24-09-2020, 08:38 PM
(This post was last modified: 24-09-2020, 09:01 PM by sanskari_shikha. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
मैं सोच रहा था की उसकी क्या हालत हो रही होगी, ये तो पक्की बात थी की वो अपनी चूत में उँगलियाँ डाल कर मास्टरबेट कर रही होगी अभी... काश मैं भी उसके पास होता, मैं भी देख सकता उसे. यही सोचते हुए मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया, अब अंशिका के रोकने पर मैं कब तक रुकूँ..उसकी चूत पता नहीं कब मिले या वो अगली बार पता नहीं कब और कहाँ मिलेगी, और अब इन दोनों यानी स्नेहा और अंशिका के चक्कर में मेरा लंड दिन में दस बार खड़ा होता है,इसकी हवा तो निकालनी ही पड़ेगी ना. मैंने लंड निकला और पास ही पड़ी क्रीम को उसपर लगाया और मुठ मारने लगा, क्रीम की चिकनाई की वजह से मुझे तो ऐसा लग रहा था की मेरा लंड अंशिका के मुंह में है...पर अभी तो मैं स्नेहा के नाम की मुठ मार रहा था, इसलिए मैंने उसे अपने दिमाग से निकाला और आँखे बंद करके स्नेहा को सोचने लगा, की वो मेरे सामने बैठी है और उसने अपना मुंह खोलकर मेरा लंड अपने मुंह में भर लिया है...और तेजी से उसे निगलते हुए, मेरी आँखों में देखकर, उसे चूस रही है...मेरा निकलने वाला था, मैंने उसे कहा...स्नेहा ...मैं आया...और ये सुनकर वो और तेजी से उसे चूसने लगी. तभी मेरे फोन की घंटी बज उठी..अब की बार अंशिका का फोन था..पर मैं झड़ने के काफी करीब था, फिर भी मैंने फोन उठाया और अपने लंड को आगे पीछे करते हुए, स्नेहा को याद करते हुए, मुठ मारना जारी रखा
मैं: हेल्लो....स्नेहा ..बोलो..
अंशिका: स्नेहा ?????? अरे मैं अंशिका हूँ...
ओ तेरी माँ की...साली गड़बड़ हो ही गयी....मुठ मारने के चक्कर में , मैंने फोन उठा कर अंशिका को स्नेहा बोल दिया...अब तो तू गया विशाल...और तभी मेरे लंड ने पिचकारियाँ मारनी शुरू कर दी...
मैं: अह्ह्हह्ह ....अह्ह्ह्ह....
अंशिका: क्या कर रहे हो.....विशाल....मैं तुम से पूछ रही हूँ....क्या कर रहे हो....और ये स्नेहा का क्या चक्कर है....तुम उसे पढ़ाने जाते हो और उससे फोन पर भी बात करते हो...मेरी तरह...है न...तुम कहीं उसके चक्कर में तो नहीं हो...बोलो विशाल....मैं कुछ पूछ रही हूँ..
मेरे लंड से पिचकारियाँ निकलती जा रही थी और दूसरी तरफ से अंशिका के मुंह से आग...उसकी हालत मैं समझ सकता था..मुझे जल्दी ही कुछ करना होगा...
मैं: अरे अंशिका...तुम भी न...मैंने ही स्नेहा को बोला था की वो मुझे फोन करे, आज मैं जब उसे पढ़ा रहा था तो एक कुएस्चन पर अटक गए थे और उसके सब्जेक्ट की एक गाईड मेरे पास भी है, मैंने उसे कहा था की शाम को फोन करके मुझसे उसका जवाब पूछ लेना. बस मैंने सोचा की उसी का फोन है..
अंशिका: पर तुमने बिना देखे फोन कैसे उठा लिया...तुम क्या कर रहे थे...और कैसी आवाजें निकाल रहे थे...तुम मास्टरबेट कर रहे थे न... बोलो?
