03-12-2019, 04:03 PM
जिन तीन दिनों में ब्यूटी नदारद थी, मैंने उसकी गैरमौजूदगी को उसे उन दो उपन्यासों में ढूँढ़ते हुए पूरा किया जिन्हें मैंने तब पढ़ा : धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता और एमिली ब्रांट का इकलौता नॉवल, 'वुदरिंग हाइट्स'। भारती का उपन्यास, जो करीब चालीस साल पहले छपा था, आज भी लोकप्रिय है और 'वुदरिंग हाइट्स' जिसकी रचना 1847 की है, अनेक अंतरराष्ट्रीय मतदान में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रेमकथाओं में शुमार हुआ है। दोबारा सोचने पर लगता है मैं ब्यूटी को ढूँढ़ नहीं रहा था। अपितु मैं इन दो कथानकों में उसके लिए वाजिब जगह तलाश रहा था।
कई घंटे मैं अपनी पीठ के बल ध्यानमग्न लेटा रहा। मेरे सामने एक बड़े स्क्रीन पर ब्यूटी की मेरी गढ़ी तस्वीर थी। और उसके ऊपर एक पतली फिल्म स्ट्रिप चल रही थी जिस पर दोनों नॉवल की नायिकाओं और स्त्री चरित्रों के नाम थे : पम्मी, बिनती, सुधा, गेसु... और इंग्लैंड के कठोर, निर्जन बीहड़ से आकृतियाँ : कैथरीन, उसकी भौजाई इसा बैला, बेटी केथी.. स्ट्रिप रुकी नहीं, चलती रही। मेरी प्रांजल, बहती कल्पना ने चरित्रों को चेहरे प्रदान किए थे, जो जरूर मैग्जीन, फिल्म और बिलबोर्ड की उड़ती यादों से रचे थे... सभी हवाओं से निखरे चेहरे, मैंने सोचा। मुझे लगा कि चलती स्ट्रिप पर मुझे किसी भी जगह उँगली रख देनी है और ब्यूटी वहाँ जगह पा लेगी। ऐसा करने की चाहत बहुतेरी थी पर मैं निश्चेष्ठ रहा और एक जड़, जमे उद्गार से बस देखता रहा। अजीब है पर मैं खुद को हीथक्लिफ या चंदर के रूप में कभी देख न पाया। मैं बस मैं बना रहा।
'वुदरिंग हाइट्स' के संवादों के टुकड़े बारंबार मेरा हृदय छलनी कर देते। जैसे जब कैथरीन, लिंटन से शादी का निश्चय करने के बाद, नैली (ऐलेन डीन) से अपने आकुल, धुँधले दिल का इजहार करती है... 'अगर सब खत्म हो जाता और वो (हीथक्लिफ) रहता, तो मैं फिर भी बनी रहती; और अगर बाकी सब बरकरार रहता और वह नष्ट हो जाता, तो संसार बस एक अजनबी दैत्य है... नैली, मैं हीथक्लिफ हूँ! वह हमेशा, हमेशा मेरे दिलोदिमाग में है : सुख की अनुभूति की तरह नहीं, जो उतनी ही है जो मैं खुद से पाती हूँ, बल्कि मेरा ही अस्तित्व बन कर...।'
फिर, जब कैथरीन का अंत निकट था, उसने हीथक्लिफ को बाँहों में भरा और कहा : 'काश मैं तब तक तुम्हें बाँहों में भरे रहती जब तक हम दोनों मर नहीं जाते... मेरी बस इतनी ख्वाहिश है कि हम कभी जुदा न हों; और अगर मेरे शब्द मेरे बाद तुम्हें पीड़ा दें तो सोचना कि जमीन के भीतर मैं भी वही पीड़ा सह रही हूँ, और मेरे लिए, मुझे माफ कर देना...।'
नैली एक जगह कहती हैः 'एक क्षण के लिए वे अलग रहे, और फिर वे कब पास आ गए मैं देख भी नहीं पायी, पर कैथरीन ने एक छलाँग ली थी, और उसने (हीथक्लिफ) उसे थामा और वे दोनों एक आलिंगन में जज्ब थे जिससे, मुझे लगा मेरी मालकिन कभी जिंदा रिहा नहीं होगी।'
मैंने सोचा : आलिंगन जिससे प्रेमी कभी जिंदा रिहा नहीं हो सकते! ऐसी अंगीकारता को मैं चित्रित भी नहीं कर सकता था, महसूस करना तो दूर की बात थी... सैकड़ों फिल्मों की तस्वीरें जेहन के आईने के सामने घूमती हैं... हजारों कलाकारों और तकनीशियनों की सम्मिलित मेहनत होती है, अपने दशक के श्रेष्ठतम अभिनेता, निर्देशक, संगीत, प्रकाश, परिवेश, रंग संयोजन, मिजाज, ये सब सावधानी से निर्मित, फिर दोबारा, तिबारा, अनेक बार, तब जा कर वह शॉट या फिल्म का टुकड़ा बनता है जो उस क्षणिक, कौंध से और रहस्यमय आलिंगन को पकड़ता है जिसका एकाकी वर्णन ब्रॉन्ट ने किया...।
