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Adultery Mother and Son : A taboo affair 3
#21

फिर मैं और शालिनी दोनों एक-दूसरे की बाँहों में लेटे रहे।

जब शालिनी का दर्द कुछ कम हुआ तो वो उठी और वाशरूम जाने लगी और पांच मिनट बाद जब वापस आई तो चहकते हुए बोली- ओए अनुज तूने तो शादी की पहली रात याद दिला दी।

तो मैंने भी उत्सुकता से पूछा- वो कैसे?

तो आंटी बोली- अरे जब मैंने पति के साथ पहली बार किया था तब भी मुझे बहुत दर्द हुआ था और खून से तो मेरे कपड़े भी खराब हो गए थे.. पर कुंवारी चूत और कुंवारी गांड फड़वाने में थोड़ा अंतर लगा।

तो मैंने भी मुस्कुराते हुए पूछा- क्या?

शालिनी आंटी बोली- उस दिन बहुत खून बहा था जिसके थोड़ी देर बाद में वाशरूम गई तो खून हल्का-हल्का बह रहा था.. पर आज तो सिर्फ हल्का-हल्का ही निकला.. मैं यही देखने गई थी।

तो मैं उसकी बात सुनकर ताली बजाकर हँसने लगा।

आंटी मुझसे बोली- तुम्हें हँसी क्यों आई?

तो मैंने बोला- सच में.. तुम्हें कुछ मालूम नहीं पड़ा।

आंटी बोली- क्यों.. क्या हुआ?

तो मैंने उसे उसका गाउन दिखाया जिस पर खून की दो-चार बूँदें टपकी हुई थीं। क्योंकि उसका गाउन नीचे ही पड़ा था और पहले मैंने ही उसे देखा था और एक तरफ कर दिया था।

फिर उसे वो सोख्ता पैड दिखाया जो कि मेरे वीर्य और उसके खून से सना हुआ था।

तो आंटी आश्चर्यचकित होते हुए मेरे पास आई और ‘आई लव यू’ कहते हुए मुझे चूमते हुए बोली- अनुज तुम सच में मेरा बहुत ख़याल रखते हो.. तुम तो मुझे तो मालूम ही न चलने देते.. अगर मैं कुछ न कहती।

फिर वो अपने गाउन को उठा कर बोली- जान फिर तो उस दिन की तरह मुझे आज भी अपनी गांड भी फिर से मरवानी पड़ेगी.. ताकि अब दुबारा चूत की तरह गांड में भी दर्द न हो.. तुम एक काम करो.. मोबाइल में एक गेम और खेलो और मैं तुम्हारे लिए चाय लाती हूँ.. पर पहले इसे धोने के लिए डाल दूँ

यह बोलकर शालिनी आंटी चली गई।

फिर थोड़ी देर बाद शालिनी आंटी चाय लेकर आते ही बोली- लो चाय पियो और दिमाग फ्रेश करो और फिर अपना खेल चालू करो।

फिर मैं बोला- अरे वाह मेरी जानू.. तुम तो बहुत अच्छे से मुझे जान चुकी हो कि मुझे गर्म चाय पसंद हैं।

फिर हम दोनों ने चाय पी और कुछ देर बैठे ही बैठे एक-दूसरे को बाँहों में लेकर प्यार भरी बातें करने लगे जिससे कुछ ही देर में शालिनी फिर से गर्माते हुए बोली- अनुज मैं सोच रही हूँ जैसे मैंने शादी की पहली रात को तीन-चार बार किया था.. वैसे ही आज भी करूँ.. पता नहीं ये समा फिर कब इस तरह रंगीन हो।

ये कहते हुए उसने अपना हाथ मेरे लौड़े पर रख दिया और मेरी आँखों में देखते हुए मुझसे बात करते-करते मेरे लौड़े को मुठियाने लगी।

उसकी इस अदा पर में’ फ़िदा ही हो गया था.. आज भी जब कल्पना करता हूँ.. उसके खुले रेशमी बाल.. बड़ी आँखें उसके होंठ.. समझ लो आज भी बस यही सोचकर मुट्ठ मार लेता हूँ।

खैर.. अब कहानी में आते हैं..

तो मैं उसके इस रूप पर इतना मोहित हो गया कि बिना कुछ बोले बस एकटक उसे ही देखता रहा… जैसे कि मैं उसे अपनी कल्पनाओं में चोदे जा रहा हूँ.. और देखते ही देखते मैंने उसके होंठों पर अपने होंठों से आक्रमण कर दिया और उसे बेतहाशा मदहोशी के आगोश में आकर चूमने चाटने लगा।
जिससे शालिनी का भी स्वर बदल गया और उसकी बोलती बंद हो गई और बीच-बीच में बस ‘आआह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. ऊऊम्म’ के स्वर निकालने लगी।

मैं उसके चूची ऐसे चूसे जा रहा था जैसे गाय के पास जाकर उसका बछड़ा उसके थनों से दूध चूसता है।

फिर कुछ देर बाद देखा तो वो भी मेरी ही तरह से पूरी तरह से मदहोशी के आगोश में आकर अपने दूसरे निप्पल को रगड़कर दबाते हुए, ‘आह्ह्ह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. उउउउउम..’ की ध्वनि निकाल रही थी.. जिससे कि मेरा जोश और बढ़ गया।

मैंने उसे वैसे ही लिटाया और उसके पैरों के बीच खड़ा होकर.. उसकी चूत में एक ही बार में लंड डालकर.. उसे जबरदस्त तरीके से गर्दन को बाएं हाथ से पलंग पर दबाकर तेज़ ठोकरों के साथ चोदने लगा।

शालिनी की सीत्कार ‘आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह’ चीत्कार में बदल गई।

‘अह्ह्हह्ह.. बहुत मज़ा आ रहा है अनुज.. बस ऐसे ही करते आह्ह्ह्ह रहो..।’

देखते ही देखते आंटी का शरीर ढीला पड़ गया और मैं भी उसके साथ तो नहीं… पर उसके शांत होते ही अपने लौड़े का गर्म उबाल.. उगल दिया।

फिर उसके चुचियों पर सर रखकर आराम करने लगा।

सच बताऊँ दोस्तों इसमें हम दोनों को बहुत मज़ा आया था।

थोड़ी देर यू हीं लेटे रहने के बाद शालिनी आंटी मेरे सर को अपने हाथों से सहलाते हुए चूमने लगी और बोली- अनुज तुम मेरे साथ जब भी.. कैसे भी.. करते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है और सुकून मिलता है.. मुझे अपना प्यार इसी तरह देते रहना।

मैंने बोला- तुमसे भी मुझे बहुत सुकून मिलता है.. तुम परेशान मत होना जान.. मैं हमेशा तुम्हें ऐसे ही प्यार देता रहूँगा।

फिर वो मुझे चूमते हुए बोली- आगे की तो जंग छुड़ाकर ऑयलिंग कर दी.. पर अब पीछे की बारी है।

तो मैंने हैरान होते हुए उसकी आँखों में झाँका.. तो वो तुरंत बोली- क्यों क्या हुआ.. ऐसा मैंने क्या बोल दिया.. जो इतना हैरान हो गए?

