21-09-2026, 05:08 AM
kindly post in this story. This story is quite interesting
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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
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21-09-2026, 05:08 AM
kindly post in this story. This story is quite interesting
Yesterday, 02:00 PM
Hi to all of my fans.
Sorry for keeping you in limbo so long . Today after a long time , i got time to write on Next Episode . Nearly 70% of Episode is ready . Will post In day or two once it is Finished . I need Your help for choosing Proper image of Anita . अनीता ने कांपते हाथों से उस पैकेट को खोला, तो भीतर की चीजें देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
Deepak Kapoor
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
Yesterday, 04:34 PM
I choose option 1
2 hours ago
करीम का अधिकार
गरम पानी कब का ठंडा हो चुका था, लेकिन अनीता अब भी बाथटब के किनारों को जकड़े फर्श पर बैठी थी। पूरे बाथरूम में फैली तेल और साबुन की तीखी खुशबू अब उसका दम घोंट रही थी। करीम के जाने के बाद जो सन्नाटा वहां पसरा था, वह शावर की आवाजों से भी ज्यादा भयानक था। उसने दीवार का सहारा लेकर उठने की कोशिश की, लेकिन पैर रखते ही उसकी जांघें थरथरा गईं। पिछले हिस्से में उठा वह तीखा, चीर देने वाला दर्द दिमाग तक पहुंचा, और वह एक सिसकी के साथ वापस ठंडी टाइलों पर ढह गई। वह ढंग से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी, चलना तो बहुत दूर की बात थी। आईने में अपनी धुंधली परछाईं देखकर अनीता कांप गई। उसकी गोरी गर्दन पर करीम के दांतों के नीले-काले निशान चमक रहे थे। उसके स्तनों पर उंगलियों की जकड़ के निशान थे, और पैरों के बीच से बहती वह चिपचिपी धार इस बात की गवाही दे रही थी कि पिछले दो घंटों में करीम ने उसकी इज्जत और मखमली शरीर को किस कदर अपने पैरों तले रौंद दिया था। 'मैं राज को क्या मुंह दिखाऊंगी?' यह सवाल उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था। 'अगर उन्होंने इन निशानों को देख लिया... अगर उन्हें जरा भी भनक लग गई...' यह सोच कर ही अनीता का दिल बैठ गया। लेकिन सबसे ज्यादा जो बात अनीता को भीतर से पूरी तरह तोड़ रही थी, वह थी उसकी खुद की गद्दारी। वह बेबसी के आंसू रोते हुए भी इस सच से भाग नहीं पा रही थी कि जब करीम ने उस पर आख़िरी प्रहार किए थे, तो उसके अपने जिस्म ने बगावत कर दी थी। उसका वह आखिरी आत्मसमर्पण, उसकी जुबान से निकले वे शब्द—"फिर कभी कर लेना, मैं मना नहीं करूंगी"—उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहे थे। उसने सिर्फ अपना बदन नहीं हारा था, उसने अपनी मर्जी, अपनी आजादी और अपना आत्मसम्मान हमेशा-हमेशा के लिए करीम के हाथों में सौंप दिया था। अब वह राज की रईस पत्नी नहीं थी, वह इस घर के नौकर की एक बंधुआ 'मिल्कियत' बन चुकी थी, जो अब उसके कपड़े तय करने वाला था, उसे अपनी उंगलियों पर नचाने वाला था। बाथरूम के आईने को देखते हुए अनीता सिसक-सिसक कर रो रही थी, जहां पानी और आंसुओं का फर्क मिट चुका था। वह पूरी तरह टूट चुकी थी, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। उसे आज भी वह दिन याद आ रहा था, जहाँ से सब कुछ उसके हाथ से निकल गया। पति-पत्नी का वह मासूम रोल प्ले, जहाँ राज ने करीम का नाम लेकर उसके साथ सब किया था, अनीता के लिए एक भयानक अभिशाप बन गया। करीम ने वह सब देख लिया था और फिर उसकी शातिर चालों को अनीता समझ ही नहीं पाई; कभी प्यार से तो कभी गिल्ट का फायदा उठाकर, वह उसके शरीर के साथ खेलता चला गया। ----------------- करीम ने जब बाथरूम का भारी दरवाजा पीछे बंद किया, तो उसके चेहरे पर मुकम्मल कामयाबी की मुस्कान थी। उसकी काली काया अभी भी पसीने से चमक रही थी और उसकी सांसों में अनीता के महंगे इत्र, बदन की खुशबू और उस मखमली रईसी का नशा घुला हुआ था। वह अपनी लुंगी को कसते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरा, तो उसकी हर चाल में एक नया गुरूर था। 'तो आखिरकार मालकिन ने घुटने टेक ही दिए,' करीम ने मन ही मन सोचा। आज, रईस राज की बेदाग और नाजुक पत्नी को उसने बाथरूम की टाइलों पर कूट-कूट कर अपनी मिल्कियत की ऐसी मोहर लगा दी थी जिसे वो चाहकर भी नहीं मिटा सकती थी। अनीता के वे आखिरी शब्द—"फिर कभी कर लेना, मैं मना नहीं करूंगी"—करीम के कानों में किसी शाही एलान की तरह गूंज रहे थे। वह समझ गया था कि उसने सिर्फ अनीता का बदन नहीं जीता है, बल्कि उसके ऊंचे खानदान के घमंड को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया है। लेकिन करीम अब बंद कमरों का खिलाड़ी नहीं रहना चाहता था। उसे असली मजा तो तब आने वाला था जब वह इस गोरी मेमसाहब को समाज के सामने, दुनिया की नजरों के ठीक नीचे अपनी रखैल और अपनी 'गर्लफ्रेंड' बनाकर घुमाए, जहां लोक-लाज का डर उसे अंदर ही अंदर खाए और वह चाहकर भी करीम का हाथ न झटक सके। ----------------- अगली सुबह जब राज हमेशा की तरह तैयार होकर अपने ऑफिस के लिए निकला, तो आलीशान बंगले के भारी दरवाजों के बंद होने की आवाज अनीता के दिल की धड़कन बनकर धड़की। घर में सन्नाटा पसरते ही उसका बदन डर के मारे थरथराने लगा। अभी आधा घंटा भी नहीं बीता था कि करीम ने बिना दस्तक दिए अनीता के बेडरूम का दरवाजा खोला। उसके हाथ में कपड़ों का एक पैकेट था। उसके चेहरे पर वही विजयी मुस्कान थी जो कल बाथरूम के फर्श पर थी। करीम ने पैकेट को बेड पर रखते हुए कहा, "मालकिन, राज भैया तो चले गए। आज हम आपको अपनी प्रेमिका बनाकर पिक्चर दिखाने ले जा रहे हैं। अपनी इस अलमारी के महंगे कपड़े अंदर रखिए और आज इस गुलाम की पसंद पहनकर तैयार हो जाइए।" अनीता ने कांपते हाथों से उस पैकेट को खोला, तो भीतर की चीजें देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
अनीता ने उस तंग और हवस भरे अंतःवस्त्रों को देखा तो उसकी रूह कांप गई। वह रोने जैसी होकर बोली, "करीम... प्लीज... मैं यह सब पहनकर बाहर कैसे जाऊंगी? लोग क्या कहेंगे? राज को पता चल गया तो..." "राज भैया को कुछ पता नहीं चलेगा मालकिन," करीम ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए अपनी भारी और सख्त आवाज में कहा। वह अनीता के करीब आया और उसकी ठुड्डी को उंगलियों से भींचते हुए बोला, "कल का वादा भूल गईं? अब आपकी मर्जी नहीं, इस करीम का हुक्म चलेगा। सीधे-सीधे यह लाल जी-स्ट्रिंग और यह छेद वाली ब्रा चढ़ाइए अपने इस गोरे बदन पर। ऊपर से यह स्कर्ट और ब्लाउज पहनकर आधे घंटे में नीचे आइए। आज सिनेमाघर में इस करीम को अपनी गर्लफ्रेंड का यही रूप देखना है। करीम इतना कहकर एक शैतानी हंसी हंसता हुआ कमरे से बाहर निकल गया, और अनीता बेड पर उन लाल और सफेद कपड़ों को देखकर अपनी बेबसी पर आंसू बहाने लगी। ------------- अनीता ने बंद कमरे में कांपते हाथों से उन कपड़ों को अपने बदन पर चढ़ाया। जब उसने आईने में खुद को देखा, तो शर्म के मारे उसकी आंखें बंद हो गईं। वह पारदर्शी सफेद शर्ट और घुटनों से काफी ऊपर की वह लाल स्कर्ट उसके वजूद को पूरी तरह ढकने में नाकाम थे। भारी कदमों से, अपनी धड़कनों को थामे वह कमरे से बाहर आई, जहां करीम हॉल में सोफे पर पैर फैलाए उसका इंतजार कर रहा था। जैसे ही अनीता सामने आकर खड़ी हुई, करीम की नजरें उसके गोरे बदन पर चिपक गईं। उसके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान उभर आई। करीम अपनी जगह से उठा और हुक्मभरी आवाज में बोला, "हाथ ऊपर उठाइए मालकिन! जरा हम भी तो देखें कि हमारी चुनी हुई पोशाक इस बदन पर कैसी खिल रही है। पूरा मुआयना करेंगे आज।" अनीता की आंखों से बेबसी का एक आंसू टपका, लेकिन अपने वादे के आगे मजबूर होकर उसने धीरे-धीरे अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। हाथ ऊपर उठते ही उसकी सफेद शर्ट ऊपर खिंच गई और उसका नंगा पेट नजर आने लगा। करीम उसके बिल्कुल करीब आया। उसकी निगाह अनीता की शर्ट और मिनी स्कर्ट के बीच बिखरे उस नंगे पेट पर पड़ी। "कितना गोरा है यह..." करीम के मुंह से बेबाक तारीफ निकली और उसने धीरे से अनीता के पेट पर अपना भारी हाथ टिका दिया। अनीता की त्वचा इतनी चिकनी और मखमली थी कि करीम का खुरदरा हाथ उस पर मोम की तरह फिसल रहा था। करीम की उंगलियों की उस पहली धीमी और सहलाती हुई छुअन का अहसास अनीता के लिए