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कहानीकार
#7
परछाईं लंबी और करीब करीब स्थूल थी और मेरी नजर एक अजीब सी उतावली के साथ उससे बँध गई। मेरी कोशिशों के बावजूद मुझे आकृति के पैर दिखाई नहीं दे रहे थे, नतीजा यह था कि वह छत पर बिना किसी यत्न के तैरती सी दिख रही थी। दो बार उस परछाईं ने छत की लंबाई पूरी की, एक छोर से दूसरे और वापस। अब तक वह सिर्फ आकृति थी, एक ठोस स्याह मौजूदगी जिसका वजूद सिर्फ यही था : एक गतिमान पुंज या आकार। फिर वह छत के मेरी तरफ के हिस्से के पास आ कर रुकी। उसकी दिशा मुझसे नब्बे डिग्री के कोण में थी। पहली बार मैंने हाथ देखे जो उसने मुँडेर पर टिकाए थे।

परछाईं की रेखाकृति में एक कठिन, यत्नशील उभार था जो किसी धड़कन से प्रेरित लग रहा था। वे वक्ष थे, मैंने उतनी दूरी से तत्काल भाँप लिया। छाया एक औरत थी। इस पहचान से मेरे भीतर खोज का एक अजीब सा पूर्वबोध जागृत हुआ। मानो, आकाशीय मूर्तिकार की तरह मैंने मात्र हल्के स्पर्श से एक औरत प्रतिमा में जान फूँक दी है।

अगले क्षण को अगर चमत्कार नहीं तो मैं अनुभूति के उत्कर्ष की संज्ञा देता हूँ। अकारण, अचानक, समूची प्रकृति इस नियम विरोध से स्तब्ध, बिजली की एक तीव्र रेखा चमकी क्षितिज से क्षितिज को काटती, और फिर, बाद में मैंने याद किया, बादल तक नहीं गरजे। क्षण भर का जगत प्रकाश : छाया एकाएक आलोकित हुई और फिर अंधकार में डूब गई। एक तस्वीर, एक उद्बोध हमेशा के लिए कैद हो गया। दो पैने नेत्र मुझे देख रहे थे, मैंने उन्हें देखा और उस क्षण ने हमें एक परस्पर, अटूट संज्ञान में बाँध लिया। पूरी तरह गुमनाम आजादी से आत्मस्वीकृति से लैस पहचान की क्षण भर की यात्रा, और यह असमय कड़की बिजली की देन थी!

भाव के उछाल से मैं काँप गया था पर लौटे अँधेरे ने मुझे संयत किया। जिस चेहरे की धवल तस्वीर मेरी आँखों में बनी वह पार्श्व में था : कील के रत्न से पुलकित तीखी नाक; खिंची गर्दन; होंठ की थिरकन और खुले बेकाबू बालों का नृत्य। मुझे अहसास रहा कि उसने हल्के रंग की पारभासी नाइटी पहनी थी और ऊपर फड़फड़ाता गाउन जिसके बटन खुले थे।

मैंने समझा था कि छाया अपने घर के परिचित नियमों में लौट जाएगी और मैं भी सीढ़ी उतर कर अपने खाली बिस्तर में नींद का इंतजार करूँगा, रोजमर्रा का अपना लगाव और सुकून है। पर अँधेरे ने हमें फिर आजाद कर दिया था। छाया आकृति अब छत के पिछले छोर पर पहुँच गई। मैं अपनी जगह बना रहा। हम एक दिशा में देख रहे थे, उसकी पीठ मेरी ओर थी।