तो मैंने बोला- अरे कुछ नहीं..

वो बोली- है तो कुछ.. मुझसे न छिपाओ.. अब बोल भी दो।

तो मैंने बोला- अरे तुम्हारे पीछे दर्द होगा.. तो क्या बर्दास्त कर लोगी? मैंने देखा था.. महसूस भी किया था तुम्हें बहुत तकलीफ हुई थी।

तो मुस्कुराते हुए बोली- अले मेले भोलू लाम.. तुम सच में बहुत प्यारे हो.. मेरा बहुत ख़याल रखते हो.. पर तुम्हें जानकर ख़ुशी होगी कि अब तालाब समुन्दर हो गई है.. चाहो तो खुद देख लो।

वो मेरा हाथ पकड़ कर अपनी गांड के छेद पर रखते हुए बोली- खुद ही अपनी ऊँगली डालकर देख लो..

तो मैंने उसकी गांड में दो ऊँगलियां डालीं.. जो कि आराम से चली गईं।

कुछ देर बाद फिर जब मैंने तीन डालीं तो उसे हल्का सा दर्द महसूस हुआ..
पर वो बोली- चलो अब जल्दी से इस दर्द को भी दूर कर दो।

मैंने बोला- अच्छा.. फिर से तेल या मक्खन लगा लो।

तो वो बोली- अरे अब उसकी जरुरत नहीं है.. मैं हूँ न.. बस तुम सीधे होकर लेट जाओ।

फिर मैं सीधा ही लेट गया.. शालिनी अपने हाथ से मेरे लंड को मुठियाते हुए मुँह में भरकर चूसने लगी.. जिससे मेरा लौड़ा फिर आनन्द की किश्ती में सवार होकर झूम उठा और जब उसके मुँह से लौड़ा निकलता तो उसके माथे पर ऐसे टीप मारता.. जैसे कहता हो, ‘पगली.. ठीक से चूस..’

फिर मैंने शालिनी को बोला- जल्दी से इसे ले लो.. वरना ये ऐसे ही उबाल खाकर भावनाओं के सागर में बह जाएगा।

तो आंटी ने भी वैसा ही किया और मुँह में ज्यादा सा थूक भरकर.. मेरे लौड़े को तरबतर करके.. खुद ही मैदान सम्हालते हुए मेरे ऊपर आ गई।

वो मेरे लौड़े को अपनी गांड के छेद पर टिकाकर धीरे-धीरे नीचे को बैठने लगी और उसकी थूक की चिकनाई के कारण आराम से उसकी गांड ने मेरा पूरा लौड़ा निगल सा लिया था।

उसकी गांड की गर्माहट पाकर मेरे अन्दर मनोभावनाओं में फिर से तूफ़ान सा जाग उठा और मैं भी कमर चलाकर उसे नीच से ठोकते हुए लंड की जड़ तक उसकी गांड में डालने लगा।

इतना आनन्द भरा समा चल रहा था कि दोनों सब कुछ भूलकर एक-दूसरे को ठोकर मारने में लगे थे।

शालिनी ऊपर से नीचे.. तो मैं नीचे से ऊपर की ओर कमर चला रहा था।

शालिनी लगातार ‘अह्ह्हह्ह उउउउम..’ करते-करते चूत से पानी बहाए जा रही थी.. जिसकी कुछेक बूँदें मेरे पेट पर गिर चुकी थीं।
उसको इतना मज़ा आ रहा था कि बिना चूत में कुछ डाले ही चरमोत्कर्ष के कारण स्वतः ही उसकी चूत का बाँध छूट गया और उसका कामरस मेरे पेट पर ही गिरने लगा।

और देखते ही देखते शालिनी ने निढाल सा होकर पलंग पर घुटने टिका कर.. लंड को अन्दर लिए ही मेरी छाती पर सर रख दिया और अपने हाथों से मेरे कंधों को सहलाने लगी।

जिससे मेरा जोश भी बढ़ने लगा और मैंने अपने हाथों से उसके चूतड़ों को पकड़ा और मज़बूती से पकड़ते हुए नीचे से जबरदस्त स्ट्रोक लगाते हुए उसकी गांड मारने लगा।

जिससे वो सीत्कार ‘श्ह्ह्ह्ह्ह्ह आआआअह..’ करते हुए जोश में आने लगी और मेरी छातियों को चूमने चाटने लगी।

मैंने रफ़्तार बढ़ा कर उसे चोदते हुए उसकी गांड में अपनी कामरस की बौछार कर दी।

झड़ने के साथ ही शालिनी को अपनी बाँहों में जकड़ कर उसके सर को चूमते हुए उसे प्यार करने लगा।

ऐसा लग रहा था.. जैसे सारी दुनिया का सुख भोगकर आया हूँ।

फिर उस रात मैंने थोड़ी-थोड़ी देर रुक रूककर शालिनी की गांड और चूत मारी.. करीब पांच बजे के आस-पास हम दोनों एक-दूसरे की बाँहों में निर्वस्त्र ही लिपटकर सो गए।
...........

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अब फिर करीब 11 बजे के आस-पास मेरी आँख खुली तो देखा शालिनी कमरे में नहीं थी, तो मैं उठा और उसको आवाज़ दी।

जब कोई जवाब न मिला तो मैंने सोचा कहीं शुभम आ तो नहीं गया.जल्दबाज़ी में बिना चड्डी के ही लोअर डाला और चड्डी को लोअर की जेब में रख ली।
मैं फ्रेश होने सीधा वाशरूम गया.. फिर फ्रेश होकर बाहर के कमरे की ओर चल दिया और देखने का प्रयास करने लगा कि ये लोग आए कि नहीं पर घर की शांति माहौल बता रही थी कि अभी शुभम नहीं आया हैं।

तो मैं बिना किसी आवाज़ किए रसोई की ओर चल दिया.. तो पाया कि शालिनी बालों को खोले और बहुत ही सरीके से साड़ी पहने हुए खाना पकाने में जुटी थी।
गर्दन से लेकर कमर तक का उसका हिस्सा खुला था.. जिस पर ब्लाउज की मात्र तीन इंची पट्टी थी।
उसके खुले बाल भीगे नज़र आ रहे थे.. जैसे कुछ ही देर पहले नहा कर आई हो..

उफ.. क्या माल दिख रही थी.. जैसे कि कोई हुस्न की परी जन्नत से उतर आई हो..

