19-11-2020, 04:40 PM
” सुनो बहू , अब ये तुम्हारा अपना घर है , फिर भी बहू तो बहू ही होती है !इसकी मान-मर्यादा भी तुम्हारे हाथ में ही है। अब कहीं भी मुँह उठा कर चल दो या जोर का हंसी ठट्ठा तुमको शोभा नहीं देगा ! ” दादी के स्वर में प्यार भरा आदेश था।
” क्या दादी ! आज ही तो आई है और यह सिखलाई -पढाई शुरू हो गई ! ” रुनकु ठुनक सी गई। अलबत्ता महिलाओं में एक चुप्पी सी पसर गई थी।
” हाँ कुछ बातें तो हैं जो सिखलाई -पढाई जा सकती है। शिवि बेटा , मैं चाहती हूँ कि तुम इस घर की अच्छाई को ही बाहर बताओ और कोई भी बात जो तुम्हें बुरी लगे , कैसी भी शिकायत हो वह मुझे बताओ। मन को अंदर ही अंदर घोट लो , यह मुझे पसंद नहीं आएगा। ” वेदिका ने बहुत अपनेपन से कहा।
शिवि के मन में एक हिलोर फिर से उठी और माँ याद आ गई।
शिवि नए ज़माने की ही लड़की थी तो सामंजस्य बैठाने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी ।
दो सप्ताह पुरानी दुल्हन सुबह -सुबह ही रसोई में वेदिका के पास खड़ी थी। चाय लेने आई थी। वेदिका भी आज जल्दी ही उठ गई थी। बेटा -बहू ने घूमने जाना था और रुनकु ने भी वापस हॉस्टल , इसलिए वह नाश्ते का इंतज़ाम कर रही थी। मौसम ठंडा था। हल्की बारिश भी हो चुकी थी।
” शिवि बेटा ! तुम्हें यहाँ कोई दिक्कत तो नहीं ! कैसे महसूस होता है ? ” वेदिका के शब्द बहुत कोमल थे।
” मम्मा …, ” कह कर चुप सी हो गई।
” हाँ बोलो बेटा ! ” थोड़ा आशंकित सी हुई वेदिका।
” मुझे यहाँ ठण्ड का अहसास सा होता है ! ठंडा -ठंडा सा …, ” कहते हुए झिझक सी गई शिवि।
” अरे बेटा …. ,” हंस पड़ी वेदिका।
” अभी तुमने यहाँ की , इस घर की गर्माहट को दिल से नहीं अपनाया। समय लगता है बेटा …. फिर सब ठीक हो जायेगा। लो चाय ले जाओ और तैयार हो जाओ , ” सर पर स्नेह से हाथ फेर कर चाय की ट्रे थमा दी। मन भर आया वेदिका का , आँखे नम कर के कुछ सोच ने लगी और चाकू से स्लेब पर एक लकीर खींच दी।
” बीबी जी ! एक बताओ जी ! ” वेदिका ने अपनी सोच और हाथ का काम रोक कर बहादुर की और देखा जो कि बहुत गंभीर मुद्रा में कुछ कहना चाह रहा था।
” हां बोलो ? ”
” बीबी जी ! आप मुझे बताओ कि ये जो बादल होते हैं उनमे पानी धरती का होता या आसमान से आता है ? ”
वेदिका हंस पड़ी कि ये कैसा सवाल है। लेकिन उसकी गंभीर मुख मुद्रा देख कर अनजान बनते हुए बोली , ” अरे भई , जब बादल आसमान के होंगे तो पानी भी आसमान से ही तो लेगा ना , कोई धरती से से पाईप थोड़ी न जोड़ रखी है ! ”
बहादुर खिलखिला कर हंस पड़ा , ” नहीं बीबी जी , धरती पर जो नदी ,तालाब और समंदर होते है उसका पानी धूप में , भाफ बन कर उड़ जाता है और उनसे बदल बनते हैं ! ”
” ओहो , अच्छा ! मुझे तो ये पता ही नहीं था ! तू तो बड़ा सायना है ! ” हंस पड़ी वेदिका। उसके साथ-साथ बाहर से भी जोर से हँसने आवाज़ आई तो वह चौंक पड़ी।
