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चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री रचित उपन्यास
#47
बयान - 15

चंपा बेफिक्र नहीं है, वह भी कुमारी की खोज में घर से निकली हुई है। जब बहुत दिन हो गए और राजकुमारी चंद्रकांता की कुछ खबर न मिली तो महारानी से हुक्म ले कर चंपा घर से निकली। जंगल-जंगल, पहाड़-पहाड़ मारी फिरी मगर कहीं पता न लगा। कई दिन की थकी-माँदी जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठ कर सोचने लगी कि अब कहाँ चलना चाहिए और किस जगह ढूँढ़ना चाहिए, क्योंकि महारानी से मैं इतना वादा करके निकली हूँ कि कुँवर वीरेंद्रसिंह और तेजसिंह से बिना मिले और बिना उनसे कुछ खबर लिए कुमारी का पता लगाऊँगी, मगर अभी तक कोई उम्मीद पूरी न हुई और बिना काम पूरा किए मैं विजयगढ़ भी न जाऊँगी चाहे जो हो, देखूँ कब तक पता नहीं लगता।

जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठी हुई चंपा इन सब बातों को सोच रही थी कि सामने से चार आदमी सिपाहियाना पोशाक पहने, ढाल-तलवार लगाए एक-एक तेगा हाथ में लिए आते दिखाई दिए।

चंपा को देख कर उन लोगों ने आपस में कुछ बातें की जिसे दूर होने के सबब चंपा बिल्कुल सुन न सकी मगर उन लोगों के चेहरे की तरफ गौर से देखने लगी। वे लोग कभी चंपा की तरफ देखते, कभी आपस में बातें करके हँसते, कभी ऊँचे हो-हो कर अपने पीछे की तरफ देखते, जिससे यह मालूम होता था कि ये लोग किसी की राह देख रहे हैं। थोड़ी देर बाद वे चारों चंपा के चारों तरफ हो गए और पेड़ों के नीचे छाया देख कर बैठ गए।

चंपा का जी खटका और सोचने लगी कि ये लोग कौन हैं, चारों तरफ से मुझको घेर कर क्यों बैठ गए और इनका क्या इरादा है? अब यहाँ बैठना न चाहिए। यह सोच कर उठ खड़ी हुई और एक तरफ का रास्ता लिया, मगर उन चारों ने न जाने दिया।

दौड़ कर घेर लिया और कहा - ‘तुम कहाँ जाती हो? ठहरो, हमारे मालिक दम-भर में आ जाते हैं, उनके आने तक बैठो, वे आ लें तब हम लोग उनके सामने ले चल के सिफारिश करेंगे और नौकर रखा देंगे, खुशी से तुम रहा करोगी। इस तरह से कहाँ तक जंगल-जंगल मारी फिरोगी।’

चंपा – ‘मुझे नौकरी की जरूरत नहीं जो मैं तुम्हारे मालिक के आने की राह देखूँ, मैं नहीं ठहर सकती।’

एक सिपाही – ‘नहीं-नहीं, तुम जल्दी न करो, ठहरो, हमारे मालिक को देखोगी तो खुश हो जाओगी, ऐसा खूबसूरत जवान तुमने कभी न देखा होगा, बल्कि हम कोशिश करके तुम्हारी शादी उनसे करा देंगे।’

चंपा – ‘होश में आ कर बातें करो नहीं तो दुरुस्त कर दूँगी। खाली औरत न समझना, तुम्हारे ऐसे दस को मैं कुछ नहीं समझती।’

चंपा की ऐसी बात सुन कर उन लोगों को बड़ा अचंभा हुआ, एक का मुँह दूसरा देखने लगा। चंपा फिर आगे बढ़ी। एक ने हाथ पकड़ लिया। बस फिर क्या था, चंपा ने झट कमर से खंजर निकाल लिया और बड़ी फुर्ती के साथ दो को जख्मी करके भागी। बाकी के दो आदमियों ने उसका पीछा किया मगर कब पा सकते थे।

चंपा भागी तो मगर उसकी किस्मत ने भागने न दिया। एक पत्थर से ठोकर खा बड़े जोर से गिरी, चोट भी ऐसी लगी कि उठ न सकी, तब तक ये दोनों भी वहाँ पहुँच गए। अभी इन लोगों ने कुछ कहा भी नहीं था कि सामने से एक काफिला सौदागरों का आ पहुँचा, जिसमें लगभग दो सौ आदमियों के करीब होंगे। उनके आगे-आगे एक बूढ़ा आदमी था, जिसकी लंबी सफेद दाढ़ी, काला रंग, भूरी आँखें, उम्र लगभग अस्सी वर्ष की होगी। उम्दे कपड़े पहने, ढाल-तलवार लगाए, बर्छी हाथ में लिए, एक बेशकीमती मुश्की घोड़े पर सवार था। साथ में उसके एक लड़का जिसकी उमर बीस वर्ष से ज्यादा न होगी, रेख तक न निकली थी, बड़े ठाठ के साथ एक नेपाली टांगन पर सवार था, जिसकी खूबसूरती और पोशाक देखने से मालूम होता था कि कोई राजकुमार है। पीछे-पीछे उनके बहुत से आदमी घोड़े पर सवार और कुछ पैदल भी थे, सबसे पीछे कई ऊँटों पर असबाब और उनका डेरा लदा हुआ था। साथ में कई डोलियाँ थीं जिनके चारों तरफ बहुत से प्यादे तोड़ेदार बंदूकें लिए चले आते थे।

