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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
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15-09-2026, 05:54 PM
What happened…
15-09-2026, 10:21 PM
Bro Waiting for ur update..daily i m checking this feed. Pls post ur awesome writings
16-09-2026, 12:04 PM
(31-08-2026, 04:33 PM)Rizzi1198 Wrote: Wahh yar fantastic kia zabardast trap kia hai lagta hai sher se zayda chandan meera ka mazay lega (02-09-2026, 11:53 AM)Qutub Minar Wrote: Really nice build up of story for past 2 updates, (03-09-2026, 09:52 AM)Shabaz123 Wrote: Awesome superb excellent update (12-09-2026, 07:31 AM)xossipy1968 Wrote: waiting for new update ..... (13-09-2026, 10:47 PM)anushka Wrote: Waiting for long update… (14-09-2026, 09:11 PM)sun500 Wrote: waiting for reply (15-09-2026, 05:54 PM)anushka Wrote: What happened… (15-09-2026, 10:21 PM)Maniverse Wrote: Bro Waiting for ur update..daily i m checking this feed. Pls post ur awesome writings Thanks for your comments and ideas . working on next update , maybe by weekend it will be ready .
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
16-09-2026, 11:00 PM
Amazing writing skills.... superb.... eagerly waiting for next.....
17-09-2026, 05:10 AM
(02-09-2026, 11:53 AM)Qutub Minar Wrote: Really nice build up of story for past 2 updates, Also the tantrik angle got lost, need to re introduce that, -- will come in next chapters . This is like a game of chess; each guy is planning moves ahead.
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
18-09-2026, 05:12 AM
नया मोड़ —5
जैसे ही शेर किसी काम से बाहर गया और चंदन बाबा को मौका मिला, उन्होंने तुरंत बेसिन का नल खोलकर बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। बहते पानी की सरसराहट के बीच, कांपते हाथों और उखड़ी हुई साँसों के साथ उन्होंने जेब से फोन निकालकर सरताज का नंबर मिलाया। दूसरी तरफ जैसे ही सरताज ने कॉल उठाई, चंदन बाबा की आवाज़ कांप रही थी। चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "सरताज... बेटा, मैं बहुत बड़े धर्मसंकट में फँस गया हूँ! मेरा मन निरंतर बेचैन हो रहा है। यह शेर जितना हम सोच रहे थे, उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक इंसान है।" सरताज की रीढ़ में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। सरताज (अत्यंत गंभीरता और चिंता के साथ): "बाबा, पहले आप खुद को संभालिए। शांत होकर बताइए, आख़िर ऐसा क्या हुआ?" चंदन बाबा ने भारी झिझक, घबराहट और आत्म-ग्लानि के साथ अपनी ज़ुबान खोली। उनका गला पूरी तरह सूख रहा था और छाती में सांसें अटक रही थीं। अपनी ही बहू-बेटी समान मीरा के प्रति कहे गए उन घिनौने शब्दों को दोहराना—वह भी सरताज के सामने, जो उसका पति है—उनके लिए एक अत्यंत कठिन काम था। चंदन बाबा (अत्यंत संकोच और हकलाते हुए): "सरताज... वह... वह नीच, अधर्मी शेर मीरा बिटिया से सिर्फ़ आकर्षित नहीं है, उसके दिल में मीरा के लिए अंधी नफ़रत भरी पड़ी है। वह... वह बेझिझक कह रहा था कि वह मीरा को पूरी तरह अपनी रखैल बनाकर छोड़ेगा। उसकी हवस की कोई सीमा नहीं है बेटा... इतना ही नहीं..." चंदन बाबा की आवाज़ में एक अजीब-सा सन्नाटा छा गया। वे ज़ोर-ज़ोर से हांफने लगे। सरताज (उतावलेपन और बढ़ती घबराहट में): "बाबा! रुकिए मत, साफ़-साफ़ बताइए और क्या कहा उस दंभी ने? वह मीरा के साथ और क्या साज़िश रच रहा है?" चंदन बाबा (आँखों से बहते आँसुओं को पोंछते हुए, घुटती हुई आवाज़ में): "बेटा... वह हैवान कह रहा था कि वह सिर्फ़ मीरा की देह का सुख नहीं छीनेगा।" सरताज फोन को कसकर भींचे खामोश रहा, उसकी सांसों की गर्माहट फोन के स्पीकर पर साफ़ सुनाई दे रही थी। चंदन बाबा (आगे बोले): "वह उसके स्वाभिमान और चरित्र को पूरी तरह तार-तार करके रख देना चाहता है।" सरताज (दाँत पीसते हुए, भारी आवाज़ में): "और क्या कह रहा था वह, बाबा?" चंदन बाबा (कांपते हुए): "वह... वह कह रहा था कि वह मीरा के जिस्म पर अपनी मुहर लगाएगा। ऐसी मुहर, कि वह दुनिया के सामने कभी अपना सर न उठा सके।" सरताज की आँखों में खून उतर आया, लेकिन उसने खुद पर काबू रखते हुए कहा, "हूँ... आप बोलते रहिए बाबा, मैं सुन रहा हूँ।" चंदन बाबा (सिसकते हुए): "उसका मक़सद सिर्फ़ उसकी देह को पाना नहीं है बेटा... वह तो उसके पूरे वजूद को मटियामेट कर देना चाहता है!" सरताज के हाथ में पकड़ा हुआ फोन कसता चला गया, उसकी उँगलियों के जोड़ सफ़ेद पड़ गए और आँखों में लाल डोरे उतर आए। उसकी धमनियों में ख़ून उबलने लगा। सरताज (दाँत पीसते हुए, बेहद कठोर आवाज़ में): "उस नीच दरिंदे की यह दुस्साहस! बाबा, आप बस एक बात का ध्यान रखिए—क्या उसे ज़रा भी भनक लगी है कि आप मुझसे संपर्क में हैं? या फिर उसने यह सब बातें आपके सामने महज़ अपना ख़ौफ़ और धौंस जमाने के लिए कही हैं?" चंदन बाबा (डर से कांपते हुए बाथरूम के दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए): "नहीं बेटा, उसे मुझ पर पूरा भरोसा है कि मैं उसका वफ़ादार बन चुका हूँ। लेकिन उसकी बातें सुनकर मेरी रूह कांप उठी है।" चंदन बाबा की आवाज़ शर्म और आत्म-ग्लानि से दब गई, पर उन्होंने खुद को सँभालते हुए आगे बताना शुरू किया। चंदन बाबा (सिसकते हुए): "बेटा... उसने मुझे अपनी तरफ़ करने के लिए मीरा की सोई हुई हालत की कुछ बेहद बेपर्दा तस्वीरें दिखाईं..." सरताज के सीने में मानो आग सी जल उठी, उसने अपनी मुट्ठियाँ भींचते हुए कहा, "बेपर्दा तस्वीरें? चंदन बाबा (हकलाते हुए, गला रूँध जाता है): "और... और मुझसे कहा कि वह मुझे भी उसके साथ... उस घिनौने काम में शामिल करेगा..." सरताज (अत्यंत कठोर और ठंडे स्वर में): "और?" चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "उसकी शर्त है कि जब यह सब हो... तो मैं उसे 'मीरा बिटिया' कहकर ही पुकारूँ। सरताज... उसके दिमाग में कोई भयंकर इंतकाम की आग जल रही है!" सरताज फोन की दूसरी तरफ बिल्कुल शांत रहा, लेकिन आँखें गुस्से से लाल हो गईं। उसकी धमनियों में खून खौल रहा था। अगर इस वक्त शेर उसके सामने आ जाता, तो सरताज बिना एक पल गँवाए अपने नंगे हाथों से उसके जिस्म के हज़ार टुकड़े कर देता। सरताज (अत्यंत शांत लेकिन गहरे लहज़े में): "बाबा, आपने बहुत हिम्मत का काम किया है जो यह सब सहकर भी उससे इतनी बातें निकलवा लीं।" चंदन बाबा (फोन पर हल्की राहत की साँस लेते हुए): "बस बेटा... जैसे-तैसे खुद को संभाले हुए हूँ।" सरताज (गंभीरता से): "हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि आख़िर वह मीरा से इतनी अंधी नफ़रत क्यों करता है।" चंदन बाबा (सहमते हुए): "हाँ बेटा, उसकी नफ़रत के पीछे कोई बहुत पुरानी वजह लगती है।" सरताज (आगे हिदायत देते हुए): "अगली बार जब वह आपसे बात करे, तो यह पता करने की कोशिश कीजिएगा कि क्या वह मुझसे भी उतनी ही नफ़रत करता है... या मुझसे उसकी दुश्मनी उससे भी ज़्यादा है।" चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "ठीक है बेटा... मैं पूरी कोशिश करूँगा।" सरताज (धीमे पर बेहद सधे हुए स्वर में): "आप बस उसके सामने अपना नाटक जारी रखिए और खुद को बिल्कुल टूटने मत दीजिए। मैं बहुत जल्द उस नीच की पूरी कुंडली निकालकर सब कुछ पता लगाता हूँ।" सरताज ने फिर कुछ क्षण सोचते हुए कहा, "बाबा, क्या आप मुझे मीरा की वे तस्वीरें भेज सकते हैं?" चंदन बाबा ने कांपते हाथों से व्हाट्सएप के ज़रिए वे तस्वीरें सरताज को भेज दीं। फिर कुछ देर गहरा विचार करने के बाद, उन्होंने भारी मन से सरताज से कहा। चंदन बाबा (फोन पर भारी ग्लानि और संकोच से भरी आवाज़ में): "सरताज बेटा, एक और ज़रूरी बात है..." सरताज (धीमी आवाज़ में): "बोलिए बाबा, मैं सुन रहा हूँ।" चंदन बाबा (झिझकते हुए): "उस दरिंदे का विश्वास पूरी तरह जीतने के लिए... मुझे उसका साथ निभाते वक्त मीरा बिटिया के लिए बहुत गलत और ओछे शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।" सरताज फोन के