” क्या मम्मा आप भी ना , कैसी बात कर रही हो , इस बहादुर के आगे भोले पन की बात कर रही हो। इसको डांट भी सकती थी। आप का भी ना दिमाग …., ”
” दिमाग खराब है , मंद-बुद्धि हूँ ! अरे भई , कई बार किसी का मन रखने के लिए अनजान बनना भी अच्छा ही होता है। अगर मैं डांटती या अपना ज्ञान बघारती तो बेचारे मासूम का दिल ना टूट जाता ! ” वेदिका ने ध्रुव की बात काट दी , वह बहू के सामने आहत महसूस कर रही थी।
” लेकिन ध्रुव इसमें ना तो मंद -बुद्धि और दिमाग खराबी की बात तो कहीं नज़र नहीं आई , यह तो मम्मा की सरलता और सहजता है जो एक नौकर का दिल भी दुखाना नहीं चाहती। सरल होना भी तो कर किसी के बस में कहाँ है ! हाँ ना मम्मा ! ” शिवि ने बहुत प्यार से वेदिका की और देखते हुए कहा।
” ले सुन ले रुनकु ! अब इस घर में तेरी माँ की हिमायती आ गई है तेरी जगह लेने ! ” दादी कटाक्ष करने में कहाँ चुकने वाली थी।
” मेरी जगह कौन लेगा भला ! और शिवि भाभी की अपनी जगह है ! ये तेरी जगह -मेरी जगह मुझे समझ नहीं आती दादी …. चार दिन की जिंदगी है क्यों ना मिल कर गुजारें। ”
दादी-पोती का संवाद वेदिका को कहीं गुम कर गया और उसने डाइनिंग टेबल पर ऊँगली से एक साथ बड़ी से छोटी लकीरें खींच दी जब तक एक बिंदु की जगह ना रह गई। वेदिका को शिवि बहुत गौर से देखती रही।
दोपहर तक सभी चले गए। रह गए तो बस वेदिका और अम्मा जी। अम्मा जी सोने चल दिए और वेदिका छत पर। अब सर्दी तो नहीं रही थी फिर भी थोड़ी सी धूप -छाँव देख कर चटाई बिछा दी। उसके पीछे -पीछे वह भी आ गई।
” बहुत दिन हुए तुमको मेरी याद भी नहीं आई ! ” उसने उलाहना सा दिया।
” नहीं तो ! तू तो मेरे दिल में बसी है फिर तुम्हें कैसे भूल जाती ! बस समय ही नहीं मिला। वेदिका हंस कर बोली।
” बहू तो तुम्हें अच्छी मिली है ! जैसी तुम चाहती थी वैसी ही …. ,”
” मेरी बहू को मनभाती सास मिली या नहीं , यह कौन बताये मुझे ? ” वेदिका ने झट से जवाब दिया।
फिर पास ही पड़े उखड़े पत्थर से वहीँ एक लकीर खींच दी। सोचने लगी ये मनचाहा क्या होता है। जो हमें अच्छा लगे वही मिले। सामने वाले की भी तो यही कामना होती है कि उसे भी मनचाहा मिले। फिर क्यों नहीं हम सामने वाले के हितों की रक्षा करते। अगर ऐसा हो जाय तो फिर सारी समस्या , प्रतिद्वंदिता ही समाप्त हो जाएगी। पर क्या यह संभव है ! यहाँ तो हर कदम पर खुद को साबित करने की होड़ है। कोई किसी से कम नहीं रहना चाहता।
” क्या सोचने लगी वेदिका ? ” उसने टहोका।
” कुछ भी नहीं , और बहुत कुछ भी … , आज माता जी ने मुझे समझाया कि बहू को सर चढ़ाने की जरुरत नहीं। कंट्रोल में रखना सीखो। एक बार हाथ से निकल जाएगी तो बेटा भी हाथ से गया ही समझो ! मुझे हंसी आ गई। पर मन ही मन में हंसी। कि अभी तो मैं भी आपके ही कंट्रोल में हूँ तो किसको बस में करूँ और किस को नहीं। जहाँ तक बेटे की बात है। नदी तो सागर की ओर ही बहेगी। बंधन में किसको बांधना, जो मेरा है वह तो मेरा ही रहेगा न !”