मैं: सच कहूँ ...हाँ...मैं आज तुमसे दोपहर को बात नहीं कर पाया, इसलिए मैं तुम्हारे बारे में सोचकर मुठ मार रहा था, मेरी आँखें बंद थी, इसलिए मैं फोन किसका है , ये भी नहीं देख पाया, मुझे लगा, स्नेहा ही होगी, क्योंकि इस समय तुम तो फोन करती नहीं हो..और तुम मुझपर शक करना छोड़ दो, मेरा और स्नेहा का कोई चक्कर नहीं चल रहा है...तुम बेकार में सोचती रहती हो..मैंने कहा था न की पहले तुम, फिर कोई और.
अंशिका: हाँ हाँ ठीक है..पर जब तुमने उसका नाम लिया तो मुझे बड़ा बुरा लगा..और ये टयूशन की बातें वहीँ छोड़ कर आया करो...कोई जरुरत नहीं है फ़ोन-वोन करने की एक दुसरे को...वैसे भी वो काफी छोटी है तुमसे समझे.
मैं: हाँ मेडम...समझ गया...कुछ और..
अंशिका (हँसते हुए): नहीं जी..कुछ नहीं..
मैं: तुम्हारा दिन कैसा रहा आज ?
अंशिका: ठीक था..फॅमिली डे आने वाला है, उसी के लिए मुझे सब सँभालने के लिए दिया है...पता है, मेरा डीन मुझे कहता है की मैं इस तरह के फंक्शन ज्यादा अच्छी तरह से मेनेज कर कर सकती हूँ...जैसे मैंने पहले किया था.
मैं: वो तो है...चलो अच्छा है, तुम्हारी कदर बढेगी तभी तो तुम्हारी सेलेरी भी बढेगी.
अंशिका: हाँ सही कह रहे हो...
मैं: अच्छा , मैं तुम्हे एक बात बताना तो भूल ही गया, वो मेरी सुबह वाली टयूशन अब नहीं होगी, वो लोग कहीं और शिफ्ट कर रहे हैं, जो काफी दूर है, मैं वहां नहीं जा पाउँगा उन्हें पढाने, पर तुम फिकर मत करो, मैं तुम्हे रोज छोड़ने आ जाया करूँगा.
ये सब तो करना ही था...आप समझ ही सकते हैं.
अंशिका: नहीं , सिर्फ मेरी वजह से इतनी सुबह उठने की कोई जरुरत नहीं है, मैंने तो सिर्फ इसलिए की तुम वहीँ जाते हो, तुम्हारे साथ जाना शुरू किया था, पर अब अगर तुम ही नहीं जा रहे तो मैं पहले की तरह मेनेज कर लुंगी और रही बात मिलने की तो उसके बारे में भी सोचते हैं..
मैं: (खुश होते हुए): अच्छा, कब मिल रही हो फिर...तुम्हारी चूत मारने का बड़ा मन कर रहा है..
अंशिका: अभी मास्टरबेट किया , उसके बावजूद भी..?
मैं: तुम अगर मेरे सामने आ जाओ न, फिर देखना, एक घंटे में तीन बार तो चोद ही दूंगा तुम्हे..
अंशिका: वो तो जब होगा, तब देखेंगे..अच्छा सुनो, मेरी बहन कनिष्का आ रही है कल, उसके 12th तो पूरी हो ही चुकी है, अब वो यही कॉलेज में पड़ेगी..
मैं: तुम्हारे कॉलेज में ?
अंशिका: नहीं, वो नहीं चाहती मेरे कॉलेज में आना, मैंने भी उसे जोर नहीं दिया..उसका एडमिशन जीसस एंड मेरी कॉलेज में हुआ है..
मैं: अब तो तुम मुझसे रात को बात भी नहीं कर पाया करोगी..
अंशिका: नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है...वो मेरी प्रायवेसी का पूरा ध्यान रखती है, और मैं किस से बात कर रही हूँ, कभी नहीं पूछती..
मैं: फिर तो मैं भी अगर तुम्हारे कमरे में आ गया तो तुम्हे उसके सामने चूम भी सकता हूँ और चोद भी...वो कुछ नहीं कहेगी ना..