मैं सोच रहा था, मग्न था, चाहत और आकुलता से सराबोर... और चाह रहा था पहुँचना उस उत्कर्ष पर जिसके आगे भावावेग का भी वश नहीं, वह चुक जाता है। और मेरे पास कोई नहीं था, बस ब्यूटी जिसके सहारे मैं ऐसे सपने बुन सकता था। मेरी जिंदगी में कोई नैली नहीं थी और, एक हीरो की जिंदगी की कल्पना करते हुए, मेरा अस्थिर दिल मना रहा था कि एक दिन कोई मिसेज डीन ब्यूटी और मेरे बारे में ऐसी एक कहानी कहेगी... पर अपने दिल की गहराई में मैं जानता था कि मैं हीथक्लिफ या एडगर लिन्टन नहीं हो सकता और ब्यूटी को बुदरिंग हाइट्स के भयावह बीहड़ में स्थापित करना असंभव है। प्रेम के आवेग की ऐसी ऊँचाइयाँ, सबसे ऊँचे पहाड़ों पर फैली धुंध की तरह थीं और यही वजह थी कि मैंने महान, शाश्वत प्रेम कहानियों में कभी तसल्ली या प्रेरणा नहीं तलाशी : रोमियो एंड जूलियट, शीरी फरहाद, हीर राँझा आदि।
इसलिए मैंने अपना ध्यान चंदर की अपेक्षाकृत हल्की कहानी पर केंद्रित किया जिसे भारती ने उपन्यास में गुनाहों का देवता कहा है। इतना वाजिब है और संभावनाएँ असीम। पर कहानी में असफल प्रेमोन्माद का वह प्रताप नहीं है जो दूर अतीत की घटनाओं को खँगालने और सुनाने से उत्पन्न होता है। भारती का कथानक पूरी तरह साधारण वर्तमान में स्थित है और घटनाओं के स्थान में वह कठोर उग्रता और नग्न धार नहीं है, जो बुदरिंग हाइट्स के परिवेश में था। फिर भी पाठक उन भावनाओं की चुभन महसूस करता है जो चंदर और उसके संपर्क में आई महिलाओं की जिंदगियों को घेरती है, धुँधलाती है; वे औरतें जो किसी न किसी रूप में चंदर का प्यार, उसकी अस्मिता और चाहतों को अपनाती हैं, भोगती हैं।
नॉवल पढ़ना, लेकिन, श्रेष्ठ उन्माद के सागर में तैरने जैसा है, पर भीगने के प्रति अनास्था और वितृष्णा है। मुझे यह दयापूर्ण और कायरता लगी, कि चंदर, सुधा, बिनती, गेसु और किसी स्तर पर पम्मी भी अपनी देह और शरीर की चाहतों के प्रति सहज और अनुरक्त नहीं हैं। मुझे क्षोभ था और द्वेष भी कि भारती सेक्स और दैहिक आकांक्षाओं के विचार से आतंकित से थे। यह नीरस है और प्रपंच कि भारती जी ने देह के मामले में अपनी बुजदिली से पार पाने के लिए नॉवल को प्रेम और कामना की कहानी बताने के बजाय उसे मध्यवर्गीय जीवन की कथा की संज्ञा दी। चंदर और सुधा दोनों अंत तक खुद को झुठलाते रहे कि उनका प्रेम दैहिक संबंध की अनदेखी कर आत्माओं का उच्चतर मिलन है, इस कोशिश में वे चुक गए। यह इस तरह था मानो अपनी आत्माओं को सींचने के लिए उन्हें देह की आहुति देनी थी। कथाकार और उसके चरित्र रति और संसर्ग के प्रति अपने भय से बखूबी वाकिफ हैं और यह भी कि उनका डर निर्मूल और अर्थहीन है। पम्मी के साथ शरीरी प्यार का जश्न मना कर चंदर जरूर अपने दैत्यों का संहार करने की भरसक कोशिश करता है। पर यह प्रयत्न क्षमायाचना ज्यादा थी और अपनी खुद की शर्म और दोष को ढाँपने का निरर्थक प्रयास और आखिर में वह पम्मी का इस्तेमाल ही करता है।
नॉवल में बार बार लौटता विषाद घुटन पैदा करता है। ऐंद्रिक ऊर्जा का दमन स्याह धुएँ की तरह था जिसने चंदर और उसकी औरतों के संबंधों में विष भर दिया और कथानक का स्तर एक निचले दर्जे की भावानुभूति पर आ गया, जहाँ प्रेम की असली, पूज्य ऊँचाई पाना संभव नहीं रहा।