मुझे शक नहीं कि उन मिनटों में, उस संजीदे मौन में जिसका सृजन सिर्फ प्रकृति कर सकती है, हम, चंद लम्हों के लिए ही सही, एक अचेतन पर साझा नियति की डोर में बँध गए थे। एक ही सोच हमारी सोच थी; एक ही स्वर हमारे अंतर्मन में गूँजा था; एक ही भावनाओं के ज्वार ने हमें भिगोया था; चाहत और उत्कंठा की घनी चादर ने हमें लपेट लिया था जिसका अभी न नाम था न गंतव्य... हम वही चाँद देख रहे थे और वही रहस्य महसूस कर रहे थे। एक समान रास्ता हमारे सामने खुला था और प्रत्याशा की बर्फ ने हमें निश्चल कर दिया था। पर यह आभास दूर नहीं था कि अगर साहस है तो हम किसी भी दिशा में उड़ सकते हैं... जिस चाँदी की नदी में हम तैर रहे थे उसका उद्गम नहीं था। अचानक एक पक्षी जो अपने झुंड से बिछड़ गया था, वह आकाश में बड़ी तेजी से ऊपर उड़ा, फिर उसने नीचे की ओर गोता लगाया, हताशा और बिछोह से भरा उसका स्वर पक्षी के ओझल हो जाने के बाद तक हवा में तिरता रहा।

परछाईं लौट गई थी, मैंने उसे जाते हुए नहीं देखा। मैं नीचे आ गया। मेरा जेहन प्रदीप्त था, मैंने लिखा : वही जो आपने अभी पढ़ा है।

मैं थोड़ी देर टेबिल के सामने बैठा रहा। लिखे को दोबारा पढ़ने में एक अजबनियत का सुकून था, मानो जो मैं पढ़ रहा हूँ किसी और ने रचा है और जो हो रहा है वह किसी दूसरे के साथ... झूला तो रुक जाता है पर मस्तिष्क उसकी गति ले कर खुद झूलने लगता है। ऐसा ही मेरे साथ हो रहा था, मन का झूला इस ज्ञान से आसक्त था कि आखिर रचयिता मैं ही हूँ और घटना का पात्र भी।

ऐसे छितरे पहलुओं को समेटने में अच्छा संतोष था : जैसे माँ की गोद में जुड़वाँ, दोनों एक से मगर फिर भी अलग, जो महसूस होता है पर बयान के परे है।

पर इस सबके बावजूद कोरा यथार्थ कहता है मैंने एक छाया देखी थी। फिर था : असमय बिजली का कड़कना, नजर का मिलना और क्षणिक स्तब्धता, एक पक्षी की बिछोह भरी चीख।

और इन घटना घटकों से एक कथा प्रकट होती है जिसकी संभावनाएँ अपरिमित हैं। अपने कंधे के बोझ के प्रति मुझे आभार व्यक्त करने का मन किया।

जब मैं छोटा था, जिस पत्रिका का मैं बेसब्री से इंतजार करता था वह थी चंदामामा। उसके पहले कुछ पन्ने मुझे खूब याद रहे हैं : बेताल की कथाएँ। कहानी के साथ हमेशा एक तस्वीर होती थी : राजा के कंधे पर चिपका बेताल जिसे वह सदा ढोने के लिए अभिशप्त था (सही या गलत, यही मेरी याद है) राजा के अनवरत बोझ और थकान को कम करने के लिए बेताल उसे कहानियाँ सुनाता जिनकी गिनती अनंत थी, हर कहानी के पीछे एक सीख या चेतावनी... यह बेताल पतला, क्षीण सा, पगला सा था, रूखे लंबे धवल बाल उसके कंधे तक बिखरे रहते।

यह तस्वीर मेरी पीठ पर लदे लेखक को एक ठोस रूप प्रदान करती है। उसे एक नाम देने की तीखी ख्वाहिश मेरे मन में उठी। नाम जो छोटा हो, मेरा दिया और मेरा भेद। ऐसे मौकों पर मेरे जैसे भावी लेखक अपने प्रिय कथाकारों की ओर रुख करते हैं। मेरे जेहन में काफ्का की दस्तक थी जिसने अपनी कितनी ही अभूतपूर्व कृतियों में शहर और पात्र के लिए 'के' अक्षर का इस्तेमाल किया... भाग्यवश 'क' से कथाकार भी है।

सो इस रात यह सहमति हुई कि 'क' मेरे कंधे पर जुटा है : वह जो मुझसे पहले चीजें देख लेता है और मुझसे आगे।

'क' है जो अधिक देखता है, अधिक जानता है, जो मुझे पुकारता है और मेरे कानों में अनोखे भेद फुसफुसाता है। मैं मानता हूँ उसका भरोसा करना मेरी खुशी है और उसके बताए पदचिह्नों पर चलना : उस दिन तक जब वो मैं होगा और मैं वो।