मैं उसके इस रूप-सौंदर्य को देखते ही अपना आपा खो बैठा और जाते ही लपककर उसको पीछे से अपनी बाँहों में भर लिया.. उसकी भीगी गर्दन पर जीभ फिराते हुए चुम्बन करने लगा।
उसके बालों से आ रही मादक खुशबू ने मुझे इतना मदहोश कर दिया कि मैं उसे अपनी ओर घुमाकर उसके सर को पकड़कर उसके होंठों को चूसते हुए तो कभी उसके कानों और गालों में चूमते हुए उसकी पीठ सहलाते-सहलाते.. उसके ब्लाउज में पीछे की ओर से ऊँगलियां डालते हुए उसकी ब्रा का हुक खोलने लगा.. जो कि कुछ ही पलों में खुल गया।

जिसका पता शालिनी को भी तभी चला, जब ब्रा का हुक खुलते ही उसकी पीठ पर थोड़ा रगड़ सा गया।

वो भी मेरी इस क्रिया में मेरा साथ देते-देते इतना मदहोश हो चुकी थी कि वो भी अपना होश खोकर मुझे अपने सीने से लगाकर.. अपनी चूचियों को मेरी छाती से रगड़ते हुए मेरे होंठों को चूसे जा रही थी।

फिर जब उसे हुक की रगड़ से होश आया तो मुझसे बोली- अनुज जाओ.. जल्दी जाकर नहा लो.. शुभम अभी आता ही होंगा।
तो मैंने बोला- क्या उनसे बात की?
आंटी बोली- नहीं.. अभी नहीं की।
तो मैंने पूछा- अच्छा मेरा फ़ोन कहाँ है रात को तो बिस्तर पर ही था.. पर जब सोकर उठा तो वहाँ मेरा फ़ोन नहीं दिखाई दिया।

शालिनी बोली- अरे वो शुभम के कमरे में चार्जिंग पर लगा है.. तुम्हारा बैग वहीं था और सुबह जब उठी तो तुम्हारा फोन ‘लो-बैटरी’ की वार्निंग दे रहा था। तो मैंने उसे चार्जिंग पर लगा दिया।

खैर.. मैंने शालिनी से बोला- ओके.. मैं अभी देखता हूँ कि शुभम कहाँ पहुँचा है।

तो शालिनी बोली- हाँ.. पूछ लो वक्त तो हो गया.. पर अभी तक नहीं आए..

मैंने आंटी को फिर से गले लगाया और उसके होंठ को चुम्बन देते हुए बोला- शालिनी ये हसीन पल.. पता नहीं कब मेरी जिंदगी में आएंगे.. मैं बहुत ही याद करूँगा।

तो शालिनी ने मेरे लहराते हुए मदमस्त नाग के समान लौड़े को पकड़ते हुए मुझसे बोली- अनुज तुम्हें नहीं पता.. तुमने इन दो दिनों में मुझे क्या दिया है.. आज इतना अच्छा लग रहा है, जितना कि पहले कभी न लगा, काश.. हम साथ रह पाते.. पर तुम परेशान न हो, तुम्हें मैं कैसे भी करके मज़ा देती और लेती रहूँगी।

यह कहते हुए उसने अपनी आँखों को बंद करते हुए गर्मजोशी के साथ मेरे लबों पर अपने लबों को चुभाते हुए चुम्बन करने लगी।

मैं और वो दोनों एक-दूसरे को बाँहों में जकड़े हुए प्यार कर रहे थे.. तभी शालिनी ने अचानक अपनी आँखें खोलीं और बोली- अनुज तुम्हारा तो नहीं पता.. पर मेरा छोटा अनुज (यानि मेरा लंड ) हमेशा मेरे लिए बेकरार रहता है.. देखो कैसे तुम्हारे लोअर के अन्दर से ही फुदक-फुदककर मेरे पेट को छेड़ रहा है।

मैंने बोला- सही ही तो है.. अब पता नहीं कब मौका मिले.. चलो एक बार मिलन करवा ही दें।

तो शालिनी डरते हुए लहज़े में बोली- अरे नहीं.. अभी नहीं.. उनका आने का समय हो चुका है।

तो मैंने बोला- तो कौन सा शुभम आ गए.. तुम तो बेकार ही घबरा रही हो.. अब एक काम करो.. मैं फ़ोन करने जा रहा हूँ.. अगर मैं पांच मिनट में न आऊँ.. तो समझ लेना अपना मिलन होकर ही रहेगा।

तुम गैस बंद करके वहीं शुभम के कमरे में आ जाना।

तो आंटी बोली- हाँ.. ये सही रहेगा.. तुम शुभम की लोकेशन लो.. तब तक मैं बचे काम खत्म करके आती हूँ।

फिर मैं ख़ुशी से झूमते हुए मतवाले हाथी के समान शुभम के कमरे की ओर चल पड़ा और जाते ही फ़ोन लगाया और काल की.. तो शूभम ने ही फ़ोन उठाया।

मैंने उससे पूछा- अबे तू अभी तक नहीं आया.. कहाँ फंसा है?

तो शुभम बोला- अरे कोई नहीं यार.. आ तो गया हूँ.. पर पिछले दस मिनट से गाड़ी आउटर पर खड़ी है.. प्लेटफॉर्म में पहुँचे.. तो काम बने।

तो मैंने पूछा- अरे कोई सिग्नल हुआ अभी कि नहीं?

तो शुभम बोला- शायद मालगाड़ी की वजह से रुकी पड़ी है.अब देखो कितना समय लगता है.. हो सकता है तीस मिनट और लग जाएँ।

मेरा मन उसकी यह बात सुनकर ख़ुशी में झूम उठा और मैंने मन ही मन खुश होकर शुभम से बोला- अरे कोई बात नहीं आराम से आओ वैसे भी आज का खाना मैं खाकर ही जाऊँगा..

इस तरह दो-अर्थी शब्दों में बाते करते हुए मैंने फोन रख दिया.. तब तक शालिनी आई और मेरे चेहरे के भावों से भांप गई कि शुभम को अभी और देर लगेगा आने में ।

आंटी मुझसे बोली- क्या बात है.. लगता है तुम्हें अब मन चाहा फल देना ही पड़ेगा..

