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Adultery कामिनी की कामुक गाथा
#4
मैं थरथराते पैरों पर किसी तरह खड़ी हुई कि अचानक मेरे नितंब पर किसी कठोर वस्तु के दबाव का अनुभव हुआ। हड़बड़ा कर ज्योंही मैं पीछे मुड़ी, मैं स्तब्ध रह गई। मेरे पीछे न जाने कब से मेरे दूर के रिश्ते के दादाजी जिन की उम्र उस वक्त करीब ६५ साल थी, ६’ लंबे तोंदियल काले कलूटे भैंस जैसे, गंजे, झुर्रीदार चेहरा, खैनी खा खा कर काले किए हुए अपने बड़े बड़े आड़े टेढ़े दांत दिखाते हुए मुह खोल कर बड़े ही भद्दे तरीके से मुस्कुराते हुए ठीक मेरे करीब पीछे से सट कर खड़े थे और धोती कुर्ते में होने के बावजूद उनकी धोती सामने से तंबू का आकार लिए हुए थी। स्पष्ट था कि मेरी सारी हरकतों को न जाने कब से देख रहे थे और अब मुझसे सट कर खड़े हो गए थे और उनकी धोती के अंदर कोई कठोर वस्तु मेरे नितंब के दरार पर दस्तक दे रहा था। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सन्न खड़ी लाज से दोहरी हुई जा रही थी।
फिर ज्यों ही मैं होश में आई अपने सलवार और पैंटी की ओर झपटी, किंतु उस खड़ूस बुड्ढे नें मुझे बाज की तरह दबोच लिया और बोला, ” घबराव ना बबुनी, हम से का शरम। हम सब कुछ देखली बानी। हमका पता है कि तोहरा मां बाबूजी तोहरा के पसंद ना करेला, मगर हम तोहरा के पसंद करीला। तू बहुत सुंदरी है रे। तोहरा मां बाबूजी के तो मति मारी गई है जे ऐसन नीक लईकी के ना पसंद करो हैं ।” कहते कहते उसका बनमानुस जैसा एक हाथ मेरे सीने के उभारों पर हरकत करने लगा और अपने जादुई स्पर्श से मुझे कमजोर करने लगा, दूसरे हाथ से वह मेरे कमर से नीचे के नाजुक अंगों को सहलाने लगा। मैं कुछ देर छूटने की असफल कोशिश का ढोंग करती रही, ढोंग मैं इस लिए रह रही हूं क्योंकि मुझे भी यह सब आनंदित कर रहा था, वरना अगर मैं चाहती तो उस बुड्ढे की पसली तोड़ सकती थी। कुछ देर पहले जो बूढ़ा कुरूप बदशक्ल और बेढब लग रहा था उसकी हरकतें अब मुझे अच्छा लगने लगी, वह खेला खाया बदमाश बूढ़ा मेरी कामोत्तेजना को भड़का कर मुझे पागल कर रहा था, मदहोश कर रहा था और मैं नादान पगली उस कामपिपाशु बूढ़े दादाजी के हाथों हौले हौले समर्पित होती जा रही थी। मेरी अवस्था को देख दादाजी की कंजी आंखों में चमक आ गई और उस नें आहिस्ते से अपनी धोती ढीली कर दी, नतीजतन पलक झपकते धोती गिर गई और मैं नें जो नजारा देखा उसे जीवन भर न भूल पाऊंगी। धोती के अंदर अंडरवियर नहीं थी, भयानक काला नाग फन उठाए मेरी ओर देखे जा रहा था, विकराल लिंग के चारों ओर लंबे लंबे घने सफेद बाल भरो हुए थे, बुड्ढे नें मेरा हाथ पकड़ कर उस पर रख दिया ” ले बबुनी हमार लंड पकड़ के खेल, तोहरा के माजा आई”, और मैं गनगना उठी। ७” लंबा और ३” मोटा लिंग मेरे हाथों में था, मेरे मुख से सिसकारी निकल पड़ी और मैं मदहोशी के आलम में उस बेलन जैसे जैसे लिंग पर बेसाख्ता हाथ फेरने लगी। कितना गर्म और सख्त। इधर