19-11-2020, 04:34 PM
सुबह से यह चौथा फोन था। फोन उठाने का बिल्कुल मन नहीं था ।…पर माँ… माँ समझने को तैयार ही नहीं थी। फोन की घंटियां उसके मन-मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी।
अंततः नेहा ने फोन उठा ही लिया। ” हेलो… हाँ माँ बोलो…बोलना क्या है… घर में सभी तुम्हारे जवाब का इंतजार कर रहे हैं… तुम किसी की बात का जवाब क्यों नहीं देती।” “माँ… माँ इतना आसान नहीं है यह सब… मुझे सोचने का मौका तो दो….।नेहा ने बुझे स्वर में कहा… “सोचना क्या है इसमें… तुम्हारी बहन की अंतिम इच्छा थी… क्या बिल्कुल भी दया नहीं आती तुम्हें… उन बच्चों के मासूम चेहरे को तो देखो।
“माँ… माँ मैं समझती हूँ पर…।” “पर क्या… वह सिर्फ तुम्हारी बहन नहीं थी… माँ की तरह पाला था उसने तुम्हें… आज जब उसके बच्चों को माँ की जरूरत है तो तुम्हें सोचने का समय चाहिए।” “माँ… इतनी जल्दबाजी में इस तरह के फैसले नहीं लिए जाते।” “हमने भी दुनिया देखी है…ठीक है… अगर तुम्हें उन बच्चों की छीछालेदर मंजूर है तो फिर क्या कहा जा सकता है।” “माँ… ये क्या बात हुई तुम इस तरह की बातें क्यों कर रही हो?”
अंततः नेहा ने फोन उठा ही लिया। ” हेलो… हाँ माँ बोलो…बोलना क्या है… घर में सभी तुम्हारे जवाब का इंतजार कर रहे हैं… तुम किसी की बात का जवाब क्यों नहीं देती।” “माँ… माँ इतना आसान नहीं है यह सब… मुझे सोचने का मौका तो दो….।नेहा ने बुझे स्वर में कहा… “सोचना क्या है इसमें… तुम्हारी बहन की अंतिम इच्छा थी… क्या बिल्कुल भी दया नहीं आती तुम्हें… उन बच्चों के मासूम चेहरे को तो देखो।
“माँ… माँ मैं समझती हूँ पर…।” “पर क्या… वह सिर्फ तुम्हारी बहन नहीं थी… माँ की तरह पाला था उसने तुम्हें… आज जब उसके बच्चों को माँ की जरूरत है तो तुम्हें सोचने का समय चाहिए।” “माँ… इतनी जल्दबाजी में इस तरह के फैसले नहीं लिए जाते।” “हमने भी दुनिया देखी है…ठीक है… अगर तुम्हें उन बच्चों की छीछालेदर मंजूर है तो फिर क्या कहा जा सकता है।” “माँ… ये क्या बात हुई तुम इस तरह की बातें क्यों कर रही हो?”
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
