05-07-2022, 11:49 AM
भाग 94
रास्ते भर सुगना और सोनू मनोरमा की तारीफों के पुल बांधते रहे परंतु मनोरमा के बिस्तर पर वीर्य के निशान देख सुगना का मन कुछ खट्टा हो गया था…
मनोरमा की बंजर हो चुकी कोख को किसने सींचा सींचा होगा सुगना के लिए प्रश्न बन चुका था…
मनोरमा के बारे में यदि कोई शख्स बता सकता था तो वह थे उसके बाबूजी शरीर से इसके अलावा सुगना की जिज्ञासा शांत करने वाला और कोई ना था…वह एंबेसडर कार के गेस्ट हाउस पहुंचने की राह देखने लगी..
उधर सोनू अपनी बड़ी बहन सुगना की चुचियों को अपने दिमाग में अनावृत कर रहा था…
सुगना और सरयू सिंह दोनों एक दूसरे का इंतजार कर रहे थे पर अपने अपने प्रश्नों और जिज्ञासाओं के साथ…
अब आगे….
अंततः सुगना सोनू और दोनों छोटे बच्चे गेस्ट हाउस आ गए …लाबी में टहलते हुए सरयू सिंह सूरज को दिखाई पड़ गए और वह अपने छोटे-छोटे कदमों से भागता हुआ सरयू सिंह के पास जाकर बोला
"बाबा मैं आ गया"
अब तक सुगना भी सरयू सिंह के करीब आ चुकी थी उसने कहा बा
"बाबूजी लगता राउर तबीयत ठीक हो गईल "
"हां अब ठीक लगाता का कहत रहली मनोरमा मैडम"
"कुछो ना…लेकिन आपके खोजत रहली"
अब तक सोनू भी आ चुका था
" सरयू चाचा कितना सुंदर घर बा मनोरमा मैडम के घर एकदम महल जैसे"
जिस महल की सोनू दिल खोलकर तारीफ कर रहा था उस महल की मालकिन को सरयू सिंह बीती रात एक नहीं दो दो बार कसकर चोद कर आए थे.
सरयू सिंह का स्वाभिमान बीती रात से बुलंदियों पर था.. परंतु मन के अंदर आ चुका डर कायम था..
सुगना से और प्रश्न पूछना उचित न था सोनू बगल में ही खड़ा था। सभी लोग कमरे में आ गए सरयू सिंह भी खाना खा चुके थे। शाम को वापस बनारस जाने की ट्रेन पकड़नी थी। समय कम था सरयू सिंह और सुगना दोनों एकांत खोज रहे थे… उन दोनों को अपनी अपनी जिज्ञासा शांत करनी थी…उधर सोनू सुगना के साथ ढेरो बाते करना चाहता था..
सुगना अपने पूर्व और वर्तमान प्रेमी के बीच झूल रही थी…अंत में विजय एसडीएम साहब की हुई और वह सुगना को बाजार ले जाने में कामयाब हो गए.. आखिर उन्हें सुगना उसके बच्चों और बनारस में बैठी अपनी दोनों बहनों के लिए कुछ ना कुछ उपहार खरीदने थे। आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण था और सोनू की खुशियों पर पूरे परिवार का हक था.
व्यस्तता और वासना दोनों एक दूसरे की दुश्मन है…सोनू ने आज का पूरा दिन लगभग सुगना के साथ ही बिताया था परंतु उसकी वासना व्यस्तता की भेंट चढ़ गई थी… बाजार से लौटते लौटते शाम के 6:00 बज चुके थे और 2 घंटे बाद ही मैं वापस स्टेशन के लिए निकलना था।
सोनू की हालत आजकल के आशिक हो जैसी हो गई थी जो अपनी गर्लफ्रेंड को दिन भर घुमाते शापिंग कराते दिन भर उसके खूबसूरत जिस्म और सानिध्य का लाभ उठाकर अपने लंड में तनाव भरते हैं लंड के सुपाड़े से लार टपकाते परंतु शाम ढलते ढलते विदा होने का वक्त हो जाता ….
सोनू मायूस हो रहा था दिन भर की खुशियां शाम आते आते धूमिल पड़ रही थी सुगना जाने वाली थी और सोनू का मन उदास था परंतु पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में कोई बदलाव कर पाना संभावना न था।
सोनू को भी अपना सामान समेटकर बनारस आना था परंतु कुछ कागजी कार्रवाई पूर्ण न होने की वजह से वह चाहकर भी सुगना के साथ बनारस नहीं जा पा रहा था।
सूरज एक बार फिर उत्साहित था। ट्रेन में बैठ ना उसे बेहद अच्छा लगता था उसने सोनू से कहा
"मामा जल्दी चलो गाड़ी छूट जाएगी…"
सोनू को पल के लिए लगा जैसे सब सुगना को उससे दूर कर रहे हैं...
सोनू ने बाजार से सुगना के लिए एक बेहद खूबसूरत लहंगा चोली खरीदा था.. जो रेशम के महीन कपड़े से बना था और जिस पर हाथ की कढ़ाई की गई थी…
नकली सितारों की चमक दमक से दूर वह लहंगा चोली बेहद खूबसूरत था जिसे सामान्य तौर पर भी बिना किसी विशेष प्रयोजन के भी पहना जा सकता था..
न जाने सोनू के मन में क्या आया उसने सुगना से कहा..
"दीदी जाए से पहले कपड़वा नाप ले छोट बढ़ हुई तब बदल देब.."
समय कम था परंतु सोनू की बातें तर्कसंगत थी …
कमरे में सोनू दोनों बच्चों के साथ खेलने लगा और सुगना बाथरूम में जाकर अपने कपड़े बदलने लगी…
हल्के गुलाबी रंग के लहंगा चोली में सुगना बेहद खूबसूरत लग रही थी सुंदर और सुडौल काया पर वस्त्र और भी खिल उठते हैं।
चोली तो जैसे सुगना की काया के लिए ही बनी थी.. चूचियों के लिए दी गई जगह शायद कुछ कम पड़ रही थी परंतु सुगना की कोमल चुचियों ने स्वयं को उन में समायोजित कर लिया था परंतु कपड़ों का तनाव चूचियों के आकार का अंदाजा बखूबी दे रहा था.. चोली की लंबाई सुगना की कमर तक आ रही थी…सोनू चाहता तो यही था कि चोली की लंबाई ब्लाउज के बराबर ही रहे….परंतु सुगना जो अब दो बच्चों की मां थी वह अपने सपाट पेट और नाभि का खुला प्रदर्शन कतई नहीं करना चाहती थी।
उसने यही चोली पसंद की थी जो उसकी कमर तक आ रही थी। परंतु सुगना को क्या पता था जिस मदमस्त कमर को वह चोली के भीतर छुपाना चाहती वह छिपने लायक न थी । चोली में सुगना की खूबसूरती को और उभार दिया था..
