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Adultery Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej
#41
Add sex photo and gif, it makes story sexy...

PLEASE ADD PIC AND GIF IN SEX

[Image: 1717812.gif]

I think tauji should marry Kavya...........she becomes tai/aunt of rajesh.#Update with sex pics and gif
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Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
#42
story pacing is great. can you please post only in hinglish and not in hindi fonts if it increases the number of updates plz
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#43
next update please
welcome
Harinder Singh
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#44
Hi Wofeloh916,

Your writing is quite good. I can say you are going to be a rising star . I just found a few formatting issues. What you can do is paste it, then do Preview Post, select all again, and change the font size to 6. then Reader are able to read it properly.
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



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#45
NEXT UPDATE KAB TAK AYE GA DEAR WOFELOH916
welcome
Harinder Singh
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#46
Awesome writing
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#47
मनोरंजक अपडेट! अगले भाग की प्रतीक्षा है.
Comics: 
https://xossipy.com/thread-49909.html (Hindi)
https://xossipy.com/thread-71320.html (Engl)
                                                                              
 
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#48
=== Ajase Devnagari First Higlish Later ===

अध्याय 38: इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट और डिजिटल कन्फेशन

हैदराबाद के उस होटल के कमरे में रात के ठीक ग्यारह बज रहे थे। 

कमरे के भीतर की बत्तियां बुझी हुई थीं। केवल मेरे लैपटॉप की स्क्रीन से निकलती हुई ठंडी, नीली रोशनी मेरे चेहरे और बिस्तर पर बिखरे सिगरेट के राख-पात्र पर पड़ रही थी। एयर-कंडीशनर की लगातार, एकरस सनसनाहट कमरे के सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। 

अचानक, मेरे लैपटॉप के ब्राउज़र पर लगी गुप्त प्रॉक्सी स्क्रिप्ट से एक हल्की, तीखी बीप की आवाज़ गूंजी। 

स्क्रीन के निचले दाएं कोने पर एक हरी इन्फ़ॉर्मेशन चमकी:
[Alert: New Post Published on @pinklily_confessions]

मेरी सांसें एक पल के लिए हलक में ही अटक गईं। 

मेरे कांपते हाथ ने माउस को छुआ और मैंने तेजी से उस नोटिफिकेशन पर क्लिक कर दिया। 

पुणे के फ्लैट ९०३ के मास्टर बेडरूम में, काव्या अपने एंड्रॉइड टैबलेट की स्क्रीन बंद करके तकिए के सहारे आंखें मूंदे लेटी थी। लेकिन उसके द्वारा इंटरनेट के उस अनजान, गुमनाम फोरम पर पोस्ट किया गया वो डिजिटल कबूलनामा अब सीधे मेरी स्क्रीन पर, सफेद अक्षरों में पानी रहा था। 

पोस्ट का शीर्षक था:
"अधूरी रात का सच और सीने में सुलगता इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट"

मैंने अपनी कांपती उंगलियों से सिगरेट की डिब्बी से एक नई सिगरेट निकाली, लाइटर की लौ से उसे सुलगाया और एक बहुत गहरा, कड़वा कश खींचते हुए स्क्रीन के उन शब्दों को पढ़ना शुरू किया। 

काव्या ने लिखा था:


रात बहुत तेजी से ढल गयी... और चारों तरफ वही पुराना, गहरा सन्नाटा पसर गया है। कितना अच्छा होता अगर मेरी ज़िंदगी की हर रात इतनी ही शांत और बेदाग होती। लेकिन कल रात जो कुछ हुआ... हे भगवान, वो रात शायद मेरी रूह पर ताउम्र के लिए एक अमिट छाप छोड़ गयी है।

मैं पिछले कई महीनों से अपने भीतर की भूख और जिस्मानी प्यास को दबाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी। मैंने पूजा-पाठ में मन लगाया, बुटीक के काम में खुद को झोंक दिया, घर की जिम्मेदारियों में खुद को थका दिया... लेकिन ये बदन भी कितना अजीब है। जब जरूरत हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तो इंसान का अपने ही वजूद पर कोई काबू नहीं रहता।

खासकर जब हर रोज़, सुबह से लेकर शाम तक, मुझे ताऊजी के उस विशाल, फौलादी और मर्दाना वजूद का सामना करना पड़ता है। मेरी उत्तेजना और बेचैनी हर बीतते दिन के साथ एक भयानक आग की तरह भड़कती जा रही थी। और फिर कल रात... कल रात ताऊजी ने मुझे जो सुख दिया, जो चरम आनंद मेरे रोम-रोम में भर दिया... मैं लाख चाहकर भी उसे अपने ज़हन से मिटा नहीं पा रही हूँ।

भले ही कल रात मर्यादा की वो आखिरी लकीर नहीं टूटी थी... भले ही उनका वो विशाल लंड मेरे भीतर नहीं समाया था... लेकिन जब वो चरम सुख का तूफ़ान मेरी जांघों पर टूटा था, तो मुझे ऐसा लगा था जैसे एक अरसे बाद मेरी बेजान रूह में किसी ने ज़िंदगी की सांसें फूंक दी हों। वो एक ऐसी मदहोश कर देने वाली याद बन चुका है, जिसे भूलना मेरे बस में नहीं है।


हैदराबाद के होटल में ये पढ़ते ही मेरे सीने में एक अजीब सा झटका लगा। 

काव्या... मेरी शर्मीली, संस्कारी काव्या, जो बेडरूम में बत्ती जलाने पर भी दुपट्टे से अपना बदन ढक लेती थी, वो आज एक अनजान फोरम पर अपने ससुर के साथ बिताए उस गैर-प्रवेशी संभोग के चरम सुख का गुणगान कर रही थी! 

मेरी जांघों के बीच का खून तेजी से खौलने लगा। उत्तेजना का एक भयानक करंट मेरी रीढ़ में दौड़ा, लेकिन उसी पल एक ज़हरीले खंजर ने मेरे दिल को चीर दिया। 

मैंने सिगरेट का धुंआ छोड़ते हुए आगे पढ़ना जारी रखा। 

काव्या ने आगे लिखा था:


राजेश को ऑफिस के काम से कुछ दिनों के लिए हैदराबाद जाना पड़ा। सच कहूं तो जब राजेश घर पर होते हैं, तो कम से कम उनका चेहरा देखकर, उनकी सेवा करके मैं अपने भीतर के शैतान को दबाए रखती हूँ। राजेश का मेरे बगल में होना ही मेरे लिए एक ढाल का काम करता है, जो मुझे होश में रखता है। लेकिन जब मुझे पता चला कि राजेश कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जा रहे हैं और मुझे इस पूरे फ्लैट में ताऊजी के साथ अकेले रहना होगा... तो मेरा दिल एक तरफ अनजाने डर से कांप उठा था, और दूसरी तरफ... एक अजीब सी, पापी उम्मीद से धड़कने लगा था।

राजेश के जाने के बाद, मैंने उनको बेपनाह याद किया। मैंने दिन में कई बार उनको फोन किया... मुझे डर था कि कहीं वो ठंड में बिना स्वेटर के न निकल जाएं, कहीं बाहर का उल्टा-सीधा खाना खाकर उनकी तबीयत न बिगड़ जाए, कहीं वो टाइम पर अपनी दवाइयां लेना न भूल जाएं। एक पत्नी के तौर पर मेरा पूरा ध्यान, मेरी पूरी फिक्र राजेश पर ही टिकी थी। ऑफिस में भी काम करते टाइम मेरे दिमाग में सिर्फ राजेश का ही चेहरा घूमता रहता था।

लेकिन... जब शाम को मैं काम से थककर घर लौटती और दरवाज़ा खुलते ही मेरे सामने ताऊजी का वो चौड़ा, गठीला सीना और उनकी गहरी आंखें आ जातीं... तो पल भर के लिए राजेश की वो सारी यादें किसी धुंध की तरह उड़ जाती थीं। ससुर के साथ उस सन्नाटे भरे घर में अकेले रहना मेरी नसों की धड़कन को बेतहाशा तेज़ कर देता था।

कल रात जब मैंने ताऊजी के साथ रात का खाना खाया, तो उसके बाद मैं अपने मास्टर बेडरूम में सोने चली आई। जब मैं दरवाज़े की कुंडी लगाने के लिए हाथ बढ़ाने लगी... तो अचानक मेरे दिमाग में एक अजीब सा ख्याल कौंधा। राजेश घर पर नहीं हैं। इस बड़े से फ्लैट में सिर्फ हम दो बालिग इंसान हैं। मेरे भीतर की वो अधूरी प्यास, और उस रात ताऊजी की खाट पर की गयी वो मनचली गुस्ताखी... सब कुछ एक साथ मेरे सीने में उमड़ पड़ा।

मेरे हाथ दरवाज़े की कुंडी पर ही रुक गए।

मेरे पापी मन में ये भयानक सवाल उठा, 'क्या ताऊजी राजेश की गैर-मौजूदगी का फायदा उठाकर आज रात मेरे कमरे में आएंगे? क्या वो मुझे अपनी बाहों में भरने की हिम्मत करोगे?'

मेरा दिल एक साथ दो किनारों पर भटक रहा था, एक तरफ गहरी घबराहट और विरोध था, तो दूसरी तरफ एक भयानक, अनकही उम्मीद! उन दोनों के बीच ऐसा घमासान मचा कि मैं फैसला नहीं कर पाई। और आखिरकार... मैंने उस रात अपने बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं किया। मैंने कुंडी खुली छोड़ दी। मैंने सब कुछ किस्मत के भरोसे छोड़ दिया... हालांकि मुझे अच्छी तरह पता था कि ताऊजी जैसे सीधे, उसूलों वाले इंसान के मेरे कमरे में आने की उम्मीद न के बराबर थी।


स्क्रीन पर ये वाक्य पढ़ते ही हैदराबाद में मेरी सिगरेट मेरे हाथ से छूटते-छूटते बची! 

काव्या ने दरवाज़ा जानबूझकर खुला छोड़ा था! 

आज काव्या की अपनी कलम ने ये राज़ खोल दिया था: मेरी पत्नी ने उस रात अपने ससुर के स्वागत के लिए अपने बेडरूम का दरवाज़ा खुला रखा था! 

मेरी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी। मेरे माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। मैंने बदहवास होकर स्क्रीन को और करीब खींचा। 

काव्या का कन्फेशन आगे बढ़ रहा था:


कमरे की बत्ती बुझाकर जब मैं बिस्तर पर लेटी, तो लाख कोशिशों के बाद भी मुझे नींद नहीं आई। मेरी आंखों के सामने बार-बार ताऊजी के गेस्ट रूम का वो मंज़र घूम रहा था, जब मैंने उनकी सोई हुई जिस्म के ऊपर बैठकर अपनी उंगलियों से खुद को छुआ था। उस याद ने मेरी जांघों के बीच ऐसी असहनीय खुजली और तपन पैदा कर दी कि मेरी सांसें फूलने लगीं।

मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही। मैं ख्यालों में ताऊजी को अपने कमरे में आते हुए देख रही थी। मेरी जिस्मानी हवस अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। मैंने अंधेरे में अपनी नाइटी ऊपर खिसकाई और अपनी ही उंगलियों से अपनी प्यास बुझाने लगी... लेकिन उस रात अपनी ही उंगलियों का वो स्पर्श मुझे बिलकुल अधूरा और बेमज़ा लग रहा था। मुझे उस सख्त, खुरदुरे और भारी स्पर्श की तलब थी, जो सिर्फ एक मर्द का जिस्म दे सकता था।

टाइम बीतता गया। और तभी... जब मैं अपनी ही उंगलियों के सहारे उस तड़प को शांत करने की कोशिश कर रही थी, मुझे बाहर गैलरी में भारी कदमों की हल्की सी आहट सुनाई दी!

ताऊजी अपने कमरे से बाहर निकल चुके थे। उनके कदमों की आवाज़ मेरे दरवाज़े की तरफ बढ़ रही थी।

मुझे लगा कि वो शायद पानी पीने या बाथरूम जा रहे होंगे... लेकिन मेरे दिल का एक कोना किसी चमत्कार की भीख मांग रहा था। और फिर... वो भारी कदम ठीक मेरे बेडरूम के दरवाज़े पर आकर रुक गये!

उस पल मेरा पूरा वजूद कांप उठा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। मैं डर के मारे सिहर उठी। अपने आपको सेफ़ दिखाने के लिए, मैंने झटके से अपने हाथ अपनी नाइटी से बाहर निकाले, अपनी दोनों टांगों को पेट की तरफ मोड़कर एक तरफ करवट लेकर लेट गयी और गहरी नींद का नाटक करने लगी। मैंने अपनी आंखें ज़ोर से मींच लीं।

कुछ पलों के सन्नाटे के बाद... दरवाज़े के हैंडल के मुड़ने की वो धीमी सी 'क्लिक' आवाज़ आई!

दरवाज़ा खुला। मेरी सांसें जैसे हमेशा के लिए थम गईं। मेरी छाती के भीतर दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा। मैंने आंखें कसकर बंद रखीं ताकि ताऊजी को ये न लगे कि मैं जाग रही हूँ। मेरा दिमाग बुरी तरह सुन्न हो चुका था, क्या मैं उठकर उनको डांट दूं? क्या मैं उनसे कहूं कि वो बाहर जाएं? या फिर चुपचाप सोने का नाटक करती रहूं? क्या ताऊजी ने शराब पी रखी है? क्या वो बहक गये हैं?

लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ सोच पाती... मैंने महसूस किया कि ताऊजी का वो बड़ा, झुर्रियों और गट्टों से भरा खुरदुरा हाथ मेरी नाइटी के निचले सिरे को बहुत आहिस्ता से ऊपर उठा रहा था!


[Image: krea-edit-custom-ratio-upsc-177-cleaned.png]


मेरी नंगी, गोरी जांघों पर ठंडी हवा का एक झोंका लगा, और फिर... उनका वो विशाल, गर्म और खुरदुरा हाथ सीधे मेरे कूल्हों पर आ टिका।


स्क्रीन पर ये पढ़ते ही मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। 

काव्या जाग रही थी! वो पूरे टाइम जाग रही थी और केवल सोने का नाटक कर रही थी! 

और फिर, अगले पैराग्राफ ने तो मेरे पैरों तले से ज़मीन ही खिसका दी। काव्या ने लिखा था:


ताऊजी के उस खुरदुरे, पहलवान जैसे हाथ ने जब मेरे कूल्हों के मांस को अपनी भारी उंगलियों में भींचा, तो मेरे पूरे जिस्म में बिजली का एक ऐसा ज़ोरदार झटका लगा कि मैं हिल भी न सकी। भय, घबराहट और अनकही उलझन ने मेरे सोचने-समझने की ताकत छीन ली थी।

और फिर... अचानक...

मेरे नंगे, खुले हुए कूल्हों पर कोई बहुत ही गर्म, गीली और मांसल चीज़ आकर चिपक गयी!

पहले तो मुझे लगा कि शायद वो उनका अंग था... लेकिन अगले ही पल जब वो गीली चीज़ मेरे नितंबों के उभार पर रेंगने लगी, तो मुझे अहसास हुआ कि वो ताऊजी की जीभ थी!


[Image: krea-edit-custom-ratio-upsc-179-cleaned.png]


हे भगवान... ताऊजी अपनी जीभ से मेरे कूल्हों को नीचे से ऊपर तक चाट रहे थे!

उनकी खुरदुरी, गर्म जीभ मेरे गोरे कूल्हों के हर एक इंच को चूस रही थी, चाट रही थी, और बीच-बीच में उनके भारी होंठ मेरे मांस को अपनी पकड़ में लेकर चूम रहे थे। उस एक पल ने मेरे भीतर की बची-खुची सारी मर्यादा और सोचने की ताकत को राख के ढेर में बदल दिया। मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। उठकर ताऊजी को धकेलने का वो सारा विचार कहीं हवा में उड़ गया। थोड़ी देर पहले जो प्यास मेरी उंगलियों से अधूरी रह गयी थी, उसे ताऊजी की उस गीली जीभ ने एक भयानक शोले में तब्दील कर दिया!

मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसा सुख महसूस नहीं किया था। सच कहूं तो... जब राजेश का जिस्म पूरी तरह तंदुरुस्त था, तब भी उन्होंने कभी मेरे कूल्हों को अपने मुंह से छूने या चाटने की जहमत नहीं उठाई थी। राजेश के लिए सेक्स हमेशा सिर्फ आगे से, कुछ मिनटों की जल्दबाज़ी का खेल हुआ करता था। लेकिन ताऊजी... एक पचपन साल का देहाती बुजुर्ग मेरी जिस्म के उस अनदेखे हिस्से को ऐसे चाट रहा था जैसे कोई भूखा शेर अपने शिकार का एक-एक कतरा चख रहा हो!

उस टाइम मैं दुनिया का हर कायदा भूल चुकी थी। मैं बस यही चाहती थी कि ताऊजी का वो गीला मुंह कभी मेरे जिस्म से अलग न हो।

फिर... ताऊजी की जीभ मेरे कूल्हों से हटी। वो नशा एक पल के लिए थमा, और इससे पहले कि मैं कोई सांस ले पाती, ताऊजी का मुंह आगे बढ़ा और उन्होंने मेरी पेंटी के पतले कॉटन कपड़े के ऊपर से ही मेरी योनि के उभरे हुए होठों को अपनी जीभ में भर लिया!

ये वो अहसास था जिसने मेरी रूह तक को कंपा दिया। राजेश ने आज तक कभी मेरे उस गुप्त हिस्से को अपने होंठों से नहीं छुआ था। लेकिन ताऊजी मेरी पेंटी के गीले कपड़े को चूस रहे थे, उनकी गर्म सांसें मेरी जांघों की जड़ों को झुलसा रही थीं। उस भयानक, अनूठे सुख के मारे मेरे मुंह से एक तीखी चीख निकलने ही वाली थी, लेकिन मैंने अपने दांतों से तकिए के कोने को कसकर भींच लिया ताकि ताऊजी को पता न चले कि मैं होश में हूँ।

मेरी योनि से काम-रस का एक दरिया बह निकला, लेकिन ताऊजी उसे अपनी जीभ से पेंटी के ऊपर से ही चाटकर साफ करते रहे।


"हरामज़ादी..." 

मेरे सूखे, कंपकंपी भरे होंठों से ये शब्द अनजाने में ही फिसल गया। 

मेरे हाथ की सिगरेट जलकर फिल्टर तक पहुंच चुकी थी, लेकिन मुझे उंगलियों में जलन का अहसास तक नहीं हुआ। मेरी छाती में ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा उड़ेल दिया हो! 

काव्या लिख रही थी कि मैंने उसे कभी वो सुख नहीं दिया... कि मैंने कभी उसके कूल्हों या उसकी योनि को अपने मुंह से नहीं छुआ... और ताऊजी ने पहली ही रात में मेरी पत्नी के उस सबसे नाज़ुक हिस्से को अपनी जीभ से चाटकर उसे मदहोश कर दिया था! 

एक पति के रूप में मेरी मर्दानगी की इससे भयानक, नंगी और शर्मनाक बेइज़्ज़ती और क्या हो सकती थी? 

लेकिन उसी ज़िल्लत के नीचे, एक बीमार, विकृत हवस मेरे पूरे बदन में ज़हर की तरह फैल रही थी। मेरा अपना लिंग पजामे के भीतर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मैं अपनी पत्नी के इस बेबाक, गंदे और रसीले कबूलनामे को एक-एक लफ्ज़ पी जाना चाहता था! 

मैंने कांपते हाथों से पेज को नीचे स्क्रॉल किया। 

काव्या ने आगे लिखा था:


जब ताऊजी ने काफी देर तक मुझे चाटने के बाद अपना मुंह हटाया, तो वो तीव्र नशा धीरे-धीरे कम हुआ और मेरा सुन्न पड़ा दिमाग दोबारा जागने लगा। अब आगे क्या होगा? क्या ताऊजी मेरी पेंटी उतारकर अपना औजार मेरे भीतर ठोक देंगे? क्या मुझे उनको ऐसा करने देना चाहिए?

मैं अभी इसी कशमकश में थी कि तभी मुझे अपनी योनि के मुहाने पर, पेंटी के ऊपर से ही, एक बहुत ही मोटा, गर्म और भारी औजार आकर टिकता हुआ महसूस हुआ। वो इतना विशाल था कि उसकी सिर्फ नोक ही मेरी दोनों जांघों के बीच की जगह को पूरा भर रही थी। वो ताऊजी का फौलादी लंड था।

मुझे लगा कि शायद वो पेंटी के ऊपर से ही रगड़कर अपनी और मेरी हवस को शांत करेंगे। अगर सिर्फ बाहर-बाहर की रगड़ से हम दोनों को तसल्ली मिल जाती, तो मेरे दिल में कोई मलाल नहीं रहता... क्योंकि कम से कम उसे पूरा संभोग तो नहीं कहा जा सकता था। मैं अपने पति के अलावा किसी दूसरे मर्द को अपने भीतर उतारने के लिए कतई तैयार नहीं थी।

लेकिन तभी... एक अनहोनी घटी।

ताऊजी के भारी, खुरदुरे हाथ की उंगलियां मेरी पेंटी के किनारे में उलझीं। उनकी उंगलियों की पीठ ने मेरी योनि की गर्म, फूली हुई फांकों को छुआ और फिर... उन्होंने पूरी ताकत से मेरी पेंटी को ऊपर की तरफ खींचकर एक तरफ सरकाने की कोशिश की!

उनका वो लोहे जैसा सख्त औजार सीधे मेरी नंगी दरार के मुहाने पर दबाव बना रहा था। अगर पेंटी एक इंच भी और खिसक जाती, तो उनका वो विशाल लिंग बिना किसी रुकावट के सीधे मेरे भीतर धंस जाता!

खतरा सिर पर आ चुका था। मेरे पास सोचने का एक सेकंड भी नहीं बचा था। मर्यादा की वो आखिरी दीवार ढहने ही वाली थी। और तभी, अपने जिस्म के स्वाभाविक बचाव में, मैं झटके से बिस्तर पर उठकर बैठ गई। मैंने पूरी ताकत से ताऊजी के उस हाथ को झटक दिया जो मेरी पेंटी खींच रहा था, और मेरे मुंह से एक बेकाबू, तीखी चीख निकली:

'नहीं!'


हैदराबाद के कमरे में मैंने राहत की एक बहुत भारी सांस छोड़ी। 

तो ये था उस 'नहीं' का सच! 

कैमरे में मैंने सिर्फ काव्या को उठते और ताऊजी का हाथ झटकते देखा था। लेकिन उस 'नहीं' के पीछे का ये रोंगटे खड़े कर देने वाला संघर्ष मुझे आज पहली बार समझ में आया था। मेरी पत्नी ने सचमुच अपनी मर्यादा की आखिरी चौखट पर खड़े होकर अपने सतीत्व की रक्षा की थी! 

काव्या ने आगे लिखा था:


मेरी उस चीख ने ताऊजी के होश उड़ा दिए। वो बिस्तर के पास सहमकर खड़े हो गये, जैसे किसी बच्चे को चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया हो। कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे मौत आ गयी हो।

मैंने कांपती आवाज़ में उनसे पूछा, 'क्यों ताऊजी? आप मेरे कमरे में क्यों आए?'

और उसके बाद जो कुछ हुआ... उसने मेरी रूह को झकझोर कर रख दिया। ताऊजी फूट-फूटकर रोने लगे। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उन्होंने जो सच मुझे बताया, उसने मेरे पैरों तले की ज़मीन खींच ली। ताऊजी ने बताया कि उस रात जब मैंने उनकी खाट पर खुद को छुआ था, वो सोए नहीं थे... वो सब कुछ देख रहे थे! उनको ये भी पता चल चुका था कि राजेश की सर्जरी के बाद से हमारी शादीशुदा ज़िंदगी में क्या कमी चल रही है। उन्होंने रोते हुए कहा कि उनको डर था कि कहीं मैं अपनी जिस्मानी भूख से तंग आकर किसी बाहरी गैर-मर्द के चक्कर में न पड़ जाऊं, जिससे हमारे खानदान की इज़्ज़त और राजेश की ज़िंदगी हमेशा के लिए तबाह हो जाए।

ताऊजी बच्चों की तरह सिसक रहे थे। उन्होंने कहा कि वो कल सुबह की पहली बस से हमेशा के लिए गांव लौट जाओगे ताकि मुझे अपनी गंदी शक्ल दोबारा न दिखानी पड़े।

उस पचपन साल के बेबस बुजुर्ग को अपने सामने आंसुओं में डूबा देखकर, मेरा दिल तार-तार हो गया। जिस इंसान ने राजेश के बचपन में अपनी पूरी जवानी झोंक दी, जिसने अपनी ज़िंदगी में कभी शादी तक नहीं की और इस परिवार के लिए अपनी हर ख्वाहिश कुर्बान कर दी... आज वही इंसान मेरे सामने अपने घुटनों पर रो रहा था। मैं इतनी पत्थरदिल कैसे हो सकती थी?

जब वो मुड़कर जाने लगे, तो मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। मैंने उनसे कहा कि वो कहीं नहीं जाएंगे। अगर वो चले गये तो राजेश जीते जी मर जाएगा।

मैंने फैसला कर लिया कि इस लाचार, सीधे बुजुर्ग के लिए मुझे कुछ करना होगा। मैंने अपने हाथों से उनके उस विशाल अंग को सहलाना शुरू किया... लेकिन वो इतना भारी और फौलादी था कि मेरी नाज़ुक हथेलियां थकने लगीं। और मेरे अपने जिस्म के भीतर भी एक भयानक प्यास मचल रही थी।

तभी मुझे कुछ दिन पहले टैबलेट पर पढ़ी हुई वो कहानी याद आई... जांघों के बीच की वो रगड़, जिसमें बिना किसी प्रवेश के, बिना किसी पाप के, दोनों शरीरों को चरम सुख मिल सकता था!

मैंने अपनी दोनों गोरी जांघों को अपने ही काम-रस से चिकना किया और ताऊजी के उस विशाल, दहकते हुए अंग को अपनी दोनों रानों के बीच कसकर दबा लिया। ताऊजी तुरंत समझ गए। उन्होंने अपनी कमर को हिलाना शुरू किया। उनका वो भारी, विशाल लंड मेरी जांघों के रेशमी मांस और मेरी पेंटी के गीले मुहाने पर पूरी ताकत से रगड़ खाने लगा।

वो सुख इतना तीव्र था कि मैं अपनी सिसकियों को दबा नहीं पाई। जब ताऊजी ने अपना हाथ बढ़ाकर मेरे स्तनों को छूना चाहा, तो मैंने तुरंत उनकी कलाई पकड़कर रोक दिया। मैंने अपने मन में तय कर लिया था कि मेरे सीने का ये हिस्सा सिर्फ और सिर्फ मेरे पति राजेश का है... इस पर मैं किसी का हक नहीं बनने दूंगी। ताऊजी ने मेरी उस मर्यादा का सम्मान किया और अपना हाथ पीछे खींच लिया।

और फिर... ताऊजी के धक्कों की रफ्तार और ताकत इतनी बढ़ गयी कि हम दोनों एक साथ उस तूफ़ान में बह गए। मेरे पूरे बदन में चरम सुख का ऐसा ज़ोरदार धमाका हुआ कि मुझे लगा मैं हवा में उड़ रही हूँ। और उसी पल, ताऊजी के उस विशाल औजार से निकला गाढ़ा, खौलता हुआ वीर्य मेरी जांघों, मेरी पेंटी और उस हरी चादर पर किसी लावे की तरह बिखर गया!


स्क्रीन पर ये वाक्य पढ़ते हुए मेरी छाती की धड़कनें इतनी तेज़ हो चुकी थीं कि मुझे अपने कानों में खून के थपेड़े सुनाई दे रहे थे। 

काव्या ने एक-एक सांस, एक-एक झटके और उस वीर्य के एक-एक कतरे का ब्यौरा उस फोरम पर दर्ज कर दिया था! 

और फिर, उस पोस्ट का आखिरी हिस्सा आया... जिसने मेरे होश पूरी तरह उड़ा दिए। 

काव्या ने अपने कबूलनामे के अंत में लिखा था:


उस रात के बाद, मैंने सुबह उठकर अपने आंसुओं से उस चादर को धोया। शाम को जब मैं बुटीक से लौटी, तो ताऊजी के चेहरे पर वही पुराना अपराधबोध था। लेकिन मैंने पहल की। मैंने उनसे अपने लिए मूंग दाल की खिचड़ी बनाने को कहा। जब हम दोनों ने बैठकर खाना खाया, तो ताऊजी ने बहुत ही संजीदगी से हाथ जोड़कर मुझसे माफी मांगी। उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ वो बहक जाने का एक खौफनाक हादसा था... वो आगे से ऐसा कभी नहीं करेंगे और इस बात को एक बुरा सपना मानकर यहीं भूल जाना चाहते हैं ताकि इस घर की मर्यादा और राजेश का विश्वास बचा रहे।

मेरी एक रूह... जो एक संस्कारी, कुलवधू बहू की है... उसने तुरंत राहत की सांस ली। मैंने भी उनसे कह दिया कि ठीक है ताऊजी, जैसा आप कहें। हम इस परिवार की खातिर सब कुछ पहले जैसा कर लेंगे। एक अच्छी पत्नी होने के नाते मुझे इसी बात पर अड़े रहना चाहिए। मुझे अपने सिंदूर, अपनी आठ साल की शादी और इस खानदान की इज़्ज़त की खातिर मर्यादा का ये पर्दा बनाए रखना ही होगा। जो हुआ, वो महज़ एक कमज़ोरी थी, कोई प्यार या रिश्ता नहीं... सिर्फ एक जिस्मानी फिसलन थी।

लेकिन... हाय रे मेरा बदनसीब जिस्म!

रात को बर्तन धोते टाइम जब सिंक पर उनका हाथ मेरे हाथ से टकराया, तो मेरे रोएं-रोएं में वही बिजली दौड़ गयी। सोफे पर बैठते हुए जब मेरी नज़र उनके चौड़े, फौलादी सीने पर पड़ी, तो मेरी दूसरी रूह... वो प्यासी, बगावती औरत... जोर-जोर से चीखने लगी। वो मुझसे कह रही थी कि तू खुद से झूठ बोल रही है! क्या तू ताऊजी के उस विशाल, गर्म अंग की रगड़ को कभी भुला पाएगी? क्या उनकी उस खुरदुरी, मर्दानी जीभ के स्वाद के बाद तू दोबारा उस ठंडे, नाममात्र के रिश्ते में घुट-घुट कर जी सकती है?

मैं अंदर से दो टुकड़ों में बंट चुकी हूँ। मेरा दिमाग कहता है कि ताऊजी का पैर छूकर मर्यादा का दायरा कभी मत लांघो... लेकिन मेरी नसें उस अधूरी प्यास में जल रही हैं। ये कोई मोहब्बत नहीं है, मैं जानती हूँ... ये महज़ एक बेकाबू जिस्मानी भूख है। पर अब जब मैं इस अंधेरे में अकेली लेटी हूँ, तो ये सवाल मेरी जान ले रहा है:

क्या मुझे एक संस्कारी बहू की तरह मर्यादा की दीवार दोबारा खड़ी करके इस आग को यहीं दफन कर देना चाहिए? या फिर क्या मेरा ये भटकता हुआ मन उन्हें सिर्फ ससुर न मानकर अपना 'हमराज़' बनाने की भयानक भूल करने जा रहा है? आप लोग ही बताइए... क्या मुझे रुक जाना चाहिए, या इस आग में खुद को झोंक देना चाहिए?