उनका प्यार, चंदर और सुधा का, कमतर और अधूरा था। उसमें एक विलाप विराजा था, न कि प्यार की स्वर्णिम आभा। इन्सानी फितरतों की असंभव ऊँचाइयाँ पाने की अमानवीय प्यास में वे अपनी जिंदगी के जीने में बौने हो गए थे।
फिर भी सब खोया नहीं था। उनके नि:स्वार्थ कृत्यों में काफी कुछ प्रशंसनीय था : उनका समर्पण और निष्ठा; उनकी पीड़ा और त्याग; संशय और ईमानदार नाराजगियाँ; उनकी विफलताएँ और कमियाँ; और कैसे उन्होंने अपनी सहनशक्ति को सदा चुनौती दी ताकि वे प्रेम के उस अनुपम स्वप्न को पा सकें, जो हर प्रेम के आगे है...।
इसलिए कहानी ने मुझे छुआ भी, और जुगुप्सा भी जगाई। एक तरफ समृद्ध महसूस करने का जज्बा था, वहीं लुटने का भी आभास। यही भावनाएँ बनी रहीं बल्कि आगे पुख्ता हुईं जब मैंने और भारतीय प्रेमकथाएँ पढ़ीं। कुछ कथाकार मुझे याद हैं, कुछ नहीं। लगभग सभी प्यार की जगह प्यार के रूपकों में आश्रय पाते प्रतीत हुए : अकेलापन और अभाव; घोर उदासी; खोई राहों को पाने की ललक; चाहतें जो पूरी न हो सकीं... वह साँड़ जिसके सींग पकड़ने से वे डरते थे, वह था इंद्रियों की इच्छाएँ, और उसका सीधा स्वरूप : संसर्ग, रति, काम संगीत। यह मनाही और अनिच्छा उन्हें साँड़ को काबू करने के लिए बेवजह के उपायों की ओर ले जाती। इसलिए ऐसी प्रेमकथाओं में व्यंग्य और हास्य का पर्याप्त प्रसाद है; विडंबना और सूखे मजाक का। कोशिश यह कि शरीरी गंध, गुंथन, जलन और ज्वाला और उनके वैभव से किसी तरह ध्यान हटे और इस, अगर निचली नहीं तो, नीचे की हरकत को हम किसी उच्च और श्रेष्ठ स्तर से देखें - जरूर प्रेम और उसकी अभिव्यक्तियों की तरफ संवेदनशील, सावधान और सर्वज्ञानी। यह रोग काफी फैला है। मुझे याद है जब हम कॉलेज में थे, टीनेजर थे, हमारे दो चेहरे थे : एक सेक्स और लड़कियों के बारे में खराब से खराब, खूब से खूब जानता और बतियाता और दूसरा अचंभित चेहरा यह मानने को तैयार नहीं कि भले, परिचित आदमी और औरत, जो शादीशुदा नहीं, वे आपस में स्पर्श या आलिंगन भी कर सकें। यह अब एक परिकथा लगती है पर एक वक्त था जब हमने अपने कस्बे में उन तकनीकों का अनावरण किया जिनके इस्तेमाल से (हमारे अनुसार) फिल्मों में नायक और नायिकाओं को अद्भुत और उत्तेजक नजदीकियों में आलिंगनबद्ध दिखाया जाता था। मूल धारणा यह थी कि हीरो हीरोइन चूँकि हमारी तरह पाक हैं, एक दूसरे को वास्तव में छूते तक नहीं, यह बस फिल्म का कमाल है। हमने बेहद सजीव और आश्चर्यजनक विस्तार से यह बताया किस तरह कैमरा एक के बाद एक हजारों शॉट लेता है ज्यों नायक और नायिका एक दूसरे के निकट आते हैं, यह नाटक है, सच्चाई नहीं, वे एक दूसरे को कभी स्पर्श नहीं करते (यह घिनौना है, पाप है) वे एक दूसरे से मात्रा मिलीमीटर दूर हो सकते हैं, उनके होंठ, बाँहें, सीने और जाँघें, पर वह दरार जितनी दूरी अमिट है। यह फर्क करता है कोरे घिनौने सेक्स को और उसके पाक प्रस्तुतिकरण को। और फिर, हमारा विज्ञान की भाषा से परिपूर्ण आख्यान कहता है कि कैमरा एक तेज स्पीड पर चलता है जिससे आलिंगन या चुंबन का दृष्टिभ्रम पैदा होता है। हमारी विवेकपूर्ण लज्जा इस तरह संतोष पाती है। इसलिए जब हम फिल्म स्क्रीन पर कोई उत्तेजक, काम दृश्य देखते हैं, वह, वस्तुगत रूप में, काम दृश्य नहीं है। इस तरह हमारा कौमार्य गुजरा था...।
मैं खुद को चंदर के रूप में नहीं देख पाता था। न कि ब्यूटी का नाम सुधा, बिनती, पम्मी या गेसु है। मैं न खुद को गुनाहगार मान सकता था न देवता। मेरी इच्छा थी मैं आईने में देखूँ और फुसफुसाऊँ : महबूब!
