अपडेट -- 1
'का हो काका? का हाल बा? अकेले-अकेले चीलम फूंक रहे हो?
गाँव के आखीरी छोर से, आम के पेंड़ो की बारी शुरु होती है। और उसी आम के बगीचे में एक झोपड़ी बनी थी। और उस झोपड़ी के सामने एक 48 वर्ष का आदमी, धोती - कुर्ता में खाट बीछा कर बैठा था। और चीलम फूंक रहा था।
वो 48 वर्ष के आदमी के कानो में जैसे ही आवाज़ गूँजी, वो नज़र उठा कर देखा तो, एक 20 साल का लड़का चला आ रहा था। वो लड़का काफी गठीले बदन का था। साँवले रंग का लड़का था। पर चेहरे की गढ़न काफी शानदार थी, जो उस लड़के को आकर्षक बना रहा था।
वो लड़का करीब आते हुए, खाट पर बैठ गया।
'अरे बबलू बेटा! का हाल है? आज मेरे अड्डे पर कैसे?'
तो मतलब उस लड़के का नाम बबलू था। खैर बबलू ने उस आदमी को जवाब में कहा-
बबलू -- अरे बनवारी काका! अब क्या करुँ, घर पर खाली बैठा था तो, सोचा तुम्हारे ही तरफ़ घुम आता हूँ।
बनवारी -- ठीक कीया बेटा! चल अब आ गया है तो, बोल तेरे लीए भी चीलम बना देता हूँ।
बबलू -- अरे क्यूँ गज़ब कर रहे हो काका? तुमको तो पता है ना, की अगर कहीं मेरी अम्मा को पता चल गया तो...कयामत आ जायेगी!
बबलू की बात सुनकर, बनवारी एक चीलम का कश लेते हुए खुद से बोला-
"कयामत तो तुम्हरी अम्मा है ही, बबलू बेटा! तूझे नही पता की, कीतनो के लंड में आग लगा कर बैठी है तुम्हरी अम्मा! साला उमर ना बीत जाये, और सपने में ही चोदता रह जांउ,"
बबलू -- का सोंचने लग गये काका?
बनवारी चीलम का कश लेकर मुस्कुराते हुए बोला-
बनवारी -- अरे बबलू! तू भी ना अपनी अम्मा से बहुत डरता है रे!
बबलू -- अम्मा है हमरी काका, इस लीये डरता हूँ।
बनवारी ने एक चीलम का कश लेते हुए...
बनवारी -- अरे बेटा! औरतों को तू नही जानता! तूझे पता नही है, औरतें डरने वाले मर्द को पसंद नही करती हैं। अरे औरतों से क्या डरना?
बबलू -- काका मैं कीसी औरत से नही डरता। वो तो बस अपनी अम्मा से!! क्यूकीं वो मेरी अम्मा है।
बनवारी -- अम्मा है तो का औरत नही है का? बुरा मत मानना बेटा, लेकीन एक बात कहता हूँ और शायद तूने सुना भी होगा। पूरे गाँव वाले कहते हैं की तेरी अम्मा से खूबसूरत औरत कोई नही है। और सब के सब मादरचोद लोग तेरी अम्मा के आगे-पीछे घुमते रहते है। मगर तेरी अम्मा तो देवी है देवी। कभी भी कीसी को घास तक नही डाली।
एक पल के लीए बबलू को गुस्सा तो आया पर अपनी माँ की देवी जैसी नीयत के बारे में सुनकर वो खुश हो गया...
बबलू -- सही कहते हो काका। हमरी अम्मा तो सच में देवी है, इसीलीए तो मैं अपनी अम्मा की सब बात मानता हूँ, और उसे खुश रखता हूँ।
बनवारी -- बात तो तेरी ठीक है बेटा, पर बुरा ना लगे तो एक बात कहूँ?
बबलू -- अरे बुरा काहे लगेगा काका? कहो ?
बनवारी -- देख बेटा, माना तू अपनी अम्मा को खुश रखता है। पर वो पूरी तरह से खुश नही है...बेटा!
बनवारी की बात सुनकर, बबलू थोड़ा हैरानी में-
बबलू -- पूरी तरह...खुश नही है!
बनवारी बबलू की बात खत्म होते ही झट से बोल पड़ा...
