21-10-2022, 05:12 PM
यूं ही दोनों ही सहेलियों का कुछ और वक्त कॉलेज में बीतता गया और वे दोनों ही धीरे -धीरे वहां के माहौल में ढलने लगी थीं। भव्या का झुकाव चूंकि कॉमर्स में पहले से ही था तो वो तैयारियों को ले कर कोई ज्यादा परेशान नहीं होती थी लेकिन वहीं नीतिका पूरी कोशिशें कर रही थी कि फाइनल रिजल्ट्स में उसकी तरफ से कहीं भी कोई चूक ना रह जाए।
वक्त के साथ ही नीतिका और दर्श भी बहुत अच्छे दोस्त तो नहीं लेकिन दोनों के बीच एक अच्छी बॉन्डिंग जरूर बन गई थी जिसकी सबसे बड़ी वजह थी लाइब्रेरी, जहां अकसर दोनों ही एक दूसरे को दिख ही जाते थे। वहीं दर्श भी नीतिका की मेहनत देख उसकी जो हो सके मदद कर दिया करता था।
लेकिन इससे ज्यादा अच्छी बात ये थी कि जो भव्या शुरू में दर्श के नाम से ही चिढ़ती थी वो भी अब धीरे -धीरे उसका आस -पास होना पसंद करने लगी थी। नीतिका भी इस बात को गौर कर रही थी लेकिन वो जब भी कुछ कहती तो भव्या मुंह बना कर उसकी बात टाल देती। वहीं दर्श की भी हरकतों से अब तक ऐसा कुछ ज्यादा नहीं समझ आ रहा था।
एक दिन नीतिका किसी जरूरी वजह से कॉलेज नहीं आ पाई और भव्या को ना चाहते हुए भी अकेले आना ही पड़ा क्योंकि आज खंडेलिया सर की स्पेशल क्लास थी और अगर दोनों में से कोई भी एक नहीं होती तो अगले दिन किसी और से नोट्स मिलने मुश्किल हो जाते। आखिर मन मसोस कर वो अकेली ही आई थी। कुछ क्लासेज के बाद जब खाली वक्त था तो कॉफी पीने का मन तो उसका बहुत हुआ लेकिन अकेले होने की वजह से वो कैंटीन भी नहीं गई और कुछ सोच कर चुपचाप लाइब्रेरी की ओर जाने लगी।
"अगर तुम्हें बुरा न लगे और कोई दिक्कत ना हो तो क्या एक कप कॉफी पी सकते हैं कैंटीन चलकर??" अचानक से पीछे से किसी की आवाज आई तो भव्या भी हैरानी से मुड़ कर देखने लगी। आज दर्श को यूं शांत खड़ा देख उसे ना जाने क्यों लेकिन बहुत अच्छा लग रहा था। लेकिन अगले ही पल कुछ सोच कर चुप हो गई।
दर्श - क्या हुआ, क्या सोच रही हो?? एक कप कॉफी कह रहा हूं बस, तुम्हारा किडनी नहीं मांग रहा जो यूं गुम होकर खड़ी हो गई हो।
भव्या (घूरते हुए)- मेरा किडनी इतना भी सस्ता नहीं है है कि ऐसे वैसे लोगों पर लुटाती फिरूं।
दर्श (हंसते हुए)- हां भाई, तुम्हारी किडनी पर तो सिर्फ नीकू का ही हक होगा, क्यों है ना ??
