17-07-2021, 06:37 PM
मेरी यह बात सुनते ही अल्का ने अचानक ही रोना बंद कर दिया। वो धीरे धीरे चलते हुए आँगन में पहुंची, और मेरे और चिन्नम्मा के सामने वहीं आँगन में एक एक कर के अपने शरीर से कपड़े का आखिरी सूत तक उतार दिया, और बारिश में पूर्ण नग्न खड़ी रही। मुझे उम्मीद ही नहीं थी की अल्का ऐसा कर भी सकती है। कुछ ही देर में उसके शरीर से बारिश के पानी की अनेकानेक धाराएं बह निकलीं। मेरी नज़र अचानक ही उसकी योनि पर पड़ी - वहां से पानी से मिल कर लाल रंग की धारा बह रही थी। तब मैंने ध्यान दिया की उसके उतारे हुए कपड़ों में सैनिटरी नैपकिन भी थी।
‘खून?’ यह विचार दिमाग में आते ही मैं उसकी तरफ दौड़ा।
“अल्का! ये क्या? खून?” वहां पहुँच कर मैंने उसकी योनि को छुआ, मेरी हथेली खून से रंग गई।
“इसीलिए तो मैंने तुमको सब्र करने को बोला था, मेरे कुट्टन!” अल्का ने थकी हुई मुस्कान के साथ कहा।
मैंने अल्का को गले से लगा लिया। उसने मेरे गालों को हाथ में ले कर कहा, “इतने सालों से अपना सब कुछ मैंने तुम्हारे लिए ही बचा कर रखा है! तुम भी तो कुछ सब्र कर लो, जानू!”
मैंने अल्का को गोद में उठाया, और आँगन से बाहर ले आया। तौलिये से उसके गीले शरीर को पोंछा, और उसी नग्नावस्था में उसको बिस्तर पर लिटाया। मान-मनुहार का दौर चला तो एक-दो घंटे बीत गए। इस बीच बारिश ने थमने का नाम ही नहीं लिया। वैसे भी आज खेत पर कोई काम नहीं होना था। मैंने चिन्नम्मा को मदद के लिए बुलाया। उसने अल्का की योनि साफ़ करी, एक ताज़ी नैपकिन निकाल कर उसकी योनि से सटाई और उसको साफ़, सूखी चड्ढी पहनाने लगी। चिन्नम्मा मेरे बर्ताव पर बहुत ही गुस्सा थी। वो, और अल्का, उम्र में इतना फ़ासला होने के बावजूद, दोनों सहेलियों जैसी थीं। अब चूँकि अल्का का दिल दुखाने का यह मेरा पहला अवसर था इसलिए चिन्नम्मा ने मुझे माफ़ कर दिया।
दरअसल, मासिकधर्म के समय अल्का बहुत चिड़चिड़ी सी हो जाती है, और उसको बात बात में गुस्सा आने लगता है। यह बात मुझे नहीं मालूम थी, और संभवतः उसको भी नहीं। लेकिन आस पास वाले, खास तौर पर लक्ष्मी को यह बात मालूम थी। अल्का उन दिनों में अक्सर ही उसको छोटी छोटी गलतियों पर झाड़ देती थी। जब चिन्नम्मा ने गणित लगाई, तो उसको इस बात का सारा रहस्य मालूम पड़ गया। चिन्नम्मा हाँलाकि इस बात से बहुत आश्चर्यचकित थीं कि मेरे और अल्का के बीच इस तरह का सम्बन्ध कैसे बन गया। लेकिन वो इस बात से खुश भी लग रही थीं। शायद उनको अल्का का कुँवारापन अच्छा नहीं लगता था।
खैर, जब हम दोनों का मन मुटाव कम या कहिए कि समाप्त हो गया, तब अल्का ने मुझसे कहा,
“तुमको मालूम है कुट्टन, मुझे मंदिर में जाना मना है इन तीन चार दिनों तक।”
“हैं? वो क्यों? किसने मना किया?”