तो मैंने भी उससे झूट बोलते हुए कहा- अभी उनको दो घंटे और लगेंगे.. उनकी ट्रेन शहर से दूर कहीं सिग्नल न मिलने के कारण खड़ी हो गई है.अब अगर मैं ये कहता कि गाड़ी स्टेशन के आउटर पर खड़ी है.. तो शायद वो मना भी कर सकती थी और डरते हुए चुदाई करने में वो मज़ा कहाँ.. जो पूरे इत्मीनान के साथ करने में मिलता है।

खैर.. शालिनी भी ख़ुशी से फूली न समाई और आकर मुझे अपनी बाँहों में भींच लिया और अपने होंठों से मेरे होंठों को चूमने लगी।

मैं भी उसे अपनी बाँहों में जकड़े हुए प्यार से चूमने-चाटने लगा और उसकी गर्दन पर जैसे ही चूमा.. वैसे ही उसके बालों से आ रही खुश्बू जो कि आज ही उसने धोए थे. से मैं मदहोश सा हो गया और उसे अपनी गोद में उठाकर उसे शुभम वाले बिस्तर पर लिटा दिया।

अब मैं उसके भीगे बालों की खुशबू लेने लगा। उसके बाल भीगे होने से तकिया भी गीला होने लगा.. मैं उसे और वो मुझे बस पागलों की ही तरह चूमे-चाटे जा रहा था।

फिर उसने मुझे ऊपर की ओर धकेला और मुझे नीचे लेटने को बोला।

मैं कुछ समझ पाता.. उसके पहले ही उसने अपनी पैंटी निकाली और फिर मेरा लोअर हटा के वहीं पलंग के नीचे डाल दी और मेरे ऊपर आकर मेरी जांघों पर बैठते हुए अपने ब्लाउज के हुक खोलने लगी।

मैं इतना बेताब हो गया कि बिना उसके खोले ही उसके चूची नोचने-दबाने लगा। जिससे उसके मुँह से चीख निकल गई और बोली- यार दो मिनट रुक नहीं सकते।

तो मैंने बोला- इतना मदहोश कर देती हो कि होश ही नहीं रहता।

तभी शालिनी ने ब्लाउज निकाल दिया और मेरे होंठों को चूसते हुए मेरा सर सहलाने लगी। फिर मैंने अपने दोनों हाथों को उसकी पीठ पर ले जाकर उसकी ब्रा का हुक खोल दिया और उसकी पीठ सहलाते हुए सके चूतड़ों को रगड़ते हुए उन पर चाटें मारने लगा..
जिससे शालिनी चिहुँक उठी।

अब तो उसे भी मेरी इस अदा पर मज़ा आने लगा था और मेरे हर तरीके का मज़े से स्वागत करने लगी थी.. जैसे कि वो मेरी आदी हो चुकी हो।

उधर मेरा लंड जो कि अब बेकरार हो चुका उसकी चूत से रगड़ खाते हुए उसकी चूत के मुहाने पर तन्नाते हुए अपना सर पटकने लगा था.. मानो कह रहा हो कि अब तुम लोगों का हो गया हो तो अब मेरी बारी आ गई है।

तभी मुझे भी होश आया कि वो लोग कभी भी घर पहुँच सकते हैं.. तो मैंने धीरे से अपने हाथों से उसके चुचियों दबाने चालू किए.. जिससे शालिनी की सीत्कार निकलने लगी।

वो भी गर्म जोशी के साथ अपनी गर्दन उठा कर लहराती हुई जुल्फों से पानी की बूँदें टपकाती हुई ‘आआह.. उउउम्म्म्म और जोर से अनुज.. आआआह.. ऐसे ही करो.. आआअह..’ बोलने लगी।

तभी मैंने महसूस किया कि शालिनी की चूत का पानी रिस कर मेरी जांघों और लौड़े के अगल-बगल बह रहा है।

फिर मैंने शालिनी के चूतड़ों को पकड़कर थोड़ा सा ऊपर उठाया और अपना सीधे हाथ से लौड़े को पकड़कर उसकी चूत पर सैट करने लगा। तो शालिनी ने मोर्चा सम्हालते हुए खुद ही अपने हाथ से मेरे पप्पू को पकड़ा और उस पर अपनी चूत टिका एक ही बार में ‘गच्च’ से बैठ गई।

चूत के रसिया जाने से मेरा लंड भी बिना किसी रुकावट के उसकी चूत में लैंड हो गया और अब बल खाते हुए अपनी कमर चला-चला कर हुमक के ऊपर-नीचे होने लगी।
यार.. मैं तो उसका चेहरा ही देखता रह गया।
उसके जोश को देखकर एक पल के लिए मैं तो थम सा गया कि आखिर आज शालिनी को क्या हो गया है.. वो एक भूखी शेरनी की तरह एक के बाद एक मेरे लौड़े पर अपनी चूत से वार करने लगी और निरंतर उसकी गति बढ़ती चली गई।

जैसे रेल की चाल चलती है.. कभी धीमे-धीमे और बीच में तेज़ और जब रूकती है तो फिर धीमे-धीमे.. ठीक उसी तरह शालिनी कि भी गति अब बढ़ चुकी थी। वो इतनी मदहोशी के साथ सब कर रही थी कि उसका अब खुद पर कोई काबू नहीं रहा था और वो अपनी आँखों को बंद किए हुए अपने निचले होंठों को मुँह से दाबे हुए दबी आवाज़ में ‘श्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. आआआअह.. उम्म्म्म्म्..’ करती हुई मेरे सीने को अपने हाथों से सहला रही थी..
जिससे मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था और मैं भी उससे बोलने लगा- शालिनी.. अब कर दो मेरे लंड पर प्यार की बरसात.. अब मेरा लंड अन्दर की और गर्मी बर्दास्त नहीं कर सकता..

इतना कहते ही मैंने उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके तरबूज सामान चूतड़ों को भींचते हुए कसकर पकड़ लिया।

अब मैं भी अपनी कमर चलाने लगा.. जिससे शालिनी का बांध कुछ ही धक्कों के बाद टूट गया और वो हाँफते हुए मेरे सीने पर सर टिका कर झुक गई। अब वो इस स्थिति में अपनी गांड उठाए हुए मेरा लंड अपनी चूत में खाने लगी.. जिससे मुझे भी मज़ा आने लगा और मैं भी नीचे से तेज़ी के साथ कमर चलाते हुए उसकी चूत बजाने लगा।

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि मैंने ये बजाना शब्द क्यों प्रयोग किया.. तो आपको बता दूँ कि उसकी चूत से इतना ज्यादा पानी डिस्चार्ज हुआ था.. और मेरे लौड़े के बार-बार अन्दर-बाहर होने से गप्प-गप्प और चप्प-चप्प की आवाजें आ रही थीं.. जो कि एक अलग प्रकार के जोश को बढ़ाने के लिए काफी थी। उधर शालिनी की भी कराहें भी बढ़ गईं और प्यार भरी सीत्कार ‘आआआह.. आह.. उम..उम्म्म..’ के साथ भारी-भारी सांसें मेरे सीने पर गिर रही थीं।

उसकी गर्म सांसें मेरे रोम-रोम से टकरा कर कह रही थीं कि अब आ जाओ और पानी डाल कर बुझा दो.. इन गर्म साँसों को.. और कर दो ठंडा..