दादाजी मेरी कमीज उतार चुके थे, ब्रा खोल चुके थे और पूर्णतय: नग्न कर मेरे सीने के उभारों को सहला रहे थे, दबा रहे थे, मेरी चिकनी योनी में अाहिस्ता आहिस्ता उंगली चला रहे थे, मैं पूरी तरह पागल हो चुकी थी। पूरी तरह उस बूढ़े के वश में थी। इस दौरान उन्होंने अपना कुर्ता बनियान बी उतार फेंका था। पूरा शरीर सफेद बालों से भरा हुआ था। उन्हें देख कर बूढ़े बनमानुस का आभास हो रहा था।
अचानक दादाजी नें एक उंगली मेरी योनी में घुसेड़ दी, मैं चिहुंक उठी। “आह, ये क्या किया? उंगली निकालिए ना आााााह” मेरे मुख से खोखली आवाज निकली, वस्तुत: मुझे दर्द कम मजा ज्यादा आया। दादाजी अनुभव शिकारी की तरह मुझे जाल में फांस चुके थे अब अंतिम प्रहार करने की तैयारी में थे। उन्होंने अब उंगली मेरी योनी के अंदर बाहर करना शुरू कर दिया।”आह, ओह उफ आह ” मेरी सिसकारियां निकल रही थी और बूढ़ा बोल रहा था,”बस बबुनी बस अब तोहरा बुर में हमार लौड़ा घुसे का समय आ गया, अब हम तोहरा के चोदब बबुनी”
मुझे तो कुछ होश ही नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। जो भी हो रहा था अच्छा लग रहा था, मैं पूर्ण रूप से अपने आप को उस बूढ़े के हवाले कर चुकी थी।
अब समय आ चुका था, मेरा कौमार्य भंग होने का। आनन फानन उस बूढ़े नें छत पर धोती बिछाया, उसी पूर्ण नग्नावस्था में मुझे चित्त लिटा कर मेरे पैरों को अलग किया और मेरी दोनों जंघाओं के बीच अपने आप को स्थापित किया, पहले से गीली मेरे योनी छिद्र के मुख पर अपने विकराल लिंग का सुपाड़ा टिकाया, मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
“ले बिटिया हमार लौड़ा तोहरा बुर में” कहते ही एक करारा धक्का मारा और मैं चीख पड़ी। “आााााााह ” लेकिन वह बूढ़ा तैयार था, उसनें अपने गंदे होंठों से मेरे होंठ बंद कर दिया। फच्चाक से मेरी गीली चिकनी योनी के संकीर्ण छिद्र को फैलाता हुआ या यों कहिए चीरता हुआ उस कमीने बूढ़े बनमानुष के लिंग का गोल अग्रभाग प्रविष्ट हो गया। आााााह दर्द से मेरी आंखों में आंसु आ गए। चंद सेकेंड रुकने के बाद फिर एक धक्का मारा,” ओहहहह मााा मर गईईई” बूढ़े नें अपना मुह मेरे मुह से हटा कर झट से एक हाथ से मेरा मुह बंद किया और बड़े ही अश्लील लहजे में बोला, “तू चुपचाप शांत रहो बबुनी, हम तोके मरने ना देब, तू खाली हमार लौड़े का कमाल देख, अभी ई तोहरा बूर में आधा घूस गईले है। ले एक धक्का और हुम,” “आाााहहहहह,” मेरी चीख घुट कर रह गई। एक और करारा ठाप मार दिया हरामी नें। उफ मांं मेरी आंखें फटी की फटी रह गई।