सोनू सुगना को देखकर फूला नहीं समा रहा था। उसकी अप्सरा उसकी आंखों के सामने उसके द्वारा दिए गए वस्त्र पहने अपने बाल संवारे रही थी.. काश सुगना उसकी बहन ना होती तो शायद इतनी आवभगत करने का इनाम सोनू अवश्य ले लिया होता।
सरयू सिंह वापस आ चुके थे और सुगना को लहंगा चोली में देखकर दंग रह गए..
सुगना अपनी युवा अवस्था में हमेशा लहंगा और चोली ही पहनती भी और सरयू सिंह के हमेशा से उसके इस पहनावे के कायल थे…सपाट पेट और उस पर छोटी सी नाभि.. सरयू सिंह को बेहद भाती।
जब पहली बार जब सरयू सिंह और सुगना ने मिलकर दीपावली मनाई थी उस दिन भी सुगना ने लहंगा और चोली ही पहना था।
सुगना के उस दिव्य स्वरूप को याद कर सरयू सिंह को कुछ हुआ हो या ना हुआ हो परंतु लंगोट में कैद सुगना का चहेता लंड हरकत में आ रहा था।
वह तो भला हो सरयू सिंह के कसे हुए लंगोट का अन्यथा वह अब तक उछल कर अपने आकार में आ रहा होता। सरयू सिंह ने सुगना से कहा
" चला देर होता वैसे भी स्टेशन में आज ढेर भीड़ भाड़ होखी"..
"बाबूजी रुक जा जाई कपड़ा बदल के चलत बानी"
"अरे कपड़ा ठीक त बा… यही पहन के चला फिर बदले में देर होखी "
सरयू सिंह देरी कतई नहीं करना चाहते थे…उन्होंने हनुमान जी की तरह दोनों बच्चों को गोद में लिया और गेस्ट हाउस से बाहर आने लगे।
कुछ ही देर बाद एक बार फिर सोनू अपनी बहन सुगना के साथ रिक्शे में बैठकर स्टेशन की तरफ जाने लगा..
लहंगा चोली में सुगना और पजामे कुर्ते में सोनू.. जो भी देखता एक पल के लिए अपने नजरें उन पर टिका लेता नियति के रचे दो खूबसूरत पात्र धीरे-धीरे बिछड़ने के लिए रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे ..
सोनू के उदास चेहरे को देखकर सुगना दुखी हो रही थी अंततः उससे रहा न गया उसने सोनू के हाथ को अपनी कोमल हथेलियों के बीच में ले लिया और सहलाते हुए बोली
"ते दुखी काहे बाडे… हम कोई हमेशा तोहरा साथ थोड़ी रहब। दू दिन खाती आईल रहनी अब जा तानी……वैसे दू दिन बाद तहरा भी त बनारस आवे के बा"
सुगना की बातें सुनकर सोनू और भी दुखी हो गया परंतु सुगना की कोमल हथेलीयों के बीच में उसकी हथेली के स्पर्श में न जाने किस भाव का अनुभव किया और सोनू के शरीर में एक सनसनी फैल गई…
युवा मर्दों का सबसे संवेदनशील अंग उनका लंड ही होता है और सुगना के स्पर्श ने सबसे ज्यादा यदि किसी अंग पर असर किया तो वह था सोनू का लंड …अचानक ही सोनू की भावनाएं बदल गईं…. साथ रिक्शे पर बैठी उसकी बहन सुगना एक बार फिर अपने मदमस्त और अतृप्त यौवन लिए उसकी निगाहों के सामने अठखेलियां करने लगी… सोनू ने सुगना के कामुक अंगो को और करीब से निहारना चाहा परंतु सिवाय चुचियों के उसे कुछ न दिखाई पड़ा। परंतु सोनू का लाया लहंगा कमाल का था…. रेशम के महीन धागे से बना वह लहंगा पारदर्शी तो न था परंतु बेहद पतला और मुलायम था…उसने सुगना की कोमल जांघों से सट कर उन पर एक आवरण देने की कोशिश जरूर की थी परंतु सुगना की पुष्ट जांघों के आकार को छुपा पाने में कतई नाकाम था।
सुगना बार बार अपने दोनों पैर फैला कर लहंगे को दोनों जांघों के बीच सटने से रोकती और अपनी जांघों के आकार को सोनू की नजरों से बचाने की कोशिश करती..
भीनी भीनी हवा चल रही थी और मौसम बेहद सुहावना था कभी-कभी सुगना को एहसास होता जैसे उसने कुछ पहना ही ना हो…रेशम का कपड़ा सुगना की रेशमी त्वचा के साथ तालमेल बिठा चुका था और सुगना को एक अद्भुत एहसास दे रहा था ..
सोनू को सुगना का और कोई अंग दिखाई दे या ना दे परंतु सुगना के कोमल और हल्की लालिमा लिए हुए गाल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे और होठों का तो कहना ही क्या ऐसा लग रहा था जैसे होठों में चाशनी भरी हुई थी…
काश काश लाली दीदी के होठ भी सुगना दीदी जैसे होते..
सोनू को अपने बचपन के दिन याद आने लगे जब वह सुगना के गालों को बेझिझक चुम लिया करता था परंतु आज शायद यह संभव न था रिश्ता वही था सुगना भी वही थी परंतु सोनू बदल चुका था ऐसा क्या हो गया था जो अब वह सुगना को चूमने मैं असहज महसूस कर रहा था…
जवानी रिश्तो की परिभाषा बदल देती है…युवा स्त्री और पुरुष कभी भी एक दूसरे को चूम नहीं सकते चाहे वह किसी भी पावन रिश्ते से बंधे क्यों ना हो…
हां माथे का चुंबन अपनी जगह है….