” हम्म्म ….,” उसे भी कोई जवाब नहीं सूझा।
घर में एक नए सदस्य आ जाने से वेदिका को जीवन में परिवर्तन सा महसूस सा हुआ। अपने अंदर आत्मविश्वास सा महसूस करने लगी थी। बेटे के व्यवहार में भी बदलाव आया था अब तुनकता नहीं बल्कि बड़ा और जिम्मेदार सा लगने लगा।
” वह तो होना ही था वेदिका ! मेरा बेटा है , मुझ पर ही जायेगा न , बीवी का गुलाम !” राघव ने चुहल की।
वेदिका भी तमक गई कि गुलाम और राघव ! कुछ कहना चाह रही थी कि माता जी ने आवाज़ लगा दी। माता जी की ठसक तो वही थी पर खुद को कहीं -न-कहीं असुरक्षित सी महसूस भी कर रही थी। क्यूंकि उनकी नज़र में राजगद्दी उनके हाथ से छिन गई थी। अब डर था कि नया राजा , पदच्युत राजा के साथ कैसा व्यवहार करने वाला है। वेदिका समझ तो रही थी पर वह ऐसा कुछ नहीं सोच रही थी। ‘ जियो और जीने दो ‘ उसका तो यही जीवन जीने का लक्ष्य था।
शिवि ने बहुत गौर से वेदिका की गतिविधि देखी। उसने देखा कि मम्मा दिन में कई-कई बार गुमसुम हो जाती है। और कभी तो ऊँगली से लकीरें खींचने लगती है। उसने ध्रुव से पूछा तो वह हंस कर बोला कि ये मम्मा की उम्र का असर है। इस उमर में औरतें ऐसे मानसिक रोगी हो ही जाती है। वह खुद ही हंसती है और कई बार तो बात भी अपने आप से करती है।
” अच्छा ! तो फिर दादी तो ऐसे नहीं हुयी और मेरी माँ भी ऐसे गुमसुम नहीं होती ! मम्मा कुछ भावुक स्वभाव की है। सरल और सहज है। छल-प्रपंच उनको नहीं आते। बस यही नुक्स है उनमें ! ” शिवि ने कुछ सोचते हुए कहा।
” अच्छा ! तुम ने तो आते ही मम्मा को जान-समझ लिया ! बहुत बुद्धिमान हो। लगता है एक दिन तुम भी मम्मा की जगह लेने वाली हो। ” ध्रुव बिन सोचे बोल गया।
” देखो ध्रुव ! मैं , तुम्हें अपने स्वाभिमान से खेलने की इज़ाज़त कभी नहीं दूंगी। बेशक पति -परमेश्वर कहे जाते हो पर ….” कहते हुए चुप हो गई।
ध्रुव आहत सा उसे ताकता रहा और वह सोच रही थी कि गलत बात का विरोध तत्काल कर देना चाहिए।
शिवि और ध्रुव के जाने का वक्त भी पास आने लगा था। दादी को नई बहू की बातें कुछ-कुछ ही पसंद आती थी और बहुत सारी बातें नापसंद ही थी। वह नए ज़माने को आत्मसात करने को झिझक रही थी। और करती भी क्या , थोड़ी भौचक्की भी थी। क्यूंकि ज़माने ने एकदम से करवट ली है और बहुत सारी बातें एक दम से बदल गई है। वह अब भी पुरानी बातें ले कर बैठी रहती थी कि पहले तो ऐसा नहीं होता था। अब तो बहुत बदल गया है।
” माता जी ! अगर हम पहले की बातें ले कर बैठे रहेंगे और आज को कोसेंगे तो तरक्की कैसे करेंगे ? ” वेदिका ने माता जी को टोक ही दिया।
” सच्ची ! दादी माँ ! मम्मा की बात एक दम सही है ! ” शिवि ने कहा।
” क्या बात सही है ! ” माता जी को वेदिका की पैरवी पसंद नहीं आई। वह आगे कुछ कहती इससे पहले ही वेदिका अनमनी सी छत की तरफ चल दी। अपनी बच्चों के सामने तो अपमानित होती आई थी लेकिन अब बहू के सामने अपनी किरकिरी नहीं करवानी चाहती थी।
छत पर जाते ही वह भी आ गई।
” क्या हुआ , आज बहुत दिन बाद मिली हो ? उदास हो ? ”
” हाँ …….. शिवि -ध्रुव के जाने के बाद तो तुमसे रोज ही मिलना होगा। ” कहते हुए उसने ऊँगली से फर्श पर लकीरें खींचना शुरू किया , तब तक नहीं रुकी , जब एक बिंदु ना रह गया।
वेदिका को पता नहीं चला कि कब शिवि उसके पीछे चली आई थी। बहुत गौर से देख रही थी कि मम्मा किस से बात कर रही है। वहां तो कोई नहीं था। खुद से ही बात कर रही थी। कोई काल्पनिक पात्र है जिस से वह मन की बात कर रही थी।
” उफ्फ ! भावुकता की हद है ! ” मन ही मन शिवि ने कहा और व्याकुलता से वेदिका को पुकारा।
” मम्मा ! आप किस से बात कर रहे हो ? ”
वेदिका चौंक पड़ी। जैसे चोरी पकड़ी गई। कोई शब्द नहीं सूझे।
” यह क्या मम्मा ! कोई बात करने वाला नहीं मिला तो खुद से ही बातें करने लग गए। ” शिवि ने बहुत प्यार और कोमलता से पूछा तो वेदिका की जैसे रुलाई फूट ने को आई। लेकिन संयत रही । इस में तो वह वैसे भी बहुत सिद्धहस्त थी। चुप हो शिवि को ताकती रही।
” बोलो तो मम्मा , आप ऐसा क्यों करने लगे हो। ”
” मेरे पास और कोई हल नहीं था ….”