भव्या को आज उसके सामने किसी और का नीतिका को यूं नीकू कहना अच्छा नहीं लगा, और वो चुप हो गई जो शायद दर्श भी समझ गया था।
दर्श (मुस्कुरा कर बात बदलते हुए) - अच्छा भाई, ये बताओ चल रही हो या नहीं, अब नीतिका होती तो कब का हां कर देती अपने दोस्त की एक बात पर फिर चाहे उसका मन हो भी या ना भी।
वो कुछ और कहता कि भव्या भी अब तक बिना कुछ बोले कैंटीन की ओर मुड़ गई और ये देख कर दर्श भी खुश हो गया। दोनों कॉफी के साथ थोड़ी देर इधर उधर की बातें करते रहे जिसमें दोनों की ही नजरें रह -रह कर एक दूसरे से टकराती और फिर वे दोनों ही इधर उधर देखने लगते। दोनों ने कुछ यहां वहां की बातें की और थोड़ी देर में कॉफी खत्म होने के बाद दोनों अपनी -अपनी क्लास के लिए उठ कर चले गए।
आज काफी वक्त बाद शाम को आद्विक और दर्श अपने उसी फेवरेट चाय की स्टाल पर मिले थे। दोनों अपनी अपनी चाय ले कर वहीं पास में लगी अपनी बाइक के पास अटक कर खड़े हो गए।
आद्विक - क्या भाई, क्या चल रहा है आज कल ?? हीरो को आज कल कॉफी खूब पसंद आने लगी है, क्या बात है??
दर्श भी आद्विक की बातों से समझ गया था कि वो जरूर आज के भव्या और उसकी कॉफी की बात कर रहा था।
दर्श - अरे, वो तो बस ऐसे ही, आज उसकी दोस्त नहीं आई थी ना, इसीलिए सोचा.....
आद्विक (हंसते हुए)- भाई, को तो तूने कभी इतने प्यार वाली कॉफी नहीं पिलाई??
दर्श झेंप गया।
आद्विक (फिर से)- वैसे कब से चल रहा है ये सब ?? और बांकी छोड़ ये बता कि मुझे ये सब कब बताने वाला था तू कमीने??
दर्श (थोड़ा शरमाते हुए)- अरे, ऐसा कुछ खास भी नहीं है, ये तो बस ऐसे ही.................... (थोड़ा रुक कर) और उसे भी तो अब तक इस बात का कोई अंदाजा नहीं है ??
आद्विक - ओहो, तो हमारा भाई शर्माता भी है......
दर्श फिर से शर्मा गया।
आद्विक (कुछ सोच कर)- देख भाई बस इतना कहूंगा कि आज कल की लड़कियों का जल्दबाजी में कोई भरोसा मत करना। इनका कुछ पता नहीं होता कि कब कौन सा रंग दिखला दें।
दर्श (गंभीर हो कर)- नहीं, वो ऐसी नहीं है। वो तो.......
आद्विक (हंसते हुए)- क्या बात है, मेरा जो भाई हमेशा से प्यार और मुहब्बत के नाम से दूर भागता था वो यूं किसी लड़की के नाम पर इतना शर्माएगा, पता नहीं था।
दर्श - नहीं यार, वो सच में बहुत प्यारी है।
आद्विक - अच्छा अब ये बता कि ये सारी बातें तू उसे कब बताएगा, अब तो बस कुछ ही दिन बचे हैं हमारे कॉलेज के ???
दर्श (थोड़ा उदास सा)- हां यार.....
आद्विक - इसीलिए तो कह रहा हूं कि पहले ही बात कर लो आपस में ताकि आगे की चीज़ें आराम से सोच सको।
दर्श - वही सोच रहा हूं कि क्या और कैसे करूं यह सब ??
