19-11-2020, 04:39 PM
दिसम्बर के छोटे-छोटे दिन। भागते-दौड़ते भी दिन पकड़ से जैसे छूटा जाता है। सुबह पांच बजे से लेकर दोपहर ढ़ाई बजे तक एक टांग पर दौड़ते रहना वेदिका की आदत में शामिल है। अब कुछ समय मिला है तो छत की तरफ चल दी। धूप भी हल्की हो चली है, मगर यही थी , उसके हिस्से की धूप…छोटी लकीर बड़ी लकीर 3
एक कोने में चटाई बिछा कर पैर सीधे कर के बैठ गई। बाल कन्धों पर फैला दिए। सुबह के धोए हुए बाल अब भी गीले ही थे। फिर हाथ बढ़ा कर साथ लाया डिब्बा खोल लिया। उसमें वैसलीन , लोशन और कंघा था , कुछ मेकअप का सामान और एक छोटा सा आईना भी । यहीं वह कुछ देर सुस्ता कर अपना चेहरा-मोहरा ठीक कर लिया करती है। हाथ पर लोशन लिया ही था कि वह भी आ गई।
” अच्छा तो मिल गई फुरसत !” वह मुस्कुराते हुए फर्श पर बैठते हुए बोली।
” हाँ ….,मगर तुम वहां क्यों बैठ गई , यहाँ बैठो ना चटाई पर !
सच में फुरसत तो बहुत दिन बाद मिली है। घर की रंगाई-पुताई सम्पूर्ण हो गई है। अभी शादी की तैयारियां भी बहुत पड़ी है। ”
” हम्म …., एक बात तो है , तुम सास बनने चली हो, फिर भी तुम्हारे बाल कितने सुन्दर है। हाँ थोड़ी सी चाँदी झलकने लगी है ! ”
” पचास के पार पहुँच गई हूँ , चाँदी तो झलकेगी ही…..,” मुस्कुरा पड़ी वेदिका। मुस्कुराते हुए उखड़े हुए फर्श पर, वहीँ पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े से एक छोटी सी लकीर खींच दी।
मुस्कुरा तो पड़ी वेदिका, लेकिन तारीफ के बोल अब उसके मन को नहीं छूते हैं। जिसके मुहँ से सुनना चाहती थी वह तो कभी बोला ही नहीं।
उसके बाल तो हमेशा से ही अच्छे थे , काले-घने… सहेलियों की ईर्ष्या मिश्रित प्रशंसा से वह भली भांति परिचित थी। सास जब पहली बार देखने आई तो उसके रूप के साथ-साथ बालों की भी प्रशंसा कर के गई थी। लेकिन राघव ने कभी भी तारीफ नहीं की। हां, एक बार ( विवाह के कुछ ही माह बाद ) वह अपने कमरे के बाहर बेसब्री से कुछ-कुछ रोमांटिक मूड लिए , इंतज़ार कर रही थी तो राघव ने अचानक पीछे से आ कर डरा दिया था और बेजारी से कहा कि क्या डायन की तरह बाल बिखरा कर खड़ी हो। उसे बहुत बुरा लगा था। तारीफ/प्यार के बोल ना सही , लेकिन राघव डायन कहेंगे , यह तो नहीं सोचा था।
उसकी आंखे भर आई थी। वैसे यह राघव का मज़ाक ही था। लेकिन इस मज़ाक की फ़ांस को वेदिका दिल से कभी निकाल ही नहीं पाई। उसके बाद किसी भी तारीफ ने उसके मन को जैसे छूना ही बंद कर हो।
” क्या सोचने लगी ? ये आंखे क्यों भर आई ! ”
” कुछ नहीं।” मन में हल्का सा बुदबुदाते हुए , पहले से खींची लकीर के पास ,एक छोटी लकीर खींच दी।
सोचने लगी कि काश ये जिंदगी भी सर्दियों के दिन सी होती तो ? कितनी जल्दी व्यतीत हो जाती …., लेकिन ये तो जेठ की दुपहरी सी है काटे नहीं कटती ….
