17-07-2021, 06:07 PM
सवेरे -
“चिन्नू, आज बढ़िया गरमा गरम इडली बनाई है तुम्हारे लिए। जल्दी से खा लो, फिर तुम्हारा ‘मसाज’ होगा।”
“आज तुम खेत पर नहीं गई ?”
“नहीं, आज छुट्टी है। आज हम सिर्फ मजा मस्ती करेंगे.. या फिर जो तुम कहो वो। ठीक है? लेकिन पहले चिन्नम्मा...”
मैंने जल्दी जल्दी नित्यकर्म किया और स्वादिष्ट गरमागरम इडली खाई, और कॉफ़ी पी। फिर चिन्नम्मा सुगन्धित तेल की कटोरी लेकर आई और बोली,
“चिन्नू, तेल मालिश आँगन में होगी, या फिर बाहर, अहाते में?”
मौसम अच्छा था, इसलिए मैंने कहा, “अहाते में, चिन्नम्मा!”
अहाते में चिन्नम्मा ने चटाई बिछाई और फिर मुझसे कपड़े उतारने को कहा। बढ़िया हवा बयार चल रही थी, और चिड़ियाँ चहक रही थीं। मैंने जाँघिया को छोड़ कर सब कपड़े उतार दिए।
“ये भी।”
“ये भी?”
“हाँ! नहीं तो मालिश कैसे होगी?”
“अरे ऐसे ही कर दो न चिन्नम्मा!”
“ऐसे ही कैसे कर दूँ? हमेशा ही तो पूरा नंगा कर के तुम्हारी मालिश होती है।”
“क्या चिन्नम्मा! अब मैं बड़ा हो गया हूँ। ऐसे कैसे आपके सामने नंगा हो जाऊँगा?”
“बड़े हो गए हो?”
“और क्या?”
“अच्छा!”
“हाँ!”
“देखूँ तो... कितने बड़े हो गए हो।”
यह कह कर वो खुद ही मेरे जाँघिया का नाड़ा खोल कर मुझे नंगा करने लगीं। चिन्नम्मा तो अम्मा से भी बड़ी थीं, तो उनको मना कैसे करूँ, यह समझ नहीं आया। बस दो सेकंड में ही मैं उनके सामने पूरा नंगा खड़ा था। और उतनी ही देर में मेरे लिंग में इतना रक्त भर गया कि वो गन्ने की पोरी के जितना लम्बा, मोटा और ठोस हो गया। चिन्नम्मा ने मेरे लिंग को अपनी हथेली में पकड़ कर दो तीन बार दबाया और कहा,
“बढ़िया!”
बढ़िया तो था, लेकिन यह अनुभव मेरे लिए बहुत अनोखा था। इतने दिनों से अल्का के साथ रहते रहते वैसे भी शरीर में कामुक ऊर्जा भरी हुई थी। यहाँ आने के पहले तो रोज़ का नियम हो गया था कि हाथ से ही खुद को शांत कर लिया जाए। लेकिन यहाँ उस तरह का एकांत अभी तक नहीं मिल पाया था। और फिर चिन्नम्मा का ऐसा हमला! मैं अपने अण्डकोषों में बनने वाले दबाव को रोक नहीं सका। जब चिन्नम्मा ने एक और बार मेरे लिंग को दबाया, तो मेरे वृषण ने पिछले दस बारह दिनों से संचित वीर्य को पूरी प्रबलता से से बाहर फेंक दिया।
कम से कम सात आठ बार मेरे लिंग ने अपना वीर्य उगला होगा, और हर बार उसकी प्रबलता में कोई ख़ास कमी नहीं हुई। चिन्नम्मा मुझसे चिपक कर नहीं बैठी थीं। लेकिन फिर भी स्खलन में इतनी तीव्रता थी कि सारा का सारा वीर्य सामने बैठी चिन्नम्मा के ऊपर ही जा कर गिरा। उस वर्षा से चिन्नम्मा पूरी तरह से भीग गईं। जब मैंने आँखें खोली तो देखा कि उनके चेहरे, बाल, ब्लाउज और साड़ी पर मेरा वीर्य गिरा हुआ है।
“अरे मेरे चक्कारे, बता तो देता कि यह होने वाला है!” चिन्नम्मा ने सम्हलते हुए कहा।
मैंने काफी देर तक गहरी गहरी साँसे भर कर खुद को संयत किया और फिर कहा, “कैसे बताता चिन्नम्मा, तुमने एक तो मुझे ऐसे नंगा कर दिया, और फिर ऐसे छेड़-खानी करने लगी।”
“छेड़-खानी नहीं, मैं तो तुम्हारा कुन्ना देख रही थी। फिर से नहाना पड़ेगा मुझे अब! कोई बात नहीं! मेरा चिन्नू तो सचमुच का बड़ा हो गया है। बढ़िया मज़बूत कुन्ना है। कुछ दिन तुम्हारी मालिश कर दूँगी तो और मज़बूत हो जायेगा यह। चलो, अब जल्दी से तुम्हारी मालिश कर दूँ।” चिन्नम्मा ने अपनी साड़ी के आँचल से अपना चेहरा साफ़ करते हुए कहा।
“चिन्नू, आज बढ़िया गरमा गरम इडली बनाई है तुम्हारे लिए। जल्दी से खा लो, फिर तुम्हारा ‘मसाज’ होगा।”
“आज तुम खेत पर नहीं गई ?”