आद्विक - तो फिर फेयरवेल पार्टी में कह दे।
दर्श (कुछ सोच कर खुशी से)- हां बात तो तू ठीक कर रहा है, वही करूंगा। फिर चाहे उसका फैसला जो भी हो।
समय यूं ही गुजर रहा था और आखिर थर्ड ईयर वालों के लिए फेयरवेल पार्टी की तैयारियां होने लगीं जिसमें हर जूनियर को अपने सीनियर का ध्यान रखना था। मेहमानों के स्वागत से ले कर बांकी सारा खयाल रखने की जिम्मेदारी फर्स्ट ईयर वालों को भी दी गई थी। जहां नीतिका अपने स्वभावानुसार इन चीज़ों से दूर ही रहना चाहती थी वहीं भव्या हर एक तैयारी और चहल पहल देख कर उतनी ही खुश थी।
फेयरवेल पार्टी को ध्यान में रख कर सबका काम पहले से ही बांट दिया गया था ताकि लास्ट मिनट पर कहीं भी कोई दिक्कत न हो। भव्या और नीतिका दोनों एक ही ग्रुप में रहना चाहती थीं लेकिन कुछ सीनियर्स ने शायद जान कर दोनों को अलग -अलग काम दे दिया। जहां एक ओर भव्या को सभी सीनियर्स का वेलकम और बैठने का खयाल रखने को कहा गया वहीं नीतिका को स्टेज डेकोरेशन का काम मिला। दोनों ही अब कहीं ना कहीं अपने काम से संतुष्ट ही थीं क्योंकि जहां भव्या को सबसे मिलना जुलना अच्छा लगता था वहीं नीतिका को ड्राइंग और क्रिएटिविटी पसंद थी।
आखीरकार तय दिन के हिसाब से फेयरवेल पार्टी का दिन आ ही गया। इन दोनों ने भी अपने घर में आज की पार्टी की बात बताई तो दोनों के ही मां बाप ने अच्छे से संभल कर कुछ भी करने को कह दिया। वहीं दूसरी ओर विवेक चूंकि इन माहौलों से अच्छे से परिचित था तो उसने एक दो बार इन्हें मना भी किया लेकिन किसी ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
दोनों ही दोस्त कॉलेज जा पहुंची जहां आज की रौनक तो और भी खूब थी। सारे एक से एक खूबसूरत लग रहे थे। एक दो पहचान की लड़कियों ने इन दोनों को साड़ी नहीं पहन कर आने की वजह पूछी तो इन्होंने भी बहाना बना कर टाल दिया क्योंकि ये दोनों अच्छे से जानती थीं कि इनकी ऐसी कोई भी बात घर पर नहीं मानी जाएगी तो इन्होंने इसकी चर्चा ही नहीं की थी। फिर भी सलवार कमीज में भी ये दोनों एक से एक खूबसूरत लग रही थीं।
थोड़ी ही देर में सीनियर्स का भी आना शुरू हो चुका था और तभी सामने से दर्श सामने से आता दिखा चूंकि भव्या को सभी सीनियर्स की अगुवाई का काम मिला था तो उसकी नजर जैसे ही आज दर्श पर गई उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। वो उसे जितना ही संभालती वो उतनी ही रफ्तार पकड़ लेता। ब्लू जींस, पर v -neck टी शर्ट और उस पर एक डार्क ब्लू कलर की ब्लेजर। बिल्कुल साधारण सी तैयारी में भी वो बहुत ही ज्यादा हैंडसम लग रहा था जिसकी शायद सबसे बड़ी वजह उसके चेहरे की मुस्कान थी। जहां भव्या की नजर चाह कर भी दर्श से नहीं हट रही थी वहीं दर्श भी आज भव्या को यूं देखे जा रहा था जैसे जिंदगी भर के लिए इन पलों को जीना चाहता था। भले ही बांकि कोई इनकी हालत समझ पाया हो या नहीं लेकिन आद्विक और नीतिका दोनों ही इन्हें देख बस मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
भव्या जैसे ही दर्श के थोड़े पास आई, तो दर्श भी आज उसकी खूबसूरती में और भी डूबे जा रहा था। हल्के पीले रंग के पटियाला सूट में उसके आधे खुले बाल जिसकी कुछ लट खुद बाखुद उसके चेहरे पर गिरी पड़ी थीं, उस पर उसकी बड़ी काली आंखों में हल्की सी शर्म उसे और खूबसूरत बना रही थीं। भव्या ने एक छोटा सा गुलाब का फूल दर्श को पकड़ाया जो उसे सारे सीनियर्स को वेलकम के लिए देना था और उसे वेलकम कह कर हल्के से उसकी आंखों में देख कर वापस मुड़ने लगी।
"कुबूल है....." अचानक से ये धीमे शब्द भव्या के कानों में पड़े और वो वहीं शर्म से जम गई क्योंकि ये आवाज किसी और की नहीं दर्श की थी।
बहुत मुश्किल से खुद को संभालते हुए भव्या ने जब मुड़ कर देखा तो तब तक दर्श और बांकी सभी लोग वहां से कब का जा चुके थे।
नीतिका (जान कर छेड़ते हुए)- क्या हुआ, ऐसे शर्मा कर क्यों खड़ी है किसी ने कुछ खास कह दिया क्या ??