बाद में, सालों में, मैंने अक्सर सोचा वह कौन सी ऊर्जा थी जिसने मेरे भीतर ऐसा आवेग, इतनी कल्पनाएँ पैदा कर दीं। मुझे याद है उन दिनों एक व्यक्ति ने अखबार में इंटरव्यू दिया था कि फिदेल कास्त्रो ने अपनी तब तक की जिंदगी में करीब 35000 औरतों से सेक्स संबंध बनाए। मेरे कम्युनिस्ट दिनों में कास्त्रो हमारा नायक, हमारा ईशू था। बाद में मैं सिमीनोन नाम के एक फ्रांसीसी लेखक का समर्पित फैन हो गया। सिमीनोन इतना प्रसिद्ध नहीं पर उसकी एक कल्ट है। वह अद्भुत, वातावरणीय, रहस्यमय उपन्यास लिखता था। अपराध और असामान्य के मनोविज्ञान का वह पारखी था। उसके लेखन की ताकत अद्वितीय थी और अपनी जिंदगी में उसने 200 से ज्यादा नॉवल लिखे। और माना जाता है कि 10,000 से अधिक महिलाओं के साथ सेक्स संबंध किए! अक्सर, लिखते हुए वह वाक्य के बीच में रुक जाता, उसे अधूरा छोड़ वह किसी प्रेमिका के साथ दोपहर बिताने चला जाता। उसे वरदान था। उसके लिए लेखन और रतिक्रिया में मूल फरक नहीं था। वे पूरक थे। अगर बाद में मेरी कोई अभिलाषा रही तो यही थी कि मैं सिमीनोन की तरह एक सौंवा जीवन भी जी सकूँ।
सिर्फ इतना : लेखन और प्यार।
जिन दगाबाज राहों में मैं अपनी राह काटने की कोशिश कर रहा था, मेरे अतीत ने मुझे उसके लिए कतई तैयार नहीं किया था। यूँ नहीं कि मैं कोरी स्लेट था या भोला कुमार। पर मेरे तजुर्बे का सागर उथला था, उसमें गहराई और लहरें नहीं थीं। इस मामले में जो मेरी सीवी थी, वह एक छोटे कस्बे की सीमित संभावनाओं से आबद्ध और परिभाषित थी। मैं मानता हूँ कि प्रेम और रतिराग का संसार शहर की किस्म से स्वतंत्र है और वह सदा घना और विस्तृत होता है पर मैं उसका भाग कभी बन नहीं पाया।
अनुभव के लिहाज से वही परिचित आहें थीं, जानलेवा नजरे इनायत, प्रेम के झूठे अफसाने और प्रेमिकाओं पर घोषित पर न पूरे होने वाले अधिकार। इश्क के विषय पर मर्द दोस्तों के बीच गर्म जोश और तीक्ष्ण वाद विवाद थे और औरत जात के लिए अथक, न मिटने वाली मुहब्बत का इजहार। ये भंगिमाएँ आकाश और हवा में चुंबन तिराने की तरह थीं जिनका कोई ग्राह्य आशिक नहीं था। खूब शायरी होती और प्रेमपीड़ा और जुदाई के गीत संगीत। हम अक्सर वे मजनूँ थे जिनकी कोई लैला नहीं थी। और अगर कहीं लैला थी, तो मजनूँ को काठ मार जाता था। यह बनावटी संसार अंतहीन था और प्रेमाशा की कोई किरण नहीं थी।
सफलताएँ कम और कभी कभी की थीं और उनके रूप थे : खामोश शरीरी टोह, अकस्मात चोरी के चुंबन, फिल्मी संवादों का आदान प्रदान और देव वरदान को तरह धधकती रति संसर्ग की एक दोपहर जो शुरू होते ही खत्म भी हो जाती, इतना तनाव और डर होता और यह हैरत कि यहाँ तक पहुँचे कैसे। यह सब नौसिखिया था और इससे कोई तैयारी संभव नहीं थी।
पर इस अकालग्रस्त, सूखे पठार में भी ओस के नन्हें चाँदी के कण थे। कम से कम एक वाक्या था, जब मैंने सचमुच पूरे संवेदन और अंतरदृष्टि से स्त्री सौंदर्य के अभिप्राय पर गहन ध्यान लगाया। कॉलेज का पहला साल था और वह मेरे क्लास में थी। आडिटोरियम की तरह इस नए क्लासरूम में छोटी ऊँचाई की सीढ़ियाँ थीं और गहराई में ढलान थी। मैं इस लड़की के दो कतार पीछे कोण में बैठता था, मेरी नजर की लकीर ऊँचाई पर थी। क्लास की मेरी सीट मेरा निजी, गुप्त प्रणय घोंसला बन गया। कोई रुकावट नहीं, पूरी तल्लीनता, मैंने करीब पाँच महीने अपनी अघोषित पर लक्षित महबूबा पर रोज कई घंटे मनन किया। जब तक मैं जान गया, जैसे वो न जानती थी, उसके गले के पिछले हिस्से की आत्मा और भाषा, उसके तनाव और नाड़ियों के जाल और उसकी छितरी लटों, नाक के झुकाव और अधर की रेखाओं में सूक्ष्म नोकझोंक... मुझे लगता है वह मनन अंत में अधूरा ही रहा और अब ब्यूटी ने उस अपूर्णता को खत्म करने के लिए मेरी जिंदगी में पदार्पण किया है। इस तरह मैंने अपनी गरीब प्रेम कहानी में पूर्व निर्धारण की अलौकिक आभा को प्रदीप्त किया। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं : कि एक दिव्य मनोवेग ने मेरे इर्दगिर्द एक प्रभामंडल रच दिया है और अब मेरा हर कथन और काज उसी के वश में है, दिव्य रोशनी से संचालित है।
कई घंटे मैं अपनी पीठ के बल ध्यानमग्न लेटा रहा। मेरे सामने एक बड़े स्क्रीन पर ब्यूटी की मेरी गढ़ी तस्वीर थी। और उसके ऊपर एक पतली फिल्म स्ट्रिप चल रही थी जिस पर दोनों नॉवल की नायिकाओं और स्त्री चरित्रों के नाम थे : पम्मी, बिनती, सुधा, गेसु... और इंग्लैंड के कठोर, निर्जन बीहड़ से आकृतियाँ : कैथरीन, उसकी भौजाई इसा बैला, बेटी केथी.. स्ट्रिप रुकी नहीं, चलती रही। मेरी प्रांजल, बहती कल्पना ने चरित्रों को चेहरे प्रदान किए थे, जो जरूर मैग्जीन, फिल्म और बिलबोर्ड की उड़ती यादों से रचे थे... सभी हवाओं से निखरे चेहरे, मैंने सोचा। मुझे लगा कि चलती स्ट्रिप पर मुझे किसी भी जगह उँगली रख देनी है और ब्यूटी वहाँ जगह पा लेगी। ऐसा करने की चाहत बहुतेरी थी पर मैं निश्चेष्ठ रहा और एक जड़, जमे उद्गार से बस देखता रहा। अजीब है पर मैं खुद को हीथक्लिफ या चंदर के रूप में कभी देख न पाया। मैं बस मैं बना रहा।
'वुदरिंग हाइट्स' के संवादों के टुकड़े बारंबार मेरा हृदय छलनी कर देते। जैसे जब कैथरीन, लिंटन से शादी का निश्चय करने के बाद, नैली (ऐलेन डीन) से अपने आकुल, धुँधले दिल का इजहार करती है... 'अगर सब खत्म हो जाता और वो (हीथक्लिफ) रहता, तो मैं फिर भी बनी रहती; और अगर बाकी सब बरकरार रहता और वह नष्ट हो जाता, तो संसार बस एक अजनबी दैत्य है... नैली, मैं हीथक्लिफ हूँ! वह हमेशा, हमेशा मेरे दिलोदिमाग में है : सुख की अनुभूति की तरह नहीं, जो उतनी ही है जो मैं खुद से पाती हूँ, बल्कि मेरा ही अस्तित्व बन कर...।'
फिर, जब कैथरीन का अंत निकट था, उसने हीथक्लिफ को बाँहों में भरा और कहा : 'काश मैं तब तक तुम्हें बाँहों में भरे रहती जब तक हम दोनों मर नहीं जाते... मेरी बस इतनी ख्वाहिश है कि हम कभी जुदा न हों; और अगर मेरे शब्द मेरे बाद तुम्हें पीड़ा दें तो सोचना कि जमीन के भीतर मैं भी वही पीड़ा सह रही हूँ, और मेरे लिए, मुझे माफ कर देना...।'
नैली एक जगह कहती हैः 'एक क्षण के लिए वे अलग रहे, और फिर वे कब पास आ गए मैं देख भी नहीं पायी, पर कैथरीन ने एक छलाँग ली थी, और उसने (हीथक्लिफ) उसे थामा और वे दोनों एक आलिंगन में जज्ब थे जिससे, मुझे लगा मेरी मालकिन कभी जिंदा रिहा नहीं होगी।'
मैंने सोचा : आलिंगन जिससे प्रेमी कभी जिंदा रिहा नहीं हो सकते! ऐसी अंगीकारता को मैं चित्रित भी नहीं कर सकता था, महसूस करना तो दूर की बात थी... सैकड़ों फिल्मों की तस्वीरें जेहन के आईने के सामने घूमती हैं... हजारों कलाकारों और तकनीशियनों की सम्मिलित मेहनत होती है, अपने दशक के श्रेष्ठतम अभिनेता, निर्देशक, संगीत, प्रकाश, परिवेश, रंग संयोजन, मिजाज, ये सब सावधानी से निर्मित, फिर दोबारा, तिबारा, अनेक बार, तब जा कर वह शॉट या फिल्म का टुकड़ा बनता है जो उस क्षणिक, कौंध से और रहस्यमय आलिंगन को पकड़ता है जिसका एकाकी वर्णन ब्रॉन्ट ने किया...।