पोस्ट यहीं पर खत्म हो गयी थी। 

स्क्रीन के सामने बैठा मैं... एक ज़िंदा लाश की तरह पत्थर बन चुका था। 

कमरे का एयर-कंडीशनर पूरी रफ्तार से चल रहा था, लेकिन मेरी पूरी पीठ और मेरी छाती पसीने से लथपथ थी। मेरे हाथ इतने ज़ोर से कांप रहे थे कि मैंने लैपटॉप की स्क्रीन को दोनों हाथों से पकड़ लिया। 

काव्या की वो आखिरी पंक्तियां मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थीं:
'क्या मुझे एक संस्कारी बहू की तरह मर्यादा की दीवार दोबारा खड़ी करके इस आग को यहीं दफन कर देना चाहिए? या फिर क्या मेरा ये भटकता हुआ मन उन्हें सिर्फ ससुर न मानकर अपना 'हमराज़' बनाने की भयानक भूल करने जा रहा है?'

लेकिन... मेरी रूह को छलनी करने वाला ये सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ था। 

पोस्ट पब्लिश हुए अभी मुश्किल से बीस मिनट भी नहीं बीते थे कि ब्राउज़र के निचले कोने में मौजूद 'कमेंट्स' का काउंटर अचानक किसी शेयर बाज़ार के टिकर की तरह तेजी से भागने लगा:
[New Comments: 14 ... 28 ... 43]

उस गुप्त, अनाम डिजिटल नेटवर्क पर, जहां सैकड़ों प्यासी, तन्हा और मर्यादा के बंधनों में घुटती औरतें और मर्द रात के अंधेरे में जागते थे, काव्या की इस रसीली, बेबाक दास्तान ने एक भयानक विस्फोट कर दिया था! 

लोग पागलों की तरह उस पोस्ट के नीचे अपनी प्रतिक्रियाएं लिख रहे थे। 

मेरे कांपते हाथ ने माउस का स्क्रॉल-व्हील नीचे घुमाया। जैसे-जैसे उन अनाम यूज़र्स के कमेंट्स मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, मेरे पैरों तले से बची-खुची ज़मीन भी खिसकती चली गयी! 

पहला कमेंट किसी @mumbai_desire_bahu का था:
Quote:"ओह माय गॉड! तुमने उस रात 'नहीं' बोलकर अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी कर दी! जब 55 साल का वो हट्टा-कट्टा पहलवान तुम्हारी नाइटी उठाकर तुम्हारे कूल्हों और पेंटी पर अपनी गर्म जीभ फिरा रहा था... तब मर्यादा कहाँ थी? एक बार जब मर्द की जीभ औरत के जिस्म के उस नाज़ुक हिस्से पर लग जाती है, तो समझो ताला हमेशा के लिए टूट चुका है! वो तो गाँव के शरीफ बुजुर्ग हैं इसलिए डरकर रुक गये... लेकिन अब गेंद तुम्हारे पाले में है सिस। कल रात जब वो तुम्हारे करीब आएँ तो अपनी पेंटी खुद अपने हाथों से सरका देना। उस साढ़े आठ इंच के औजार का पूरा मज़ा लो, अपनी जवानी को ऐसे कागज़ी पति के नाम पर मत सुखाओ!"

स्क्रीन पर ये पढ़ते ही मेरा चेहरा शर्म और अपमान की आग से तवे की तरह दहक उठा! 
'कागज़ी पति!' 
एक अनजान औरत इंटरनेट पर मेरी मर्दानगी को 'कागज़ी' कह रही थी और मेरी अपनी पत्नी को उकसा रही थी कि वो अपने ससुर के फौलादी अंग को अपने भीतर उतार ले! मेरी छाती पर जैसे किसी ने अंगारे रख दिए हों। 

दूसरा कमेंट किसी उम्रदराज़, पारंपरिक औरत का था, हैंडल था @rural_sanskari_sakhi:
Quote:"बहू, अपने दिल पर इतना बोझ मत डालो। हमारे पुराने देहाती परिवारों में ये कोई नई बात नहीं है। जब जवान पति किसी बीमारी या लाचारी से अधूरा रह जाता है, तो खानदान का बड़ा जेठ या ससुर ही उस सूनी बगिया को सींचता है ताकि खानदान की लाज बची रहे। ताऊजी तुम्हारे पति के अपने बड़े हैं, उन्हीं का खून हैं। उन्होंने पूरी ज़िंदगी बिना शादी किए, अखाड़े और परिवार के नाम पर अकेलेपन में काटी है... कभी किसी औरत का सुख नहीं देखा। अगर वो तुम्हारी प्यास बुझा रहे हैं और तुम उनकी तकलीफ हर रही हो, तो ये कोई पाप नहीं, बल्कि एक पुण्य का काम है। इसे ईश्वर की मर्जी समझकर एक्सेप्ट कर लो... अपने पति को कभी पता मत चलने देना और घर की सुख-शांति बनाए रखना।"

"पुण्य का काम?!"
मेरे हलक से एक दमघोंटू, कड़वी चीख निकली। 
इस बुज़ुर्ग औरत की नज़र में मेरी बीवी का मेरे ताऊजी की बाहों में जाना कोई व्यभिचार नहीं, बल्कि परिवार को बचाने वाला 'पुण्य' था! ये वही ज़हरीली, पारंपरिक दलील थी जिसे काव्या बचपन से सुनती आई थी... और यही दलील उसके दिल के आखिरी अपराधबोध को मोम की तरह पिघला देने के लिए काफी थी! काव्या अगर ये पढ़ेगी, तो उसका बचा-खुचा संकोच भी हमेशा के लिए मिट जाएगा! 

तभी तीसरा कमेंट सामने आया, जो किसी बेबाक और हवस से भरे पुरुष यूज़र का था, @wolf_in_shadows:
Quote:"वाह यार... क्या गजब की रसीली भाभी हो तुम! काश मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी संस्कारी और प्यासी बहू होती! वो ताऊजी सचमुच किस्मत का धनी है जो 28 साल की गोरी, मखमली कली के नितंबों को चाटने का सुख पा गया। भाई, जब सिर्फ जांघों की रगड़ में ही तुम्हारी रूह कांप गयी और वीर्य की बाढ़ आ गयी, तो सोचो जब वो मोटा मूसल पहली बार तुम्हारी तंग सील को फाड़कर अंदर धंसेगा तब तुम्हारा क्या हाल होगा! अगली बार कमरे की लाइट जलाकर करना भाभी, ताकि ताऊजी तुम्हारी उस गोरी छाती को भी अपने मुंह में भर सकें!"

इस घिनौने, नंगे कमेंट ने मेरे पूरे वजूद को झकझोर कर रख दिया। 
कोई अनाम मर्द मेरी पत्नी की योनि, उसके कूल्हों और उसके स्तनों को 'तंग सील' और 'गोरी कली' कहकर हवस की गालियां बक रहा था, और मैं... एक नपुंसक की तरह हैदराबाद के होटल में बैठा अपनी ही बीवी की नग्नता पर दूसरों की लार टपकते देख रहा था! 

लेकिन सबसे ज़हरीला और तीखा वार चौथा कमेंट था, जिसे किसी @confused_metro_wife ने लिखा था:
Quote:"तुम जो अपनी पोस्ट में पूछ रही हो कि क्या तुम्हें मर्यादा बचाकर रुक जाना चाहिए या उन्हें अपना 'हमराज़' बनाने की भूल से बचना चाहिए... डियर, तुम खुद को बेवकूफ बनाना बंद करो! तुम जिस मर्यादा का नकाब ओढ़कर संस्कारी बहू बनने का दिखावा कर रही हो, वो दीवार तो उसी रात ढह चुकी थी जब तुमने उनकी जीभ और उनकी जांघों के बीच अपनी प्यास बुझाई थी। वो सिर्फ तुम्हारे ससुर नहीं हैं, उन्हें खुलकर अपना सच्चा 'हमराज़' बना लो! जब एक मर्द तुम्हारी उस भूख को शांत कर सकता है जिसे तुम्हारा कागज़ी पति आठ साल में छू भी नहीं पाया, तो फिर अपराधबोध कैसा? अगर तुमने ताऊजी को अपना हमराज़ नहीं बनाया और इस आग को दबाया, तो घुटकर मर जाओगी। मर्यादा का ढोंग छोड़ो और उन्हें पूरी तरह अपना बना लो!"

और पांचवां कमेंट था @silent_rebel_woman:
Quote:
"बहन, इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट छोड़ो और खुलकर जियो। ताऊजी ने जो आग लगाई है, वो अब सिर्फ उनके पूरे मिलन से ही बुझेगी। समाज की परवाह मत करो। गो फॉर इट!"

छठा कमेंट एक और शादीशुदा महिला @poonam_secret_diary का था:
Quote:"सच्चाई ये है कि हम औरतें हमेशा एक रक्षक, एक मजबूत साया ढूंढती हैं। जब पति बेडरूम में लाचार हो, तो दिल और जिस्म किसी फौलाद की तलाश करते हैं। तुम्हारे ताऊजी वही फौलाद हैं। डरो मत, जो सुख तुमको वहां मिल रहा है, वो तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे हसीन सच है।"


कमेंट्स की इस अंतहीन कतार ने मेरे सीने में बारूद का एक ऐसा धमाका किया कि मेरा पूरा जिस्म थर-थर कांपने लगा। 

ये कमेंट्स... ये अनाम आवाज़ें कोई मामूली प्रतिक्रियाएं नहीं थीं। ये काव्या के उस सुलगते हुए इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट के लिए खाद और पानी का काम कर रही थीं!
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#49
काव्या जब अपनी स्क्रीन पर इन कमेंट्स को पढ़ेगी, तो उसका हर संकोच, हर डर और हर मर्यादा किसी सूखे पत्ते की तरह उड़ जाएगी। दुनिया की ये औरतें उसे ये यकीन दिला रही थीं कि अपने ससुर के सामने टांगें खोलना कोई गुनाह नहीं, बल्कि उसका स्वाभाविक हक़ है! 

मेरी योजना... मेरा वो गंदा, विकृत खेल... कामयाब तो हो चुका था, लेकिन वो इस हद तक कामयाब हो जाएगा, इसका अंदाज़ा मुझे अपने सबसे डरावने ख्वाबों में भी नहीं था! 

मैंने ताऊजी के सीने में हवस की जो चिंगारी सुलगाई थी, उसने आज मेरी अपनी पत्नी के वजूद को दो फाड़ कर दिया था। काव्या का एक हिस्सा... वो अच्छी, संस्कारी बहू... अभी भी मर्यादा की उस गिरती हुई दीवार को थामने की आखिरी, बेबस कोशिश कर रहा था। वो ताऊजी की उस माफी और दूरी को ढाल बनाकर अपने सिंदूर को बचाना चाहती थी। लेकिन उसका दूसरा हिस्सा... वो भूखी, कामुक औरत... उस फौलादी मर्द की खुरदुरी जीभ और विशाल अंग के स्वाद के बाद आग की तरह सुलग रहा था! 

और सबसे भयानक बात ये थी कि इंटरनेट पर बैठी वो अनाम औरतें काव्या की उस आखिरी नैतिक दीवार को हथौड़े मार-मार कर तोड़ रही थीं! 

वो मेरी पत्नी को उकसा रही थीं कि मर्यादा का दिखावा छोड़ो और अपने ही ससुर को अपना 'हमराज़' बना लो! 

अगर काव्या ने उन औरतों की बात मान ली... अगर उसकी वो प्यासी रूह उसके संस्कारी नकाब पर हावी हो गयी और उसने सचमुच ताऊजी को अपना हमराज़ मान लिया... तो मेरा आठ साल का वैवाहिक जीवन, मेरा प्यार, और मेरी कागज़ी मर्दानगी हमेशा के लिए राख के ढेर में बदल जाएगी! 

"नहीं... ये बहुत आगे निकल चुका है..." 

मैंने बदहवास होकर अपने बाल नोंच लिए। 

मेरे भीतर का वो परवर्ट दर्शक, जो स्क्रीन पर अपनी पत्नी को गैर-मर्द की बाहों में देखकर उत्तेजित होता था, वो आज एक पति की बेबसी और खौफ के आगे थर-थर कांप रहा था। मुझे साफ दिखाई दे रहा था कि अगर मैंने अभी दखल नहीं दिया, तो बहुत जल्द उस घर में मेरी कोई हैसियत नहीं बचेगी। काव्या की वो 'अधूरी प्यास' बहुत जल्द मर्यादा की उस आखिरी पतली दीवार को भी तोड़कर ताऊजी के पूरे औजार को अपने भीतर उतार लेगी! 

मुझे तुरंत पुणे लौटना होगा... अभी इसी टाइम! 

लेकिन मैं इस टाइम, आधी रात को सब कुछ छोड़कर कैसे भाग सकता था? 

मेरा ये दौरा कुछ ही दिनों का था, और कल का दिन इस रीजनल सप्लाई चेन ऑडिट का आखिरी और सबसे अहम दिन था। कल सुबह नौ बजे से शाम तक क्लाइंट्स और सीनियर मैनेजमेंट के साथ फाइनल रिव्यू और क्लोजर मीटिंग्स थीं। कंपनी के शेड्यूल के मुताबिक, मुझे कल शाम का फाइनल साइन-ऑफ पूरा करके ही निकलना था। 

अगर मैं इस टाइम, रात के साढ़े ग्यारह बजे क्लाइंट एस्केलेशन की परवाह किए बिना होटल छोड़कर भागा, तो कल सुबह होते ही मेरी नौकरी पर बन आती। बानेर के फ्लैट का बीस साल का होम लोन और मेरा पूरा करियर... सब कुछ दांव पर लगा था। 

मुझे हर हाल में कल शाम तक रुकना ही होगा... कल रात की वापसी ट्रेन पकड़ने से पहले मेरे हाथ पूरी तरह बंधे हुए थे। 

लेकिन... कल रात तक का टाइम? 

क्या फ्लैट ९०३ की वो नाजुक मर्यादा कल रात तक टिक पाएगी? 

मेरी छाती किसी धौंकनी की तरह चलने लगी। काव्या अपने कमरे में प्यास से तप रही थी, और गेस्ट रूम में वो छप्पन साल का भूखा शेर जाग रहा था। आज की ये बाकी बची रात, और फिर कल का पूरा दिन... उन दोनों को उस बंद फ्लैट के सन्नाटे में पूरी तरह अकेले गुज़ारना था। 

काव्या ने आज अपने कन्फेशन में जिस आग का ज़िक्र किया था... वो आग बारूद के ढेर पर बैठी थी। अगर कल रात मेरे पहुँचने से पहले वो चिंगारी दोबारा भड़क गयी, तो जब तक मैं उस दहलीज पर कदम रखूँगा, तब तक शायद सब कुछ राख हो चुका होगा! 

बाहर खिड़की के पार, हैदराबाद के आसमान में घने, काले बादल घिर आए थे... और फ्लैट ९०३ की उस अंधेरी रात में, आने वाले एक और भयानक तूफ़ान की आहट मेरे कानों में गूंज रही थी।

Chapter 38: Internal Conflict Aur Digital Confession

Hyderabad ke us hotel ke kamre mein raat ke theek gyaarah baj rahe the.

Kamre ke bheetar ki battiyan bujhi hui thiin. Keval mere laptop ki screen se nikalti hui thandi, neeli roshni mere chehre aur bistar par bikhre cigarette ke raakh-paatra par pad rahi thi. Air-conditioner ki lagataar, ekras sansanaahat kamre ke sannaate ko aur gehra bana rahi thi.

Achanak, mere laptop ke browser par lagi gupt proxy script se ek halki, teekhi beep ki aawaaz goonji.

Screen ke nichle daayein kone par ek hari information chamki:
[Alert: New Post Published on @pinklily_confessions]

Meri saansein ek pal ke liye halaq mein hi atak gayiin.

Mere kaanpte haath ne mouse ko chhua aur maine tezi se us notification par click kar diya.

Pune ke flat 903 ke master bedroom mein, Kavya apne Android tablet ki screen band karke takiye ke sahaare aankhein moonde leti thi. Lekin uske dwara internet ke us anjaan, gumnaam forum par post kiya gaya woh digital qaboolnaama ab seedhe meri screen par, safed aksharon mein tair raha tha.

Post ka sheershak tha:
"Adhoori Raat Ka Sach Aur Seene Mein Sulagta Internal Conflict"

Maine apni kaanpti ungliyon se cigarette ki dibbi se ek nayi cigarette nikaali, lighter ki lau se use sulgaaya aur ek bahut gehra, kadwa kash kheenchte hue screen ke un shabdon ko padhna shuru kiya.

Kavya ne likha tha:


Raat bahut tezi se dhal gayi... aur chaaron taraf wahi puraana, gehra sannaata pasar gaya hai. Kitna achha hota agar meri zindagi ki har raat itni hi shaant aur bedaagh hoti. Lekin kal raat jo kuch hua... he Bhagwan, woh raat shaayad meri rooh par ta-umr ke liye ek amit chhaap chhod gayi hai.

Main pichhle kai maheenon se apne bheetar ki bhookh aur jismani pyaas ko dabaane ki har mumkin koshish kar rahi thi. Maine pooja-paath mein man lagaya, boutique ke kaam mein khud ko jhonk diya, ghar ki zimmedaariyon mein khud ko thaka diya... lekin yeh badan bhi kitna ajeeb hai. Jab zaroorat had se zyaada badh jaati hai, to insaan ka apne hi wajood par koi qaaboo nahi rehta.

Khaaskar jab har roz, subah se lekar shaam tak, mujhe Tauji ke us vishaal, faulaadi aur mardaana wajood ka saamna karna padta hai. Meri uttejana aur bechaini har beette din ke saath ek bhayanak aag ki tarah bhadakti ja rahi thi. Aur phir kal raat... kal raat Tauji ne mujhe jo sukh diya, jo charam aanand mere rom-rom mein bhar diya... main laakh chaahkar bhi use apne zehan se mita nahi paa rahi hoon.

Bhale hi kal raat maryaada ki woh aakhiri lakeer nahi tooti thi... bhale hi unka woh vishaal lund mere bheetar nahi samaaya tha... lekin jab woh charam sukh ka toofaan meri jaanghon par toota tha, to mujhe aisa laga tha jaise ek arse baad meri bejaan rooh mein kisi ne zindagi ki saansein phoonk di hon. Woh ek aisi madhosh kar dene wali yaad ban chuka hai, jise bhoolna mere bas mein nahi hai.


Hyderabad ke hotel mein yeh padhte hi mere seene mein ek ajeeb sa jhatka laga.

Kavya... meri sharmeeli, sanskaari Kavya, jo bedroom mein batti jalaane par bhi dupatte se apna badan dhak leti thi, woh aaj ek anjaan forum par apne sasur ke saath bitaaye us gair-praveshi sambhog ke charam sukh ka gungaan kar rahi thi!

Meri jaanghon ke beech ka khoon tezi se khoulne laga. Uttejana ka ek bhayanak current meri reedh mein dauda, lekin usi pal ek zehreele khanjar ne mere dil ko cheer diya.

Maine cigarette ka dhuen chhodte hue aage padhna jaari rakha.

Kavya ne aage likha tha:


Rajesh ko office ke kaam se kuch dinon ke liye Hyderabad jaana pada. Sach kahoon to jab Rajesh ghar par hote hain, to kam se kam unka chehra dekhkar, unki sewa karke main apne bheetar ke shaitaan ko dabaaye rakhti hoon. Rajesh ka mere bagal mein hona hi mere liye ek dhaal ka kaam karta hai, jo mujhe hosh mein rakhta hai. Lekin jab mujhe pata chala ki Rajesh kuch dinon ke liye shehar se baahar ja rahe hain aur mujhe is poore flat mein Tauji ke saath akele rehna hoga... to mera dil ek taraf anjaane dar se kaanp utha tha, aur doosri taraf... ek ajeeb si, paapi ummeed se dhadakne laga tha.

Rajesh ke jaane ke baad, maine unko bepanaah yaad kiya. Maine din mein kai baar unko phone kiya... mujhe dar tha ki kahin woh thand mein bina sweater ke na nikal jaayein, kahin baahar ka ulta-seedha khaana khaakar unki tabiyat na bigad jaaye, kahin woh time par apni dawaiyan lena na bhool jaayein. Ek patni ke taur par mera poora dhyaan, meri poori fikr Rajesh par hi tiki thi. Office mein bhi kaam karte time mere dimaag mein sirf Rajesh ka hi chehra ghoomta rehta tha.

Lekin... jab shaam ko main kaam se thak-kar ghar laut-ti aur darwaza khulte hi mere saamne Tauji ka woh chauda, gatheela seena aur unki gehri aankhein aa jaatiin... to pal bhar ke liye Rajesh ki woh saari yaadein kisi dhundh ki tarah ud jaati thiin. Sasur ke saath us sannaate bhare ghar mein akele rehna meri nason ki dhadkan ko betahaasha tez kar deta tha.

Kal raat jab maine Tauji ke saath raat ka khaana khaaya, to uske baad main apne master bedroom mein sone chali aayi. Jab main darwaze ki kundi lagaane ke liye haath badhaane lagi... to achanak mere dimaag mein ek ajeeb sa khayaal kaundha. Rajesh ghar par nahi hain. Is bade se flat mein sirf hum do baaligh insaan hain. Mere bheetar ki woh adhoori pyaas, aur us raat Tauji ki khaat par ki gayi woh manchali gustaakhi... sab kuch ek saath mere seene mein umad pada.

Mere haath darwaze ki kundi par hi ruk gaye.

Mere paapi man mein yeh bhayanak sawaal utha, 'Kya Tauji Rajesh ki gair-maujoodgi ka faayda uthaakar aaj raat mere kamre mein aayenge? Kya woh mujhe apni baahon mein bharne ki himmat karenge?'

Mera dil ek saath do kinaaron par bhatak raha tha, ek taraf gehri ghabrahat aur virodh tha, to doosri taraf ek bhayanak, anakahi ummeed! Un dono ke beech aisa ghamaasaan macha ki main faisla nahi kar paayi. Aur aakhirkaar... maine us raat apne bedroom ka darwaza andar se band nahi kiya. Maine kundi khuli chhod di. Maine sab kuch kismat ke bharose chhod diya... haalaanki mujhe achhi tarah pata tha ki Tauji jaise seedhe, usoolon wale insaan ke mere kamre mein aane ki ummeed na ke baraabar thi.


Screen par yeh vaakya padhte hi Hyderabad mein meri cigarette mere haath se chhootte-chhootte bachi!

Kavya ne darwaza jaan-boojhkar khula chhoda tha!

Aaj Kavya ki apni qalam ne yeh raaz khol diya tha: meri patni ne us raat apne sasur ke swaagat ke liye apne bedroom ka darwaza khula rakha tha!

Meri chhaati dhaunkani ki tarah chalne lagi. Mere maathe par paseene ki boondein chhalak aayiin. Maine badhawaas hokar screen ko aur qareeb kheencha.

Kavya ka confession aage badh raha tha:


Kamre ki batti bujhaakar jab main bistar par leti, to laakh koshishon ke baad bhi mujhe neend nahi aayi. Meri aankhon ke saamne baar-baar Tauji ke guest room ka woh manzar ghoom raha tha, jab maine unki soyi hui jism ke oopar baithkar apni ungliyon se khud ko chhua tha. Us yaad ne meri jaanghon ke beech aisi asahneeya khujli aur tapan paida kar di ki meri saansein phoolne lagiin.

Main bistar par karwatein badalti rahi. Main khayaalon mein Tauji ko apne kamre mein aate hue dekh rahi thi. Meri jismani hawas apni charam seema par pahunch chuki thi. Maine andhere mein apni nighty oopar khiskaayi aur apni hi ungliyon se apni pyaas bujhaane lagi... lekin us raat apni hi ungliyon ka woh sparsh mujhe bilkul adhoora aur be-maza lag raha tha. Mujhe us sakht, khurdure aur bhaari sparsh ki talab thi, jo sirf ek mard ka jism de sakta tha.

Time beetta gaya. Aur tabhi... jab main apni hi ungliyon ke sahaare us tadap ko shaant karne ki koshish kar rahi thi, mujhe baahar gallery mein bhaari kadmon ki halki si aahat sunai di!

Tauji apne kamre se baahar nikal chuke the. Unke kadmon ki aawaaz mere darwaze ki taraf badh rahi thi.

Mujhe laga ki woh shaayad paani peene ya bathroom ja rahe honge... lekin mere dil ka ek kona kisi chamatkaar ki bheekh maang raha tha. Aur phir... woh bhaari kadam theek mere bedroom ke darwaze par aakar ruk gaye!

Us pal mera poora wajood kaanp utha. Mujhe samajh nahi aa raha tha ki main kya karoon. Main dar ke maare sihar uthi. Apne aapko safe dikhaane ke liye, maine jhatke se apne haath apni nighty se baahar nikaale, apni dono taangon ko pet ki taraf modkar ek taraf karwat lekar let gayi aur gehri neend ka naatak karne lagi. Maine apni aankhein zor se meench liin.

Kuch palon ke sannaate ke baad... darwaze ke handle ke mudne ki woh dheemi si 'click' aawaaz aayi!

Darwaza khula. Meri saansein jaise hamesha ke liye tham gayiin. Meri chhaati ke bheetar dil kisi panchhi ki tarah phadphadaane laga. Maine aankhein kaskar band rakhiin taaki Tauji ko yeh na lage ki main jaag rahi hoon. Mera dimaag buri tarah sunn ho chuka tha, kya main uthkar unko daant doon? Kya main unse kahoon ki woh baahar jaayein? Ya phir chupchaap sone ka naatak karti rahoon? Kya Tauji ne sharaab pee rakhi hai? Kya woh behak gaye hain?

Lekin isse pehle ki main kuch soch paati... maine mehsoos kiya ki Tauji ka woh bada, jhurriyon aur gatton se bhara khurdura haath meri nighty ke nichle sire ko bahut aahista se oopar utha raha tha!

[Image: krea-edit-custom-ratio-upsc-177-cleaned.png]

Meri nangi, gori jaanghon par thandi hawa ka ek jhonka laga, aur phir... unka woh vishaal, garam aur khurdura haath seedhe mere koolhon par aa tika.


Screen par yeh padhte hi meri aankhein phati ki phati reh gayiin.

Kavya jaag rahi thi! Woh poore time jaag rahi thi aur keval sone ka naatak kar rahi thi!

Aur phir, agle paragraph ne to mere pairon tale se zameen hi khiska di. Kavya ne likha tha:


Tauji ke us khurdure, pehalwaan jaise haath ne jab mere koolhon ke maans ko apni bhaari ungliyon mein bheencha, to mere poore jism mein bijli ka ek aisa zordaar jhatka laga ki main hil bhi na saki. Bhay, ghabrahat aur anakahi uljhan ne mere sochne-samajhne ki taaqat chheen li thi.

Aur phir... achanak...

Mere nange, khule hue koolhon par koi bahut hi garam, geeli aur maansal cheez aakar chipak gayi!

Pehle to mujhe laga ki shaayad woh unka ang tha... lekin agle hi pal jab woh geeli cheez mere nitambon ke ubhaar par rengne lagi, to mujhe ehsaas hua ki woh Tauji ki jeebh thi!

[Image: krea-edit-custom-ratio-upsc-179-cleaned.png]

He Bhagwan... Tauji apni jeebh se mere koolhon ko neeche se oopar tak chaat rahe the!

Unki khurduri, garam jeebh mere gore koolhon ke har ek inch ko choos rahi thi, chaat rahi thi, aur beech-beech mein unke bhaari honth mere maans ko apni pakad mein lekar choom rahe the. Us ek pal ne mere bheetar ki bachi-khuchi saari maryaada aur sochne ki taaqat ko raakh ke dher mein badal diya. Mere dimaag ne kaam karna band kar diya. Uthkar Tauji ko dhakelne ka woh saara vichaar kahin hawa mein ud gaya. Thodi der pehle jo pyaas meri ungliyon se adhoori reh gayi thi, use Tauji ki us geeli jeebh ne ek bhayanak shole mein tabdeel kar diya!

Maine apni zindagi mein kabhi aisa sukh mehsoos nahi kiya tha. Sach kahoon to... jab Rajesh ka jism poori tarah tandurust tha, tab bhi unhone kabhi mere koolhon ko apne munh se chhoone ya chaatne ki zehmat nahi uthaayi thi. Rajesh ke liye sex hamesha sirf aage se, kuch minuteon ki jaldbaazi ka khel hua karta tha. Lekin Tauji... ek pachpan saal ka dehati bujurg meri jism ke us andekhe hisse ko aise chaat raha tha jaise koi bhookha sher apne shikaar ka ek-ek qatra chakh raha ho!

Us time main duniya ka har qaayda bhool chuki thi. Main bas yahi chahti thi ki Tauji ka woh geela munh kabhi mere jism se alag na ho.

Phir... Tauji ki jeebh mere koolhon se hati. Woh nasha ek pal ke liye thama, aur isse pehle ki main koi saans le paati, Tauji ka munh aage badha aur unhone meri panty ke patle cotton kapde ke oopar se hi meri yoni ke ubhre hue honthon ko apni jeebh mein bhar liya!

Yeh woh ehsaas tha jisne meri rooh tak ko kampa diya. Rajesh ne aaj tak kabhi mere us gupt hisse ko apne honthon se nahi chhua tha. Lekin Tauji meri panty ke geele kapde ko choos rahe the, unki garam saansein meri jaanghon ki jadon ko jhulsa rahi thiin. Us bhayanak, anoothe sukh ke maare mere munh se ek teekhi cheekh nikalne hi wali thi, lekin maine apne daanton se takiye ke kone ko kaskar bheencha liya taaki Tauji ko pata na chale ki main hosh mein hoon.

Meri yoni se kaam-ras ka ek dariya beh nikla, lekin Tauji use apni jeebh se panty ke oopar se hi chaatkar saaf karte rahe.


"Haraamzaadi..."

Mere sookhe, kampkampi bhare honthon se yeh shabd anjaane mein hi fisal gaya.

Mere haath ki cigarette jalkar filter tak pahunch chuki thi, lekin mujhe ungliyon mein jalan ka ehsaas tak nahi hua. Meri chhaati mein aisa lag raha tha jaise kisi ne pighla hua seesa undel diya ho!

Kavya likh rahi thi ki maine use kabhi woh sukh nahi diya... ki maine kabhi uske koolhon ya uski yoni ko apne munh se nahi chhua... aur Tauji ne pehli hi raat mein meri patni ke us sabse naazuk hisse ko apni jeebh se chaatkar use madhosh kar diya tha!

Ek pati ke roop mein meri mardaangi ki isse bhayanak, nangi aur sharmnaak be-izzati aur kya ho sakti thi?

Lekin usi zillat ke neeche, ek beemaar, vikrit hawas mere poore badan mein zeher ki tarah phail rahi thi. Mera apna ling pajaame ke bheetar patthar ki tarah sakht ho chuka tha. Main apni patni ke is bebaak, gande aur raseele qaboolnaame ko ek-ek lafz pee jaana chahta tha!

Maine kaanpte haathon se page ko neeche scroll kiya.

Kavya ne aage likha tha:


Jab Tauji ne kaafi der tak mujhe chaatne ke baad apna munh hataaya, to woh teevra nasha dheere-dheere kam hua aur mera sunn pada dimaag dobaara jaagne laga. Ab aage kya hoga? Kya Tauji meri panty utaarkar apna auzaar mere bheetar thok denge? Kya mujhe unko aisa karne dena chahiye?

Main abhi isi kashmakash mein thi ki tabhi mujhe apni yoni ke muhaane par, panty ke oopar se hi, ek bahut hi mota, garam aur bhaari auzaar aakar tikta hua mehsoos hua. Woh itna vishaal tha ki uski sirf nok hi meri dono jaanghon ke beech ki jagah ko poora bhar rahi thi. Woh Tauji ka faulaadi lund tha.

