19-11-2020, 04:44 PM
मैं बेचैनी से पहलु बदलता हूं। कितना असाध्य है प्रेम।
और जो प्रेम को साध ले?
“वह दो कौड़ी का आदमी हो जाता है।” लड़की ने सहजता से कहा।
मैं मुस्कुराता हूं। ऐन उसी वक़्त मोबाइल स्क्रीन पर एक संदेशा कौंधता है, लड़की के नाम का। उसने लिखा है “मुझे समय पर पहुंचना अच्छा लगता है और इंतज़ार करना नाहद उबाऊ” लड़की की कही बातें मेरे भीतर कहीं गहरे बैठ जाती है। मैं उसकी कही बातों की गांठ बांध रख लेता हूं। मन के संदूकची में। बिन ताले वाली संदूकची। कभी किसी निरीह एकांत में संदूकची में घुस तमाम गांठे खोल देता हूं।
एक दिन उसने कहा “मेरी कहानी का मुख्य किरदार ऐनक लगाता है।” और तब से ऐनक चढ़ा मैं खुद को नायक की तरह देखता हूं। ऐसे तो मैं ऐनक बारह साल की उम्र से लगाता आ रहा हूं और पहली बार जब ऐनक चढ़ा कॉलेज गया था तब सहपाठियों ने खूब मजाक उड़ाया था। इसलिए ऐनक को कभी नायक तत्व की तरह नहीं देख पाया, लेकिन लड़की ने कहा – मैं उसकी कहानी का नायक हूं।
लड़की कहानियां लिखती है, विशेषकर प्रेम कहानियां।
मैंने पूछा “क्या तुमने कभी प्रेम किया है?’
उसने साहिर भोपाली के प्रसिद्ध शेर के मतले की पहली पंक्ति को अपने ताल्लुक ढाल दोहरा दिया “दर्दे दिल में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं“
और तुरंत ही प्रश्न गेंद की तरह मेरी ओर उछाल दिया “और तुमने?”
और जो प्रेम को साध ले?
“वह दो कौड़ी का आदमी हो जाता है।” लड़की ने सहजता से कहा।
मैं मुस्कुराता हूं। ऐन उसी वक़्त मोबाइल स्क्रीन पर एक संदेशा कौंधता है, लड़की के नाम का। उसने लिखा है “मुझे समय पर पहुंचना अच्छा लगता है और इंतज़ार करना नाहद उबाऊ” लड़की की कही बातें मेरे भीतर कहीं गहरे बैठ जाती है। मैं उसकी कही बातों की गांठ बांध रख लेता हूं। मन के संदूकची में। बिन ताले वाली संदूकची। कभी किसी निरीह एकांत में संदूकची में घुस तमाम गांठे खोल देता हूं।
एक दिन उसने कहा “मेरी कहानी का मुख्य किरदार ऐनक लगाता है।” और तब से ऐनक चढ़ा मैं खुद को नायक की तरह देखता हूं। ऐसे तो मैं ऐनक बारह साल की उम्र से लगाता आ रहा हूं और पहली बार जब ऐनक चढ़ा कॉलेज गया था तब सहपाठियों ने खूब मजाक उड़ाया था। इसलिए ऐनक को कभी नायक तत्व की तरह नहीं देख पाया, लेकिन लड़की ने कहा – मैं उसकी कहानी का नायक हूं।
लड़की कहानियां लिखती है, विशेषकर प्रेम कहानियां।
मैंने पूछा “क्या तुमने कभी प्रेम किया है?’
उसने साहिर भोपाली के प्रसिद्ध शेर के मतले की पहली पंक्ति को अपने ताल्लुक ढाल दोहरा दिया “दर्दे दिल में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं“
और तुरंत ही प्रश्न गेंद की तरह मेरी ओर उछाल दिया “और तुमने?”
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
