04-05-2022, 04:52 PM
डार्लिंग, हो गया, बस… बस, इतना ही।” वह मुझे सांत्वना देने की कोशिश कर रहा था। ‘इतना ही!’ यह क्या कम है? ”अब और कुछ नहीं होगा। बस इतना ही सहना था।” वह मुझे सहलाने लगा था – कंधों को, बगलों को, नर्म छातियों को। ”पहली बार थोड़ा सहना पड़ता है। इसके बाद कभी दर्द नहीं होगा।” आश्वासन का मरहम लगाकर उस दर्द को शांत करने की कोशिश कर रहा था जो मेरी जांघों के जोड़ से बहुत भीतर मर्म तक दहकती आग जैसी जलन से उत्पन्न हो रहा था। उसका हाथ बहुत हौले हौले घूम रहा था, मसलने से दुख रही नाजुक चूचियों पर, तेज साँस में ऊपर नीचे होते नर्म पेट पर, उसके नीचे धड़कते फूले मांसल पेड़ू पर। वह सांत्वना दे रहा था – जांघों पर, घुटनों पर, पैरों पर, कोमल तलवों पर, वहाँ से उतर कर सँकरी कमर पर, उपर क्रमश: चौड़े होते धड पर। हर जगह घूमता हुआ वह मानो मेरा दर्द खींच रहा था।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.