दोनों आदमियों ने जिन्होंने चंपा का पीछा किया था पुकार कर कहा - ‘इस औरत ने हमारे दो आदमियों को जख्मी किया है।’ जब तक कुछ और कहे तब तक कई आदमियों ने चंपा को घेर लिया और खंजर छीन हथकड़ी-बेड़ी डाल दी।

उस बूढ़े सवार ने जिसके बारे में कह सकते हैं कि शायद सभी का सरदार होगा, दो-एक आदमियों की तरफ देख कर कहा - ‘हम लोगों का डेरा इसी जंगल में पड़े। यहाँ आदमियों की आमदरफ्त कम मालूम होती है, क्योंकि कोई निशान पगडंडी का जमीन पर दिखाई नहीं देता।’

डेरा पड़ गया, एक बड़ी रावटी में कई औरतें कैद की गईं जो डोलियों पर थीं। चंपा बेचारी भी उन्हीं में रखी गई। सूरज अस्त हो गया, एक चिराग उस रावटी में जलाया गया जिसमें कई औरतों के साथ चंपा भी थी। दो लौडियाँ आईं जिन्होंने औरतों से पूछा कि तुम लोग रसोई बनाओगी या बना-बनाया खाओगी?

सभी ने कहा - ‘हम बना-बनाया खाएँगे।’

मगर दो औरतों ने कहा - ‘हम कुछ न खाएँगे।’

जिसके जवाब में वे दोनों लौंडियाँ यह कह कर चली गईं कि देखें कब तक भूखी रहती हो। इन दोनों औरतों में से एक तो बेचारी आफत की मारी चंपा ही थी और दूसरी एक बहुत ही नाजुक और खूबसूरत औरत थी जिसकी आँखों से आँसू जारी थे और जो थोड़ी-थोड़ी देर पर लंबी-लंबी साँस ले रही थी। चंपा भी उसके पास बैठी हुई थी।

पहर रात चली गई, सभी के वास्ते खाने को आया मगर उन दोनों के वास्ते नहीं जिन्होंने पहले इंकार किया था। आधी रात बीतने पर सन्नाटा हुआ, पैरों की आवाज डेरे के चारों तरफ मालूम होने लगी जिससे चंपा ने समझा कि इस डेरे के चारों तरफ पहरा घूम रहा है। धीरे-धीरे चंपा ने अपने बगल वाली खूबसूरत नाजुक औरत से बातें करना शुरू किया।

चंपा – ‘आप कौन हैं और इन लोगों के हाथ क्यों कर फँस गईं?’

औरत – ‘मेरा नाम कलावती है, मैं महाराज शिवदत्त की रानी हूँ, महाराज लड़ाई पर गए थे, उनके वियोग में जमीन पर सो रही थी, मुझको कुछ मालूम नहीं, जब आँख खुली अपने को इन लोगों के फंदे में पाया। बस और क्या कहूँ। तुम कौन हो?

चंपा - हैं, आप चुनारगढ़ की महारानी हैं। हा, आपकी यह दशा। वाह विधाता तू धन्य है। मैं क्या बताऊँ, जब आप महाराज शिवदत्त की रानी हैं तो कुमारी चंद्रकांता को भी जरूर जानती होंगी, मैं उन्हीं की सखी हूँ, उन्हीं की खोज में मारी-मारी फिरती थी कि इन लोगों ने पकड़ लिया।

ये दोनों आपस में धीरे-धीरे बातें कर रही थीं कि बाहर से एक आवाज आई - ‘कौन है? भागा, भागा, निकल गया।’

महारानी डरीं, मगर चंपा को कुछ खौफ न मालूम हुआ। बात ही बात में रात बीत गई, दोनों में से किसी को नींद न आई। कुछ-कुछ दिन भी निकल आया, वही दोनों लौंडियाँ जो भोजन कराने आई थीं इस समय फिर आईं। तलवार दोनों के हाथ में थी। इन दोनों ने सभी से कहा - ‘चलो पारी-पारी से मैदान हो आओ।’

कुछ औरतें मैदान गईं, मगर ये दोनों अर्थात महारानी और चंपा उसी तरह बैठी रहीं, किसी ने जिद्द भी न की। पहर दिन चढ़ आया होगा कि इस काफिले का बूढ़ा सरदार एक बूढ़ी औरत को लिए इस डेरे में आया जिसमें सब औरतें कैद थीं।

बुढ़िया – ‘इतनी ही हैं या और भी?’