Mujhe laga ki shaayad woh panty ke oopar se hi ragadkar apni aur meri hawas ko shaant karenge. Agar sirf baahar-baahar ki ragad se hum dono ko tasalli mil jaati, to mere dil mein koi malaal nahi rehta... kyonki kam se kam use poora sambhog to nahi kaha ja sakta tha. Main apne pati ke alaawa kisi doosre mard ko apne bheetar utaarne ke liye katai taiyaar nahi thi.

Lekin tabhi... ek anhoni ghati.

Tauji ke bhaari, khurdure haath ki ungliyan meri panty ke kinaare mein uljhiin. Unki ungliyon ki peeth ne meri yoni ki garam, phooli hui phaankon ko chhua aur phir... unhone poori taaqat se meri panty ko oopar ki taraf kheenchkar ek taraf sarkaane ki koshish ki!

Unka woh lohe jaisa sakht auzaar seedhe meri nangi daraar ke muhaane par dabaav bana raha tha. Agar panty ek inch bhi aur khisak jaati, to unka woh vishaal ling bina kisi rukaawat ke seedhe mere bheetar dhans jaata!

Khatra sir par aa chuka tha. Mere paas sochne ka ek second bhi nahi bacha tha. Maryaada ki woh aakhiri deewaar dhehne hi wali thi. Aur tabhi, apne jism ke swaabhaavik bachaav mein, main jhatke se bistar par uthkar baith gayi. Maine poori taaqat se Tauji ke us haath ko jhatak diya jo meri panty kheench raha tha, aur mere munh se ek beqaaboo, teekhi cheekh nikli:

'Nahi!'


Hyderabad ke kamre mein maine raahat ki ek bahut bhaari saans chhodi.

To yeh tha us 'Nahi' ka sach!

Camera mein maine sirf Kavya ko uthte aur Tauji ka haath jhatakte dekha tha. Lekin us 'Nahi' ke peeche ka yeh rongte khade kar dene wala sangharsh mujhe aaj pehli baar samajh mein aaya tha. Meri patni ne sachmuch apni maryaada ki aakhiri chaukhat par khade hokar apne sateetva ki raksha ki thi!

Kavya ne aage likha tha:


Meri us cheekh ne Tauji ke hosh uda diye. Woh bistar ke paas sahamkar khade ho gaye, jaise kisi bachhe ko chori karte hue range haathon pakad liya gaya ho. Kamre mein aisa sannaata chha gaya jaise maut aa gayi ho.

Maine kaanpti aawaaz mein unse poochha, 'Kyon Tauji? Aap mere kamre mein kyon aaye?'

Aur uske baad jo kuch hua... usne meri rooh ko jhakjhor kar rakh diya. Tauji phoot-phootkar rone lage. Unhone apne dono haath jod liye. Unhone jo sach mujhe bataaya, usne mere pairon tale ki zameen kheench li. Tauji ne bataaya ki us raat jab maine unki khaat par khud ko chhua tha, woh soye nahi the... woh sab kuch dekh rahe the! Unko yeh bhi pata chal chuka tha ki Rajesh ki surgery ke baad se humari shaadishuda zindagi mein kya kami chal rahi hai. Unhone rote hue kaha ki unko dar tha ki kahin main apni jismani bhookh se tang aakar kisi baahari gair-mard ke chakkar mein na pad jaaoon, jisse humare khaandaan ki izzat aur Rajesh ki zindagi hamesha ke liye tabaah ho jaaye.

Tauji bachhon ki tarah sisak rahe the. Unhone kaha ki woh kal subah ki pehli bus se hamesha ke liye gaanv laut jaayenge taaki mujhe apni gandi shakl dobaara na dikhaani pade.

Us pachpan saal ke bebas bujurg ko apne saamne aansuon mein dooba dekhkar, mera dil taar-taar ho gaya. Jis insaan ne Rajesh ke bachpan mein apni poori jawaani jhonk di, jisne apni zindagi mein kabhi shaadi tak nahi ki aur is parivaar ke liye apni har khwaahish qurbaan kar di... aaj wahi insaan mere saamne apne ghutnon par ro raha tha. Main itni patthardil kaise ho sakti thi?

Jab woh mudkar jaane lage, to maine unka haath pakad liya. Maine unse kaha ki woh kahin nahi jaayenge. Agar woh chale gaye to Rajesh jeete ji mar jaayega.

Maine faisla kar liya ki is laachaar, seedhe bujurg ke liye mujhe kuch karna hoga. Maine apne haathon se unke us vishaal ang ko sehlaana shuru kiya... lekin woh itna bhaari aur faulaadi tha ki meri naazuk hatheliyan thakne lagiin. Aur mere apne jism ke bheetar bhi ek bhayanak pyaas machal rahi thi.

Tabhi mujhe kuch din pehle tablet par padhi hui woh kahaani yaad aayi... jaanghon ke beech ki woh ragad, jismein bina kisi pravesh ke, bina kisi paap ke, dono shareeron ko charam sukh mil sakta tha!

Maine apni dono gori jaanghon ko apne hi kaam-ras se chikna kiya aur Tauji ke us vishaal, dehakte hue ang ko apni dono raanon ke beech kaskar daba liya. Tauji turant samajh gaye. Unhone apni kamar ko hilaana shuru kiya. Unka woh bhaari, vishaal lund meri jaanghon ke reshmi maans aur meri panty ke geele muhaane par poori taaqat se ragad khaane laga.

Woh sukh itna teevra tha ki main apni siskiyon ko daba nahi paayi. Jab Tauji ne apna haath badhaakar mere stanon ko chhoona chaaha, to maine turant unki kalaayi pakadkar rok diya. Maine apne man mein tay kar liya tha ki mere seene ka yeh hissa sirf aur sirf mere pati Rajesh ka hai... is par main kisi ka haq nahi banne doongi. Tauji ne meri us maryaada ka sammaan kiya aur apna haath peeche kheench liya.

Aur phir... Tauji ke dhakkon ki raftaar aur taaqat itni badh gayi ki hum dono ek saath us toofaan mein beh gaye. Mere poore badan mein charam sukh ka aisa zordaar dhamaka hua ki mujhe laga main hawa mein ud rahi hoon. Aur usi pal, Tauji ke us vishaal auzaar se nikla gaadha, khoulta hua veerya meri jaanghon, meri panty aur us hari chaadar par kisi laave ki tarah bikhar gaya!


Screen par yeh vaakya padhte hue meri chhaati ki dhadkanein itni tez ho chuki thiin ki mujhe apne kaanon mein khoon ke thapede sunai de rahe the.

Kavya ne ek-ek saans, ek-ek jhatke aur us veerya ke ek-ek qatre ka byora us forum par darj kar diya tha!

Aur phir, us post ka aakhiri hissa aaya... jisne mere hosh poori tarah uda diye.

Kavya ne apne qaboolnaame ke ant mein likha tha:


Us raat ke baad, maine subah uthkar apne aansuon se us chaadar ko dhoya. Shaam ko jab main boutique se lauti, to Tauji ke chehre par wahi puraana apraadhbodh tha. Lekin maine pehal ki. Maine unse apne liye moong daal ki khichdi banaane ko kaha. Jab hum dono ne baithkar khaana khaaya, to Tauji ne bahut hi sanjeedgi se haath jodkar mujhse maafi maangi. Unhone kaha ki jo kuch hua woh behak jaane ka ek khaufnaak haadsa tha... woh aage se aisa kabhi nahi karenge aur is baat ko ek bura sapna maankar yahin bhool jaana chahte hain taaki is ghar ki maryaada aur Rajesh ka vishwaas bacha rahe.

Meri ek rooh... jo ek sanskaari, kulvadhoo bahu ki hai... usne turant raahat ki saans li. Maine bhi unse keh diya ki theek hai Tauji, jaisa aap kahein. Hum is parivaar ki khaatir sab kuch pehle jaisa kar lenge. Ek achhi patni hone ke naate mujhe isi baat par ade rehna chahiye. Mujhe apne sindoor, apni aath saal ki shaadi aur is khaandaan ki izzat ki khaatir maryaada ka yeh parda banaaye rakhna hi hoga. Jo hua, woh mehaz ek kamzori thi, koi pyaar ya rishta nahi... sirf ek jismani fislan thi.

Lekin... haay re mera badnaseeb jism!

Raat ko bartan dhote time jab sink par unka haath mere haath se takraaya, to mere royen-royen mein wahi bijli daud gayi. Sofa par baithte hue jab meri nazar unke chaude, faulaadi seene par padi, to meri doosri rooh... woh pyaasi, baghaawati aurat... zor-zor se cheekhne lagi. Woh mujhse keh rahi thi ki tu khud se jhooth bol rahi hai! Kya tu Tauji ke us vishaal, garam ang ki ragad ko kabhi bhula paayegi? Kya unki us khurduri, mardaani jeebh ke swaad ke baad tu dobaara us thande, naam-maatra ke rishte mein ghut-ghut kar jee sakti hai?

Main andar se do tukdon mein bant chuki hoon. Mera dimaag kehta hai ki Tauji ka pair chhookar maryaada ka daayra kabhi mat laangho... lekin meri nasein us adhoori pyaas mein jal rahi hain. Yeh koi mohabbat nahi hai, main jaanti hoon... yeh mehaz ek beqaaboo jismani bhookh hai. Par ab jab main is andhere mein akeli leti hoon, to yeh sawaal meri jaan le raha hai:

Kya mujhe ek sanskaari bahu ki tarah maryaada ki deewaar dobaara khadi karke is aag ko yahin dafan kar dena chahiye? Ya phir kya mera yeh bhatakta hua man unhein sirf sasur na maankar apna 'hamraaz' banaane ki bhayanak bhool karne ja raha hai? Aap log hi bataiye... kya mujhe ruk jaana chahiye, ya is aag mein khud ko jhonk dena chahiye?


Post yahin par khatam ho gayi thi.

Screen ke saamne baitha main... ek zinda laash ki tarah patthar ban chuka tha.

Kamre ka air-conditioner poori raftaar se chal raha tha, lekin meri poori peeth aur meri chhaati paseene se lathpath thi. Mere haath itne zor se kaanp rahe the ki maine laptop ki screen ko dono haathon se pakad liya.

Kavya ki woh aakhiri panktiyan mere dimaag mein hathode ki tarah baj rahi thiin:
'Kya mujhe ek sanskaari bahu ki tarah maryaada ki deewaar dobaara khadi karke is aag ko yahin dafan kar dena chahiye? Ya phir kya mera yeh bhatakta hua man unhein sirf sasur na maankar apna 'hamraaz' banaane ki bhayanak bhool karne ja raha hai?'

Lekin... meri rooh ko chhalni karne wala yeh silsila yahin khatam nahi hua tha.

Post publish hue abhi mushkil se bees minute bhi nahi beete the ki browser ke nichle kone mein maujood 'comments' ka counter achanak kisi share bazaar ke ticker ki tarah tezi se bhaagne laga:
[New Comments: 14 ... 28 ... 43]

Us gupt, anaam digital network par, jahan saikdon pyaasi, tanha aur maryaada ke bandhanon mein ghutti auratein aur mard raat ke andhere mein jaagte the, Kavya ki is raseeli, bebaak daastaan ne ek bhayanak visphot kar diya tha!

Log paaglon ki tarah us post ke neeche apni pratikriyaayein likh rahe the.

Mere kaanpte haath ne mouse ka scroll-wheel neeche ghumaaya. Jaise-jaise un anaam users ke comments meri aankhon ke saamne se guzarne lage, mere pairon tale se bachi-khuchi zameen bhi khisakti chali gayi!

Pehla comment kisi @mumbai_desire_bahu ka tha:

Quote:"Oh my God! Tumne us raat 'Nahi' bolkar apni zindagi ki sabse badi bewakoofi kar di! Jab 55 saal ka woh hatta-katta pehalwaan tumhari nighty uthaakar tumhaare koolhon aur panty par apni garam jeebh phira raha tha... tab maryaada kahan thi? Ek baar jab mard ki jeebh aurat ke jism ke us naazuk hisse par lag jaati hai, to samjho taala hamesha ke liye toot chuka hai! Woh to gaanv ke shareef bujurg hain isliye darkar ruk gaye... lekin ab gend tumhaare paale mein hai sis. Kal raat jab woh tumhaare qareeb aayein to apni panty khud apne haathon se sarka dena. Us saadhe aath inch ke auzaar ka poora mazaa lo, apni jawaani ko aise kaagzi pati ke naam par mat sukhaao!"

Screen par yeh padhte hi mera chehra sharm aur apmaan ki aag se tawe ki tarah dehak utha!
'Kaagzi pati!'
Ek anjaan aurat internet par meri mardaangi ko 'kaagzi' keh rahi thi aur meri apni patni ko uksaa rahi thi ki woh apne sasur ke faulaadi ang ko apne bheetar utaar le! Meri chhaati par jaise kisi ne angaare rakh diye hon.

Doosra comment kisi umrdaraaz, paaramparik aurat ka tha, handle tha @rural_sanskari_sakhi:

Quote:"Bahu, apne dil par itna bojh mat daalo. Humare puraane dehati parivaaron mein yeh koi nayi baat nahi hai. Jab jawaan pati kisi beemaari ya laachaari se adhoora reh jaata hai, to khaandaan ka bada jeth ya sasur hi us sooni bagiya ko seenchta hai taaki khaandaan ki laaj bachi rahe. Tauji tumhaare pati ke apne bade hain, unhi ka khoon hain. Unhone poori zindagi bina shaadi kiye, akhaade aur parivaar ke naam par akelepan mein kaati hai... kabhi kisi aurat ka sukh nahi dekha. Agar woh tumhaari pyaas bujhaa rahe hain aur tum unki takleef har rahi ho, to yeh koi paap nahi, balki ek punya ka kaam hai. Ise ishwar ki marzi samajhkar accept kar lo... apne pati ko kabhi pata mat chalne dena aur ghar ki sukh-shaanti banaaye rakhna."

"Punya ka kaam?!"
Mere halaq se ek damghontu, kadwi cheekh nikli.
Is bujurg aurat ki nazar mein meri biwi ka mere Tauji ki baahon mein jaana koi vyabhichaar nahi, balki parivaar ko bachaane wala 'punya' tha! Yeh wahi zehreeli, paaramparik daleel thi jise Kavya bachpan se sunti aayi thi... aur yahi daleel uske dil ke aakhiri apraadhbodh ko mom ki tarah pighla dene ke liye kaafi thi! Kavya agar yeh padhegi, to uska bacha-khucha sankoch bhi hamesha ke liye mit jaayega!

Tabhi teesra comment saamne aaya, jo kisi bebaak aur hawas se bhare purush user ka tha, @wolf_in_shadows:

Quote:"Waah yaar... kya gazab ki raseeli bhabhi ho tum! Kaash mere ghar mein bhi tumhaare jaisi sanskaari aur pyaasi bahu hoti! Woh Tauji sachmuch kismat ka dhani hai jo 28 saal ki gori, makhmali kali ke nitambon ko chaatne ka sukh paa gaya. Bhai, jab sirf jaanghon ki ragad mein hi tumhaari rooh kaanp gayi aur veerya ki baadh aa gayi, to socho jab woh mota moosal pehli baar tumhaari tang seal ko phaadkar andar dhansega tab tumhaara kya haal hoga! Agli baar kamre ki light jalaakar karna bhabhi, taaki Tauji tumhaari us gori chhaati ko bhi apne munh mein bhar sakein!"

Is ghinoune, nange comment ne mere poore wajood ko jhakjhor kar rakh diya.
Koi anaam mard meri patni ki yoni, uske koolhon aur uske stanon ko 'tang seal' aur 'gori kali' kehkar hawas ki gaaliyan bak raha tha, aur main... ek napunsak ki tarah Hyderabad ke hotel mein baitha apni hi biwi ki nagnata par doosron ki laar tapakte dekh raha tha!

Lekin sabse zehreela aur teekha waar chautha comment tha, jise kisi @confused_metro_wife ne likha tha:

Quote:"Kumudini, tum jo apni post mein poochh rahi ho ki kya tumhe maryaada bachaakar ruk jaana chahiye ya unhein apna 'hamraaz' banaane ki bhool se bachna chahiye... dear, tum khud ko bewakoof banaana band karo! Tum jis maryaada ka naqaab oadhkar sanskaari bahu banne ka dikhaawa kar rahi ho, woh deewaar to usi raat dheh chuki thi jab tumne unki jeebh aur unki jaanghon ke beech apni pyaas bujhaayi thi. Woh sirf tumhaare sasur nahi hain, unhein khulkar apna sachha 'hamraaz' bana lo! Jab ek mard tumhaari us bhookh ko shaant kar sakta hai jise tumhaara kaagzi pati aath saal mein chhoo bhi nahi paaya, to phir apraadhbodh kaisa? Agar tumne Tauji ko apna hamraaz nahi banaya aur is aag ko dabaya, to ghutkar mar jaaogi. Maryaada ka dhong chhodo aur unhein poori tarah apna bana lo!"

Aur paanchwaan comment tha @silent_rebel_woman:

Quote:"Behan, internal conflict chhodo aur khulkar jiyo. Tauji ne jo aag lagaayi hai, woh ab sirf unke poore milan se hi bujhegi. Samaaj ki parwaah mat karo. Go for it!"

Chhatha comment ek aur shaadishuda mahila @poonam_secret_diary ka tha:

Quote:"Sachhaayi yeh hai ki hum auratein hamesha ek rakshak, ek mazboot saaya dhoondhti hain. Jab pati bedroom mein laachaar ho, to dil aur jism kisi faulaad ki talaash karte hain. Tumhaare Tauji wahi faulaad hain. Daro mat, jo sukh tumko wahan mil raha hai, woh tumhaari zindagi ka sabse haseen sach hai."


Comments ki is anthheen qataar ne mere seene mein baarood ka ek aisa dhamaka kiya ki mera poora jism thar-thar kaanpne laga.

Yeh comments... yeh anaam aawaazein koi maamooli pratikriyaayein nahi thiin. Yeh Kavya ke us sulagte hue internal conflict ke liye khaad aur paani ka kaam kar rahi thiin!

Kavya jab apni screen par in comments ko padhegi, to uska har sankoch, har dar aur har maryaada kisi sookhe patte ki tarah ud jaayegi. Duniya ki yeh auratein use yeh yaqeen dila rahi thiin ki apne sasur ke saamne taangein kholna koi gunaah nahi, balki uska swaabhaavik haq hai!

Meri yojana... mera woh ganda, vikrit khel... kaamyaab to ho chuka tha, lekin woh is had tak kaamyaab ho jaayega, iska andaaza mujhe apne sabse darawne khwaabon mein bhi nahi tha!

Maine Tauji ke seene mein hawas ki jo chingaari sulgaayi thi, usne aaj meri apni patni ke wajood ko do phaad kar diya tha. Kavya ka ek hissa... woh achhi, sanskaari bahu... abhi bhi maryaada ki us girti hui deewaar ko thaamne ki aakhiri, bebas koshish kar raha tha. Woh Tauji ki us maafi aur doori ko dhaal banaakar apne sindoor ko bachaana chahti thi. Lekin uska doosra hissa... woh bhookhi, kaamuk aurat... us faulaadi mard ki khurduri jeebh aur vishaal ang ke swaad ke baad aag ki tarah sulag raha tha!

Aur sabse bhayanak baat yeh thi ki internet par baithi woh anaam auratein Kavya ki us aakhiri naitik deewaar ko hathode maar-maar kar tod rahi thiin!

Woh meri patni ko uksaa rahi thiin ki maryaada ka dikhaawa chhodo aur apne hi sasur ko apna 'hamraaz' bana lo!

Agar Kavya ne un auraton ki baat maan li... agar uski woh pyaasi rooh uske sanskaari naqaab par haavi ho gayi aur usne sachmuch Tauji ko apna hamraaz maan liya... to mera aath saal ka vaivaahik jeevan, mera pyaar, aur meri kaagzi mardaangi hamesha ke liye raakh ke dher mein badal jaayegi!

"Nahi... yeh bahut aage nikal chuka hai..."

Maine badhawaas hokar apne baal nonch liye.

Mere bheetar ka woh pervert darshak, jo screen par apni patni ko gair-mard ki baahon mein dekhkar uttejit hota tha, woh aaj ek pati ki bebasi aur khauf ke aage thar-thar kaanp raha tha. Mujhe saaf dikhai de raha tha ki agar maine abhi dakhal nahi diya, to bahut jald us ghar mein meri koi haisiyat nahi bachegi. Kavya ki woh 'adhoori pyaas' bahut jald maryaada ki us aakhiri patli deewaar ko bhi todkar Tauji ke poore auzaar ko apne bheetar utaar legi!

Mujhe turant Pune lautna hoga... abhi isi time!

Lekin main is time, aadhi raat ko sab kuch chhodkar kaise bhaag sakta tha?

Mera yeh daura kuch hi dinon ka tha, aur kal ka din is regional supply chain audit ka aakhiri aur sabse ahem din tha. Kal subah nau baje se shaam tak clients aur senior management ke saath final review aur closure meetings thiin. Company ke schedule ke mutabiq, mujhe kal shaam ka final sign-off poora karke hi nikalna tha.

Agar main is time, raat ke saadhe gyaarah baje client escalation ki parwaah kiye bina hotel chhodkar bhaaga, to kal subah hote hi meri naukri par ban aati. Baner ke flat ka bees saal ka home loan aur mera poora career... sab kuch daanv par laga tha.

Mujhe har haal mein kal shaam tak rukna hi hoga... kal raat ki waapsi train pakadne se pehle mere haath poori tarah bandhe hue the.

Lekin... kal raat tak ka time?

Kya flat 903 ki woh naazuk maryaada kal raat tak tik paayegi?

Meri chhaati kisi dhaunkani ki tarah chalne lagi. Kavya apne kamre mein pyaas se tap rahi thi, aur guest room mein woh chhappan saal ka bhookha sher jaag raha tha. Aaj ki yeh baaqi bachi raat, aur phir kal ka poora din... un dono ko us band flat ke sannaate mein poori tarah akele guzaarna tha.

Kavya ne aaj apne confession mein jis aag ka zikr kiya tha... woh aag baarood ke dher par baithi thi. Agar kal raat mere pahunchne se pehle woh chingaari dobaara bhadak gayi, to jab tak main us dehleez par kadam rakhoonga, tab tak shaayad sab kuch raakh ho chuka hoga!

Baahar khidki ke paar, Hyderabad ke aasmaan mein ghane, kaale baadal ghir aaye the... aur flat 903 ki us andheri raat mein, aane wale ek aur bhayanak toofaan ki aahat mere kaanon mein goonj rahi thi.
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#50
अध्याय 39: भोर की चाय और मौन समझौता

हैदराबाद के उस बिजनेस होटल के कमरे में, सुबह के ठीक सवा छह बज रहे थे। 

खिड़की के पार बाहर का आसमान हल्के नारंगी और मटमैले भूरे रंग में बदल रहा था, जहाँ शहर की चौड़ी सड़कों पर सुबह की पहली गाड़ियाँ रेंगने लगी थीं। मेज़ पर रात भर की ठंडी हो चुकी कॉफी के दो खाली कप और सिगरेट की राख से भरी ऐशट्रे रखी थी। कंपनी के इस कुछ दिनों के रीजनल सप्लाई चेन ऑडिट का आज आखिरी और सबसे अहम दिन था। सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक क्लाइंट्स और सीनियर मैनेजमेंट के साथ फाइनल रिव्यू और क्लोजर मीटिंग्स थीं। कंपनी के शेड्यूल के मुताबिक, मुझे आज दिन भर का ये फाइनल साइन-ऑफ पूरा करके ही निकलना था, ताकि मैं आज रात की अपनी तयशुदा ट्रेन पकड़कर पुणे वापस लौट सकूं। 

लेकिन इस टाइम... होटल की मेज़ पर खुला मेरा लैपटॉप सीधे वाई-फाई से जुड़ा था और मेरी सूजी हुई, लाल आंखें स्क्रीन पर चल रही पुणे के फ्लैट ९०३ की लाइव वीडियो फीड पर गड़ी हुई थीं। 

रात भर मैं एक पल के लिए भी अपनी आंखें नहीं झपका सका था। काव्या के उस गुप्त डिजिटल कबूलनामे और उसके नीचे उमड़े उन ज़हरीले, अनाम कमेंट्स ने मेरी रूह को इस कदर झकझोर कर रख दिया था कि मेरे सीने में अब भी एक अजीब सी टीस उठ रही थी। 

और अब... स्क्रीन पर पुणे के फ्लैट में सुबह की पहली हलचल शुरू हो चुकी थी। 

टाइम सुबह के ठीक ६:१० बजे का था। 

मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा बहुत आहिस्ता से खुला। काव्या कमरे से बाहर निकली। 

कैमरे के नाइट-विज़न से डे-मोड में बदलते लेंस ने काव्या की सूरत को बिलकुल साफ कर दिया। रात भर की अनिद्रा और टैबलेट पर अपने दिल की आग उड़ेलने के बाद, काव्या के चेहरे पर थकान का एक गहरा साया था। उसकी कजरारी आंखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, लेकिन उसके गोरे, संगमरमरी चेहरे पर एक अजीब सा नूर, एक दहकती हुई बेचैनी अब भी तैर रही थी। 

उसने रात की उस पतली लैवेंडर नाइटी के ऊपर एक हल्का बादामी कश्मीरी शॉल लपेट रखा था। उसके घने, रेशमी काले बाल पीठ पर एक ढीले-ढाले जूड़े में बंधे थे, जिसकी कुछ आवारा लटें उसकी नाज़ुक गर्दन और गालों पर झूल रही थीं। 


[Image: img-01497-cleaned.png]



काव्या ने बालकनी की बड़ी कांच की खिड़की से बाहर देखा, सूरज की पहली नारंगी किरणें फूट रही थीं। फिर वो बहुत धीमी, नंगे कदमों से रसोई की तरफ बढ़ गई। 

रसोई के ग्रेनाइट प्लेटफॉर्म पर पहुंचकर उसने गैस स्टोव का बर्नर जलाया। स्टेनलेस स्टील के सस्पैन में पानी और दूध चढ़ाया। 

फिर, उसने पीतल की छोटी खरल में ताज़ी अदरक का एक टुकड़ा और दो हरी इलायची डालीं। 

खट... खट... खट... 


[Image: img-01498-cleaned.png]



उस सन्नाटे भरे घर में मूसली के पीतल से टकराने की वो जानी-पहचानी, घरेलू आवाज़ गूंज उठी। 

सस्पैन में चाय की पत्तियां उबलने लगीं और अदरक-इलायची की तीखी, सोंधी खुशबू रसोई की नम हवा में तैरने लगी। काव्या प्लेटफॉर्म की ठंडी स्लैब पर अपनी दोनों हथेलियां टिकाए, उस उबलते हुए दूध को एकटक देख रही थी। उसके भरे हुए होंठ हल्के से कांप रहे थे। वो अपने ही ख्यालों में कहीं बहुत दूर खोई हुई थी, कल रात की वो खिचड़ी... सिंक पर वो गीला स्पर्श... और परसों रात का वो खौलता हुआ लावा... 

तभी... 

गैलरी से भारी, सधे हुए कदमों की आहट रसोई की तरफ बढ़ी। 

होटल के कमरे की मेज़ पर बैठे मेरी उंगलियां अपने आप लैपटॉप के कीबोर्ड पर भींच गईं। 

ताऊजी रसोई की चौखट पर आ पहुंचे थे। 

पचपन साल का वो देहाती पहलवान, सुबह के ठंडे पानी से नहाना करके निकला था। उन्होंने एक बहुत ही साफ, सफेद कॉटन धोती बांध रखी थी और बदन पर वही सफेद कॉटन बनियान थी। उनके चौड़े, फौलादी कंधों और सीने पर फैले सफेद-काले रोएं अब भी पानी की हल्की सी नमी से चमक रहे थे। उनकी दाढ़ी करीने से संवरी हुई थी और उनकी गहरी, तपे हुए तांबे जैसी आंखों में सुबह की एक शांत, भारी संजीदगी थी। 

रसोई की चौखट पर ताऊजी के कदम एक पल के लिए रुके। 

काव्या ने चौंककर अपनी गर्दन घुमाई। 

उन दोनों की नज़रें ठीक उसी तरह टकराईं जैसे भोर की पहली किरण किसी ठंडी ओस की बूंद से टकराती है। 

कमरे में एक भारी, दमघोंटू सन्नाटा छा गया। 

परसों रात मर्यादा की दीवार टूटने और कल शाम डाइनिंग टेबल पर हुई उस भावुक सुलह के बाद, ये पहली सुबह थी जब वो दोनों उस बंद घर में एक-दूसरे के इतने करीब और बिलकुल अकेले थे। 

लेकिन आज... उस सन्नाटे में कल जैसी कोई घबराहट या भागने की हड़बड़ाहट नहीं थी। 

काव्या ने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं, लेकिन वो पीछे नहीं हटी। उसके गोरे गालों पर एक बहुत ही धीमी, गुलाबी लाली तैर गई। उसने बहुत आहिस्ता से चाय की आंच धीमी की। 

ताऊजी बहुत धीमे, भारी कदमों से चलते हुए प्लेटफॉर्म के करीब आए। 

उनका वो विशाल, छह फुट एक इंच का गठीला शरीर काव्या के बिलकुल बगल में आकर खड़ा हो गया। ताऊजी के बदन से लाइफबॉय साबुन की ताज़ी झाग और शुद्ध सरसों के तेल की वो जानी-पहचानी, मर्दाना महक उठ रही थी, जिसने काव्या के पूरे जिस्म में एक हल्की सी कंपकंपी दौड़ा दी। 

हैदराबाद के उस होटल के कमरे में मेरी सांसें रुक गईं। मुझे डर था कि कहीं ताऊजी कोई ऐसी हरकत न कर बैठें... कहीं वो काव्या को अपनी बाहों में न भर लें! 

लेकिन ताऊजी एक उसूलों वाले, पुराने देहाती बुजुर्ग थे। 

उनके भीतर कोई छिछोरापन या बाज़ारू हवस नहीं थी। जो कुछ हुआ था, वो उनकी बरसों की भूख और लाचारी की बेबसी थी, लेकिन काव्या की इज़्ज़त आज भी उनके लिए खानदान की सबसे बड़ी अमानत थी। 

ताऊजी ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। उन्होंने मर्यादा की उस लकीर को अपने मन में मजबूती से थाम रखा था। 

उन्होंने अपना वो बड़ा, गट्टों और झुर्रियों से भरा खुरदुरा हाथ प्लेटफॉर्म के ग्रेनाइट पर, काव्या की नाज़ुक कलाई से सिर्फ दो इंच की दूरी पर टिका दिया। 


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उनका हाथ काव्या के हाथ से टकरा नहीं रहा था, लेकिन उस खुरदुरे हाथ से निकलती हुई शारीरिक गर्मी काव्या के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी थी। 

ताऊजी ने काव्या के झुके हुए चेहरे को देखा। काव्या की आंखों के नीचे की उस हल्की सी थकान को उस तपे हुए पहलवान ने एक ही पल में भांप लिया। 

फिर, ताऊजी की वो भारी, फटी हुई और गंभीर देहाती आवाज़ उस भाप से भरी रसोई में बहुत आहिस्ता से गूंजी: 

"रात सोई नहीं, बहू?" 