” क्या हल नहीं था ? खुद से बातें करने के अलावा क्या ? ”
” हाँ। ” संक्षिप्त सा उत्तर दिया वेदिका ने। थोड़ा चुप रह कर बोली , ” तुम नहीं समझोगी वेदिका ! चालीस की उम्र के बाद स्त्री के जीवन में कितना परिवर्तन आता है। यह वह समय होता है जब उसकी छाया में रहने वाले बच्चे उससे ही कद में ना केवल लम्बे बल्कि बड़े भी बनने लग जाते हैं। कितना मुश्किल होता है जब आपको नाकारा जाने लगता है। ”
” अच्छा , और ! ” शिवि ने बहुत गौर से वेदिका देखा।
वेदिका थोड़ी हैरान थी कि वह क्यों इस परायी लड़की के सामने अपना मन खोलने की कोशिश कर रही है। यह तो उसकी प्रतिद्व्न्दि है। अपनी कमज़ोरियाँ क्यों जाहिर कर रही है।
” मम्मा ! मैं बेशक पराई हूँ , आपकी बहू ही हूँ , बेटी नहीं हूँ ! पर आप मुझे अपना हमदर्द तो मान ही सकती है , मैं तो सोचती हूँ कि चालीस की उम्र के बाद कोई भी स्त्री अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से चाहे दिशा में सकारात्मक तरीके से मोड़ सकती है। आप में भी कई हुनर हो सकते हैं तो अपना कोई शौक पूरा क्यों नहीं किया। यह भी क्या बात हुयी ! आपने तो खुद को कछुए की तरह खोल में ही समेट लिया। ” शिवि ने अंतिम वाक्य थोड़ा ठुनकते हुए कहा तो वेदिका को हंसी आ गई।
” अब तू मुझे समझाएगी कि मुझे क्या करना चाहिए था। ” मुस्कराते हुए वेदिका ने आगे कहा , ” शिवि बेटा मुझे पता था कि मैं क्या कर सकती थी और क्या नहीं ; लेकिन कर नहीं पाई। बस ….. जैसे तुम कहती हो कि खुद को खोल में ही समेट लिया , कछुए की तरह ही ! ” कहते हुए गला भर्रा गया।
” आपने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और अच्छा समय फिजूल की भावुकता में गँवा दिया। यह दुनिया ऐसी ही है , यहाँ हर किसी को अपनी जगह खुद ही बनानी पड़ती है , अपने हिस्से का आसमान भी खुद ही खोजना होता है। आपने क्या सोचा ; कि कोई आएगा और आपको आगे बढ़ने का मौका देगा। यहाँ मैं स्त्री या स्त्री विमर्श की बात नहीं करती , क्यूंकि आप पर कोई जुल्म नहीं हुआ ना ही दबाया गया कि आपको आगे बढ़ने से रोका गया हो। बस कोरी भावुकता चलते हुए मम्मा आप बस खुद को कमतर समझते गए। ” शिवि ने बहुत दृढ़ता से कहा।
वेदिका चुप थी। सच भी यही था। उँगलियाँ फिर से फर्श पर रेंगने लगी और लकीरे खींचने लगी।
” मम्मा ! इन लकीरों का क्या मतलब हुआ ? जरा मुझे समझाइये तो ये बिंदु का क्या मतलब हुआ ! ” शिवि ने कौतुहल से पूछा।
वेदिका सोचने लगी कि जरूर उसने पुण्य किये होंगे। तभी तो शिवि जैसी सुलझी हुई बहू मिली। उसको प्यार से देखती हुयी सोचती रही। फिर बोली , ” यह बिंदु मैं हूँ , इस घर में मेरी हैसियत इतनी है ! ना कम ना ही ज्यादा। बाकी सभी बड़ी लकीरें , छोटी लकीरें। ”
” अच्छा मम्मा ! मगर आप इसे ऐसा भी तो सोच सकते हैं। ” वह थोड़ा हैरान होते हुए शिवि ने कहा।
” कैसे ……….. ”