मैं भी पूरी तल्लीनता के साथ अपने चरमोत्कर्ष के मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ उसकी चूत पर लंड की ठोकर जड़ने लगा। इतने में ही डोर बेल बजी.. जिससे शालिनी सकते में आ गई और घबरा गई।

वास्तव में हम दोनों पसीने से लथपथ तो थे ही.. अब आँखों में घबराहट के डोरे भी साफ़ दिखने लगे और उधर लगातार डोर-बेल बजे ही जा रही थी।

मेरा मन तो कर रहा था जाऊँ और जाकर उस बेल को तोड़ दूँ.. पर करता भी तो क्या? मेरा अभी भी हुआ नहीं था तो मैं जल्दी से उठा और अपना लोअर पहना और उसी से जुड़े हुए बाथरूम में चला गया।

जल्द-बाज़ी में शालिनी ने भी अपनी साड़ी सही की जो अस्तव्यस्त हो गई थी और चड्डी वहीं पलंग के ऊपर पड़ी भूल गई थी।
वो अपने कपड़े सुधारने के बाद बिस्तर बिना सही किए ही चिल्लाते हुए चली गई।

‘आ रही हूँ.. पता नहीं कौन है.. बार-बार परेशान कर रहा है..’

उधर मैं भी अपना हाथ जगन्नाथ करने में जुटा था और अपना पानी बहाते हुए मैं थोड़ी देर वहीं बैठ गया.. अब मुझे क्या पता कि जल्दबाजी में लोअर उठाने के चक्कर में मेरी चड्डी जो कि शुभम के पलंग के नीचे रह गई थी और शालिनी की चूत रस से भीगी चड्डी बिस्तर पर ही पड़ी थी।

खैर.. तब तक मुझे कमरें में कुछ हलचल महसूस हुई.. तो मैंने सोचा अब निकलना चाहिए ताकि बहाना बना सकूँ कि मैं फ्रेश हो रहा था और मैं कैसे दरवाज़ा खोलता।

खैर.. मैं धीरे से अपना मुँह धोते हुए बाहर निकला.. तो मैं हक्का-बक्का सा रह गया क्योंकि अभी अभी कॉलेज से आई , अंकिता के हाथों में मेरी और शालिनी की चड्डी थीं.. उसके दाए हाँथ में मेरी और बाएं हाथ में शालिनी की.. और वो बड़े ही गौर से मेरी चड्डी को बिस्तर पर रखकर शालिनी की चड्डी के गीले भाग को बड़े ही गौर से देखते हुए सूंघने लगी और अपनी ऊँगली से छूकर शायद ये देख रही थी कि ये चिपचिपा-चिपचिपा सा क्या है?

इतने में मैंने अपनी मौजूदगी को जाहिर करते हुए तेज़ी से बाथरूम का गेट बंद किया.. जिससे अंकिता भी हड़बड़ा गई और उस चड्डी को बिस्तर पर फेंकते हुए मुझसे बोली- तुम यहाँ क्या कर रहे थे?

तो मैंने बाथरूम की ओर इशारा करते हुए बोला- यहाँ क्या करते हैं?

वो अंकिता बोली- मैं उसकी बात नहीं कर रही हूँ।

‘तो किसकी बात कर रही हो?’

वो बेड को दिखाते हुए बोली- यहाँ की..!

तो मैंने सोचा.. इसको तो अब कुछ तो बताना ही होगा.. मैं बहुत असमंजस में पड़ते हुए बोला- यहाँ सोता था..

तो अंकिता मेरी और शालिनी की चड्डी उठाते हुए बोली- ये सब क्या है?

वो गीला तकिया जो कि शालिनी के गीले बालों से भीगा सा लग रहा था।

अब मैंने मन ही मन सोचा कि शुभम के यहाँ आने के पहले इसका कुछ तो करना ही पड़ेगा..
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#22

अब आगे बढ़ कर मैंने उससे बोला- तुम्हें क्या लग रहा है?

तो अंकिता मुझसे बोली- वही तो समझने की कोशिश कर रही हूँ कि मुझे क्यों सब कुछ गड़बड़ लग रहा है या फिर बात कुछ और है?

तो मैंने उसे बोला- जो तुम्हें लग रहा है पहले वो बोलो.. फिर अगर सही होगा तो मैं ‘हाँ’ या ‘न’ में जवाब दूँगा और तुम गलत हुई.. तो मैं बता दूँगा.. पर ये बात मेरे और तुम्हारे बीच ही रहेगी।

मैं उस दिन बहुत डर गया था.. घबराहट के मारे मेरे माथे से पसीना बहने लगा था। पर जैसे ही उसकी बात सुनी तो मेरी जान में जान आई और मैंने सोचा इसे अपनी बात पूरी कर लेने दो फिर तो मैं इसे हैंडल कर लूँगा।

मैं दरवाजा बंद करने लगा तो उसने कहा- ये क्यों किया तुमने?

मैंने बोला- ताकि कोई यहाँ न आए.. फिर मैं उसी बिस्तर पर जाकर बैठ गया.. और उससे बोला- मेरे पास न सही.. पर चाहो तो सामने वाले बिस्तर पर बैठ जाओ.।

तो अंकिता मुँह बनाते हुए बोली - ज्यादा हमदर्दी दिखाने की कोशिश मत करो..वो यह कहते हुए बैठ गई।

फिर मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा- अच्छा अब बोलो.. तुम क्या सोच रही थी?

मैंने उसके हाथ की ओर इशारा करते हुए पूछा.. जिसमें वो शालिनी के रस से सनी चड्डी को पकड़े हुए थी।

तो अंकिता बोली- तुम कितने गंदे हो.. मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि तुम मौसी के अंदरूनी कपड़ों को लेकर सोओगे और ये सब करोगे..

तो मैं समझ गया कि ये अभी नादान है.. इसे ज्यादा कुछ नहीं पता लगा।

मैंने भी थोड़ी बेशर्मी दिखाते हुए बोला- क्या.. इस सबसे तुम्हारा क्या मतलब है?

तो वो चड्डी में लगे हुए रस को छूते हुए बोली- ये..

तो मैंने पूछा- तुम्हें नहीं पता कि ये क्या है.. तो तुम मुझे गन्दा कैसे कह सकती हो?

मुझे पता चल गया था कि वो क्या कहना चाह रही थी.. पर उसके मुँह से सुनने के लिए मैंने उसे उकसाया.. तो अंकिता बोली- बेवकूफ मत समझो मुझे.. आपको नहीं मालूम.. ये आपका स्पर्म है। मैंने अपनी सहेलियों से सुना है कि लड़कों का स्पर्म चिकना होता है.. और आपको मैं पहले दिन से नोटिस कर रही हूँ कि आप मेरी मौसी को मौका पाकर छेड़ते रहते हो।

तो मैंने बोला- और क्या?

अंकिता बोली- और.. अब तो हद ही हो गई.. आपने हम लोगों की गैरहाज़िरी का फायदा उठाते हुए मेरी मौसी पर गन्दी नज़र रखते हुए.. उनके अंडरगार्मेंट्स को अपने साथ लेकर सोने लगे और न जाने मन में क्या क्या करते होंगे.. जिससे आपका स्पर्म निकल जाता होगा..

तो मैंने उससे बोला- तुम्हें पता है.. स्पर्म कैसे निकलता है?