आखिर मैं लेट गया हूँ, चादर ने मुझे ओढ़ लिया है। नींद दूर है। मुझे इत्मीनान है 'क' आराम कर रहा है। वह मेरे बाल सहलाता है और विश्वास दिला रहा है मैं सही दिशा पर हूँ। नींद गहरी और बेरोक रही। सपनों में परछाईं का हस्तक्षेप नहीं है, अभी तो नहीं।

मेरी माँ विश्वास नहीं करेगी पर सुबह जल्दी उठने के लिए मुझे अलार्म घड़ी की जरूरत नहीं पड़ती। भोर में छः बजे मेरी आँख खुद ब खुद खुल जाती है : एक ताजा पंखुरी की तरह, मुझे लगता है और इसमें कोई अति नहीं। सबसे पहले मैं नीचे मुख्य द्वार जाता हूँ और जमीन पर बिछे दो अखबार उठाता हूँ : चिकने, सफेद, एक खास किस्म की गंध जिसके केंद्र में एक भली चाक्षुक उत्सुकता है। चाय बना कर मैं बिस्तर पर बैठता हूँ। एक स्वस्थ भूख के साथ मैं अखबार खोलता हूँ और मेरे जेहन में लगातार यह फुरफुरा बोध है कि मेरे हिस्से में खूब समय है और इसे किसी कीमत पर मैं खोने को तैयार नहीं। मैं इतना आरामदेह और तृप्त महसूस करता हूँ कि मन करता है समय और धीरे गुजरे। अगर वक्त ठहर भी जाता तो मैं और खुश होता।

आज भी वैसा ही मन है और मैंने खूब शौक से चाय का दूसरा प्याला बनाया। अखबार पन्ने दर पन्ने पढ़ लिए थे। फिर मानो एक जज्बाती लत की तरह मैं स्मृतियों का आखेट करने लगा, उस तरह जैसे आलसपन में लोग पैर के अँगूठों से खेलते हैं : अपने भाग्य के घोड़ों की सरपट, अनोखी दौड़ पर मेरा गहरा आश्चर्य बरकरार है। मेरी स्थिति अकल्पनीय है - मैं इस बड़े घर में अकेला रह रहा हूँ, सारी सुविधाओं का इंतजाम है, राजधानी में न मुझ पर किराए की मार है न फुटकर खर्चों की। एक मध्य आकार की कंपनी (वह तमाम धातुओं के तमाम प्रोडक्ट बनाती है जिनके गजब के रागमय और रहस्यमय नाम हैं) ने मुझे मार्केटिंग अफसर का पद दिया है। कंपनी ने मुझे पचास हजार रुपए का कैश रीटेनर एडवांस दिया है और मुझे तीन महीने बाद ज्वाइन करने के लिए कहा है। तनखा, पर्क और कमीशन की दरें मेरी आशाओं से बहुत ऊपर है। इस तरह मेरे पास नौकरी के अलावा जेब में पचास हजार रुपए हैं और तीन खाली महीने, मैं जो चाहे करूँ और भरूँ। यह कैसे हो गया जबकि मात्र एक महीने पहले मैं बंद और अँधेरी गलियों और रास्तों के दुखद और भयानक सपने देख रहा था।