भव्या (हकलाते हुए)- न.......नहीं..... नहीं तो......
वक्त के साथ ही नीतिका और दर्श भी बहुत अच्छे दोस्त तो नहीं लेकिन दोनों के बीच एक अच्छी बॉन्डिंग जरूर बन गई थी जिसकी सबसे बड़ी वजह थी लाइब्रेरी, जहां अकसर दोनों ही एक दूसरे को दिख ही जाते थे। वहीं दर्श भी नीतिका की मेहनत देख उसकी जो हो सके मदद कर दिया करता था।
लेकिन इससे ज्यादा अच्छी बात ये थी कि जो भव्या शुरू में दर्श के नाम से ही चिढ़ती थी वो भी अब धीरे -धीरे उसका आस -पास होना पसंद करने लगी थी। नीतिका भी इस बात को गौर कर रही थी लेकिन वो जब भी कुछ कहती तो भव्या मुंह बना कर उसकी बात टाल देती। वहीं दर्श की भी हरकतों से अब तक ऐसा कुछ ज्यादा नहीं समझ आ रहा था।
एक दिन नीतिका किसी जरूरी वजह से कॉलेज नहीं आ पाई और भव्या को ना चाहते हुए भी अकेले आना ही पड़ा क्योंकि आज खंडेलिया सर की स्पेशल क्लास थी और अगर दोनों में से कोई भी एक नहीं होती तो अगले दिन किसी और से नोट्स मिलने मुश्किल हो जाते। आखिर मन मसोस कर वो अकेली ही आई थी। कुछ क्लासेज के बाद जब खाली वक्त था तो कॉफी पीने का मन तो उसका बहुत हुआ लेकिन अकेले होने की वजह से वो कैंटीन भी नहीं गई और कुछ सोच कर चुपचाप लाइब्रेरी की ओर जाने लगी।
"अगर तुम्हें बुरा न लगे और कोई दिक्कत ना हो तो क्या एक कप कॉफी पी सकते हैं कैंटीन चलकर??" अचानक से पीछे से किसी की आवाज आई तो भव्या भी हैरानी से मुड़ कर देखने लगी। आज दर्श को यूं शांत खड़ा देख उसे ना जाने क्यों लेकिन बहुत अच्छा लग रहा था। लेकिन अगले ही पल कुछ सोच कर चुप हो गई।
दर्श - क्या हुआ, क्या सोच रही हो?? एक कप कॉफी कह रहा हूं बस, तुम्हारा किडनी नहीं मांग रहा जो यूं गुम होकर खड़ी हो गई हो।
भव्या (घूरते हुए)- मेरा किडनी इतना भी सस्ता नहीं है है कि ऐसे वैसे लोगों पर लुटाती फिरूं।
दर्श (हंसते हुए)- हां भाई, तुम्हारी किडनी पर तो सिर्फ नीकू का ही हक होगा, क्यों है ना ??
भव्या को आज उसके सामने किसी और का नीतिका को यूं नीकू कहना अच्छा नहीं लगा, और वो चुप हो गई जो शायद दर्श भी समझ गया था।
दर्श (मुस्कुरा कर बात बदलते हुए) - अच्छा भाई, ये बताओ चल रही हो या नहीं, अब नीतिका होती तो कब का हां कर देती अपने दोस्त की एक बात पर फिर चाहे उसका मन हो भी या ना भी।
वो कुछ और कहता कि भव्या भी अब तक बिना कुछ बोले कैंटीन की ओर मुड़ गई और ये देख कर दर्श भी खुश हो गया। दोनों कॉफी के साथ थोड़ी देर इधर उधर की बातें करते रहे जिसमें दोनों की ही नजरें रह -रह कर एक दूसरे से टकराती और फिर वे दोनों ही इधर उधर देखने लगते। दोनों ने कुछ यहां वहां की बातें की और थोड़ी देर में कॉफी खत्म होने के बाद दोनों अपनी -अपनी क्लास के लिए उठ कर चले गए।
आज काफी वक्त बाद शाम को आद्विक और दर्श अपने उसी फेवरेट चाय की स्टाल पर मिले थे। दोनों अपनी अपनी चाय ले कर वहीं पास में लगी अपनी बाइक के पास अटक कर खड़े हो गए।
आद्विक - क्या भाई, क्या चल रहा है आज कल ?? हीरो को आज कल कॉफी खूब पसंद आने लगी है, क्या बात है??
