19-11-2020, 04:46 PM
मुझसे मिलना ज़रूरी कामों में से एक नहीं था, सोचता मैं टेबल पर अपनी दोनो कांपती कोहनी को दृढ़ता से टिकाए सामान्य बने रहने की कोशिश करता हुआ उसके कुछ कहने का इंतज़ार करता हूं। मैं कुछ कहना नही चाहता, वह जो भी कहेगी वही मान्य होगा। यह अबोला समझौता है। वैसे भी हमारे बीच सबकुछ बिनबोला ही रहा है अब तक और अब मैं उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
“प्रेम लिखना बहुत सरल है किंतु प्रेम में होना दुष्कर।” उसने टेबल से कार की चाभी उठाते हुए कहा और चली गई।
मैं उसके मुड़कर देखने की प्रतीक्षा करता रहा। मैं उसकी प्रतीक्षा का आदी हूं।
ठंडी बेमज़ा चाय की छोटी छोटी घूंट भरता मैं उसके जाने के बहुत देर तक पशोपेश में रहा। वह क्यूं आई थी?
कुछ दिन पहले मैंने ही कहा था “उधर आती हो तो, कॉफ़ी के लिये…” मैंने बात अधूरी छोड़ दी थी।
सबके सामने यूं कहा था मानों ख़ास आमंत्रण ना देकर बस खानापूर्ति की हो। मैं किसी ख़ास तरह के निमंत्रण देने की स्थिति में था भी नहीं, लेकिन उसका मैसेज आने तक मैं अपनी उसी अधूरी बात में जीता रहा और वह मुझमें।
इन दिनों कुछ अलग सी दुश्वारियों में जी रहा था। मैं क्या कर रहा था, क्या चाहता था, कुछ समझ नही आ रहा था। कुछ समझना चाहता भी नहीं, बस उसका आना चाहता था। आज वो आई थी। अब चली गई है। उसके आने और जाने के बीच जो भी था, नॉर्मल नहीं था। वह जा चुकी है मैं वहीं बैठा हूं। मैं मुन्तज़िर हूं लेकिन वह नहीं आयेगी। वह जा चुकी है।
“प्रेम लिखना बहुत सरल है किंतु प्रेम में होना दुष्कर।” उसने टेबल से कार की चाभी उठाते हुए कहा और चली गई।
मैं उसके मुड़कर देखने की प्रतीक्षा करता रहा। मैं उसकी प्रतीक्षा का आदी हूं।
ठंडी बेमज़ा चाय की छोटी छोटी घूंट भरता मैं उसके जाने के बहुत देर तक पशोपेश में रहा। वह क्यूं आई थी?
कुछ दिन पहले मैंने ही कहा था “उधर आती हो तो, कॉफ़ी के लिये…” मैंने बात अधूरी छोड़ दी थी।
सबके सामने यूं कहा था मानों ख़ास आमंत्रण ना देकर बस खानापूर्ति की हो। मैं किसी ख़ास तरह के निमंत्रण देने की स्थिति में था भी नहीं, लेकिन उसका मैसेज आने तक मैं अपनी उसी अधूरी बात में जीता रहा और वह मुझमें।
इन दिनों कुछ अलग सी दुश्वारियों में जी रहा था। मैं क्या कर रहा था, क्या चाहता था, कुछ समझ नही आ रहा था। कुछ समझना चाहता भी नहीं, बस उसका आना चाहता था। आज वो आई थी। अब चली गई है। उसके आने और जाने के बीच जो भी था, नॉर्मल नहीं था। वह जा चुकी है मैं वहीं बैठा हूं। मैं मुन्तज़िर हूं लेकिन वह नहीं आयेगी। वह जा चुकी है।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