मैं सोच रहा था, मग्न था, चाहत और आकुलता से सराबोर... और चाह रहा था पहुँचना उस उत्कर्ष पर जिसके आगे भावावेग का भी वश नहीं, वह चुक जाता है। और मेरे पास कोई नहीं था, बस ब्यूटी जिसके सहारे मैं ऐसे सपने बुन सकता था। मेरी जिंदगी में कोई नैली नहीं थी और, एक हीरो की जिंदगी की कल्पना करते हुए, मेरा अस्थिर दिल मना रहा था कि एक दिन कोई मिसेज डीन ब्यूटी और मेरे बारे में ऐसी एक कहानी कहेगी... पर अपने दिल की गहराई में मैं जानता था कि मैं हीथक्लिफ या एडगर लिन्टन नहीं हो सकता और ब्यूटी को बुदरिंग हाइट्स के भयावह बीहड़ में स्थापित करना असंभव है। प्रेम के आवेग की ऐसी ऊँचाइयाँ, सबसे ऊँचे पहाड़ों पर फैली धुंध की तरह थीं और यही वजह थी कि मैंने महान, शाश्वत प्रेम कहानियों में कभी तसल्ली या प्रेरणा नहीं तलाशी : रोमियो एंड जूलियट, शीरी फरहाद, हीर राँझा आदि।
इसलिए मैंने अपना ध्यान चंदर की अपेक्षाकृत हल्की कहानी पर केंद्रित किया जिसे भारती ने उपन्यास में गुनाहों का देवता कहा है। इतना वाजिब है और संभावनाएँ असीम। पर कहानी में असफल प्रेमोन्माद का वह प्रताप नहीं है जो दूर अतीत की घटनाओं को खँगालने और सुनाने से उत्पन्न होता है। भारती का कथानक पूरी तरह साधारण वर्तमान में स्थित है और घटनाओं के स्थान में वह कठोर उग्रता और नग्न धार नहीं है, जो बुदरिंग हाइट्स के परिवेश में था। फिर भी पाठक उन भावनाओं की चुभन महसूस करता है जो चंदर और उसके संपर्क में आई महिलाओं की जिंदगियों को घेरती है, धुँधलाती है; वे औरतें जो किसी न किसी रूप में चंदर का प्यार, उसकी अस्मिता और चाहतों को अपनाती हैं, भोगती हैं।
नॉवल पढ़ना, लेकिन, श्रेष्ठ उन्माद के सागर में तैरने जैसा है, पर भीगने के प्रति अनास्था और वितृष्णा है। मुझे यह दयापूर्ण और कायरता लगी, कि चंदर, सुधा, बिनती, गेसु और किसी स्तर पर पम्मी भी अपनी देह और शरीर की चाहतों के प्रति सहज और अनुरक्त नहीं हैं। मुझे क्षोभ था और द्वेष भी कि भारती सेक्स और दैहिक आकांक्षाओं के विचार से आतंकित से थे। यह नीरस है और प्रपंच कि भारती जी ने देह के मामले में अपनी बुजदिली से पार पाने के लिए नॉवल को प्रेम और कामना की कहानी बताने के बजाय उसे मध्यवर्गीय जीवन की कथा की संज्ञा दी। चंदर और सुधा दोनों अंत तक खुद को झुठलाते रहे कि उनका प्रेम दैहिक संबंध की अनदेखी कर आत्माओं का उच्चतर मिलन है, इस कोशिश में वे चुक गए। यह इस तरह था मानो अपनी आत्माओं को सींचने के लिए उन्हें देह की आहुति देनी थी। कथाकार और उसके चरित्र रति और संसर्ग के प्रति अपने भय से बखूबी वाकिफ हैं और यह भी कि उनका डर निर्मूल और अर्थहीन है। पम्मी के साथ शरीरी प्यार का जश्न मना कर चंदर जरूर अपने दैत्यों का संहार करने की भरसक कोशिश करता है। पर यह प्रयत्न क्षमायाचना ज्यादा थी और अपनी खुद की शर्म और दोष को ढाँपने का निरर्थक प्रयास और आखिर में वह पम्मी का इस्तेमाल ही करता है।
नॉवल में बार बार लौटता विषाद घुटन पैदा करता है। ऐंद्रिक ऊर्जा का दमन स्याह धुएँ की तरह था जिसने चंदर और उसकी औरतों के संबंधों में विष भर दिया और कथानक का स्तर एक निचले दर्जे की भावानुभूति पर आ गया, जहाँ प्रेम की असली, पूज्य ऊँचाई पाना संभव नहीं रहा।