, सांस जैसे रूक सा गया, पूरा लिंग किसी खंजर की तरह मेरी योनी को ककड़ी की तरह चीरता हुआ जड़ तक समा गया था या यों कहिए कि घुप गया था। कुछ पल उसी अवस्था में रुका, मेरा कौमार्य तार तार हो चुका था। दादाजी नें तो जैसे किला फतह कर लिया था, किसी भैंसे की तरह डकारता हुआ हौले से लिंग बाहर निकाला, मुझे पल भर थोड़ा सुकून की सांस लेने का मौका मिला मगर उस तोंदियल खड़ूस वहशी जानवर के मुंह में तो जैसे खून का स्वाद मिल गया था, खून से सना लिंग पूरी ताकत से दुबारा एक ही बार में भच्च से मेरी योनी के अंदर जड़ तक ठोंक दिया ,” देख रे बुरचोदी बिटिया, अब हम तोहरा के हमार लंड से पूरा मजा देब,” बोलते बोलते फिर ठोका, अब ठोकने की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ाता जा रहा था गंदी गंदी गाली निकाल रहा था, “आह मेरी रंडी, ओह बुरचोदी, आज तोहरा बुर को भोंसड़ा बना देब,”मेरे सीने को दबा रहा था नोच रहा था “चूतमरानी, कुत्ती” और अब मुझे यह सब अत्यंत रोमांचित कर रहा था। मुझे दर्द की जगह जन्नत का अनंद मिल रहा था, हर ठाप पर मस्ती से भरती जा रही थी। मैं भी अब बेशरमी पर उतर आई, ” आह दादूू, ओह राजा, आााााााा,हां हाहं,” पता नहीं और क्या क्या मेरे मुह से निकल रहा था। मैं भी ठाप का जवाब ठाप से देने लगी। नीचे से मेरी कमर चल रही थी।मैं समझ गई कि इसे चुदाई कहते हैं और अब मुझे चुदाई का आनंद मिल रहा है। मर्द के लिंग को लंड या लौड़ा कहते हैं और स्त्री की योनी को चूत या बुर कहते हैं। अब मैं बुरचोदी बन गई थी, चूतमरानी बन गई थी, ” चोद राजा चोद,” मेरे मुह से भी मस्ती भरी बातों निकल रही थी, मैं पगली की तरह अपने बुर में घपाघप लंड पेलवा रही थी और यह दौर करीब १५ मिनट तक चला कि अचानक मेरा पूरा बदन कांपने लगा, उधर बूढ़ा भी पूरी रफ्तार से मेरी चूत की कुटाई किए जा रहाथा कि अचानक हम दोनों ने एक दूसरे को कस कर पकड़ लिया और मुझे महसूस होने लगा कि मेरी चूत में गरमा गरम तरल गिर रहा है, मैं भी चरम अनंद में बुड्ढे से चिपक गई, मेरा भी स्खलन होने लगा, यह स्थिति करीब १ मिनट तक रहा फिर दादाजी का विशाल शरीर भी डकारता हुआ निढाल हो गया और इधर मैं भी चरम सुख में आंखें मूंदे निढाल पड़ गई। “कैसा लगा बिटिया” बूढ़ा पूछ रहा था और मैं बेशरमों की तरह बोल पड़ी ” मस्त, मेरे प्यारे चोदू दादाजी” फिर मैं ने खुद ही शरमा कर उनके चौड़े सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। बूढ़ा अपनी विजय पर मुस्कुरा उठा और मुझे अपनी बांहों में समेट लिया। उधर घर वाले रात भर शादी में व्यस्त रहे और इधर रात भर में चुदक्कड़ बूढ़े नें अपने विशाल लंड से तीन बार मुझे अच्छी तरह से चोद चोद कर मेरी बूर को पावरोटी की तरह फुला दिया, मेरे सीने के उभारों का ऐसा मर्दन किया कि वह भी नींबू से संतरा बन गए। फिर पूरी तरह थक कर चूर उसी तरह निर्वस्त्र नंग धड़ंग हम दोनों छत पर ही सो गए। मेरे अगल बगल मेरे कपड़े पड़े हुए मुझे मुह चिढ़ा रहे थे। दादाजी की धोती मेरे खून से लाल हो चुकी थी।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी  हम अकेले हैं.



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RE: कामिनी की कामुक गाथा - by neerathemall - 13-05-2022, 05:07 PM



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