काव्या की सांस हलक में ही अटक गई। 

उसने अपनी पलकें नहीं उठाईं। उसके हाथ में पकड़ा हुआ चाय का चिमटा हल्का सा थरथराया। 

"नींद... नींद उचट गयी थी, ताऊजी," काव्या ने बहुत ही धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में जवाब दिया। उसकी आवाज़ में एक अनकही हिचक थी, लेकिन उसमें कोई परायापन नहीं था। 

ताऊजी कुछ पलों तक शांत रहे। सस्पैन से उठती हुई भाप उन दोनों के चेहरों के बीच एक धुंधली सी चादर बना रही थी। 

और फिर, ताऊजी ने जो कहा, उसने उस पूरे घर के भूगोल और मर्यादा की बुनियाद को एक फौलादी लकीर में बांध दिया। 

ताऊजी ने अपनी गर्दन हल्की सी झुकाई। उनकी आवाज़ में एक पिता का गहरा, भारी और अटूट पश्चाताप गूंजा: 

"बहू... कल रात डाइनिंग टेबल पर जो मैंने वचन दिया था, मैं उस पर पत्थर की तरह कायम हूँ। उस रात मुझसे जो भूल हुई... वो दोबारा कभी इस चौखट की छांव भी नहीं छू पाएगी। तू मेरे राजेश का सुहाग है, इस घर की कुलवधू है... और तेरी मर्यादा की रक्षा करना मेरी सबसे पहली ज़िम्मेदारी है। तू... तू ठीक तो है ना?" 

तू ठीक तो है ना? 

ये सवाल किसी लफंगे की हवस नहीं थी। ये उस छप्पन साल के बूढ़े पहलवान का अपनी कुलवधू के सामने किया गया वो सबसे सच्चा, पवित्र और संजीदा इक़रार था, एक ऐसा अटल फैसला कि आगे से किसी भी तरह का शारीरिक स्पर्श पूरी तरह वर्जित रहेगा, ताकि खानदान की इज़्ज़त और सुहाग की पवित्रता पर कभी कोई आंच न आए। 

काव्या के सीने में दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसकी शॉल का सिरा ऊपर-नीचे होने लगा। 

ताऊजी के इन शब्दों ने काव्या के भीतर एक अजीब सा तूफ़ान खड़ा कर दिया। 

एक तरफ, उसके दिल में राहत का एक बहुत गहरा दरिया उमड़ पड़ा। उसके सुहाग की मर्यादा बच गयी थी, और ताऊजी ने एक सच्चे, पूज्य पिता की तरह उस रिश्ते की पवित्रता को दोबारा बहाल कर दिया था। लेकिन दूसरी तरफ... उसी गहरे सन्नाटे में, काव्या की उस जवान, अतृप्त जिस्म के भीतर एक दबी हुई टीस, एक अनकहा मातम भी जाग उठा। उस रात जो पहली बार उसकी नसों में तृप्ति की आग जगी थी... वो आग अब मर्यादा की इस दीवार के पीछे हमेशा के लिए दबाई जा रही थी। राहत और इस अनकहे मातम के बीच झूलती काव्या की आंखों में आंसुओं की एक बहुत बारीक सी नमी चमक उठी। 

उसने बहुत धीरे से अपनी गर्दन उठाई। ताऊजी के उस पके हुए, दाढ़ी वाले चेहरे की तरफ देखा, जहाँ सिर्फ एक पिता-तुल्य फिक्र और मर्यादा का अटल संकल्प था। 

काव्या के सूखे होंठों पर एक बहुत ही हल्की, कांपती हुई विनीत मुस्कान आई। उसने अपनी पलकें दोबारा झुका लीं और बहुत ही दबी हुई, आदरपूर्ण आवाज़ में बोली: 

"हाँ ताऊजी... मैं ठीक हूँ। जैसा आपने कहा... हमारे लिए इस घर की मर्यादा ही सबसे ऊपर है। बस... आप इस बात को लेकर अपनी सेहत मत बिगाड़िए।" 

उस एक छोटे से वाक्य ने सब कुछ तय कर दिया। 

काव्या ने ताऊजी के उस फैसले को पूरी निष्ठा से एक्सेप्ट कर लिया था। 

ताऊजी के चौड़े सीने से राहत की एक बहुत भारी सांस बाहर निकली। उनके चेहरे की तनी हुई नसें ढीली पड़ गईं। 

उन्होंने अपनी भारी हथेली को प्लेटफॉर्म पर थोड़ा और आगे बढ़ाया, और बहुत ही आहिस्ता से, एक बुजुर्ग के आशीर्वाद की तरह, काव्या के सिर के पीछे बंधी उस शॉल के कोने को बहुत हल्के से छुआ: 

"जब तक ये बूढ़ा इस चौखट पर खड़ा है, तुझे किसी बात का डर रखने की ज़रूरत नहीं है, बहू। तेरे सुहाग और इस घर की इज़्ज़त पर मैं कभी कोई आंच नहीं आने दूंगा... ये बात सिर्फ मेरे और तेरे बीच की मिट्टी में दबी रहेगी... जीते जी किसी तीसरे कान तक नहीं पहुंचेगी।" 

जीते जी किसी तीसरे कान तक नहीं पहुंचेगी...


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हैदराबाद के उस होटल के कमरे में बैठे मेरे होंठों पर एक बहुत ही भयानक, कड़वी और लाचार मुस्कान खिंच आई। 

ताऊजी को लग रहा था कि ये राज़ सिर्फ उन दोनों के बीच दबा है। वो नहीं जानते थे कि उनका वो तथाकथित 'तीसरा कान' सैकड़ों मील दूर बैठा, उनकी एक-एक सांस और एक-एक लफ्ज़ को अपनी स्क्रीन पर रिकॉर्ड कर रहा था! 

लेकिन इस बात ने मुझे कोई सुकून नहीं दिया। 

स्क्रीन पर जो कुछ घट रहा था, वो किसी नग्न संभोग से भी ज्यादा डरावना था! 

अगर वो दोनों वहां एक-दूसरे से चिपट जाते, अगर ताऊजी काव्या को चूमने लगते, तो शायद मैं अपने गुस्से में चिल्ला पड़ता, शायद मैं एक पति के हक़ से उस रिश्ते को 'बदचलनी' करार देकर खत्म कर देता। 

लेकिन यहाँ... यहाँ कोई वासना का नंगा नाच नहीं था। 

यहाँ एक ऐसा मौन, गहरा और अटूट समझौता हो चुका था जिसकी जड़ें बहुत गहरी थीं। काव्या और ताऊजी ने बिना किसी फूहड़पन के, अपनी उस वर्जित प्यास और मर्यादा की सीमा को एक घरेलू सच्चाई के रूप में एक्सेप्ट कर लिया था! 

अब उस घर में काव्या के लिए ताऊजी कोई पराया मर्द नहीं थे। वो उसके उस सबसे गुप्त, नाज़ुक हिस्से के रक्षक और साझीदार बन चुके थे। 

काव्या ने गैस बंद की। उसने प्लेटफॉर्म से दो भारी कांच के गिलास उठाए। 

उसने छलनी से खौलती हुई अदरक-इलायची की चाय गिलासों में छानी। गरम भाप के बीच, उसने एक गिलास उठाया और बहुत ही सहजता से, बिना किसी हिचकिचाहट के ताऊजी के सामने बढ़ा दिया। 

ताऊजी ने गिलास थाम लिया। 

उस पल, उन दोनों की उंगलियां एक-दूसरे से बहुत स्वाभाविक रूप से टकराईं। न ताऊजी झिझके, और न काव्या ने अपना हाथ पीछे खींचा। 


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वो दोनों उस नम, भाप भरी रसोई के ग्रेनाइट प्लेटफॉर्म के सहारे कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए। 

बाहर बालकनी से सुबह की धूप अब पूरे फ्लैट में सुनहरी चादर की तरह फैल चुकी थी। और वो दोनों, अपने-अपने गिलासों से चाय की गरम चुस्कियां लेते हुए, उस नए, अनकहे रिश्ते के सन्नाटे में एक-दूसरे की मौजूदगी को पूरी तरह महसूस कर रहे थे। 

पर्दा गिर चुका था... और उस खाली जगह पर एक ऐसा अटूट डोमेस्टिक पैक्ट बन चुका था जिसे अब दुनिया की कोई ताकत नहीं डिगा सकती थी। 

तभी... 

मेज़ पर रखे मेरे ऑफिशियल स्मार्टफोन की स्क्रीन नीली रोशनी से जगमगा उठी। 

फोन वाइब्रेशन मोड पर था, और कांच के टॉप पर वो भयानक घड़घड़ाहट के साथ कांपने लगा: 

बीप... बीप... बीप... 

स्क्रीन पर मेरे प्रोजेक्ट मैनेजर और रीजनल हेड का हाई-प्रायोरिटी कैलेंडर रिमाइंडर चमक रहा था: 

अलर्ट: फाइनल क्लाइंट सप्लाई चेन ऑडिट व ईआरपी क्लोजर रिव्यू - सुबह ९:०० बजे शार्प, बोर्डरूम ३। शाम ६:०० बजे तक मैंडेटरी एग्जीक्यूटिव साइन-ऑफ। 

और उसके ठीक नीचे, मेरे टीम लीड का एक अर्जेंट व्हाट्सएप मैसेज भी पॉप-अप हुआ: 
'राजेश, आज का दिन इस पूरे रीजनल रोलआउट का सबसे क्रिटिकल दिन है। क्लाइंट्स सीधे बोर्डरूम में मौजूद रहेंगे। तुम्हारा पूरा प्रजेंटेशन और साइन-ऑफ तैयार होना चाहिए। आज शाम के क्लोजर के बाद ही तुम्हारा ट्रैवल अप्रूवल फाइनल होगा। ८:३० बजे तक लॉबी में मिलो।' 

उस मैसेज को पढ़कर मेरी छाती पर जैसे किसी ने अंगारे रख दिए हों। 

टाइम सुबह के ठीक पौने सात बज रहे थे। 

इसका मतलब था कि मेरे पास इस कमरे में बैठने के लिए मुश्किल से चालीस मिनट बचे थे। 

मुझे इस टाइम नहाकर अपनी कॉरपोरेट फॉर्मल शर्ट पहननी होगी, गले में टाई कसनी होगी, और अपने चेहरे पर पेशेवर कामयाबी की एक झूठी मुस्कान चिपकाकर उस बोर्डरूम में जाना होगा। सुबह नौ बजे से लेकर शाम के छह बजे तक... पूरे नौ से दस घंटे! मुझे उन क्लाइंट्स, डायरेक्टर्स और वाइस-प्रेसिडेंट्स के सामने बैठकर ग्राफ्स, नंबर्स और ऑडिट शीट्स पर सिर खपाना होगा... जहाँ मैं एक सेकंड के लिए भी अपने फोन में कैमरे की फीड नहीं खोल पाऊँगा! 

और उस पूरे दिन... पुणे के फ्लैट ९०३ के उस बंद दायरे में, काव्या और ताऊजी इस नए, अटूट मौन समझौते की छांव में पूरी तरह अकेले रहने वाले थे! 

मुझे नहीं पता था कि सुबह की इस चाय के बाद जब काव्या बालकनी में कपड़े सुखाने जाएगी, तो ताऊजी की नज़रें कहाँ टिकेंगी। मुझे नहीं पता था कि दोपहर के उस खामोश सन्नाटे में, जब बाहर तेज धूप होगी, तो उस घर के बंद कमरों में क्या खिचड़ी पकेगी। मैं दिन भर उस बोर्डरूम में एक बंधक की तरह बैठा रहूँगा... अपने बीस साल के होम लोन और नौकरी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ! 

मुझे हर हाल में आज शाम छह बजे का वो फाइनल साइन-ऑफ पूरा करना ही था... ताकि मैं रात की वापसी ट्रेन पकड़कर किसी तरह पुणे पहुँच सकूँ। 

लेकिन... आज शाम छह बजे तक? 

क्या आज शाम मेरे पुणे की ट्रेन पकड़ने तक, मेरे घर की वो आबरू सलामत बच पाएगी? 

मैंने कांपते हुए, पसीने से भीगे हाथों से अपने लैपटॉप की स्क्रीन को धीरे से नीचे झुकाकर बंद कर दिया। 

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया... और उस सन्नाटे में, मेरे अपने ही दिल की भयानक, बेबस धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं। 




Chapter 39: Bhor Ki Chai Aur Maun Samjhauta

Hyderabad ke us business hotel ke kamre mein, subah ke theek sava chhah baj rahe the.

Khidki ke paar baahar ka aasmaan halke naarangi aur matmaile bhoore rang mein badal raha tha, jahan shehar ki chaudi sadkon par subah ki pehli gaadiyan rengne lagi thiin. Mez par raat bhar ki thandi ho chuki coffee ke do khaali cup aur cigarette ki raakh se bhari ashtray rakhi thi. Company ke is kuch dinon ke regional supply chain audit ka aaj aakhiri aur sabse ahem din tha. Subah nau baje se shaam chhah baje tak clients aur senior management ke saath final review aur closure meetings thiin. Company ke schedule ke mutabiq, mujhe aaj din bhar ka yeh final sign-off poora karke hi nikalna tha, taaki main aaj raat ki apni tay-shuda train pakadkar Pune waapas laut sakoon.

Lekin is time... hotel ki mez par khula mera laptop seedhe Wi-Fi se juda tha aur meri sooji hui, laal aankhein screen par chal rahi Pune ke flat 903 ki live video feed par gadi hui thiin.

Raat bhar main ek pal ke liye bhi apni aankhein nahi jhapka saka tha. Kavya ke us gupt digital qaboolnaame aur uske neeche umde un zehreele, anaam comments ne meri rooh ko is qadar jhakjhor kar rakh diya tha ki mere seene mein ab bhi ek ajeeb si tees uth rahi thi.

Aur ab... screen par Pune ke flat mein subah ki pehli halchal shuru ho chuki thi.

Time subah ke theek 6:10 baje ka tha.

Master bedroom ka darwaza bahut aahista se khula. Kavya kamre se baahar nikli.

Camera ke night-vision se day-mode mein badalte lens ne Kavya ki soorat ko bilkul saaf kar diya. Raat bhar ki anidra aur tablet par apne dil ki aag undelne ke baad, Kavya ke chehre par thakaan ka ek gehra saaya tha. Uski kajraari aankhon ke neeche halke kaale ghere the, lekin uske gore, sangmarmari chehre par ek ajeeb sa noor, ek dehakti hui bechaini ab bhi tair rahi thi.

Usne raat ki us patli lavender nighty ke oopar ek halka baadaami Kashmiri shawl lapet rakha tha. Uske ghane, reshmi kaale baal peeth par ek dheele-dhaale joode mein bandhe the, jiski kuch aawaara latein uski naazuk gardan aur gaalon par jhool rahi thiin.

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Kavya ne balcony ki badi kaanch ki khidki se baahar dekha, sooraj ki pehli naarangi kirnein phoot rahi thiin. Phir woh bahut dheemi, nange kadmon se rasoi ki taraf badh gayi.

Rasoi ke granite platform par pahunchkar usne gas stove ka burner jalaya. Stainless steel ke saucepan mein paani aur doodh chadhaya.

Phir, usne peetal ki chhoti kharal mein taazi adrak ka ek tukda aur do hari ilaichi daaliin.

Khat... khat... khat...

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Us sannaate bhare ghar mein moosli ke peetal se takraane ki woh jaani-pehchaani, gharelu aawaaz goonj uthi.

Saucepan mein chai ki pattiyan ubalne lagiin aur adrak-ilaichi ki teekhi, sondhi khushboo rasoi ki nam hawa mein tairne lagi. Kavya platform ki thandi slab par apni dono hatheliyan tikaaye, us ubalte hue doodh ko ektak dekh rahi thi. Uske bhare hue honth halke se kaanp rahe the. Woh apne hi khayaalon mein kahin bahut door khoyi hui thi—kal raat ki woh khichdi... sink par woh geela sparsh... aur parson raat ka woh khoulta hua laava...

Tabhi...

Gallery se bhaari, sadhe hue kadmon ki aahat rasoi ki taraf badhi.

Hotel ke kamre ki mez par baithe meri ungliyan apne aap laptop ke keyboard par bheencha gayiin.

Tauji rasoi ki chaukhat par aa pahunche the.

Pachpan saal ka woh dehati pehalwaan, subah ke thande paani se nahaana karke nikla tha. Unhone ek bahut hi saaf, safed cotton dhoti baandh rakhi thi aur badan par wahi safed cotton baniyan thi. Unke chaude, faulaadi kandhon aur seene par phaile safed-kaale royen ab bhi paani ki halki si nami se chamak rahe the. Unki daadhi qareene se sanwri hui thi aur unki gehri, tape hue taambe jaisi aankhon mein subah ki ek shaant, bhaari sanjeedgi thi.

Rasoi ki chaukhat par Tauji ke kadam ek pal ke liye ruke.

Kavya ne chaunk-kar apni gardan ghumaayi.

Un dono ki nazrein theek usi tarah takraayiin jaise bhor ki pehli kiran kisi thandi os ki boond se takraati hai.

Kamre mein ek bhaari, damghontu sannaata chha gaya.

Parson raat maryaada ki deewaar tootne aur kal shaam dining table par hui us bhaavuk sulah ke baad, yeh pehli subah thi jab woh dono us band ghar mein ek-doosre ke itne qareeb aur bilkul akele the.

Lekin aaj... us sannaate mein kal jaisi koi ghabrahat ya bhaagne ki hadbadaahat nahi thi.

Kavya ne apni nazrein neeche jhukaa liin, lekin woh peeche nahi hati. Uske gore gaalon par ek bahut hi dheemi, gulaabi laali tair gayi. Usne bahut aahista se chai ki aanch dheemi ki.

Tauji bahut dheeme, bhaari kadmon se chalte hue platform ke qareeb aaye.

Unka woh vishaal, chhah foot ek inch ka gatheela shareer Kavya ke bilkul bagal mein aakar khada ho gaya. Tauji ke badan se Lifebuoy saabun ki taazi jhaag aur shuddh sarson ke tel ki woh jaani-pehchaani, mardaana mehak uth rahi thi, jisne Kavya ke poore jism mein ek halki si kampkampi dauda di.

Hyderabad ke us hotel ke kamre mein meri saansein ruk gayiin. Mujhe dar tha ki kahin Tauji koi aisi harkat na kar baithein... kahin woh Kavya ko apni baahon mein na bhar lein!

Lekin Tauji ek usoolon wale, puraane dehati bujurg the.

Unke bheetar koi chhichhoraapan ya baazaaru hawas nahi thi. Jo kuch hua tha, woh unki barson ki bhookh aur laachaari ki bebasi thi, lekin Kavya ki izzat aaj bhi unke liye khaandaan ki sabse badi amaanat thi.

Tauji ne koi jaldbaazi nahi ki. Unhone maryaada ki us lakeer ko apne man mein mazbooti se thaam rakha tha.

Unhone apna woh bada, gatton aur jhurriyon se bhara khurdura haath platform ke granite par, Kavya ki naazuk kalaayi se sirf do inch ki doori par tika diya.

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Unka haath Kavya ke haath se takraa nahi raha tha, lekin us khurdure haath se nikalti hui shareerik garmi Kavya ke rongte khade karne ke liye kaafi thi.

Tauji ne Kavya ke jhuke hue chehre ko dekha. Kavya ki aankhon ke neeche ki us halki si thakaan ko us tape hue pehalwaan ne ek hi pal mein bhaanp liya.

Phir, Tauji ki woh bhaari, phati hui aur gambheer dehati aawaaz us bhaap se bhari rasoi mein bahut aahista se goonji:

"Raat soyi nahi, bahu?"

Kavya ki saans halaq mein hi atak gayi.

Usne apni palkein nahi uthaayiin. Uske haath mein pakda hua chai ka chimta halka sa thartharaaya.

"Neend... neend uchat gayi thi, Tauji," Kavya ne bahut hi dheemi, lagbhag fusfusaati hui aawaaz mein jawaab diya. Uski aawaaz mein ek anakahi hichak thi, lekin usmein koi paraayaapan nahi tha.

Tauji kuch palon tak shaant rahe. Saucepan se uthti hui bhaap un dono ke chehron ke beech ek dhundhli si chaadar bana rahi thi.

Aur phir, Tauji ne jo kaha, usne us poore ghar ke bhoogol aur maryaada ki buniyaad ko ek faulaadi lakeer mein baandh diya.

Tauji ne apni gardan halki si jhukaayi. Unki aawaaz mein ek pita ka gehra, bhaari aur atoot pashchaataap goonja:

"Bahu... kal raat dining table par jo maine vachan diya tha, main us par patthar ki tarah qaayam hoon. Us raat mujhse jo bhool hui... woh dobaara kabhi is chaukhat ki chhaanv bhi nahi chhoo paayegi. Tu mere Rajesh ka suhaag hai, is ghar ki kulvadhoo hai... aur teri maryaada ki raksha karna meri sabse pehli zimmedaari hai. Tu... tu theek to hai na?"

Tu theek to hai na?

Yeh sawaal kisi lafange ki hawas nahi thi. Yeh us chhappan saal ke boodhe pehalwaan ka apni kulvadhoo ke saamne kiya gaya woh sabse sachha, pavitra aur sanjeeda iqraar tha, ek aisa atal faisla ki aage se kisi bhi tarah ka shareerik sparsh poori tarah varjit rahega, taaki khaandaan ki izzat aur suhaag ki pavitrata par kabhi koi aanch na aaye.

Kavya ke seene mein dil itni zor se dhadka ki uski shawl ka sira oopar-neeche hone laga.

Tauji ke in shabdon ne Kavya ke bheetar ek ajeeb sa toofaan khada kar diya.

Ek taraf, uske dil mein raahat ka ek bahut gehra dariya umad pada. Uske suhaag ki maryaada bach gayi thi, aur Tauji ne ek sachhe, poojya pita ki tarah us rishte ki pavitrata ko dobaara bahaal kar diya tha. Lekin doosri taraf... usi gehre sannaate mein, Kavya ki us jawaan, atript jism ke bheetar ek dabi hui tees, ek anakaha maatam bhi jaag utha. Us raat jo pehli baar uski nason mein tripti ki aag jagi thi... woh aag ab maryaada ki is deewaar ke peeche hamesha ke liye dabaayi ja rahi thi. Raahat aur is anakahi maatam ke beech jhoolti Kavya ki aankhon mein aansuon ki ek bahut baareek si nami chamak uthi.

Usne bahut dheere se apni gardan uthaayi. Tauji ke us pake hue, daadhi wale chehre ki taraf dekha, jahan sirf ek pita-tulya fikr aur maryaada ka atal sankalp tha.

Kavya ke sookhe honthon par ek bahut hi halki, kaanpti hui vineet muskaan aayi. Usne apni palkein dobaara jhukaa liin aur bahut hi dabi hui, aadarpoorn aawaaz mein boli:

"Haan Tauji... main theek hoon. Jaisa aapne kaha... humare liye is ghar ki maryaada hi sabse oopar hai. Bas... aap is baat ko lekar apni sehat mat bigaadiye."

Us ek chhote se vaakya ne sab kuch tay kar diya.

Kavya ne Tauji ke us faisle ko poori nishtha se accept kar liya tha.

Tauji ke chaude seene se raahat ki ek bahut bhaari saans baahar nikli. Unke chehre ki tani hui nasein dheeli pad gayiin.

Unhone apni bhaari hatheli ko platform par thoda aur aage badhaya, aur bahut hi aahista se, ek bujurg ke aasheervaad ki tarah, Kavya ke sir ke peeche bandhi us shawl ke kone ko bahut halke se chhua:

"Jab tak yeh boodha is chaukhat par khada hai, tujhe kisi baat ka dar rakhne ki zaroorat nahi hai, bahu. Tere suhaag aur is ghar ki izzat par main kabhi koi aanch nahi aane doonga... yeh baat sirf mere aur tere beech ki mitti mein dabi rahegi... jeete ji kisi teesre kaan tak nahi pahunchegi."

Jeete ji kisi teesre kaan tak nahi pahunchegi...

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Hyderabad ke us hotel ke kamre mein baithe mere honthon par ek bahut hi bhayanak, kadwi aur laachaar muskaan khinch aayi.

Tauji ko lag raha tha ki yeh raaz sirf un dono ke beech daba hai. Woh nahi jaante the ki unka woh tathakathit 'teesra kaan' saikdon meel door baitha, unki ek-ek saans aur ek-ek lafz ko apni screen par record kar raha tha!

Lekin is baat ne mujhe koi sukoon nahi diya.

Screen par jo kuch ghat raha tha, woh kisi nagna sambhog se bhi zyaada darawna tha!

Agar woh dono wahan ek-doosre se chipat jaate, agar Tauji Kavya ko choomne lagte, to shaayad main apne gusse mein chilla padta, shaayad main ek pati ke haq se us rishte ko 'badchalni' qaraar dekar khatam kar deta.

Lekin yahan... yahan koi vaasna ka nanga naach nahi tha.

Yahan ek aisa maun, gehra aur atoot samjhauta ho chuka tha jiski jadein bahut gehri thiin. Kavya aur Tauji ne bina kisi phoohadpan ke, apni us varjit pyaas aur maryaada ki seema ko ek gharelu sachhaayi ke roop mein accept kar liya tha!

Ab us ghar mein Kavya ke liye Tauji koi paraaya mard nahi the. Woh uske us sabse gupt, naazuk hisse ke rakshak aur saajhedaari ban chuke the.

Kavya ne gas band ki. Usne platform se do bhaari kaanch ke glass uthaaye.

Usne chhalni se khoulte hui adrak-ilaichi ki chai glasson mein chhaani. Garam bhaap ke beech, usne ek glass uthaya aur bahut hi sahajta se, bina kisi hichkichaahat ke Tauji ke saamne badha diya.

Tauji ne glass thaam liya.

Us pal, un dono ki ungliyan ek-doosre se bahut swaabhaavik roop se takraayiin. Na Tauji jhijhke, aur na Kavya ne apna haath peeche kheencha.

[Image: img-01501-cleaned.png]

Woh dono us nam, bhaap bhari rasoi ke granite platform ke sahaare kandhe se kandha milaakar khade ho gaye.

Baahar balcony se subah ki dhoop ab poore flat mein sunhehri chaadar ki tarah phail chuki thi. Aur woh dono, apne-apne glasson se chai ki garam chuskiyan lete hue, us naye, anakahi rishte ke sannaate mein ek-doosre ki maujoodgi ko poori tarah mehsoos kar rahe the.

Parda gir chuka tha... aur us khaali jagah par ek aisa atoot domestic pact ban chuka tha jise ab duniya ki koi taaqat nahi diga sakti thi.

Tabhi...

Mez par rakhe mere official smartphone ki screen neeli roshni se jagmaga uthi.

Phone vibration mode par tha, aur kaanch ke top par woh bhayanak ghadghadaahat ke saath kaanpne laga:

Beep... beep... beep...

Screen par mere project manager aur regional head ka high-priority calendar reminder chamak raha tha:

Alert: Final Client Supply Chain Audit wa ERP Closure Review - Subah 9:00 baje sharp, Boardroom 3. Shaam 6:00 baje tak mandatory executive sign-off.

Aur uske theek neeche, mere team lead ka ek urgent WhatsApp message bhi pop-up hua:
'Rajesh, aaj ka din is poore regional rollout ka sabse critical din hai. Clients seedhe boardroom mein maujood rahenge. Tumhara poora presentation aur sign-off taiyaar hona chahiye. Aaj shaam ke closure ke baad hi tumhara travel approval final hoga. 8:30 baje tak lobby mein milo.'

Us message ko padhkar meri chhaati par jaise kisi ne angaare rakh diye hon.

Time subah ke theek paune saat baj rahe the.

Iska matlab tha ki mere paas is kamre mein baithne ke liye mushkil se chaalees minute bache the.

Mujhe is time nahaakar apni corporate formal shirt pehanni hogi, gale mein tie kasni hogi, aur apne chehre par peshewar kaamyaabi ki ek jhoothi muskaan chipkaakar us boardroom mein jaana hoga. Subah nau baje se lekar shaam ke chhah baje tak... poore nau se das ghante! Mujhe un clients, directors aur vice-presidents ke saamne baithkar graphs, numbers aur audit sheets par sir khapaana hoga... jahan main ek second ke liye bhi apne phone mein camera ki feed nahi khol paaoonga!

Aur us poore din... Pune ke flat 903 ke us band daayre mein, Kavya aur Tauji is naye, atoot maun samjhaute ki chhaanv mein poori tarah akele rehne wale the!

Mujhe nahi pata tha ki subah ki is chai ke baad jab Kavya balcony mein kapde sukhaane jaayegi, to Tauji ki nazrein kahan tikengi. Mujhe nahi pata tha ki dopahar ke us khaamosh sannaate mein, jab baahar tez dhoop hogi, to us ghar ke band kamron mein kya khichdi pakegi. Main din bhar us boardroom mein ek bandhak ki tarah baitha rahoonga... apne bees saal ke home loan aur naukri ki bediyon mein jakda hua!

Mujhe har haal mein aaj shaam chhah baje ka woh final sign-off poora karna hi tha... taaki main raat ki waapsi train pakadkar kisi tarah Pune pahunch sakoon.

Lekin... aaj shaam chhah baje tak?

Kya aaj shaam mere Pune ki train pakadne tak, mere ghar ki woh aabroo salaamat bach paayegi?

Maine kaanpte hue, paseene se bheege haathon se apne laptop ki screen ko dheere se neeche jhukaakar band kar diya.

Kamre mein gehra sannaata chha gaya... aur us sannaate mein, mere apne hi dil ki bhayanak, bebas dhadkanein kisi nagaade ki tarah baj rahi thiin.
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#51
अध्याय 40: अप्रत्याशित हादसा

हैदराबाद के टेक कॉरिडोर स्थित रीजनल हेडक्वार्टर में, शाम के ठीक सवा छह बज रहे थे। 

पूरे नौ घंटे की लगातार, थका देने वाली ऑडिट मैराथन के बाद अब जाकर कॉन्फ्रेंस रूम की भारी कांच की खिड़कियों के पार सन्नाटा उतरा था। टेबल पर बिखरी हुई बैलेंस शीट्स, रीजनल वेयरहाउस के इन्वेंट्री चार्ट्स और ईआरपी इंटीग्रेशन के दर्जनों पन्नों पर क्लाइंट्स और डायरेक्टर्स के नीली स्याही वाले दस्तखत चमक रहे थे। 

दिन भर की इस जानलेवा मसरूफियत में मेरे पास एक पल के लिए भी सांस लेने या अपनी जेब से फोन निकालकर फ्लैट ९०३ के कैमरों को चेक करने की फुरसत नहीं मिली थी। सुबह की वो चाय, ताऊजी के वो संजीदा लफ्ज़ और काव्या का वो मौन समर्पण... सब कुछ दिन भर मेरे दिमाग के किसी अंधेरे कोने में एक खौलता हुआ कांटा बनकर चुभता रहा था। 

लेकिन अब... सब कुछ खत्म हो चुका था। 

"ग्रेट जॉब, राजेश! आज का क्लोजर वाकई सॉलिड रहा," मेरे सीनियर कलीग ने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा और अपना लैपटॉप बैग समेटने लगा। "चलो, लॉबी में चलते हैं। आज रात का डिनर कंपनी की तरफ से बंजारा हिल्स में है।" 

"थैंक्स समीर, पर मैं डिनर के लिए नहीं रुक पाऊँगा," मैंने एक फीकी, थकी हुई मुस्कान के साथ जवाब दिया और अपनी मेज़ पर रखा लेदर का ब्रीफकेस बंद करने लगा। "मेरी रात की ट्रेन का टाइम हो रहा है। बस होटल जाकर बैग उठाना है और सीधे सिकंदराबाद स्टेशन निकलना है।" 

"अरे हां, तुम्हारी आज रात की वापसी तय थी ना? ठीक है भाई, सेफ जर्नी। कल पुणे पहुँचकर बात करते हैं।" 

समीर मुस्कुराते हुए बाहर निकल गया। 

कॉन्फ्रेंस रूम की दूधिया ट्यूबलाइट्स के नीचे अकेला खड़ा मैं, गहरी राहत की एक ठंडी सांस ले रहा था। 

मेरी ट्रेन रात के ठीक नौ बजे थी। इसका मतलब था कि मैं अगले बारह घंटों में पुणे पहुँचने वाला था। आज सुबह से लेकर अब तक मेरे दिल पर जो एक भयानक, दमघोंटू खौफ हावी था कि मेरे गैर-हाज़िरी में फ्लैट ९०३ की मर्यादा पर कोई नई आंच न आ जाए... वो खौफ अब खत्म होने वाला था। मैं आज रात ही अपने घर पहुँचकर अपनी उस ठंडी गृहस्थी की कमान दोबारा अपने हाथों में ले लूँगा। 

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी जैकेट की ज़िप खींची और जैसे ही ब्रीफकेस उठाकर दरवाजे की तरफ बढ़ा...