दूसरी तरफ बिल्कुल खामोश रहा, पर चंदन बाबा ने अपनी बात जारी रखी। चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "तभी वह मुझे पूरी तरह अपना समझेगा, और मैं उन तस्वीरों के बहाने उसके और राज़ उगलवा पाऊँगा।" चंदन बाबा (गला रूँधते हुए): "आज भी उसने मुझे वे तस्वीरें दिखाते हुए कहा कि वह मीरा बिटिया के साथ क्या-क्या करेगा... और बेटा, मुझे उस वक्त अपना रोल निभाने के लिए... खुद अपने मुँह से बहुत ही गंदे और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा।" सरताज (गहरी साँस लेते हुए): "आप पर क्या बीत रही है, मैं समझ सकता हूँ बाबा..." बाबा थोड़ा रुके, अपनी शर्म और ग्लानि के घूँट को पीते हुए आगे बोले। चंदन बाबा: "एक और बात मैंने गौर की है सरताज... वह तेरे नाम से ज़रा भी नहीं डरता।" सरताज (चौंकते हुए): "मेरे नाम से भी नहीं? यानी उसे सिक्युरिटी का या मेरा कोई ख़ौफ़ नहीं है?" चंदन बाबा (गंभीरता से): "बिलकुल नहीं! इसका सीधा मतलब यही है कि उसके पास मीरा की इन तस्वीरों के अलावा भी कोई बहुत बड़ा 'लीवरेज' है, जिसके दम पर वह इतना बेखौफ़ घूम रहा है।" सरताज (दाँत पीसते हुए): "हुँह... बात तो आपकी सही है बाबा। उस नीच के पास यकीनन कोई और बड़ा मोहरा है।" चंदन बाबा (कांपती और शर्मिंदा आवाज़ में): "पर बेटा... उस दरिंदे को झांसा देने के लिए, शायद मुझे अपनी मर्यादा की हर सीमा को लांघना पड़े। अनचाहे ही सही, पर मेरे मुँह से मीरा बिटिया के लिए बहुत घिनौने शब्द निकलेंगे।" सरताज (शांत रहते हुए): "आप घबराइए मत बाबा, आप आगे बोलिए..." चंदन बाबा (अत्यंत घबराए और गिड़गिड़ाते हुए स्वर में): "सरताज... बात सिर्फ़ शब्दों तक रहे तो ठीक है, पर हो सकता है कि वह हैवान मेरा इम्तिहान लेने या अपना विश्वास पक्का करने के लिए... मुझे मीरा बिटिया को ग़लत तरीक़े से छूने के लिए भी कहे! अब तू ही बता बेटा, तेरा यह बाबा क्या करे?" सरताज ने फोन हाथ में थामे कुछ पलों के लिए गहरी ख़ामोशी साधे रखी। उसका तेज़ तर्रार आईपीएस दिमाग़ तेज़ी से हर पहलू, ख़तरे और चाल का आकलन कर रहा था। वह अच्छी तरह समझ गया था कि अगर शेर का भरोसा पूरी तरह जीतना है, तो चंदन बाबा को इस घिनौने खेल में पूरी तरह डूबने का नाटक करना ही पड़ेगा। शेर के पास तस्वीरों से भी बढ़कर कोई बहुत बड़ा 'लीवरेज' था, और उस आख़िरी और सबसे बड़े राज़ तक पहुँचने का इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। सरताज ने एक गहरी साँस छोड़ी और बेहद गंभीर आवाज़ में बोला, "बाबा... आप जो कह रहे हैं, मैं सब समझ रहा हूँ। यह राह बेहद कठिन है और आपकी मर्यादा, चरित्र तथा आत्मबल की सबसे बड़ी परीक्षा लेगी, लेकिन इस वक्त हमारे पास और कोई चारा नहीं है। मेरी तरफ से आपको इस नाटक को आगे बढ़ाने की पूरी इजाज़त है।" फोन की दूसरी तरफ चंदन बाबा ने राहत की एक मिली-जुली साँस ली। सरताज (हिदायत देते हुए, सधी आवाज़ में): "बाबा, आप शेर के सामने वही बनिए जो वह आपको देखना चाहता है।" चंदन बाबा (फोन पर भारी मन से सुनत हुए): "हाँ बेटा..." सरताज: "अगर उसके सामने मीरा के लिए ग़लत शब्द भी बोलने पड़ें, तो बिल्कुल मत झिझकिए।" चंदन बाबा (हिचकिचाते हुए): "पर बेटा, मेरी ज़ुबान..." सरताज (टोकते हुए, गंभीर स्वर में): "आपको यह कड़वा घूँट पीना ही होगा बाबा। हमें हर हाल में यह जानना है कि इन तस्वीरों के अलावा उस नीच के हाथ में ऐसा कौन सा ब्लैकमेलिंग का हथियार है, जिसके दम पर वह इतना बेखौफ़ घूम रहा है।" चंदन बाबा (कांपती सांस छोड़ते हुए): "समझ गया बेटा।" सरताज (ताकीद करते हुए): "बस अपने मन पर काबू रखिएगा, अपनी नीयत को किसी भी हाल में डगमगाने मत दीजिएगा... और शेर की हर छोटी-बड़ी हरकत की ख़बर मुझ तक पहुँचाते रहिएगा।" चंदन बाबा ने कांपते हाथों से कॉल काटी और फोन बंद कर लिया। सरताज की तरफ से हरी झंडी तो मिल चुकी थी, लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा था—कि इस ख़तरनाक नाटक को निभाते-निभाते, कहीं उनका अपना भटकता हुआ मन सचमुच पाप की उस दलदल में पूरी तरह न डूब जाए। कॉल कटने के बाद, सरताज ने अपने फोन की स्क्रीन पर उभरी उन तस्वीरों को ध्यान से देखना शुरू किया। पहली नज़र में तो सिर्फ़ इतना ही दिख रहा था कि मीरा बेखबर सो रही है। लेकिन जब सरताज ने ज़ूम करके बैकग्राउंड को करीब से देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तस्वीरों में नज़र आ रही दीवारें, पर्दों की सलवटें और नाइटस्टैंड—सब कुछ उसी के अपने बेडरूम का था! उसकी निगाहें अब मीरा के कपड़ों पर टिक गईं। एक गहरा झटका उसके ज़हन में लगा—यह वही नाइटी थी जो मीरा ने ठीक दो रात पहले पहनी थी! वही रात, जब आधी रात को अचानक इमरजेंसी ड्यूटी की वजह से उसे घर छोड़कर जाना पड़ा था। इसका सीधा मतलब यह था कि सरताज के घर से निकलते ही, आधी रात के सन्नाटे में शेर उसके बेडरूम में दाखिल हुआ था। सरताज का माथा भिनभिना उठा। कई ज़हरीले सवाल एक साथ उसके दिमाग में कौंधने लगे—क्या उस दरिंदे ने सिर्फ़ तस्वीरें खींचकर ही दम लिया? क्या उसके पास इससे भी ज़्यादा आपत्तिजनक और बेपर्दा तस्वीरें हैं? या फिर... उसने सोई हुई मीरा के साथ तस्वीरों से भी ज़्यादा कुछ खौफनाक और घिनौना किया था? लेकिन मीरा... मीरा तो पिछले दो दिनों से बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थी। क्या इसका मतलब यह था कि वह इस पूरी वारदात से पूरी तरह बेखबर थी? क्या उसे भनक तक नहीं लगी कि कोई उसकी आबरू पर डाका डालकर चला गया? तस्वीरों को और ध्यान से देखते हुए, सरताज को अब चंदन बाबा के धर्मसंकट की गहराई का पूरी तरह अहसास हुआ। इस उम्र में बाबा को अपनी ही बहू-बेटी समान मीरा की ऐसी बेपर्दा और आपत्तिजनक तस्वीरें देखने पर मजबूर किया जा रहा था, और ऊपर से उस दरिंदे द्वारा उनसे पूछा जा रहा था कि वे उसके साथ क्या-क्या करना चाहेंगे! क्या शेर बाबा के मन को पूरी तरह भ्रष्ट करने की साज़िश रच रहा था? या फिर उसे बाबा पर शक था और वह इसे एक इम्तिहान की तरह इस्तेमाल कर रहा था? यह सब सोचते-सोचते सरताज का दिमाग फटने लगा था। "वह मेरे आईपीएस के रुतबे से भी नहीं डरता... उसके पास यकीनन कुछ ऐसा ठोस 'लीवरेज' है, जिसके दम पर वह इतना बेखौफ़ होकर मेरे ही घर में सेंध लगा रहा है!" सरताज ने दाँत पीसते हुए खुद से कहा। कुछ पल गहरा विचार करने के बाद, उसने तुरंत अपना फोन उठाया और अपने खास मुखबिरों को शेर की पूरी बैकग्राउंड जाँच करने का हुक्म दिया। साथ ही, उसने शेर के फोन कॉल्स को सर्विलांस पर डालने के निर्देश दिए। इसके तुरंत बाद, उसने साइबर क्राइम यूनिट में तैनात अपने एक बेहद भरोसेमंद दोस्त को कॉल मिलाया। उसने शेर का फोन हैक करके उसके अंदर का सारा प्राइवेट डेटा, तस्वीरें और चैट निकालने को कहा। सरताज ने साफ़ ताकीद की कि यह काम पूरी तरह अनऑफिशियल होना चाहिए—वह खुद उस सारे डेटा की जाँच करना चाहता था। सरताज चाहता तो एक आईपीएस अफसर होने के नाते शेर को चुटकी बजाते ही उठवा सकता था और इस ज़मीन से हमेशा-हमेशा के लिए गायब करवा सकता था। लेकिन उसका हाथ एक खौफनाक डर ने रोक रखा था। अगर शेर के पीछे कोई पूरा गिरोह काम कर रहा हुआ? अगर उसके साथियों के पास मीरा की इससे भी ज़्यादा आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो हुए और शेर के गायब होते ही उन्होंने उसे इंटरनेट पर अपलोड कर दिया तो? मीरा और उसकी मासूम ज्योति की ज़िंदगी तो जीते-जी तबाह हो जाएगी! वह अपनी साख और मीरा की इज़्ज़त के साथ ऐसा कोई रिस्क नहीं ले सकता था। कोई भी अंतिम कदम उठाने से पहले, उसे इस पूरी साज़िश की तह तक पहुँचना ही होगा। कॉल कटने के बाद चंदन बाबा के मन को क्षणभर के लिए राहत तो मिली। उनके हाथ में फोन था और स्क्रीन पर मीरा की वे तस्वीरें जस की तस खुली हुई थीं। वे खुद को रोक नहीं पाए। नज़रों को फेरने की तमाम नाकाम कोशिशों के बावजूद, उनकी आँखें वापस फोन की स्क्रीन पर जा टिकीं। वॉयग्रा की तेज़ दवा का असर उनके ख़ून में पहले से ही उफान मार रहा था। जैसे ही उनकी निगाहें सोई हुई मीरा की बेपर्दा तस्वीरों पर पड़ीं, उनके शरीर के भीतर वासना की एक भयंकर लहर दौड़ गई। उनका लंड पल भर में फिर से पत्थर की तरह सख्त और बेकाबू हो गया। चंदन बाबा की नीयत पूरी तरह डगमगाने लगी। उनके अधरों से एक हल्की, कामुक आह निकली। "हाय... कितनी ख़ूबसूरत है मीरा बिटिया..." उन्होंने तस्वीरों पर उँगलियाँ फेरते हुए मन ही मन कहा। उनकी निगाहें मीरा के सुडौल जिस्म, उसकी खुली हुई गोरी जाँघों और नाईटी के ढीले गले से झांकते हुए वक्षस्थल पर जाकर अटक गईं। "क्या जाँघें हैं... क्या उभार हैं... जिस्म का एक-एक अंग।" अब तक जो डर और संकोच उनके मन में धर्मसंकट बनकर बैठा था, वह सरताज की ज़ुबानी 'हरी झंडी' मिलते ही एक ख़तरनाक लालच में बदलने लगा। उनके भीतर छिपे वासना के भेड़िया ने अचानक से अपने पंजे फैला लिए। "अब तो सरताज ने खुद मुझे छूट दे दी है..." चंदन बाबा की आँखों में एक चमक तैरने लगी। उनकी नज़रें फोन की स्क्रीन पर चिपकी मीरा की तस्वीर पर गड़ गईं, जहाँ उनका हाथ बेकाबू होकर फिर से चलने लगा। "अब तो मैं मीरा बिटिया को बेझिझक छू भी सकता हूँ..." उन्होंने एक गहरी, वासनाभरी साँस खींचते हुए खुद से कहा। "...