” जैसे आप खुद को बिंदु कहते हो तो देखिये मैंने इस बिंदु को बीच में रखा और बाकी लकीरों को इसके बाहर चारों और खींच दिया। अब देखो आप केंद्र में हो और सभी लकीरें आपके चारों ओर से घेरे हुए हैं। आपके बिना किसी का अस्तित्व ही क्या ? ” शिवि हंसी तो वेदिका भी हंस पड़ी।
वेदिका के पास कोई जवाब नहीं था उसने हाथ बढ़ा कर शिवि को अपनी तरफ खींचा तो शिवि ने भी हंस कर गले में बांहे डाल दी। दो स्त्रियों को वह भी एक ही घर की , यूँ हँसते देख वह चुपके से चल पड़ी। उसे भी वेदिका की निर्मल हंसी बहुत भा रही थी।
” क्या दादी ! आज ही तो आई है और यह सिखलाई -पढाई शुरू हो गई ! ” रुनकु ठुनक सी गई। अलबत्ता महिलाओं में एक चुप्पी सी पसर गई थी।
” हाँ कुछ बातें तो हैं जो सिखलाई -पढाई जा सकती है। शिवि बेटा , मैं चाहती हूँ कि तुम इस घर की अच्छाई को ही बाहर बताओ और कोई भी बात जो तुम्हें बुरी लगे , कैसी भी शिकायत हो वह मुझे बताओ। मन को अंदर ही अंदर घोट लो , यह मुझे पसंद नहीं आएगा। ” वेदिका ने बहुत अपनेपन से कहा।
शिवि के मन में एक हिलोर फिर से उठी और माँ याद आ गई।
शिवि नए ज़माने की ही लड़की थी तो सामंजस्य बैठाने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी ।
दो सप्ताह पुरानी दुल्हन सुबह -सुबह ही रसोई में वेदिका के पास खड़ी थी। चाय लेने आई थी। वेदिका भी आज जल्दी ही उठ गई थी। बेटा -बहू ने घूमने जाना था और रुनकु ने भी वापस हॉस्टल , इसलिए वह नाश्ते का इंतज़ाम कर रही थी। मौसम ठंडा था। हल्की बारिश भी हो चुकी थी।
” शिवि बेटा ! तुम्हें यहाँ कोई दिक्कत तो नहीं ! कैसे महसूस होता है ? ” वेदिका के शब्द बहुत कोमल थे।
” मम्मा …, ” कह कर चुप सी हो गई।
” हाँ बोलो बेटा ! ” थोड़ा आशंकित सी हुई वेदिका।
” मुझे यहाँ ठण्ड का अहसास सा होता है ! ठंडा -ठंडा सा …, ” कहते हुए झिझक सी गई शिवि।
” अरे बेटा …. ,” हंस पड़ी वेदिका।
” अभी तुमने यहाँ की , इस घर की गर्माहट को दिल से नहीं अपनाया। समय लगता है बेटा …. फिर सब ठीक हो जायेगा। लो चाय ले जाओ और तैयार हो जाओ , ” सर पर स्नेह से हाथ फेर कर चाय की ट्रे थमा दी। मन भर आया वेदिका का , आँखे नम कर के कुछ सोच ने लगी और चाकू से स्लेब पर एक लकीर खींच दी।
” बीबी जी ! एक बताओ जी ! ” वेदिका ने अपनी सोच और हाथ का काम रोक कर बहादुर की और देखा जो कि बहुत गंभीर मुद्रा में कुछ कहना चाह रहा था।
” हां बोलो ? ”
” बीबी जी ! आप मुझे बताओ कि ये जो बादल होते हैं उनमे पानी धरती का होता या आसमान से आता है ? ”
वेदिका हंस पड़ी कि ये कैसा सवाल है। लेकिन उसकी गंभीर मुख मुद्रा देख कर अनजान बनते हुए बोली , ” अरे भई , जब बादल आसमान के होंगे तो पानी भी आसमान से ही तो लेगा ना , कोई धरती से से पाईप थोड़ी न जोड़ रखी है ! ”
बहादुर खिलखिला कर हंस पड़ा , ” नहीं बीबी जी , धरती पर जो नदी ,तालाब और समंदर होते है उसका पानी धूप में , भाफ बन कर उड़ जाता है और उनसे बदल बनते हैं ! ”
” ओहो , अच्छा ! मुझे तो ये पता ही नहीं था ! तू तो बड़ा सायना है ! ” हंस पड़ी वेदिका। उसके साथ-साथ बाहर से भी जोर से हँसने आवाज़ आई तो वह चौंक पड़ी।