मेरे पिता कॉलेज में अध्यापक हैं, उन्होंने एक रोज मुझ पर उँगली तानी और निश्चयात्मक स्वर में ताकीद दी : बुरे से बुरे की कल्पना करो और तदनुसार खुद को तैयार करो। नहीं तो जिंदगी हमेशा दगा देगी। पिता कयामत के हिमायती कतई नहीं थे और न जिंदगी की ओर निर्मोही। पर इस दफा वे शायद अपनी उँगली नीचे लाना भूल गए थे। इस तरह मैं बचपन से जवानी के दिनों तक उठी उँगली के आतंक से किसी न किसी तरह उलझा रहा। आतंक उतना नहीं जितना एक हल्के नकारवादी अंदाज की ओर झुकाव : आधा खाली गिलास दिखता बनिस्बत आधा भरे के। माँ मुझे खूब खिलाती, दुलार से बिगाड़ती पर इस उलझे सवाल से उसने खुद को दूर रखा। इस तरह पराजय या बदकिस्मती का भय कभी हटा नहीं सिवाय उन अस्थायी मौकों के जब मैंने खुद को वैचारिक संघर्ष के उदान घमासान में डुबोया। तब जोखिम और लापरवाही में बलिदान के चार चाँद लग जाते। किसी तरह के मतवाद और मार्क्स, लेनिन के समेकित ग्रंथों के पठन पाठन से ज्यादा जोखिम से खेलने की यह शुद्ध उन्मुक्ति थी जिसकी वजह से कॉलेज में दाखिला लेने के बाद मैं मुस्तैदी से लाल झंडा छात्र संगठन के संघर्षों में कूद गया। आज भी मैं मानता हूँ वह समय बेकार नहीं गया। यूनियन के चुनाव, हड़ताल, सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन, न्यूनतम मजदूरी और जमीनी हक के लिए जनसंघर्ष और राज्य के दमनकारी ढाँचे और इलीट वर्ग की लुंपेन सेना के खिलाफ जंग : इन सब में मैंने पूरे मनोयोग से हिस्सा लिया। यह एक तरह से वरदान ही था कि जरूरी अनुभव के इस क्रम को मैंने फटाफट पूरा कर लिया। क्रांतिकारिता के इस छोटे मगर प्रबल दौर ने मुझे मूलभूत तरीके से आजाद कर दिया और वह मानसिक राह साफ की जिस पर सभ्य धूर्तता और छिपी खुदगर्जी से चलते हुए मैं मध्य वर्ग के स्वप्न साकार करने की ओर कदम बढ़ा सकता हूँ। ग्लानि, क्षोभ, अपराध भाव और नपुंसक युवाकाल की कोई दरकार नहीं।

मेरी चेतना पर जितने लाल निशान थे उनसे रुखसत होने के बाद मैंने एम.ए. खत्म किया और फिर बेफोकस, नौसिखिया आँखों से मैं लंबी चौड़ी दुनिया को देखने लगा। मेरे कस्बे का यह संत्रास था या कहें लाइलाज बदकिस्मती थी कि वह उच्च आकांक्षाओं के लायक बड़ा नहीं था और लालसाओं पर सीमा की पाबंदी लगाने के लिए उतना छोटा भी नहीं। पिसने और कुटने के लिए बीच की अवस्था सबसे उपयुक्त है। मेरी किस्मत ठीक थी कि स्थानीय अखबार के संपादक से मेरी दोस्ती हो गई। न जाने क्यों मैं उसे पसंद था। उसने मुझे विश्व साहित्य की उत्प्रेरक और जादुई दुनिया से परिचित कराया। संपादक मित्र के अखबार में मैं रिपोर्टर हो गया। इस तरह मेरे चार कामकाजी, कुँवारे साल निकले। माँ बाप के साथ रहने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मैं धीरे धीरे कस्बे के 'बीचपन' का ग्रास बन रहा था।

इसे करतब ही मानें कि मैंने ऐसी कंपनी में नौकरी के लिए अप्लाई किया जिसके बारे में मेरी जानकारी करीबन शून्य थी। और ऐसे पद पर जिसके लिए न मेरे पास ठीक अर्हता थी न ढंग का अनुभव। शायद मेरा क्षणिक बहकावा या ठसक थी क्योंकि कई दिन से अखबार, पत्रिका गा रहे थे कि भारत अवसरों की नायाब खान है; देश की कहानी हिट है; शीर्ष और शिखर की ओर मदमस्त चलता भारत का हाथी! इन शब्दों ने शायद मेरे भीतर कुछ ऊर्जा जगाई। फिर वेब का अजब सा सम्मोहन था। जिसकी वेबसाइट है वह बेहतर है, ऐसी मानसिकता। फिर कंपनी की वेबसाइट पर जो मार्गदर्शक सिद्धांत थे उनसे मैं आकृष्ट हुआ। लिखा था -