उसके इस मखमली जिस्म का मज़ा ले सकता हूँ!" वे अपने ही दिमाग में बुने जा रहे इस नापाक जाल की बारीकियों को सोचकर मन ही मन मुस्कुराने लगे। "और अगर... अगर मीरा को कभी ज़रा भी शक हुआ भी," उनके अधरों पर एक मुस्कान उभरी, "या उसने रो-धोकर सरताज से मेरी शिकायत भी कर दी..." उन्होंने एक पल का विराम लिया, और उनकी आँखों में एक चालाक और विकृत ऐंठन आ गई। "...तो भी सरताज यही समझेगा कि यह सब तो मैंने सिर्फ़ शेर का भरोसा जीतने और उसके राज़ उगलवाने के लिए किया है!" चंदन बाबा ने एक संतोषभरी, कुटिल साँस छोड़ी। "सरताज कभी मुझ पर शक नहीं करेगा... वह तो उल्टे मेरी इस नीचता को मेरा त्याग समझेगा!" इस विचार के दिमाग में आते ही चंदन बाबा के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई। मर्यादा और पाप के बीच की बारीक लकीर उनके लिए हमेशा-हमेशा के लिए मिट चुकी थी। शेर के सामने नाटक करने का जो बहाना उन्हें मिला था, वह अब उनकी अपनी हवस को पूरा करने का सबसे बड़ा और महफ़ूज़ ढाल बन चुका था। तस्वीर में दिख रहे मीरा के मखमली जिस्म को टकटकी लगाए देखते हुए चंदन बाबा का हाथ बेकाबू होकर अपनी लँगोट के भीतर चला गया। हवस और वॉयग्रा के मिले-जुले असर में अंधे होकर वे तेज़ी से अपना हाथ चलाने लगे। कमरे में नल के बहते पानी की सरसराहट के बीच उनकी उखड़ी हुई सांसें और भी भारी होती चली गईं। "मीरा बिटिया... अहा, मीरा बिटिया..." ज़ुबान से घिनौने रसीले बोल निकालते हुए, अपनी ही बहू-बेटी समान मीरा का नाम ले-लेकर उन्होंने खुद को शांत किया। वासना का वह अंधा उफान जैसे ही चरम पर पहुँचकर ठंडा पड़ा, उनका शरीर ढीला पड़ गया और वे हाँफते हुए बाथरूम की दीवार से टिक गए। लेकिन अगली ही छण, जैसे ही दिमागी धुंध छँटी, चंदन बाबा पर अपराधबोध का एक पहाड़ टूट पड़ा। अपने ही हाथों पर लगे उस पाप के चिपचिपे अहसास को देखकर उनकी रूह कांप उठी। "हे भगवान! यह मैंने क्या कर दिया? मैं किस नीचता पर उतर आया हूँ?" उन्होंने कांपते हाथों से तुरंत अपना चेहरा धोया, मानो पानी उनके भीतर के पाप को बहा देगा। उनका मन भारी आत्म-ग्लानि और शर्म से भर गया। वे घुटनों के बल बैठकर अपनी ही हथेली को धिक्कारने लगे। किस मुसीबत में फँस गए हैं वे? एक तरफ शेर उन्हें अपनी उँगलियों पर नचा रहा था, और दूसरी तरफ उनकी अपनी ही सोई हुई वासना उन्हें जानवर बना रही थी। क्या से क्या बनते जा रहे थे वे? एक बुजुर्ग बाबा से गिरकर एक बदनीयत इंसान? सरताज और मीरा का चेहरा उनकी बंद आँखों के सामने घूमने लगा। सरताज ने उन्हें अपने पिता जैसा मान दिया था, अपने घर में शरण दी थी, और मीरा बिटिया... जिसने हमेशा एक बेटी की तरह उनकी सेवा की, उनके खाने-पीने का ध्यान रखा, कभी कोई कमी नहीं होने दी। उन दोनों के कितने अहसान थे उन पर! और वे क्या सोच रहे थे? सरताज के दिए भरोसे का इस्तेमाल वे अपनी हवस मिटाने के लिए करने की बात सोच रहे थे? "छिः! रे चंदन... तू तो शेर से भी बड़ा दरिंदा निकला!" चंदन बाबा ने खुद के गाल पर एक थप्पड़ जड़ा। उनकी आँखों से पछतावे के आँसू बह निकले। वे समझ गए थे कि अगर उन्होंने अपने मन के इस शैतान पर तुरंत काबू नहीं पाया, तो शेर का शिकार बनने से पहले वे खुद अपनी ही नज़रों में पूरी तरह तबाह हो जाएँगे। आज ज्योति की कॉलेज की छुट्टी थी। नाश्ता करने के बाद वह और मीरा कोठी के बागीचे के पास टहल रही थीं। मीरा ने सफेद रंग का सिल्क रोब पहन रखा था, जिसके नीचे हल्की सफेद स्लिप झलक रही थी। जैसे-जैसे मीरा बेफिक्र होकर कदम बढ़ा रही थी, रोब के अंदर उसके सुडौल मम्मों की चाल और उभार में एक अजीब सा लचीलापन था। दूर खड़े शेर ने अपनी पारखी निगाहों से देखते ही अंदाज़ा लगा लिया। शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "उफ़्फ़ मादरचोद... आज तो मालकिन बिना ब्रा के ही घूम रही हैं! रोब के नीचे मम्मे कैसे आज़ाद होकर उछल रहे हैं। और अंदर की पैंटी... ज़रूर या तो काली होगी या फिर सफ़ेद! क्या माल लग रही है साली सुबह-सुबह!" इसी बीच, शेर ने बड़ी चालाकी से सुबह की चाय में वैद की वियाग्रा की आधी खुराक और घोलकर चंदन बाबा को पिला दी थी। दवा की नई खुराक पेट में जाते ही और हनुमान चालीसा का असर खत्म होते ही, चंदन बाबा की आँखें भटकने लगीं। वे बागीचे के दूसरे कोने में झाड़ियों के पास खड़े होकर मीरा की तरफ देखने लगे। शेर ने जब चंदन बाबा की तरफ देखा, तो उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई। चंदन बाबा की निगाहें अब मीरा के उस सफेद रोब में झूलते हुए मम्मों और उसकी कमर के मटकाव पर टिकने लगीं। तभी उनके भीतर एक साथ अलग-अलग सोच की परतें टकराने लगीं—एक तरफ उन्हें शेर को झांसे में लेने के लिए कामुकता का नाटक करना था, दूसरी तरफ चंदन के भीतर दवा के नशे में सुलगता हुआ भटकता हुआ कामुक मन था, जो मीरा के इस रूप को देखकर बेकाबू हो रहा था। शेर समझ गया कि उसकी चाल कामयाब हो रही है—60 साल का यह साधु अब उसकी बिछाई हवस के जाल में फँसता दिख रहा है। तभी शेर के दिमाग में एक विचार आया। उसने तुरंत ज्योति को पास बुलाया और उसके कान में कुछ फुसफुसा दिया। ज्योति तो बच्ची थी, वह खेल के मूड में खुश हो गई। ज्योति ने बागीचे में लगी पानी की पाइप उठाई और उसका मुँह सीधे मीरा की तरफ करके पानी चालू कर दिया। मीरा (हँसते और बचते हुए चिल्लाई): "अरे ज्योति बेटा... मत करो, मैं पूरी भीग रही हूँ!" लेकिन ज्योति को मस्ती सूझ रही थी, वह खिलखिलाते हुए मीरा पर पानी की धार मारती रही। देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में मीरा सिर से पाँव तक पूरी भीग गई। उसका सफेद सिल्क रोब और नीचे की स्लिप पानी से सराबोर होकर उसके गोरे जिस्म से एकदम चिपक गए, जिससे उसके शरीर के सारे सुडौल उतार-चढ़ाव साफ उभर आए। सफेद कपड़ा भीगते ही लगभग पारदर्शी हो गया—उसके उभरे हुए मम्मे, मम्मों की ढाल और रानों का कसाव साफ़ झलकने लगा। बागीचे के दूसरे कोने में खड़े चंदन बाबा और पास खड़े शेर—दोनों की आँखें हैरत और हवस के मारे फटी की फटी रह गईं! तभी ज्योति दौड़कर आई और पानी की पाइप शेर के हाथ में थमाते हुए बोली, "शेर भैया, अब मेरे ऊपर भी पानी डालो!" शेर (कमीनी मुस्कान छिपाकर बोला): "हाँ-हाँ ज्योति बेटी, अभी डालता हूँ!" शेर ने पाइप हाथ में ली और ज्योति पर पानी डालते-डालते अपनी असली चाल चल दी। उसने जानबूझकर पाइप का मुँह मीरा की तरफ घुमा दिया। अब पानी की तेज़ धार सीधे मीरा के भीगे हुए रोब पर गिर रही थी—कभी उसके आज़ाद झूलते मम्मों पर, तो कभी उसकी दोनों जाँघों के बिल्कुल बीच में! पानी के दबाव और बहाव से मीरा के रोब की डोरी ढीली होकर खुल गई। भीगा हुआ सफेद रोब कंधों से सरककर साइड हो गया, और अंदर की पतली स्लिप में मीरा का सुडौल, पानी से नहाया हुआ बदन पूरी तरह बेपर्दा होने लगा। मीरा पानी से बचने के लिए अपने हाथों से सीने को ढकने की कोशिश कर रही थी, पर शेर की पाइप की तेज़ धार बार-बार उसके जिस्म के सबसे कामुक हिस्सों को निशाना बना रही थी। जैसे ही मीरा पानी की सीधी धार से बचने के लिए झटके से पीछे घूमी, शेर की आँखें उसकी भीगी हुई पीठ और पानी से चिपके रोब के अंदर झांकती उसकी उभरी हुई गांड पर गड़ गईं। लेकिन मीरा के घूमते ही, बागीचे के दूसरे कोने में खड़े चंदन बाबा को सामने का पूरा नज़ारा साफ़-साफ़ दिख गया। मीरा के भीगे रोब की डोरी पूरी तरह खुल चुकी थी। अंदर पहनी पतली सफेद सिल्क की स्लिप ठंडे पानी से भीगकर उसके गोरे बदन पर चिपक गई थी। ठंडे पानी के झोंकों से उसके दोनों सुडौल मम्मे एकदम अकड़कर सख्त हो चुके थे, और पतले कपड़े के पार से उसके गुलाबी निप्पल बाहर की तरफ साफ़ उभरकर झांक रहे थे। नीचे रानों के पास से पानी में भीगी हुई उसकी पैंटी की झलक अलग ही कामुक लग रही थी। यह नज़ारा देखते ही चंदन बाबा के भीतर तीनों विचार एक भयंकर मानसिक युद्ध में उलझ गए। "मुझे शेर को दिखाना होगा कि मैं भी उसकी तरह हवस में अंधा हो चुका हूँ..." उन्होंने मन ही मन सोचा।