रेलवे स्टेशन आने वाला था परंतु उससे पहले रेलवे क्रासिंग आ चुकी थी। सारे वाहनों पर विराम लगा हुआ था… रिक्शेवाले अपने मैले कुचैले तौलिए से अपना चेहरा पोंछ रहे थे…सरयू सिंह ने पीछे मुड़कर सुगना और सोनू को देखा वह मन ही मन अपने फैसले पर प्रसन्न हो रहे थे कि उन्होंने स्टेशन जल्दी आने का फैसला लेकर सही कार्य किया था.. अचानक सोनू का ध्यान बगल की दीवार पर लगे किसी एडल्ट फिल्म के पोस्टर पर चला गया…
फिल्म का नाम था "लहंगा में धूम धाम"
पोस्टर में दिख रही हीरोइन ने भी संयोग से लहंगा और चोली ही पहना हुआ था परंतु उसकी चोली तंग थी और चूचियां उभर कर बाहर आ रही थीं … शायद निर्देशक ने उन वस्त्रों का चयन ही इसलिए किया था ताकि वह चुचियों को और उभार सके..
इसी प्रकार लहंगा लहंगा ना होकर एक स्कर्ट के रूप में था और हीरोइन के नंगे पैर पिंडलियों चमक रहे थे सोनू लालसा भरी निगाहों से उस पोस्टर को देखे जा रहा था
सोनू को वासना भरी निगाहों से पोस्टर की तरफ देखते हुए देख कर सुगना स्वयं शर्मसार हो रही थी उसने सोनू का ध्यान खींचने के लिए बोला..
"अब अपन ब्याह के मन बना ले ई सब ताक झांक ठीक नईखे"
"अब सब तहारे हांथ में बा.."
"तोरा इतना फोटो में कोई पसंद काहे नईखे परत?"
सोनू क्या जवाब देता वह सुगना के प्यार में पागल हो चुका था…प्यार तो वह सुनना से पहले भी करता था परंतु अब वह जिस रूप में सुगना को चाहने लगा था …उसे और कोई लड़की पसंद नहीं आ सकती थी.. इतना प्यार करने वाली सुगना जैसी खुबसूरत युवती मिलना असंभव ही नही नामुमकिन था…
सोनू ने खुद को संभाला और मुस्कुराने लगा.. परंतु उस में कुछ न कहा सुगना ने फिर पूछा
" बोलत काहे नहींखे .."
"तू दुनिया में अकेले ही आईल बाड़ू का? तोहरा जैसन केहू काहे नईखे मिलत.."
सुगना निरुत्तर हो गई और शर्मसार भी ऐसा नहीं है कि सोनू ने यह बात पहली बार कही थी परंतु फिर भी अपनी होने वाली पत्नी की तुलना अपनी बड़ी बहन से करना …..शायद सोनू ने बातचीत की मर्यादा का दायरा बढ़ा दिया था दिया था।
सुगना यह बातें पहले भी सुन चुकी थी उसे उसे अब यह सामान्य लगने लगा था.. ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज का उसके होठों को कभी-कभी चूम लेना… ना जाने क्यों सोनू के इस कथन में उसे अपनी तारीफ नजर आती और वह मन ही मन मुस्कुरा उठती उसे यह कतई पता न था कि उसकी मुस्कुराहट सोनू को और उकसा रही थी।
मुस्कुराती हुई सुगना और भी ज्यादा खूबसूरत लगती थी।
मुस्कुराहट वैसे भी सौंदर्य को निखार देती है और लज्जा वश आई मुस्कुराहट का कहना ही क्या..
सोनू उस हीरोइन को छोड़ सुगना के शर्म से लाल हुए गाल देखने लगा …
रेलवे केबिन में बैठी नियति सोनू और सुगना दोनों को एक साथ देख कर अपने मन में आने वाले घटनाक्रम बुन रही थी। नियति ने ऐसी खूबसूरत जोड़ी को मिलाने का फैसला कर लिया परंतु क्या यह इतना आसान था?
सुगना जैसी मर्यादित बहन को अपने ही छोटे भाई से संभोग के उसके नीचे ला पाना नियति के लिए भी दुष्कर था परंतु सोनू अधीर था और वह सुगना के प्रति पूरी तरह समर्पित था…
रेलवे क्रॉसिंग पर अचानक कंपन प्रारंभ हो गए और कुछ ही देर में ट्रेन की तीव्र आवाज सुनाई थी धड़ धड़आती हुई मालगाड़ी रेलवे क्रॉसिंग से पास होने लगी..
अचानक शांत पड़े वाहनों में हलचल शुरू हो गई मोटर कार के स्टार्ट होने की आवाज गूंजने लगी वातावरण में काले धुएं का अंश बढ़ने लगा सुगना और सोनू दोनों चैतन्य होकर क्रासिंग के खुलने का इंतजार करने लगे और धीरे धीरे सोनू और सुगना का रिक्शा गंतव्य की तरफ पर चला परंतु जैसे-जैसे स्टेशन करीब आ रहा था सोनू मायूस हो रहा था उसकी बड़ी बहन सुगना एक बार फिर उससे दूर हो रही थी।
थोड़ी देर में रिक्शा स्टेशन पर आ चुका था और एक बार फिर सोनू अपनी बहन सुगना के साथ लखनऊ सिटी के प्लेटफार्म पर भीड़ का हिस्सा बन चुका था..
लखनऊ सिटी लखनऊ के मुख्य स्टेशन के बाहर का एक छोटा स्टेशन था जो गेस्ट हाउस के करीब ही था सरयू सिंह ने अपने अनुभव का प्रयोग करते हुए यह फैसला लिया था कि वह ट्रेन लखनऊ मेन स्टेशन की बजाय लखनऊ सिटी से पकड़ेंगे शायद उनके मन में यह बात थी कि आउटर स्टेशन होने के कारण वहां पर ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं होगी और सीट आसानी से मिल जाएगी।
सोनू और सुगना सरयू सिंह पर पूरा विश्वास करते थे और उनके अनुभव पर कभी भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते थे।
परंतु आज सरयू सिंह का अनुमान गलत प्रतीत हो रहा था इस आउटर स्टेशन पर भी भीड़भाड़ कम न थी शायद जो अनुभव सरयू सिंह को प्राप्त था वैसा अनुभव और भी लोग अब हासिल कर चुके थे । परंतु अब कोई चारा न था थोड़ी ही देर में ट्रेन आने वाली थी।
सरयू सिंह सूरज की खातिरदारी करने में कोई कमी ना रख रहे थे वह कभी उसके लिए खिलौने खरीदते कभी रंग-बिरंगे रैपर में पैक छोटे-छोटे बिस्किट..