बहुत ही अलग और अनोखा था। अनीता को अपने उस नंगे पेट पर करीम के हाथ का स्पर्श हजार वाट के करंट की तरह महसूस हुआ। करीम की उंगलियों की सहलाती हुई छुअन का अहसास अनीता के लिए बहुत ही अनोखा था; उसका पूरा बदन उस सनसनी से कांप उठा। उस अनचाहे और रेशमी अहसास के असर से अनीता के मुंह से अनजाने में ही एक दबी हुई, मदहोश कर देने वाली मर्मज्ञ सिसकी निकल गई— "ओह गॉड... करीम, यह क्या कर रहे हो..." करीम ने अनीता के पेट पर अपनी उंगलियों की पकड़ थोड़ी और बेबाक करते हुए उसके चेहरे की तरफ देखा। करीम (अनीता के कान के पास अपनी गर्म और भारी सांसें छोड़ते हुए): "अपनी गर्लफ्रेंड को सहला रहा हूं डार्लिंग... अब कोई जल्दबाजी नहीं है। आज के बाद से आप ना तो कोई अनीता बेटी हैं, और ना ही इस घर की रईस अनीता मालकिन। आप बस मेरी अनीता हैं... सिर्फ और सिर्फ इस करीम की।" करीम ने अपने दोनों हाथों से अनीता की सफेद शर्ट के निचले दोनों कोनों को पकड़ा और अनीता के ठीक नाभि के ऊपर एक टाइट गाँठ बाँध दी। शर्ट के ऊपर चढ़ते ही अनीता का गोरा, सुडौल और रेशमी पेट अब पूरी तरह बेपर्दा होकर निखर आया। शर्ट की उस गाँठ और नीचे लाल स्कर्ट के बीच अनीता के नंगे पेट का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुला रह गया था। उसकी बेदाग, गोरी त्वचा और नाभि की गहराई रोशनी में साफ चमक रही थी। अनीता अपनी इस खुली हुई नग्नता को देखकर झेंप गई और कांपते हाथों से उस नंगे हिस्से को ढकने की नाकाम कोशिश करने लगी, लेकिन करीम ने एक मुस्कान के साथ उसके हाथों को थाम लिया। करीम ने अनीता के कांपते हाथों को थाम लिया और उन्हें उसकी नाभि से थोड़ा दूर करते हुए भारी आवाज में कहा, "मैं अपनी अनीता को ऐसे ही देखना चाहता हूं। अपने हाथ बीच में मत लाओ, अनीता डार्लिंग।" अनीता का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। करीम का इस तरह सरेआम उसके बदन पर अपना पूरा हक जमाना और उसे बार-बार 'डार्लिंग' कहना उसे अंदर तक झकझोर रहा था। फिर करीम की गहरी और हवस भरी निगाह अनीता की उस गोरी, बेदाग नाभि (धुनी) पर जाकर टिक गई। उस कसे हुए पेट के बीचों-बीच नाभि की वह सुडौल गहराई देखकर करीम के चेहरे पर एक चमक आ गई। "क्या कयामत नज़ारा है..." करीम के मुँह से बेबाक तारीफ़ निकली। इतना कहते ही करीम थोड़ा नीचे झुका और बिना किसी हिचकिचाहट के अनीता की नाभि पर अपनी गर्म और गीली ज़ुबान टिका दी। उसने बहुत ही इत्मीनान से अनीता की नाभि को चाटना और अपनी ज़ुबान की नोक से उसकी गहराई को खंगालना शुरू कर दिया। ज़ुबान का वह अचानक, गीला और तीखा स्पर्श अनीता के नंगे पेट पर बिजली के कड़कने जैसा था। नाभि पर होती उस सनसनी ने उसके पूरे जिस्म की नसों में आग लगा दी। अनीता के मुँह से एक बेकाबू, मर्मज्ञ सिसकी फूट पड़ी— "ओह गॉड..." अनीता की टांगें कांपने लगीं और उसकी आँखें मदहोशी में बंद होने लगीं। बेबसी और उस अनचाही उत्तेजना के बवंडर में, अनीता के दोनों हाथ अनजाने में ही नीचे झुके करीम के सिर पर चले गए। उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद करीम के घने और खुरदरे बालों में उलझकर उसके सिर को अपनी नाभि की ओर दबाने लगीं। करीब दो मिनट तक करीम अनीता के उस गोरे और मखमली नंगे पेट पर अपनी गीली ज़ुबान फिराता रहा। उसकी ज़ुबान कभी नाभि की गहराई में घूमती तो कभी उसके सुडौल पेट के किनारों को चाटती हुई ऊपर शर्ट की गाँठ तक चली जाती। उस तीखे और गीले स्पर्श की सनसनी अनीता के बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। उसकी आँखें मदहोशी और शर्म के मारे पूरी तरह बंद थीं, और उसके होंठों से लगातार मर्मज्ञ सिसकियाँ निकल रही थीं— "उह्ह... करीम... आह्ह..." उसका पूरा बदन उस अनचाहे सुख और बेबसी की वजह से थरथरा रहा था। करीम के बालों में उलझी उसकी उंगलियाँ कभी उसे दूर धकेलने की नाकाम कोशिश करतीं, तो कभी उसी उत्तेजना में उसके सिर को और कसकर अपने पेट से सटा लेतीं। फिर करीम ने अपना सिर उठाया तो उसकी नजरें उस पतली सफेद शर्ट के आर-पार साफ झलकती उस लाल ब्रा पर गईं। शर्ट का कपड़ा इतना महीन था कि लाल रंग अंदर से पूरी तरह नुमायां हो रहा था। ब्रा के कप्स में बने उन छोटे छेदों की वजह से अनीता के दोनों निप्पल्स ब्रा से बाहर निकलकर सफेद शर्ट के पतले कपड़े को अंदर से ढकेल रहे थे। वे उत्तेजना की वजह से पूरी तरह कड़े हो गए थे। वे उभरे हुए हिस्से साफ दिखाई दे रहे थे। करीम (अनीता की आंखों में झांकते हुए, भारी और मदहोश आवाज में): "देखो अनीता... तुम्हारे ये निप्पल्स तरस रहे हैं मेरे पास आने के लिए। कपड़ा इनकी बेताबी छुप नहीं पा रही है।" करीम ने एक गहरी सांस ली और अपनी उंगलियों से शर्ट के ऊपर से ही उन सुलगते हुए कड़े हिस्सों को अपनी चुटकी में पकड़ा और धीरे से सहला दिया। उस अचानक और तीखे स्पर्श से अनीता का पूरा बदन सिर से पांव तक सिहर उठा और उसके कांपते होंठों से बेबसी भरी सिसकी निकली, "बस... करीम..." इसके बाद करीम की नजरें नीचे उतरीं, जहां लाल स्कर्ट के नीचे अनीता की नंगी और गोरी जांघें पूरी तरह खुली हुई थीं। घुटनों से बहुत ऊपर तक दिखती उस बेदाग त्वचा को देखकर करीम की आंखों में हवस की आग और भड़क गई। वह अनीता के और करीब सटा और अपने बड़े काले हाथों से उसकी लाल स्कर्ट को धीरे से ऊपर की ओर उठा दिया। स्कर्ट के ऊपर उठते ही अनीता का निचला हिस्सा लगभग पूरी तरह नग्न हो गया। करीम की नजरें उसकी जांघों के बीच टिकीं, जहां वह लाल रंग की जी-स्ट्रिंग महज पतले धागों के सहारे उसके नितंबों और गुप्तांग के मुहाने को बमुश्किल छू रही थी। आगे का गोरा हिस्सा और पीछे के विशाल कूल्हे उस पतली पट्टी के बीच लगभग पूरी तरह बेपर्दा चमक रहे थे। करीम ने स्कर्ट को वैसे ही उठाए रखा और एक वहशी हंसी हंसते हुए फुसफुसाया, "कसम खुदा की मालकिन... इस रूप में तो आप राज भैया की बीवी नहीं, बल्कि इस नौकर की रखैल लग रही हैं।" "करीम... मत करो ऐसे। मैं इन कपड़ों में बाहर कैसे जाऊंगी, अगर किसी ने देख लिया तो?" अनीता की आवाज़ डर और बेबसी के मारे थरथरा रही थी, और उसकी आँखें आसूँओं से भर आई थीं। करीम के चेहरे पर एक सख्त भाव आ गया। उसने अनीता की आंखों में झांकते हुए कहा, "पहले तो ये आंसू नहीं आने चाहिए तुम्हारे चेहरे पर। तभी मैं तुम्हारी बात पर गौर करूंगा।" करीम का यह हुक्म सुनते ही अनीता जल्दी से अपने दोनों हाथों से गालों पर बहते आंसुओं को पोंछ लिया और करीम की तरफ अपनी बेबस नजरों से देखने लगी। करीम ने अपनी दोनों बांहों को सीने पर बांधा और अपनी गर्दन को थोड़ा तिरछा करके अनीता को सिर से पांव तक देखा। करीम (असंतोष भरे लहजे में): "नहीं मालकिन, मजा नहीं आया... अभी भी तुम्हारे चेहरे पर वही बेबसी और खौफ दिख रहा है। तुम कहीं से भी इस करीम की माशूका नहीं लग रही हो। और याद रखना, करीम सिर्फ अपनी माशूका की बात सुनता है, किसी रोती हुई मालकिन की नहीं।" करीम के इन तीखे शब्दों का मतलब अनीता तुरंत समझ गई। उसे समझ आ गया कि अगर इस सार्वजनिक बेइज्जती से बचना है या करीम को किसी बात के लिए राजी करना है, तो उसे डर को दरकिनार करके करीम की प्रेमिका होने का नाटक ही नहीं, बल्कि वैसा बर्ताव भी करना पड़ेगा। अनीता ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने कांपते चेहरे पर जबरदस्ती एक कोमल, कातिलाना मुस्कान लाने की कोशिश की। उसने अपनी पलकों को हल्का सा झुकाया और अपने नाजुक कदम करीम की तरफ बढ़ाए। उसने अपने दोनों हाथों को करीम के चौड़े सीने पर रख दिया और अपनी कजरारी आंखों से उसकी आंखों में देखा। अनीता (अपनी आवाज में एक बनावटी मिठास और नजाकत लाते हुए): "करीम... डार्लिंग, प्लीज मेरी बात सुनो ना। मैं बस इतना चाहती हूं कि हम दोनों के बीच जो कुछ भी चल रहा है, जो ये खास रिश्ता है... उसकी भनक किसी भी तरह राज को न लगे।" करीम ने अनीता के अपने सीने पर रखे हाथों को महसूस किया और उसकी इस अचानक बदली अदा पर उसकी आंखें हवस और घमंड से चमक उठीं। उसने अनीता की पतली नंगी कमर में अपना भारी हाथ डालकर उसे और करीब खींच लिया। करीम (अनीता के होंठों के बेहद करीब अपना चेहरा लाते हुए, भारी आवाज में): "अच्छा? तो हमारी माशूका को हमारी फिक्र कम और राज भैया का डर ज्यादा है? " अनीता का दिल अंदर ही अंदर इस छुअन से घिना रहा था, लेकिन उसने अपने चेहरे की मुस्कान को फीका नहीं पड़ने दिया। अनीता (करीम के कंधे पर अपना सिर हल्का सा टिकाते हुए, सहमी