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18-09-2026, 05:15 AM
शेर का भरोसा जीतने के लिए उन्होंने अपनी आँखें फाड़ लीं और मुँह खोलकर खड़े हो गए, ताकि शेर को यही लगे कि वे पूरी तरह इस दृश्य के नशे में डूब चुके हैं।
इसके साथ ही, उनके दिमाग के एक कोने में सरताज का ख्याल कौंधा।"मुझे सरताज का साथ निभाना है... मुझे इस नीच की हर चाल नाकाम करनी है," उन्होंने खुद को याद दिलाने की कोशिश की। लेकिन इन दोनों मुखौटों के पीछे उनका असली, भटकता और वासना से भरा मन इस कदर हावी हो चुका था कि वे चाहकर भी अपनी आँखें उस दृश्य से हटा नहीं पा रहे थे। "हे भगवान... क्या रूप है इसका!" उनका भटकता मन अंदर ही अंदर चीख उठा और उनकी निगाहें मीरा के भीगे जिस्म पर पूरी तरह जम गईं। नसों में दौड़ती वियाग्रा, रात की नीली फ़िल्मों की अश्लीलता और सामने बिखरे इस नंगे जिस्म के हुस्न ने 60 साल के उस 'साधु' के ईमान को पूरी तरह राख कर दिया था। उनकी धोती के अंदर का लंड लोहे की छड़ की तरह ऐसा अकड़ा कि उनकी साँसें उखड़ गईं, और वे खुद को वासना के उस बहकते हुए दलदल में उतरने से रोक नहीं पाए। चंदन (अपनी राल टपकाते हुए, आँखें फाड़े मन ही मन हांफकर बुदबुदाया): "उफ़्फ़... हे राम! शेर बिल्कुल सही कहता है... मीरा बिटिया तो सचमुच पूरी माल है! साला, बॉलीवुड की सारी हीरोइनें इसके सामने पानी भरेंगी! कल रात जो नीली फ़िल्मों में औरतें देखी थीं, वो तो इस बदन के आगे कुछ भी नहीं हैं... क्या उफान है इसके मम्मों में!" चंदन बाबा के मुँह से 'बिटिया' शब्द निकला तो ज़रूर, पर अब उसमें कोई बाप वाला प्यार नहीं, बल्कि सिर्फ हवस की गंदी बू आ रही थी। उधर दूर खड़ा शेर, चंदन के इस बदले हुए रूप और उनकी धोती के उभार को ताड़कर हँसी हँस रहा था। उसे समझ आ गया था कि बुड्ढा अब पूरी तरह से उसके रंग में रंग चुका है। शेर (ज्योति की तरफ देखकर चिल्लाया): "ज्योति बेटी! पकड़ो अपनी मम्मा को... देखो भाग रही हैं!" ज्योति बेफिक्री में हँसते हुए मीरा की तरफ झपटी। इसी बीच शेर ने पाइप का प्रेशर और तेज़ कर दिया और धार सीधे मीरा के भीगे हुए जिस्म पर मार दी। मीरा पानी से बचने के लिए तेज़ी से पीछे हटने लगी, पर ज्योति ने दौड़कर पीछे से उसका भीगा हुआ रोब कसकर पकड़ लिया। खींचाताणी में भीगे कपड़े का दबाव बढ़ा और रोब पूरी तरह मीरा की बाँहों से छूटकर नीचे ज़मीन पर गिर गया। अब मीरा के बदन पर सिर्फ़ पानी से तर-बतर, पारदर्शी जैसी पतली सफेद स्लिप बची थी, जो उसके गोरे जिस्म से ऐसे चिपकी थी जैसे उसके ऊपर कोई कपड़ा ही न हो। पानी की तेज़ बौछार से बदहवास होकर मीरा बिना देखे बागीचे के दूसरी तरफ भागी—जहाँ चंदन बाबा खड़े थे। पानी के बहाव और गीली घास पर फिसलने की वजह से मीरा का संतुलन बिगड़ गया और वह सीधे जाकर चंदन बाबा से ज़ोरदार तरीके से टकरा गई! धक्के का प्रभाव इतना तेज़ था कि चंदन बाबा खुद को संभाल नहीं पाए और पीठ के बल घास पर गिर पड़े, और मीरा सीधे उनके ऊपर आ गिरी। नज़ारा पूरी तरह अश्लील हो चुका था। मीरा का पानी में भीगा हुआ बदन पूरी तरह चंदन बाबा के सीने से चिपका हुआ था। पतली स्लिप के पार से उसके ठंडे पानी से अकड़े हुए, सख्त मम्मे सीधे चंदन बाबा की छाती पर बुरी तरह पिस रहे थे। गिरते वक्त खुद को और मीरा को संभालने के चक्कर में चंदन बाबा के दोनों हाथ अपने आप मीरा के भीगे हुए शरीर पर चले गए—और उनकी चौड़ी हथेलियाँ सीधे मीरा की नंगी जैसी पानी से चिपकी गांड पर जाकर कस गईं! चंदन बाबा के नथुने मीरा के भीगे हुए बालों और उसके गर्म-ठंडे जिस्म की महक से भर गए। उनके नीचे दबे कड़क अंग पर मीरा की जाँघों की रगड़ साफ़ महसूस हो रही थी। साठ साल के इस शरीफ़ और नेक इंसान का सारा संयम, सारे संस्कार उस एक सेकंड में डगमगाने लगे। एक तरफ तो उनका मन इस पवित्र रिश्ते को बचाने की दुहाई दे रहा था, पर दूसरी तरफ एक ढलती उम्र के मर्द की दबी हुई हवस और वैद की दवा की आँच मीरा की कयामत जैसी सुंदरता के सामने घुटने टेक रही थी। वे चाहकर भी अपने हाथों को पीछे नहीं खींच पाए और उंगलियों का दबाव अपने आप बढ़ता चला गया। उधर थोड़ी दूरी पर खड़ा शेर पाइप थामे ज़हरीली हँसी हँस रहा था। उसका बिछाया जाल पूरी तरह कामयाब हो चुका था—अब चंदन बाबा इस खेल के सीधे हिस्सेदार बनते दिख रहे थे। मीरा के अकड़े हुए मम्मे जब उनकी छाती से बुरी तरह पिसे, तो वियाग्रा और नीली फ़िल्मों की भड़की हुई आग ने चंदन के दिमाग पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया। गिरते वक्त चंदन के हाथ बेखयाली में मीरा की गांड पर तो गए थे, लेकिन जैसे ही उनकी उंगलियों ने उस भीगी हुई सफेद पैंटी के पार से मीरा की सुडौल, भरी हुई गांड का मांसल कसाव महसूस किया, उनकी हथेलियों की पकड़ अनजाने में कसती चली गई। चंदन बाबा ने मीरा की गांड को अपनी बड़ी हथेलियों से दबोच लिया। वे खुद को कोसते हुए भी उस अनचाहे, मादक सुख के रस में खिंचते चले जा रहे थे। उधर दूर खड़ा शेर अपनी कामयाबी पर मन ही मन अट्टहास कर रहा था। उसने इस अश्लील पल को और भड़काने के लिए पाइप की तेज़ धार सीधी उन दोनों पर मार दी। अब ठंडा पानी चंदन बाबा और मीरा दोनों को बुरी तरह भिगो रहा था। पानी के तेज़ बहाव और ज़मीन पर फिसलने की वजह से चंदन बाबा की सफेद धोती कमर से पूरी तरह खुल चुकी थी। उनकी काली, गठीली और बालों से भरी जाँघें पूरी तरह नंगी हो गई थीं और वे मीरा की गोरी, भीगी हुई नंगी चिकनी जाँघों के ठीक बीच में कसकर फँस चुकी थीं! पानी की ठंडक और मीरा की सुडौल जाँघों के सीधे स्पर्श से चंदन बाबा के बदन में बिजली सी दौड़ गई। उनकी खुली हुई धोती के नीचे से उनका कड़क लंड मीरा के पानी से भीगे कपड़ों के पार उसकी जाँघों के बीच तेज़ी से रगड़ खाने लगा। मीरा पानी की धार और अचानक हुए इस हादसे से इतनी बदहवास थी कि वह समझ ही नहीं पा रही थी कि नीचे उसके बाबा तुल्य चंदन के हाथ उसकी पैंटी को किस तरह दबोच रहे हैं, और उनकी गठीली जाँघें उसकी टांगों के बीच क्या महसूस कर रही हैं। भीगे हुए पानी की बौछार के बीच जैसे ही चंदन बाबा ने नज़र उठाई, उनकी आँखें सीधे शेर से जा मिलीं। शेर चेहरे पर एक शैतानी, कमीनी मुस्कान लिए खड़ा था। उसने चंदन बाबा की तरफ देखा और आँख मारते हुए उंगलियों के इशारे से कहा— "और कस ले बाबा! दबा के मज़ा ले इस मौके का... अपने हाथ ऊपर खिसका और थोड़ा और सीने से सटा ले इस मालकिन को!" शेर के इस उकसावे ने चंदन बाबा के भीतर सरताज के लिए जारी नाटक को असली हवस में बदल दिया। वे शेर को यह दिखाने के लिए भी आतुर थे कि वे उसके खेल में शामिल हैं, और साथ ही मीरा की नशीली देह के मोज़े ने उनकी शरीफ़ियत की बची-खुची डोर भी तोड़ दी। चंदन बाबा की चौड़ी हथेलियाँ मीरा की भीगी पैंटी से सरकती हुई ऊपर की तरफ बढ़ीं। हाथों के इस बहाव के साथ मीरा की पतली, भीगी हुई सिल्क की स्लिप भी ऊपर खिंचने लगी, जिससे चंदन बाबा के हाथ सीधे उसकी नंगी, गोरी पीठ पर जा टिके। चंदन बाबा (मन ही मन कामुकता में बेकाबू होते हुए): "अहह... क्या मखमली चमड़ी है! मीरा का यह जिस्म... आज तो भगवान ने खुद मेरे हाथों में सौंप दिया है।" सामने का मंज़र बेहद कामुक हो चुका था—मीरा के सुडौल, पानी से नहाए मम्मे स्लिप के कपड़े से बाहर निकलकर बेपर्दा होने की कगार पर थे, और उनका कड़ाव सीधे चंदन बाबा की छाती पर पिस रहा था। चंदन बाबा (मन ही मन हैवानियत भरी मुस्कान के साथ): "छू ले चंदन... आज कोई रोकने वाला नहीं है। सरताज तो समझेगा कि तू फर्ज़ निभा रहा है, और यह बेचारी समझ रही है कि यह सिर्फ़ एक हादसा है! क्या बेवकूफ़ बनाया है दोनों को!" उधर यह सब देख रहे शेर के होठों पर एक दरिंदगी भरी मुस्कान फैल गई। शेर (मन ही मन ढिठाई से हंसते हुए): "वाह बाबा वाह! बाहर से बड़ा साधु बनता है और अंदर बहती गंगा में हाथ धो रहा है! इस बूढ़े को तो वियाग्रा और हवस ने पूरी तरह अंधा कर दिया है।" शेर (मन ही मन चटकाने वाले अंदाज़ में): "दबा बाबा, कसकर दबा! ते। अब तो तू मेरी उँगलियों पर नाचेगा!" चंदन बाबा की गठीली जाँघ पूरी तरह मीरा की भीगी, गोरी और चिकनी जाँघों के बीच फँसी हुई थी। मीरा ने घबराकर उठने की कोशिश की, "अरे... बाबा! मुझे उठने दीजिए..." लेकिन चंदन बाबा ने अपने हाथ उसकी नंगी पीठ पर और कस दिए और ढोंग रचते हुए उसे वापस अपनी छाती पर खींच लिया। चंदन (दिखावे के लिए चिंताजनक आवाज़ में बोला, पर हाथ उसकी पीठ पर कसता रहा): "अरे-अरे मीरा बिटिया! आराम से... संभल के! कहीं चोट तो नहीं आई न तुम्हें? कहीं फिसल न जाओ... रुक जाओ, मैं तुम्हें पकड़े हुए हूँ!" शेर (दूर खड़ा होकर, पाइप की धार तेज़ करते हुए, मन ही मन अट्टहास करने लगा): "वाह रे मेरे साठ साल के भगत बुड्ढे! साला मुझसे भी बड़ा हवसी निकला! कैसे हाथों को नंगी पीठ पर फिरा रहा है और 'बिटिया-बिटिया' चिल्लाकर मम्मे अपनी छाती में पेले जा रहा है। अब आया न ऊँट पहाड़ के नीचे!" मीरा बेबस होकर चंदन के ऊपर फँसी हुई थी, यह समझे बिना कि उसके बाबा का नकाब उतर चुका है और उनकी रगड़ खाती हुई जाँघें और नंगी पीठ पर सरकते हाथ किसी पिता के नहीं, बल्कि हुस्न के जाल में उलझे एक कामुक मर्द के हैं। जैसे ही मीरा को अपनी हालत अंदाज़ा हुआ, उसके बदन में सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर चंदन बाबा के सीने पर हाथ रखा और धक्का देते हुए बोली, "चंदन बाबा, छोड़िए मुझे!" चंदन बाबा का दिल तो नहीं मान रहा था और वे उसे अपनी छाती से ही चिपकाए रखना चाहते थे, पर बात बिगड़ते देख उन्हें ना चाहते हुए भी अपनी पकड़ ढीली करनी पड़ी। जैसे ही मीरा झटके से चंदन बाबा के ऊपर से उठी, उसकी स्लिप ऊपर की तरफ खिसक गई। चंदन बाबा की हवस भरी आँखों के ठीक सामने मीरा के लगभग 75% नंगे, सुडौल और ठंडे पानी से अकड़े हुए मम्मे पूरी तरह बेपर्दा हो गए। हवा की ठंडक से उसके गुलाबी निप्पल साफ़ झलक रहे थे। चंदन बाबा अभी इस नज़ारे को अपनी प्यासी आँखों से पी ही रहे थे कि तभी ज्योति खेल-खेल में मीरा के ऊपर आ गिरी। मीरा अपना संतुलन संभाल नहीं पाई और झटके से वापस नीचे गिरी, लेकिन इस बार चंदन बाबा के हाथ अनजाने में आगे फैले हुए थे। जैसे ही मीरा उनके ऊपर गिरी, चंदन बाबा की हथेलियों में मीरा के वे दोनों लगभग नंगे मम्मे पूरी तरह भींच गए। मीरा ने ज्योति पर चिल्लाते हुए कहा, "क्या कर रही हो बेटा, मुझे चोट लग जाएगी! ऊपर से उठो तुरंत!" इधर चंदन बाबा, जिनके हाथों में मीरा के कसाब भरे मम्मे पहले ही दबे हुए थे, वे इस सुनहरे मौके को गंवाने वाले कहाँ थे। उन्होंने तुरंत इस मौके का पूरा फायदा उठाया। ज्योति का भार मीरा पर होने की आड़ में, चंदन बाबा ने अपनी हथेलियों में फँसे मीरा के उन गर्म और सुडौल मम्मों की नरमाई को पूरी शिद्दत से महसूस किया। वासना से अंधे होकर उन्होंने अपनी पकड़ और मजबूत की और एक झटके में मीरा के दोनों मम्मों को कसकर ज़ोर से दबा दिया। मीरा को अपने मम्मों पर चंदन बाबा के हाथों का दबाव साफ़ महसूस हुआ। जैसे ही उसने विरोध करने के लिए अपना मुँह खोला, चंदन बाबा ने फौरन कहा, "माफ़ करना मीरा बेटी... तुम खुद अचानक मेरे ऊपर आ गिरी हो!" मुँह से तो वे माफ़ी माँग रहे थे, लेकिन उनके हाथ कुछ और ही कर रहे थे। उन्होंने बेहद चालाकी भरे तरीक़े से मीरा की स्लिप को थोड़ा और किनारे खिसकाया और अपनी उँगलियों से उसके अकड़े हुए निप्पल को कसकर रगड़ दिया। उस अचानक लगे तीखे स्पर्श और सिहरन से मीरा के मुँह से बेसाख्ता एक सिसकारी निकल गई, "आह!" ज्योति ने इस एक मज़ेदार खेल समझा और मीरा की बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। वह हंसती हुई मीरा के ऊपर ही जमी रही, जिससे मीरा नीचे पूरी तरह असहाय होकर दबी रह गई। मीरा के लिए इस वक्त हिले बिना हटना लगभग नामुमकिन हो चुका था। ऊपर से ज्योति का वज़न था और नीचे चंदन बाबा का शरीर, जिनकी नियत फिर चुकी थी। चंदन बाबा ने ज्योति के ऊपर बैठे रहने का पूरा फ़ायदा उठाया। उन्होंने अपनी उँगलियों की पकड़ मीरा की छाती पर और गहरी कर दी। "बेटी ज्योति, ज़रा संभलो... मीरा बिटिया को चोट लग जाएगी," चंदन बाबा ने मुँह से तो ज्योति को हटाने का ढोंग किया, लेकिन नीचे उनके हाथ मीरा के दोनों मम्मों को अपनी हथेलियों में पूरी तरह सहला रहे थे। वे यह सब इतने चालाक अंदाज़ से कर रहे थे ताकि मीरा को यही लगे कि यह सब सिर्फ़ अनजाने में और संतुलन खोने की वजह से हो रहा है। मीरा (मन ही मन घबराते हुए, चेहरे पर शर्म और बेबसी के रंग लिए): "हे भगवान... यह क्या हो रहा है!" उसका चेहरा लाल पड़ चुका था। वह अब तक यही समझ रही थी कि बाबा का यह स्पर्श महज़ अनजाने में हुआ एक हादसा है। मीरा (खुद को तसल्ली देते हुए, झिझकती साँसों में): "नहीं... बाबा ऐसा नहीं कर सकते। मैं ही तो उनके ऊपर आ गिरी हूँ..." हालांकि उनकी उँगलियों का हर दबाव, निप्पल पर उनके अँगूठे की हल्की मालिश और अपनी छाती से टकराता हुआ उनका अकड़ा हुआ लंड—सब कुछ उसे महसूस हो रहा था, लेकिन वह खुद को यही समझा रही थी कि यह सब इस विकट परिस्थिति का ही एक हिस्सा है, क्योंकि आख़िरकार वही तो संतुलन खोकर बाबा के ऊपर गिरी थी। मीरा (धीमी, कांपती फुसफुसाहट में): "बाबा... ज़रा हटिए ना..." लेकिन चंदन बाबा पर तो वियाग्रा और हवस का भूत पूरी तरह सवार था। वे अपनी उँगलियों को मीरा की स्लिप के अंदर सरकाते हुए उसके नंगे, गर्म वक्षस्थल की त्वचा को सीधे सहलाने लगे। ज्योति के ऊपर होने का बहाना बनाकर वे खुद को थोड़ा और ऊपर खिसकाते गए, जिससे उनका कड़क लंड मीरा की भीगी नाभि से रगड़ खाता हुआ सीधा उसकी पेट की निचली त्वचा पर दबाव बनाने लगा। चंदन बाबा (मासूमियत का नाटक करते हुए): "मीरा बेटी... मैं कैसे हटूँ? मेरे ऊपर तो तुम और ज्योति दोनों चढ़ी हुई हो! जब तुम ऊपर से हटोगी, तभी तो मैं भी उठ पाऊँगा..." मुँह से तो वे अपनी बेबसी जता रहे थे, लेकिन नीचे उनके हाथ मीरा के नंगे मम्मों को मरोड़ने में लगे थे और उनकी कमर का हल्का दबाव मीरा की पेट की निचली त्वचा पर उनके कड़क लंड की मौजूदगी को साफ़ बयाँ कर रहा था। मीरा की सहनशक्ति की अब इंतहा हो चुकी थी। मीरा (ग़ुस्से में तमतमाते चेहरे के साथ, ज्योति पर चिल्लाते हुए): "बेटा! आपको सुनाई नहीं देता मैं इतनी देर से क्या कह रही हूँ?! इस वक्त मेरे ऊपर से हटो, तुरंत!" ज्योति अपनी माँ की ऐसी कड़क, तीखी और ग़ुस्से से भरी आवाज़ सुनकर बुरी तरह डर गई। उसकी हंसी हवा में ही गायब हो गई। ज्योति (सहमी हुई आवाज़ में): "म... मम्मी... सॉरी..." ज्योति डर के मारे झटके से मीरा के ऊपर से नीचे उतर गई और एक तरफ हटकर खड़ी हो गई। रास्ता साफ होते ही, मीरा ने अपनी पूरी ताकत लगाई और चंदन बाबा की छाती पर हाथ रखकर खुद को उनके ऊपर से झटके से उठाया। पर उस अचानक लगे झटके की वजह से मीरा की खिसकी हुई स्लिप और नीचे सरक गई, और उसके दोनों सुडौल मम्मे छलककर स्लिप के बाहर बेपर्दा हो गए। मीरा (हाफ़ते हुए, बेबसी और घबराहट में अपने भीगे कपड़ों को संभालने की कोशिश करते हुए): "हे भगवान..." चंदन बाबा के हाथों से मीरा के गर्म मम्मे भले ही छूट गए थे, लेकिन उनकी भूखी आँखें लगातार इस कामुक नज़ारे को पी रही थीं। चंदन बाबा (नज़रें चुराने का नाटक करते हुए, पर आँखें मीरा के मम्मों पर ही टिकाए हकलाकर बोले): "अरे... अरे मीरा बिटिया! अपने... अपने कपड़े ठीक करो! कहीं... कहीं किसी की नज़र न पड़ जाए..." यह सुनते ही मीरा का चेहरा शर्म और अपमान से लाल-सुर्ख हो गया। मीरा (झटके से अपने दोनों हाथों से सीने को ढकते हुए, सहमी और शर्मिंदा आवाज़ में): "अहह... जी... जी बाबा..." उसने तुरंत स्लिप को ऊपर खींचने की नाकाम कोशिश की, लेकिन भीगी हुई पतली सिल्क की स्लिप तो अब बस नाम की ही बची थी—उसका पारदर्शी कपड़ा और उभरे हुए गुलाबी निप्पल उसकी देह का हर राज़ साफ़ बयाँ कर रहे थे। वह एक पल भी वहाँ रुकना बर्दाश्त नहीं कर सकी और घबराकर, बिना पीछे मुड़े, भागते हुए कोठी के मुख्य दरवाज़े की तरफ चली गई। यह सब देख रहे शेर ने तुरंत मौका ताड़ा। उसने दूर से ही चंदन बाबा की तरफ देखा, एक कमीनी आँख मारी और हाथ से इशारे में जताया कि 'क्या काम किया है बाबा!' शेर (चंदन से फुसफुसाकर बोला): "बाबा, आप ज्योति बेटी को संभालो और इसके साथ खेलो... मैं जरा मालकिन को तौलिया देने अंदर जाता हूँ!" इतना कहकर शेर ने पाइप को ज़मीन पर फेंका और दबे पाँव, भीगी मीरा के पीछे-पीछे मुख्य कोठी के अंदर भाग गया।
