भी कम काम नहीं कराए थे जो तेरी बारी आने पर तुझे छोड़ दूं। चल उठ....." मुंह बना कर हंसते हुए भव्या बोल पड़ी।
"भावी तुम........." उछलती हुई दोनों सहेलियां एक दूसरे के गले लग गईं।"
नीतिका (भावुक हो कर)- भावी, सच में बहुत -बहुत मिस किया तुझे, thanku आखिर तू आ गई।
भव्या (थोड़ा नाराज होते हुए)- तू और मुझे मिस करती थी, है ना .......?? हुंह.... इसीलिए इस एक महीने में मुश्किल से गिन कर एक -दो कॉल या चार या पांच मैसेज.... मेरे शक्ल पर बेवकूफ लिखा है जो तेरी बात मान लूं।
नीतिका (धीरे से) - नहीं यार, तुझे पता है, ऐसी कोई बात नहीं है, हां बस न्यूली वेडेड कपल को बार -बार कॉल करके परेशान करना अच्छा नहीं लगता था।
भव्या (जान कर चिढ़ाती हुई)- हां, हां, ये सीधा बोल ना, जीजू के खयाल छोड़ेंगे तब ना किसी और का कुछ सोचेगी??
नीतिका भव्या की बातों से बिल्कुल चुप थी जो भव्या भी बड़े गौर से समझने की कोशिश कर रही थी।
भव्या (कुछ सोच कर थोड़ा गंभीरता से)- क्या हुआ नीकू, तू इतनी बुझी हुई क्यों है?? परसों तेरी शादी है पागल..... और एक बात ये बता तूने लड़के से मिलने तक से मना क्यों कर दिया और फिर ये शादी भी इतने सिंपल तरीके से करने की जिद...... जबकि मैं तुझे जितना जानती और समझती हूं तुझे तो इन ढेर सारी रस्मों रिवाजों का कितना शौक है।
नीतिका (शांत हो कर)- नहीं भावी ऐसी कोई बात नहीं है, बस पता नहीं दिल में एक अजीब सा सन्नाटा है कि जैसे जिंदगी में कोई बहुत बड़ी हलचल मचने वाली है। रही बात लड़के से मिलने या मिलाने की, तो तू ये अच्छे से जानती है कि इन चीजों में मैं पहले से ही थोड़ी कच्ची हूं, समझ नहीं आया कि क्या करना चाहिए या क्या नहीं, फिर जब शांति से सोचा तो लगा कि जब मां -पापा दोनों की पसंद है तो अच्छा ही होगा, बांकी जो आगे किस्मत लिख दे।
भावी (प्यार से)- नीकू, plz इतना मत सोच, खुद को रिलैक्स रख..... मैंने जितना उनके बारे में दर्श से सुना है वो बहुत अच्छे हैं। दर्श तो कहते हैं कि तुम्हारी दोस्त को उससे ज्यादा अच्छा जीवनसाथी मिल ही नहीं सकता।
नीतिका चुपचाप भव्या की बात सुन रही थी।
भव्या (फिर से)- देख, देखने में तो सुपर कूल हैं, तू जानती ही है, हां मैंने तो ये भी सुना है कि अपने परिवार पर जान छिड़कते हैं वो तो अपनी बीवी को कितना मानेंगे ये सोच। (कुछ सोच कर)-दर्श और वे बेस्ट फ्रेंड हैं लेकिन एक बस ये बात अजीब है कि मैं भी अब तक उनसे बस एक बार रिसेप्शन में मिली हूं फिर उसके बाद कभी नहीं। उनका या उनके घरवालों का हमारे घर आना जाना काफी कम ही होता है।
भव्या अब तक इस बात से बिल्कुल ही अंजान थी कि नीतिका ने अब तक आद्विक को ठीक से देखा तक नहीं है, यहां तक कि तस्वीर में भी। भव्या आगे कुछ और बोलती कि उसका फोन बजने लगा और वो उठा कर एक साइड में चली गई। उसका चमकता चेहरा ही बता रहा था कि वो दर्श की कॉल थी तो नीतिका बस उसके चेहरे को देख फिर से यूं ही कुछ सोचने लगी।
थोड़ी देर में नीतिका की मां के जोर देने पर दोनों सहेलियां शॉपिंग के लिए चली गईं।
उधर आज काफी दिनों बाद दर्श और आद्विक अपनी पुरानी पसंदीदा जगह "चाचा की चाय" वाली दुकान पर बैठे थे।
दर्श - क्या हो गया है तुझे आज कल ???
आद्विक - क्यों, बिल्कुल भला चंगा तो हूं।
दर्श (कुछ सोच कर)- देख आदि, तेरे बांकी दोस्तों को तू ये कहानियां बता, मुझे नहीं।
दर्श (फिर से)- जो लड़का अपनी एक जींस भी पच्चीस दुकानों में चक्कर लगा कर पसंद करता है उसने एक बार भी उससे मिलने की कोई जिद नहीं की......। जो लड़का जिंदगी भर लव मैरिज की बात करता रहा वो आज अचानक ऐसे सीधे शांत तरीके से किसी से भी शादी करने को तैयार हो गया, ये सब कुछ अजीब नहीं है ??
आद्विक (शांति से)- नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं है। तुझे पता है ना दादू -दादी मेरे लिए क्या हैं...। फिर अगर उसे उन्होंने इतने भरोसे से मेरे लिए चुना है तो यही सही।
आद्विक (फिर से)- मुझे पता है कि इस रिश्ते का कोई खास भविष्य नहीं है लेकिन....... (थोड़ा रुक कर) वैसे भी, अच्छा ही है ना, उनका ये भ्रम भी दूर हो जाएगा.....
दर्श (उसकी बात बीच में काटता हुआ)- ऐसे क्यों बोल रहा है?? लड़की सच में अच्छी है।
आद्विक (हंसते हुए)- जो भी हो... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। हां वैसे एक बात सोच कि बिना मिले, बिना जाने, किस बात पर वे लोग इस शादी के लिए राजी हो गए, (थोड़ा रुक कर)..... यही सोच कर ना, कि लड़का बहुत पैसे वाला है। बेटी पूरी जिंदगी ऐश करेगी।
दर्श (थोड़ा गुस्से में)- क्यों, तुझे उस लड़की को बिना देखे, बिना मिले ये सब कैसे समझ आ गया...??? भगवान है तू कि यहां बैठे हुए तूने सब जान लिया..??
दर्श (फिर से)- जितना मैं उस लड़की को जानता और समझता हूं ना, सच में आज के वक्त में उतना शांत और समझदार होना बहुत बड़ी बात है।
आद्विक (थोड़ा चिढ़ कर)- बस कर अब उसका पुराण, अच्छी है या बुरी, अब फर्क क्या पड़ता है, शादी तो कर ही रहा हूं ना, हां जब असलियत सामने आए तो दुखी मत होना।
दर्श -अपनी सोच पर तू पछताएगा, देखना....।
आद्विक (हंसते हुए)- देखेंगे...... खैर अभी से इस बात पर क्यों बहस करनी, वैसे भी काफी दिनों बाद मिले हैं चल शहर की ही एक तफ़री मारते हैं।
दोनों थोड़ी देर में गाड़ी में बैठ निकल गए।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