सी आवाज में): "तुम तो जानते ही हो करीम... "अगर राज ने या उनके किसी जानने वाले ने मुझे इन कपड़ों में बाहर देख लिया, तो सब बर्बाद हो जाएगा। तुम जो कहोगे मैं करूंगी, बस... बाहर के लिए मुझे कुछ ऐसा पहनने दो जिससे कोई पहचान न सके।" करीम ने अनीता की ठोड़ी को अपनी दो उंगलियों से ऊपर उठाया और उसके लाल पड़ चुके होंठों को एक पल के लिए घूरकर देखा। करीम (एक विजयी मुस्कान के साथ): "चलो, डार्लिंग कहा है तो तुम्हारी बात पर विचार करते हैं।" करीम ने अनीता की नंगी कमर को अपने मजबूत हाथों से सहलाते हुए उसे झटके से अपनी बाहों में खींच लिया। उसका चौड़ा और तपता हुआ सीना अनीता के नाजुक बदन से पूरी तरह सट गया। करीम (अनीता के चेहरे पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए, हवस भरी आवाज में): "अनीता डार्लिंग... अब जरा आगे बढ़ो और अपने इस करीम को एक गहरा किस करो। पिक्चर चलने से पहले मेरा दिल कर रहा है कि अपनी इस खूबसूरत माशूका के साथ थोड़ा प्यार कर लूं। उसके बाद ही मैं खुद तैयार होने जाऊंगा।" अनीता ने करीम की भूखी आंखों में देखा और बिना किसी विरोध के अपने होंठ उसके काले और मोटे होंठों पर टिका दिए। शुरुआत में तो वह यह सब सिर्फ एक नाटक की तरह कर रही थी ताकि करीम उसकी बात मान ले, लेकिन करीम कोई नौसिखिया नहीं था। जैसे ही उसने अनीता के नाज़ुक और रसीले होंठों को अपने ढीठ, खुरदरे और गर्म होंठों के बीच बेदर्दी से दबाया, उसकी गीली ज़ुबान अनीता के मुँह के हर कोने में बेहद महारत से चलने लगी। करीम की ज़ुबान अनीता की कोमल ज़ुबान से टकराई और उसे मथने लगी, जैसे किसी प्यासे ने पहली बार कोई मीठा शरबत चखा हो। बेमन और सिर्फ एक नाटक से शुरू हुआ वह चुंबन अचानक एक बेकाबू, सुलगती हुई अनचाही उत्तेजना में बदलने लगा। करीम ने एक वहशी मुस्कान के साथ उसके होंठों पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया। उसके मोटे होंठ कभी अनीता के रसीले होंठों को हल्के से चूसते, तो कभी एकदम से पूरे जोर के साथ उन पर हावी हो जाते, जैसे किसी भूखे शिकारी ने अपना शिकार दबोच लिया हो। अनीता के मुँह का रस पीते हुए करीम का यह अंदाज़ उसे पूरी तरह बेबस बना रहा था। उसी पल उसका एक भारी हाथ अनीता की लाल स्कर्ट के नीचे, उसकी नंगी और तपती हुई जाँघों पर जा टिका। उसकी काली मोटी उँगलियाँ अनीता की मखमली, गोरी त्वचा पर धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगीं। करीम की उंगलियों की उस गर्म छुअन से अनीता के पूरे शरीर में एक तीखी, ठंडी सिहरन दौड़ गई और उसकी टांगें अनजाने में ही थोड़ी ढीली पड़ने लगीं। करीम ने अनीता की नंगी जांघों पर अपनी खुरदरी उंगलियों का दबाव थोड़ा और बढ़ाते हुए उसके होंठों से अपने होंठ हटाए। उसकी भूखी और हवस भरी निगाहें अनीता की लाल स्कर्ट के नीचे उभरी गोरी रंगत पर टिकी थीं। करीम (मदहोश और भारी आवाज़ में, अनीता के गालों से अपना चेहरा सटाते हुए): "मखन हैं आपकी जांघें... उंगली फिसल ही जाती है। कितनी कोमल है आपकी स्किन, कितनी गोरी..." उसके इस बेबाक बयान और नंगी त्वचा पर रेंगती उसकी काली उंगलियों ने अनीता को शर्म से लाल कर दिया। वहीं करीम का दूसरा हाथ अनीता की पतली सफेद शर्ट के ऊपर से ही उसके उभरे हुए सुडौल स्तन पर पहुँच गया। ब्रा के छेदों से बाहर निकले अनीता के कड़े निप्पल्स को उसने अपनी उँगलियों के बीच दबोचा और चुटकी काटते हुए उन्हें बेदर्दी से मसलने लगा। उस तीखे स्पर्श और दर्द-मिश्रित सुख के अचानक मिले अहसास से अनीता का पूरा वजूद कांप उठा। उसके गले से एक तीखी, दबी हुई आह निकली, जो करीम के मुँह के भीतर ही घुटकर रह गई— "अह्ह... धीरे करीम... दर्द होता है..." अनीता ने करीम के होंठों के बीच ही सिसकते हुए गुहार लगाई। करीम का मुँह अनीता के कोमल होंठों को पूरी तरह से निगल चुका था। वह अनीता की नंगी कमर को अपनी ओर इतना कसता चला गया कि अनीता के उभरे हुए सीने और उसकी नंगी जांघों का हर हिस्सा करीम के कठोर और तपते जिस्म से सट गया। अनीता का पूरा बदन उस छुअन के आगे समर्पण करने लगा था; उसके थरथराते हाथ अब खुद-ब-खुद करीम के चौड़े कंधों को जकड़ने लगे थे। कुछ पलों तक अनीता को अपनी बाहों में इस कदर भींचने और उसकी सुध-बुध छीनने के बाद, करीम ने बड़ी मुश्किल से अपने होंठ पीछे हटाए। अनीता के होंठ उसकी उखड़ी हुई साँसों के साथ काँप रहे थे। करीम ने एक विजयी और मदहोश मुस्कान के साथ अनीता के बहके हुए गाल पर प्यार से हाथ फेरा और भारी आवाज़ में आगे बोला। करीम (विजयी लहजे में): "और सुनो डार्लिंग, बाहर की फिक्र छोड़ दो। मैंने अपने एक दोस्त से बात कर ली है, हम उसकी मोटरसाइकिल पर सवार होकर पिक्चर देखने जाएंगे। तुम अपने चेहरे को स्कार्फ या रुमाल से अच्छी तरह ढक लेना... किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी कि यह रईस मालकिन इस काले करीम की मोटरसाइकिल पर पीछे सटकर बैठी है।" यह सुनते ही अनीता के मन से राज के देख लेने का खौफ थोड़ा कम हुआ, लेकिन एक नौकर की मोटरसाइकिल पर इस छोटे स्कर्ट और तंग ब्रा में पीछे बैठकर जाने के अहसास ने उसके बदन में सिहरन पैदा कर दी। ---------- करीम ने अनीता को कमरे में उसी बहकी हुई हालत में छोड़ा, अपने कपड़े थोड़े ठीक किए और सीधे अपने जिगरी दोस्त शंकर के कमरे की तरफ बढ़ गया। शंकर उम्र में करीम के ही बराबर था और दोनों की आपस में काफी जमती थी। सामने करीम को आता देख शंकर ने अपने हाथ में पकड़ी बीड़ी का एक लंबा सुट्टा खींचा और धुएं का गुबार छोड़ते हुए हंसकर बोला, "अबे करीम! आज किधर से सूरज निकल आया बे? बड़ी तेज चाल में आ रहा है, चेहरे पर तो अलग ही चमक बिखरी पड़ी है!" करीम ने पास आकर शंकर के कंधे पर एक थपकी मारी और सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, "अबे चमक-वमक छोड़, तेरी मोटरसाइकिल की चाबी निकाल जरा। अर्जेंट काम आ गया है।" शंकर ने अपनी आंखें मटकाते हुए चाबी अपनी जेब में कसकर पकड़ ली और चिढ़ाने वाले लहजे में बोला, "अबे-अबे, थम जा भाई! हवा में उड़ रहा है क्या? अचानक मोटरसाइकिल की क्या जरूरत पड़ गई? और वो भी इस टाइम? बात क्या है बे? कहीं कोई नई सैटिंग तो नहीं पटा ली?" करीम ने हंसते हुए शंकर की बात को हवा में उड़ाया, "अबे तेरी तो सुई हमेशा वहीं जाके अटकती है! काम है जरा शहर की तरफ, एक जरूरी सामान लेकर आना है। दे चाबी चुपचाप, ज्यादा सीआईडी मत बन।" "अच्छा बच्चा! मुझसे छुपाएगा?" शंकर ने नकली नाराजगी दिखाते हुए चाबी जेब से निकाली और उंगली में घुमाते हुए करीम के करीब आया, "देख भाई, मेरी काली घोड़ी की सवारी ऐसे ही मुफ़्त में नहीं मिलती। सच-सच बता, चक्कर क्या है? नहीं तो चाबी भूल जा।" करीम ने झटके से शंकर के हाथ से चाबी लपक ली और आंख मारते हुए बोला, "अबे सब सच बता दूंगा तो नजर नहीं लग जाएगी तेरी? शाम को आऊंगा तो तेरी बीड़ी का बंडल और एक कटिंग चाय मेरी तरफ से पक्की। अब रास्ते से हट, मुझे देर हो रही है!" शंकर ने हंसते हुए करीम की पीठ पर एक घूंसा मारा, "साले हरामी! काम निकलते ही भाग रहा है। जा ले जा, पर गाड़ी ध्यान से चलाना, मेरी जान बस्ती है उसमें!" करीम ने चाबी जेब में डाली, काली मोटरसाइकिल को किक मारी और एक जोरदार धुआं छोड़ते हुए वापस अनीता के बंगले की तरफ मोड़ दिया।
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करीम ने यह काली मोटरसाइकिल कोई इत्तेफाक से नहीं, बल्कि पूरी प्लानिंग के साथ चुनी थी। शंकर की यह मोटरसाइकिल करीम का पुराना और परखा हुआ हथियार थी।