स्टेशन पर आज कुछ ज्यादा ही भीड़ भाड़ थी जैसे ही ट्रेन आई ट्रेन के अंदर सवार होने की जंग जारी हो गई इस बार सुगना के दो-दो कदरदान उपस्थित थे सरयू सिंह आगे बढ़े और सुगना उनके पीछे…ट्रेन में इतनी भीड़ भाड़ थी कि एक बार ऊपर चढ़ जाने के बाद नीचे उतरना संभव न था।
सरयू सिंह ने कहां
" सुगना तू मधु के गोद में लेला… सोनू ट्रेन में ना चढ़ी …. अंदर गइला के बाद उतरे में बहुत दिक्कत होखी सुगना को मधु को अपनी गोद में लेना पड़ा था।
ट्रेन के आते ही धक्कम धक्का शुरू हो गई। ट्रेन के दरवाजे पर ढेर सारे लोग खड़े हो गए महिला पुरुष बच्चे सब जल्दी से जल्दी ट्रेन में चढ़ जाना चाहते थे। शुरुआत में तो लोगों ने ट्रेन के अंदर बैठे यात्रियों को उतरने दिया परंतु जैसे ही उतरने वालों का रेला धीमा पड़ा अंदर जाने के लिए जैसे होड़ लग गई।
पिछली बार की ही भांति सरयू सिंह सबसे पहले ट्रेन में चढ़े और ऊपर पहुंच कर उन्होंने सुगना को ऊपर आने के लिए अपना हाथ दिया.. मधु के गोद में होने के कारण सुगना अकेले चढ़ने में नाकाम थी.
जिस प्रकार पिछली बार एक अनजान युवक ने उसकी कमर पर हाथ रखकर उसे चढ़ने में सहायता की थी आज वही स्थिति दोबारा आ चुकी थी सोनू ने कोई मौका ना गवायां उसने सुगना की गोरी और मादक कमर के मांसल भाग को अपने हाथों में पकड़ लिया और उसे धक्का देते हुए उसे ट्रेन में चढ़ने की मदद की।
इन कुछ पलों के स्पर्श ने सोनू के शरीर को गनगना दिया। सोनू के हाथ ठीक उसी जगह लगे थे जिस जगह को आज की आधुनिक भाषा में लव हैंडल कहा जाता है सोनू स्त्रियों के उस खूबसूरत भाग से बखूबी परिचित था लाली को घोड़ी बनाकर चोदते समय वह लाली के कमर के उसी भाग को अपनी हथेलियों से पकड़े रहता था और लाली की फूली हुई चूत को अपने लंड के निशाने पर हमेशा बनाए रखता था । सोनू के दिमाग में एक वही दृश्य घूम गए।
अंदर अभी भी कुछ यात्री शेष थे जिन्हें इसी स्टेशन पर उतरना था अंदर गहमागहमी बढ़ रही थी ..
"अरे हम लोगों को पहले उतरने दीजिए तब चढ़िएगा.."
ट्रेन के अंदर से एक स्भ्रांत बुजुर्ग अंदर की आवाज आ रही थी.. परंतु उनकी आवाज लोग सुनकर भी अनसुना कर रहे थे.. ट्रेन के अंदर से एक बार फिर लोगों के बाहर आने का दबाव बढ़ा और एक पल के लिए लगा जैसे दरवाजे पर खड़ी सुगना बाहर गिर पड़ेगी..
सोनू के रहते ऐसा संभव न था सोनू ने अपने दोनों मजबूत हाथों से दरवाजे के दोनों तरफ लगे स्टील के सपोर्ट को पकड़ा और स्वयं को ट्रेन के अंदर धकेलने लगा सुगना सोनू के ठीक आगे थी अपने भाई द्वारा पीछे से दिए जा रहे दबाव के कारण वह अब ट्रेन में लगभग सवार हो चुकी थी सोनू अभी भी लटका हुआ था..
ट्रेन ने सीटी दी और धीरे-धीरे गति पकड़ने लगी..
सुगना ने कहां
"सोनू उतर जा गाड़ी खुल गईल"
"दीदी तू बिल्कुल दरवाजा पर बाडू.. झटका लागी तो दिक्कत होगी मधु भी गोद में बीया .. चला हम आगे लखनऊ स्टेशन पर उतर जाएब…
सुगना संतुष्ट हो गई.. और अपने भाई सोनू की अपनत्व की कायल हो गई वह उसे सचमुच बेहद प्यार करता था और उसका ख्याल रखता था..
सोनू भी अब ट्रेन के अंदर आ चुका था पर दरवाजे के पास बेहद भीड़भाड़ थी लखनऊ सिटी पर उतरने वाले यात्री अंदर कूपे में जाने को तैयार न थे और जो चढ़े थे वह मजबूरन दरवाजे के गलियारे में खड़े थे..
सबसे आगे दो दो झोले टांगे और सूरज को अपनी गोद में लिए सरयू सिंह उनके ठीक पीछे मधु को अपनी गोद में लिए हुए सुगना और सबसे पीछे अपनी दोनों मजबूत भुजाओं से ट्रेन के सपोर्ट को पकड़ा हुआ और अपनी कमर से सुगना को सहारा देता हुआ सोनू..
जैसे ही माहौल सहज हुआ सोनू ने महसूस किया कि उसकी कमर सुगना से पूरी तरह सटी हुई है। अब तक तो सोनू का ध्यान सुगना के मादक बदन से हटा हुआ था परंतु धीरे-धीरे उसे उसके बदन की कोमलता महसूस होने लगी सुगना के मादक नितंब उसकी कमर से दब कर चपटे हो रहे थे।
सोनू ने पतले लहंगे के पीछे छुपे सुगना के मादक नितंबों को अपनी जांघों और पेडू प्रदेश पर महसूस करना शुरू कर दिया जैसे-जैसे सोनू का ध्यान केंद्रित होता गया उसके लंड में तनाव आने लगा.. सोनू के लंड का सुपाड़ा सुगना की कमर से सट रहा था शायद यह लंबाई में अंतर होने की वजह से था।
सोनू पूरी तरह सुगना से सटा हुआ था.. उसके मजबूत खूंटे जैसे लंड में तनाव आए और सुगना को पता ना चले यह संभव न था। सोनू के लंड में आ रहे तनाव को देखकर सुगना आश्चर्यचकित थी.. और अब वह स्वयं को असहज महसूस कर रही थी…. उसके दिमाग में सोनू के लंड की तस्वीर घूमने लगी…
शेष अगले भाग में…
रास्ते भर सुगना और सोनू मनोरमा की तारीफों के पुल बांधते रहे परंतु मनोरमा के बिस्तर पर वीर्य के निशान देख सुगना का मन कुछ खट्टा हो गया था…
मनोरमा की बंजर हो चुकी कोख को किसने सींचा सींचा होगा सुगना के लिए प्रश्न बन चुका था…
मनोरमा के बारे में यदि कोई शख्स बता सकता था तो वह थे उसके बाबूजी शरीर से इसके अलावा सुगना की जिज्ञासा शांत करने वाला और कोई ना था…वह एंबेसडर कार के गेस्ट हाउस पहुंचने की राह देखने लगी..