अंशिका: ऐसा भी नहीं है...वो इतनी नासमझ भी नहीं है.
मैं: ओहो...यानी ये जवानी के खेल वो भी समझती है.
अंशिका (थोडा गुस्से में): मैंने तुमसे कहा था न की उसके बारे में मैं इस तरह की बातें नहीं सुनना चाहती..
मैं: ओह्ह..सॉरी..मैं तो बस ऐसे ही, मैं तो बस ये कह रहा था की अब रहा नहीं जाता, जल्दी ही कुछ करो, वर्ना मैं किसी दिन, सबके सामने ही तुम्हे चोदना शुरू कर दूंगा.
अंशिका: ठीक है...चोद लेना.
मैं (हैरानी से): मतलब, तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता.
अंशिका: जब से तुमसे मिली हूँ, मेरे दिल से इस तरह का डर ख़त्म सा हो गया है, और सच कहूँ तो अब मुझे बड़ी एक्साय्मेंट होती है, तुम्हारे साथ उस दिन पार्क में, फिर मेरे कमरे में, रात को उस दिन बिजली घर में और फिर आज चेंजिंग रूम में.. जहाँ कभी भी कोई भी आ सकता था, मैंने खुल कर चूमा-चाटी, सकिंग और ना जाने क्या क्या कर दिया..ये सब करने में जो रोमांच मिलता है, वो मैं तुम्हे बता नहीं सकती...इसलिए तो कह रही हूँ, ऐसे पब्लिक प्लेस में या जहाँ किसी के आने का डर हो, वहां करने में जो मजा है, वो बंद कमरे में कहाँ..
मैं: समझ गया...तुमपर अब सेक्स का भूत चढ़ गया है...और वो भूत तुम्हे पब्लिक प्लेस में अपना जलवा दिखाने को कहता है...है न..
अंशिका (हँसते हुए): हाँ...ऐसा ही समझ लो.
मैं: तो ठीक है, कल ही तुम्हे एक ऐसी जगह ले जाता हूँ, जहाँ जाकर प्यार करने में तुम्हे मजा आएगा..
अंशिका: कौन सी जगह ?
मैं: वो तो मैं कल ही बताऊंगा..तुम घर पर बोल देना की तुम लेट आओगी..मैं तुम्हे कॉलेज से पिक कर लूँगा..
अंशिका: देखो...कोई मुसीबत ना आ जाए, मेरा मतलब वो भी नहीं था...जैसा तुम समझे....
मैं: अब तो मैंने सोच लिया है...तुम्हे उस जगह लेकर ही जाऊंगा..कोई अगर मगर नहीं..समझी.
अंशिका: ठीक है...तुम दो बजे आ जाना कॉलेज.वहीँ से चलेंगे..
मैं: ठीक है..अब एक पप्पी तो दे दो..
अंशिका (इठलाते हुए): कल ही दे दूंगी...जहाँ कहोगे..
मैं: वो तो मैं ले ही लूँगा..पर अभी के लिए तो कुछ करो..मेरे लंड पर एक किस करो ना..
अंशिका: आज मैं: तुम्हे लंड पर नहीं, उसके नीचे वाली जगह यानी तुम्हारी बाल्स पर किस दूंगी..ऊऊउम्म्म्माअ ...और उसपर किस ...कल ही मिलेगी..हे हे...
मैं: ठीक है...हंस लो...कल देख लूँगा.
अंशिका: देख लेना..जो चाहे..जैसे चाहे.
साली बड़ी दिलदार बन रही है...कल बताऊंगा इसे तो.