दर्श भी आद्विक की बातों से समझ गया था कि वो जरूर आज के भव्या और उसकी कॉफी की बात कर रहा था।
दर्श - अरे, वो तो बस ऐसे ही, आज उसकी दोस्त नहीं आई थी ना, इसीलिए सोचा.....
आद्विक (हंसते हुए)- भाई, को तो तूने कभी इतने प्यार वाली कॉफी नहीं पिलाई??
दर्श झेंप गया।
आद्विक (फिर से)- वैसे कब से चल रहा है ये सब ?? और बांकी छोड़ ये बता कि मुझे ये सब कब बताने वाला था तू कमीने??
दर्श (थोड़ा शरमाते हुए)- अरे, ऐसा कुछ खास भी नहीं है, ये तो बस ऐसे ही.................... (थोड़ा रुक कर) और उसे भी तो अब तक इस बात का कोई अंदाजा नहीं है ??
आद्विक - ओहो, तो हमारा भाई शर्माता भी है......
दर्श फिर से शर्मा गया।
आद्विक (कुछ सोच कर)- देख भाई बस इतना कहूंगा कि आज कल की लड़कियों का जल्दबाजी में कोई भरोसा मत करना। इनका कुछ पता नहीं होता कि कब कौन सा रंग दिखला दें।
दर्श (गंभीर हो कर)- नहीं, वो ऐसी नहीं है। वो तो.......
आद्विक (हंसते हुए)- क्या बात है, मेरा जो भाई हमेशा से प्यार और मुहब्बत के नाम से दूर भागता था वो यूं किसी लड़की के नाम पर इतना शर्माएगा, पता नहीं था।
दर्श - नहीं यार, वो सच में बहुत प्यारी है।
आद्विक - अच्छा अब ये बता कि ये सारी बातें तू उसे कब बताएगा, अब तो बस कुछ ही दिन बचे हैं हमारे कॉलेज के ???
दर्श (थोड़ा उदास सा)- हां यार.....
आद्विक - इसीलिए तो कह रहा हूं कि पहले ही बात कर लो आपस में ताकि आगे की चीज़ें आराम से सोच सको।
दर्श - वही सोच रहा हूं कि क्या और कैसे करूं यह सब ??
आद्विक - तो फिर फेयरवेल पार्टी में कह दे।
दर्श (कुछ सोच कर खुशी से)- हां बात तो तू ठीक कर रहा है, वही करूंगा। फिर चाहे उसका फैसला जो भी हो।
समय यूं ही गुजर रहा था और आखिर थर्ड ईयर वालों के लिए फेयरवेल पार्टी की तैयारियां होने लगीं जिसमें हर जूनियर को अपने सीनियर का ध्यान रखना था। मेहमानों के स्वागत से ले कर बांकी सारा खयाल रखने की जिम्मेदारी फर्स्ट ईयर वालों को भी दी गई थी। जहां नीतिका अपने स्वभावानुसार इन चीज़ों से दूर ही रहना चाहती थी वहीं भव्या हर एक तैयारी और चहल पहल देख कर उतनी ही खुश थी।
फेयरवेल पार्टी को ध्यान में रख कर सबका काम पहले से ही बांट दिया गया था ताकि लास्ट मिनट पर कहीं भी कोई दिक्कत न हो। भव्या और नीतिका दोनों एक ही ग्रुप में रहना चाहती थीं लेकिन कुछ सीनियर्स ने शायद जान कर दोनों को अलग -अलग काम दे दिया। जहां एक ओर भव्या को सभी सीनियर्स का वेलकम और बैठने का खयाल रखने को कहा गया वहीं नीतिका को स्टेज डेकोरेशन का काम मिला। दोनों ही अब कहीं ना कहीं अपने काम से संतुष्ट ही थीं क्योंकि जहां भव्या को सबसे मिलना जुलना अच्छा लगता था वहीं नीतिका को ड्राइंग और क्रिएटिविटी पसंद थी।