आँखे मूंदे , गर्दन उठाये हुए , चेहरा ऊपर किये जाती हुयी धूप को जैसे आत्मसात करती हुई , सोच में डूबी थी कि नीचे रसोई में खट -पट सी सुनाई दी। साथ ही सास की बड़बड़ाहट। बड़बड़ाहट ने जैसे उसे जमीन पर ला दिया। झट से बाल समेटे , अपना डिब्बा भी समेट लिया। पास बैठी वह मुस्कुराई , ” हो गई शुरू बुढ़िया की ताना-कशी ! ”
” ना री ! बुजुर्ग है बेचारी , ऐसे मत कहो। ” वेदिका ने हंसी रोकते हुए,आँखों ही आँखों में उसे डांटा।
सीढ़ियों की तरफ भागी।
जा कर देखा , माता जी चाय बना चुकी थी। कप में डाल कर रसोई से बाहर आते हुए , वेदिका के हाथ में पड़े डब्बे को देख कर मुहं बनाते हुए ‘ सजने-संवरने में ही फुरसत नहीं मिलती , बहू आने वाली है फिर भी …’ बड़बड़ाते हुए , मुहं बनाते हुए अपने कमरे में चली गई। वेदिका की आंखे नम हो गई , उनकी बड़बड़ाहट कुछ स्पष्ट सुनाई दे गई थी। खिला मुख मलिन हो गया। अपने कमरे की अलमारी में डिब्बे को रखते हुए सोचने लगी , ” माता जी को मेरे सजने-संवरने पर इतनी तकलीफ क्यों है ? और ऐसा भी क्या सज रही थी मैं !”
सोचना तो बहुत चाहती थी कि बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ सुन कर आँखों की नमी को पौंछते हुए बाहर आ गई। बेटा था। सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। प्यारी सी मुस्कान देख कर मन और आँखों से नमी छंट गई। ममता उमड़ आई कि इसे क्यों अपने मन की उलझनों में डालूं , चार दिन तो आया है। मेरा क्या है , यही नसीब है। सोच कर हंस पड़ी।
” क्या हुआ माँ ? ” यह हंसी क्यों आ रही है।
माताजी जी फिर बड़बड़ा उठी, ” अरे इसका क्या , ये तो बिना कारण ही हंसती है !हंस ले ! जितना हंसना है ! बहू आएगी तब पता चलेगा। ”
दादी की बड़बड़ाहट पोते ने सुन ली , हंस कर बोल उठा , ” दादी ! बहू आएगी तो हंसी क्यों बंद हो जाएगी ? माँ के आ जाने पर आपके साथ भी ऐसा हुआ था क्या !”
दादी कुछ कहती तभी , ” क्या हुआ था भई …., कहते हुए राघव भी आ गए।
” मुझे लगता है पापा , माँ को डॉक्टर को दिखाना चाहिए ! मैंने भी कई बार नोट किया है ,खुद ही हँसती रहती है , कभी मन ही मन मुस्कुराती है ! ”
” मतलब ! ” वेदिका ने हैरान होते हुए पूछा।
” मतलब कि दिमाग के डॉक्टर को !” राघव की आवाज़ थी। वे हँस भी रहे थे , और आँखों में लापरवाही भी थी।
” हाँ माँ ! ये कोई पागलपन की बात नहीं है, ये बीमारी होती है , आम लोग समझते ही नहीं है ! ” कहता हुआ बेटा उसे रसोई के दरवाज़े तक ले गया।
वह हैरान रह गई कि सारी उम्र यहाँ खपा दी और आज वह मानसिक रोगी कही जा रही थी। उसे रोना आ गया, लेकिन उसे रोने का समय भी तो कहाँ था।
फिर वही शाम का काम शुरू हो गया। वेदिका को सोचने का अवसर ही नहीं मिला ना ही कहने को। रात को फुर्सत मिली तो शादी पर चर्चा चल पड़ी थी। बेटे की छुट्टियां तो कुछ दिन में ख़त्म हो जाएगी। फिर तो शादी से कुछ दिन पहले ही आ पायेगा , इसलिए जो भी बात / कार्यक्रम तय करना था , उसकी ज्यादा से ज्यादा बात कर लेना चाहते थे। उसके बाद तो फ़ोन पर ही बात हो सकनी थी।
बात करती , राय देती, वेदिका को कोई बात जब समझ नहीं आती या दोबारा पूछ लेती तो बेटा खीझ उठता कि माँ को कुछ समझ ही नहीं आता , तभी तो कह रहा था , माँ को डॉक्टर की जरूरत है।
अब तो गला और आंखे दोनों ही भर आये। अनवरत आँसू चल पड़े। राघव चिढ़ गए।
” काम की बातों में ये तुम्हारे आंसू विघ्न डालते ही हैं ! कोई बात याद मत आने दिया करो ! ”
” मैंने क्या कहा ! मारो-पीटो और रोओ भी मत ! ” वेदिका बहुत आहत हो उठी। मन में घटायें शाम से ही भरी थी अब बरस गई तो क्या आश्चर्य था।
” आपसे तो बात करनी ही बेकार है माँ , और, अब भी समय है आप डॉक्टर को दिखा ही लो ! ” बेटा नाराज़ हो कर कमरे से चला गया।
एक कोने में चटाई बिछा कर पैर सीधे कर के बैठ गई। बाल कन्धों पर फैला दिए। सुबह के धोए हुए बाल अब भी गीले ही थे। फिर हाथ बढ़ा कर साथ लाया डिब्बा खोल लिया। उसमें वैसलीन , लोशन और कंघा था , कुछ मेकअप का सामान और एक छोटा सा आईना भी । यहीं वह कुछ देर सुस्ता कर अपना चेहरा-मोहरा ठीक कर लिया करती है। हाथ पर लोशन लिया ही था कि वह भी आ गई।
” अच्छा तो मिल गई फुरसत !” वह मुस्कुराते हुए फर्श पर बैठते हुए बोली।
” हाँ ….,मगर तुम वहां क्यों बैठ गई , यहाँ बैठो ना चटाई पर !
