19-11-2020, 04:35 PM
याद है… उसे आज भी वह दिन…दीदी की कैंसर की रिपोर्ट आई थी… कैंसर थर्ड स्टेज पर था घर में कोहराम मच गया था।माँ…माँ का रो-रो कर बुरा हाल था और दीदी दीवार का कोना पकड़े बुत पड़ी थी। नेहा को समझ में नहीं आ रहा था किस-किस को संभाले और क्या समझाएं। समझते सभी थे… पर झूठी दिलासा एक-दूसरे को देते रहे।
प्रवीण जीजा जी का सुदर्शन चेहरा अचानक से बूढ़ा लगने लगा था। अपने जीवन संगिनी की दुर्दशा उन से बर्दाश्त नहीं हो रही थी ।कितने सुखी थे वे… राम सीता जैसी जोड़ी।न जाने किसकी नजर लग गई थी उस खुशहाल परिवार पर…। जीजा जी ने दीदी को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की मुंबई… मद्रास कहाँ-कहाँ नहीं दौड़े… किस-किस के आगे हाथ नहीं जोड़ें … पर पत्थर का भगवान भी पत्थर हो चुका था।
जीजा जी की आलीशान कोठी ,रुपया-पैसा सब धरा रह गया और दीदी हमें रोता-बिलखता छोड़ कर चली गई। इन दिनों उसने क्या-क्या नहीं देखा और महसूस किया था…ये तो वही जानती थी।
घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भरा हुआ था। नन्ही परी माँ के लिए बिलखते-बिलखते नेहा की गोदी में ही सो गई थी। दीदी की चचिया सास कनखियों से नेहा को बार-बार घूर रही थीं। “बेटा तुम कौन हो …बहुत-बहुत देखा -देखा चेहरा लग रहा है।”नेहा ने परी की तरफ इशारा करके कहा …”मैं इसकी मासी हूँ।” चाची जी के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गई।
उन्होंने सोती हुई परी के सर पर हाथ फेरते हुए बड़े व्यंग्यात्मक ढंग से कहा… “हाँ भाई ….परी के लिए तुम मा$$$सी हो…अब तो तुम ही इसकी ??” नेहा गुस्से से तिलमिला गई …चाची के शब्द गले मे अटक कर रह गए।वो परी को लेकर कमरें में चली गई।ये पहली बार नहीं था…इन तेरह दिनों में हर आने-जाने वालों की निग़ाहों में उसने यही सवाल तैरते देखा था।
प्रवीण जीजा जी का सुदर्शन चेहरा अचानक से बूढ़ा लगने लगा था। अपने जीवन संगिनी की दुर्दशा उन से बर्दाश्त नहीं हो रही थी ।कितने सुखी थे वे… राम सीता जैसी जोड़ी।न जाने किसकी नजर लग गई थी उस खुशहाल परिवार पर…। जीजा जी ने दीदी को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की मुंबई… मद्रास कहाँ-कहाँ नहीं दौड़े… किस-किस के आगे हाथ नहीं जोड़ें … पर पत्थर का भगवान भी पत्थर हो चुका था।
जीजा जी की आलीशान कोठी ,रुपया-पैसा सब धरा रह गया और दीदी हमें रोता-बिलखता छोड़ कर चली गई। इन दिनों उसने क्या-क्या नहीं देखा और महसूस किया था…ये तो वही जानती थी।
घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भरा हुआ था। नन्ही परी माँ के लिए बिलखते-बिलखते नेहा की गोदी में ही सो गई थी। दीदी की चचिया सास कनखियों से नेहा को बार-बार घूर रही थीं। “बेटा तुम कौन हो …बहुत-बहुत देखा -देखा चेहरा लग रहा है।”नेहा ने परी की तरफ इशारा करके कहा …”मैं इसकी मासी हूँ।” चाची जी के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गई।
उन्होंने सोती हुई परी के सर पर हाथ फेरते हुए बड़े व्यंग्यात्मक ढंग से कहा… “हाँ भाई ….परी के लिए तुम मा$$$सी हो…अब तो तुम ही इसकी ??” नेहा गुस्से से तिलमिला गई …चाची के शब्द गले मे अटक कर रह गए।वो परी को लेकर कमरें में चली गई।ये पहली बार नहीं था…इन तेरह दिनों में हर आने-जाने वालों की निग़ाहों में उसने यही सवाल तैरते देखा था।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