मेरी ऐसी हालत थी, कि अल्का की कोई भी समस्या अब मेरी समस्या थी। मैंने मन ही मन यह निश्चय किया कि इस लड़की को अब से हमेशा खुश रखूँगा और उसका दिल कभी नहीं दुखाऊँगा।
“मेरा अर्रट्टावम (मासिक धर्म) है न...”
“यह तो गलत बात है... प्राकृतिक बातों के लिए किसी को धार्मिक काम करने से कैसे मना किया जा सकता है।”
‘खून?’ यह विचार दिमाग में आते ही मैं उसकी तरफ दौड़ा।
“अल्का! ये क्या? खून?” वहां पहुँच कर मैंने उसकी योनि को छुआ, मेरी हथेली खून से रंग गई।
“इसीलिए तो मैंने तुमको सब्र करने को बोला था, मेरे कुट्टन!” अल्का ने थकी हुई मुस्कान के साथ कहा।
मैंने अल्का को गले से लगा लिया। उसने मेरे गालों को हाथ में ले कर कहा, “इतने सालों से अपना सब कुछ मैंने तुम्हारे लिए ही बचा कर रखा है! तुम भी तो कुछ सब्र कर लो, जानू!”
मैंने अल्का को गोद में उठाया, और आँगन से बाहर ले आया। तौलिये से उसके गीले शरीर को पोंछा, और उसी नग्नावस्था में उसको बिस्तर पर लिटाया। मान-मनुहार का दौर चला तो एक-दो घंटे बीत गए। इस बीच बारिश ने थमने का नाम ही नहीं लिया। वैसे भी आज खेत पर कोई काम नहीं होना था। मैंने चिन्नम्मा को मदद के लिए बुलाया। उसने अल्का की योनि साफ़ करी, एक ताज़ी नैपकिन निकाल कर उसकी योनि से सटाई और उसको साफ़, सूखी चड्ढी पहनाने लगी। चिन्नम्मा मेरे बर्ताव पर बहुत ही गुस्सा थी। वो, और अल्का, उम्र में इतना फ़ासला होने के बावजूद, दोनों सहेलियों जैसी थीं। अब चूँकि अल्का का दिल दुखाने का यह मेरा पहला अवसर था इसलिए चिन्नम्मा ने मुझे माफ़ कर दिया।
दरअसल, मासिकधर्म के समय अल्का बहुत चिड़चिड़ी सी हो जाती है, और उसको बात बात में गुस्सा आने लगता है। यह बात मुझे नहीं मालूम थी, और संभवतः उसको भी नहीं। लेकिन आस पास वाले, खास तौर पर लक्ष्मी को यह बात मालूम थी। अल्का उन दिनों में अक्सर ही उसको छोटी छोटी गलतियों पर झाड़ देती थी। जब चिन्नम्मा ने गणित लगाई, तो उसको इस बात का सारा रहस्य मालूम पड़ गया। चिन्नम्मा हाँलाकि इस बात से बहुत आश्चर्यचकित थीं कि मेरे और अल्का के बीच इस तरह का सम्बन्ध कैसे बन गया। लेकिन वो इस बात से खुश भी लग रही थीं। शायद उनको अल्का का कुँवारापन अच्छा नहीं लगता था।
खैर, जब हम दोनों का मन मुटाव कम या कहिए कि समाप्त हो गया, तब अल्का ने मुझसे कहा,
“तुमको मालूम है कुट्टन, मुझे मंदिर में जाना मना है इन तीन चार दिनों तक।”
“हैं? वो क्यों? किसने मना किया?”
मेरी ऐसी हालत थी, कि अल्का की कोई भी समस्या अब मेरी समस्या थी। मैंने मन ही मन यह निश्चय किया कि इस लड़की को अब से हमेशा खुश रखूँगा और उसका दिल कभी नहीं दुखाऊँगा।
“मेरा अर्रट्टावम (मासिक धर्म) है न...”
“यह तो गलत बात है... प्राकृतिक बातों के लिए किसी को धार्मिक काम करने से कैसे मना किया जा सकता है।”