” क्या मम्मा आप भी ना , कैसी बात कर रही हो , इस बहादुर के आगे भोले पन की बात कर रही हो। इसको डांट भी सकती थी। आप का भी ना दिमाग …., ”
” दिमाग खराब है , मंद-बुद्धि हूँ ! अरे भई , कई बार किसी का मन रखने के लिए अनजान बनना भी अच्छा ही होता है। अगर मैं डांटती या अपना ज्ञान बघारती तो बेचारे मासूम का दिल ना टूट जाता ! ” वेदिका ने ध्रुव की बात काट दी , वह बहू के सामने आहत महसूस कर रही थी।
” लेकिन ध्रुव इसमें ना तो मंद -बुद्धि और दिमाग खराबी की बात तो कहीं नज़र नहीं आई , यह तो मम्मा की सरलता और सहजता है जो एक नौकर का दिल भी दुखाना नहीं चाहती। सरल होना भी तो कर किसी के बस में कहाँ है ! हाँ ना मम्मा ! ” शिवि ने बहुत प्यार से वेदिका की और देखते हुए कहा।
” ले सुन ले रुनकु ! अब इस घर में तेरी माँ की हिमायती आ गई है तेरी जगह लेने ! ” दादी कटाक्ष करने में कहाँ चुकने वाली थी।
” मेरी जगह कौन लेगा भला ! और शिवि भाभी की अपनी जगह है ! ये तेरी जगह -मेरी जगह मुझे समझ नहीं आती दादी …. चार दिन की जिंदगी है क्यों ना मिल कर गुजारें। ”
दादी-पोती का संवाद वेदिका को कहीं गुम कर गया और उसने डाइनिंग टेबल पर ऊँगली से एक साथ बड़ी से छोटी लकीरें खींच दी जब तक एक बिंदु की जगह ना रह गई। वेदिका को शिवि बहुत गौर से देखती रही।
दोपहर तक सभी चले गए। रह गए तो बस वेदिका और अम्मा जी। अम्मा जी सोने चल दिए और वेदिका छत पर। अब सर्दी तो नहीं रही थी फिर भी थोड़ी सी धूप -छाँव देख कर चटाई बिछा दी। उसके पीछे -पीछे वह भी आ गई।
” बहुत दिन हुए तुमको मेरी याद भी नहीं आई ! ” उसने उलाहना सा दिया।
” नहीं तो ! तू तो मेरे दिल में बसी है फिर तुम्हें कैसे भूल जाती ! बस समय ही नहीं मिला। वेदिका हंस कर बोली।
” बहू तो तुम्हें अच्छी मिली है ! जैसी तुम चाहती थी वैसी ही …. ,”
” मेरी बहू को मनभाती सास मिली या नहीं , यह कौन बताये मुझे ? ” वेदिका ने झट से जवाब दिया।
फिर पास ही पड़े उखड़े पत्थर से वहीँ एक लकीर खींच दी। सोचने लगी ये मनचाहा क्या होता है। जो हमें अच्छा लगे वही मिले। सामने वाले की भी तो यही कामना होती है कि उसे भी मनचाहा मिले। फिर क्यों नहीं हम सामने वाले के हितों की रक्षा करते। अगर ऐसा हो जाय तो फिर सारी समस्या , प्रतिद्वंदिता ही समाप्त हो जाएगी। पर क्या यह संभव है ! यहाँ तो हर कदम पर खुद को साबित करने की होड़ है। कोई किसी से कम नहीं रहना चाहता।
” क्या सोचने लगी वेदिका ? ” उसने टहोका।
” कुछ भी नहीं , और बहुत कुछ भी … , आज माता जी ने मुझे समझाया कि बहू को सर चढ़ाने की जरुरत नहीं। कंट्रोल में रखना सीखो। एक बार हाथ से निकल जाएगी तो बेटा भी हाथ से गया ही समझो ! मुझे हंसी आ गई। पर मन ही मन में हंसी। कि अभी तो मैं भी आपके ही कंट्रोल में हूँ तो किसको बस में करूँ और किस को नहीं। जहाँ तक बेटे की बात है। नदी तो सागर की ओर ही बहेगी। बंधन में किसको बांधना, जो मेरा है वह तो मेरा ही रहेगा न !”