आज पता नहीं अंशिका से बात करने के बाद मुझे एक अजीब तरह की ख़ुशी मिल रही थी, जिस तरह से वो बात करने लगी है आजकल, मैं उसका श्रेय खुद को दे रहा था, कहाँ वो कॉलेज की सिंपल सी मेडम और कहाँ अब ये लंड और चूत की बातें करने वाली, और पब्लिक प्लेस में प्यार का खेल खेलने को तेयार गर्म और रसीली जलेबी. मैंने अंशिका के बारे में सोचते हुए सो गया. अगले दिन मैंने स्नेहा को फोन करके बोल दिया की मैं आज नहीं आ पाउँगा, वो थोड़ी निराश तो हुई पर उसने जाहिर नहीं होने दिया..वैसे भी जब से मैंने उसके साथ फोन सेक्स किया था उसके बाद मेरा और उसका सामना आज ही होना था और शायद खेल उसके आगे बढ़ सकता था, जहाँ पर हमने उसे छोड़ा था...पर अभी तो मुझे अंशिका की प्यास पहले बुझानी थी.
ठीक २ बजे मैं उसके कॉलेज के पास पहुँच गया, आज मौसम बड़ा अजीब सा था, बादल थे लाल से रंग के, शायद बारिश हो जाए.
मैं किटी मैम से बच रहा था, कहीं उन्होंने मुझे आज यहाँ देख लिया तो गड़बड़ हो जायेगी, वो पूछेंगी, की आज मैं उनकी बेटी को पढ़ाने क्यों नहीं गया..मैंने अंशिका को पहले से ही ये बात बता दी थी. वो थोड़ी देर बाद मुझे आती हुई दिखाई दी. उसने आज पिंक कलर का सूट पहना हुआ था, और सफ़ेद रंग की पायजामी. बाल खुले और चुन्नी से ढके उसके विशाल पर्वत. वो मेरे पास आई और मुझे एक क्यूट सी स्माईल करी और मेरी बाईक पर बैठ गयी..थोड़ी ही दूर जाकर उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया. अब उसकी ब्रेस्ट की हलचल में अपनी पीठ पर महसूस कर पा रहा था.
अंशिका: हां जी...अब बोलो, कहाँ ले जा रहे हो.
मैं: यूनीवर्सिटी में एक बहुत बड़ा गार्डेन है...कमला नेहरु रिड्ज पार्क ...वहीँ पर.
अंशिका: बोंटे पार्क...पागल हो क्या...तुम मरवाओगे...हमारे कॉलेज के कई लड़के लड़कियां वहां जाते हैं...कहीं किसी ने देख लिया तो मर जाउंगी मैं , ना बाबा ना. कहीं और चलो..नहीं तो मुझे घर छोड़ दो.
मैं: देखो, तुम अब पलट रही हो...तुमने ही कहा था की तुम्हे ऐसी जगह प्यार करवाने में मजा आता है, जहाँ किसी के आने का डर हो..और वैसे भी, हमने अभी तक जहाँ भी प्यार किया है, वहां भी तो कोई जान पहचान वाला आ सकता था..तुम फिकर मत करो, वहां इतनी झाड़ियाँ है की कोई किसी को नहीं देख पाता..
वो कुछ देर तक और बोलती रही पर मैंने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया..और लगभग आधे घंटे में हम वहां पहुँच गए. मैं बाईक से उतरा और हम अन्दर चल दिए, अंशिका ने थोड़ी समझदारी दिखाई और अपनी चुन्नी से अपने चेहरे को पूरी तरह से ढक लिया, सिर्फ उसकी आँखें ही दिखाई दे रही थी..पर ऐसा करने से उसके मोटे-मोटे चुच्चे साफ़ दिखाई देने लग गए थे. मैंने एक हाथ आगे करके उसके दांये चुच्चे को दबा दिया..उसने अपनी आँखें फेला कर मुझे घुर.
अंशिका: ये क्या कर रहे हो...कोई देख लेगा.
मैं: अंशिका को लेकर अन्दर तक चला गया, वहां काफी हरियाली थी, और आज मौसम भी थोडा सुहाना था, इसलिए आशिको की भीड़ भी थी..पर अभी तक अंशिका ने मुझे ये नहीं कहा की वो देखो, वो है मेरे कॉलेज के लड़के/लड़कियां...