इस मोटरसाइकिल की पीछे वाली सीट काफी ऊंची और आगे की तरफ ढलान वाली थी। इस बनावट की वजह से पीछे बैठने वाले इंसान का पूरा वजन अपने आप आगे की तरफ सरक आता था, जिससे वह चाहकर भी ड्राइवर की पीठ से चिपककर बैठने पर मजबूर हो जाता था। करीम को जब भी किसी औरत को अपने साथ घुमाने ले जाना होता या अपनी नजदीकी बढ़ानी होती, तो वह हमेशा बहाना बनाकर शंकर से यही मोटरसाइकिल मांग कर लाता था। इतना ही नहीं, इस मोटरसाइकिल के पिछले हिस्से पर पकड़ बनाने के लिए कोई हैंडल या सपोर्ट बार भी नहीं था। पीछे बैठने वाली सवारी के पास संतुलन बनाए रखने के लिए सिर्फ दो ही रास्ते बचते थे—या तो वह अपनी दोनों बाहें ड्राइवर की कमर में डालकर उसे कसकर जकड़ ले, या फिर अपने दोनों हाथ उसकी छाती या कंधों पर टिकाकर बिल्कुल उससे सटकर बैठी रहे। करीम मन ही मन मुस्कुराया, यह सोचकर कि जब अनीता इस ऊंची सीट पर अपनी नंगी जांघों और छोटी स्कर्ट के साथ उसके पीछे बैठेगी, तो रफ्तार के हर झटके के साथ उसका पूरा नाजुक बदन उसकी पीठ पर किस कदर पिघलेगा। शंकर से चाबी लेने के बाद करीम सीधे अपने नौकर वाले क्वार्टर में पहुंचा। उसके सिर पर आज एक अलग ही नशा सवार था। उसने जल्दी-जल्दी एक बढ़िया फव्वारे से स्नान किया और अपने दांतों को अच्छी तरह ब्रश किया ताकि मुँह से जरा सी भी बदबू न आए। नहाने के बाद, करीम ने अपनी अलमारी के एक कोने से इत्र की एक महंगी शीशी निकाली—यह वही परफ्यूम था जो उसने कुछ दिन पहले राज साहब की वार्डरोब से चुपचाप चुराया था। करीम ने उस महंगे परफ्यूम को अपनी गर्दन, चौड़े सीने और बगलों पर दिल खोलकर छिड़का। परफ्यूम की तेज, मर्दाना और रईसाना खुशबू से उसका पूरा क्वार्टर महक उठा। अपनी नंगी छाती पर हाथ फेरते हुए और परफ्यूम की शीशी को देखते हुए करीम के होंठों पर एक बहुत ही वहशी और अय्याश मुस्कान तैर गई। करीम (मन ही मन हंसते हुए, बुदबुदाया): "वाह करीम भाई... क्या किस्मत पाई है! परफ्यूम भी राज सर का, बीवी भी राज साहब की... और ऐश इस काले करीम की!" इसके बाद उसने अपनी अलमारी से अपनी सबसे बढ़िया वाली नीली जींस निकाली और उसे कसकर पहन लिया। लेकिन ऊपर पहनने के लिए उसने बहुत ही चालाकी से अपनी सबसे पतली टी-शर्ट चुनी। वह टी-शर्ट इतनी महीन थी कि शरीर से पूरी तरह चिपकी रहती थी। करीम ने यह जान-बूझकर किया था; वह अच्छी तरह जानता था कि जब ऊंची सीट वाली मोटरसाइकिल पर रास्ते के झटकों के साथ अनीता उसके पीछे चिपकेगी, तो उस पतली टी-शर्ट के पार से उसकी पीठ पर अनीता के सुलगते और कसे हुए मम्मों का एक-एक उभार साफ महसूस होगा। पूरी तरह तैयार होकर, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, करीम बेहद ऐंठ और आत्मविश्वास के साथ बंगले की ओर बढ़ गया। उधर कमरे में अनीता शीशे के सामने खड़ी होकर अपने इस रूप को देख-देखकर बेहद परेशान और शर्मिंदा हो रही थी। सफेद पतली शर्ट, जिसकी नाभि के ऊपर बंधी गाँठ से उसका पूरा गोरा पेट बेपर्दा था, और नीचे वह लाल रंग की बेहद छोटी मिनी स्कर्ट—इन कपड़ों में खुद को देखना भी उसके लिए दूभर हो रहा था। लेकिन अब उसके पास इस चक्रव्यूह से निकलने का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। तभी उसे ख्याल आया कि अगर राज ने अचानक घर पर फोन कर दिया और वह गायब मिली, तो बहुत बड़ा बवंडर खड़ा हो जाएगा। कांपते हाथों से उसने अपना मोबाइल उठाया और राज का नंबर मिलाया। दूसरी तरफ से फोन उठते ही राज की प्यार भरी आवाज सुनाई दी, "हेलो अनीता! कैसी हो डार्लिंग? सब ठीक है न?" अनीता ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू में करने की कोशिश की और भारी आवाज में बोली, "हाँ राज... सब ठीक है। मैं... मैं सोच रही थी कि जरा शहर जाकर कुछ शॉपिंग कर आऊं। घर में बैठे-बैठे बहुत बोरियत हो रही थी।" "अच्छा? यह तो बहुत अच्छी बात है अनीता। तुम्हें थोड़ा बाहर घूम भी आना चाहिए," राज ने बहुत ही सहज और बेफिक्र अंदाज में कहा। "लेकिन तुम जाओगी कैसे? " अनीता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। झूठ बोलते वक्त उसकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगी, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, "मैं... मैं करीम को साथ ले जा रही हूँ। हम बाहर से ऑटो कर लेंगे। वो साथ रहेगा तो सामान उठाने में भी मदद हो जाएगी।" "हाहा, बिल्कुल ठीक सोचा तुमने डार्लिंग!" राज हंसते हुए बोला। "करीम साथ तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। आराम से शॉपिंग करो और हां... अपने लिए कुछ बढ़िया सा ड्रेस जरूर ले लेना। और कोई चिंता मत करना, ठीक है?" "थैंक यू राज... अपना ध्यान रखना," अनीता ने बेहद धीमी आवाज में कहा। "तुम भी डार्लिंग, बाय!" कहकर राज ने फोन काट दिया। फोन डिस्कनेक्ट होते ही अनीता ने अपनी छाती पर हाथ रख लिया। उसका दिल अपराधबोध से बुरी तरह बैठा जा रहा था। राज उस पर कितना अंधा भरोसा करता था, उसे करीम जैसे नौकर के साथ बेफिक्र होकर भेजने को तैयार हो गया था... और यहाँ वह उसी राज से इतना बड़ा झूठ बोल रही थी। अपनी नग्नता और इस धोखे के अहसास से अनीता की आँखों में ग्लानि के आँसू छलक आए, लेकिन वक्त की टिक-टिक उसे याद दिला रही थी कि अब करीम किसी भी पल आने ही वाला है। उधर अपने क्वार्टर में बैठा शंकर लगातार बीड़ी के कस खींचते हुए गहराई से कुछ सोच रहा था। उसके दिमाग में करीम के चेहरे का वो जोश और बेताबी बार-बार घूम रही थी। यह पहली बार था जब करीम ने उससे कोई बात छुपाने की नाकाम कोशिश की थी। वरना दोनों के बीच कभी कोई पर्दा नहीं रहा। शहर की तंग गलियों से लेकर गांव की पगडंडियों तक, दोनों ने न जाने कितनी रसीली औरतों का एक साथ शिकार किया था। कई बार करीम की फंसाई हुई गरम औरतों को शंकर ने चखा था, तो कभी शंकर की पटाई हुई जिस्मों पर करीम ने अपना पानी बहाया था। दोनों का यह घिनौना और नंगा हिसाब-किताब बरसों पुराना था। शंकर ने अंगूठे से बीड़ी की राख झाड़ी और मन ही मन बुदबुदाया, "साले करीम की चाल ही बदल गई है आज... ज़रूर किसी बहुत बड़े और भारी माल पर हाथ मारा है इसने! वरना इतनी ऐंठ में चाबी झपटकर नहीं भागता। मामला बहुत गरम है।" सोचते-सोचते शंकर के पेट में चुल मचने लगी। उसके भीतर का हरामीपन और हवस उफान मारने लगी। उसने अपनी पुरानी ऑटो-रिक्शा निकाली, उसमें किक मारी और धीरे-धीरे उस बड़े बंगले की तरफ बढ़ा जहाँ करीम केयरटेकर का काम करता था। बंगले से थोड़ी दूर पहले ही, एक घने पेड़ की छांव में उसने ऑटो इस तरह खड़ा किया कि सड़क से कोई उसे पहचान न पाए। ड्राइविंग सीट पर बैठकर, बीड़ी का बचा हुआ गुट्ठा होंठों में दबाए, शंकर पुरानी बातें टटोलने लगा। अभी हफ़्ते-दस दिन पहले की तो बात है, जब करीम दारू के पैग खींचते हुए बता रहा था कि बंगले के गेस्ट हाउस में कोई बहुत ही कयामत चीज़ रहने आई है—एकदम गोरी-चिट्टी, कसी हुई और रईस मैडम, जो अपने साहब के साथ वहाँ ठहरी हुई थी। शंकर के दिमाग में अचानक एक बिजली सी कौंधी, "अबे कहीं साले करीम ने उस रईस मैडम को तो नहीं पटा लिया?? नहीं-नहीं... ! यह कैसे हो सकता है? कहाँ हम जैसे फटेहाल, नंगे-भूखे गरीब और कहाँ वो साहब की खूबसूरत मालकिन!" लेकिन फिर शंकर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई, "पर करीम साला चीज़ बहुत चालू है... अगर उसने सच में मैडम पर हाथ साफ़ कर दिया होगा, तो आज मुझे भी उस गरम माल का जलवा देखना ही पड़ेगा।" शंकर ऑटो की सीट पर थोड़ा आगे होकर, अपनी नज़रों को सीधे बंगले के मुख्य गेट पर टिकाकर करीम के बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा।
Deepak Kapoor
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Karim Ka Adhikar
Garam paani kab ka thanda ho chuka tha, lekin Anita ab bhi bathtub ke kinaron ko jakde pharsh par baithi thi. Poore bathroom mein phaili tel aur sabun ki teekhi khushboo ab uska dam ghont rahi thi. Karim ke jaane ke baad jo sannata wahan pasra tha, woh shower ki aawazon se bhi zyada bhayanak tha. Usne deewar ka sahara lekar uthne ki koshish ki, lekin pair rakhte hi uski jaanghen tharthara gayin. Pichhle hisse mein utha woh teekha, cheer dene wala dard dimaag tak pahuncha, aur woh ek siski ke saath wapas thandi tiles par dhah gayi. Woh dhang se khadi bhi nahi ho paa rahi thi, chalna toh bahut door ki baat thi. Aaine mein apni dhundhli parchhai dekhkar Anita kaamp gayi. Uski gori gardan par Karim ke daanton ke neele-kale nishan chamak rahe the. Uske stano par ungliyon ki jakad ke nishan the, aur pairon ke beech se bahti woh chipchipi dhaar is baat ki gawahi de rahi thi ki pichhle do ghante mein Karim ne uski izzat aur makhmali shareer ko kis kadar apne pairon tale raond diya tha. 'Main Raj ko kya muh dikhaungi?' Yeh sawal uske dimaag mein hathode ki tarah baj raha tha. 