उधर सोनू अपनी बड़ी बहन सुगना की चुचियों को अपने दिमाग में अनावृत कर रहा था…
सुगना और सरयू सिंह दोनों एक दूसरे का इंतजार कर रहे थे पर अपने अपने प्रश्नों और जिज्ञासाओं के साथ…
अब आगे….
अंततः सुगना सोनू और दोनों छोटे बच्चे गेस्ट हाउस आ गए …लाबी में टहलते हुए सरयू सिंह सूरज को दिखाई पड़ गए और वह अपने छोटे-छोटे कदमों से भागता हुआ सरयू सिंह के पास जाकर बोला
"बाबा मैं आ गया"
अब तक सुगना भी सरयू सिंह के करीब आ चुकी थी उसने कहा बा
"बाबूजी लगता राउर तबीयत ठीक हो गईल "
"हां अब ठीक लगाता का कहत रहली मनोरमा मैडम"
"कुछो ना…लेकिन आपके खोजत रहली"
अब तक सोनू भी आ चुका था
" सरयू चाचा कितना सुंदर घर बा मनोरमा मैडम के घर एकदम महल जैसे"
जिस महल की सोनू दिल खोलकर तारीफ कर रहा था उस महल की मालकिन को सरयू सिंह बीती रात एक नहीं दो दो बार कसकर चोद कर आए थे.
सरयू सिंह का स्वाभिमान बीती रात से बुलंदियों पर था.. परंतु मन के अंदर आ चुका डर कायम था..
सुगना से और प्रश्न पूछना उचित न था सोनू बगल में ही खड़ा था। सभी लोग कमरे में आ गए सरयू सिंह भी खाना खा चुके थे। शाम को वापस बनारस जाने की ट्रेन पकड़नी थी। समय कम था सरयू सिंह और सुगना दोनों एकांत खोज रहे थे… उन दोनों को अपनी अपनी जिज्ञासा शांत करनी थी…उधर सोनू सुगना के साथ ढेरो बाते करना चाहता था..
सुगना अपने पूर्व और वर्तमान प्रेमी के बीच झूल रही थी…अंत में विजय एसडीएम साहब की हुई और वह सुगना को बाजार ले जाने में कामयाब हो गए.. आखिर उन्हें सुगना उसके बच्चों और बनारस में बैठी अपनी दोनों बहनों के लिए कुछ ना कुछ उपहार खरीदने थे। आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण था और सोनू की खुशियों पर पूरे परिवार का हक था.
व्यस्तता और वासना दोनों एक दूसरे की दुश्मन है…सोनू ने आज का पूरा दिन लगभग सुगना के साथ ही बिताया था परंतु उसकी वासना व्यस्तता की भेंट चढ़ गई थी… बाजार से लौटते लौटते शाम के 6:00 बज चुके थे और 2 घंटे बाद ही मैं वापस स्टेशन के लिए निकलना था।
सोनू की हालत आजकल के आशिक हो जैसी हो गई थी जो अपनी गर्लफ्रेंड को दिन भर घुमाते शापिंग कराते दिन भर उसके खूबसूरत जिस्म और सानिध्य का लाभ उठाकर अपने लंड में तनाव भरते हैं लंड के सुपाड़े से लार टपकाते परंतु शाम ढलते ढलते विदा होने का वक्त हो जाता ….
सोनू मायूस हो रहा था दिन भर की खुशियां शाम आते आते धूमिल पड़ रही थी सुगना जाने वाली थी और सोनू का मन उदास था परंतु पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में कोई बदलाव कर पाना संभावना न था।
सोनू को भी अपना सामान समेटकर बनारस आना था परंतु कुछ कागजी कार्रवाई पूर्ण न होने की वजह से वह चाहकर भी सुगना के साथ बनारस नहीं जा पा रहा था।
सूरज एक बार फिर उत्साहित था। ट्रेन में बैठ ना उसे बेहद अच्छा लगता था उसने सोनू से कहा
"मामा जल्दी चलो गाड़ी छूट जाएगी…"
सोनू को पल के लिए लगा जैसे सब सुगना को उससे दूर कर रहे हैं...
सोनू ने बाजार से सुगना के लिए एक बेहद खूबसूरत लहंगा चोली खरीदा था.. जो रेशम के महीन कपड़े से बना था और जिस पर हाथ की कढ़ाई की गई थी…
नकली सितारों की चमक दमक से दूर वह लहंगा चोली बेहद खूबसूरत था जिसे सामान्य तौर पर भी बिना किसी विशेष प्रयोजन के भी पहना जा सकता था..
न जाने सोनू के मन में क्या आया उसने सुगना से कहा..
"दीदी जाए से पहले कपड़वा नाप ले छोट बढ़ हुई तब बदल देब.."
समय कम था परंतु सोनू की बातें तर्कसंगत थी …
कमरे में सोनू दोनों बच्चों के साथ खेलने लगा और सुगना बाथरूम में जाकर अपने कपड़े बदलने लगी…
हल्के गुलाबी रंग के लहंगा चोली में सुगना बेहद खूबसूरत लग रही थी सुंदर और सुडौल काया पर वस्त्र और भी खिल उठते हैं।
चोली तो जैसे सुगना की काया के लिए ही बनी थी.. चूचियों के लिए दी गई जगह शायद कुछ कम पड़ रही थी परंतु सुगना की कोमल चुचियों ने स्वयं को उन में समायोजित कर लिया था परंतु कपड़ों का तनाव चूचियों के आकार का अंदाजा बखूबी दे रहा था.. चोली की लंबाई सुगना की कमर तक आ रही थी…सोनू चाहता तो यही था कि चोली की लंबाई ब्लाउज के बराबर ही रहे….परंतु सुगना जो अब दो बच्चों की मां थी वह अपने सपाट पेट और नाभि का खुला प्रदर्शन कतई नहीं करना चाहती थी।
उसने यही चोली पसंद की थी जो उसकी कमर तक आ रही थी। परंतु सुगना को क्या पता था जिस मदमस्त कमर को वह चोली के भीतर छुपाना चाहती वह छिपने लायक न थी । चोली में सुगना की खूबसूरती को और उभार दिया था..