मेरी पैंट की जेब में रखा फोन बेतहाशा कांप उठा। 

वाइब्रेशन... थरथराहट... और लाउड रिंगटोन! 

स्क्रीन पर काव्या का नाम चमक रहा था। 

काव्या का फोन इस टाइम? आमतौर पर काव्या मुझे रात को आठ या साढ़े आठ बजे, बुटीक बंद करके घर लौटने के बाद ही कॉल किया करती थी। अभी तो शाम के सवा छह ही बजे थे। 

मैंने तुरंत स्क्रीन स्वाइप करके फोन कान से लगाया: 

"हेलो काव्या? मैं बस अभी ऑफिस से निकल ही रहा था, आज रात की ट्रेन..." 

"रा... राजेश!" 

काव्या की आवाज़ सुनते ही मेरे कदम चौखट पर ही जम गए। 

वो आवाज़ काव्या की कॉमन, मीठी और संजीदा आवाज़ नहीं थी। काव्या बुरी तरह हांफ रही थी। उसकी सांसें किसी फटी हुई धौंकनी की तरह चल रही थीं, और उसकी आवाज़ में एक भयानक, बेकाबू चीख और आंसुओं का सैलाब घुला हुआ था। पृष्ठभूमि से किसी बड़े हॉस्पिटल के अनाउंसमेंट सिस्टम की गूंज और मॉनिटर्स की तीखी टीं... टीं... की आवाज़ें साफ आ रही थीं। 

"काव्या?! क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो? तुम कहाँ हो?!" मेरी रीढ़ में बर्फ की सनसनाहट दौड़ गई। 

"राजेश... बहुत बड़ा अनर्थ हो गया... ताऊजी... ताऊजी का एक्सीडेंट..." 


[Image: img-01512-cleaned.png]


काव्या का गला बुरी तरह रुंध गया। वो हिचकियों के बीच पूरी बात भी नहीं कह पाई थी कि...

बीप... बीप... बीप! 

मेरे फोन की स्क्रीन पर कॉल-वेटिंग की तीखी, भारी बीप बजी। 

स्क्रीन की काली पट्टी पर बड़े-बड़े अक्षरों में कंपनी के रीजनल वाइस प्रेसिडेंट (सप्लाई चेन व लॉजिस्टिक्स ऑपरेशंस) का ऑफिशियल नंबर चमक रहा था: राघवन सर (वीपी - नेशनल ऑपरेशंस)। 

कॉरपोरेट की दुनिया में वीपी का कॉल किसी जनरल के इमरजेंसी फरमान जैसा होता था, जिसे इग्नोर करने का मतलब सीधे अपनी नौकरी से हाथ धोना था। 

मुझे लगा कि शायद आज के सफल क्लोजर के बाद समीर ने वीपी को ब्रीफ कर दिया है और वो केवल दो शब्दों की फॉर्मल बधाई या मेरे ट्रैवल वाउचर की क्लीयरेंस के लिए लाइन पर हैं। 

"काव्या, सुनो! एक सेकंड रुको, वीपी सर की अर्जेंट लाइन आ रही है, मैं बस दो सेकंड में बात करके काटता हूँ... प्लीज होल्ड करना!" 

"नहीं राजेश, मेरी बात सुनो! यहाँ ताऊजी..." 

लेकिन इससे पहले कि काव्या का अगला वाक्य पूरा होता, मैंने घबराहट और हड़बड़ाहट में कॉल-वेटिंग का बटन दबाकर वीपी की लाइन कनेक्ट कर दी। 

"गुड इवनिंग सर, मैं राजेश बोल रहा हूँ..." 

"राजेश, कट द फॉर्मैलिटीज एंड लिसन टू मी वेरी केयरफुली!" दूसरी तरफ से राघवन सर की भारी, सख्त और तनाव से भरी आवाज़ गूंजी। 

कॉन्फ्रेंस रूम के सन्नाटे में मेरे कान सुन्न पड़ गए। 

"सर? सब ठीक तो है? आज का रीजनल ऑडिट तो पूरी तरह साइन-ऑफ हो चुका है..." 

"ऑडिट गया भाड़ में, राजेश! अभी आधे घंटे पहले हेडक्वार्टर से रेड-अलर्ट आया है। साउथ-वेस्टर्न रीजन के तीन बड़े वेयरहाउस क्लस्टर्स, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद में पूरा ईआरपी और सप्लाई चेन नेटवर्क पूरी तरह क्रैश कर गया है। करोड़ों का शिपमेंट पोर्ट्स और हाईवे पर अटका हुआ है। क्लाइंट्स ने पेनल्टी क्लॉज ट्रिगर करने की धमकी दी है!" 

मेरी छाती में एक भयानक धक-धक शुरू हो गयी: 

"सर... लेकिन मेरी तो आज रात की पुणे की ट्रेन..." 

"कोई ट्रेन नहीं, राजेश! तुम्हारी सारी छुट्टियां और ट्रैवल टिकट्स इमीडिएट इफेक्ट से कैंसिल कर दी गयी हैं। मैनेजमेंट ने फैसला किया है कि तुम अगले पूरे तीन हफ्तों तक यहीं साउथ रीजन में डिप्लॉयड रहोगे। तुमको आज रात ही चेन्नई के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़नी होगी, फिर बेंगलुरु और वापस हैदराबाद का सारा लॉजिस्टिक्स ग्राउंड जीरो पर रहकर अपनी देखरेख में रिस्टोर करना होगा। ये नॉन-नेगोशिएबल है, राजेश! अगर तुमने ये क्राइसिस संभाल लिया तो तुम्हारा प्रमोशन पक्का है, लेकिन अगर तुमने इस टाइम साइट छोड़ी... तो कल सुबह तक टर्मिनेशन लेटर तुम्हारी टेबल पर होगा!" 

फ्लाइट... चेन्नई... बेंगलुरु... तीन हफ्ते! 

टर्मिनेशन लेटर! 

मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई। 

'फ्लाइट' शब्द सुनते ही मेरे हलक में थूक सूख गया। मुझे बचपन से हवाई जहाज़ में बैठने का एक भयानक, लकवा मार देने वाला डर था... एक ऐसा दमघोंटू एवियोफोबिया (प्लेन-फोबिया) जिसमें फ़्लाइट का दरवाज़ा बंद होते ही मेरा दम घुटने लगता था, आंखों के आगे अंधेरा छा जाता था और पैनिक अटैक से मेरी जान हलक में अटक जाती थी। यही वजह थी कि मैं कंपनी के हर टूर पर चौदह-चौदह घंटे की ट्रेन यात्रा चुनता था ताकि मेरे पैर ज़मीन पर रहें! 

मेरा दिल चाहा कि मैं वीपी के सामने गिड़गिड़ाकर कह दूँ कि सर, मुझे ट्रेन से जाने दो... लेकिन कॉरपोरेट की इस बेरहम, टारगेट-ड्रिवन दुनिया में अपनी इस कमज़ोरी का ज़िक्र करने का मतलब था अपनी ही कब्र खुद खोदना! संकट के इस टाइम कंपनी को रिजल्ट चाहिए थे, किसी मैनेजर का फोबिया नहीं। अगर मैंने बहाना बनाया, तो वीपी मुझे उसी सेकंड नौकरी से बाहर फेंक देता। 

"सर... लेकिन मेरी फैमिली... घर पर..." 

"फैमिली बाद में, राजेश! कंपनी का फ्यूचर दांव पर लगा है। एचआर को मैंने इन्स्ट्रक्ट कर दिया है, तुम्हारा पूरा रिवाइज्ड शेड्यूल मेल पर आ रहा है। डोंट लेट मी डाउन!" 

क्लिक! 

फोन कट गया। 

लाइन पूरी तरह डेड हो चुकी थी। 

मैं उस खाली कॉन्फ्रेंस रूम में किसी लावारिस लाश की तरह खड़ा रह गया। मेरे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। मेरा बीस साल का होम लोन, मेरी नौकरी, मेरा पूरा कॉरपोरेट करियर... और उसके ऊपर अगले इक्कीस दिनों तक एक शहर से दूसरे शहर उड़ने वाली वो खौफनाक फ्लाइट्स! सब कुछ एक ही झटके में उस तीन हफ्ते के फरमान की ज़द में आ चुका था। कंपनी ने मुझे अपने करियर और अपने सबसे बड़े फोबिया की आग में एक साथ झोंक दिया था! 

लेकिन अगले ही पल, मेरे दिमाग में बिजली की तरह एक भयानक खौफ कौंधा...

काव्या! 

काव्या रो रही थी... ताऊजी का एक्सीडेंट! 

मैंने पागलों की तरह कांपती उंगलियों से काव्या का नंबर दोबारा डायल किया। 

फोन की पहली ही घंटी पर कॉल उठ गया। 

लेकिन फोन उठते ही, दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, उसने मेरे सीने को छलनी कर दिया। 

"राजेश! तुम... तुम इंसान हो या पत्थर के बने हो?!" 

काव्या की आवाज़ गुस्से, घबराहट और आंसुओं के एक भयानक तूफ़ान में फट पड़ी थी: 

"तुमने मेरा फोन काट दिया?! तुमको अंदाज़ा भी है कि मैं इस टाइम कहाँ खड़ी हूँ? यहाँ मेरी रूह कांप रही है, मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ चुके हैं, और तुमने अपने उस मनहूस दफ्तर के लिए मेरी बात बीच में ही काट दी?!" 



"काव्या... मुझे माफ कर दो, भगवान के लिए मेरी बात सुनो!" मैं कॉरीडोर में पागलों की तरह टहलते हुए गिड़गिड़ाने लगा, मेरी अपनी सांसें उखड़ रही थीं। "वो... वो वीपी का इमरजेंसी कॉल था... तुम पहले बताओ कि हुआ क्या है? तुम रो क्यों रही हो? ताऊजी को क्या हुआ?!" 

काव्या ने एक बहुत भारी, हिचकियों से भरी सांस खींची। उसके रोने की आवाज़ इतनी बेबस और दर्दनाक थी कि मेरा कलेजा मुंह को आ गया: 

"राजेश... आज दोपहर को... हमारी बेटी... हमारी अनु..." 

अनु?! 

मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मेरा ब्रीफकेस मेरे हाथ से छूटकर नीचे मार्बल के फर्श पर गिर पड़ा: 

"अनु?! अनु को क्या हुआ काव्या?! भगवान के लिए सच बताओ, मेरी बेटी ठीक तो है ना?!" 

"अनु... अनु बिलकुल सेफ़ है राजेश... भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि मेरी बेटी को एक खरोंच तक नहीं आई!" काव्या ने सुबकते हुए कहा, और फिर उसकी आवाज़ में एक गहरा, कंपकंपाता हुआ दर्द गूंजा। "लेकिन... ताऊजी... ताऊजी ने अनु को बचाने के लिए अपनी दोनों बाहें तुड़वा लीं राजेश!" 

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा पूरा बदन पसीने से भीग गया: 

"क्या?! कैसे?!" 

काव्या ने रोते हुए जो कुछ बताया, उसने मेरी रूह को अंदर तक कंपा दिया। 

दोपहर के करीब चार बजे, हमारी हाई-राइज सोसाइटी के भारी लोहे वाले मेन स्लाइडिंग गेट के पास अनु खेल रही थी। तभी अचानक, वो कई सौ किलो का भारी, जंग लगा लोहे का गेट अपने ऊपरी ट्रैक से फिसल गया और पूरी रफ्तार से सीधे नीचे अनु की तरफ गिरने लगा! 

सोसाइटी के कंपाउंड में टहल रहे ताऊजी ने जैसे ही उस लोहे के पहाड़ को हमारी लाडली पर गिरते देखा, उस छप्पन साल के बूढ़े पहलवान के भीतर का अखाड़े वाला खून खौल उठा। ताऊजी ने न अपनी उम्र देखी, न अपनी जान की परवाह की। वो किसी बिजली की रफ्तार से छलांग लगाकर उस गिरते हुए गेट के नीचे कूद पड़े! 

ताऊजी ने अनु को झपटकर अपने विशाल सीने के नीचे पूरी तरह छुपा लिया... और उस कई सौ किलो वजनी लोहे के गेट का पूरा जानलेवा प्रहार सीधे अपने दोनों फैले हुए हाथों और कलाइयों पर झेल लिया! 

अनु नीचे पूरी तरह महफूज़ बच गयी, लेकिन उस भारी लोहे की चोट ने ताऊजी की दोनों कलाइयों और अग्रभुजाओं की हड्डियों को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया! 

"सोसाइटी के लोग दौड़े... सिक्योरिटी गार्ड्स ने मिलकर उस भारी गेट को हटाया," काव्या की आवाज़ में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। "ताऊजी दर्द से तड़प रहे थे, उनके दोनों हाथ बेजान होकर लटक रहे थे राजेश! मैं पागलों की तरह उनको लेकर शहर के इस बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल भागी। डॉक्टरों ने तुरंत उनको इमरजेंसी में लिया..." 

"डॉक्टर... डॉक्टर क्या कह रहे हैं काव्या?! चोट कितनी गहरी है?!" मेरी आवाज़ कांप रही थी। 

"दोनों हाथों की हड्डियां मल्टीपल फ्रैक्चर हो गयी हैं राजेश... कलाई से लेकर कोहनी तक की हड्डियां टूट चुकी हैं," काव्या ने नाक सुड़कते हुए, बहुत ही रुआंसी आवाज़ में बताया। "ऑर्थोपेडिक सर्जन ने पिछले दो घंटे से उनको ऑपरेशन थिएटर में रखकर दोनों हाथों पर उंगलियों से लेकर कोहनी के ऊपर तक भारी, सफेद प्लास्टर चढ़ा दिया है। दोनों हाथों में पट्टियां और गले में स्लिंग्स बांध दी हैं। डॉक्टर ने साफ कह दिया है कि हड्डियों को दोबारा जुड़ने में पूरे सौ दिन का टाइम लगेगा! अगले एक महीने तक वो अपनी उंगलियां तक नहीं हिला पाएंगे... वो अपने हाथों से पानी का एक घूंट तक नहीं पी सकते राजेश!" 

मेरी आंखों से आंसुओं की दो बूंदें टपक कर मेरे गालों पर ढुलक गईं। 

मेरे सीने में ताऊजी के लिए एक ऐसा बेपनाह, असीम आदर और कर्ज का समंदर उमड़ पड़ा जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। 

वो बूढ़ा देहाती शेर... जिसे मैंने अपनी वहशी हवस और घटिया वोयूरिज्म का मोहरा बनाने की कोशिश की थी... उसने आज मेरी कुल की एकमात्र संतान, मेरी मासूम बेटी की ज़िंदगी बचाने के लिए अपने दोनों फौलादी हाथ कुर्बान कर दिए थे! अगर आज ताऊजी वहां न होते, तो मेरी लाडली... मेरी अनु... उस लोहे के नीचे दबकर खत्म हो चुकी होती! 

और उसी पल, मेरे सीने में एक भयानक अपराधबोध और पश्चाताप की आग भड़क उठी। 

"काव्या... सुनो!" मैंने फोन को दोनों हाथों से भींचते हुए बदहवास आवाज़ में कहा। "तुम बिलकुल मत घबराओ। मैं... मैं अभी इसी टाइम अपनी कंपनी के वीपी के पैर पड़ता हूँ। मुझे इस नौकरी की, इस प्रमोशन की कोई परवाह नहीं है! मैं अभी जाकर इमरजेंसी लीव मांगता हूँ और चाहे जो हो जाए, मैं आज रात की पहली ट्रेन पकड़कर सुबह तक सीधे हॉस्पिटल पहुँच रहा हूँ! तुम ताऊजी को संभालो, मैं आ रहा हूँ!" 

"नहीं राजेश!" 

काव्या की आवाज़ अचानक चीखते हुए गूंजी। 

उसकी आवाज़ में अब वो रोने वाली लाचारी नहीं थी। एक औरत, एक पत्नी और एक गृहलक्ष्मी की वो फौलादी, संजीदा और सख्त आवाज़ फोन के स्पीकर से निकली, जिसने मुझे वहीं का वहीं पत्थर की मूरत बना दिया: 

"तुम ऐसी बेवकूफी करने की हिम्मत भी मत करना, राजेश!" 

"काव्या... तुम समझ नहीं रही हो, ताऊजी लाचार हैं..." 

"मैं सब समझ रही हूँ राजेश, और तुम जो करने जा रहे हो, वो सरासर पागलपन है!" काव्या ने एक बहुत भारी, सख्त सांस भरकर कहा। "तुम अपनी नौकरी को दांव पर लगाओगे? तुम्हारे उस फ्लैट का बीस साल का होम लोन कौन भरेगा? हमारे घर का राशन, बेटी की इतनी महंगी कॉलेज फीस और इस हॉस्पिटल के लाखों के मेडिकल बिल्स... ये सब तुम्हारी सैलरी से आते हैं राजेश! अगर इस टाइम तुम्हारी नौकरी चली गयी, तो हम रोड पर आ जाएंगे। क्या तुम इस मुश्किल टाइम में हमको बर्बाद करना चाहते हो?!" 

"लेकिन काव्या... घर पर ताऊजी की देखभाल कौन करेगा? उनके दोनों हाथ बंधे हैं!" 

"मैं करूँगी!" काव्या की आवाज़ में एक ऐसा गहरा, अटूट और पवित्र संकल्प गूंजा जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया। "ताऊजी ने मेरे कलेजे के टुकड़े को, मेरी बच्ची को अपनी जान देकर बचाया है राजेश। आज अगर मेरी बेटी ज़िंदा है, तो वो उस बुजुर्ग की बदौलत है। अब उनकी सेवा करना, उनके इस टूटे हुए जिस्म को संभालना... ये किसी और का नहीं, ये मेरा पहला और सबसे बड़ा धर्म है!" 

काव्या ने एक पल का ठहराव लिया, उसकी सांसों की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी: 

"अनु पूरी तरह ठीक है... वो मेरे साथ हॉस्पिटल में ही है, बहुत सहमी हुई है। मैंने मम्मी सुमित्रा को बोल दिया है, वो बाद में अनु को अपने घर ले जाने के लिए हमारे फ्लैट पर आ जाएंगी। और मैंने... मैंने अपने बुटीक से अगले पूरे महीने की छुट्टी ले ली है। मैं अपना सारा काम अपनी असिस्टेंट को सौंप चुकी हूँ।" 

"काव्या... लेकिन तुम अकेले..." 

"मैं कोई बच्ची नहीं हूँ राजेश, मैं इस घर की बहू हूँ!" काव्या की आवाज़ में एक अजीब सा संजीदा ठहराव आ गया था। "डॉक्टर ने कहा है कि आधे घंटे में प्लास्टर सूखने के बाद वो ताऊजी को डिस्चार्ज कर देंगे। मैं उनको टैक्सी से लेकर सीधे अपने फ्लैट जा रही हूँ। तुम अपने उस दफ्तर की जिम्मेदारी पूरी करो। जो भी तुम्हारी कंपनी का काम है, उसे पूरी निष्ठा से खत्म करो और जब तुम्हारा असाइनमेंट पूरा हो, तभी वापस लौटना। इस घर की, ताऊजी की और मेरी फिक्र तुम बिलकुल छोड़ दो। जब तक ये बहू ज़िंदा है, ताऊजी को किसी बात की तकलीफ नहीं होने देगी।" 

काव्या के उन सीधे, सच्चे और फौलादी शब्दों ने मेरे मुंह पर ताला लगा दिया था। 

काव्या ने मुझे पुणे लौटने से पूरी तरह, कड़ाई से रोक दिया था। उसने मुझे अपने उस तीन हफ्ते के कॉरपोरेट निर्वासन में रहने का एक ऐसा नैतिक लाइसेंस, एक ऐसा सामाजिक सुरक्षा-कवच थमा दिया था जिसे दुनिया का कोई भी इंसान झुठला नहीं सकता था। 

"डॉक्टर मुझे बुला रहे हैं राजेश, मुझे डिस्चार्ज पेपर्स पर साइन करना है। अपना ख्याल रखना। फोन रखता हूँ।" 

क्लिक। 

फोन कट गया। 

कॉन्फ्रेंस रूम की सुनसान, ठंडी हवा में सिर्फ मेरी अपनी उखड़ी हुई सांसों की आवाज़ गूंज रही थी। 

मैं वहीं चौखट के सहारे खड़ा रह गया। 

शुरुआत में जो मेरे सीने में एक भयानक घबराहट और हड़बड़ाहट थी... वो धीरे-धीरे, बहुत आहिस्ता से एक अजीब सी, शांत राहत में बदलने लगी। 

और फिर... 

उस सन्नाटे के भीतर, मेरे थके हुए दिमाग में एक बात बहुत साफ होकर उभरी:

ताऊजी के दोनों हाथ... कलाई से लेकर कोहनी के ऊपर तक... भारी, सफेद प्लास्टर में जकड़े हुए हैं! 

वो अपनी उंगलियां तक नहीं हिला सकते! 

डॉक्टर ने साफ कह दिया है कि हड्डियों को दोबारा जुड़ने में पूरे सौ दिन का टाइम लगेगा... वो एक लाचार मरीज की तरह बिस्तर पर पड़े रहने वाले हैं! 

मेरी छाती से एक बहुत भारी, ठंडी सांस बाहर निकली। 

इसका मतलब... इसका सीधा सा मतलब ये था कि जिस भयानक, वर्जित आग से मैं पिछले कई दिनों से खौफजदा था... वो आग अब हमेशा के लिए बुझ चुकी थी! 

जिस अखाड़े वाली फौलादी मर्दानगी, जिस बाहुबल और जिस शारीरिक ताक़त से मैं डर रहा था... आज के इस हादसे ने उस पूरी ताक़त को एक ही वार में पंगु बना दिया था। जब मर्द के दोनों हाथ ही टूट चुके हों, जब वो हिलने-डुलने के काबिल ही न बचा हो, तो फिर किसी अंतरंगता, किसी शारीरिक स्पर्श का सवाल ही कहाँ उठता था?! 

एक लाचार, घायल बुजुर्ग जिसके दोनों हाथ गले में स्लिंग्स से बंधे हों, वो किसी औरत को छूने का हौसला कैसे कर सकता था? 

काव्या भले ही घर पर रहे, लेकिन अब उनके बीच जो कुछ भी होगा, वो सिर्फ और सिर्फ दवा-गोली, खिचड़ी और एक संस्कारी बहू की तीमारदारी तक सीमित रहेगा। मर्यादा की जिस दीवार को सुबह की उस चाय ने मुश्किल से खड़ा किया था, ताऊजी के इस प्लास्टर ने उस दीवार को फौलाद का बना दिया था! अब उस बंद फ्लैट ९०३ में किसी अनहोनी, किसी पाप की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। 

"चलो..." मैंने एक गहरी राहत की सांस खींचते हुए खुद से फुसफुसाया, "कम से कम पुणे के मोर्चे पर अब कोई खतरा नहीं है। सब कुछ सेफ़ है।" 

अब जो कुछ झेलना था, वो सिर्फ मुझे झेलना था। 

मेरी अपनी कॉरपोरेट मुसीबत, वीपी का वो सख्त फरमान, और अगले इक्कीस दिनों तक साउथ के अलग-अलग शहरों के बीच उड़ने वाली वो मनहूस फ्लाइट्स! मुझे अपनी नौकरी और बीस साल के होम लोन को बचाने के लिए अपने उस खौफनाक एवियोफोबिया की आग से गुज़रना था, अपनी जान को मुट्ठी में लेकर उन हवाई सफरों को झेलना था। 

लेकिन दिल के किसी कोने में ये तसल्ली ज़रूर थी कि मेरे घर की आबरू पर अब कोई आंच नहीं आने वाली थी। 

डिनर की भूख मेरे भीतर से पूरी तरह मर चुकी थी। 

मैंने नीचे फर्श से अपना ब्रीफकेस उठाया। अपने बिखरे हुए बालों को ठीक किया, और तेज़ी से उस कॉरपोरेट बिल्डिंग की सीढ़ियां उतरकर बाहर आ गया। 

रोड पर शाम की बत्तियां पानी चुकी थीं। मैंने पहली ही ऑटो को हाथ दिया और सीधे अपने होटल की तरफ रवाना हो गया। 

होटल के कमरे में पहुँचकर मुझे तुरंत अपना बैग पैक करना था, चेन्नई की उस रात वाली कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए निकलना था, और उससे पहले बस एक नज़र लैपटॉप खोलकर तसल्ली कर लेनी थी कि काव्या और ताऊजी हॉस्पिटल से घर सही-सलामत पहुँच जाएं। 

पुणे का खतरा अब हमेशा के लिए टल चुका था... या कम से कम, उस बेवकूफ, नादान पति को यही लग रहा था! 


Chapter 40: Apratyashit Haadsa

Hyderabad ke tech corridor sthit regional headquarters mein, shaam ke theek sava chhah baj rahe the.

Poore nau ghante ki lagataar, thaka dene wali audit marathon ke baad ab jaakar conference room ki bhaari kaanch ki khidkiyon ke paar sannaata utra tha. Table par bikhri hui balance sheets, regional warehouse ke inventory charts aur ERP integration ke darjanon pannon par clients aur directors ke neeli syaahi wale dastakhat chamak rahe the.

Din bhar ki is jaanleva masroofiyat mein mere paas ek pal ke liye bhi saans lene ya apni jeb se phone nikaalkar flat 903 ke cameron ko check karne ki fursat nahi mili thi. Subah ki woh chai, Tauji ke woh sanjeeda lafz aur Kavya ka woh maun samarpan... sab kuch din bhar mere dimaag ke kisi andhere kone mein ek khoulta hua kaanta bankar chubhta raha tha.

Lekin ab... sab kuch khatam ho chuka tha.

"Great job, Rajesh! Aaj ka closure waqai solid raha," mere senior colleague ne meri peeth thapthapaate hue kaha aur apna laptop bag sametne laga. "Chalo, lobby mein chalte hain. Aaj raat ka dinner company ki taraf se Banjara Hills mein hai."

"Thanks Sameer, par main dinner ke liye nahi ruk paaoonga," maine ek pheeki, thaki hui muskaan ke saath jawaab diya aur apni mez par rakha leather ka briefcase band karne laga. "Meri raat ki train ka time ho raha hai. Bas hotel jaakar bag uthaana hai aur seedhe Secunderabad station nikalna hai."

"Are haan, tumhaari aaj raat ki waapsi tay thi na? Theek hai bhai, safe journey. Kal Pune pahunchkar baat karte hain."

Sameer muskuraate hue baahar nikal gaya.

Conference room ki doodhiya tubelights ke neeche akela khada main, gehri raahat ki ek thandi saans le raha tha.

Meri train raat ke theek nau baje thi. Iska matlab tha ki main agle baarah ghanton mein Pune pahunchne wala tha. Aaj subah se lekar ab tak mere dil par jo ek bhayanak, damghontu khauf haavi tha ki mere gair-haaziri mein flat 903 ki maryaada par koi nayi aanch na aa jaaye... woh khauf ab khatam hone wala tha. Main aaj raat hi apne ghar pahunchkar apni us thandi grihasthi ki kamaan dobaara apne haathon mein le loonga.

Maine muskuraate hue apni jacket ki zip kheenchi aur jaise hi briefcase uthaakar darwaze ki taraf badha...

Meri pant ki jeb mein rakha phone betahaasha kaanp utha.

Vibration... thartharaahat... aur loud ringtone!

Screen par Kavya ka naam chamak raha tha.

Kavya ka phone is time? Aamtaur par Kavya mujhe raat ko aath ya saadhe aath baje, boutique band karke ghar lautne ke baad hi call kiya karti thi. Abhi to shaam ke sava chhah hi baje the.

Maine turant screen swipe karke phone kaan se lagaya:

"Hello Kavya? Main bas abhi office se nikal hi raha tha, aaj raat ki train..."

"Ra... Rajesh!"

Kavya ki aawaaz sunte hi mere kadam chaukhat par hi jam gaye.

Woh aawaaz Kavya ki common, meethi aur sanjeeda aawaaz nahi thi. Kavya buri tarah haanph rahi thi. Uski saansein kisi phati hui dhaunkani ki tarah chal rahi thiin, aur uski aawaaz mein ek bhayanak, beqaaboo cheekh aur aansuon ka sailaab ghula hua tha. Prishthabhoomi se kisi bade hospital ke announcement system ki goonj aur monitors ki teekhi teen... teen... ki aawaazein saaf aa rahi thiin.

"Kavya?! Kya hua? Tum ro kyon rahi ho? Tum kahan ho?!" Meri reedh mein baraf ki sansanaahat daud gayi.

"Rajesh... bahut bada anarth ho gaya... Tauji... Tauji ka accident..."

[Image: img-01512-cleaned.png]

Kavya ka gala buri tarah rundh gaya. Woh hichkiyon ke beech poori baat bhi nahi keh paayi thi ki...

Beep... beep... beep!

Mere phone ki screen par call-waiting ki teekhi, bhaari beep baji.

Screen ki kaali patti par bade-bade aksharon mein company ke regional vice president (supply chain wa logistics operations) ka official number chamak raha tha: Raghavan Sir (VP - National Operations).

Corporate ki duniya mein VP ka call kisi general ke emergency farmaan jaisa hota tha, jise ignore karne ka matlab seedhe apni naukri se haath dhona tha.

Mujhe laga ki shaayad aaj ke safal closure ke baad Sameer ne VP ko brief kar diya hai aur woh keval do shabdon ki formal badhaai ya mere travel voucher ki clearance ke liye line par hain.

"Kavya, suno! Ek second ruko, VP sir ki urgent line aa rahi hai, main bas do second mein baat karke kaatta hoon... please hold karna!"

"Nahi Rajesh, meri baat suno! Yahan Tauji..."

Lekin isse pehle ki Kavya ka agla vaakya poora hota, maine ghabrahat aur hadbadaahat mein call-waiting ka button dabakar VP ki line connect kar di.

"Good evening sir, main Rajesh bol raha hoon..."

"Rajesh, cut the formalities and listen to me very carefully!" Doosri taraf se Raghavan sir ki bhaari, sakht aur tanaav se bhari aawaaz goonji.

Conference room ke sannaate mein mere kaan sunn pad gaye.

"Sir? Sab theek to hai? Aaj ka regional audit to poori tarah sign-off ho chuka hai..."

"Audit gaya bhaad mein, Rajesh! Abhi aadhe ghante pehle headquarters se red-alert aaya hai. South-Western region ke teen bade warehouse clusters, Chennai, Bengaluru aur Hyderabad mein poora ERP aur supply chain network poori tarah crash kar gaya hai. Karodon ka shipment ports aur highway par atka hua hai. Clients ne penalty clause trigger karne ki dhamki di hai!"

Meri chhaati mein ek bhayanak dhak-dhak shuru ho gayi:

"Sir... lekin meri to aaj raat ki Pune ki train..."