'Agar unhone in nishanon ko dekh liya... agar unhein zara bhi bhanak lag gayi...' Yeh soch kar hi Anita ka dil baith gaya. Lekin sabse zyada jo baat Anita ko bheetar se poori tarah tod rahi thi, woh thi uski khud ki gaddari. Woh bebasi ke aansu rote hue bhi is sach se bhaag nahi paa rahi thi ki jab Karim ne us par aakhiri prahaar kiye the, toh uske apne jism ne bagawat kar di thi. Uska woh aakhiri aatmasamarpana, uski zubaan se nikle we shabd—"Phir kabhi kar lena, main mana nahi karungi"—uske kanon mein pighle hue seesa ki tarah goonj rahe the. Usne sirf apna badan nahi hara tha, usne apni marzi, apni aazadi aur apna aatmasamman hamesha-hamesha ke liye Karim ke hathon mein saunp diya tha. Ab woh Raj ki raees patni nahi thi, woh is ghar ke naukar ki ek bandhua 'milkiyat' ban chuki thi, jo ab uske kapde tay karne wala tha, usse apni ungliyon par nachane wala tha. Bathroom ke aaine ko dekhte hue Anita sisak-sisak kar ro rahi thi, jahan paani aur aansuon ka phark mit chuka tha. Woh poori tarah toot chuki thi, sharirik roop se bhi aur mansik roop se bhi. Usse aaj bhi woh din yaad aa raha tha, jahan se sab kuchh uske hath se nikal gaya. Pati-patni ka woh masoom role play, jahan Raj ne Karim ka naam lekar uske saath sab kiya tha, Anita ke liye ek bhayanak abhishaap ban gaya. Karim ne woh sab dekh liya tha aur phir uski shatir chalon ko Anita samajh hi nahi paayi; kabhi pyar se toh kabhi guilt ka fayda uthakar, woh uske shareer ke saath khelta chala gaya. ----------------- Karim ne jab bathroom ka bhaari darwaza pichhe band kiya, toh uske chehre par mukammal kamyabi ki muskaan thi. Uski kali kaya abhi bhi pasine se chamak rahi thi aur uski saanson mein Anita ke mahange itra, badan ki khushboo aur us makhmali raeesi ka nasha ghula hua tha. Woh apni lungi ko kaste hue seedhiyon se neeche utra, toh uski har chaal mein ek naya garoor tha. 'Toh aakhirkar malkin ne ghutne tek hi diye,' Karim ne man hi man sochha. Aaj, raees Raj ki bedag aur najuk patni ko usne bathroom ki tiles par koot-koot kar apni milkiyat ki aisi mohar laga di thi jise wo chahkar bhi nahi mita sakti thi. Anita ke we aakhiri shabd—"Phir kabhi kar lena, main mana nahi karungi"—Karim ke kanon mein kisi shahi elan ki tarah goonj rahe the. Woh samajh gaya tha ki usne sirf Anita ka badan nahi jeeta hai, balki uske oonche khandani ghamand ko hamesha ke liye chaknachoor kar diya hai. Lekin Karim ab band kamron ka khiladi nahi rahna chahta tha. Usse asli maja toh tab aane wala tha jab woh is gori memsahab ko samaj ke samne, duniya ki najron ke theek neeche apni rakhail aur apni 'girlfriend' banakar ghumaye, jahan lok-laj ka dar usse andar hi andar khaaye aur woh chahkar bhi Karim ka hath na jhatak sake. ---------------- Aggli subah jab Raj hamesha ki tarah taiyar hokar apne office ke liye nikla, toh aalishan bangle ke bhaari darwazon ke band hone ki aawaz Anita ke dil ki dhadkan bankar dhadki. Ghar mein sannata pasarte hi uska badan dar ke mare thartharane laga. Abhi aadha ghanta bhi nahi beeta tha ki Karim ne bina dastak diye Anita ke bedroom ka darwaza khola. Uske hath mein kapdon ka ek packet tha. Uske chehre par wahi vijayi muskaan thi jo kal bathroom ke pharsh par thi. Karim ne packet ko bed par rakhhte hue kaha, "Malkin, Raj bhaiya toh chale gaye. Aaj hum aapko apni premika banakar picture dikhane le ja rahe hain. Apni is almari ke mahange kapde andar rakhiye aur aaj is gulaam ki pasand pahankar taiyar ho jaiye." Anita ne kaampte hathon se us packet ko khola, toh bheetar ki cheezein dekhkar uski aankhen phati ki phati rah gayin. Lal rang ki ek bra, jiske cups par beechon-beech, jahan nipple hote hain, chhote-chhote chhed bane hue the, jo kisi bhi patle kapde ke aar-paar sab kuchh numayan karne ke liye kafi the. Lal rang ki panty, jo mahaj ek mamuli si G-string thi, jismein badan dhakne ke naam par sirf patle dhage the. Ek safed rang ka blouse aur uske saath ek lal rang ka skirt, jo mini skirt se toh thoda lamba tha, lekin ghutnon se kafi upar tha. Anita ne apni zindagi mein kabhi itne chhote aur bebak kapde nahi pahne the. Anita ne us tang aur hawas bhare antahvastron ko dekha toh uski rooh kaamp gayi. Woh rone jaisi hokar boli, "Karim... please... main yeh sab pahankar bahar kaise jaungi? Log kya kahenge? Raj ko pata chal gaya toh..." "Raj bhaiya ko kuchh pata nahi chalega malkin," Karim ne uski baat beech mein hi kaatte hue apni bhaari aur sakht aawaz mein kaha. Woh Anita ke kareeb aaya aur uski thuddi ko ungliyon se bheenchte hue bola, "Kal ka wada bhool gayin? Ab aapki marzi nahi, is Karim ka hukum chalega. Seedhe-seedhe yeh lal G-string aur yeh chhed wali bra chadhaiye apne is gore badan par. Upar se yeh skirt aur blouse pahankar aadhe ghante mein neeche aaiye. Aaj cinemaghar mein is Karim ko apni girlfriend ka yahi roop dekhna hai. Karim itna kahkar ek shaitani hansi hansta hua kamre se bahar nikal gaya, aur Anita bed par un lal aur safed kapdon ko dekhkar apni bebasi par aansu bahane lagi. ------------ Anita ne band kamre mein kaampte hathon se un kapdon ko apne badan par chadhaya. Jab usne aaine mein khud ko dekha, toh sharm ke mare uski aankhen band ho gayin. Woh pardarshi safed shirt aur ghutnon se kafi upar ki woh lal skirt uske wajood ko poori tarah dhakne mein nakam the. Bhaari kadmon se, apni dhadkanon ko thame woh kamre se bahar aayi, jahan Karim hall mein sofa par pair phailaye uska intezar kar raha tha. Jaise hi Anita samne aakar khadi hui, Karim ki najrein uske gore badan par chipak gayin. Uske chehre par ek santusht muskaan ubhar aayi. Karim apni jagah se utha aur hukumbhari aawaz mein bola, "Hath upar uthaiye malkin! Zara hum bhi toh dekhein ki hamari chuni hui poshak is badan par kaisi khil rahi hai. Poora muayana karenge aaj." Anita ki aankhon se bebasi ka ek aansu tapka, lekin apne wade ke aage majboor hokar usne dheere-dheere apne dono hath upar utha diye. Hath upar uthte hi uski safed shirt upar khinch gayi aur uska nanga pet najar aane laga. Karim uske bilkul kareeb aaya. Uski nigah Anita ki shirt aur mini skirt ke beech bikhre us nange pet par padi. "Kitna gora hai yeh..." Karim ke muh se bebak tareef nikli aur usne dheere se Anita ke pet par apna bhaari hath tika diya. Anita ki twacha itni chikni aur makhmali thi ki Karim ka khurdura hath us par mom ki tarah phisal raha tha. Karim ki ungliyon ki us pehli dheemi aur sahlati hui chhoan ka ahsaas Anita ke liye bahut hi alag aur anokha tha. Anita ko apne us nange pet par Karim ke hath ka sparsh hazar watt ke current ki tarah mehsus hua. Karim ki ungliyon ki sahlati hui chhoan ka ahsaas Anita ke liye bahut hi anokha tha; uska poora badan us sansani se kaamp utha. Us anchahe aur reshmi ahsaas ke asar se Anita ke muh se anjaane mein hi ek dabi hui, madhosh kar dene wali marmagya siski nikal gayi— "Oh God... Karim, yeh kya kar rahe ho..." Karim ne Anita ke pet par apni ungliyon ki jakad thodi aur bebak karte hue uske chehre ki taraf dekha. Karim (Anita ke kaan ke paas apni garam aur bhaari saansen chhodge hue): "Apni girlfriend ko sahla raha hoon darling... ab koi jaldbaazi nahi hai. Aaj ke baad se aap na toh koi Anita beti hain, aur na hi is ghar ki raees Anita malkin. Aap bas meri Anita hain... sirf aur sirf is Karim ki." Karim ne apne dono hathon se Anita ki safed shirt ke nichle dono konon ko pakda aur Anita ke theek nabhi ke upar ek tight