Deepak Kapoor
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
18-09-2026, 05:24 AM
Deepak Kapoor
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18-09-2026, 05:28 AM
Naya Mod — 5
Jaise hi Sher kisi kaam se baahar gaya aur Chandan baba ko mauka mila, unhone turant basin ka nal khoolkar bathroom ka darwaza andar se band kar liya. Bahte paani ki sarasraahat ke beech, kaampte haathon aur ukhdi hui saanson ke saath unhone jeb se phone nikaalkar Sartaj ka number milaaya. Doosri taraf jaise hi Sartaj ne call uthaai, Chandan baba ki aawaz kaamp rahi thi. Chandan baba (kaampti aawaz mein): "Sartaj... beta, main bahut bade dharmasankat mein phans gaya hoon! Mera man nirantar bechain ho raha hai. Yeh Sher jitna hum soch rahe the, usse kahi zyaada khatarnaak insaan hai." Sartaj ki reedh mein ek thandi siharan daud gayi. Sartaj (atyant gambheerta aur chinta ke saath): "Baba, pehle aap khud ko sambhaaliye. Shaant hokar bataaiye, aakhir aisa kya hua?" Chandan baba ne bhaari jhijhak, ghabraahat aur aatmaglaani ke saath apni zubaan khooli. Unka gala poori tarah sookh raha tha aur chhati mein saansen atak rahi theen. Apni hi bahu-beti samaan Meera ke prati kaye gaye un ghinowne shabdon ko dohraana—vah bhi Sartaj ke saamne, jo uska pati hai—unke liye ek atyant kathin kaam tha. Chandan baba (atyant sankoch aur haklaate hue): "Sartaj... vah... vah neech, adharmi Sher Meera bitiya se sirf aakarsHit nahi hai, uske dil mein Meera ke liye andhi nafrat bhari padi hai. Vah... vah bejhijhak kah raha tha ki vah Meera ko poori tarah apni rakhail banaakar chhodeoga. Uski havas ki koi seema nahi hai beta... itna hi nahi..." Chandan baba ki aawaz mein ek ajeeb-sa sannaata chhaa gaya. Ve zor-zor se haanfne lage. Sartaj (utaawlepan aur badhti ghabraahat mein): "Baba! Rukiye mat, saaf-saaf bataaiye aur kya kaha us dambhi ne? Vah Meera ke saath aur kya saazish rach raha hai?" Chandan baba (aankhon se bahte aansoon ko poonchhte hue, ghut-ti hui aawaz mein): "Beta... vah haiewaan kah raha tha ki vah sirf Meera ki deh ka sukh nahi chheeneoga." Sartaj phone ko kaskar bheenche khaamosh raha, uski saanson ki garmaahat phone ke speaker par saaf sunai de rahi thi. Chandan baba (aage boole): "Vah uske swaabhimaan aur charitra ko poori tarah taar-taar karke rakh dena chahta hai." Sartaj (daant peeste hue, bhaari aawaz mein): "Aur kya kah raha tha vah, baba?" Chandan baba (kaampte hue): "Vah... vah kah raha tha ki vah Meera ke jism par apni muhar lagaayega. Aisi muhar, ki vah duniya ke saamne kabhi apna sir na uthaa sake." Sartaj ki aankhon mein khoon utar aaya, lekin usne khud par kaabu rakhte hue kaha, "Hoon... aap boolte rahiye baba, main sun raha hoon." Chandan baba (sisakte hue): "Uska maqsad sirf uski deh ko paana nahi hai beta... vah to uske poore wajoog ko matiyaamet kar dena chahta hai!" Sartaj ke haath mein pakda hua phone kasta chala gaya, uski uungliyon ke jod safed pad gaye aur aankhon mein laal doore utar aaye. Uski dhamaniyon mein khoon ubalne laga. Sartaj (daant peeste hue, behad kathoor aawaz mein): "Us neech darinde ki yeh dussaahas! Baba, aap bas ek baat ka dhyaan rakhiye—kya usse zara bhi bhanak lagi hai ki aap mujhse sampark mein hain? Ya phir usne yeh sab baaten aapke saamne mahaz apna khauf aur dhauns jamaane ke liye kahi hain?" Chandan baba (dar se kaampte hue bathroom ke darwaze ki taraf dekhte hue): "Nahi beta, usse mujh par poora bharosa hai ki main uska wafaadaar ban chuka hoon. Lekin uski baaten sunkar meri rooh kaamp uthi hai." Chandan baba ki aawaz sharm aur aatmaglaani se dab gayi, par unhone khud ko sambhaalte hue aage bataana shuru kiya. Chandan baba (sisakte hue): "Beta... usne mujhe apni taraf karne ke liye Meera ki sooi hui haalat ki kuch behad beparda tasveeren dikhaaiin..." Sartaj ke seene mein maano aag si jal uthi, usne apni mutthiyan bheenchte hue kaha, "Beparda tasveeren? Chandan baba (haklaate hue, gala roondh jaata hai): "Aur... aur mujhse kaha ki vah mujhe bhi uske saath... us ghinowne kaam mein shaamil karega..." Sartaj (atyant kathoor aur thande swar mein): "Aur?" Chandan baba (kaampti aawaz mein): "Uski shart hai ki jab yeh sab ho... to main usse 'Meera bitiya' kahkar hi pukaaroon. Sartaj... uske dimaag mein koi bhayankar intqaam ki aag jal rahi hai!" Sartaj phone ki doosri taraf bilkul shaant raha, lekin aankhen gusse se laal ho gayiin. Uski dhamaniyon mein khoon khoul raha tha. Agar is waqt Sher uske saamne aa jaata, to Sartaj bina ek pal ganwaaye apne nange haathon se uske jism ke hazaar tukde kar deta. Sartaj (atyant shaant lekin gahre lahze mein): "Baba, aapne bahut himmat ka kaam kiya hai jo yeh sab sahkar bhi usse itni baaten nikaalwa liin." Chandan baba (phone par halki raahat ki saans leete hue): "Bas beta... jaise-taise khud ko sambhaale hue hoon." Sartaj (gambheerta se): "Hamein sabse pehle yeh jaanna hooga ki aakhir vah Meera se itni andhi nafrat kyon karta hai." Chandan baba (sahamte hue): "Haan beta, uski nafrat ke peeche koi bahut puraani वजह lagti hai." Sartaj (aage hidaayat dete hue): "Aagali baar jab vah aapase baat kare, to yeh pata karne ki koshish kijiyega ki kya vah mujhse bhi utni hi nafrat karta hai... ya mujhse uski dushmani usse bhi zyaada hai." Chandan baba (kaampti aawaz mein): "Theek hai beta... main poori koshish karunga." Sartaj (dheeme par behad sadhe hue swar mein): "Aap bas uske saamne apna naatak jaari rakhiye aur khud ko bilkul tootne mat dijie. Main bahut jald us neech ki poori kundali nikaalkar sab kuch pata lagaata hoon." Sartaj ne phir kuch kshan sochte hue kaha, "Baba, kya aap mujhe Meera ki ve tasveeren bhej sakte hain?" Chandan baba ne kaampte haathon se WhatsApp ke zariye ve tasveeren Sartaj ko bhej diin. Phir kuch deer gahra vichaar karne ke baad, unhone bhaari man se Sartaj se kaha. Chandan baba (phone par bhaari glaani aur sankoch se bhari aawaz mein): "Sartaj beta, ek aur zaroori baat hai..." Sartaj (dheemi aawaz mein): "Booliye baba, main sun raha hoon." Chandan baba (jhijhakte hue): "Us darinde ka vishwaas poori tarah jeetne ke liye... mujhe uska saath nibhaate waqt Meera bitiya ke liye bahut galat aur oochhe shabdon ka istemaal karna pad sakta hai." Sartaj phone ke doosri taraf bilkul khaamosh raha, par Chandan baba ne apni baat jaari rakhi. Chandan baba (kaampti aawaz mein): "Tabhi vah mujhe poori tarah apna samajhega, aur main un tasveeron ke bahane uske aur raaz ugalwa paunga." Chandan baba (gala roondhte hue): "Aaj bhi