06-08-2020, 12:26 PM
जासूसी कहानियों लिखने के अलावा माहिर हास्य व्यंग्य और बेहतरीन शायर थे
आखिरकार 1980 में असरार अहमद उर्फ इब्ने सफी ने, उसी दिन जब उनके पाठक उनका जन्मदिन मना रहे थे, अलविदा कह कर सबको चौंका दिया. वो सिर्फ जासूसी कहानियां ही नहीं लिखते थे बल्कि एक माहिर हास्य-व्यंग्य कथाकार के साथ-साथ हरदिल अजीज शायर भी थे. चलते-चलते उनकी गजल के कुछ शेर-
रहे-तलब में कौन किसी का अपने भी बेगाने हैं
चांद से मुखड़े रश्क-ए-गजालां सब जाने पहचाने हैं
उफ्फ ये तलाशे-हुस्नो-हकीकत किस जा ठहरे जाए कहां
सहने-चमन में फूल खिले हैं सहरा में दीवाने हैं
बिल आखिर थक-हार के यारों हमने भी तस्लीम किया
अपनी जात से इश्क है सच्चा बाकी सब अफसाने हैं
आखिरकार 1980 में असरार अहमद उर्फ इब्ने सफी ने, उसी दिन जब उनके पाठक उनका जन्मदिन मना रहे थे, अलविदा कह कर सबको चौंका दिया. वो सिर्फ जासूसी कहानियां ही नहीं लिखते थे बल्कि एक माहिर हास्य-व्यंग्य कथाकार के साथ-साथ हरदिल अजीज शायर भी थे. चलते-चलते उनकी गजल के कुछ शेर-
रहे-तलब में कौन किसी का अपने भी बेगाने हैं
चांद से मुखड़े रश्क-ए-गजालां सब जाने पहचाने हैं
उफ्फ ये तलाशे-हुस्नो-हकीकत किस जा ठहरे जाए कहां
सहने-चमन में फूल खिले हैं सहरा में दीवाने हैं
बिल आखिर थक-हार के यारों हमने भी तस्लीम किया
अपनी जात से इश्क है सच्चा बाकी सब अफसाने हैं
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