gaanth baandh di. Shirt ke upar chadhte hi Anita ka gora, sudaul aur reshmi pet ab poori tarah beparda hokar nikhar aaya. Shirt ki us gaanth aur neeche lal skirt ke beech Anita ke nange pet ka ek bahut bada hissa khula rah gaya tha. Uski bedag, gori twacha aur nabhi ki gahrai roshni mein saaf chamak rahi thi. Anita apni is khuli hui nagnata ko dekhkar jhainp gayi aur kaampte hathon se us nange hisse ko dhakne ki nakam koshish karne lagi, lekin Karim ne ek muskaan ke saath uske hathon ko thaam liya. Karim ne Anita ke kaampte hathon ko thaam liya aur unhein uski nabhi se thoda door karte hue bhaari aawaz mein kaha, "Main apni Anita ko aise hi dekhna chahta hoon. Apne hath beech mein mat lao, Anita darling." Anita ka dil zor-zor se dhadak raha tha. Karim ka is tarah sareaam uske badan par apna poora hak jamana aur usse baar-baar 'darling' kahna usse andar tak jhakjhor raha tha. Phir Karim ki gahri aur hawas bhari nigah Anita ki us gori, bedag nabhi (dhuni) par jaakar tik gayi. Us kase hue pet ke beechon-beech nabhi ki woh sudaul gahrai dekhkar Karim ke chehre par ek chamak aa gayi. "Kya kayamat nazara hai..." Karim ke muh se bebak tareef nikli. Itna kahte hi Karim thoda neeche jhuka aur bina kisi hichkichahat ke Anita ki nabhi par apni garam aur geeli zubaan tika di. Usne bahut hi itmeenan se Anita ki nabhi ko chatna aur apni zubaan ki nok se uski gahrai ko khangalna shuru kar diya. Zubaan ka woh achanak, geela aur teekha sparsh Anita ke nange pet par bijli ke kadakne jaisa tha. Nabhi par hoti us sansani ne uske poore jism ki nason mein aag laga di. Anita ke muh se ek bekaabu, marmagya siski phoot padi— "Oh God..." Anita ki taangen kaampne lagin aur uski aankhen madhoshi mein band hone lagin. Bebasi aur us anchahi uttejana ke bawandar mein, Anita ke dono hath anjaane mein hi neeche jhuke Karim ke sir par chale gaye. Uski ungliyan khud-ba-khud Karim ke ghane aur khurdure baalon mein ulajhkar uske sir ko apni nabhi ki oor dabane lagin. Kareeb do minute tak Karim Anita ke us gore aur makhmali nange pet par apni geeli zubaan phirata raha. Uski zubaan kabhi nabhi ki gahrai mein ghoomti toh kabhi uske sudaul pet ke kinaron ko chatti hui upar shirt ki gaanth tak chali jaati. Us teekhe aur geele sparsh ki sansani Anita ke bardasht se bahar ho rahi thi. Uski aankhen madhoshi aur sharm ke mare poori tarah band theen, aur uske honton se lagataar marmagya siskiyan nikal rahi theen— "Uhh... Karim... Aahh..." Uska poora badan us anchahe sukh aur bebasi ki wajah se tharthara raha tha. Karim ke baalon mein ulajhi uski ungliyan kabhi usse door dhakelne ki nakam koshish karteen, toh kabhi usi uttejana mein uske sir ko aur kaskar apne pet se sata leteen. Phir Karim ne apna sir uthaya toh uski najrein us patli safed shirt ke aar-paar saaf jhalakti us lal bra par gayin. Shirt ka kapda itna maheen tha ki lal rang andar se poori tarah numayan ho raha tha. Bra ke cups mein bane un chhote chhedon ki wajah se Anita ke dono nipples bra se bahar nikalkar safed shirt ke patle kapde ko andar se dhakel rahe the. We uttejana ki wajah se poori tarah kade ho gaye the. We ubhre hue hisse saaf dikhai de rahe the. Karim (Anita ki aankhon mein jhankte hue, bhaari aur madhosh aawaz mein): "Dekho Anita... tumhare yeh nipples taras rahe hain mere paas aane ke liye. Kapda inki betaabi chhup nahi paa raha hai." Karim ne ek gahri saans li aur apni ungliyon se shirt ke upar se hi un sulagte hue kade hisson ko apni chutki mein pakda aur dheere se sahla diya. Us achanak aur teekhe sparsh se Anita ka poora badan sir se paon tak sihar utha aur uske kaampte honton se bebasi bhari siski nikli, "Bas... Karim..." Iske baad Karim ki najrein neeche utrein, jahan lal skirt ke neeche Anita ki nangi aur gori jaanghen poori tarah khuli hui theen. Ghutnon se bahut upar tak dikhti us bedag twacha ko dekhkar Karim ki aankhon mein hawas ki aag aur bhadak gayi. Woh Anita ke aur kareeb sata aur apne bade kale hathon se uski lal skirt ko dheere se upar ki oor utha diya. Skirt ke upar uthte hi Anita ka nichla hissa lagbhag poori tarah nagn ho gaya. Karim ki najrein uski jaanghon ke beech tikin, jahan woh lal rang ki G-string mahaj patle dhagon ke sahare uske nitambon aur guptang ke muhane ko bamushkil chhoo rahi thi. Aage ka gora hissa aur pichhe ke vishal koolhe us patli patti ke beech lagbhag poori tarah beparda chamak rahe the. Karim ne skirt ko waise hi uthaye rakha aur ek wahshi hansi hanste hue phusphusaya, "Kasam khuda ki malkin... is roop mein toh aap Raj bhaiya ki biwi nahi, balki is naukar ki rakhail lag rahi hain." "Karim... mat karo aise. Main in kapdon mein bahar kaise jaungi, agar kisi ne dekh liya toh?" Anita ki aawaz dar aur bebasi ke mare tharthara rahi thi, aur uski aankhen aansuon se bhar aayi theen. Karim ke chehre par ek sakht bhav aa gaya. Usne Anita ki aankhon mein jhankte hue kaha, "Pahle toh ye aansu nahi aane chahiye tumhare chehre par. Tabhi main tumhari baat par gaur karunga." Karim ka yeh hukum sunte hi Anita jaldi se apne dono hathon se gaalon par bahte aansuon ko ponchh liya aur Karim ki taraf apni bebas najron se dekhne lagi. Karim ne apni dono banhon ko seene par baandha aur apni gardan ko thoda tirchha karke Anita ko sir se paon tak dekha. Karim (asantosh bhare lahje mein): "Nahi malkin, maja nahi aaya... abhi bhi tumhare chehre par wahi bebasi aur khauf dikh raha hai. Tum kahin se bhi is Karim ki mashooka nahi lag rahi ho. Aur yaad rakhna, Karim sirf apni mashooka ki baat sunta hai, kisi roti hui malkin ki nahi." Karim ke in teekhe shabdon ka matlab Anita turant samajh gayi. Usse samajh aa gaya ki agar is sarvajanik beijjati se bachna hai ya Karim ko kisi baat ke liye raazi karna hai, toh usse dar ko dar-kinar karke Karim ki premika hone ka natak hi nahi, balki waisa bartav bhi karna padega. Anita ne ek gahri saans li. Usne apne kaampte chehre par zabardasti ek komal, katilana muskaan lane ki koshish ki. Usne apni palkon ko halka sa jhukaya aur apne najuk kadam Karim ki taraf badhaye. Usne apne dono hathon ko Karim ke chaode seene par rakh diya aur apni kajrari aankhon se uski aankhon mein dekha. Anita (apni aawaz mein ek banawti mithas aur najakat late hue): "Karim... darling, please meri baat suno na. Main bas itna chahti hoon ki hum dono ke beech jo kuchh bhi chal raha hai, jo ye khas rishta hai... uski bhanak kisi bhi tarah Raj ko na lage." Karim ne Anita ke apne seene par rakhe hathon ko mehsus kiya aur uski is achanak badli ada par uski aankhen hawas aur ghamand se chamak uthin. Usne Anita ki patli nangi kamar mein apna bhaari hath dalkar usse aur kareeb khinch liya. Karim (Anita ke honton ke behad kareeb apna chehra late hue, bhaari aawaz mein): "Achha? Toh hamari mashooka ko hamari phikra kam aur Raj bhaiya ka dar zyada hai?" Anita ka dil andar hi andar is chhoan se ghina raha tha, lekin usne apne chehre ki muskaan ko pheeka nahi padne diya. Anita (Karim ke kandhe par apna sir halka sa tikate hue, sehmi si aawaz mein): "Tum toh jaante hi ho Karim... agar Raj ne ya unke kisi jaane wale ne mujhe in kapdon mein bahar