उनका प्यार, चंदर और सुधा का, कमतर और अधूरा था। उसमें एक विलाप विराजा था, न कि प्यार की स्वर्णिम आभा। इन्सानी फितरतों की असंभव ऊँचाइयाँ पाने की अमानवीय प्यास में वे अपनी जिंदगी के जीने में बौने हो गए थे।
फिर भी सब खोया नहीं था। उनके नि:स्वार्थ कृत्यों में काफी कुछ प्रशंसनीय था : उनका समर्पण और निष्ठा; उनकी पीड़ा और त्याग; संशय और ईमानदार नाराजगियाँ; उनकी विफलताएँ और कमियाँ; और कैसे उन्होंने अपनी सहनशक्ति को सदा चुनौती दी ताकि वे प्रेम के उस अनुपम स्वप्न को पा सकें, जो हर प्रेम के आगे है...।
इसलिए कहानी ने मुझे छुआ भी, और जुगुप्सा भी जगाई। एक तरफ समृद्ध महसूस करने का जज्बा था, वहीं लुटने का भी आभास। यही भावनाएँ बनी रहीं बल्कि आगे पुख्ता हुईं जब मैंने और भारतीय प्रेमकथाएँ पढ़ीं। कुछ कथाकार मुझे याद हैं, कुछ नहीं। लगभग सभी प्यार की जगह प्यार के रूपकों में आश्रय पाते प्रतीत हुए : अकेलापन और अभाव; घोर उदासी; खोई राहों को पाने की ललक; चाहतें जो पूरी न हो सकीं... वह साँड़ जिसके सींग पकड़ने से वे डरते थे, वह था इंद्रियों की इच्छाएँ, और उसका सीधा स्वरूप : संसर्ग, रति, काम संगीत। यह मनाही और अनिच्छा उन्हें साँड़ को काबू करने के लिए बेवजह के उपायों की ओर ले जाती। इसलिए ऐसी प्रेमकथाओं में व्यंग्य और हास्य का पर्याप्त प्रसाद है; विडंबना और सूखे मजाक का। कोशिश यह कि शरीरी गंध, गुंथन, जलन और ज्वाला और उनके वैभव से किसी तरह ध्यान हटे और इस, अगर निचली नहीं तो, नीचे की हरकत को हम किसी उच्च और श्रेष्ठ स्तर से देखें - जरूर प्रेम और उसकी अभिव्यक्तियों की तरफ संवेदनशील, सावधान और सर्वज्ञानी। यह रोग काफी फैला है। मुझे याद है जब हम कॉलेज में थे, टीनेजर थे, हमारे दो चेहरे थे : एक सेक्स और लड़कियों के बारे में खराब से खराब, खूब से खूब जानता और बतियाता और दूसरा अचंभित चेहरा यह मानने को तैयार नहीं कि भले, परिचित आदमी और औरत, जो शादीशुदा नहीं, वे आपस में स्पर्श या आलिंगन भी कर सकें। यह अब एक परिकथा लगती है पर एक वक्त था जब हमने अपने कस्बे में उन तकनीकों का अनावरण किया जिनके इस्तेमाल से (हमारे अनुसार) फिल्मों में नायक और नायिकाओं को अद्भुत और उत्तेजक नजदीकियों में आलिंगनबद्ध दिखाया जाता था। मूल धारणा यह थी कि हीरो हीरोइन चूँकि हमारी तरह पाक हैं, एक दूसरे को वास्तव में छूते तक नहीं, यह बस फिल्म का कमाल है। हमने बेहद सजीव और आश्चर्यजनक विस्तार से यह बताया किस तरह कैमरा एक के बाद एक हजारों शॉट लेता है ज्यों नायक और नायिका एक दूसरे के निकट आते हैं, यह नाटक है, सच्चाई नहीं, वे एक दूसरे को कभी स्पर्श नहीं करते (यह घिनौना है, पाप है) वे एक दूसरे से मात्रा मिलीमीटर दूर हो सकते हैं, उनके होंठ, बाँहें, सीने और जाँघें, पर वह दरार जितनी दूरी अमिट है। यह फर्क करता है कोरे घिनौने सेक्स को और उसके पाक प्रस्तुतिकरण को। और फिर, हमारा विज्ञान की भाषा से परिपूर्ण आख्यान कहता है कि कैमरा एक तेज स्पीड पर चलता है जिससे आलिंगन या चुंबन का दृष्टिभ्रम पैदा होता है। हमारी विवेकपूर्ण लज्जा इस तरह संतोष पाती है। इसलिए जब हम फिल्म स्क्रीन पर कोई उत्तेजक, काम दृश्य देखते हैं, वह, वस्तुगत रूप में, काम दृश्य नहीं है। इस तरह हमारा कौमार्य गुजरा था...।
मैं खुद को चंदर के रूप में नहीं देख पाता था। न कि ब्यूटी का नाम सुधा, बिनती, पम्मी या गेसु है। मैं न खुद को गुनाहगार मान सकता था न देवता। मेरी इच्छा थी मैं आईने में देखूँ और फुसफुसाऊँ : महबूब!
