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खत पढ़ते पढ़ते कुशल, कितनी देर तक हँसता रहा था। तृप्ता ने वही बातें लिखीं थीं, जो कभी-कभी भावुक हो कर उससे भी किया करती है। सोम के खत पढ़ कर तो हँसी से लोटपोट हो गया था। सोम की शक्ल देख कर तो अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि वह इतना भावुक हो सकता है और हिज्जों की इतनी गलतियाँ कर सकता है। इस बार जब सोम आया था तो उसने थोड़ी-थोड़ी मूँछें भी बढ़ायी हुई थीं। कुशल को यह बात बड़ी अजीब लगी कि मूँछें बढ़ा कर भी आदमी भावुक हो सकता है। मूँछों वाला भावुक! शाम को जब तृप्ता बाजार से लौटी तो उसने कहा, 'तृप्ता, तुम तीस बरस की कब होगी?' 'क्यों आप मूझे बूढ़ी देखना चाहते हैं?'
'नहीं बूढ़ी नहीं, लेकिन बच्ची भी नहीं। काश! तुम तीस साल की होती।' कुशल हँस पड़ा था। कुशल गुसलखाने से लौटा तो कमरे का रूप एकदम बदला हुआ था। खाट, जो इससे पहले कमरे के ठीक बीच पड़ी थी, अब दूसरे कमरे में खुलने वाले दरवाजे़ के साथ टिका दी गयी था। और उस पर अंगूरी रंग की एक नयी शीट बिछी थी। खाट के साथ ही दीवार की बगल में तृप्ता का ट्रंक पड़ा था, जिस पर उसी द्वारा काढ़ा हुआ एक सुन्दर मेजपोश बिछा था और जिसके ऊपर बैठी तृप्ता क्रोशिए से कुछ बुन रही थी। उसने आँखों में काजल की गहरी लकीरें खींच ली थीं। होंठ लिपिस्टिक के हल्के-से स्पर्श से किरमिजी हो गये थे।
कुशल ने यह परिवर्तन देखा तो, मुस्करा दिया। उसे मुस्कराते देख कर तृप्ता ने पूछा, 'आप मुस्करा क्यों रहे हैं?' तृप्ता क्रोशिए से पीठ खुजलाने लगी, जिससे उसका ब्लाउज कंधे के नीचे से गुब्बारे सा फूल गया था। कुशल के मन में क्षण भर के लिए यह विचार आया कि वह बाहर का दरवाजा बन्द कर आये, परन्तु स्नान करने से उसकी पिण्डलियों को थोड़ा-सा सुकून मिला था, जिसे वह कुछ देर और कायम रखना चाहता था। उसने सर पर कंघी फेरते हुए कहा, 'तुम कहती हो तो नहीं मुस्कराता।' 'आप कुछ सोच रहे हैं।' तृप्ता क्रोशिए पर दृष्टि गड़ा कर बोली, 'क्या सोच रहे हैं?' कुशल ने कुछ सोचने की कोशिश की और
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कल्पित प्रेमिका का पुराना किस्सा ले बैठा, बोला 'दरअसल मुझे शीला याद आ रही थी। जब मैं हँसता था, तो वह भी तुम्हारी तरह टोक देती थी। जब मैं सिगरेट पीता था, वह मुझसे दूर जा बैठती थी। जब कभी उसके घर जाता तो नौकर को भेज कर सिगरेट मँगवा देती। अजीब लड़की थी शीला....।' कुशल ने सिगरेट सुलगाया और खाली पैकेट नाटकीय अंदाज में दूर फेंक दिया। तृप्ता ने क्रोशिए से आँखें नहीं उठायीं। कुशल ने तृप्ता को लक्षित करके धुएँ का एक गहरा बादल उसकी ओर फेंका। उसे आशा थी कि ताजी लिपिस्टिक पर थोड़ा-सा धुआँ जरूर जम जायेगा। अपनी बात का प्रभाव न होते देख उसने बात आगे
बढ़ायी कि कैसे वह शीला के साथ पिकनिक पर जाया करता था। और... 'बस... बस मैं और नहीं सुनूँगी।' तृप्ता ने क्रोशिये से आँखें उठा कर कुशल की ओर अविश्वासपूर्वक देखते हुए कहा, 'आप मेरा बेवकूफ बना रहे हैं।' कुशल ने एक लम्बा कश लिया और बोला, 'अच्छा, अब तुम मेरा बेवकूफ बनाओ।' इस बार उसने नाक से धुआँ छोड़ा। तृप्ता को चुप देख कर उसने कहा, 'बनाओ भी।' 'क्या?' 'यही बेवकूफ।' उसने तृप्ता की ओर सरकते हुए कहा, 'तुम शायद समझती हो कि मैं पहले ही बेवकूफ हूँ।' 'बेवकूफ तो आप मुझे बना रहे हैं।' तृप्ता का चेहरा सुर्ख हो गया था और कड़वाहट पी जाने से उसने रुआँसी-सी हो कर कहा, '