अंकिता बोली- हाँ.. गन्दा सोचने पर..

मैंने हंसकर बोला- उतनी देर से तुम भी तो मेरे बारे मैं गन्दा सोच रही हो.. तो क्या तुम्हारा भी ‘स्पर्म’ निकल रहा है?

अंकिता यह सुनकर बोली- अरे मेरे कहने का मतलब ऐसा नहीं है..

तो मैंने बोला- फिर कैसा है?

अंकिता बोली- मैं अभी जाती हूँ.. और बाहर जाकर सबको बताती हूँ.. फिर वही तुम्हें समझा देंगे..

ये कह उठने सी लगी तो मैंने उसके कंधे पर हाथ रखे और उसे बैठने को कहा और बोला- पहले ठीक से हमें समझ तो लें.. फिर जो मन में आए.. वो करना।

तो अंकिता बोली- नहीं.. अब मुझे कुछ नहीं समझना.. मैं आपको बहुत अच्छा समझती थी.. पर आप बिलकुल भी ठीक इंसान नहीं हो..

मैंने बोला- अभी सब समझा दूँगा.. पर पहले ये बताओ.. तुम मेरी किस सोच को गन्दा बोल रही हो।

तो अंकिता कुछ हकलाते हुऐ बोली- मैं सब सब समझती हूँ.. अब मैं छोटी नहीं रही.. जो तुम मुझे बेवकूफ बना लोगे.. तुमसे सिर्फ दो ही साल छोटी हूँ।

तो मैंने बोला- तुम्हें कुछ पता होता.. तो अब तक बता चुकी होतीं.।

तो अंकिता बोली- ज्यादा होशियारी मत दिखाओ.. जब मन में सेक्स करने के ख़याल आते हैं तो स्पर्म निकलता है और वही तुम करते थे।

मैंने बोला- ऐसा नहीं है।

तो अंकिता बोली- इस उम्र में ये सब होना बड़ी बात नहीं है.. पर मेरी मौसी को लेकर तुम्हारी नियत खराब हो गई.. ये बहुत गलत बात है.. मैं अभी मौसी को बताती हूँ।

तो मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे बैठाया और उसी के बगल में बैठ गया और उसके चेहरे को अपनी ओर घुमाया।

तो अंकिता बोली- ये तुम क्या कर रहे हैं?

तो मैंने बोला- अभी कहाँ कुछ किया.. और जब तक तुम ‘हाँ’ नहीं कहती.. मैं कुछ भी नहीं करूँगा।

तो अंकिता बोली- मैं समझी नहीं.. तुम कहना क्या चाहते हो?

तो मैंने उसे बुद्धू बनाते हुए बोला- प्लीज़ तुम किसी को भी ये बात मत बोलना.. मगर मेरी अब एक बात सुन लो.. फिर तुम अगर चाहोगी तो मैं यहाँ दोबारा आऊँगा.. वर्ना कभी भी अपनी शक्ल तक नहीं दिखाऊँगा।

तो अंकिता बोली- तुम पहले मेरे ऊपर से अपने गंदे हाथ हटाएं.. और यहाँ से जल्दी अपनी बात खत्म करके निकल जाएं।

फिर मैं उसे उल्लू बनाते हुए बोला- जो ये तुम्हारे हाथ में चड्डी है..

अंकिता बोली- हाँ तो?

तो मैंने बोला- यह मैं नहीं जानता था कि ये तुम्हारी है या आंटी की.. क्योंकि ये मुझे यहीं मिली थी।

तो अंकिता हैरानी से बोली- मतलब क्या है तुम्हारा? किसी की भी चड्डी में अपना रस गिरा देते हो?

तो मैंने बोला- नहीं.. ऐसा नहीं है..

अंकिता बोली- फिर कैसा है?

मैंने उससे बोला- मैंने जबसे तुमको देखा है.. मैं बस तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूँ और तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.. और मुझे सच में यह नहीं मालूम कि यह किसकी थी.. मैंने तो तुम्हारी समझ कर ही अपने पास रख ली थी और आंटी को लेकर मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। मैं तो सोते जागते बस तुम्हारे बारे में ही सोचता था.. इसीलिए मैंने सोने के लिए बिस्तर भी तुम्हारा ही पसंद किया था.. जिसमें मुझे तुम्हारे बदन की मदहोश कर महक अपना स्पर्म निकालने के लिए मजबूर कर देती थी.. और अगर तुम्हें ये गलत लगता है.. तो आज के बाद मैं तुम्हें कभी मुँह नहीं दिखाऊँगा.. पर मैं तुमसे बहुत प्यार करने लगा हूँ.. आगे तुम्हारी मर्ज़ी…

यह कहते हुए मैं शांत होकर उसके चेहरे के भावों को पढ़ने लगा।

उसका चेहरा साफ़ बता रहा था कि अब वो कोई हंगामा नहीं खड़ा करेगी.. तो मैंने फिर से उससे बोला- क्या तुम भी मुझे अपना सकती हो?

तो अंकिता उलझन में आ गई… जो कि उसके चेहरे पर दिख रही थी..

मैं उठा और उससे बोला- कोई जल्दी नहीं है.. आराम से सोचकर जवाब देना.. पर हाँ.. तब तक के लिए मैं तुम्हारे घर जरूर आऊँगा.. पर बाहर ही बाहर तक.. मुझे तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा।

मेरी बात समाप्त होते ही दरवाज़े पर शुभम आ गया और खटखटाने लगा तो अंकिता ने मुझे फिर से इशारे से बाथरूम का रास्ता दिखा दिया और मैं अपनी चड्डी की जगह जल्दबाज़ी में शालिनी की ले आया और बाथरूम अन्दर से बंद करके बाहर की आवाज़ सुनने लगा।

शुभम घर में घुसते ही पूछा- अनुज किधर है.. माँ ने बोला है कि कमरे में होगा?

तो अंकिता बोली- भैया.. वो तो नहा रहे हैं मैंने जब बाथरूम खोलना चाहा तो वो अन्दर से लॉक था.. फिर अन्दर से उसकी आवाज़ आई कि " मैं नहा रहा हूँ.." तब मैंने सोचा कि चलो तब तक कपड़ों को ही अलमारी में एक सा जमा दूँ।

शुभम बोला - तू बहुत पागल है.. इस तरह से पूरे बिस्तर में कपड़े फ़ैलाने की क्या जरुरत थी? चल जल्दी से निपटा ले।

तभी मैं अन्दर से निकला और मैंने शो करने के लिए शावर से थोड़ा नहा भी लिया था।

मैंने निकलते ही पूछा- अरे शुभम तुम्हारा एग्जाम कैसा रहा?

तो शुभम बोला - अच्छा रहा..

