14-10-2021, 05:39 PM
(This post was last modified: 18-10-2021, 05:06 PM by neerathemall. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
ओह ! सागर! तुम इत'नी अच्छी बातें कर'ते हो के सुन'ने में बहुत प्यारा लग'ता है!" ऐसा कह'कर संगीता दीदी ने मेरे दोनो हाथ पकड़ लिए, जो उसकी कमर पर थे और मुझे नज़दीक खींच लिया. फिर मेरे हाथ उस'ने अप'ने पेट पर लपेट लिए जो बिल'कुल उसके छाती के उभारों के नीचे थे और उन'को हलका सा स्पर्श कर रहे थे.
संगीता दीदी की उस 'प्यारभरी' नज़दीकीयों का पूरा फ़ायदा उठाते मेने उसे ज़ोर से अप'नी बाँहों में भर लिया और उसके पिछे से चिपक गया. मेरा चह'रा मेने उसके कंधोपर रखा था जो उसके गालो को हलके से छू रहा था. मेरे हाथों से मेने उसके पेट को ज़ोर से आलींगन किया था जिस'से उसकी भरी हुई छाती मेरे हाथों से थोड़ी उपर उठ गयी थी. मेरे जांघों का भाग उसके गोला मटोल चुत्तऱ पर दब गया था.
"ओह ! सागर!" संगीता दीदी ने मेरी पकड़ और मजबूत कर के और खुद को और पिछे धकेल कर कहा, "तुम्हें तो मालूम है शादी से पह'ले अप'ने घर में मेने कभी ऐसा लिबास नही पहना क्योंकी पिताजी को ऐसा लिबास पसंद नही था. और शादी के बाद तो सवाल ही नही क्योंकी मेरे पति मुझे पंजाबी लिबास भी पहन'ने नही देते है. इस'लिए जींस और टी-शर्ट पहन'ने की मेरी बहुत दिन की 'इच्छा' आज पूरी हो गई. थॅंक्स, ब्रदर! तुम्हारी वजह से मेरा और एक 'इच्छा' पूरी हो गई."
"मेने तुम्हें कहा है ना, दीदी! तुम्हारी सभी 'इच्छाए' पूरी कर'ने के लिए में हमेशा तुम्हारे साथ हूँ. सिर्फ़ मुझे बताओ! तुम्हारी और कौन सी 'इच्छाए' पूरी कर'ना बाकी है" ऐसे कह'ते मेने और ज़ोर से उसे पिछे से कस लिया.
"अब और कोई 'इच्छा' बाकी नही है, सागर! तुम'ने मेरे लिए बहुत कुच्छ किया है. अब तुम मुझे बताओ.. में तुम्हारे लिए कुच्छ कर सक'ती हूँ क्या? तुम्हारी कोई 'इच्छा' में पूरी कर सक'ती हूँ क्या? बता मुझे कि में तुम्हारा कोई सपना पूरा कर सक'ती हूँ क्या?"
संगीता दीदी की उस 'प्यारभरी' नज़दीकीयों का पूरा फ़ायदा उठाते मेने उसे ज़ोर से अप'नी बाँहों में भर लिया और उसके पिछे से चिपक गया. मेरा चह'रा मेने उसके कंधोपर रखा था जो उसके गालो को हलके से छू रहा था. मेरे हाथों से मेने उसके पेट को ज़ोर से आलींगन किया था जिस'से उसकी भरी हुई छाती मेरे हाथों से थोड़ी उपर उठ गयी थी. मेरे जांघों का भाग उसके गोला मटोल चुत्तऱ पर दब गया था.
"ओह ! सागर!" संगीता दीदी ने मेरी पकड़ और मजबूत कर के और खुद को और पिछे धकेल कर कहा, "तुम्हें तो मालूम है शादी से पह'ले अप'ने घर में मेने कभी ऐसा लिबास नही पहना क्योंकी पिताजी को ऐसा लिबास पसंद नही था. और शादी के बाद तो सवाल ही नही क्योंकी मेरे पति मुझे पंजाबी लिबास भी पहन'ने नही देते है. इस'लिए जींस और टी-शर्ट पहन'ने की मेरी बहुत दिन की 'इच्छा' आज पूरी हो गई. थॅंक्स, ब्रदर! तुम्हारी वजह से मेरा और एक 'इच्छा' पूरी हो गई."
"मेने तुम्हें कहा है ना, दीदी! तुम्हारी सभी 'इच्छाए' पूरी कर'ने के लिए में हमेशा तुम्हारे साथ हूँ. सिर्फ़ मुझे बताओ! तुम्हारी और कौन सी 'इच्छाए' पूरी कर'ना बाकी है" ऐसे कह'ते मेने और ज़ोर से उसे पिछे से कस लिया.
"अब और कोई 'इच्छा' बाकी नही है, सागर! तुम'ने मेरे लिए बहुत कुच्छ किया है. अब तुम मुझे बताओ.. में तुम्हारे लिए कुच्छ कर सक'ती हूँ क्या? तुम्हारी कोई 'इच्छा' में पूरी कर सक'ती हूँ क्या? बता मुझे कि में तुम्हारा कोई सपना पूरा कर सक'ती हूँ क्या?"
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