सोनू सुगना को देखकर फूला नहीं समा रहा था। उसकी अप्सरा उसकी आंखों के सामने उसके द्वारा दिए गए वस्त्र पहने अपने बाल संवारे रही थी.. काश सुगना उसकी बहन ना होती तो शायद इतनी आवभगत करने का इनाम सोनू अवश्य ले लिया होता।
सरयू सिंह वापस आ चुके थे और सुगना को लहंगा चोली में देखकर दंग रह गए..
सुगना अपनी युवा अवस्था में हमेशा लहंगा और चोली ही पहनती भी और सरयू सिंह के हमेशा से उसके इस पहनावे के कायल थे…सपाट पेट और उस पर छोटी सी नाभि.. सरयू सिंह को बेहद भाती।
जब पहली बार जब सरयू सिंह और सुगना ने मिलकर दीपावली मनाई थी उस दिन भी सुगना ने लहंगा और चोली ही पहना था।
सुगना के उस दिव्य स्वरूप को याद कर सरयू सिंह को कुछ हुआ हो या ना हुआ हो परंतु लंगोट में कैद सुगना का चहेता लंड हरकत में आ रहा था।
वह तो भला हो सरयू सिंह के कसे हुए लंगोट का अन्यथा वह अब तक उछल कर अपने आकार में आ रहा होता। सरयू सिंह ने सुगना से कहा
" चला देर होता वैसे भी स्टेशन में आज ढेर भीड़ भाड़ होखी"..
"बाबूजी रुक जा जाई कपड़ा बदल के चलत बानी"
"अरे कपड़ा ठीक त बा… यही पहन के चला फिर बदले में देर होखी "
सरयू सिंह देरी कतई नहीं करना चाहते थे…उन्होंने हनुमान जी की तरह दोनों बच्चों को गोद में लिया और गेस्ट हाउस से बाहर आने लगे।
कुछ ही देर बाद एक बार फिर सोनू अपनी बहन सुगना के साथ रिक्शे में बैठकर स्टेशन की तरफ जाने लगा..
लहंगा चोली में सुगना और पजामे कुर्ते में सोनू.. जो भी देखता एक पल के लिए अपने नजरें उन पर टिका लेता नियति के रचे दो खूबसूरत पात्र धीरे-धीरे बिछड़ने के लिए रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे ..
सोनू के उदास चेहरे को देखकर सुगना दुखी हो रही थी अंततः उससे रहा न गया उसने सोनू के हाथ को अपनी कोमल हथेलियों के बीच में ले लिया और सहलाते हुए बोली
"ते दुखी काहे बाडे… हम कोई हमेशा तोहरा साथ थोड़ी रहब। दू दिन खाती आईल रहनी अब जा तानी……वैसे दू दिन बाद तहरा भी त बनारस आवे के बा"
सुगना की बातें सुनकर सोनू और भी दुखी हो गया परंतु सुगना की कोमल हथेलीयों के बीच में उसकी हथेली के स्पर्श में न जाने किस भाव का अनुभव किया और सोनू के शरीर में एक सनसनी फैल गई…
युवा मर्दों का सबसे संवेदनशील अंग उनका लंड ही होता है और सुगना के स्पर्श ने सबसे ज्यादा यदि किसी अंग पर असर किया तो वह था सोनू का लंड …अचानक ही सोनू की भावनाएं बदल गईं…. साथ रिक्शे पर बैठी उसकी बहन सुगना एक बार फिर अपने मदमस्त और अतृप्त यौवन लिए उसकी निगाहों के सामने अठखेलियां करने लगी… सोनू ने सुगना के कामुक अंगो को और करीब से निहारना चाहा परंतु सिवाय चुचियों के उसे कुछ न दिखाई पड़ा। परंतु सोनू का लाया लहंगा कमाल का था…. रेशम के महीन धागे से बना वह लहंगा पारदर्शी तो न था परंतु बेहद पतला और मुलायम था…उसने सुगना की कोमल जांघों से सट कर उन पर एक आवरण देने की कोशिश जरूर की थी परंतु सुगना की पुष्ट जांघों के आकार को छुपा पाने में कतई नाकाम था।
सुगना बार बार अपने दोनों पैर फैला कर लहंगे को दोनों जांघों के बीच सटने से रोकती और अपनी जांघों के आकार को सोनू की नजरों से बचाने की कोशिश करती..
भीनी भीनी हवा चल रही थी और मौसम बेहद सुहावना था कभी-कभी सुगना को एहसास होता जैसे उसने कुछ पहना ही ना हो…रेशम का कपड़ा सुगना की रेशमी त्वचा के साथ तालमेल बिठा चुका था और सुगना को एक अद्भुत एहसास दे रहा था ..
सोनू को सुगना का और कोई अंग दिखाई दे या ना दे परंतु सुगना के कोमल और हल्की लालिमा लिए हुए गाल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे और होठों का तो कहना ही क्या ऐसा लग रहा था जैसे होठों में चाशनी भरी हुई थी…
काश काश लाली दीदी के होठ भी सुगना दीदी जैसे होते..
सोनू को अपने बचपन के दिन याद आने लगे जब वह सुगना के गालों को बेझिझक चुम लिया करता था परंतु आज शायद यह संभव न था रिश्ता वही था सुगना भी वही थी परंतु सोनू बदल चुका था ऐसा क्या हो गया था जो अब वह सुगना को चूमने मैं असहज महसूस कर रहा था…
जवानी रिश्तो की परिभाषा बदल देती है…युवा स्त्री और पुरुष कभी भी एक दूसरे को चूम नहीं सकते चाहे वह किसी भी पावन रिश्ते से बंधे क्यों ना हो…
हां माथे का चुंबन अपनी जगह है….