” हम्म्म ….,” उसे भी कोई जवाब नहीं सूझा।
घर में एक नए सदस्य आ जाने से वेदिका को जीवन में परिवर्तन सा महसूस सा हुआ। अपने अंदर आत्मविश्वास सा महसूस करने लगी थी। बेटे के व्यवहार में भी बदलाव आया था अब तुनकता नहीं बल्कि बड़ा और जिम्मेदार सा लगने लगा।
” वह तो होना ही था वेदिका ! मेरा बेटा है , मुझ पर ही जायेगा न , बीवी का गुलाम !” राघव ने चुहल की।
वेदिका भी तमक गई कि गुलाम और राघव ! कुछ कहना चाह रही थी कि माता जी ने आवाज़ लगा दी। माता जी की ठसक तो वही थी पर खुद को कहीं -न-कहीं असुरक्षित सी महसूस भी कर रही थी। क्यूंकि उनकी नज़र में राजगद्दी उनके हाथ से छिन गई थी। अब डर था कि नया राजा , पदच्युत राजा के साथ कैसा व्यवहार करने वाला है। वेदिका समझ तो रही थी पर वह ऐसा कुछ नहीं सोच रही थी। ‘ जियो और जीने दो ‘ उसका तो यही जीवन जीने का लक्ष्य था।
शिवि ने बहुत गौर से वेदिका की गतिविधि देखी। उसने देखा कि मम्मा दिन में कई-कई बार गुमसुम हो जाती है। और कभी तो ऊँगली से लकीरें खींचने लगती है। उसने ध्रुव से पूछा तो वह हंस कर बोला कि ये मम्मा की उम्र का असर है। इस उमर में औरतें ऐसे मानसिक रोगी हो ही जाती है। वह खुद ही हंसती है और कई बार तो बात भी अपने आप से करती है।
” अच्छा ! तो फिर दादी तो ऐसे नहीं हुयी और मेरी माँ भी ऐसे गुमसुम नहीं होती ! मम्मा कुछ भावुक स्वभाव की है। सरल और सहज है। छल-प्रपंच उनको नहीं आते। बस यही नुक्स है उनमें ! ” शिवि ने कुछ सोचते हुए कहा।
” अच्छा ! तुम ने तो आते ही मम्मा को जान-समझ लिया ! बहुत बुद्धिमान हो। लगता है एक दिन तुम भी मम्मा की जगह लेने वाली हो। ” ध्रुव बिन सोचे बोल गया।
” देखो ध्रुव ! मैं , तुम्हें अपने स्वाभिमान से खेलने की इज़ाज़त कभी नहीं दूंगी। बेशक पति -परमेश्वर कहे जाते हो पर ….” कहते हुए चुप हो गई।
ध्रुव आहत सा उसे ताकता रहा और वह सोच रही थी कि गलत बात का विरोध तत्काल कर देना चाहिए।
शिवि और ध्रुव के जाने का वक्त भी पास आने लगा था। दादी को नई बहू की बातें कुछ-कुछ ही पसंद आती थी और बहुत सारी बातें नापसंद ही थी। वह नए ज़माने को आत्मसात करने को झिझक रही थी। और करती भी क्या , थोड़ी भौचक्की भी थी। क्यूंकि ज़माने ने एकदम से करवट ली है और बहुत सारी बातें एक दम से बदल गई है। वह अब भी पुरानी बातें ले कर बैठी रहती थी कि पहले तो ऐसा नहीं होता था। अब तो बहुत बदल गया है।
” माता जी ! अगर हम पहले की बातें ले कर बैठे रहेंगे और आज को कोसेंगे तो तरक्की कैसे करेंगे ? ” वेदिका ने माता जी को टोक ही दिया।
” सच्ची ! दादी माँ ! मम्मा की बात एक दम सही है ! ” शिवि ने कहा।
” क्या बात सही है ! ” माता जी को वेदिका की पैरवी पसंद नहीं आई। वह आगे कुछ कहती इससे पहले ही वेदिका अनमनी सी छत की तरफ चल दी। अपनी बच्चों के सामने तो अपमानित होती आई थी लेकिन अब बहू के सामने अपनी किरकिरी नहीं करवानी चाहती थी।
छत पर जाते ही वह भी आ गई।
” क्या हुआ , आज बहुत दिन बाद मिली हो ? उदास हो ? ”
” हाँ …….. शिवि -ध्रुव के जाने के बाद तो तुमसे रोज ही मिलना होगा। ” कहते हुए उसने ऊँगली से फर्श पर लकीरें खींचना शुरू किया , तब तक नहीं रुकी , जब एक बिंदु ना रह गया।
वेदिका को पता नहीं चला कि कब शिवि उसके पीछे चली आई थी। बहुत गौर से देख रही थी कि मम्मा किस से बात कर रही है। वहां तो कोई नहीं था। खुद से ही बात कर रही थी। कोई काल्पनिक पात्र है जिस से वह मन की बात कर रही थी।
” उफ्फ ! भावुकता की हद है ! ” मन ही मन शिवि ने कहा और व्याकुलता से वेदिका को पुकारा।
” मम्मा ! आप किस से बात कर रहे हो ? ”
वेदिका चौंक पड़ी। जैसे चोरी पकड़ी गई। कोई शब्द नहीं सूझे।
” यह क्या मम्मा ! कोई बात करने वाला नहीं मिला तो खुद से ही बातें करने लग गए। ” शिवि ने बहुत प्यार और कोमलता से पूछा तो वेदिका की जैसे रुलाई फूट ने को आई। लेकिन संयत रही । इस में तो वह वैसे भी बहुत सिद्धहस्त थी। चुप हो शिवि को ताकती रही।
” बोलो तो मम्मा , आप ऐसा क्यों करने लगे हो। ”
” मेरे पास और कोई हल नहीं था ….”