"Koi train nahi, Rajesh! Tumhari saari chhuttiyan aur travel tickets immediate effect se cancel kar di gayi hain. Management ne faisla kiya hai ki tum agle poore teen hafton tak yahin South region mein deployed rahoge. Tumko aaj raat hi Chennai ke liye connecting flight pakadni hogi, phir Bengaluru aur waapas Hyderabad ka saara logistics ground zero par rehkar apni dekhrekh mein restore karna hoga. Yeh non-negotiable hai, Rajesh! Agar tumne yeh crisis sambhaal liya to tumhara promotion pakka hai, lekin agar tumne is time site chhodi... to kal subah tak termination letter tumhari table par hoga!"

Flight... Chennai... Bengaluru... teen hafte!

Termination letter!

Mere pairon ke neeche se jaise zameen hi khisak gayi.

'Flight' shabd sunte hi mere halaq mein thook sookh gaya. Mujhe bachpan se hawaai jahaaz mein baithne ka ek bhayanak, lakwa maar dene wala dar tha... ek aisa damghontu aviophobia (plane-phobia) jismein flight ka darwaza band hote hi mera dam ghutne lagta tha, aankhon ke aage andhera chha jaata tha aur panic attack se meri jaan halaq mein atak jaati thi. Yahi wajah thi ki main company ke har tour par chaudah-chaudah ghante ki train yaatra chunta tha taaki mere pair zameen par rahein!

Mera dil chaaha ki main VP ke saamne gidgidaakar keh doon ki sir, mujhe train se jaane do... lekin corporate ki is berahm, target-driven duniya mein apni is kamzori ka zikr karne ka matlab tha apni hi qabr khud khodna! Sankat ke is time company ko result chahiye the, kisi manager ka phobia nahi. Agar maine bahaana banaya, to VP mujhe usi second naukri se baahar phenk deta.

"Sir... lekin meri family... ghar par..."

"Family baad mein, Rajesh! Company ka future daanv par laga hai. HR ko maine instruct kar diya hai, tumhara poora revised schedule mail par aa raha hai. Don't let me down!"

Click!

Phone kat gaya.

Line poori tarah dead ho chuki thi.

Main us khaali conference room mein kisi laawaaris laash ki tarah khada reh gaya. Mere haath buri tarah kaanp rahe the. Mera bees saal ka home loan, meri naukri, mera poora corporate career... aur uske oopar agle ikkees dinon tak ek shehar se doosre shehar udne wali woh khaufnaak flights! Sab kuch ek hi jhatke mein us teen hafte ke farmaan ki zad mein aa chuka tha. Company ne mujhe apne career aur apne sabse bade phobia ki aag mein ek saath jhonk diya tha!

Lekin agle hi pal, mere dimaag mein bijli ki tarah ek bhayanak khauf kaundha...

Kavya!

Kavya ro rahi thi... Tauji ka accident!

Maine paaglon ki tarah kaanpti ungliyon se Kavya ka number dobaara dial kiya.

Phone ki pehli hi ghanti par call uth gaya.

Lekin phone uthte hi, doosri taraf se jo aawaaz aayi, usne mere seene ko chhalni kar diya.

"Rajesh! Tum... tum insaan ho ya patthar ke bane ho?!"

Kavya ki aawaaz gusse, ghabrahat aur aansuon ke ek bhayanak toofaan mein phat padi thi:

"Tumne mera phone kaat diya?! Tumko andaaza bhi hai ki main is time kahan khadi hoon? Yahan meri rooh kaanp rahi hai, mere haath-pair thande pad chuke hain, aur tumne apne us manhoos daftar ke liye meri baat beech mein hi kaat di?!"

"Kavya... mujhe maaf kar do, bhagwan ke liye meri baat suno!" Main corridor mein paaglon ki tarah tehalte hue gidgidaane laga, meri apni saansein ukhad rahi thiin. "Woh... woh VP ka emergency call tha... tum pehle batao ki hua kya hai? Tum ro kyon rahi ho? Tauji ko kya hua?!"

Kavya ne ek bahut bhaari, hichkiyon se bhari saans kheenchi. Uske rone ki aawaaz itni bebas aur dardnaak thi ki mera kaleja munh ko aa gaya:

"Rajesh... aaj dopahar ko... humari beti... humari Anu..."

Anu?!

Meri aankhon ke aage andhera chha gaya. Mera briefcase mere haath se chhootkar neeche marble ke farsh par gir pada:

"Anu?! Anu ko kya hua Kavya?! Bhagwan ke liye sach batao, meri beti theek to hai na?!"

"Anu... Anu bilkul safe hai Rajesh... bhagwan ka laakh-laakh shukr hai ki meri beti ko ek kharonch tak nahi aayi!" Kavya ne subakte hue kaha, aur phir uski aawaaz mein ek gehra, kampkampaata hua dard goonja. "Lekin... Tauji... Tauji ne Anu ko bachaane ke liye apni dono baahein tudwa leen Rajesh!"

Mere rongte khade ho gaye. Mera poora badan paseene se bheeg gaya:

"Kya?! Kaise?!"

Kavya ne rote hue jo kuch bataaya, usne meri rooh ko andar tak kampa diya.

Dopahar ke qareeb chaar baje, humari high-rise society ke bhaari lohe wale main sliding gate ke paas Anu khel rahi thi. Tabhi achanak, woh kai sau kilo ka bhaari, jang laga lohe ka gate apne oopri track se fisal gaya aur poori raftaar se seedhe neeche Anu ki taraf girne laga!

Society ke compound mein tehal rahe Tauji ne jaise hi us lohe ke pahaad ko humari laadli par girte dekha, us chhappan saal ke boodhe pehalwaan ke bheetar ka akhaade wala khoon khoul utha. Tauji ne na apni umr dekhi, na apni jaan ki parwaah ki. Woh kisi bijli ki raftaar se chhalaang lagaakar us girte hue gate ke neeche kood pade!

Tauji ne Anu ko jhapatkar apne vishaal seene ke neeche poori tarah chhupa liya... aur us kai sau kilo wazani lohe ke gate ka poora jaanleva prahaar seedhe apne dono phaile hue haathon aur kalaiyon par jhel liya!

Anu neeche poori tarah mehfooz bach gayi, lekin us bhaari lohe ki chot ne Tauji ki dono kalaiyon aur agrabhujaon ki haddiyon ko buri tarah chaknachoor kar diya!

"Society ke log daude... security guards ne milkar us bhaari gate ko hataaya," Kavya ki aawaaz mein aansoo thamne ka naam nahi le rahe the. "Tauji dard se tadap rahe the, unke dono haath bejaan hokar latak rahe the Rajesh! Main paaglon ki tarah unko lekar shehar ke is bade multi-speciality hospital bhaagi. Doctoron ne turant unko emergency mein liya..."

"Doctor... doctor kya keh rahe hain Kavya?! Chot kitni gehri hai?!" Meri aawaaz kaanp rahi thi.

"Dono haathon ki haddiyan multiple fracture ho gayi hain Rajesh... kalaayi se lekar kohani tak ki haddiyan toot chuki hain," Kavya ne naak sudakte hue, bahut hi ruaansi aawaaz mein bataaya. "Orthopedic surgeon ne pichhle do ghante se unko operation theater mein rakhkar dono haathon par ungliyon se lekar kohani ke oopar tak bhaari, safed plaster chadha diya hai. Dono haathon mein pattiyan aur gale mein slings baandh di hain. Doctor ne saaf keh diya hai ki haddiyon ko dobaara judne mein poore sau din ka time lagega! Agle ek maheene tak woh apni ungliyan tak nahi hila paayenge... woh apne haathon se paani ka ek ghoont tak nahi pee sakte Rajesh!"

Meri aankhon se aansuon ki do boondein tapak kar mere gaalon par dhulak gayiin.

Mere seene mein Tauji ke liye ek aisa bepanaah, aseem aadar aur qarz ka samandar umad pada jise shabdon mein bayaan nahi kiya ja sakta tha.

Woh boodha dehati sher... jise maine apni wehshi hawas aur ghatiya voyeurism ka mohra banaane ki koshish ki thi... usne aaj meri kul ki ekmaatra santaan, meri maasoom beti ki zindagi bachaane ke liye apne dono faulaadi haath qurbaan kar diye the! Agar aaj Tauji wahan na hote, to meri laadli... meri Anu... us lohe ke neeche dabkar khatam ho chuki hoti!

Aur usi pal, mere seene mein ek bhayanak apraadhbodh aur pashchaataap ki aag bhadak uthi.

"Kavya... suno!" Maine phone ko dono haathon se bheenchte hue badhawaas aawaaz mein kaha. "Tum bilkul mat ghabraao. Main... main abhi isi time apni company ke VP ke pair padta hoon. Mujhe is naukri ki, is promotion ki koi parwaah nahi hai! Main abhi jaakar emergency leave maangta hoon aur chaahe jo ho jaaye, main aaj raat ki pehli train pakadkar subah tak seedhe hospital pahunch raha hoon! Tum Tauji ko sambhaalo, main aa raha hoon!"

"Nahi Rajesh!"

Kavya ki aawaaz achanak cheekhte hue goonji.

Uski aawaaz mein ab woh rone wali laachaari nahi thi. Ek aurat, ek patni aur ek grihalakshmi ki woh faulaadi, sanjeeda aur sakht aawaaz phone ke speaker se nikli, jisne mujhe wahin ka wahin patthar ki moorat bana diya:

"Tum aisi bewakoofi karne ki himmat bhi mat karna, Rajesh!"

"Kavya... tum samajh nahi rahi ho, Tauji laachaar hain..."

"Main sab samajh rahi hoon Rajesh, aur tum jo karne ja rahe ho, woh saraasar paagalpan hai!" Kavya ne ek bahut bhaari, sakht saans bharkar kaha. "Tum apni naukri ko daanv par lagaaoge? Tumhaare us flat ka bees saal ka home loan kaun bharega? Humare ghar ka ration, beti ki itni mehengi college fees aur is hospital ke laakhon ke medical bills... yeh sab tumhari salary se aate hain Rajesh! Agar is time tumhari naukri chali gayi, to hum road par aa jaayenge. Kya tum is mushkil time mein humko barbaad karna chahte ho?!"

"Lekin Kavya... ghar par Tauji ki dekhbhaal kaun karega? Unke dono haath bandhe hain!"

"Main karoongi!" Kavya ki aawaaz mein ek aisa gehra, atoot aur pavitra sankalp goonja jisne mujhe andar tak hila diya. "Tauji ne mere kaleje ke tukde ko, meri bachhi ko apni jaan dekar bachaaya hai Rajesh. Aaj agar meri beti zinda hai, to woh us bujurg ki badaulat hai. Ab unki sewa karna, unke is toote hue jism ko sambhaalna... yeh kisi aur ka nahi, yeh mera pehla aur sabse bada dharm hai!"

Kavya ne ek pal ka thehraav liya, uski saanson ki dhadkan saaf sunai de rahi thi:

"Anu poori tarah theek hai... woh mere saath hospital mein hi hai, bahut sahmi hui hai. Maine mummy Sumitra ko bol diya hai, woh baad mein Anu ko apne ghar le jaane ke liye humare flat par aa jaayengi. Aur maine... maine apne boutique se agle poore maheene ki chhutti le li hai. Main apna saara kaam apni assistant ko saump chuki hoon."

"Kavya... lekin tum akele..."

"Main koi bachhi nahi hoon Rajesh, main is ghar ki bahu hoon!" Kavya ki aawaaz mein ek ajeeb sa sanjeeda thehraav aa gaya tha. "Doctor ne kaha hai ki aadhe ghante mein plaster sookhne ke baad woh Tauji ko discharge kar denge. Main unko taxi se lekar seedhe apne flat ja rahi hoon. Tum apne us daftar ki zimmedaari poori karo. Jo bhi tumhari company ka kaam hai, use poori nishtha se khatam karo aur jab tumhara assignment poora ho, tabhi waapas lautna. Is ghar ki, Tauji ki aur meri fikr tum bilkul chhod do. Jab tak yeh bahu zinda hai, Tauji ko kisi baat ki takleef nahi hone degi."

Kavya ke un seedhe, sachhe aur faulaadi shabdon ne mere munh par taala laga diya tha.

Kavya ne mujhe Pune lautne se poori tarah, kadaayi se rok diya tha. Usne mujhe apne us teen hafte ke corporate nirvaasan mein rehne ka ek aisa naitik license, ek aisa saamaajik suraksha-kavach thama diya tha jise duniya ka koi bhi insaan jhuthla nahi sakta tha.

"Doctor mujhe bula rahe hain Rajesh, mujhe discharge papers par sign karna hai. Apna khayaal rakhna. Phone rakhti hoon."

Click.

Phone kat gaya.

Conference room ki sunsaan, thandi hawa mein sirf meri apni ukhdi hui saanson ki aawaaz goonj rahi thi.

Main wahin chaukhat ke sahaare khada reh gaya.

Shuruaat mein jo mere seene mein ek bhayanak ghabrahat aur hadbadaahat thi... woh dheere-dheere, bahut aahista se ek ajeeb si, shaant raahat mein badalne lagi.

Aur phir...

Us sannaate ke bheetar, mere thake hue dimaag mein ek baat bahut saaf hokar ubhri:

Tauji ke dono haath... kalaayi se lekar kohani ke oopar tak... bhaari, safed plaster mein jakde hue hain!

Woh apni ungliyan tak nahi hila sakte!

Doctor ne saaf keh diya hai ki haddiyon ko dobaara judne mein poore sau din ka time lagega... woh ek laachaar mareez ki tarah bistar par pade rehne wale hain!

Meri chhaati se ek bahut bhaari, thandi saans baahar nikli.

Iska matlab... iska seedha sa matlab yeh tha ki jis bhayanak, varjit aag se main pichhle kai dinon se khaufzada tha... woh aag ab hamesha ke liye bujh chuki thi!

Jis akhaade wali faulaadi mardaangi, jis baahubal aur jis shareerik taaqat se main dar raha tha... aaj ke is haadse ne us poori taaqat ko ek hi waar mein pangu bana diya tha. Jab mard ke dono haath hi toot chuke hon, jab woh hilne-dulne ke qaabil hi na bacha ho, to phir kisi antarangata, kisi shareerik sparsh ka sawaal hi kahan uthta tha?!

Ek laachaar, ghaayal bujurg jiske dono haath gale mein slings se bandhe hon, woh kisi aurat ko chhoone ka hausla kaise kar sakta tha?

Kavya bhale hi ghar par rahe, lekin ab unke beech jo kuch bhi hoga, woh sirf aur sirf dawa-goli, khichdi aur ek sanskaari bahu ki teemaardaari tak seemit rahega. Maryaada ki jis deewaar ko subah ki us chai ne mushkil se khada kiya tha, Tauji ke is plaster ne us deewaar ko faulaad ka bana diya tha! Ab us band flat 903 mein kisi anhoni, kisi paap ki koi gunjaaish hi nahi bachi thi.

"Chalo..." Maine ek gehri raahat ki saans kheenchte hue khud se fusfusaaya, "Kam se kam Pune ke morche par ab koi khatra nahi hai. Sab kuch safe hai."

Ab jo kuch jhelna tha, woh sirf mujhe jhelna tha.

Meri apni corporate museebat, VP ka woh sakht farmaan, aur agle ikkees dinon tak South ke alag-alag sheharon ke beech udne wali woh manhoos flights! Mujhe apni naukri aur bees saal ke home loan ko bachaane ke liye apne us khaufnaak aviophobia ki aag se guzarna tha, apni jaan ko mutthi mein lekar un hawaai safaron ko jhelna tha.

Lekin dil ke kisi kone mein yeh tasalli zaroor thi ki mere ghar ki aabroo par ab koi aanch nahi aane wali thi.

Dinner ki bhookh mere bheetar se poori tarah mar chuki thi.

Maine neeche farsh se apna briefcase uthaya. Apne bikhre hue baalon ko theek kiya, aur tezi se us corporate building ki seedhiyan utarkar baahar aa gaya.

Road par shaam ki battiyan jal chuki thiin. Maine pehli hi auto ko haath diya aur seedhe apne hotel ki taraf rawaana ho gaya.

Hotel ke kamre mein pahunchkar mujhe turant apna bag pack karna tha, Chennai ki us raat wali connecting flight ke liye nikalna tha, aur usse pehle bas ek nazar laptop kholkar tasalli kar leni thi ki Kavya aur Tauji hospital se ghar sahi-salaamat pahunch jaayein.

Pune ka khatra ab hamesha ke liye tal chuka tha... ya kam se kam, us bewakoof, naadaan pati ko yahi lag raha tha!
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#52
अध्याय 41: दोहरा मन

होटल के कमरे का भारी लकड़ी का दरवाज़ा मैंने जैसे ही अपने पीछे बंद किया, मेरे माथे से पसीना बहकर मेरी पलकों पर आ गिरा था। कमरे की सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग की ठंडी, बासी हवा सीधे मेरे चेहरे पर लगी, लेकिन मेरे भीतर जो आग सुलग रही थी, वो किसी भी तापमान से शांत होने वाली नहीं थी।

मैंने अपने जूते तक ठीक से नहीं खोले। ब्रीफकेस को सीधे कालीन पर पटका और अपने कांपते हुए हाथों से सीधे डेस्क की तरफ लपका। 

लैपटॉप का ढक्कन उठाते ही उसकी नीली स्क्रीन पानी उठी। मेरी उंगलियां कीबोर्ड पर इतनी तेज़ी से चलीं कि पासवर्ड दो बार गलत टाइप हुआ। तीसरी बार में जब ऑथेंटिकेशन हुआ, तो पुणे के बानेर स्थित फ्लैट के क्लोज़्ड-सर्किट सर्विलांस का रिमोट सॉफ्टवेयर स्क्रीन पर खुल गया।

चार विंडो। 

@@Cam_MainDoor_01@@, @@Cam_Living_01@@, @@Cam_MasterBed_01@@, और @@Cam_Kitchen_01@@।

स्क्रीन पर अभी सन्नाटा था। फ्लैट ९०३ का लिविंग रूम खाली पड़ा था। सोफे के कुशन थोड़े अस्त-बिज़ी थे, और सेंटर टेबल पर पानी का एक खाली जग रखा था, वही मंज़र जो दोपहर के उस भयानक हादसे के वक़्त छूटा था जब काव्या बदहवास हालत में ताऊजी और अनु को लेकर हॉस्पिटल भागी थी।

टाइमस्टैम्प दिखा रहा था: रात के ७:४२।

मेरी धड़कनें मेरे कानों में हथौड़ों की तरह बज रही थीं। मैं अपनी घूमने वाली कुर्सी के किनारे पर टिका हुआ, अपनी दोनों हथेलियों को डेस्क पर गड़ाए स्क्रीन को घूर रहा था। 

और ठीक ७:४७ पर... Cam_MainDoor_01 के मोशन सेंसर ने बीप की।

दरवाज़े की भारी कुंडी बाहर से खुली। 

सबसे पहले काव्या अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ा हुआ था। सुबह जो लैवेंडर रंग का रेशमी सलवार-सूट उसने करीने से पहना था, वो अब बुरी तरह सिलवटों से भरा था। उसका बादामी कश्मीरी शॉल एक कंधे से बेतरतीब ढलका हुआ था, और माथे की लटें पसीने से चिपक गयी थीं। 


[Image: img-01509-cleaned.png]



लेकिन उसकी नज़रें पीछे थीं, पूरी तरह किसी की हिफाज़त में जुटी हुईं।

"आराम से ताऊजी... चौखट पर पैर संभालिए... धीरे..." काव्या की आवाज़ में एक अजीब सा, हलक चीर देने वाला खिंचाव था।

और फिर वो विशाल, देहाती जिस्म चौखट के भीतर आया।

उनको देखते ही मेरे सीने में एक भयानक कंपकंपी दौड़ गई। 

सुखदेव ताऊजी... छह फीट एक इंच का वो अखाड़े का शेर... आज दोनों घुटनों से थोड़ा झुककर चल रहा था। उनके दोनों हाथ... कलाई से लेकर पूरी कोहनी के ऊपर तक... मोटे, खुरदुरे और भारी सफेद प्लास्टर में जकड़े हुए थे। दोनों बाहें काली मेडिकल स्लिंग्स (पट्टियों) के सहारे उनकी चौड़ी गर्दन से लटकी हुई थीं। उनकी उंगलियां प्लास्टर के सिरे से बाहर निकली थीं, नीली, सूजी हुई और पूरी तरह बेजान। 

वो अपनी उंगलियों का एक पोर तक नहीं हिला पा रहे थे।

सफेद खादी का कुर्ता जो वो सुबह पहनते थे, वो हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने कैंची से काटकर अलग कर दिया होगा, क्योंकि इस टाइम उनके बदन पर सिर्फ एक बिना आस्तीन की सफेद कॉटन बनियान थी। बनियान पर जगह-जगह खून और ज़ंग लगे लोहे के भूरे दाग थे। उनकी चौड़ी, रोएंदार छाती हर सांस के साथ भारी धौंकनी की तरह फूल और पिचक रही थी। उनके माथे पर दर्द की गहरी, काली लकीरें खिंची थीं, और होंठ सूखे पापड़ की तरह फटे हुए थे।

उनके ठीक पीछे, अनु दबे पांव अंदर आई। उसकी गुलाबी फ्रॉक धूल से सनी थी, और उसकी आंखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। वो काव्या के कुर्ते का कोना पकड़ना चाहती थी, लेकिन काव्या का पूरा वजूद सिर्फ और सिर्फ ताऊजी को संभालने में लगा था।

"यहाँ बैठिए... दीवान पर... हाँ, टेक लगाइए..." काव्या ने ताऊजी के भारी, मांसल कंधे को सहारा दिया। 

ताऊजी के बदन का पूरा भार जब काव्या के नाज़ुक बदन पर आया, तो काव्या के पैर एक पल के लिए लड़खड़ाए, लेकिन उसने अपने पूरे वजूद का ज़ोर लगाकर उस विशाल जिस्म को दीवान पर टिकने में मदद की। ताऊजी के मुंह से एक दबी हुई, कराहती हुई चीख निकली, "आह्ह... भगवान...!"

"दर्द बहुत ज़्यादा है ना ताऊजी?" काव्या उनके सामने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई। उसने अपने कांपते हाथों से ताऊजी के पैरों से चमड़े की चप्पलें उतारीं। "डॉक्टर ने कहा है कि रात को इंजेक्शन का असर कम होगा तो टीस बढ़ेगी... मैं अभी गर्म हल्दी का दूध बनाती हूँ और पेनकिलर देती हूँ।"

ताऊजी ने अपनी बंद आंखों से धीरे से सिर हिलाया। उनके माथे से पसीने की एक मोटी बूंद ढलकर उनकी दाढ़ी में समा गई। 

"तू... तू परेशान मत हो, बहू..." ताऊजी की भारी, देहाती आवाज़ दर्द की वजह से कांप रही थी। "हड्डी ही तो चटकी है... अखाड़े में इससे बुरी मार सही है मैंने। तू बस बैठ जा... दिन भर से दौड़ी है तू।"

"आप चुप रहिए ताऊजी!" काव्या की आवाज़ में अचानक एक ऐसा अधिकार, एक ऐसी सख्त ममता उभरी जो मैंने अपनी आठ साल की शादी में कभी नहीं सुनी थी। "दो-दो जगह से हड्डियां चकनाचूर हुई हैं आपकी... और आप कहते हैं कुछ नहीं हुआ? अगर ज़रा सी भी देर हो जाती तो..."

काव्या का गला रुंध गया। उसने अपनी दोनों हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लिया और दीवान के पाए से सिर टिकाकर सिसक पड़ी।

मैं हैदराबाद में स्क्रीन के सामने बैठा अपनी सांसें रोक चुका था। काव्या का वो रोना किसी औपचारिकता का नहीं था; वो उस भयानक सदमे का रेचन था जो उसने पिछले चार घंटों से हॉस्पिटल के गलियारों में अकेले झेला था।

और तभी... वो हुआ जिसने उस पूरे घर की हवा को ज़हरीला बना दिया।

अनु, जो अब तक लिविंग रूम के कालीन पर सहमी हुई खड़ी थी, ऊब और भूख से मचलने लगी। उसने सेंटर टेबल के पास जाकर अपने पैर से एक स्टील का गिलास हिला दिया। 

झन... झन... खड़खड़खड़!

खाली स्टील का गिलास संगमरमर के ठंडे फर्श पर गोल-गोल घूमता हुआ तेज़ आवाज़ के साथ गूंज उठा। 

ताऊजी दर्द के मारे चौंक गये, उनकी घायल बांह स्लिंग में हल्का सा झटका खा गयी और उनके मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली, "उफ़्फ़...!"

अनु ने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। उसने अपने दोनों छोटे हाथ अपनी कमर पर रखे और एक चिड़चिड़ी, बचकानी ज़िद के साथ रोनी सूरत बनाकर बोली, "मम्मा! मुझे भूख लगी है... मुझे कार्टून देखना है! रिमोट कहाँ है? कब से हॉस्पिटल में बैठे-बैठे मेरे पैर दुख रहे हैं... मुझे टीवी चला कर दो ना!"

उस एक पल में... काव्या का पूरा शरीर पत्थर की तरह सख्त हो गया।

उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया। 

भगवान गवाह है, Cam_Living_01 के हाई-डेफिनिशन लेंस से मैंने काव्या की जो आंखें उस पल देखीं, उनसे मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ की एक धार उतर गई। 

वो मेरी शांत, संस्कारी, कोरगांव पार्क की नफीस और नर्मदिल पत्नी काव्या नहीं थी। 

उसकी आंखों की पुतलियां सिकुड़कर कोयले की तरह सुलग रही थीं। उसके नथुने फड़क रहे थे, और जब वो फर्श से उठी, तो उसकी चाल में एक खूंखार, ज़हरीला तनाव था। 

"चुप करो अनु!" 


[Image: img-01510-cleaned.png]



काव्या की आवाज़ में ऐसी ठंडी, हिंसक कड़वाहट थी कि अनु वहीं की वहीं सहमकर दो कदम पीछे हट गई।

"मम्मा...?" अनु की आवाज़ गले में ही अटक गई।

"एक शब्द और नहीं निकलेगा तुम्हारे मुंह से!" काव्या अपनी बेटी के बिलकुल करीब आ खड़ी हुई। उसने अपनी उंगली अनु के चेहरे के सामने तान दी। उसकी आवाज़ भले ही चीखने वाली नहीं थी, लेकिन उस धीमी, फुसफुसाती हुई डांट में जो ज़हर था, उसने कमरे की सारी ऑक्सीजन सोख ली थी। "तुमको ज़रा भी शर्म नहीं आती? ज़रा सा भी अहसास है कि तुम्हारी उस बेहूदा, लापरवाह ज़िद की वजह से आज इस घर में क्या हो गया है?!"

"काव्या... बहू..." ताऊजी ने दीवान से अपनी भारी गर्दन उठाने की कोशिश की। "अनु है... अभी नादान है... छोड़ उसे..."

"नहीं ताऊजी, आप बीच में मत बोलिए!" काव्या ने मुड़कर देखे बिना कहा, उसकी पूरी नफरत उस टाइम अपनी ही बेटी पर केंद्रित थी। "अगर आज इस लड़की ने उस भारी गेट के नीचे गेंद के पीछे दौड़ने की बदतमीज़ी न की होती... तो आज आपके हाथ सलामत होते! सौ बार मना किया था मैंने कि मेन गेट के पास मत खेला करो... लेकिन नहीं! वही ढीठपन, वही गैर-ज़िम्मेदाराना बचकानापन!"

काव्या की आंखें लाल अंगारे जैसी हो चुकी थीं। और फिर उसने जो लफ्ज़ कहे, उन्होंने हैदराबाद के होटल में बैठे मेरे सीने पर किसी ने गर्म खंजर घोंप दिया:

"तुम्हारा ये लापरवाह, मतलबी रवैया बिलकुल तुम्हारे पापा जैसा है, अनु! बिलकुल वही खून! किसी की क़ुर्बानी, किसी के दर्द की कोई क़दर नहीं है तुम लोगों को! बस अपनी भूख, अपना टीवी, अपना आराम दिखता है! अगर आज ताऊजी ने अपना शरीर उस तीन सौ किलो के लोहे के नीचे न झोंका होता ना... तो आज तुम इस दुनिया में ज़िंदा खड़ी होकर टीवी मांगने लायक नहीं बचतीं! लाश बन चुकी होतीं तुम!"

"काव्या!" ताऊजी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी एक प्लास्टर बंधी बांह उठाई, चेहरे पर बेपनाह तकलीफ उभर आई। "बहू, बस कर! मेरी लाडली पर इतना जुल्म मत ढा... उस गेट की कमानी टूटी थी, मेरी गुड़िया की कोई खता नहीं है! भगवान के लिए चुप हो जा!"

अनु की आंखें फटी की फटी रह गयी थीं। उसकी मासूम समझ में ये बात नहीं आ रही थी कि जो मां उसे हर रात सीने से लगाकर परियों की कहानियां सुनाती थी, वो अचानक उसे ऐसे क्यों देख रही थी जैसे वो कोई पराई, घिनौनी बला हो। 

अनु का निचला होंठ बुरी तरह कांपने लगा। उसकी आंखों से आंसुओं के दो बड़े-बड़े धारे बहे, और वो मुंह पर हाथ रखकर बेतहाशा सिसकती हुई सीधे मास्टर बेडरूम की तरफ भागी और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।

लिविंग रूम में सन्नाटा छा गया। सिर्फ ताऊजी की भारी, दर्दनाक सांसें और एसी की धीमी घुरघुराहट बची थी।

काव्या वहीं खड़ी रही। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके चेहरे पर अपनी बेटी को इतनी बेरहमी से दुत्कारने का कोई पछतावा उस टाइम नहीं दिख रहा था। उसके चेहरे पर सिर्फ एक भयानक, आदिम हिफाज़त का भाव था, एक ऐसी शेरनी का भाव जो अपने घायल शेर के इर्द-गिर्द खड़ी होकर किसी भी तीसरे वजूद को, चाहे वो उसकी अपनी बेटी ही क्यों न हो, एक खतरे की तरह देखने लगती है।

और मैं? 

मैं अपनी स्क्रीन के सामने सुन्न पड़ा था। 

“तुम्हारा ये लापरवाह, मतलबी रवैया बिलकुल तुम्हारे पापा जैसा है... बिलकुल वही खून!”

काव्या के वो शब्द मेरे कानों में किसी सीसे की तरह पिघल रहे थे। वो डांट सिर्फ अनु के लिए नहीं थी; वो एक गहरा, अचेतन थप्पड़ था जो काव्या ने परोक्ष रूप से मेरे मुंह पर मारा था। उसके अवचेतन ने अनु की उस लापरवाही को मेरे उस कायर, दफ्तर में दुबके हुए वजूद से जोड़ दिया था जो हर संकट के टाइम अपनी बीस साल की होम लोन की ईएमआई और कॉरपोरेट नौकरी का रोना रोकर भाग खड़ा होता था। उसके ज़ेहन में ताऊजी की अखाड़े वाली मर्दानगी और मेरा खोखला, शहरी वजूद आमने-सामने खड़े थे... और उस तुलना में मैं और मेरी बेटी, दोनों ताऊजी के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं ठहर रहे थे।

मेरा खून खौल उठा। मेरा दिल चाहा कि मैं अभी फोन मिलाऊं और काव्या पर चीख पड़ूं, 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी मासूम बेटी को ये बोलने की कि वो लाश बन जाती?! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे खून को मतलबी कहने की?!'

लेकिन... मेरे हाथ फोन तक जाकर रुक गए।

कायरता। नामर्दगी। 

मैं कैसे फोन करता? मैं किस मुंह से काव्या पर चिल्लाता? 