usne mujhe ve tasveeren dikhaate hue kaha ki vah Meera bitiya ke saath kya-kya karega... aur beta, mujhe us waqt apna role nibhaane ke liye... khud apne muunh se bahut hi gande aur ghinowne shabdon ka istemaal karna pada." Sartaj (gahri saans leete hue): "Aap par kya beet rahi hai, main samajh sakta hoon baba..." Baba thoda rooke, apni sharm aur glaani ke ghoont ko peete hue aage boole. Chandan baba: "Ek aur baat maine gaur ki hai Sartaj... vah tere naam se zara bhi nahi darta." Sartaj (chaunkte hue): "Mere naam se bhi nahi? Yaani usse security officer ka ya mera koi khauf nahi hai?" Chandan baba (gambheerta se): "Bilkul nahi! Iska seedha matlab yahi hai ki uske paas Meera ki in tasveeron ke alaawa bhi koi bahut bada 'leverage' hai, jiske dam par vah itna bekhauf ghoom raha hai." Sartaj (daant peeste hue): "Hunh... baat to aapki sahi hai baba. Us neech ke paas yakeenan koi aur bada mohra hai." Chandan baba (kaampti aur sharminda aawaz mein): "Par beta... us darinde ko jhaansa dene ke liye, shayad mujhe apni maryaada ki har seema ko laanghna pade. Anchaahe hi sahi, par mere muunh se Meera bitiya ke liye bahut ghinowne shabd nikalenge." Sartaj (shaant rahte hue): "Aap ghabraaiye mat baba, aap aage booliye..." Chandan baba (atyant ghabraaye aur gidgidaate hue swar mein): "Sartaj... baat sirf shabdon tak rahe to theek hai, par ho sakta hai ki vah haiewaan mera imtihaan leene ya apna vishwaas pakka karne ke liye... mujhe Meera bitiya ko galat tareeqe se chhoone ke liye bhi kaaye! Ab too hi bata beta, tera yeh baba kya kare?" Sartaj ne phone haath mein thaame kuch palon ke liye gahri khaamoshi saabhe rakhi. Uska tez tarraar IPS dimaag tezi se har pehlu, khatre aur chaal ka aaklan kar raha tha. Vah achhi tarah samajh gaya tha ki agar Sher ka bharosa poori tarah jeetna hai, to Chandan baba ko is ghinowne khel mein poori tarah doobne ka naatak karna hi padega. Sher ke paas tasveeron se bhi badhkar koi bahut bada 'leverage' tha, aur us aakhri aur sabse bade raaz tak pahunchna ka iske alaawa koi doosra raasta nahi tha. Sartaj ne ek gahri saans chhodi aur behad gambheer aawaz mein boola, "Baba... aap jo kah rahe hain, main sab samajh raha hoon. Yeh raah behad kathin hai aur aapki maryaada, charitra tatha aatmbal ki sabse badi pareeksha leegi, lekin is waqt hamare paas aur koi chaara nahi hai. Meri taraf se aapko is naatak ko aage badhaane ki poori ijaazat hai." Phone ki doosri taraf Chandan baba ne raahat ki ek mili-juli saans li. Sartaj (hidaayat dete hue, sadhi aawaz mein): "Baba, aap Sher ke saamne wahi baniye jo vah aapko dekhna chahta hai." Chandan baba (phone par bhaari man se sunat hue): "Haan beta..." Sartaj: "Agar uske saamne Meera ke liye galat shabd bhi boolne paden, to bilkul mat jhijhakiye." Chandan baba (hijakchaate hue): "Par beta, meri zubaan..." Sartaj (tookte hue, gambheer swar mein): "Aapko yeh kadva ghoont peena hi hooga baba. Hamein har haal mein yeh jaanna hai ki in tasveeron ke alaawa us neech ke haath mein aisa kaun sa blackmailing ka hathiyaar hai, jiske dam par vah itna bekhauf ghoom raha hai." Chandan baba (kaampti saans chhodte hue): "Samajh gaya beta." Sartaj (taakeed karte hue): "Bas apne man par kaabu rakhiyea, apni neeyat ko kisi bhi haal mein dagmagaane mat dijie... aur Sher ki har chhoti-badi harkat ki khabar mujh tak pahunchaate rahiye." Chandan baba ne kaampte haathon se call kaati aur phone band kar liya. Sartaj ki taraf se hari jhandi to mil chuki thi, lekin ab unke saamne sabse bada dharmasankat khada tha—ki is khatarnaak naatak ko nibhaate-nibhaate, kahi unka apna bhatakta hua man sachmuch paap ki us daldal mein poori tarah na doob jaaye. --------------- Call katne ke baad, Sartaj ne apne phone ki screen par ubhri un tasveeron ko dhyaan se dekhna shuru kiya. Pehli nazar mein to sirf itna hi dikh raha tha ki Meera bekhabar so rahi hai. Lekin jab Sartaj ne zoom karke background ko kareeb se dekha, to uske pairon tale zameen khisak gayi. Tasveeron mein nazar aa rahi deewaren, pardo ki salwaraten aur nightstand—sab kuch usi ke apne bedroom ka tha! Uski nigahaen ab Meera ke kapdon par tik gayiin. Ek gahra jhatka uske zahan mein laga—yeh wahi nighty thi jo Meera ne theek do raat pehle pahni thi! Wahi raat, jab aadhi raat ko achanak emergency duty ki वजह se usse ghar chhodkar jaana pada tha. Iska seedha matlab yeh tha ki Sartaj ke ghar se nikalte hi, aadhi raat ke sannaate mein Sher uske bedroom mein daakhil hua tha. Sartaj ka maatha bhinbhina utha. Kai zaheereele sawaal ek saath uske dimaag mein kaundhne lage—kya us darinde ne sirf tasveeren kheenchkar hi dam liya? Kya uske paas isse bhi zyaada aapattijanak aur beparda tasveeren hain? Ya phir... usne sooi hui Meera ke saath tasveeron se bhi zyaada kuch khaufnaak aur ghinowna kiya tha? Lekin Meera... Meera to pichhle do dinon se bilkul saamaanya vyavahaar kar rahi thi. Kya iska matlab yeh tha ki vah is poori vaardaat se poori tarah bekhabar thi? Kya usse bhanak tak nahi lagi ki koi uski aabroo par daaka daalkar chala gaya? Tasveeron ko aur dhyaan se dekhte hue, Sartaj ko ab Chandan baba ke dharmasankat ki gahrai ka poori tarah ehsaas hua. Is umr mein baba ko apni hi bahu-beti samaan Meera ki aisi beparda aur aapattijanak tasveeren dekhne par majboor kiya ja raha tha, aur uupar se us darinde dwara unse poochha ja raha tha ki ve uske saath kya-kya karna chahenge! Kya Sher baba ke man ko poori tarah bhrasht karne ki saazish rach raha tha? Ya phir usse baba par shak tha aur vah isse ek imtihaan ki tarah istemaal kar raha tha? Yeh sab sochte-sochte Sartaj ka dimaag phatne laga tha. "Vah mere IPS ke rutbe se bhi nahi darta... uske paas yakeenan kuch aisa thos 'leverage' hai, jiske dam par vah itna bekhauf hokar mere hi ghar mein sendh laga raha hai!" Sartaj ne daant peeste hue khud se kaha. Kuch pal gahra vichaar karne ke baad, usne turant apna phone uthaaya aur apne khaas mukhbiroon ko Sher ki poori background jaanch karne ka hukm diya. Saath hi, usne Sher ke phone calls ko surveillance par daalne ke nirdesh diye. Iske turant baad, usne cyber crime unit mein tainaat apne ek behad bharosemand dost ko call milaaya. Usne Sher ka phone hack karke uske andar ka saara private data, tasveeren aur chat nikaalne ko kaha. Sartaj ne saaf taakeed ki ki yeh kaam poori tarah unofficial hona chahiye—vah khud us saare data ki jaanch karna chahta tha. Sartaj chahta to ek IPS officer hone ke naate Sher ko chutki bajaate hi uthwa sakta tha aur is zameen se hamesha-hamesha ke liye gaayab karwa sakta tha. Lekin uska haath ek khaufnaak dar ne rook rakha tha. Agar Sher ke peeche koi poora girooh kaam kar raha hua? Agar uske saathiyon ke paas Meera ki isse bhi zyaada aapattijanak tasveeren ya video hue aur Sher ke gaayab hote hi unhone usse internet par upload kar diya to? Meera aur uski maasoom Jyoti ki zindagi to jeete-jee tabaah ho jaayegi! Vah apni saakh aur Meera ki izzat ke saath aisa koi risk nahi