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रकीब के मानी क्या होता है?' 'बुआ का लड़का।' कुशल ने सिगरेट के टुकड़े को पैर से मसल दिया, 'कहानी लेखिका हो कर इसका भी अर्थ नहीं पता?' कुशल को मालूम था कि अब वह कहानी लेखिका का लबादा ओढ़ने के लिए विवश है। 'आपको मेरा कुछ पसन्द भी है?' तृप्ता की आँखों में पानी चमकने लगा था। वह चाहता तो आसानी से तृप्ता को रुला सकता था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। इधर-उधर सिगरेट का कोई बड़ा टुकड़ा ढूँढ़ते हुए उसने निहायत सादगी से कहा, 'निश्चित ही मुझे तुम्हारी रचनाएँ पसन्द आ सकती हैं, लेकिन तुम सुनाओ, तब तो।' तृप्ता ने कुशल की ओर नहीं देखा, उसकी बात भी अनसुनी कर दी और
घुटनों में सर दे कर बैठ गयी। पहले तो कुशल के जी में आया कि तृप्ता को चुप करवाया जाये और उसी बहाने प्यार भी किया जाये, परन्तु उसने महसूस किया कि बिना सिगरेट के कश खींचे प्यार नहीं किया जा सकता, भावुक तो बिल्कुल नहीं हुआ जा सकता। कुशल जानता है कि तृप्ता भावुकता-रहित प्यार को स्वीकार नहीं करेगी। उसने घुटनों पर झुकी तृप्ता की ओर देखा और पाँव में चप्पल पहनने लगा। तृप्ता के झुक कर बैठने से उसकी पीठ भरी-पूरी और मांसल लग रही थी। सफेद वायल के ब्लाउज में से उसके ब्रेसियर की कसी हुई तनियाँ नजर आ रही थीं। तृप्ता ने कुशल को चप्पल घसीटते हुए बाहर जाते देखा तो सिसकियाँ भरने लगी।
कुशल के मन में तृप्ता के प्रति करुणा उमड़ रही थी। उसे दुकान से इस प्रकार उठ आने में कोई तुक नजर नहीं आ रही थी। उसे मालूम है कि अब वह तृप्ता को जितना भी मनाने का प्रयत्न करेगा, वह उसी मात्रा में रूठती चली जायेगी। मनाने के इस लम्बे सिलसिले से तो दुकान पर दिन भर टाइप करना कहीं आसान है, कुशल ने सोचा और पनवाड़ी से सिगरेट का पैकेट लिया। वह लौटा तो भरे टब में पानी गिरने की वही चिर-परिचित आवाज सुनायी दी। उसे लगा, जैसे सहसा किसी ने देर से उसके कानों में रखी रुई निकाल फेंकी हो या वह बरसों पुराने माहौल में लौट आया हो उसने देखा, तृप्ता खाट पर औंधी लेटी थी
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और उसने अपना मुँह तकिए में छिपा रखा था। स्टोव पर पानी उबल रहा था और जले हुए कागज स्टोव पर रखे पानी में तिर रहे थे। कुशल ने बड़ी एहतियात से एक स्याह कागज उठाया और तृप्ता की पीठ पर पापड़ की तरह चूर्ण करते हुए बोला, 'कहानी जला डाली क्या? उठो... ब्याहता स्त्रियाँ बच्चों की तरह नहीं रोया करती। तृप्ता, जो धीमे-धीमे सुबक रही थी, फफक कर रोने लगी और उसकी हिचकी बँध गयी। कुशल खाट के निकट पड़े ट्रंक पर बैठ गया और खुले ताले से खेलने लगा, जो मेजपोश पर पेपरवेट-सा पड़ा था। सिगरेट सुलगा कर भी वह तृप्ता को चुप कराने का साहस न बटोर सका, उसे लग रहा था,
तृप्ता का रोना बिलकुल जायज है।
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