सरदार – ‘बस इस वक्त तो इतनी ही हैं, अब तुम्हारी मेहरबानी होगी तो और हो जाएँगी।’

बुढ़िया – ‘देखिए तो सही, मैं कितनी औरतें फँसा लाती हूँ। हाँ, अब बताइए किस मेल की औरत लाने पर कितना इनाम मिलेगा।’

सरदार – ‘देखो ये सब एक मेल में हैं, इस किस्म की अगर लाओगी तो दस रुपए मिलेंगे। (चंपा की तरफ इशारा करके) अगर इस मेल की लाओगी तो पूरे पचास रुपए। (महारानी की तरफ बता कर) अगर ऐसी खूबसूरत हो तो पूरे सौ रुपए मिलेंगे, समझ गईं।’

बुढ़िया – ‘हाँ अब मैं बिल्कुल समझ गई, इन सभी को आपने कैसे पाया।’

सरदार – ‘यह जो सबसे खूबसूरत है इसको तो एक खोह में पाया था, बेहोश पड़ी थी और यह कल इसी जगह पकड़ी गई है, इसने दो आदमी मेरे मार डाले हैं, बड़ी बदमाश है।’

बुढ़िया – ‘इसकी चितवन ही से बदमाशी झलकती है, ऐसी-ऐसी अगर तीन-चार आ जाएँ तो आपका काफिला ही बैकुंठ चला जाए।’

सरदार – ‘इसमें क्या शक है। और वे सब जो हैं, कई तरह से पकड़ी गई हैं। एक तो वह बंगाल की रहने वाली है, इसके पड़ोस ही में मेरे लड़के ने डेरा डाला था, अपने पर आशिक करके निकाल लाया। ये चारों रुपए की लालच में फँसी हैं, और बाकी सभी को मैंने उनकी माँ, नानी या वारिसों से खरीद लिया है। बस चलो अब अपने डेरे में बातचीत करेंगे। मैं बूढ़ा आदमी बहुत देर तक खड़ा नहीं रह सकता।’

बुढ़िया – ‘चलिए।’

दोनों उस डेरे से रवाना हुए। इन दोनों के जाने के बाद सब औरतों ने खूब गालियाँ दीं - ‘मुए को देखो, अभी और औरतों को फँसाने की फिक्र में लगा है? न मालूम यह बुढ़िया इसको कहाँ से मिल गई, बड़ी शैतान मालूम पड़ती है। कहती है, देखो मैं कितनी औरतें फँसा लाती हूँ। हे परमेश्वर। इन लोगों पर तेरी भी कृपा बनी रहती है? न मालूम यह डाइन कितने घर चौपट करेगी।’

चंपा ने उस बुढ़िया को खूब गौर करके देखा और आधे घंटे तक कुछ सोचती रही, मगर महारानी को सिवाय रोने के और कोई धुन न थी। ‘हाय, महाराज की लड़ाई में क्या दशा हुई होगी, वे कैसे होंगे, मेरी याद करके कितने दु:खी होते होंगे।’ धीरे-धीरे यही कह के रो रही थीं। चंपा उनको समझाने लगी - ‘महारानी, सब्र करो, घबराओ मत, मुझे पूरी उम्मीद हो गई, ईश्वर चाहेगा तो अब हम लोग बहुत जल्दी छूट जाएँगे। क्या करूँ, मैं हथकड़ी-बेड़ी में पड़ी हूँ, किसी तरह यह खुल जातीं तो इन लोगों को मजा चखाती, लाचार हूँ कि यह मजबूत बेड़ी सिवाय कटने के दूसरी तरह खुल नहीं सकती और इसका कटना यहाँ मुश्किल है।’

इसी तरह रोते-कलपते आज का दिन भी बीता। शाम हो गई। बूढ़ा सरदार फिर डेरे में आ पहुँचा जिसमें औरतें कैद थीं। साथ में सवेरे वाली बुढ़िया, आफत की पुड़िया एक जवान खूबसूरत औरत को लिए हुए थी।

बुढ़िया – ‘मिला लीजिए, अव्वल नंबर की है या नहीं?

सरदार – ‘अव्वल नंबर की तो नहीं, हाँ दूसरे नंबर की जरूर है, पचास रुपए की आज तुम्हारी बोहनी हुई, इसमें शक नहीं।’

बुढ़िया –‘खैर, पचास ही सही, यहाँ कौन गिरह की जमा लगती है, कल फिर लाऊँगी, चलिए।’

इस समय इन दोनों की बातचीत बहुत धीरे-धीरे हुई, किसी ने सुना नहीं मगर होठों के हिलने से चंपा कुछ-कुछ समझ गई। वह नई औरत जो आज आई बड़ी खुश दिखाई देती थी। हाथ-पैर खुले थे। तुरंत ही इसके वास्ते खाने को आया। इसने भी खूब लंबे-चौड़े हाथ लगाए, बेखटके उड़ा गई। दूसरी औरतों को सुस्त और रोते देख हँसती और चुटकियाँ लेती थी। चंपा ने जी में सोचा - यह तो बड़ी भारी बला है, इसको अपने कैद होने और फँसने की कोई फिक्र ही नहीं। मुझे तो कुछ खुटका मालूम होता है।
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RE: चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री रचित उपन्यास - by usaiha2 - 25-07-2021, 08:54 PM



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