dekh liya, toh sab barbaad ho jayega. Tum jo kahoge main karungi, bas... bahar ke liye mujhe kuchh aisa pahne do jisse koi pehchan na sake." Karim ne Anita ki thodi ko apni do ungliyon se upar uthaya aur uske lal pad chuke honton ko ek pal ke liye ghoorkar dekha. Karim (ek vijayi muskaan ke saath): "Chalo, darling kaha hai toh tumhari baat par vichar karte hain." Karim ne Anita ki nangi kamar ko apne majboot hathon se sahlate hue usse jhatke se apni banhon mein khinch liya. Uska chaoda aur tapta hua seena Anita ke najuk badan se poori tarah sat gaya. Karim (Anita ke chehre par apni garam saansen chhodge hue, hawas bhari aawaz mein): "Anita darling... ab zara aage badho aur apne is Karim ko ek gahra kiss karo. Picture chalne se pahle mera dil kar raha hai ki apni is khoobsurat mashooka ke saath thoda pyar kar loon. Uske baad hi main khud taiyar hone jaunga." Anita ne Karim ki bhookhi aankhon mein dekha aur bina kisi virodh ke apne hont uske kale aur mote honton par tika diye. Shuruat mein toh woh yeh sab sirf ek natak ki tarah kar rahi thi taki Karim uski baat maan le, lekin Karim koi nausikhiya nahi tha. Jaise hi usne Anita ke najuk aur raseele honton ko apne dheet, khurdure aur garam honton ke beech bedardi se dabaya, uski geeli zubaan Anita ke muh ke har kone mein behad maharat se chalne lagi. Karim ki zubaan Anita ki komal zubaan se takrayi aur usse mathne lagi, jaise kisi pyase ne pehli baar koi meetha sharbat chakha ho. Beman aur sirf ek natak se shuru hua woh chumban achanak ek bekaabu, sulagti hui anchahi uttejana mein badalne laga. Karim ne ek wahshi muskaan ke saath uske honton par poori tarah se kabja kar liya. Uske mote hont kabhi Anita ke raseele honton ko halke se chooste, toh kabhi ekdam se poore zor ke saath un par haavi ho jaate, jaise kisi bhookhe shikari ne apna shikar daboch liya ho. Anita ke muh ka ras peete hue Karim ka yeh andaz usse poori tarah bebas bana raha tha. Usi pal uska ek bhaari hath Anita ki lal skirt ke neeche, uski nangi aur tapti hui jaanghon par ja tika. Uski kali moti ungliyan Anita ki makhmali, gori twacha par dheere-dheere upar ki oor sarakne lagin. Karim ki ungliyon ki us garam chhoan se Anita ke poore sharir mein ek teekhi, thandi siharan daud gayi aur uski taangen anjaane mein hi thodi dheeli padne lagin. Karim ne Anita ki nangi jaanghon par apni khurduri ungliyon ka dabav thoda aur badhate hue uske honton se apne hont hataye. Uski bhookhi aur hawas bhari najrein Anita ki lal skirt ke neeche ubhri gori rangat par tiki theen. Karim (madhosh aur bhaari aawaz mein, Anita ke gaalon se apna chehra satate hue): "Makhan hain aapki jaanghen... ungli phisal hi jaati hai. Kitni komal hai aapki skin, kitni gori..." Uske is bebak bayan aur nangi twacha par rengti uski kali ungliyon ne Anita ko sharm se lal kar diya. Wahin Karim ka doosra hath Anita ki patli safed shirt ke upar se hi uske ubhre hue sudaul stan par pahunch gaya. Bra ke chhedon se bahar nikle Anita ke kade nipples ko usne apni ungliyon ke beech daboocha aur chutki katte hue unhein bedardi se masalne laga. Us teekhe sparsh aur dard-mishrit sukh ke achanak mile ahsaas se Anita ka poora wajood kaamp utha. Uske gale se ek teekhi, dabi hui aah nikli, jo Karim ke muh ke bheetar hi ghutkar rah gayi— "Aahh... dheere Karim... dard hota hai..." Anita ne Karim ke honton ke beech hi sisakte hue guhaar lagayi. Karim ka muh Anita ke komal honton ko poori tarah se nigal chuka tha. Woh Anita ki nangi kamar ko apni oor itna kasta chala gaya ki Anita ke ubhre hue seene aur uski nangi jaanghon ka har hissa Karim ke kathor aur tapte jism se sat gaya. Anita ka poora badan us chhoan ke aage samarpana karne laga tha; uske thartharate hath ab khud-ba-khud Karim ke chaode kandhon ko jakadne lage the. Kuchh palon tak Anita ko apni banhon mein is kadar bheenchne aur uski sudh-budh chheenne ke baad, Karim ne badi mushkil se apne hont pichhe hataye. Anita ke hont uski ukhdi hui saanson ke saath kaamp rahe the. Karim ne ek vijayi aur madhosh muskaan ke saath Anita ke bahke hue gaal par pyar se hath phera aur bhaari aawaz mein aage bola. Karim (vijayi lahje mein): "Aur सुनो darling, bahar ki phikra chhode do. Mainne apne ek dost se baat kar li hai, hum uski motorcycle par sawaar hokar picture dekhne jaenge. Tum apne chehre ko scarf ya rumal se achhi tarah dhak lena... kisi ko kanon-kan khabar nahi hogi ki yeh raees malkin is kale Karim ki motorcycle par pichhe satkar baithi hai." Yeh sunte hi Anita ke man se Raj ke dekh lene ka khauf thoda kam hua, lekin ek naukar ki motorcycle par is chhote skirt aur tang bra mein pichhe baithkar jaane ke ahsaas ne uske badan mein siharan paida kar di. ------------- Karim ne Anita ko kamre mein usi bahki hui halat mein chhoda, apne kapde thode theek kiye aur seedhe apne jigari dost Shankar ke kamre ki taraf badh gaya. Shankar umra mein Karim ke hi barabar tha aur dono ki aapas mein kafi jamti thi. Samne Karim ko aata dekh Shankar ne apne hath mein pakdi beedi ka ek lamba sutta khincha aur dhuen ka gubaar chhodge hue hanskar bola, "Abe Karim! Aaj kidhar se Sooraj nikal aaya be? Badi tej chaal mein aa raha hai, chehre par toh alag hi chamak bikhri padi hai!" Karim ne paas aakar Shankar ke kandhe par ek thapki maari aur seedhe mudde par aate hue kaha, "Abe chamak-wamak chhode, teri motorcycle ki chabi nikal zara. Urgent kaam aa gaya hai." Shankar ne apni aankhen matkate hue chabi apni jeb mein kaskar pakad li aur chidhane wale lahje mein bola, "Abe-abe, tham ja bhai! Hawa mein ud raha hai kya? Achanak motorcycle ki kya zaroorat pad gayi? Aur wo bhi is time? Baat kya hai be? Kahin koi nai setting toh nahi pata li?" Karim ne hanste hue Shankar ki baat ko hawa mein uraya, "Abe teri toh sui hamesha wahin jaake atakti hai! Kaam hai zara shahar ki taraf, ek zaroori saman lekar aana hai. De chabi chupchap, zyada CID mat ban." "Achha bachha! Mujhse chhupayega?" Shankar ne nakli narazgi dikhate hue chabi jeb se nikali aur ungli mein ghoomate hue Karim ke kareeb aaya, "Dekh bhai, meri kali ghodi ki sawari aise hi muft mein nahi मिलती. Sach-sach bata, chakkar kya hai? Nahi toh chabi bhool ja." Karim ne jhatke se Shankar ke hath se chabi lapak li aur aankh maarte hue bola, "Abe sab sach bata dunga toh najar nahi lag jayegi teri? Shaam ko aaunga toh teri beedi ka bundle aur ek cutting chai meri taraf se pakki. Ab raaste se hat, mujhe der ho rahi hai!" Shankar ne hanste hue Karim ki peeth par ek ghoonsa mara, "Saale harami! Kaam nikalte hi bhaag raha hai. Ja le ja, par gaadi dhyan se chalana, meri jaan basti hai usmein!" Karim ne chabi jeb mein dali, kali motorcycle ko kick maari aur ek zordaar dhuand chhodge hue wapas Anita ke bangle ki taraf mod diya. --------------- Karim ne yeh kali motorcycle koi ittefaq se nahi, balki poori planning ke saath chuni thi. Shankar ki yeh motorcycle Karim ka purana aur parkha hua hathiyar thi. Is motorcycle ki pichhe wali seat kafi oonchi aur aage ki taraf dhalan wali thi. Is banawat ki wajah se pichhe baithne wale insan ka poora wajan apne aap aage ki taraf sarak aata tha, jisse