क्या ये सच नहीं था कि ताऊजी ने मेरी ही बेटी को बचाने के लिए अपनी दोनों बाहें तुड़वाई थीं? क्या ये सच नहीं था कि इस टाइम जब ताऊजी अपाहिज बनकर दर्द से तड़प रहे थे, मैं हैदराबाद के एक फाइव-स्टार होटल के वातानुकूलित कमरे में बैठकर चुपचाप कैमरे से अपनी बीवी की जासूसी कर रहा था? काव्या नैतिक रूप से उस हिमालय की चोटी पर खड़ी थी जहां से मैं सिर्फ एक कीड़े की तरह रेंगता हुआ दिखाई देता था। अगर मैंने आवाज़ उठाई, तो काव्या सीधे कह सकती थी, 'अगर इतना ही दर्द है बेटी का, तो छोड़िए अपनी वो वीपी की नौकरी और आइए अभी ट्रेन पकड़कर! संभालिए ताऊजी का पेशाब-पाखाना!'

और मैं नहीं आ सकता था। मैं उस बीस साल के होम लोन के जाल में बंधा हुआ एक नपुंसक कॉरपोरेट गुलाम था।

स्क्रीन पर, काव्या ने गहरी सांस ली। उसने अपने चेहरे पर गिरे बालों को पीछे झटका, अपने बादामी दुपट्टे का छोर कमर में खोंसा और सीधे रसोई की तरफ बढ़ गई। 

अब मौका था।

रसोई में जाते ही काव्या का रुख दीवान और बेडरूम से हट गया था।

मैंने तुरंत अपने फोन से मास्टर बेडरूम में रखे उस सैमसंग टैबलेट का गुप्त वीडियो-कॉल नंबर डायल किया, जिसे मैंने अनु के ऑनलाइन कॉलेज और गेम्स के लिए सेट किया था। 

कॉल दो बार बजी। फिर स्क्रीन हिली। 

अनु ने रोते-रोते, कांपते हाथों से टैबलेट उठाया था। वो मास्टर बेड के भारी रज़ाई के नीचे दुबकी हुई थी। उसका चेहरा आंसुओं और नाक के पानी से भीगा हुआ था, और उसके गाल तमतमा रहे थे।

"पापा..." उसकी आवाज़ इतनी धीमी, इतनी टूटी हुई थी कि मेरा कलेजा मुंह को आ गया।

"अनु... मेरी लाडली..." मैंने फुसफुसाते हुए कहा, अपनी आवाज़ को जितना हो सके संयत रखते हुए। "रो मत बेटा... पापा हैं ना... रोते नहीं, मेरी गुड़िया..."

"पापा... मम्मा मुझसे प्यार नहीं करतीं..." अनु की हिचकी बंधी हुई थी। उसने अपनी छोटी नाक अपनी बांह से पोंछी। "मम्मा बहुत गंदी हैं... वो मुझे ऐसे देख रही थीं... जैसे... जैसे मैं कोई पराई हूँ... उन्होंने कहा कि मैं लाश बन जाती... पापा, मम्मा मुझसे नफरत करती हैं!"

मेरे हलक में आंसुओं का एक भारी घूंट अटक गया। मैं एक बाप था, लेकिन अपनी ही बेटी के आंसुओं को पोंछने के लिए सात सौ किलोमीटर दूर स्क्रीन के पीछे कैद था।

"नहीं बेटा... ऐसा नहीं बोलते..." मैंने झूठ की चाशनी में लिपटी वही खोखली, कॉरपोरेट तसल्ली दी। "मम्मा बहुत परेशान हैं अनु। बाऊजी को इतनी बड़ी चोट लगी है ना... मम्मा हॉस्पिटल में डर गयी थीं। वो तुमसे बहुत प्यार करती हैं बेटा..."

और तभी, मेरी उस मासूम बेटी ने जो कहा, उसने मेरे भीतर के बचे-खुचे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ा दीं।

अनु ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं, और उसके नन्हे कंधे ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे। 

"पापा... मेरी ही वजह से बाऊजी के हाथ टूटे हैं ना?" उसकी मासूमियत में एक ऐसा भयानक, आत्मघाती अपराधबोध था जो उस छोटी सी उम्र के ज़ेहन में कभी नहीं होना चाहिए था। "वो गेट... वो गेट बहुत बड़ा था पापा... बहुत भारी था। जब वो गिर रहा था, तो बाऊजी दौड़कर आए और उन्होंने मुझे अपनी छाती के नीचे दबा लिया... फिर बहुत ज़ोर की आवाज़ आई: कड़क!... और बाऊजी चीख पड़े... उनकी आंखों से आंसू निकल रहे थे पापा... सॉरी पापा... आई एम सॉरी... मेरी वजह से बाऊजी बीमार हो गये... सॉरी..."

"अनु, चुप हो जाओ बेटा... तुम्हारी कोई गलती नहीं थी..." 

लेकिन मेरे शब्द हवा में तैरते रह गए। दूर कॉरिडोर से काव्या की भारी, तेज़ पायल की आवाज़ आई, छम... छम... छम... 

"अनु, फोन रखो! मम्मा आ रही हैं... फोन तकिए के नीचे छिपाओ, तुरंत!" मैंने घबराकर फुसफुसाया।

अनु ने झटके से स्क्रीन बंद कर दी। कनेक्शन कट गया।

मैं अपने होटल के कमरे में हांफ रहा था। वो दरार पड़ चुकी थी। वो ज़हरीला बीज बोया जा चुका था। अनु के मासूम दिल में अपनी मां के प्रति एक ऐसा अजनबी खौफ और खुद के वजूद के प्रति ऐसा अपराधबोध बैठ चुका था, जो आने वाले बरसों में भी शायद कभी नहीं भरने वाला था।

और काव्या? 

Cam_Living_01 पर मैंने देखा, काव्या पीतल के एक भारी कटोरे में गर्म, हल्दी वाला पीला दूध लेकर दीवान के पास आई थी। 

"ताऊजी... ये पी लीजिए।" उसकी आवाज़ अब फिर से उसी रेशमी, अगाध समर्पण में ढल चुकी थी। 

ताऊजी ने लाचारी से अपने दोनों प्लास्टर चढ़े हाथ देखे। "बहू... हाथ तो उठेंगे नहीं... तू रख दे, जब थोड़ा ठंडा होगा तो मैं मुंह लगाकर..."


"मुंह लगाकर पिएंगे आप?!" काव्या ने लगभग डांटते हुए, लेकिन बेपनाह प्यार से कहा। वो दीवान की कोर पर बिलकुल उनके सटकर बैठ गई। उसकी जांघ ताऊजी की धोती से ढकी भारी, रोएंदार जांघ से पूरी तरह छू रही थी। "जब तक आपकी बहू ज़िंदा है, आपको किसी कटोरे में मुंह मारने की ज़रूरत नहीं है ताऊजी। मैं पिलाऊंगी।"

उसने चम्मच भरा। दूध पर तैरती हुई मलाई को हल्के से फूंका, और चम्मच सीधे ताऊजी के सूखे, चौड़े होंठों पर टिका दिया। 



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ताऊजी की आंखों में कृतज्ञता और लाचारी के आंसू छलक आए। उस छप्पन साल के विशाल पहलवान ने एक अबोध की तरह अपना मुंह खोला और काव्या के हाथ से घूंट-घूंट दूध पीने लगा। काव्या की नज़रें सिर्फ और सिर्फ उनके चेहरे पर थीं, उस चेहरे पर जहाँ दर्द की जगह अब धीरे-धीरे एक अजीब सा, विवश सुकून उतर रहा था।

दूध खत्म कराने के बाद, काव्या ने अपने दुपट्टे के छोर से ताऊजी की मूंछों पर लगी दूध की लकीर को इतने सहज भाव से पोंछा जैसे ये उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो।

फिर उसने अपना फोन निकाला। 

रात के ९:१५ बज रहे थे।

उसने अपनी मां, सुमित्रा शर्मा, को फोन लगाया।

"हाँ माँ... मैं ठीक हूँ।" काव्या की आवाज़ में अब एक नपी-तुली, व्यावहारिक कॉरपोरेट जैसी कठोरता थी। "नहीं, ताऊजी को डिस्चार्ज कराकर घर ले आई हूँ। दोनों हाथों में फ्रैक्चर है... डॉक्टर ने सौ दिन का कम्प्लीट इमोबिलाइज़ेशन बोला है। एक गिलास पानी भी खुद नहीं पी सकते।"

दूसरी तरफ से मेरी सास की घबराई हुई आवाज़ मुझे सुनाई नहीं दे रही थी, लेकिन काव्या का जवाब साफ था:

"हाँ माँ, इसीलिए फोन किया है। राजेश हैदराबाद में फंसा है, उसका प्रोजेक्ट तीन हफ्ते और खिंच गया है। इस घर में ताऊजी को चौबीस घंटे तीमारदारी की ज़रूरत है... मुझे बुटीक से छुट्टी लेनी पड़ रही है। और अनु... वो इस पूरे हादसे से बुरी तरह सहमी हुई है। उसकी छुट्टियों के जो दो दिन बचे थे, वो यहाँ इस दवाइयों और कराहों के माहौल में काटने का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी मंडे से उसका कॉलेज शुरू है और उसे आपके पास कोरगांव पार्क ही रहना था... आप और पापा अभी गाड़ी लेकर आ जाइए। उसका वेकेशन बैग लेकर उसे आज रात ही अपने पास ले जाइए, ताकि वो अपने शांत रूटीन में लौट सके।"

मेरी सास ने शायद कुछ पूछा, क्योंकि काव्या ने तुरंत बात काटी:

"नहीं माँ, कोई बहस नहीं। यहाँ इस टाइम मुकम्मल शांति चाहिए। आप बस आ जाइए... मैं सब संभाल लूँगी।"

कॉल कट गई।

फैसला हो चुका था। 

ठीक पैंतालीस मिनट बाद, रात के ठीक दस बजे, कोरगांव पार्क से मेरी सास सुमित्रा और ससुर श्रीकांत शर्मा अपनी होंडा सिटी से हमारे बानेर वाले फ्लैट पर पहुंचे। 

ससुर जी ने दीवान पर लेटे ताऊजी के दोनों प्लास्टर चढ़े हाथों को देखकर हाथ जोड़ लिए, उनकी आंखों में अपने दामाद के उस देहाती ताऊ के प्रति भगवान जैसी श्रद्धा थी। "सुखदेव जी... आपने हमारी फूल जैसी नातिन के लिए अपनी दोनों बाहें दांव पर लगा दीं... हम आपका ये अहसान सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते!"

ताऊजी ने बड़ी मुश्किल से सिर झुकाकर उनका अभिवादन एक्सेप्ट किया। "समधी जी... हमारी लाडली हमारे कुल का दीपक है... उसके आगे इस बूढ़े शरीर की क्या औकात है।"

काव्या ने पहले ही अनु का वो छोटा लाल वेकेशन बैग और कॉलेज की किताबें पैक करके दरवाज़े पर रख दिया था। 

जब मेरी सास अनु का हाथ पकड़कर दरवाज़े की तरफ बढ़ीं, तो अनु चौखट पर एक पल के लिए रुकी। उसने मुड़कर अपनी मां को देखा। उसकी आंखों में एक याचना थी, कि शायद मम्मा दौड़कर आएगी, उसे गले लगाएगी और कहेगी कि 'मत जाओ बेटा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।'

लेकिन काव्या दरवाज़े के पास सीधी, तनी हुई खड़ी रही। उसके चेहरे पर एक सपाट, बर्फीला अनुशासन था। उसने सिर्फ एक बार अपनी पलकें झपकाईं और बहुत संक्षेप में कहा, "नानी की बात मानना अनु। और मन लगाकर पढ़ना।"

अनु का चेहरा बुझ गया। उसने अपना सिर झुकाया और नानी की उंगली पकड़कर लिफ्ट की तरफ बढ़ गई। 

क्लिक।

फ्लैट ९०३ का भारी सुरक्षा दरवाज़ा बंद हो गया।

ताला लग गया।

और उस एक आवाज़ के साथ... फ्लैट ९०३ की पूरी दुनिया हमेशा-हमेशा के लिए बदल गई।

घर पूरी तरह खाली हो चुका था। 

अनु जा चुकी थी। सास-ससुर लौट चुके थे। मैं, कानूनी पति, सैकड़ों मील दूर हैदराबाद के कॉरपोरेट पिंजरे में कैद था। 

उस नौवीं मंजिल के आलीशान, बंद फ्लैट में अब सिर्फ दो ही रूहें बची थीं, एक छप्पन साल का, दोनों हाथों से लाचार, घायल देहाती पहलवान... और उसकी तीस साल की, हुस्न के शबाब पर दहकती हुई, अकेली बहू!

और तभी... 

हैदराबाद के उस ठंडे होटल के कमरे में बैठे-बैठे, मेरे दिमाग की किसी अंधेरी नस में एक ऐसा भयानक, बिजली जैसा तीखा झटका लगा कि मेरी रीढ़ की हड्डी सुन्न पड़ गई। 

मैं कितना बड़ा मूर्ख था! कितना अंधा और नादान था मैं!

अभी कुछ ही घंटे पहले, हैदराबाद के उस कॉन्फ्रेंस रूम से बाहर निकलते वक़्त मैं अपने मन को क्या तसल्ली दे रहा था? मैं यही सोचकर राहत की ठंडी सांसें ले रहा था ना कि ताऊजी के दोनों हाथ टूट जाने से खतरा टल गया है... कि दोनों हाथों पर भारी सफेद प्लास्टर चढ़ जाने के बाद अब किसी शारीरिक स्पर्श, किसी अंतरंगता का सवाल ही नहीं उठता... कि अब मर्यादा की दीवार फौलाद की बन चुकी है!

लेकिन हे भगवान... मेरा वो शहरी, कॉरपोरेट दिमाग कितना खोखला और बेवकूफ था!

एक ऐसी नंगी, बेरहम और बायोलॉजिकल सच्चाई जो अब तक मेरे दिमाग से ओझल थी, अचानक पूरी नग्नता के साथ मेरे सामने आ खड़ी हुई!

ताऊजी के दोनों हाथ... कलाई से लेकर कोहनी के ऊपर तक भारी, सख्त प्लास्टर में जकड़े हुए हैं!

वो अपनी उंगलियों का एक पोर तक नहीं हिला सकते!

इसका मतलब? 

हे भगवान... इसका सीधा, व्यावहारिक मतलब क्या था?!

खाना? ताऊजी अपने हाथ से पानी का एक गिलास तक नहीं उठा सकते थे। वो रोटी का एक निवाला नहीं तोड़ सकते थे, दाल में चम्मच नहीं डुबो सकते थे। अगले पूरे तीन हफ़्तों तक... काव्या को अपने नाज़ुक, गोरे हाथों से हर एक कौर उनके मुंह में डालना होगा... गिलास उनके होंठों पर टिकाकर पानी पिलाना होगा!

नहाना? प्लास्टर पर पानी की एक बूंद भी नहीं पड़नी चाहिए थी। ताऊजी अपने बदन पर साबुन कैसे लगाएंगे? अपनी चौड़ी, पसीने से भीगी पीठ कैसे धोएंगे? काव्या को उस विशाल, नंगे पहलवान के बदन से बनियान उतारनी होगी... प्लास्टिक की थैलियों से उनके प्लास्टर को बांधना होगा... और अपने हाथों से गीले तौलिये और Lifebuoy साबुन से उस पूरे अखाड़े के बदन को स्पंज-बाथ कराना होगा!

और... और सबसे भयानक... सबसे रूह कंपा देने वाला सवाल...

वॉशरूम?!

नंबर एक और नंबर दो?!

मेरी सांस मेरी छाती में ही घुटकर रह गई। मेरी हथेलियों से ठंडा पसीना छूटने लगा। 

एक मर्द... एक छप्पन साल का विशाल, देहाती पहलवान... जब उसे पेशाब लगेगी, तो वो क्या करेगा? वो अपनी धोती की गांठ खुद कैसे खोलेगा? वो अपने हाथ से अपनी लुंगी का छोर तक नहीं पकड़ सकता! 

उसे पेशाब करने के लिए... कमोड के सामने खड़े होकर... अपनी बहू को आवाज़ देनी होगी! 

काव्या को उस बंद बाथरूम में उनके साथ जाना होगा... अपने नाज़ुक, कांपते हाथों से उस देहाती मर्द की धोती की गांठ खोलनी होगी... कपड़े के भीतर हाथ डालकर उस भारी, रोएंदार और विशाल अंग को अपनी उंगलियों में थामना होगा... और कमोड के ऊपर सीधा पकड़कर तब तक खड़े रहना होगा जब तक उस पहलवान की पेशाब की धार खत्म न हो जाए!

और नंबर दो? शौच? 

जब ताऊजी को पेट साफ करना होगा... तो वो कमोड पर कैसे बैठेंगे? और उससे भी आगे... शौच के बाद वो खुद को धोएंगे कैसे?! एक भारतीय घर में कोई भी शौच के बाद बिना धोए नहीं रह सकता! ताऊजी अपनी दोनों प्लास्टर बंधी बाहों से न तो जेट-स्प्रे उठा सकते थे, न पानी का लोटा, न ही पीछे हाथ ले जा सकते थे!

काव्या को... मेरी उस नफीस, कोरगांव पार्क की रईस और संस्कारी बीवी को... अपने हाथों से पानी और साबुन लेकर, उस विशाल ससुर के पिछले हिस्से को, उनके अंगों को साफ़ करना होगा... धोना होगा!

ओह शिट... ओह गॉड...!

मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे। मेरे गले में थूक सूख चुका था। 

ये कोई नॉर्मल सेवा नहीं थी। ये कोई बीमार ससुर को दवाई देने जैसा नहीं था। ये इंसान के जिस्म की वो सबसे निचली, सबसे आदिम और सबसे नग्न जैविक लाचारी थी जहाँ शर्म, हया, रिश्ते और मर्यादा की हर एक दीवार ढहकर राख बन जाती है! 

अगर कोई औरत किसी पराए मर्द के पेशाब के अंग को दिन में चार बार अपने हाथों में थामेगी... अगर वो उसके शौच के बाद उसके अंगों को अपने हाथों से धोएगी... तो फिर उन दोनों के बीच ऐसा कौन सा पर्दा, ऐसी कौन सी मर्यादा बाकी रह जाएगी जिसे लांघने में उनको ज़रा भी हिचक हो?!

जिस हाथ टूटने को मैं खतरा टलना समझ रहा था... वो तो असल में इस घर की हर एक दीवार, हर एक पर्दे को नंगा करके गिरा देने वाला सबसे भयानक तूफान बन चुका था! 

उस एक विचार ने... उस भयानक, कामुक और वर्जित अहसास ने मेरे दिमाग को एक ऐसी आग में झोंक दिया जिसने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था!

दरवाज़ा बंद होते ही काव्या ने अपनी पीठ उस भारी लकड़ी के पल्ले से टिका दी। 

उसने अपनी दोनों आंखें मूंद लीं। कमरे में छाया सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी किसी चाबुक की तरह सुनाई दे रही थी। 

काव्या लगभग घिसटते हुए कदमों से सीधे मास्टर बेडरूम के भीतर गयी और अंदर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद करके कुंडी चढ़ा दी।

Cam_MasterBed_01 से मुझे सिर्फ बाथरूम का बंद दरवाज़ा दिखाई दे रहा था, लेकिन उस सन्नाटे में वेंटिलेशन ग्रिल से छनकर आती हुई आवाज़ें मेरे हेडफोन में बिलकुल साफ थीं।

काव्या बेसिन के नल को पूरी ताकत से खोल चुकी थी। पानी के तेज़ बहाव की आवाज़ के बीच... उसके सिसकने की आवाज़ आई।

वो रो रही थी। 

वो भयानक, बेकाबू होकर रो रही थी। 

बेसिन के काले ग्रेनाइट पर अपने दोनों हाथ टिकाए, वो आईने के सामने खड़ी अपने ही अक्स को देखकर घिन और खौफ से कांप रही थी। 

"हे भगवान... ये मुझे क्या हो गया था?" उसकी टूटी हुई, सिसकती हुई फुसफुसाहट पानी की आवाज़ के साथ मेरे कानों में पड़ी। "मैंने अपनी ही लाडली को... अपनी अनु को उस तरह देखा? वो मेरी जान है... मैंने उसे ऐसे डांटा जैसे वो मेरी सौतन हो, मेरी दुश्मन हो... मुझे क्या होता जा रहा है? क्या मैं पागल हो रही हूँ...?"

उसने अपनी हथेलियों में ठंडा पानी भरा और पागलों की तरह अपने चेहरे, अपनी आंखों और अपनी गर्दन पर मारा। वो अपनी उस संस्कारी, ममतालु पहचान को ढूंढने की कोशिश कर रही थी जो कोरगांव पार्क के बंगले में पली-बढ़ी थी, जो मंदिर में दीया जलाती थी और अपनी बेटी को खरोंच आने पर भी रो पड़ती थी।

लेकिन फिर... 

पानी की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।

काव्या ने अपना सिर उठाया। 

आईने में उसने अपने उस भीगे हुए, तमतमाते चेहरे को देखा। और उस पल... उसके आंसुओं की धार थम गई।


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उसकी सांसों की गति धीमी हुई। उसकी आंखों की वो नम, लाचार पुतलियां अचानक एक अजीब, ठंडे और आदिम पत्थर में बदलने लगीं। 

एक दूसरी औरत... जो शायद इस घर की दीवारों में, ताऊजी के उस पसीने और सरसों के तेल की गंध में पिछले कई हफ्तों से धीरे-धीरे जाग रही थी... उसने काव्या के वजूद की कमान अपने हाथों में ले ली।

काव्या ने आईने में अपने ही होठों को हल्का सा तनते हुए देखा। 

“नहीं... जो हुआ, वही होना था।” 

वो फुसफुसाहट अब रोने वाली काव्या की नहीं थी। वो उस दूसरी काव्या की थी जिसकी ज़बान पर कोई ताला नहीं था। 

“राजेश हैदराबाद में है... उसे अपनी नौकरी और लोन प्यारा है। अनु कोरगांव पार्क चली गयी... वो सेफ़ है। अब इस घर में मेरे और ताऊजी के बीच कोई तीसरा नहीं है। जिस मर्द ने मेरी बेटी के लिए अपनी हड्डियां तुड़वा लीं... उसका हक़ है मेरे हर कतरे पर। अब मुझे किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है... अब इस जिस्म की, इस घर की मालकिन सिर्फ मैं हूँ।”

उसने नल बंद किया। तौलिये से अपना चेहरा पोंछा। 

जब वो बाथरूम से बाहर निकली, तो उसकी चाल में वो पहले वाली हिचकिचाहट, वो घबराहट पूरी तरह गायब थी। उसके कंधे सीधे थे, उसकी चाल में एक नशीला, गहरा ठहराव था।

उसने दीवान पर जाकर देखा, ताऊजी दर्द की भारी दवाइयों के असर से गहरी, खर्राटों भरी नींद में डूब चुके थे। उनका मुंह हल्का सा खुला था और प्लास्टर बंधे हाथ उनके सीने पर धरे थे। 

काव्या ने झुककर बहुत धीरे से उनकी चादर उनके सीने तक खींची। उसकी उंगलियां एक पल के लिए ताऊजी के चौड़े, पसीने से भीगे माथे पर टिकीं। उसने अपनी सांस उनकी सांसों के करीब महसूस की, और फिर बिना एक भी आवाज़ किए, वो वापस मास्टर बेडरूम में आ गई।

उसने बेडरूम की बत्तियां बुझा दीं। 

सिर्फ खिड़की से आती हुई शहर की हल्की पीली रोशनी कमरे में थी।

काव्या बिस्तर की कोर पर बैठ गई। उसने अपने तकिए के नीचे से अपना वो सैमसंग टैबलेट निकाला। 

उसकी स्क्रीन की ठंडी, नीली रोशनी काव्या के खूबसूरत, संगमरमरी चेहरे पर पड़ी। 

उसने एक ऐप खोला। 

वही ऐप... वही सीक्रेट टम्बलर ब्लॉग, @pinklily_confessions। 

हैदराबाद के होटल में बैठे मेरे फोन पर एक तीखी, हल्की नोटिफिकेशन वाइब्रेट हुई: 

[pink lily just posted a new entry: "दो औरतें"]

मेरी उंगलियां कांपने लगीं। मैंने अपने फोन की स्क्रीन खोली। 

रात के १०:२४ पर काव्या ने अपने उस गुप्त पते से, अंधेरे कमरे में बैठकर, वो अल्फाज़ टाइप किए थे जिन्होंने मेरी आत्मा को हमेशा के लिए झकझोर कर रख दिया:

Quote:"मेरी ही चमड़ी के नीचे कोई अजनबी औरत जाग उठी है... वो जब सामने आती है, तो मुझे अपनी ही फूल जैसी बेटी एक दुश्मन की तरह लगने लगती है। जैसे वो लाडली उस लाचार मर्द का खून चूसने आई हो।

एक मैं हूँ जो अपने सिंदूर, अपनी शादी और अपनी ममता के लिए तकिए में मुँह छिपाकर रोती है... और दूसरी वो है जो उस घायल मर्द की चौड़ी, पसीने से भीगी छाती और टूटी बाहों को देखकर अपनी सारी मर्यादा, सारी शर्म भूल जाती है। जब मैं उनकी पट्टियों को छूती हूँ, तो मेरे अंदर से दया नहीं... एक खौफनाक, हठीला अधिकार निकलता है।

मुझे डर लग रहा है कि वो दूसरी औरत मुझे धीरे-धीरे पूरा निगल लेगी... और सबसे डरावनी बात ये है कि मेरा मन अब उस दूसरी औरत से ही प्यार करने लगा है। आज की रात... ये घर खाली है। और मैं उस अजनबी औरत के हवाले हूँ..."

मैंने फोन को अपनी डेस्क पर रख दिया। 

मेरी हथेलियां पसीने से लथपथ थीं। मेरी गर्दन के पीछे के सारे बाल खड़े हो चुके थे। 

काव्या को खुद नहीं पता था कि उसके ज़ेहन में क्या टूट चुका है। वो किसी मनोरोग की शिकार नहीं थी, वो तो बस उस आदिम, वर्जित वासना और कृतज्ञता के उस दोराहे पर खड़ी थी जहाँ एक औरत अपने सारे सामाजिक खोल उतारकर फेंक देती है। 

और मैं? 

मैं स्क्रीन पर उस अंधेरे बेडरूम में नीली रोशनी में चमकते उसके चेहरे को देख रहा था... ये जानते हुए कि कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो उस फ्लैट ९०३ में कोई बहू अपने ससुर की सेवा नहीं कर रही होगी... बल्कि एक भूखी, आज़ाद और निडर औरत, अपने उस घायल, लाचार मर्द को अपनी उंगलियों पर नचा रही होगी।

और उस खेल का पहला पर्दा... अब उठने ही वाला था।


--- To Be Continued ---
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#53
Chapter 41: Dohra Man

Hotel ke kamre ka bhaari lakdi ka darwaza maine jaise hi apne peeche band kiya, mere maathe se paseena behkar meri palkon par aa gira tha. Kamre ki central air-conditioning ki thandi, baasi hawa seedhe mere chehre par lagi, lekin mere bheetar jo aag sulag rahi thi, woh kisi bhi taapmaan se shaant hone wali nahi thi.

Maine apne joote tak theek se nahi khole. Briefcase ko seedhe kaaleen par patka aur apne kaanpte hue haathon se seedhe desk ki taraf lapka.

Laptop ka dhakkan uthaate hi uski neeli screen tair uthi. Meri ungliyan keyboard par itni tezi se chaliin ki password do baar galat type hua. Teesri baar mein jab authentication hua, to Pune ke Baner sthit flat ke closed-circuit surveillance ka remote software screen par khul gaya.

Chaar window.

Cam_MainDoor_01, Cam_Living_01, Cam_MasterBed_01, aur Cam_Kitchen_01।

Screen par abhi sannaata tha. Flat 903 ka living room khaali pada tha. Sofa ke cushion thode ast-vyast the, aur center table par paani ka ek khaali jag rakha tha, wahi manzar jo dopahar ke us bhayanak haadse ke waqt chhoota tha jab Kavya badhawaas haalat mein Tauji aur Anu ko lekar hospital bhaagi thi.

Timestamp dikha raha tha: Raat ke 7:42.

Meri dhadkanein mere kaanon mein hathodon ki tarah baj rahi thiin. Main apni ghoomne wali kursi ke kinaare par tika hua, apni dono hatheliyon ko desk par gadaaye screen ko ghoor raha tha.

Aur theek 7:47 par... Cam_MainDoor_01 ke motion sensor ne beep ki.

Darwaze ki bhaari kundi baahar se khuli.

Sabse pehle Kavya andar daakhil hui. Uske chehre ka rang poori tarah uda hua tha. Subah jo lavender rang ka reshmi salwar-suit usne qareene se pehna tha, woh ab buri tarah silwaton se bhara tha. Uska baadaami Kashmiri shawl ek kandhe se betarteeb dhalqa hua tha, aur maathe ki latein paseene se chipak gayi thiin.

[Image: img-01509-cleaned.png]

Lekin uski nazrein peeche thiin, poori tarah kisi ki hifaazat mein juti huiin.

"Aaraam se Tauji... chaukhat par pair sambhaaliye... dheere..." Kavya ki aawaaz mein ek ajeeb sa, halaq cheer dene wala khinchaav tha.

Aur phir woh vishaal, dehati jism chaukhat ke bheetar aaya.

Unko dekhte hi mere seene mein ek bhayanak kampkampi daud gayi.

Sukhdev Tauji... chhah feet ek inch ka woh akhaade ka sher... aaj dono ghutnon se thoda jhuk-kar chal raha tha. Unke dono haath... kalaayi se lekar poori kohani ke oopar tak... mote, khurdure aur bhaari safed plaster mein jakde hue the. Dono baahein kaali medical slings (pattiyon) ke sahaare unki chaudi gardan se latki hui thiin. Unki ungliyan plaster ke sire se baahar nikli thiin, neeli, sooji hui aur poori tarah bejaan.

Woh apni ungliyon ka ek por tak nahi hila paa rahe the.

Safed khaadi ka kurta jo woh subah pehante the, woh hospital mein doctoron ne kainchi se kaatkar alag kar diya hoga, kyonki is time unke badan par sirf ek bina aasteen ki safed cotton baniyan thi. Baniyan par jagah-jagah khoon aur zang lage lohe ke bhoore daagh the. Unki chaudi, royendaar chhaati har saans ke saath bhaari dhaunkani ki tarah phool aur pichak rahi thi. Unke maathe par dard ki gehri, kaali lakeerein khinchi thiin, aur honth sookhe paapad ki tarah phate hue the.

Unke theek peeche, Anu dabe paanv andar aayi. Uski gulaabi frock dhool se sani thi, aur uski aankhein ro-rokar laal ho chuki thiin. Woh Kavya ke kurte ka kona pakadna chahti thi, lekin Kavya ka poora wajood sirf aur sirf Tauji ko sambhaalne mein laga tha.

"Yahan baithiye... deewaan par... haan, tek lagaaiye..." Kavya ne Tauji ke bhaari, maansal kandhe ko sahaara diya.

Tauji ke badan ka poora bhaar jab Kavya ke naazuk badan par aaya, to Kavya ke pair ek pal ke liye ladkhadaaye, lekin usne apne poore wajood ka zor lagaakar us vishaal jism ko deewaan par tikne mein madad ki. Tauji ke munh se ek dabi hui, karaahti hui cheekh nikli, "Aahh... bhagwan...!"

"Dard bahut zyaada hai na Tauji?" Kavya unke saamne ghutnon ke bal farsh par baith gayi. Usne apne kaanpte haathon se Tauji ke pairon se chamde ki chappalein utaariin. "Doctor ne kaha hai ki raat ko injection ka asar kam hoga to tees badhegi... main abhi garam haldi ka doodh banaati hoon aur painkiller deti hoon."