” क्या हल नहीं था ? खुद से बातें करने के अलावा क्या ? ”
” हाँ। ” संक्षिप्त सा उत्तर दिया वेदिका ने। थोड़ा चुप रह कर बोली , ” तुम नहीं समझोगी वेदिका ! चालीस की उम्र के बाद स्त्री के जीवन में कितना परिवर्तन आता है। यह वह समय होता है जब उसकी छाया में रहने वाले बच्चे उससे ही कद में ना केवल लम्बे बल्कि बड़े भी बनने लग जाते हैं। कितना मुश्किल होता है जब आपको नाकारा जाने लगता है। ”
” अच्छा , और ! ” शिवि ने बहुत गौर से वेदिका देखा।
वेदिका थोड़ी हैरान थी कि वह क्यों इस परायी लड़की के सामने अपना मन खोलने की कोशिश कर रही है। यह तो उसकी प्रतिद्व्न्दि है। अपनी कमज़ोरियाँ क्यों जाहिर कर रही है।
” मम्मा ! मैं बेशक पराई हूँ , आपकी बहू ही हूँ , बेटी नहीं हूँ ! पर आप मुझे अपना हमदर्द तो मान ही सकती है , मैं तो सोचती हूँ कि चालीस की उम्र के बाद कोई भी स्त्री अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से चाहे दिशा में सकारात्मक तरीके से मोड़ सकती है। आप में भी कई हुनर हो सकते हैं तो अपना कोई शौक पूरा क्यों नहीं किया। यह भी क्या बात हुयी ! आपने तो खुद को कछुए की तरह खोल में ही समेट लिया। ” शिवि ने अंतिम वाक्य थोड़ा ठुनकते हुए कहा तो वेदिका को हंसी आ गई।
” अब तू मुझे समझाएगी कि मुझे क्या करना चाहिए था। ” मुस्कराते हुए वेदिका ने आगे कहा , ” शिवि बेटा मुझे पता था कि मैं क्या कर सकती थी और क्या नहीं ; लेकिन कर नहीं पाई। बस ….. जैसे तुम कहती हो कि खुद को खोल में ही समेट लिया , कछुए की तरह ही ! ” कहते हुए गला भर्रा गया।
” आपने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और अच्छा समय फिजूल की भावुकता में गँवा दिया। यह दुनिया ऐसी ही है , यहाँ हर किसी को अपनी जगह खुद ही बनानी पड़ती है , अपने हिस्से का आसमान भी खुद ही खोजना होता है। आपने क्या सोचा ; कि कोई आएगा और आपको आगे बढ़ने का मौका देगा। यहाँ मैं स्त्री या स्त्री विमर्श की बात नहीं करती , क्यूंकि आप पर कोई जुल्म नहीं हुआ ना ही दबाया गया कि आपको आगे बढ़ने से रोका गया हो। बस कोरी भावुकता चलते हुए मम्मा आप बस खुद को कमतर समझते गए। ” शिवि ने बहुत दृढ़ता से कहा।
वेदिका चुप थी। सच भी यही था। उँगलियाँ फिर से फर्श पर रेंगने लगी और लकीरे खींचने लगी।
” मम्मा ! इन लकीरों का क्या मतलब हुआ ? जरा मुझे समझाइये तो ये बिंदु का क्या मतलब हुआ ! ” शिवि ने कौतुहल से पूछा।
वेदिका सोचने लगी कि जरूर उसने पुण्य किये होंगे। तभी तो शिवि जैसी सुलझी हुई बहू मिली। उसको प्यार से देखती हुयी सोचती रही। फिर बोली , ” यह बिंदु मैं हूँ , इस घर में मेरी हैसियत इतनी है ! ना कम ना ही ज्यादा। बाकी सभी बड़ी लकीरें , छोटी लकीरें। ”
” अच्छा मम्मा ! मगर आप इसे ऐसा भी तो सोच सकते हैं। ” वह थोड़ा हैरान होते हुए शिवि ने कहा।
” कैसे ……….. ”
” जैसे आप खुद को बिंदु कहते हो तो देखिये मैंने इस बिंदु को बीच में रखा और बाकी लकीरों को इसके बाहर चारों और खींच दिया। अब देखो आप केंद्र में हो और सभी लकीरें आपके चारों ओर से घेरे हुए हैं। आपके बिना किसी का अस्तित्व ही क्या ? ” शिवि हंसी तो वेदिका भी हंस पड़ी।
वेदिका के पास कोई जवाब नहीं था उसने हाथ बढ़ा कर शिवि को अपनी तरफ खींचा तो शिवि ने भी हंस कर गले में बांहे डाल दी। दो स्त्रियों को वह भी एक ही घर की , यूँ हँसते देख वह चुपके से चल पड़ी। उसे भी वेदिका की निर्मल हंसी बहुत भा रही थी।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