फिर मैंने शुभम से पूछा- यार नींद पूरी नहीं हुई क्या.. जो आते ही सो गए।

तो शुभम बोला- हाँ यार.. ट्रेन में सही से सो नहीं पाया।

तब तक आंटी ने आवाज़ देते हुए बोला- अरे सुनो सब.. तुम लोग आ जाओ.. नाश्ता रेडी है।

शुभम बोला- अंकिता पहले तू फ्रेश होने जाएगी या मैं जाऊँ?

वो अंकिता बोली- आप हो आइए.. मैं कपड़े रखकर जाऊंगी।

मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। तो अंकिता मेरी तरफ देखते हुए बोली- तब तक तुम नाश्ता करो , हम दोनों आते हैं।

अब मुझे यकीन हो गया था कि ये चिड़िया भले ही मेरे जाल में न फंसी हो.. पर यह बात ये किसी को भी नहीं बोलेगी..
यह सोचता हुआ बाहर आ गया।

शालिनी ने जैसे ही मुझे देखा कि मैं अकेला ही आ रहा हूँ.. तो वो जोर से बोलते हुए बोली- वो लोग कहाँ हैं?

फिर मेरे पास आई और बोली- कुछ अन्दर गड़बड़ तो नहीं हुई न?

तो मैंने उनके गालों को चूमते हुए कहा- आप परेशान न हों.. किसी को कुछ भी शक नहीं हुआ है।

ये कहते हुए मैं डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।

.........................

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करीब 10 मिनट बाद शुभम आया और उसके कुछ ही देर बाद र
अंकिता भी आ गई।

हम बैठे.. इधर-उधर की बात करते-करते नाश्ता करने लगे , थोड़ी देर में मेरा और शुभम का नाश्ता हो चुका था.. तो हम उठे.. और हाथ धोकर करके सोफे पर बैठ गए बात करने के लिए , थोड़ी देर बात करने के बाद शुभम से मैं बोला - अच्छा भाई.. अब मैं चलता हूँ.. मुझे नहीं लगता कि अब मेरी यहाँ कोई जरूरत है। अब तो तुम आ गए हो.. वैसे तुमसे बिना पूछे तुम्हारे कमरे का इस्तेमाल करने के लिए सॉरी..

तब शुभम बोला- अरे तो कोई बात नहीं.. वैसे भी हमें बुरा नहीं लगा..?

तो मैंने मन में सोचा चलो भाई अब तो हो चुका जो होना था.. अब तो वो करना है.. जो बाकी है..
यही सोचते हुए मैंने अंकिता की आँखों में झांकते हुए कहा- वैसे यार सच बोलूँ इतना मज़ा तो कभी खुद के बिस्तर पर नहीं आया.. जितना यहाँ के बिस्तर में आया है.. यार वास्तव में मज़ा आ गया।

तो अंकिता का चेहरा शर्म से लाल हो गया और उसके चेहरे पर मुस्कान छा गई जो कि उसके अंतर्मन को दर्शाने के लिए काफी थी।

तब तक शुभम बोला- " ऐसा क्या हो गया " ?

मैं बोला- यार यहाँ सुबह जल्दी नहीं उठना पड़ता था न.. इसलिए..

मैंने बात को घुमा दिया.. ताकि शुभम अपना ज्यादा दिमाग न लगाए.. और मैंने बात यहीं ख़त्म कर दी।

फिर मैंने बोला- मुझे मेरा जवाब चाहिए.. जितनी जल्दी हो सके दो..

यह मेरा अंकिता से पूछा गया सवाल था.. जो कि कुछ देर पहले ही कमरे में मेरी और अंकिता के बहस से सम्बंधित था।

तो शुभम बोला- कैसा जवाब?

मैं बोला- अब मैं घर जा सकता हूँ..
तो वो बोला- थोड़ी देर में चले जाना..
मैं बोला- नहीं यार.. घर में भी देखना पड़ेगा.. दो दिन से यहीं हूँ.. आंटी के साथ.. अब तुम आ ही गए हो तो..

इतने में शालिनी आंटी पीछे से आते हुए बोलीं- मुझे बहुत खलेगा अनुज तुमने मेरा बहुत ध्यान रखा.. हो सके तो शाम को आ जाना.. तुम्हारी याद आएगी।

तो मैंने अंकिता की ओर देखते हुए बोला- " आंटी मैं नहीं आऊँगा " पर आपके साथ बिताए हुए एक एक पल मुझे बहुत याद आयेगा। क्योंकि आप ने मुझे बेटे से बढ़कर प्यार और सम्मान दिया।

( ये मैंने केवल अंकिता को झांसे में लेने के लिए तीर छोड़ा था.. जो कि ठीक निशाने पर लगा.. क्योंकि उसका चेहरा उतर चुका था )

इतने में शालिनी आंटी बोली- जब तुम मेरी इतनी प्रवाह करते हो तो.. क्या मेरे कहने पर आ नहीं सकते।

तो मैं बिना बोले ही अंकिता की आँखों में आँखे डालकर शांत होकर देखने लगा.. जिससे उसे ऐसा लगा.. जैसे मैं उससे ही पूछ रहा होऊँ कि मैं आऊँ या न आऊँ..

तब तक शुभम भी बोला- बोल ना , शाम को आ जा..

पर अब भी मुझे शांत देखकर अंकिता ने अपनी चुप्पी तोड़ी और बोली- क्यों न आप आज भी यहीं रुक जाएँ.. हम मिलकर मस्ती करेंगे और कल फिर आपको देर तक सोने को मिलेगा।

( सच बोलूँ तो उसकी ये बात सुन तो मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही न रहा। )

मेरी ख़ुशी को देखकर अंकिता बोली- देखना मौसी अनुज जरूर मान जायेंगे.. क्योंकि लगता है.. उनको सोने का बहुत शौक है और ये शौक वो अपने घर में पूरा नहीं कर पाते हैं।

तो शुभम बोला- हाँ यार.. चल अब जल्दी से ‘हाँ’ बोल दे.. सबकी जब यहीं इच्छा है.. तो तू आज रात यहीं रुक जा..

तो मैंने भी बोला- चलो ठीक है.. जैसी आप लोगों की इच्छा.. पर मुझे अभी घर जाना ही होगा। फिर शाम तक आ जाऊँगा।

( मैं मन में सोचने लगा कि मैंने तो सोचा था कि अब आना ही कम हो जाएगा.. पर यहाँ तो खुद अंकिता ही मुझे रुकने के लिए बोल रही है। ये मैं कैसे हाथ से जाने दूँ। )

इतने में अंकिता बोली- अब क्या सोच रहे हो.. तुम जल्दी से तुम अपने घर होकर आओ।

मैंने बोला- अब घर पर क्या बोलूँगा कि आज क्यों रुक रहा हूँ?
तो कोई कुछ बोलता.. उसके पहले ही अंकिता बोली- अरे आप परेशान न हों.. मैं खुद ही आंटी जी को फ़ोन करूँगी।
तो मैंने बोला- वो तो ठीक है.. पर बोलोगी क्या?