आखीरकार तय दिन के हिसाब से फेयरवेल पार्टी का दिन आ ही गया। इन दोनों ने भी अपने घर में आज की पार्टी की बात बताई तो दोनों के ही मां बाप ने अच्छे से संभल कर कुछ भी करने को कह दिया। वहीं दूसरी ओर विवेक चूंकि इन माहौलों से अच्छे से परिचित था तो उसने एक दो बार इन्हें मना भी किया लेकिन किसी ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
दोनों ही दोस्त कॉलेज जा पहुंची जहां आज की रौनक तो और भी खूब थी। सारे एक से एक खूबसूरत लग रहे थे। एक दो पहचान की लड़कियों ने इन दोनों को साड़ी नहीं पहन कर आने की वजह पूछी तो इन्होंने भी बहाना बना कर टाल दिया क्योंकि ये दोनों अच्छे से जानती थीं कि इनकी ऐसी कोई भी बात घर पर नहीं मानी जाएगी तो इन्होंने इसकी चर्चा ही नहीं की थी। फिर भी सलवार कमीज में भी ये दोनों एक से एक खूबसूरत लग रही थीं।
थोड़ी ही देर में सीनियर्स का भी आना शुरू हो चुका था और तभी सामने से दर्श सामने से आता दिखा चूंकि भव्या को सभी सीनियर्स की अगुवाई का काम मिला था तो उसकी नजर जैसे ही आज दर्श पर गई उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। वो उसे जितना ही संभालती वो उतनी ही रफ्तार पकड़ लेता। ब्लू जींस, पर v -neck टी शर्ट और उस पर एक डार्क ब्लू कलर की ब्लेजर। बिल्कुल साधारण सी तैयारी में भी वो बहुत ही ज्यादा हैंडसम लग रहा था जिसकी शायद सबसे बड़ी वजह उसके चेहरे की मुस्कान थी। जहां भव्या की नजर चाह कर भी दर्श से नहीं हट रही थी वहीं दर्श भी आज भव्या को यूं देखे जा रहा था जैसे जिंदगी भर के लिए इन पलों को जीना चाहता था। भले ही बांकि कोई इनकी हालत समझ पाया हो या नहीं लेकिन आद्विक और नीतिका दोनों ही इन्हें देख बस मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
भव्या जैसे ही दर्श के थोड़े पास आई, तो दर्श भी आज उसकी खूबसूरती में और भी डूबे जा रहा था। हल्के पीले रंग के पटियाला सूट में उसके आधे खुले बाल जिसकी कुछ लट खुद बाखुद उसके चेहरे पर गिरी पड़ी थीं, उस पर उसकी बड़ी काली आंखों में हल्की सी शर्म उसे और खूबसूरत बना रही थीं। भव्या ने एक छोटा सा गुलाब का फूल दर्श को पकड़ाया जो उसे सारे सीनियर्स को वेलकम के लिए देना था और उसे वेलकम कह कर हल्के से उसकी आंखों में देख कर वापस मुड़ने लगी।
"कुबूल है....." अचानक से ये धीमे शब्द भव्या के कानों में पड़े और वो वहीं शर्म से जम गई क्योंकि ये आवाज किसी और की नहीं दर्श की थी।
बहुत मुश्किल से खुद को संभालते हुए भव्या ने जब मुड़ कर देखा तो तब तक दर्श और बांकी सभी लोग वहां से कब का जा चुके थे।
नीतिका (जान कर छेड़ते हुए)- क्या हुआ, ऐसे शर्मा कर क्यों खड़ी है किसी ने कुछ खास कह दिया क्या ??
भव्या (हकलाते हुए)- न.......नहीं..... नहीं तो......
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