रेलवे स्टेशन आने वाला था परंतु उससे पहले रेलवे क्रासिंग आ चुकी थी। सारे वाहनों पर विराम लगा हुआ था… रिक्शेवाले अपने मैले कुचैले तौलिए से अपना चेहरा पोंछ रहे थे…सरयू सिंह ने पीछे मुड़कर सुगना और सोनू को देखा वह मन ही मन अपने फैसले पर प्रसन्न हो रहे थे कि उन्होंने स्टेशन जल्दी आने का फैसला लेकर सही कार्य किया था.. अचानक सोनू का ध्यान बगल की दीवार पर लगे किसी एडल्ट फिल्म के पोस्टर पर चला गया…
फिल्म का नाम था "लहंगा में धूम धाम"
पोस्टर में दिख रही हीरोइन ने भी संयोग से लहंगा और चोली ही पहना हुआ था परंतु उसकी चोली तंग थी और चूचियां उभर कर बाहर आ रही थीं … शायद निर्देशक ने उन वस्त्रों का चयन ही इसलिए किया था ताकि वह चुचियों को और उभार सके..
इसी प्रकार लहंगा लहंगा ना होकर एक स्कर्ट के रूप में था और हीरोइन के नंगे पैर पिंडलियों चमक रहे थे सोनू लालसा भरी निगाहों से उस पोस्टर को देखे जा रहा था
सोनू को वासना भरी निगाहों से पोस्टर की तरफ देखते हुए देख कर सुगना स्वयं शर्मसार हो रही थी उसने सोनू का ध्यान खींचने के लिए बोला..
"अब अपन ब्याह के मन बना ले ई सब ताक झांक ठीक नईखे"
"अब सब तहारे हांथ में बा.."
"तोरा इतना फोटो में कोई पसंद काहे नईखे परत?"
सोनू क्या जवाब देता वह सुगना के प्यार में पागल हो चुका था…प्यार तो वह सुनना से पहले भी करता था परंतु अब वह जिस रूप में सुगना को चाहने लगा था …उसे और कोई लड़की पसंद नहीं आ सकती थी.. इतना प्यार करने वाली सुगना जैसी खुबसूरत युवती मिलना असंभव ही नही नामुमकिन था…
सोनू ने खुद को संभाला और मुस्कुराने लगा.. परंतु उस में कुछ न कहा सुगना ने फिर पूछा
" बोलत काहे नहींखे .."
"तू दुनिया में अकेले ही आईल बाड़ू का? तोहरा जैसन केहू काहे नईखे मिलत.."
सुगना निरुत्तर हो गई और शर्मसार भी ऐसा नहीं है कि सोनू ने यह बात पहली बार कही थी परंतु फिर भी अपनी होने वाली पत्नी की तुलना अपनी बड़ी बहन से करना …..शायद सोनू ने बातचीत की मर्यादा का दायरा बढ़ा दिया था दिया था।
सुगना यह बातें पहले भी सुन चुकी थी उसे उसे अब यह सामान्य लगने लगा था.. ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज का उसके होठों को कभी-कभी चूम लेना… ना जाने क्यों सोनू के इस कथन में उसे अपनी तारीफ नजर आती और वह मन ही मन मुस्कुरा उठती उसे यह कतई पता न था कि उसकी मुस्कुराहट सोनू को और उकसा रही थी।
मुस्कुराती हुई सुगना और भी ज्यादा खूबसूरत लगती थी।
मुस्कुराहट वैसे भी सौंदर्य को निखार देती है और लज्जा वश आई मुस्कुराहट का कहना ही क्या..
सोनू उस हीरोइन को छोड़ सुगना के शर्म से लाल हुए गाल देखने लगा …
रेलवे केबिन में बैठी नियति सोनू और सुगना दोनों को एक साथ देख कर अपने मन में आने वाले घटनाक्रम बुन रही थी। नियति ने ऐसी खूबसूरत जोड़ी को मिलाने का फैसला कर लिया परंतु क्या यह इतना आसान था?
सुगना जैसी मर्यादित बहन को अपने ही छोटे भाई से संभोग के उसके नीचे ला पाना नियति के लिए भी दुष्कर था परंतु सोनू अधीर था और वह सुगना के प्रति पूरी तरह समर्पित था…
रेलवे क्रॉसिंग पर अचानक कंपन प्रारंभ हो गए और कुछ ही देर में ट्रेन की तीव्र आवाज सुनाई थी धड़ धड़आती हुई मालगाड़ी रेलवे क्रॉसिंग से पास होने लगी..
अचानक शांत पड़े वाहनों में हलचल शुरू हो गई मोटर कार के स्टार्ट होने की आवाज गूंजने लगी वातावरण में काले धुएं का अंश बढ़ने लगा सुगना और सोनू दोनों चैतन्य होकर क्रासिंग के खुलने का इंतजार करने लगे और धीरे धीरे सोनू और सुगना का रिक्शा गंतव्य की तरफ पर चला परंतु जैसे-जैसे स्टेशन करीब आ रहा था सोनू मायूस हो रहा था उसकी बड़ी बहन सुगना एक बार फिर उससे दूर हो रही थी।
थोड़ी देर में रिक्शा स्टेशन पर आ चुका था और एक बार फिर सोनू अपनी बहन सुगना के साथ लखनऊ सिटी के प्लेटफार्म पर भीड़ का हिस्सा बन चुका था..
लखनऊ सिटी लखनऊ के मुख्य स्टेशन के बाहर का एक छोटा स्टेशन था जो गेस्ट हाउस के करीब ही था सरयू सिंह ने अपने अनुभव का प्रयोग करते हुए यह फैसला लिया था कि वह ट्रेन लखनऊ मेन स्टेशन की बजाय लखनऊ सिटी से पकड़ेंगे शायद उनके मन में यह बात थी कि आउटर स्टेशन होने के कारण वहां पर ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं होगी और सीट आसानी से मिल जाएगी।
सोनू और सुगना सरयू सिंह पर पूरा विश्वास करते थे और उनके अनुभव पर कभी भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते थे।
परंतु आज सरयू सिंह का अनुमान गलत प्रतीत हो रहा था इस आउटर स्टेशन पर भी भीड़भाड़ कम न थी शायद जो अनुभव सरयू सिंह को प्राप्त था वैसा अनुभव और भी लोग अब हासिल कर चुके थे । परंतु अब कोई चारा न था थोड़ी ही देर में ट्रेन आने वाली थी।
सरयू सिंह सूरज की खातिरदारी करने में कोई कमी ना रख रहे थे वह कभी उसके लिए खिलौने खरीदते कभी रंग-बिरंगे रैपर में पैक छोटे-छोटे बिस्किट..