वहां जो भी छुप कर बैठने की जगह थी, वहां पहले से ही कोई न कोई बैठा हुआ था..हर जोड़ा एक दुसरे को चूसने और चाटने में लगा हुआ था, किसी को दिन दुनिया की कोई खबर नहीं थी, मेरी जींस में मेरे लंड ने अंगडाई लेनी शुरू कर दी थी, अंशिका मेरा हाथ पकड़ कर चल रही थी, जिसकी वजह से उसका मुम्मा मेरी बाजू से रगड़ खा रहा था. अंत में मुझे अपनी मनचाही जगह मिल ही गयी, वो एक बड़ी सी झाडी थी और उसके नीचे घांस में बैठने की जगह थी, ऊपर से वो झाडी किसी छतरी की तरह से थी, उसके नीचे हम दोनों घुस गए..अब अगर कोई सामने से निकले भी तो उसे नीचे बैठकर देखना होगा की अन्दर कौन है और क्या कर रहा है. बैठते के साथ ही अंशिका ने अपने पर्स से पानी की बोतल निकाली और उसका ढक्कन खोला. मैंने उसके हाथों से पानी छीन लिया.
अंशिका: दो न प्लीस....मुझे बड़ी प्यास लगी है..
मैंने बोतल को अपने मुंह से लगा कर पानी अपने मुंह में भर लिया और अपना चेहरा उसके आगे किया और आँखों से इशारा करके उसे कहा लो पी लो फिर. उसने मेरा इरादा समझ लिया और अपने चेहरे पर कातिल मुस्कान बिखेरते हुए अपने बालों को एक तरफ किया और अपने हाथों की उँगलियाँ मेरे चेहरे पर फिराते हुए उसने अपने पिंक लिपस्टिक वाले होंठ मेरे मुंह से लगा दिए और मैंने अपने होंठ उसके दोनों होंठों के चारों तरफ लपेट दिए और अगले ही पल ठंडा पानी मेरे मुंह से झरने की तरह दूसरी तरफ जाने लगा, मैं धीरे-धीरे पानी छोड़ रहा था और हर घूँट के साथ उसके होंठ चूस रहा था, गीले-गीले होंठ चूसने में आज बड़ा मजा आ रहा था..अचानक उसका एक हाथ मेरे लंड के ऊपर आ गया. मैंने भी उसकी ब्रेस्ट को अपने हाथों से नापना शुरू कर दिया. जल्दी ही मेरे मुंह से सारा पानी ख़त्म हो गया, पर हमने एक दुसरे को चुसना नहीं छोड़ा..थोडा पानी निकल कर अंशिका की चिन से होता हुआ, उसकी गर्दन को भिगोता हुआ, अन्दर की और चल दिया...मैंने अपनी जीभ से उस पानी की लकीर का पीछा करना शुरू कर दिया और जैसे ही मेरे गर्म होंठ उसकी लम्बी गर्दन के ऊपर आये, उसने मेरे सर को अपने हाथों से जोर से दबा कर अपनी छाती में समां लिया. मेरे मुंह में उसकी नर्म ब्रेस्ट आ गयी और मैंने उसे सूट के ऊपर से ही उसे चुसना शुरू कर दिया..
आह्ह्ह्हह्ह ओह्ह्हह्ह्ह्ह विशाल्लल्ल्ल ....सक में.....सक में हार्ड... और ये कहते हुए उसने अपने सूट के गले से अपना एक मुम्मा बाहर निकाल दिया. उसका निप्पल तन कर खड़ा हुआ था, मैंने ठंडी जीभ उसके ऊपर फेराई तो वो तड़प सी उठी...उसने मेरे बालों में ऊँगली फेरते हुए मेरे मुंह को अपनी ब्रेस्ट पर दबा दिया...
अंशिका: क्यों तड़पा रहे हो....चुसो न...सक इट....बाईट मी...
मैंने उसके निप्पल को मुंह में भरा और उसपर दांत गडा दिए. उसका निप्पल तन कर खड़ा हुआ था, मैंने ठंडी जीभ उसके ऊपर फेराई तो वो तड़प सी उठी...उसने मेरे बालों में ऊँगली फेरते हुए मेरे मुंह को अपनी ब्रेस्ट पर दबा दिया...