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जिनके उपन्यास पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी ब्लैक में बिका करते थे
#11
जासूसी कहानियों में अक्सर कुछ विचित्र संयोग भी हुआ करते हैं. आम लोगों के साथ शायद ही ऐसा होता हो लेकिन एक अजब संयोग इब्ने सफी के साथ भी जुड़ा हुआ है. 1980 में आज के ही दिन उनकी मृत्यु हुई थी यानी उनका जन्मदिन और पुण्यतिथि एक ही दिन है. इब्ने सफी जैसे-जैसे लोकप्रिय होते गए उनके ऊपर लुगदी साहित्यकार का तमगा चिपकता गया. हालांकि वे ऐसी किसी छवि से न कभी परेशान हुए और न ही उन्होंने अपने लिखने का क्रम तोड़ा. उन्होंने तकरीबन 250 उपन्यास लिखे हैं और इनमें हर दूसरे उपन्यास को पहले से बेहतर करने की कोशिश साफ दिखती है. शायद यही वजह है कि वक़्त की तहों से निकलकर उनकी कहानियां आज फिर ज़िंदा हुई हैं. जानेमाने विश्विद्यालयों में विद्यार्थी उनकी किताबों को शोध का विषय बना रहे हैं. वहीं हाल ही में हार्पर कॉलिन्स ने उनकी 13 किताबें पुनर्प्रकाशित की हैं. इब्ने सफी चाहते थे कि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और इस समय उनके उपन्यासों की तरफ पाठकों की बढ़ती रुचि उनके इसी सपने को असलियत में बदल रही है.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी  हम अकेले हैं.



thanks
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RE: जिनके उपन्यास पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी ब्लैक में बिका करते थे - by neerathemall - 06-08-2020, 12:15 PM



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