06-08-2020, 12:13 PM
मैं जो कुछ पेश कर रहा हूं उसे किसी अदब से कमतर नहीं समझता. हो सकता है कि मेरी किताबें अलमारियों की जीनत न बनती हों लेकिन तकियों के नीचे जरूर मिलेंगी. हर किताब बार-बार पढ़ी जाती है. मैंने अपने लिए ऐसे माध्यम का इन्तखाब (चयन) किया है जिससे मेरे विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें’ जासूसी उपन्यास लिखने की वजह बताते हुए इब्ने सफी यही कहते थे. दरअसल उस दौर में (1950 से लेकर 1980 तक) जासूसी कथा लेखन की साहित्य में कोई खास प्रतिष्ठा नहीं थी. यह अलग बात है कि इब्ने सफी की वजह से जासूसी लेखन भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा पढ़ी जानी वाली साहित्यिक विधा थी.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
