
वो सत्ताईस दिन...
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( ये आज से करीब 5000 साल पहले की एक काल्पनिक पौराणिक गाथा है, इसलिए जहाँ तक संभव हो सका है, मैंने उस समयानुसार कहानी लेखन में अपने शब्दों का चयन किया है, कहानी बयां करते समय Modern शब्दों का प्रयोग है और किरदारों के बातचीत के समय उस वक़्त की बोलने की शैली. कितना सफल रहा हूँ, ये मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ )
(RoccoSam - original writer)
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" ये आप कैसी बातें कर रहें हैं पुरोहित जी ? ". महारानी वैदेही ने अचंभित होकर पुरोहित जी से पूछा, और फिर महाराजा नंदवर्मन की ओर देखने लगी, ताकि वो भी कुछ बोलें, मगर वे चुप रहें, और कुछ सोचने लगें.
" क्षमा चाहता हूँ महारानी जी, मगर मेरे वचन असत्य नहीं हो सकतें ! ". पुरोहित जी ने बड़े ही आदरपूर्वक कहा और अपना सर झुका लिया.
" लेकिन ऐसा तो हमने कभी नहीं सुना, अगर ऐसा हुआ तो फिर... ". महारानी ने कहा.
" पुरोहित जी, काफ़ी रात हो चुकी है, अब आप आइये... ". महारानी की बात बीच में ही काटते हुए महाराजा नंदवर्मन ने कहा. " और हाँ... कल कृपया दिन की घड़ी में आ जाइएगा, हम चाहते हैं की ये बात आप स्वयं हमारी पुत्री, दोनों पुत्रों और बड़ी कुलवधु के सामने कहें. आपके इस विचित्र कथन के बारे में हमें उनकी भी राय जाननी है ! ".
" जो आज्ञा महाराज... ". कहकर पुरोहित जी उठ खड़े हुए और महाराजा और महारानी को चिंतित छोड़ कर वहाँ से चले गएँ...
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