स्टेशन पर आज कुछ ज्यादा ही भीड़ भाड़ थी जैसे ही ट्रेन आई ट्रेन के अंदर सवार होने की जंग जारी हो गई इस बार सुगना के दो-दो कदरदान उपस्थित थे सरयू सिंह आगे बढ़े और सुगना उनके पीछे…ट्रेन में इतनी भीड़ भाड़ थी कि एक बार ऊपर चढ़ जाने के बाद नीचे उतरना संभव न था।
सरयू सिंह ने कहां
" सुगना तू मधु के गोद में लेला… सोनू ट्रेन में ना चढ़ी …. अंदर गइला के बाद उतरे में बहुत दिक्कत होखी सुगना को मधु को अपनी गोद में लेना पड़ा था।
ट्रेन के आते ही धक्कम धक्का शुरू हो गई। ट्रेन के दरवाजे पर ढेर सारे लोग खड़े हो गए महिला पुरुष बच्चे सब जल्दी से जल्दी ट्रेन में चढ़ जाना चाहते थे। शुरुआत में तो लोगों ने ट्रेन के अंदर बैठे यात्रियों को उतरने दिया परंतु जैसे ही उतरने वालों का रेला धीमा पड़ा अंदर जाने के लिए जैसे होड़ लग गई।
पिछली बार की ही भांति सरयू सिंह सबसे पहले ट्रेन में चढ़े और ऊपर पहुंच कर उन्होंने सुगना को ऊपर आने के लिए अपना हाथ दिया.. मधु के गोद में होने के कारण सुगना अकेले चढ़ने में नाकाम थी.
जिस प्रकार पिछली बार एक अनजान युवक ने उसकी कमर पर हाथ रखकर उसे चढ़ने में सहायता की थी आज वही स्थिति दोबारा आ चुकी थी सोनू ने कोई मौका ना गवायां उसने सुगना की गोरी और मादक कमर के मांसल भाग को अपने हाथों में पकड़ लिया और उसे धक्का देते हुए उसे ट्रेन में चढ़ने की मदद की।
इन कुछ पलों के स्पर्श ने सोनू के शरीर को गनगना दिया। सोनू के हाथ ठीक उसी जगह लगे थे जिस जगह को आज की आधुनिक भाषा में लव हैंडल कहा जाता है सोनू स्त्रियों के उस खूबसूरत भाग से बखूबी परिचित था लाली को घोड़ी बनाकर चोदते समय वह लाली के कमर के उसी भाग को अपनी हथेलियों से पकड़े रहता था और लाली की फूली हुई चूत को अपने लंड के निशाने पर हमेशा बनाए रखता था । सोनू के दिमाग में एक वही दृश्य घूम गए।
अंदर अभी भी कुछ यात्री शेष थे जिन्हें इसी स्टेशन पर उतरना था अंदर गहमागहमी बढ़ रही थी ..
"अरे हम लोगों को पहले उतरने दीजिए तब चढ़िएगा.."
ट्रेन के अंदर से एक स्भ्रांत बुजुर्ग अंदर की आवाज आ रही थी.. परंतु उनकी आवाज लोग सुनकर भी अनसुना कर रहे थे.. ट्रेन के अंदर से एक बार फिर लोगों के बाहर आने का दबाव बढ़ा और एक पल के लिए लगा जैसे दरवाजे पर खड़ी सुगना बाहर गिर पड़ेगी..
सोनू के रहते ऐसा संभव न था सोनू ने अपने दोनों मजबूत हाथों से दरवाजे के दोनों तरफ लगे स्टील के सपोर्ट को पकड़ा और स्वयं को ट्रेन के अंदर धकेलने लगा सुगना सोनू के ठीक आगे थी अपने भाई द्वारा पीछे से दिए जा रहे दबाव के कारण वह अब ट्रेन में लगभग सवार हो चुकी थी सोनू अभी भी लटका हुआ था..
ट्रेन ने सीटी दी और धीरे-धीरे गति पकड़ने लगी..
सुगना ने कहां
"सोनू उतर जा गाड़ी खुल गईल"
"दीदी तू बिल्कुल दरवाजा पर बाडू.. झटका लागी तो दिक्कत होगी मधु भी गोद में बीया .. चला हम आगे लखनऊ स्टेशन पर उतर जाएब…
सुगना संतुष्ट हो गई.. और अपने भाई सोनू की अपनत्व की कायल हो गई वह उसे सचमुच बेहद प्यार करता था और उसका ख्याल रखता था..
सोनू भी अब ट्रेन के अंदर आ चुका था पर दरवाजे के पास बेहद भीड़भाड़ थी लखनऊ सिटी पर उतरने वाले यात्री अंदर कूपे में जाने को तैयार न थे और जो चढ़े थे वह मजबूरन दरवाजे के गलियारे में खड़े थे..
सबसे आगे दो दो झोले टांगे और सूरज को अपनी गोद में लिए सरयू सिंह उनके ठीक पीछे मधु को अपनी गोद में लिए हुए सुगना और सबसे पीछे अपनी दोनों मजबूत भुजाओं से ट्रेन के सपोर्ट को पकड़ा हुआ और अपनी कमर से सुगना को सहारा देता हुआ सोनू..
जैसे ही माहौल सहज हुआ सोनू ने महसूस किया कि उसकी कमर सुगना से पूरी तरह सटी हुई है। अब तक तो सोनू का ध्यान सुगना के मादक बदन से हटा हुआ था परंतु धीरे-धीरे उसे उसके बदन की कोमलता महसूस होने लगी सुगना के मादक नितंब उसकी कमर से दब कर चपटे हो रहे थे।
सोनू ने पतले लहंगे के पीछे छुपे सुगना के मादक नितंबों को अपनी जांघों और पेडू प्रदेश पर महसूस करना शुरू कर दिया जैसे-जैसे सोनू का ध्यान केंद्रित होता गया उसके लंड में तनाव आने लगा.. सोनू के लंड का सुपाड़ा सुगना की कमर से सट रहा था शायद यह लंबाई में अंतर होने की वजह से था।
सोनू पूरी तरह सुगना से सटा हुआ था.. उसके मजबूत खूंटे जैसे लंड में तनाव आए और सुगना को पता ना चले यह संभव न था। सोनू के लंड में आ रहे तनाव को देखकर सुगना आश्चर्यचकित थी.. और अब वह स्वयं को असहज महसूस कर रही थी…. उसके दिमाग में सोनू के लंड की तस्वीर घूमने लगी…
शेष अगले भाग में…