19-11-2020, 04:50 PM
इस पर लिखा था SSC officers based in London १९८० । क्यूँकि इस कम्पनी का अकाउंट हमारे बैंक में था, इस लिए मैं काफ़ी लोगों को जानता था । हो सकता है कि मैं किसी को पहचान सकूँ, इस विचार से मैं उस फ़ोटो को बड़े ध्यानपूर्वक देखने लगा । फिर एक व्यक्ति पर मेरी नज़र आ कर टिक गई । अरे, यह तो अपना मित्र जग्गी है । मैं तो इसे बड़ी अच्छी तरह जानता हूँ । इसकी पोस्टिंग ४० वर्ष पहले ३ वर्ष के लिए लंदन में हुई थी । उसके दो बच्चे भी हैं, एक लड़का और एक लड़की । लंदन में वह मेरे घर के पास ही रहता था, इस लिए अकसर मुलाक़ात हो जाती थी । और जब भी मैं उस के घर जाता, तो खाना खाए बग़ैर तो वह आने ही नहीं देता था । उसकी लड़की बिनू छोटी सी उम्र में ही काफ़ी सुलझी हुई थी, मगर उसका लड़का, जो की बीनू से छोटा था, कभी कुछ नहीं बोलता था । लेकिन उसकि आँखें बहुत रहस्यमय थीं । कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ कह जाती थीं ।
३ वर्ष पूरे होने पर जग्गी की तब्दीली दिल्ली हो गई । कुछ वर्षों तक तो सम्बंध रहा, मगर यह कब टूट गया, याद नहीं । उसके बाद मेरी भी शादी हो गई और मैं अपनी ग्रहस्ती में व्यस्त हो गया। जैसे कि एक कहावत है ‘ आँख ओझल पहाड़ ओझल ‘ वाली बात हो गई । मगर वह तस्वीर देख कर बहुत सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं और उस से मिलने की फिर से तमन्ना जाग उठी ।काफ़ी चेष्टा के बाद उसका पता मिल हि गया । मैंने FB पर उसके नाम संदेश भेजा और फिर उसके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। जब कुछ दिन तक उसका जवाब नहीं आया, तो बड़ी निराशा हुई । फिर कोई एक मास के बाद उसका पैग़ाम आ ही गया । उस ने देर से जवाब देने के लिए क्षमा माँगी थी । इसके बाद FB पर काफ़ी संदेश अक्सचेंज होते रहे । उस ने कहा, कि मैं जब भी दिल्ली आऊँ, तो उस से ज़रूर मिलूँ । और फिर वह दिन आ ही गया ।
३ वर्ष पूरे होने पर जग्गी की तब्दीली दिल्ली हो गई । कुछ वर्षों तक तो सम्बंध रहा, मगर यह कब टूट गया, याद नहीं । उसके बाद मेरी भी शादी हो गई और मैं अपनी ग्रहस्ती में व्यस्त हो गया। जैसे कि एक कहावत है ‘ आँख ओझल पहाड़ ओझल ‘ वाली बात हो गई । मगर वह तस्वीर देख कर बहुत सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं और उस से मिलने की फिर से तमन्ना जाग उठी ।काफ़ी चेष्टा के बाद उसका पता मिल हि गया । मैंने FB पर उसके नाम संदेश भेजा और फिर उसके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। जब कुछ दिन तक उसका जवाब नहीं आया, तो बड़ी निराशा हुई । फिर कोई एक मास के बाद उसका पैग़ाम आ ही गया । उस ने देर से जवाब देने के लिए क्षमा माँगी थी । इसके बाद FB पर काफ़ी संदेश अक्सचेंज होते रहे । उस ने कहा, कि मैं जब भी दिल्ली आऊँ, तो उस से ज़रूर मिलूँ । और फिर वह दिन आ ही गया ।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