बनवारी -- हाँ...बेटा! खुश नही है।
बबलू -- पर काका...मैं तो अपनी अम्मा को कभी उदास नही देखा।
बनवारी -- अरे बेटा! तू एक बेटे की नज़र से अपनी अम्मा को देखता है। इसलीए तूझे उसकी उदासी नही दीखती।
बबलू -- बेटे की नज़र से! काका तुम का बोल रहे हो, मेरी तो कुछ समझ में ही नही आ रहा है।
बनवारी -- देख बेटा, माना वो तेरी माँ है। पर वो भी एक औरत ही है, बाकी औरतो की तरह उसे भी वो सब करने का मन होता है। जो एक औरत एक मर्द के सांथ करती है। पर वो एक वीधवा और संसकारी औरत है बेटा! मरद के खत्म होने के बाद वो बाहर ऐसे काम नही करेगी। इज्जत की डर से। इसलीए उसने सारे अरमानो को अपने सीने में दबा कर रख दीया है।
बनवारी की बात बबलू बड़ी ध्यान से सुन रहा था। उसे गुस्सा नही आया पर सोंच में जरुर पड़ गया। बबलू के पास बनवारी काका से पूछने के लीए कुछ नही था। इसलीए वो उठा और खामोशी से वहाँ से घर की तरफ लौट गया।
@@@@@
बबलू अपने घर पहुँचा तो पाया, आँगन में उसकी माँ सुधा और एक औरत बैठी बाते कर रही थी। बबलू को देखते ही सुधा बोली-
सुधा -- अरे बेटा कहाँ गया था? मैं तूझे कब से ढुंढ़ रही हूँ?
बबलु अपने माँ के बगल में खाट पर बैठते हुए बोला-
बबलू -- वो अम्मा, मैं थोड़ा बनवारी काका के इधर चला गया था।
सुधा -- ठीक है! इतना मत घूमा कर, जा-जाकर कुछ सब्जीया तोड़ ले आ।
उसके बाद बबलू उठ कर घर के बाहर नीकल जाता है। और घर के पीछवाड़े सब्जीया तोड़ने चला जाता है।
आगन मे बैठी सुधा उस औरत से बात कर रही थी। वो औरत सुधा से बोली-
"अरे सुधा, अपने बेटे को का खीला रही है रे? एकदम पहलवान बनते जा रहा है!"
सुधा को उस औरत पर गुस्सा आ गया...और मन में (ई हरज़ाई मेरे बेटे को नज़र ना लगा दे।)
ये सोंचते हुए सुधा अपने गुस्से पर काबू पाते हुए थोड़ी मुस्कुरा कर बोली-
सुधा -- अरे का खीला रही हूँ माला...जो सब खीलाते हैं वही मैं भी खीलाती हूँ। वो तो मेरा बेटा रोज कसरत करता है, इसलीए उसका शरीर थोड़ा गठीला हो गया है।
माला -- अरे थोड़ा का, पूरा गठीला और मज़बूत है। छातीया देखी है का अपने बेटे की, कीतनी चौंड़ी हैं। एक बार कीसी को जकड़ ले तो छुड़ा ना पाये।
माला की बात सुनते हुए सुधा मन ही मन खुश भी हो रही थी।
'का हो काका? का हाल बा? अकेले-अकेले चीलम फूंक रहे हो?
गाँव के आखीरी छोर से, आम के पेंड़ो की बारी शुरु होती है। और उसी आम के बगीचे में एक झोपड़ी बनी थी। और उस झोपड़ी के सामने एक 48 वर्ष का आदमी, धोती - कुर्ता में खाट बीछा कर बैठा था। और चीलम फूंक रहा था।
वो 48 वर्ष के आदमी के कानो में जैसे ही आवाज़ गूँजी, वो नज़र उठा कर देखा तो, एक 20 साल का लड़का चला आ रहा था। वो लड़का काफी गठीले बदन का था। साँवले रंग का लड़का था। पर चेहरे की गढ़न काफी शानदार थी, जो उस लड़के को आकर्षक बना रहा था।
वो लड़का करीब आते हुए, खाट पर बैठ गया।
'अरे बबलू बेटा! का हाल है? आज मेरे अड्डे पर कैसे?'
तो मतलब उस लड़के का नाम बबलू था। खैर बबलू ने उस आदमी को जवाब में कहा-
बबलू -- अरे बनवारी काका! अब क्या करुँ, घर पर खाली बैठा था तो, सोचा तुम्हारे ही तरफ़ घुम आता हूँ।
बनवारी -- ठीक कीया बेटा! चल अब आ गया है तो, बोल तेरे लीए भी चीलम बना देता हूँ।
बबलू -- अरे क्यूँ गज़ब कर रहे हो काका? तुमको तो पता है ना, की अगर कहीं मेरी अम्मा को पता चल गया तो...कयामत आ जायेगी!
बबलू की बात सुनकर, बनवारी एक चीलम का कश लेते हुए खुद से बोला-
"कयामत तो तुम्हरी अम्मा है ही, बबलू बेटा! तूझे नही पता की, कीतनो के लंड में आग लगा कर बैठी है तुम्हरी अम्मा! साला उमर ना बीत जाये, और सपने में ही चोदता रह जांउ,"
बबलू -- का सोंचने लग गये काका?
बनवारी चीलम का कश लेकर मुस्कुराते हुए बोला-
बनवारी -- अरे बबलू! तू भी ना अपनी अम्मा से बहुत डरता है रे!
बबलू -- अम्मा है हमरी काका, इस लीये डरता हूँ।
बनवारी ने एक चीलम का कश लेते हुए...