Tauji ne apni band aankhon se dheere se sir hilaaya. Unke maathe se paseene ki ek moti boond dhal-kar unki daadhi mein sama gayi.

"Tu... tu pareshaan mat ho, bahu..." Tauji ki bhaari, dehati aawaaz dard ki wajah se kaanp rahi thi. "Haddi hi to chatki hai... akhaade mein isse buri maar sahi hai maine. Tu bas baith ja... din bhar se daudi hai tu."

"Aap chup rahiye Tauji!" Kavya ki aawaaz mein achanak ek aisa adhikaar, ek aisi sakht mamta ubhri jo maine apni aath saal ki shaadi mein kabhi nahi suni thi. "Do-do jagah se haddiyan chaknachoor hui hain aapki... aur aap kehte hain kuch nahi hua? Agar zara si bhi der ho jaati to..."

Kavya ka gala rundh gaya. Usne apni dono hatheliyon mein apna chehra chhipa liya aur deewaan ke paaye se sir tikaakar sisak padi.

Main Hyderabad mein screen ke saamne baitha apni saansein rok chuka tha. Kavya ka woh rona kisi aupchaarikta ka nahi tha; woh us bhayanak sadme ka rechan tha jo usne pichhle chaar ghanton se hospital ke galiyaaron mein akele jhela tha.

Aur tabhi... woh hua jisne us poore ghar ki hawa ko zehreela bana diya.

Anu, jo ab tak living room ke kaaleen par sahmi hui khadi thi, oob aur bhookh se machalne lagi. Usne center table ke paas jaakar apne pair se ek steel ka glass hila diya.

Jhan... jhan... khadkhadkhad!

Khaali steel ka glass sangmarmar ke thande farsh par gol-gol ghoomta hua tez aawaaz ke saath goonj utha.

Tauji dard ke maare chaunk gaye, unki ghaayal baanh sling mein halka sa jhatka khaa gayi aur unke munh se ek teekhi siskaari nikli, "Ufff...!"

Anu ne us taraf koi dhyaan nahi diya. Usne apne dono chhote haath apni kamar par rakhe aur ek chidchidi, bachkaani zid ke saath roni soorat banaakar boli, "Mamma! Mujhe bhookh lagi hai... mujhe cartoon dekhna hai! Remote kahan hai? Kab se hospital mein baithe-baithe mere pair dukh rahe hain... mujhe TV chala kar do na!"

Us ek pal mein... Kavya ka poora shareer patthar ki tarah sakht ho gaya.

Usne apna chehra oopar uthaya.

Bhagwan gawaah hai, Cam_Living_01 ke high-definition lens se maine Kavya ki jo aankhein us pal dekhiin, unse meri reedh ki haddi mein baraf ki ek dhaar utar gayi.

Woh meri shaant, sanskaari, Koregaon Park ki nafees aur narm-dil patni Kavya nahi thi.

Uski aankhon ki putliyan sikudkar koyle ki tarah sulag rahi thiin. Uske nathune fadak rahe the, aur jab woh farsh se uthi, to uski chaal mein ek khoonkhar, zehreela tanaav tha.

"Chup karo Anu!"

[Image: img-01510-cleaned.png]

Kavya ki aawaaz mein aisi thandi, hinsak kadwaahat thi ki Anu wahin ki wahin sahamkar do kadam peeche hat gayi.

"Mamma...?" Anu ki aawaaz gale mein hi atak gayi.

"Ek shabd aur nahi niklega tumhaare munh se!" Kavya apni beti ke bilkul qareeb aa khadi hui. Usne apni ungli Anu ke chehre ke saamne taan di. Uski aawaaz bhale hi cheekhne wali nahi thi, lekin us dheemi, fusfusaati hui daant mein jo zeher tha, usne kamre ki saari oxygen sokh li thi. "Tumko zara bhi sharm nahi aati? Zara sa bhi ehsaas hai ki tumhaari us behooda, laaparwaah zid ki wajah se aaj is ghar mein kya ho gaya hai?!"

"Kavya... bahu..." Tauji ne deewaan se apni bhaari gardan uthaane ki koshish ki. "Anu hai... abhi naadaan hai... chhod use..."

"Nahi Tauji, aap beech mein mat boliye!" Kavya ne mudkar dekhe bina kaha, uski poori nafrat us time apni hi beti par kendrit thi. "Agar aaj is ladki ne us bhaari gate ke neeche gend ke peeche daudne ki badtameezi na ki hoti... to aaj aapke haath salaamat hote! Sau baar mana kiya tha maine ki main gate ke paas mat khela karo... lekin nahi! Wahi dheethpan, wahi gair-zimmedaaraana bachkaanapan!"

Kavya ki aankhein laal angaare jaisi ho chuki thiin. Aur phir usne jo lafz kahe, unhone Hyderabad ke hotel mein baithe mere seene par kisi ne garam khanjar ghonp diya:

"Tumhara yeh laaparwaah, matlabi rawaiya bilkul tumhaare papa jaisa hai, Anu! Bilkul wahi khoon! Kisi ki qurbaani, kisi ke dard ki koi qadr nahi hai tum logon ko! Bas apni bhookh, apna TV, apna aaraam dikhta hai! Agar aaj Tauji ne apna shareer us teen sau kilo ke lohe ke neeche na jhonka hota na... to aaj tum is duniya mein zinda khadi hokar TV maangne laayak nahi bachtiin! Laash ban chuki hotiin tum!"

"Kavya!" Tauji ne apni poori taaqat lagaakar apni ek plaster bandhi baanh uthaayi, chehre par bepanaah takleef ubhar aayi. "Bahu, bas kar! Meri laadli par itna zulm mat dhaa... us gate ki kamaani tooti thi, meri gudiya ki koi khata nahi hai! Bhagwan ke liye chup ho ja!"

Anu ki aankhein phati ki phati reh gayi thiin. Uski maasoom samajh mein yeh baat nahi aa rahi thi ki jo maa use har raat seene se lagaakar pariyon ki kahaaniyan sunaati thi, woh achanak use aise kyon dekh rahi thi jaise woh koi paraayi, ghinouni bala ho.

Anu ka nichla honth buri tarah kaanpne laga. Uski aankhon se aansuon ke do bade-bade dhaare bahe, aur woh munh par haath rakhkar betahaasha sisakti hui seedhe master bedroom ki taraf bhaagi aur darwaza bheetar se band kar liya.

Living room mein sannaata chha gaya. Sirf Tauji ki bhaari, dardnaak saansein aur AC ki dheemi ghurghuraahat bachi thi.

Kavya wahin khadi rahi. Uski chhaati tezi se oopar-neeche ho rahi thi. Uske chehre par apni beti ko itni berahmi se dutkaarne ka koi pachhtaawa us time nahi dikh raha tha. Uske chehre par sirf ek bhayanak, aadim hifaazat ka bhaav tha, ek aisi sherni ka bhaav jo apne ghaayal sher ke ird-gird khadi hokar kisi bhi teesre wajood ko, chaahe woh uski apni beti hi kyon na ho, ek khatre ki tarah dekhne lagti hai.

Aur main?

Main apni screen ke saamne sunn pada tha.

“Tumhara yeh laaparwaah, matlabi rawaiya bilkul tumhaare papa jaisa hai... bilkul wahi khoon!”

Kavya ke woh shabd mere kaanon mein kisi seese ki tarah pighal rahe the. Woh daant sirf Anu ke liye nahi thi; woh ek gehra, achetan thappad tha jo Kavya ne paroksh roop se mere munh par maara tha. Uske avachetan ne Anu ki us laaparwaahi ko mere us kaayar, daftar mein dubke hue wajood se jod diya tha jo har sankat ke time apni bees saal ki home loan ki EMI aur corporate naukri ka rona rokar bhaag khada hota tha. Uske zehan mein Tauji ki akhaade wali mardaangi aur mera khokhla, shehri wajood aamne-saamne khade the... aur us tulna mein main aur meri beti, dono Tauji ke pairon ki dhool ke baraabar bhi nahi thehar rahe the.

Mera khoon khoul utha. Mera dil chaaha ki main abhi phone milaaoon aur Kavya par cheekh padoon, 'Tumhari himmat kaise hui meri maasoom beti ko yeh bolne ki ki woh laash ban jaati?! Tumhari himmat kaise hui mere khoon ko matlabi kehne ki?!'

Lekin... mere haath phone tak jaakar ruk gaye.

Kaayarta. Naamardgi.

Main kaise phone karta? Main kis munh se Kavya par chillaata?

Kya yeh sach nahi tha ki Tauji ne meri hi beti ko bachaane ke liye apni dono baahein tudwaayi thiin? Kya yeh sach nahi tha ki is time jab Tauji apaahij bankar dard se tadap rahe the, main Hyderabad ke ek five-star hotel ke vaataanukoolit kamre mein baithkar chupchaap camera se apni biwi ki jaasoosi kar raha tha? Kavya naitik roop se us Himalaya ki choti par khadi thi jahan se main sirf ek keede ki tarah rengta hua dikhai deta tha. Agar maine aawaaz uthaayi, to Kavya seedhe keh sakti thi, 'Agar itna hi dard hai beti ka, to chhodiye apni woh VP ki naukri aur aaiye abhi train pakadkar! Sambhaaliye Tauji ka peshaab-paakhaana!'

Aur main nahi aa sakta tha. Main us bees saal ke home loan ke jaal mein bandha hua ek napunsak corporate gulaam tha.

Screen par, Kavya ne gehri saans li. Usne apne chehre par gire baalon ko peeche jhatka, apne baadaami dupatte ka chhor kamar mein khonsa aur seedhe rasoi ki taraf badh gayi.

Ab mauqa tha.

Rasoi mein jaate hi Kavya ka rukh deewaan aur bedroom se hat gaya tha.

Maine turant apne phone se master bedroom mein rakhe us Samsung tablet ka gupt video-call number dial kiya, jise maine Anu ke online college aur games ke liye set kiya tha.

Call do baar baji. Phir screen hili.

Anu ne rote-rote, kaanpte haathon se tablet uthaya tha. Woh master bed ke bhaari razaai ke neeche dubki hui thi. Uska chehra aansuon aur naak ke paani se bheega hua tha, aur uske gaal tamtama rahe the.

"Papa..." Uski aawaaz itni dheemi, itni tooti hui thi ki mera kaleja munh ko aa gaya.

"Anu... meri laadli..." Maine fusfusaate hue kaha, apni aawaaz ko jitna ho sake sanyat rakhte hue. "Ro mat beta... papa hain na... rote nahi, meri gudiya..."

"Papa... mamma mujhse pyaar nahi kartiin..." Anu ki hichki bandhi hui thi. Usne apni chhoti naak apni baanh se ponchhi. "Mamma bahut gandi hain... woh mujhe aise dekh rahi thiin... jaise... jaise main koi paraayi hoon... unhone kaha ki main laash ban jaati... papa, mamma mujhse nafrat karti hain!"

Mere halaq mein aansuon ka ek bhaari ghoont atak gaya. Main ek baap tha, lekin apni hi beti ke aansuon ko ponchhne ke liye saat sau kilometer door screen ke peeche qaid tha.

"Nahi beta... aisa nahi bolte..." Maine jhooth ki chaashni mein lipti wahi khokhli, corporate tasalli di. "Mamma bahut pareshaan hain Anu. Baauji ko itni badi chot lagi hai na... mamma hospital mein dar gayi thiin. Woh tumse bahut pyaar karti hain beta..."

Aur tabhi, meri us maasoom beti ne jo kaha, usne mere bheetar ke bache-khuche aatmasammaan ki dhajjiyan uda diin.

Anu ne apni dono aankhein band kar liin, aur uske nanhe kandhe zor-zor se hilne lage.

"Papa... meri hi wajah se Baauji ke haath toote hain na?" Uski maasoomiyat mein ek aisa bhayanak, aatmghaati apraadhbodh tha jo us chhoti si umr ke zehan mein kabhi nahi hona chahiye tha. "Woh gate... woh gate bahut bada tha papa... bahut bhaari tha. Jab woh gir raha tha, to Baauji daudkar aaye aur unhone mujhe apni chhaati ke neeche daba liya... phir bahut zor ki aawaaz aayi: Kadak!... aur Baauji cheekh pade... unki aankhon se aansoo nikal rahe the papa... sorry papa... I am sorry... meri wajah se Baauji beemaar ho gaye... sorry..."

"Anu, chup ho jaao beta... tumhari koi galti nahi thi..."

Lekin mere shabd hawa mein tairte reh gaye. Door corridor se Kavya ki bhaari, tez paayal ki aawaaz aayi, Chham... chham... chham...

"Anu, phone rakho! Mamma aa rahi hain... phone takiye ke neeche chhipaao, turant!" Maine ghabraakar fusfusaaya.

Anu ne jhatke se screen band kar di. Connection kat gaya.

Main apne hotel ke kamre mein haanph raha tha. Woh daraar pad chuki thi. Woh zehreela beej boya ja chuka tha. Anu ke maasoom dil mein apni maa ke prati ek aisa ajnabi khauf aur khud ke wajood ke prati aisa apraadhbodh baith chuka tha, jo aane wale barson mein bhi shaayad kabhi nahi bharne wala tha.

Aur Kavya?

Cam_Living_01 par maine dekha, Kavya peetal ke ek bhaari katoray mein garam, haldi wala peela doodh lekar deewaan ke paas aayi thi.

"Tauji... yeh pee lijiye." Uski aawaaz ab phir se usi reshmi, aagaadh samarpan mein dhal chuki thi.

Tauji ne laachaari se apne dono plaster chadhe haath dekhe. "Bahu... haath to uthenge nahi... tu rakh de, jab thoda thanda hoga to main munh lagaakar..."

"Munh lagaakar piyenge aap?!" Kavya ne lagbhag daant-te hue, lekin bepanaah pyaar se kaha. Woh deewaan ki kor par bilkul unke satkar baith gayi. Uski jaangh Tauji ki dhoti se dhaki bhaari, royendaar jaangh se poori tarah chhoo rahi thi. "Jab tak aapki bahu zinda hai, aapko kisi katoray mein munh maarne ki zaroorat nahi hai Tauji. Main pilaaungi."

Usne chammach bhara. Doodh par tairti hui malaai ko halke se phoonka, aur chammach seedhe Tauji ke sookhe, chaude honthon par tika diya.

[Image: img-01511-cleaned.png]

Tauji ki aankhon mein kritagyata aur laachaari ke aansoo chhalak aaye. Us chhappan saal ke vishaal pehalwaan ne ek abodh ki tarah apna munh khola aur Kavya ke haath se ghoont-ghoont doodh peene laga. Kavya ki nazrein sirf aur sirf unke chehre par thiin, us chehre par jahan dard ki jagah ab dheere-dheere ek ajeeb sa, vivash sukoon utar raha tha.

Doodh khatam karaane ke baad, Kavya ne apne dupatte ke chhor se Tauji ki moonchhon par lagi doodh ki lakeer ko itne sahaj bhaav se ponchha jaise yeh uska janmsiddh adhikaar ho.

Phir usne apna phone nikaala.

Raat ke 9:15 baj rahe the.

Usne apni maa, Sumitra Sharma, ko phone lagaya.

"Haan Maa... main theek hoon." Kavya ki aawaaz mein ab ek napi-tuli, vyaavahaarik corporate jaisi kathorta thi. "Nahi, Tauji ko discharge karaakar ghar le aayi hoon. Dono haathon mein fracture hai... doctor ne sau din ka complete immobilization bola hai. Ek glass paani bhi khud nahi pee sakte."

Doosri taraf se meri saas ki ghabraayi hui aawaaz mujhe sunai nahi de rahi thi, lekin Kavya ka jawaab saaf tha:

"Haan Maa, isiliye phone kiya hai. Rajesh Hyderabad mein phansa hai, uska project teen hafte aur khinch gaya hai. Is ghar mein Tauji ko chaubees ghante teemaardaari ki zaroorat hai... mujhe boutique se chhutti leni pad rahi hai. Aur Anu... woh is poore haadse se buri tarah sahmi hui hai. Uski chhuttiyon ke jo do din bache the, woh yahan is dawaiyon aur karaahon ke mahaul mein kaatne ka koi matlab nahi hai. Waise bhi Monday se uska college shuru hai aur use aapke paas Koregaon Park hi rehna tha... aap aur papa abhi gaadi lekar aa jaaiye. Uska vacation bag lekar use aaj raat hi apne paas le jaaiye, taaki woh apne shaant routine mein laut sake."

Meri saas ne shaayad kuch poochha, kyonki Kavya ne turant baat kaati:

"Nahi Maa, koi behas nahi. Yahan is time mukammal shaanti chahiye. Aap bas aa jaaiye... main sab sambhaal loongi."

Call kat gayi.

Faisla ho chuka tha.

Theek paintaalees minute baad, raat ke theek das baje, Koregaon Park se meri saas Sumitra aur sasur Shrikant Sharma apni Honda City se humare Baner wale flat par pahunche.

Sasur ji ne deewaan par lete Tauji ke dono plaster chadhe haathon ko dekhkar haath jod liye, unki aankhon mein apne daamaad ke us dehati Tau ke prati bhagwan jaisi shraddha thi. "Sukhdev ji... aapne humari phool jaisi naatin ke liye apni dono baahein daanv par laga diin... hum aapka yeh ehsaan saat janmon mein bhi nahi chuka sakte!"

Tauji ne badi mushkil se sir jhukaakar unka abhivaadan accept kiya. "Samdhi ji... humari laadli humare kul ka deepak hai... uske aage is boodhe shareer ki kya auqaat hai."

Kavya ne pehle hi Anu ka woh chhota laal vacation bag aur college ki kitaabein pack karke darwaze par rakh diya tha.

Jab meri saas Anu ka haath pakadkar darwaze ki taraf badhiin, to Anu chaukhat par ek pal ke liye ruki. Usne mudkar apni maa ko dekha. Uski aankhon mein ek yaachna thi, ki shaayad mamma daudkar aayegi, use gale lagaayegi aur kahegi ki 'mat jaao beta, main tumhaare bina nahi reh sakti.'

Lekin Kavya darwaze ke paas seedhi, tani hui khadi rahi. Uske chehre par ek sapaat, barfeela anushaasan tha. Usne sirf ek baar apni palkein jhapkaayiin aur bahut sankshep mein kaha, "Naani ki baat maanna Anu. Aur man lagaakar padhna."

Anu ka chehra bujh gaya. Usne apna sir jhukaaya aur naani ki ungli pakadkar lift ki taraf badh gayi.

Click.

Flat 903 ka bhaari suraksha darwaza band ho gaya.

Taala lag gaya.

Aur us ek aawaaz ke saath... flat 903 ki poori duniya hamesha-hamesha ke liye badal gayi.

Ghar poori tarah khaali ho chuka tha.

Anu ja chuki thi. Saas-sasur laut chuke the. Main, qaanooni pati, saikdon meel door Hyderabad ke corporate pinjre mein qaid tha.

Us nauveen manzil ke aaleeshaan, band flat mein ab sirf do hi roohein bachi thiin—ek chhappan saal ka, dono haathon se laachaar, ghaayal dehati pehalwaan... aur uski tees saal ki, husn ke shabaab par dehakti hui, akeli bahu!

Aur tabhi...

Hyderabad ke us thande hotel ke kamre mein baithe-baithe, mere dimaag ki kisi andheri nas mein ek aisa bhayanak, bijli jaisa teekha jhatka laga ki meri reedh ki haddi sunn pad gayi.

Main kitna bada moorkh tha! Kitna andha aur naadaan tha main!

Abhi kuch hi ghante pehle, Hyderabad ke us conference room se baahar nikalte waqt main apne man ko kya tasalli de raha tha? Main yahi sochkar raahat ki thandi saansein le raha tha na ki Tauji ke dono haath toot jaane se khatra tal gaya hai... ki dono haathon par bhaari safed plaster chadh jaane ke baad ab kisi shareerik sparsh, kisi antarangata ka sawaal hi nahi uthta... ki ab maryaada ki deewaar faulaad ki ban chuki hai!

Lekin he Bhagwan... mera woh shehri, corporate dimaag kitna khokhla aur bewakoof tha!

Ek aisi nangi, berahm aur biological sachhaayi jo ab tak mere dimaag se ojhal thi, achanak poori nagnata ke saath mere saamne aa khadi hui!

Tauji ke dono haath... kalaayi se lekar kohani ke oopar tak bhaari, sakht plaster mein jakde hue hain!

Woh apni ungliyon ka ek por tak nahi hila sakte!

Iska matlab?

He Bhagwan... iska seedha, vyaavahaarik matlab kya tha?!

Khaana? Tauji apne haath se paani ka ek glass tak nahi utha sakte the. Woh roti ka ek nivaala nahi tod sakte the, daal mein chammach nahi dubo sakte the. Agle poore teen hafton tak... Kavya ko apne naazuk, gore haathon se har ek kaur unke munh mein daalna hoga... glass unke honthon par tikaakar paani pilaana hoga!

Nahaana? Plaster par paani ki ek boond bhi nahi padni chahiye thi. Tauji apne badan par saabun kaise lagaayenge? Apni chaudi, paseene se bheegi peeth kaise dhoenge? Kavya ko us vishaal, nange pehalwaan ke badan se baniyan utaarni hogi... plastic ki thailiyon se unke plaster ko baandhna hoga... aur apne haathon se geele tauliye aur Lifebuoy saabun se us poore akhaade ke badan ko sponge-bath karaana hoga!

Aur... aur sabse bhayanak... sabse rooh kampa dene wala sawaal...

Washroom?!

Number ek aur number do?!

Meri saans meri chhaati mein hi ghutkar reh gayi. Meri hatheliyon se thanda paseena chhootne laga.

Ek mard... ek chhappan saal ka vishaal, dehati pehalwaan... jab use peshaab lagegi, to woh kya karega? Woh apni dhoti ki gaanth khud kaise kholega? Woh apne haath se apni lungi ka chhor tak nahi pakad sakta!

Use peshaab karne ke liye... commode ke saamne khade hokar... apni bahu ko aawaaz deni hogi!

Kavya ko us band bathroom mein unke saath jaana hoga... apne naazuk, kaanpte haathon se us dehati mard ki dhoti ki gaanth kholni hogi... kapde ke bheetar haath daalkar us bhaari, royendaar aur vishaal ang ko apni ungliyon mein thaamna hoga... aur commode ke oopar seedha pakadkar tab tak khade rehna hoga jab tak us pehalwaan ki peshaab ki dhaar khatam na ho jaaye!

Aur number do? Shauch?

Jab Tauji ko pet saaf karna hoga... to woh commode par kaise baithenge? Aur usse bhi aage... shauch ke baad woh khud ko dhoenge kaise?! Ek Bharatiya ghar mein koi bhi shauch ke baad bina dhoye nahi reh sakta! Tauji apni dono plaster bandhi baahon se na to jet-spray utha sakte the, na paani ka lota, na hi peeche haath le ja sakte the!

Kavya ko... meri us nafees, Koregaon Park ki raees aur sanskaari biwi ko... apne haathon se paani aur saabun lekar, us vishaal sasur ke pichhle hisse ko, unke angon ko saaf karna hoga... dhona hoga!

Oh shit... oh God...!

Mere rongte khade ho chuke the. Mere gale mein thook sookh chuka tha.

Yeh koi normal sewa nahi thi. Yeh koi beemaar sasur ko dawaai dene jaisa nahi tha. Yeh insaan ke jism ki woh sabse nichli, sabse aadim aur sabse nagna jaivik laachaari thi jahan sharm, haya, rishte aur maryaada ki har ek deewaar dhehkar raakh ban jaati hai!

Agar koi aurat kisi paraaye mard ke peshaab ke ang ko din mein chaar baar apne haathon mein thaamegi... agar woh uske shauch ke baad uske angon ko apne haathon se dhoegi... to phir un dono ke beech aisa kaun sa parda, aisi kaun si maryaada baaqi reh jaayegi jise laanghne mein unko zara bhi hichak ho?!

Jis haath tootne ko main khatra talna samajh raha tha... woh to asal mein is ghar ki har ek deewaar, har ek parde ko nanga karke gira dene wala sabse bhayanak toofaan ban chuka tha!

Us ek vichaar ne... us bhayanak, kaamuk aur varjit ehsaas ne mere dimaag ko ek aisi aag mein jhonk diya jisne mujhe andar tak hilaakar rakh diya tha!

Darwaza band hote hi Kavya ne apni peeth us bhaari lakdi ke palle se tika di.

Usne apni dono aankhein moond liin. Kamre mein chhaaya sannaata itna gehra tha ki ghadi ki suiyon ki tik-tik bhi kisi chaabuk ki tarah sunai de rahi thi.

Kavya lagbhag ghisat-te hue kadmon se seedhe master bedroom ke bheetar gayi aur andar se bathroom ka darwaza band karke kundi chadha di.

Cam_MasterBed_01 se mujhe sirf bathroom ka band darwaza dikhai de raha tha, lekin us sannaate mein ventilation grill se chhankar aati hui aawaazein mere headphone mein bilkul saaf thiin.

Kavya basin ke nal ko poori taaqat se khol chuki thi. Paani ke tez bahaav ki aawaaz ke beech... uske sisakne ki aawaaz aayi.

Woh ro rahi thi.

Woh bhayanak, beqaaboo hokar ro rahi thi.

Basin ke kaale granite par apne dono haath tikaaye, woh aaine ke saamne khadi apne hi aks ko dekhkar ghin aur khauf se kaanp rahi thi.

"He Bhagwan... yeh mujhe kya ho gaya tha?" Uski tooti hui, sisakti hui fusfusaahat paani ki aawaaz ke saath mere kaanon mein padi. "Maine apni hi laadli ko... apni Anu ko us tarah dekha? Woh meri jaan hai... maine use aise daanta jaise woh meri sautan ho, meri dushman ho... mujhe kya hota ja raha hai? Kya main paagal ho rahi hoon...?"

Usne apni hatheliyon mein thanda paani bhara aur paaglon ki tarah apne chehre, apni aankhon aur apni gardan par maara. Woh apni us sanskaari, mamtaalu pehchaan ko dhoondhne ki koshish kar rahi thi jo Koregaon Park ke bangley mein pali-badhi thi, jo mandir mein deeya jalaati thi aur apni beti ko kharonch aane par bhi ro padti thi.

Lekin phir...

Paani ki aawaaz achanak dheemi ho gayi.

Kavya ne apna sir uthaya.

Aaine mein usne apne us bheege hue, tamtamaate chehre ko dekha. Aur us pal... uske aansuon ki dhaar tham gayi.

[Image: img-01513-cleaned.png]

Uski saanson ki gati dheemi hui. Uski aankhon ki woh nam, laachaar putliyan achanak ek ajeeb, thande aur aadim patthar mein badalne lagiin.

Ek doosri aurat... jo shaayad is ghar ki deewaaron mein, Tauji ke us paseene aur sarson ke tel ki gandh mein pichhle kai hafton se dheere-dheere jaag rahi thi... usne Kavya ke wajood ki kamaan apne haathon mein le li.

Kavya ne aaine mein apne hi honthon ko halka sa tante hue dekha.

“Nahi... jo hua, wahi hona tha.”

Woh fusfusaahat ab rone wali Kavya ki nahi thi. Woh us doosri Kavya ki thi jiski zubaan par koi taala nahi tha.

“Rajesh Hyderabad mein hai... use apni naukri aur loan pyaara hai. Anu Koregaon Park chali gayi... woh safe hai. Ab is ghar mein mere aur Tauji ke beech koi teesra nahi hai. Jis mard ne meri beti ke liye apni haddiyan tudwa leen... uska haq hai mere har qatre par. Ab mujhe kisi se darne ki zaroorat nahi hai... ab is jism ki, is ghar ki maalkin sirf main hoon.”

Usne nal band kiya. Tauliye se apna chehra ponchha.

Jab woh bathroom se baahar nikli, to uski chaal mein woh pehle wali hichkichaahat, woh ghabrahat poori tarah gaayab thi. Uske kandhe seedhe the, uski chaal mein ek nasheela, gehra thehraav tha.

Usne deewaan par jaakar dekha, Tauji dard ki bhaari dawaiyon ke asar se gehri, kharraaton bhari neend mein doob chuke the. Unka munh halka sa khula tha aur plaster bandhe haath unke seene par dhare the.

Kavya ne jhuk-kar bahut dheere se unki chaadar unke seene tak kheenchi. Uski ungliyan ek pal ke liye Tauji ke chaude, paseene se bheege maathe par tikiin. Usne apni saans unki saanson ke qareeb mehsoos ki, aur phir bina ek bhi aawaaz kiye, woh waapas master bedroom mein aa gayi.

Usne bedroom ki battiyan bujhaa diin.

Sirf khidki se aati hui shehar ki halki peeli roshni kamre mein thi.

Kavya bistar ki kor par baith gayi. Usne apne takiye ke neeche se apna woh Samsung tablet nikaala.

Uski screen ki thandi, neeli roshni Kavya ke khoobsurat, sangmarmari chehre par padi.

Usne ek app khola.

Wahi app... wahi secret Tumblr blog, @pinklily_confessions।

Hyderabad ke hotel mein baithe mere phone par ek teekhi, halki notification vibrate hui:

[pink lily just posted a new entry: "Do Auratein"]

Meri ungliyan kaanpne lagiin. Maine apne phone ki screen kholi.

Raat ke 10:24 par Kavya ne apne us gupt pate se, andhere kamre mein baithkar, woh alfaaz type kiye the jinhone meri aatma ko hamesha ke liye jhakjhor kar rakh diya:

Quote:"Meri hi chamdi ke neeche koi ajnabi aurat jaag uthi hai... woh jab saamne aati hai, to mujhe apni hi phool jaisi beti ek dushman ki tarah lagne lagti hai. Jaise woh laadli us laachaar mard ka khoon choosne aayi ho.
Ek main hoon jo apne sindoor, apni shaadi aur apni mamta ke liye takiye mein munh chhipaakar roti hai... aur doosri woh hai jo us ghaayal mard ki chaudi, paseene se bheegi chhaati aur tooti baahon ko dekhkar apni saari maryaada, saari sharm bhool jaati hai. Jab main unki pattiyon ko chhooti hoon, to mere andar se daya nahi... ek khaufnaak, hatheela adhikaar nikalta hai.
Mujhe dar lag raha hai ki woh doosri aurat mujhe dheere-dheere poora nigal legi... aur sabse darawni baat yeh hai ki mera man ab us doosri aurat se hi pyaar karne laga hai. Aaj ki raat... yeh ghar khaali hai. Aur main us ajnabi aurat ke hawaale hoon..."

Maine phone ko apni desk par rakh diya.

Meri hatheliyan paseene se lathpath thiin. Meri gardan ke peeche ke saare baal khade ho chuke the.

Kavya ko khud nahi pata tha ki uske zehan mein kya toot chuka hai. Woh kisi manorog ki shikaar nahi thi, woh to bas us aadim, varjit vaasna aur kritagyata ke us doraahe par khadi thi jahan ek aurat apne saare saamaajik khol utaarkar phenk deti hai.

Aur main?

Main screen par us andhere bedroom mein neeli roshni mein chamakte uske chehre ko dekh raha tha... yeh jaante hue ki kal subah jab sooraj niklega, to us flat 903 mein koi bahu apne sasur ki sewa nahi kar rahi hogi... balki ek bhookhi, aazaad aur nidar aurat, apne us ghaayal, laachaar mard ko apni ungliyon par nacha rahi hogi.

Aur us khel ka pehla parda... ab uthne hi wala tha.

--- To Be Continued ---
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#54
Yaar aap do do bar kyu post krte ho sirf ek bar he post kro story
welcome
Harinder Singh
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#55
Pics bhi Acchi nahi aad ki he and na hi gif
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#56
kya likha hai bro ,keep up
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#57
Do not post story twice and add sexy pic and gif..........really hot update
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