“नहीं, आज छुट्टी है। आज हम सिर्फ मजा मस्ती करेंगे.. या फिर जो तुम कहो वो। ठीक है? लेकिन पहले चिन्नम्मा...”
मैंने जल्दी जल्दी नित्यकर्म किया और स्वादिष्ट गरमागरम इडली खाई, और कॉफ़ी पी। फिर चिन्नम्मा सुगन्धित तेल की कटोरी लेकर आई और बोली,
“चिन्नू, तेल मालिश आँगन में होगी, या फिर बाहर, अहाते में?”
मौसम अच्छा था, इसलिए मैंने कहा, “अहाते में, चिन्नम्मा!”
अहाते में चिन्नम्मा ने चटाई बिछाई और फिर मुझसे कपड़े उतारने को कहा। बढ़िया हवा बयार चल रही थी, और चिड़ियाँ चहक रही थीं। मैंने जाँघिया को छोड़ कर सब कपड़े उतार दिए।
“ये भी।”
“ये भी?”
“हाँ! नहीं तो मालिश कैसे होगी?”
“अरे ऐसे ही कर दो न चिन्नम्मा!”
“ऐसे ही कैसे कर दूँ? हमेशा ही तो पूरा नंगा कर के तुम्हारी मालिश होती है।”
“क्या चिन्नम्मा! अब मैं बड़ा हो गया हूँ। ऐसे कैसे आपके सामने नंगा हो जाऊँगा?”
“बड़े हो गए हो?”
“और क्या?”
“अच्छा!”
“हाँ!”
“देखूँ तो... कितने बड़े हो गए हो।”
यह कह कर वो खुद ही मेरे जाँघिया का नाड़ा खोल कर मुझे नंगा करने लगीं। चिन्नम्मा तो अम्मा से भी बड़ी थीं, तो उनको मना कैसे करूँ, यह समझ नहीं आया। बस दो सेकंड में ही मैं उनके सामने पूरा नंगा खड़ा था। और उतनी ही देर में मेरे लिंग में इतना रक्त भर गया कि वो गन्ने की पोरी के जितना लम्बा, मोटा और ठोस हो गया। चिन्नम्मा ने मेरे लिंग को अपनी हथेली में पकड़ कर दो तीन बार दबाया और कहा,
“बढ़िया!”
बढ़िया तो था, लेकिन यह अनुभव मेरे लिए बहुत अनोखा था। इतने दिनों से अल्का के साथ रहते रहते वैसे भी शरीर में कामुक ऊर्जा भरी हुई थी। यहाँ आने के पहले तो रोज़ का नियम हो गया था कि हाथ से ही खुद को शांत कर लिया जाए। लेकिन यहाँ उस तरह का एकांत अभी तक नहीं मिल पाया था। और फिर चिन्नम्मा का ऐसा हमला! मैं अपने अण्डकोषों में बनने वाले दबाव को रोक नहीं सका। जब चिन्नम्मा ने एक और बार मेरे लिंग को दबाया, तो मेरे वृषण ने पिछले दस बारह दिनों से संचित वीर्य को पूरी प्रबलता से से बाहर फेंक दिया।
कम से कम सात आठ बार मेरे लिंग ने अपना वीर्य उगला होगा, और हर बार उसकी प्रबलता में कोई ख़ास कमी नहीं हुई। चिन्नम्मा मुझसे चिपक कर नहीं बैठी थीं। लेकिन फिर भी स्खलन में इतनी तीव्रता थी कि सारा का सारा वीर्य सामने बैठी चिन्नम्मा के ऊपर ही जा कर गिरा। उस वर्षा से चिन्नम्मा पूरी तरह से भीग गईं। जब मैंने आँखें खोली तो देखा कि उनके चेहरे, बाल, ब्लाउज और साड़ी पर मेरा वीर्य गिरा हुआ है।
“अरे मेरे चक्कारे, बता तो देता कि यह होने वाला है!” चिन्नम्मा ने सम्हलते हुए कहा।
मैंने काफी देर तक गहरी गहरी साँसे भर कर खुद को संयत किया और फिर कहा, “कैसे बताता चिन्नम्मा, तुमने एक तो मुझे ऐसे नंगा कर दिया, और फिर ऐसे छेड़-खानी करने लगी।”
“छेड़-खानी नहीं, मैं तो तुम्हारा कुन्ना देख रही थी। फिर से नहाना पड़ेगा मुझे अब! कोई बात नहीं! मेरा चिन्नू तो सचमुच का बड़ा हो गया है। बढ़िया मज़बूत कुन्ना है। कुछ दिन तुम्हारी मालिश कर दूँगी तो और मज़बूत हो जायेगा यह। चलो, अब जल्दी से तुम्हारी मालिश कर दूँ।” चिन्नम्मा ने अपनी साड़ी के आँचल से अपना चेहरा साफ़ करते हुए कहा।