बाद में, सालों में, मैंने अक्सर सोचा वह कौन सी ऊर्जा थी जिसने मेरे भीतर ऐसा आवेग, इतनी कल्पनाएँ पैदा कर दीं। मुझे याद है उन दिनों एक व्यक्ति ने अखबार में इंटरव्यू दिया था कि फिदेल कास्त्रो ने अपनी तब तक की जिंदगी में करीब 35000 औरतों से सेक्स संबंध बनाए। मेरे कम्युनिस्ट दिनों में कास्त्रो हमारा नायक, हमारा ईशू था। बाद में मैं सिमीनोन नाम के एक फ्रांसीसी लेखक का समर्पित फैन हो गया। सिमीनोन इतना प्रसिद्ध नहीं पर उसकी एक कल्ट है। वह अद्भुत, वातावरणीय, रहस्यमय उपन्यास लिखता था। अपराध और असामान्य के मनोविज्ञान का वह पारखी था। उसके लेखन की ताकत अद्वितीय थी और अपनी जिंदगी में उसने 200 से ज्यादा नॉवल लिखे। और माना जाता है कि 10,000 से अधिक महिलाओं के साथ सेक्स संबंध किए! अक्सर, लिखते हुए वह वाक्य के बीच में रुक जाता, उसे अधूरा छोड़ वह किसी प्रेमिका के साथ दोपहर बिताने चला जाता। उसे वरदान था। उसके लिए लेखन और रतिक्रिया में मूल फरक नहीं था। वे पूरक थे। अगर बाद में मेरी कोई अभिलाषा रही तो यही थी कि मैं सिमीनोन की तरह एक सौंवा जीवन भी जी सकूँ।
सिर्फ इतना : लेखन और प्यार।
जिन दगाबाज राहों में मैं अपनी राह काटने की कोशिश कर रहा था, मेरे अतीत ने मुझे उसके लिए कतई तैयार नहीं किया था। यूँ नहीं कि मैं कोरी स्लेट था या भोला कुमार। पर मेरे तजुर्बे का सागर उथला था, उसमें गहराई और लहरें नहीं थीं। इस मामले में जो मेरी सीवी थी, वह एक छोटे कस्बे की सीमित संभावनाओं से आबद्ध और परिभाषित थी। मैं मानता हूँ कि प्रेम और रतिराग का संसार शहर की किस्म से स्वतंत्र है और वह सदा घना और विस्तृत होता है पर मैं उसका भाग कभी बन नहीं पाया।
अनुभव के लिहाज से वही परिचित आहें थीं, जानलेवा नजरे इनायत, प्रेम के झूठे अफसाने और प्रेमिकाओं पर घोषित पर न पूरे होने वाले अधिकार। इश्क के विषय पर मर्द दोस्तों के बीच गर्म जोश और तीक्ष्ण वाद विवाद थे और औरत जात के लिए अथक, न मिटने वाली मुहब्बत का इजहार। ये भंगिमाएँ आकाश और हवा में चुंबन तिराने की तरह थीं जिनका कोई ग्राह्य आशिक नहीं था। खूब शायरी होती और प्रेमपीड़ा और जुदाई के गीत संगीत। हम अक्सर वे मजनूँ थे जिनकी कोई लैला नहीं थी। और अगर कहीं लैला थी, तो मजनूँ को काठ मार जाता था। यह बनावटी संसार अंतहीन था और प्रेमाशा की कोई किरण नहीं थी।
सफलताएँ कम और कभी कभी की थीं और उनके रूप थे : खामोश शरीरी टोह, अकस्मात चोरी के चुंबन, फिल्मी संवादों का आदान प्रदान और देव वरदान को तरह धधकती रति संसर्ग की एक दोपहर जो शुरू होते ही खत्म भी हो जाती, इतना तनाव और डर होता और यह हैरत कि यहाँ तक पहुँचे कैसे। यह सब नौसिखिया था और इससे कोई तैयारी संभव नहीं थी।
पर इस अकालग्रस्त, सूखे पठार में भी ओस के नन्हें चाँदी के कण थे। कम से कम एक वाक्या था, जब मैंने सचमुच पूरे संवेदन और अंतरदृष्टि से स्त्री सौंदर्य के अभिप्राय पर गहन ध्यान लगाया। कॉलेज का पहला साल था और वह मेरे क्लास में थी। आडिटोरियम की तरह इस नए क्लासरूम में छोटी ऊँचाई की सीढ़ियाँ थीं और गहराई में ढलान थी। मैं इस लड़की के दो कतार पीछे कोण में बैठता था, मेरी नजर की लकीर ऊँचाई पर थी। क्लास की मेरी सीट मेरा निजी, गुप्त प्रणय घोंसला बन गया। कोई रुकावट नहीं, पूरी तल्लीनता, मैंने करीब पाँच महीने अपनी अघोषित पर लक्षित महबूबा पर रोज कई घंटे मनन किया। जब तक मैं जान गया, जैसे वो न जानती थी, उसके गले के पिछले हिस्से की आत्मा और भाषा, उसके तनाव और नाड़ियों के जाल और उसकी छितरी लटों, नाक के झुकाव और अधर की रेखाओं में सूक्ष्म नोकझोंक... मुझे लगता है वह मनन अंत में अधूरा ही रहा और अब ब्यूटी ने उस अपूर्णता को खत्म करने के लिए मेरी जिंदगी में पदार्पण किया है। इस तरह मैंने अपनी गरीब प्रेम कहानी में पूर्व निर्धारण की अलौकिक आभा को प्रदीप्त किया। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं : कि एक दिव्य मनोवेग ने मेरे इर्दगिर्द एक प्रभामंडल रच दिया है और अब मेरा हर कथन और काज उसी के वश में है, दिव्य रोशनी से संचालित है।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