सच में फुरसत तो बहुत दिन बाद मिली है। घर की रंगाई-पुताई सम्पूर्ण हो गई है। अभी शादी की तैयारियां भी बहुत पड़ी है। ”
” हम्म …., एक बात तो है , तुम सास बनने चली हो, फिर भी तुम्हारे बाल कितने सुन्दर है। हाँ थोड़ी सी चाँदी झलकने लगी है ! ”
” पचास के पार पहुँच गई हूँ , चाँदी तो झलकेगी ही…..,” मुस्कुरा पड़ी वेदिका। मुस्कुराते हुए उखड़े हुए फर्श पर, वहीँ पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े से एक छोटी सी लकीर खींच दी।
मुस्कुरा तो पड़ी वेदिका, लेकिन तारीफ के बोल अब उसके मन को नहीं छूते हैं। जिसके मुहँ से सुनना चाहती थी वह तो कभी बोला ही नहीं।
उसके बाल तो हमेशा से ही अच्छे थे , काले-घने… सहेलियों की ईर्ष्या मिश्रित प्रशंसा से वह भली भांति परिचित थी। सास जब पहली बार देखने आई तो उसके रूप के साथ-साथ बालों की भी प्रशंसा कर के गई थी। लेकिन राघव ने कभी भी तारीफ नहीं की। हां, एक बार ( विवाह के कुछ ही माह बाद ) वह अपने कमरे के बाहर बेसब्री से कुछ-कुछ रोमांटिक मूड लिए , इंतज़ार कर रही थी तो राघव ने अचानक पीछे से आ कर डरा दिया था और बेजारी से कहा कि क्या डायन की तरह बाल बिखरा कर खड़ी हो। उसे बहुत बुरा लगा था। तारीफ/प्यार के बोल ना सही , लेकिन राघव डायन कहेंगे , यह तो नहीं सोचा था।
उसकी आंखे भर आई थी। वैसे यह राघव का मज़ाक ही था। लेकिन इस मज़ाक की फ़ांस को वेदिका दिल से कभी निकाल ही नहीं पाई। उसके बाद किसी भी तारीफ ने उसके मन को जैसे छूना ही बंद कर हो।
” क्या सोचने लगी ? ये आंखे क्यों भर आई ! ”
” कुछ नहीं।” मन में हल्का सा बुदबुदाते हुए , पहले से खींची लकीर के पास ,एक छोटी लकीर खींच दी।
सोचने लगी कि काश ये जिंदगी भी सर्दियों के दिन सी होती तो ? कितनी जल्दी व्यतीत हो जाती …., लेकिन ये तो जेठ की दुपहरी सी है काटे नहीं कटती ….