बनवारी -- अरे बेटा! औरतों को तू नही जानता! तूझे पता नही है, औरतें डरने वाले मर्द को पसंद नही करती हैं। अरे औरतों से क्या डरना?
बबलू -- काका मैं कीसी औरत से नही डरता। वो तो बस अपनी अम्मा से!! क्यूकीं वो मेरी अम्मा है।
बनवारी -- अम्मा है तो का औरत नही है का? बुरा मत मानना बेटा, लेकीन एक बात कहता हूँ और शायद तूने सुना भी होगा। पूरे गाँव वाले कहते हैं की तेरी अम्मा से खूबसूरत औरत कोई नही है। और सब के सब मादरचोद लोग तेरी अम्मा के आगे-पीछे घुमते रहते है। मगर तेरी अम्मा तो देवी है देवी। कभी भी कीसी को घास तक नही डाली।
एक पल के लीए बबलू को गुस्सा तो आया पर अपनी माँ की देवी जैसी नीयत के बारे में सुनकर वो खुश हो गया...
बबलू -- सही कहते हो काका। हमरी अम्मा तो सच में देवी है, इसीलीए तो मैं अपनी अम्मा की सब बात मानता हूँ, और उसे खुश रखता हूँ।
बनवारी -- बात तो तेरी ठीक है बेटा, पर बुरा ना लगे तो एक बात कहूँ?
बबलू -- अरे बुरा काहे लगेगा काका? कहो ?
बनवारी -- देख बेटा, माना तू अपनी अम्मा को खुश रखता है। पर वो पूरी तरह से खुश नही है...बेटा!
बनवारी की बात सुनकर, बबलू थोड़ा हैरानी में-
बबलू -- पूरी तरह...खुश नही है!
बनवारी बबलू की बात खत्म होते ही झट से बोल पड़ा...
बनवारी -- हाँ...बेटा! खुश नही है।
बबलू -- पर काका...मैं तो अपनी अम्मा को कभी उदास नही देखा।
बनवारी -- अरे बेटा! तू एक बेटे की नज़र से अपनी अम्मा को देखता है। इसलीए तूझे उसकी उदासी नही दीखती।
बबलू -- बेटे की नज़र से! काका तुम का बोल रहे हो, मेरी तो कुछ समझ में ही नही आ रहा है।
बनवारी -- देख बेटा, माना वो तेरी माँ है। पर वो भी एक औरत ही है, बाकी औरतो की तरह उसे भी वो सब करने का मन होता है। जो एक औरत एक मर्द के सांथ करती है। पर वो एक वीधवा और संसकारी औरत है बेटा! मरद के खत्म होने के बाद वो बाहर ऐसे काम नही करेगी। इज्जत की डर से। इसलीए उसने सारे अरमानो को अपने सीने में दबा कर रख दीया है।
बनवारी की बात बबलू बड़ी ध्यान से सुन रहा था। उसे गुस्सा नही आया पर सोंच में जरुर पड़ गया। बबलू के पास बनवारी काका से पूछने के लीए कुछ नही था। इसलीए वो उठा और खामोशी से वहाँ से घर की तरफ लौट गया।
@@@@@
बबलू अपने घर पहुँचा तो पाया, आँगन में उसकी माँ सुधा और एक औरत बैठी बाते कर रही थी। बबलू को देखते ही सुधा बोली-
सुधा -- अरे बेटा कहाँ गया था? मैं तूझे कब से ढुंढ़ रही हूँ?
बबलु अपने माँ के बगल में खाट पर बैठते हुए बोला-
बबलू -- वो अम्मा, मैं थोड़ा बनवारी काका के इधर चला गया था।
सुधा -- ठीक है! इतना मत घूमा कर, जा-जाकर कुछ सब्जीया तोड़ ले आ।
उसके बाद बबलू उठ कर घर के बाहर नीकल जाता है। और घर के पीछवाड़े सब्जीया तोड़ने चला जाता है।
आगन मे बैठी सुधा उस औरत से बात कर रही थी। वो औरत सुधा से बोली-
"अरे सुधा, अपने बेटे को का खीला रही है रे? एकदम पहलवान बनते जा रहा है!"
सुधा को उस औरत पर गुस्सा आ गया...और मन में (ई हरज़ाई मेरे बेटे को नज़र ना लगा दे।)
ये सोंचते हुए सुधा अपने गुस्से पर काबू पाते हुए थोड़ी मुस्कुरा कर बोली-
सुधा -- अरे का खीला रही हूँ माला...जो सब खीलाते हैं वही मैं भी खीलाती हूँ। वो तो मेरा बेटा रोज कसरत करता है, इसलीए उसका शरीर थोड़ा गठीला हो गया है।
माला -- अरे थोड़ा का, पूरा गठीला और मज़बूत है। छातीया देखी है का अपने बेटे की, कीतनी चौंड़ी हैं। एक बार कीसी को जकड़ ले तो छुड़ा ना पाये।
माला की बात सुनते हुए सुधा मन ही मन खुश भी हो रही थी।