हमारे लिए : अच्छा वह है जो अच्छा है;

गुण वह है जो गुण है;

खराब वह है जो खराब है;

हमारी कंपनी के तानेबाने में अगर और मगर के लिए कोई जगह नहीं। नौकरी ऑफर करते हुए कंपनी के एम डी ने मुझमें आखिर क्या देखा, इसका मुझे रत्ती भर इल्म नहीं। इसके ऊपर रीटेनरशिप का कैश... इंटरव्यू के दौरान मैं साफ और सीधा बोला था। हो सकता है वह मेरी छात्र यूनियन की उग्र कारस्तानियों और दुस्साहस से उत्साहित हो गया हो : उत्साह और आशंका का पितृभाव एक ही होता है। तुमने अगर यह सब किया जो तुम कह रहे हो तुमने किया तो तुम मेरे आदमी हो, एम डी ने कहा। हमें अपने प्रोडक्ट के लिए देश के कस्बों, गाँवों को भेदना है। उसके लिए गुर्दा चाहिए। और हमारे लिए, एम डी एक क्षण के लिए रुका, गुर्दा वाला वह है जिसके पास गुर्दा है! कंपनी में तुम्हारा स्वागत है बंधु।

इस अनोखे घटनाक्रम से चकित और प्रफुल्लित, मैं अपने मामा मामी के घर लौटा जहाँ मैं रात बिता रहा था। उन्हें यह खुशखबरी दी। मामा जितने खुश हुए आम तौर पर दूर के रिश्ते के मामा नहीं होते।

मामा लगभग कूदे और मुझे गले लगा लिया। फिर उन्होंने कहा तुमने चमत्कार कर दिया बेटा। ऐसी दिक्कत का समाधान कर दिया जिसका कोई समाधान नहीं था। मैं मूर्ख सा उन्हें देखने लगा सो उन्होंने समझाया। बात यह थी कि मामा मामी की कई बरस से तमन्ना थी कि वे अमरीका में अपनी बेटी के पास जाएँ और वहाँ आराम से छह सात महीने रहें। पर घर की देखभाल और सुरक्षा की ऐसी समस्या थी जिसका तोड़ नहीं मिल रहा था। घर की सुरक्षा को ले कर उनकी चिंता और बढ़ गई जब उनके एक पड़ोसी के साथ हादसा हो गया। उन्होंने अपना घर लॉक किया था और विदेश चले गए। उनकी गैरमौजूदगी में फर्जी कागजों के सहारे और कोर्ट का आदेश ले कर कुछ अवांछित लोगों ने घर पर कब्जा कर लिया। अब वे बेचारे बेघर थे... मामा मामी के लिए मैं अचूक समाधान था।

तुम यहाँ छह महीने आराम से रहो, मामा ने गद्गद् हो कर रहा। घर के मालिक की तरह। यह घर तुम्हारा है। तुम्हें कुछ नहीं करना है। खाने पीने, बाकी जरूरी चीजों का पूरा इंतजाम है। एक कार है जिसे तुम्हें चलाना ही होगा। रोजमर्रा के काम रमाबाई कर देगी, खाना, धोना, सफाई, बरतन सब कुछ। बिल और खर्चे की कोई चिंता नहीं, ज्यादातर ई पेमेंट पर है या भरपूर क्रेडिट है।