आँखे मूंदे , गर्दन उठाये हुए , चेहरा ऊपर किये जाती हुयी धूप को जैसे आत्मसात करती हुई , सोच में डूबी थी कि नीचे रसोई में खट -पट सी सुनाई दी। साथ ही सास की बड़बड़ाहट। बड़बड़ाहट ने जैसे उसे जमीन पर ला दिया। झट से बाल समेटे , अपना डिब्बा भी समेट लिया। पास बैठी वह मुस्कुराई , ” हो गई शुरू बुढ़िया की ताना-कशी ! ”
” ना री ! बुजुर्ग है बेचारी , ऐसे मत कहो। ” वेदिका ने हंसी रोकते हुए,आँखों ही आँखों में उसे डांटा।
सीढ़ियों की तरफ भागी।
जा कर देखा , माता जी चाय बना चुकी थी। कप में डाल कर रसोई से बाहर आते हुए , वेदिका के हाथ में पड़े डब्बे को देख कर मुहं बनाते हुए ‘ सजने-संवरने में ही फुरसत नहीं मिलती , बहू आने वाली है फिर भी …’ बड़बड़ाते हुए , मुहं बनाते हुए अपने कमरे में चली गई। वेदिका की आंखे नम हो गई , उनकी बड़बड़ाहट कुछ स्पष्ट सुनाई दे गई थी। खिला मुख मलिन हो गया। अपने कमरे की अलमारी में डिब्बे को रखते हुए सोचने लगी , ” माता जी को मेरे सजने-संवरने पर इतनी तकलीफ क्यों है ? और ऐसा भी क्या सज रही थी मैं !”
सोचना तो बहुत चाहती थी कि बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ सुन कर आँखों की नमी को पौंछते हुए बाहर आ गई। बेटा था। सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। प्यारी सी मुस्कान देख कर मन और आँखों से नमी छंट गई। ममता उमड़ आई कि इसे क्यों अपने मन की उलझनों में डालूं , चार दिन तो आया है। मेरा क्या है , यही नसीब है। सोच कर हंस पड़ी।
” क्या हुआ माँ ? ” यह हंसी क्यों आ रही है।
माताजी जी फिर बड़बड़ा उठी, ” अरे इसका क्या , ये तो बिना कारण ही हंसती है !हंस ले ! जितना हंसना है ! बहू आएगी तब पता चलेगा। ”
दादी की बड़बड़ाहट पोते ने सुन ली , हंस कर बोल उठा , ” दादी ! बहू आएगी तो हंसी क्यों बंद हो जाएगी ? माँ के आ जाने पर आपके साथ भी ऐसा हुआ था क्या !”
दादी कुछ कहती तभी , ” क्या हुआ था भई …., कहते हुए राघव भी आ गए।
” मुझे लगता है पापा , माँ को डॉक्टर को दिखाना चाहिए ! मैंने भी कई बार नोट किया है ,खुद ही हँसती रहती है , कभी मन ही मन मुस्कुराती है ! ”
” मतलब ! ” वेदिका ने हैरान होते हुए पूछा।
” मतलब कि दिमाग के डॉक्टर को !” राघव की आवाज़ थी। वे हँस भी रहे थे , और आँखों में लापरवाही भी थी।
” हाँ माँ ! ये कोई पागलपन की बात नहीं है, ये बीमारी होती है , आम लोग समझते ही नहीं है ! ” कहता हुआ बेटा उसे रसोई के दरवाज़े तक ले गया।
वह हैरान रह गई कि सारी उम्र यहाँ खपा दी और आज वह मानसिक रोगी कही जा रही थी। उसे रोना आ गया, लेकिन उसे रोने का समय भी तो कहाँ था।
फिर वही शाम का काम शुरू हो गया। वेदिका को सोचने का अवसर ही नहीं मिला ना ही कहने को। रात को फुर्सत मिली तो शादी पर चर्चा चल पड़ी थी। बेटे की छुट्टियां तो कुछ दिन में ख़त्म हो जाएगी। फिर तो शादी से कुछ दिन पहले ही आ पायेगा , इसलिए जो भी बात / कार्यक्रम तय करना था , उसकी ज्यादा से ज्यादा बात कर लेना चाहते थे। उसके बाद तो फ़ोन पर ही बात हो सकनी थी।
बात करती , राय देती, वेदिका को कोई बात जब समझ नहीं आती या दोबारा पूछ लेती तो बेटा खीझ उठता कि माँ को कुछ समझ ही नहीं आता , तभी तो कह रहा था , माँ को डॉक्टर की जरूरत है।
अब तो गला और आंखे दोनों ही भर आये। अनवरत आँसू चल पड़े। राघव चिढ़ गए।
” काम की बातों में ये तुम्हारे आंसू विघ्न डालते ही हैं ! कोई बात याद मत आने दिया करो ! ”
” मैंने क्या कहा ! मारो-पीटो और रोओ भी मत ! ” वेदिका बहुत आहत हो उठी। मन में घटायें शाम से ही भरी थी अब बरस गई तो क्या आश्चर्य था।
” आपसे तो बात करनी ही बेकार है माँ , और, अब भी समय है आप डॉक्टर को दिखा ही लो ! ” बेटा नाराज़ हो कर कमरे से चला गया।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