तब उसने जो बोला उसे सुन कर तो मैं हैरान हो गया और मुझे ऐसा लगा कि ये तो शालिनी से भी बड़ी चुदैल रंडी बनेगी। साली मेरे साथ नौटंकी कर रही थी। उसकी बात से केवल मैं ही हैरान नहीं था बल्कि शालिनी और शुभम भी बहुत हैरान थे।

उसने बोला ही कुछ ऐसा था कि आप अभी अपने घर जाओ और आंटी पूछें कि हम आए या नहीं.. तो तुम बोलना मैं जब निकला था.. तब तक तो वो लोग नहीं आए थे और उनका फ़ोन भी स्विच ऑफ था..। फिर आप अपने काम में लग जाना.. जैसे आप सही कह रहे हों और फिर 6 बजे के आस-पास मैं ही आपकी मम्मी को काॅल करूँगी और उनसे बोलूँगी कि आंटी अगर अनुज घर पर ही हों तो आप उनसे बोल दीजिएगा कि शुभम भैया आज नहीं आ पा रहे हैं। उनकी ट्रेन कैंसिल हो गई है.. तो वह कल घर पहुँच पायेंगे..

फिर अपनी बात को समाप्त करते हुए बोली- क्यों कैसा लगा सबको मेरा आईडिया?

तो सब ने एक साथ बोला- बहुत ही बढ़िया..

मैंने मन में सोचा- यार इससे तो संभल कर रहना पड़ेगा.. ये तो अपनी मौसी से भी ज्यादा चालाक लड़की है।

फिर हमने एक साथ बैठकर चाय पी। इस बीच अंकिता बार-बार मुझे ही घूरते हुए हँसे जा रही थी.. पर कुछ बोल नहीं रही थी। जबकि मैं उससे सुनना चाहता था कि वो ऐसा क्यों कर रही है.. पर मुझे कोई मौका ही नहीं मिल रहा था।

इतने में शुभम उठा और वहीं सोफे के पास पड़े दीवान पर लेटते हुए बोला- मैं तो चला सोने.. अब मुझे कोई डिस्टर्ब न करना।
मैंने भी सोचा.. चलो अब तो बात करने का मौका मिल ही जाएगा।
मैं वक़्त की नजाकत को समझते हुए बोला- अच्छा शुभम.. तुम सो.. मैं चला अपने घर.. फिर शाम को मिलते हैं।

तो शुभम बोला- ठीक है।

आंटी भी वहीं बैठी थीं.. वो तुरंत बोलीं- शाम को क्या खाओगे?
तो मैंने उनके रसभरे चूची की ओर घूरते हुए कहा- जो आप पिला और खिला पाओ?
तो वो मेरी निगाहों को समझते हुए बोलीं- ठीक है.. देखते हैं फिर क्या बना सकती हुं।
फिर मैंने बोला- अब आप सोचती रहो.. शाम तक.. मैं चला अपनी पैकिंग करने.. घर जल्दी ही पहुँचना पड़ेगा।

तो अंकिता भी खुद ही बोली जैसे वो भी मुझसे बात करना चाह रही हो, खैर.. वो मुझसे बोली- हाँ अनुज चलिए मैं भी तुम्हारी कुछ मदद कर देती हूँ ताकि तुम्हारा ‘काम’ जल्दी हो जाए।

वो ‘काम’ तो ऐसे बोली थी.. जैसे कामशुत्र की प्रोफेसर हो और मुझे नीचे लिटाकर ही मेरा काम-तमाम कर देगी।
लेकिन फिर भी मैंने संभलते हुए बोला- अरे मैं कर लूँगा.. तुम परेशान न हो।
तो अंकिता बोली- अरे कोई बात नहीं.. आखिर मैं कब काम आऊँगी।

मैंने भी सोचा.. चलो ‘हाँ’ बोल दो.. नहीं तो ये काम-काम बोल कर मेरा काम बढ़ा देगी।
फिर मैंने भी मुस्कुराते हुए बोल दिया- ठीक है.. जैसी तेरी इच्छा..

हालांकि अभी मैं उससे दो अर्थी शब्दों में बात नहीं कर रहा था.. पर अपने नैनों के बाणों से उसके शरीर को जरूर छलनी कर रहा था। जिसे वो देखकर मुस्कुरा रही थी।

शायद वो ये समझ रही होगी कि मैं उसे प्यार करता हूँ। मुझे वो उसकी अदाओं और बातों से लगने भी लगा था ।

फिर वो अपने भारी चूतड़ों को मटकाते हुए मेरे आगे चलने लगी।
उसकी इस अदा से साफ़ लग रहा था कि वो मुझे ही अपनी अदाओं से मारने के लिए ऐसे चल रही है.. क्योंकि वो बार-बार साइड से देखने का प्रयास कर रही थी कि मेरी नज़र किधर है।

साला इधर मेरा लौड़ा इतना मचल गया था कि बस दिल तो यही कर रहा था कि अपने लौड़े को छुरी समान बना कर इसके दिल समान चूतड़ों में गाड़ कर ठूंस दूँ। पर मैं कोई जल्दबाज़ी नहीं करना चाहता था.. क्योंकि मेरे मन में ये भी ख़याल आ रहे थे कि हो सकता है कि अंकिता अभी कुंवारी हो.. और न भी हो..
पर यदि ये कुवांरी हुई.. तो सब गड़बड़ हो जाएगी और वैसे भी उसकी तरफ से लाइन क्लियर तो थी ही.. ये तो पक्का हो ही गया था कि आज नहीं तो कल इसको चोदकर मेरी इच्छा पूरी हो ही जाएगी।

फिर ये सब सोचते-सोचते हम दोनों कमरे में पहुँचे तो अंकिता बोली- अनुज तुम दरवाज़ा बंद कर दो ।
तो मैंने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा तो बोली- अरे तुम परेशान न हों.. मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ।
तो मैंने भी तुरंत ही सवाल दाग दिया- क्या मेरी तरह.. मेरी तरह.. लगा रखा है।

वो बिस्तर की ओर इशारा करते हुए बोली- यही.. जो आप दरवाज़ा बंद करके मेरे बिस्तर और मौसी की चड्डी से करते थे।

मैंने भी बोला- मैं कैसे समझाऊँ कि मुझे नहीं मालूम था कि वो तेरी मौसी की चड्डी है।
अंकिता तुरंत ही बोली- और ये बिस्तर..
मैंने बोला- हाँ.. ये तो मालूम था।
तो अंकिता बोली- बस यही तो मैं बोली कि आप दरवाज़ा बंद करो.. मैं तूम्हारी तरह तुमको मुठयानि नहीं करूँगी।

साली बोल तो ऐसे रही थी.. जैसे बोल रही हो कि अनुज आओ जल्दी से.. और मेरा चोद दो और मेरे शरीर को मसलते हुए कोई रहम न करना।
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