woh chahkar bhi driver ki peeth se chipakkar baithne par majboor ho jata tha. Karim ko jab bhi kisi aurat ko apne saath ghoomane le jaana hota ya apni najdeeki badhani hoti, toh woh hamesha bahana banakar Shankar se yahi motorcycle maang kar laata tha. Itna hi nahi, is motorcycle ke pichhle hisse par pakad banane ke liye koi handle ya support bar bhi nahi tha. Pichhe baithne wali sawari ke paas santulan banaye rakhne ke liye sirf do hi raaste bachte the—ya toh woh apni dono banhen driver ki kamar mein dalkar usse kaskar jakad le, ya phir apne dono hath uski chhati ya kandhon par tikakar bilkul usse satkar baithi rahe. Karim man hi man muskuraya, yeh sochkar ki jab Anita is oonchi seat par apni nangi jaanghon aur chhoti skirt ke saath uske pichhe baithegi, toh raftar ke har jhatke ke saath uska poora najuk badan uski peeth par kis kadar pighlega. Shankar se chabi lene ke baad Karim seedhe apne naukar wale quarter mein pahuncha. Uske sir par aaj ek alag hi nasha sawaar tha. Usne jaldi-jaldi ek badhiya phawware se snan kiya aur apne daanton ko achhi tarah brush kiya taki muh se zara si bhi badboo na aaye. Nahane ke baad, Karim ne apni almari ke ek kone se itra ki ek mahangi sheeshi nikali—yeh wahi perfume tha jo usne kuchh din pahle Raj sahab ki wardrobe se chupchap churaya tha. Karim ne us mahange perfume ko apni gardan, chaode seene aur baglon par dil kholkar chhidka. Perfume ki tej, mardana aur raeesana khushboo se uska poora quarter mahak utha. Apni nangi chhati par hath pherte hue aur perfume ki sheeshi ko dekhte hue Karim ke honton par ek bahut hi wahshi aur ayyaash muskaan tair gayi. Karim (man hi man hanste hue, budbudaya): "Wah Karim bhai... kya kismat paayi hai! Perfume bhi Raj sir ka, biwi bhi Raj sahab ki... aur aash is kale Karim ki!" Iske baad usne apni almari se apni sabse badhiya wali neeli jeans nikali aur usse kaskar pehan liya. Lekin upar pehanne ke liye usne bahut hi chalaki se apni sabse patli t-shirt chuni. Woh t-shirt itni maheen thi ki sharir se poori tarah chipki rahti thi. Karim ne yeh jaan-boojhkar kiya tha; woh achhi tarah jaanta tha ki jab oonchi seat wali motorcycle par raaste ke jhatkon ke saath Anita uske pichhe chipkegi, toh us patli t-shirt ke paar se uski peeth par Anita ke sulagte aur kase hue mammon ka ek-ek ubhar saaf mehsus hoga. Poori tarah taiyar hokar, apni moonchhon par taav dete hue, Karim behad aainth aur aatmavishwas ke saath bangle ki oor badh gaya. ---------- Udhar kamre mein Anita sheeshe ke samne khadi hokar apne is roop ko dekh-dekhkar behad pareshan aur sharminda ho rahi thi. Safed patli shirt, jiski nabhi ke upar bandhi gaanth se uska poora gora pet beparda tha, aur neeche woh lal rang ki behad chhoti mini skirt—in kapdon mein khud ko dekhna bhi uske liye doobhar ho raha tha. Lekin ab uske paas is chakravyuh se nikalne ka koi doosra vikalp bhi nahi tha. Tabhi usse khayal aaya ki agar Raj ne achanak ghar par phone kar diya aur woh gayab mili, toh bahut bada bawandar khada ho jayega. Kaampte hathon se usne apna mobile uthaya aur Raj ka number milaya. Doosri taraf se phone uthte hi Raj ki pyar bhari aawaz sunai di, "Hello Anita! Kaisi ho darling? Sab theek hai na?" Anita ne apni ukhdi hui saanson ko kaabu mein karne ki koshish ki aur bhaari aawaz mein boli, "Haan Raj... sab theek hai. Main... main soch rahi thi ki zara shahar jaakar kuchh shopping kar aaun. Ghar mein baithe-baithe bahut boriyat ho rahi thi." "Achha? Yeh toh bahut achhi baat hai Anita. Tumhein thoda bahar ghoom bhi aana chahiye," Raj ne bahut hi sahaj aur befikra andaz mein kaha. "Lekin tum jaogi kaise?" Anita ka dil zor-zor se dhadakne laga. Jhooth bolte waqt uski zubaan ladkhadane lagi, lekin usne khud ko sambhalte hue kaha, "Main... main Karim ko saath le ja rahi hoon. Hum bahar se auto kar lenge. Wo saath rahega toh saman uthane mein bhi madad ho jayegi." "Haha, bilkul theek sochha tumne darling!" Raj hanste hue bola. "Karim saath tumhein koi dikkat nahi hogi. Aaram se shopping karo aur haan... apne liye kuchh badhiya sa dress zaroor le lena. Aur koi chinta mat karna, theek hai?" "Thank you Raj... apna dhyan rakhna," Anita ne behad dheemi aawaz mein kaha. "Tum bhi darling, bye!" kahkar Raj ne phone kaat diya. Phone disconnect hote hi Anita ne apni chhati par hath rakh liya. Uska dil aparadhbodh se buri tarah baitha ja raha tha. Raj us par kitna andha bharosa karta tha, usse Karim jaise naukar ke saath befikra hokar bhejne ko taiyar ho gaya tha... aur yahan woh usi Raj se itna bada jhooth bol rahi thi. Apni nagnata aur is dhokhe ke ahsaas se Anita ki aankhon mein gilani ke aansu chhalak aaye, lekin waqt ki tik-tik usse yaad dila rahi thi ki ab Karim kisi bhi pal aane hi wala hai. ----------- Udhar apne quarter mein baitha Shankar lagataar beedi ke kas khinchte hue gahrai se kuchh soch raha tha. Uske dimaag mein Karim ke chehre ka wo josh aur betaabi baar-baar ghoom rahi thi. Yeh pehli baar tha jab Karim ne usse koi baat chhupane ki nakam koshish ki thi. Warna dono ke beech kabhi koi parda nahi raha. Shahar ki tang galiyon se lekar gaon ki pagdandiyon tak, dono ne na jaane kitni raseeli aurton ka ek saath shikar kiya tha. Kai baar Karim ki phansai hui garam aurton ko Shankar ne chakha tha, toh kabhi Shankar ki patai hui jismon par Karim ne apna paani bahaya tha. Dono ka yeh ghinona aur nanga hisab-kitab barson purana tha. Shankar ne angoothe se beedi ki raakh jhaadi aur man hi man budbudaya, "Saale Karim ki chaal hi badal gayi hai aaj... zaroor kisi bahut bade aur bhaari maal par hath mara hai isne! Warna itni aainth mein chabi jhatapkar nahi bhaagta. Maamla bahut garam hai." Sochte-sochte Shankar ke pet mein chul machne lagi. Uske bheetar ka haramipan aur hawas uphan maarne lagi. Usne apni purani auto-rickshaw nikali, usmein kick maari aur dheere-dheere us bade bangle ki taraf badha jahan Karim caretaker ka kaam karta tha. Bangle se thodi door pahle hi, ek ghane ped ki chhaon mein usne auto is tarah khada kiya ki sadak se koi usse pehchan na paaye. Driving seat par baithkar, beedi ka bacha hua guttha honton mein dabaye, Shankar purani baatein tatolne laga. Abhi hafte-das din pahle ki toh baat hai, jab Karim daaru ke peg khinchte hue bata raha tha ki bangle ke guest house mein koi bahut hi kayamat cheez rahne aayi hai—ekdam gori-chitti, kasi hui aur raees madam, jo apne sahab ke saath wahan thahri hui thi. Shankar ke dimaag mein achanak ek bijli si kaundhi, "Abe kahin saale Karim ne us raees madam ko toh nahi pata liya?? Nahi-nahi...! Yeh kaise ho sakta hai? Kahan hum jaise phatehaal, nange-bhookhe gareeb aur kahan wo sahab ki khoobsurat malkin!" Lekin phir Shankar ke chehre par ek kutil muskaan phail gayi, "Par Karim saala cheez bahut chaalu hai... agar usne sach mein madam par hath saaf kar diya hoga, toh aaj mujhe bhi us garam maal ka jalwa dekhna hi padega." Shankar auto ki seat par thoda aage hokar, apni najron ko seedhe bangle ke mukhya gate par tikakar Karim ke bahar nikalne ka intezar karne laga.
Deepak Kapoor
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