मुझे लगा गश आ रहा है, मामा जिस तस्वीर का चित्रण कर रहे थे वह विश्वास के परे लग रही थी : इतनी सुविधा, इतना आसान! बाद में रात को मामा ने मुझे पूरे घर का विस्तृत दर्शन कराया, सारी चीजें समझाईं जो हर घर का रहस्य होती हैं : बिजली, पावर के स्विच, एसी के कनेक्शन, गैस, केबिल और इंटरनेट, वाशिंग मशीन, इनवर्टर आदि। मामा ने मुझे एक शीट दी जिस पर तमाम फोन नंबर थे : जनरल प्रोविजन स्टोर, किराए पर डी वी डी की होम डिलिवरी, रेस्तराँ वगैरह। समझ लो ये सब तुम्हारे आशिक हैं, जैसे चाहो नचाओ, मामा ने मजाक किया (मैं एकाएक चौंक गया था क्योंकि मामा के बारे में हमारे घर में धारणाएँ एकदम अलग थीं : नकचढ़े, कठोर, निर्दयी, हमेशा गुप्पा) और मुझे ग्राउंड फ्लोर पर एक अलग कमरे में ले गए जो आँगन के दूसरी ओर और अकेला था। मामा ने लाइटें जलाईं और मैं अचंभित रह गया : एक बेहद खूबसूरत ढंग से सजी लाइब्रेरी और स्टडी थी। वहाँ दो आराम कुर्सियाँ थीं, एक पूफ, एक सोफा कम बेड, एक पुरानी और भव्य स्टडी टेबिल जो अमूमन मैंने फिल्मों में देखी थी और छत तक ऊँचे लकड़ी के खुले शेल्फ जिनमें किताबें ही किताबें थीं। इसके पहले सबसे उम्दा लाइब्रेरी मैंने अपने संपादक के घर देखी थी जो जर्जर थी और मामा की लाइब्रेरी के मुकाबले एक बटा दस।

मेरा खुला मुँह देख कर मामा मुस्कराए। किताबों से प्यार है, उन्होंने दुलार से पूछा। उनकी महक से और भी ज्यादा, मैंने कहा और यह सच था। अब तक का मेरा जीवन ऐसा था कि मैंने खुद चार या पाँच किताबें खरीदी होंगी। पर उन्हें मैंने सदा सीने से लगा कर रखा। रेणु की प्रतिनिधि कहानियों के अलावा एक चेखव की कहानियों का संकलन था और एक पुराना, मोटा जिल्द संकलन : विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रेमकथाएँ। उस वक्त साहित्य मेरी प्रिय उधेड़बुन थी ओर फिर दर्शन पर कुछ किताबें जो मेरे संपादक ने मुझे पढ़ने के लिए दी थीं। इधर मैं हिंदी साहित्य की तरफ थोड़ा खुश्क हो गया था। वजह शायद वे कस्बाई लेखक थे जिनसे मेरी मुलाकात संपादक महोदय के कमरे में होती। उन सभी के दाँत खराब थे और उनसे एक थकी गंध आती थी। मेरी हैरत यह भी थी कि बेहद शराब पीने के बाद भी वे थोड़ी और पीने को तैयार रहते।

मामा पीछे थे और मैंने किताबों के शेल्फ का जायजा लिया। बहुतेरे जिल्दबंद संकलन थे। और खुशी की बात, दुनिया भर का बहुतेरा साहित्य। आपकी साहित्य में खास रुचि है, मैंने अचकचा कर कहा। मामा जैसे लोग भी साहित्य पढ़ते हैं, यह मेरे लिए सूचना थी। अपनी बची उम्र के लिए इकट्ठा किया है, मामा ने मीठी आवाज में कहा। किताबें बदले में कुछ नहीं माँगती। पता है, मैं रोज बिना नागा पाँच पन्ने पढ़ता हूँ, न कम न ज्यादा। अगर मैं बीस बरस और जिंदा रहा तो 20 x 365 x 5 = 36500 पन्ने पढ़ लूँगा। इतना बहुत है। मैं अचकचा गया। पढ़ने के बारे में मैंने इस तरह कभी नहीं सोचा था।

एक दिन मैंने मामा मामी को एयरपोर्ट पर विदा किया। मामा का छलकता, गद्गद् अनुराग और मेरे भीतर खामोश खुशी की उमंग। मामा की आँखें चमक रहीं थीं। अब मुझे कोई चिंता नहीं, मामा ने कहा। मैंने मामा मामी के पैर छुए। अपना आशीर्वाद दे कर वे अमरीका चले गए।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी  हम अकेले हैं.



thanks
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कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 11:29 AM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 03:57 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 03:58 PM
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RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:02 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:03 PM
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RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:04 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:04 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:04 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:05 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:05 PM
RE: कहानीकार - by neerathemall - 03-12-2019, 04:12 PM
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RE: कहानीकार - by neerathemall - 31-01-2022, 04:55 PM
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