le sakta tha. Koi bhi antim kadam uthaane se pehle, usse is poori saazish ki tah tak pahunchna hi hooga. ------------ Call katne ke baad Chandan baba ke man ko kshanbhar ke liye raahat to mili. Unke haath mein phone tha aur screen par Meera ki ve tasveeren jas ki tas khuli hui theen. Ve khud ko rook nahi paaye. Nazaron ko pheurne ki tamaam naakam koshishon ke baavajood, unki aankhen waapas phone ki screen par ja tikiin. Viagra ki tez dawa ka asar unke khoon mein pehle se hi uphaan maar raha tha. Jaise hi unki nigahaen sooi hui Meera ki beparda tasveeron par padiin, unke shareer ke bheetar vaasna ki ek bhayankar lahar daud gayi. Unka lund pal bhar mein phir se patthar ki tarah sakht aur bekaabu ho gaya. Chandan baba ki neeyat poori tarah dagmagaane lagi. Unke adharon se ek halki, kaamuk aah nikli. "Haaye... kitni khoobsurat hai Meera bitiya..." unhone tasveeron par uungliyan pheerte hue man hi man kaha. Unki nigahaen Meera ke sudaul jism, uski khuli hui gori jaanghon aur nighty ke dheele gale se jhaangkte hue vakshasthal par jaakar atak gayiin. "Kya jaanghen hain... kya ubhaar hain... jism ka ek-ek ang." Ab tak jo dar aur sankoch unke man mein dharmasankat bankar baitha tha, vah Sartaj ki zubaani 'hari jhandi' meelte hi ek khatarnaak laalach mein badalne laga. Unke bheetar chhipe vaasna ke bhediya ne achanak se apne panje phaila liye. "Ab to Sartaj ne khud mujhe chhoot de di hai..." Chandan baba ki aankhon mein ek chamak tairne lagi. Unki nazaren phone ki screen par chipki Meera ki tasveer par gad gayiin, jahaan unka haath bekaabu hokar phir se chalne laga. "Ab to main Meera bitiya ko bejhijhak chhoo bhi sakta hoon..." unhone ek gahri, vaasnabhari saans kheenchte hue khud se kaha. "...uske is makhmali jism ka maza le sakta hoon!" Ve apne hi dimaag mein bune ja rahe is naapaak jaal ki baareekiyon ko sochkar man hi man muskuraane lage. "Aur agar... agar Meera ko kabhi zara bhi shak hua bhi," unke adharon par ek muskaan ubhri, "ya usne ro-dhookar Sartaj se meri shikayat bhi kar di..." Unhone ek pal ka viraam liya, aur unki aankhon mein ek chaalaak aur vikrit aainthan aa gayi. "...to bhi Sartaj yahi samajhega ki yeh sab to maine sirf Sher ka bharosa jeetne aur uske raaz ugalwaane ke liye kiya hai!" Chandan baba ne ek santoshbhari, kutil saans chhodi. "Sartaj kabhi mujh par shak nahi karega... vah to ulte meri is neechta ko mera tyaag samajhega!" Is vichaar ke dimaag mein aate hi Chandan baba ke chehre par ek muskaan phail gayi. Aryaada aur paap ke beech ki baareek lakeer unke liye hamesha-hamesha ke liye mit chuki thi. Sher ke saamne naatak karne ka jo bahana unhen mila tha, vah ab unki apni havas ko poora karne ka sabse bada aur mahfooz dhaal ban chuka tha. Tasveer mein dikh rahe Meera ke makhmali jism ko takatki lagaaye dekhte hue Chandan baba ka haath bekaabu hokar apni langot ke bheetar chala gaya. Havas aur viagra ke mile-jule asar mein andhe hokar ve tezi se apna haath chalaane lage. Kamre mein nal ke bahte paani ki sarasraahat ke beech unki ukhdi hui saansen aur bhi bhaari hoti chali gayiin. "Meera bitiya... aaha, Meera bitiya..." Zubaan se ghinowne raseele bool nikaalte hue, apni hi bahu-beti samaan Meera ka naam le-lekar unhone khud ko shaant kiya. Vaasna ka vah andha uphaan jaise hi charam par pahunchkar thanda pada, unka shareer dheela pad gaya aur ve haanfte hue bathroom ki deewar se tik gaye. Lekin aagali hi kshan, jaise hi dimaagi dhundh chhanti, Chandan baba par aapraadhboodh ka ek pahaad toot pada. Apne hi haathon par lage us paap ke chipchipe ehsaas ko dekhkar unki rooh kaamp uthi. "Hey Bhagwan! Yeh maine kya kar diya? Main kis neechta par utar aaya hoon?" unhone kaampte haathon se turant apna chehra dhooya, maano paani unke bheetar ke paap ko baha dega. Unka man bhaari aatm-glaani aur sharm se bhar gaya. Ve ghutnon ke bal baithkar apni hi hatheli ko dhikkaarne lage. Kis museebat mein phans gaye hain ve? Ek taraf Sher unhen apni uungliyon par nachaa raha tha, aur doosri taraf unki apni hi sooi hui vaasna unhen jaanwar bana rahi thi. Kya se kya bante ja rahe the ve? Ek buzurg baba se girkar ek badneeyat insaan? Sartaj aur Meera ka chehra unki band aankhon ke saamne ghoomne laga. Sartaj ne unhen apne pita jaisa maan diya tha, apne ghar mein sharan di thi, aur Meera bitiya... jisne hamesha ek beti ki tarah unki seva ki, unke khaane-peene ka dhyaan rakha, kabhi koi kami nahi hone di. Un dono ke kitne ahsaan the un par! Aur ve kya soch rahe the? Sartaj ke diye bharose ka istemaal ve apni havas mitaane ke liye karne ki baat soch rahe the? "Chhee! Re Chandan... too to Sher se bhi bada darinda nikla!" Chandan baba ne khud ke gaal par ek thappad jada. Unki aankhon se pachhtaave ke aansoo bah nikle. Ve samajh gaye the ki agar unhone apne man ke is shaitan par turant kaabu nahi paaya, to Sher ka shikaar banane se pehle ve khud apni hi nazaron mein poori tarah tabaah ho jaaenge. --------- Aaj Jyoti ki college ki chhutti thi. Naashta karne ke baad vah aur Meera kothi ke baageeche ke paas tahal rahi theen. Meera ne safed rang ka silk robe pahan rakha tha, jiske neeche halki safed slip jhalak rahi thi. Jaise-jaise Meera befikr hokar kadam badhaa rahi thi, robe ke andar uske sudaul mammon ki chaal aur ubhaar mein ek ajeeb sa lacheelaapan tha. Door khada Sher ne apni paarkhi nazaron se dekhte hi andaaza laga liya. Sher (man hi man badbadaaya): "Ufff maadarchod... aaj to maalkin bina bra ke hi ghoom rahi hain! Robe ke neeche mamme kaise aazaad hokar uchhal rahe hain. Aur andar ki panty... zaroor ya to kaali hoogi ya phir safed! Kya maal lag rahi hai saali subah-subah!" Isi beech, Sher ne badi chaalaaki se subah ki chai mein vaid ki viagra ki aadhi khooraak aur ghoolkar Chandan baba ko pila di thi. Dawa ki nai khooraak pet mein jaate hi aur Hanuman Chalisa ka asar khatam hote hi, Chandan baba ki aankhen bhatakne lagiin. Ve baageeche ke doosre koone mein jhaadiyon ke paas khade hokar Meera ki taraf dekhne lage. Sher ne jab Chandan baba ki taraf dekha, to uske chehre par ek kutil muskaan phail gayi. Chandan baba ki nigahaen ab Meera ke us safed robe mein jhoolte hue mammon aur uski kamar ke matkaav par tikne lagiin. Tabhi unke bheetar ek saath alag-alag soch ki paraten takraane lagiin—ek taraf unhen Sher ko jhaanse mein leene ke liye kaamukta ka naatak karna tha, doosri taraf Chandan ke bheetar dawa ke nashe mein sulagta hua bhatakta hua kaamuk man tha, jo Meera ke is roop ko dekhkar bekaabu ho raha tha. Sher samajh gaya ki uski chaal kaamyaab ho rahi hai—60 saal ka yeh saadhu ab uski bichhaai havas ke jaal mein phansata dikh raha hai. Tabhi Sher ke dimaag mein ek vichaar aaya. Usne turant Jyoti ko paas bulaaya aur uske kaan mein kuch phusphusaa diya. Jyoti to bachhi thi, vah khel ke mood mein khush ho gayi. Jyoti ne baageeche mein lagi paani ki pipe uthaayi aur uska muunh seedhe Meera ki taraf karke paani chaalu kar diya. Meera (hanste aur bachate hue cheekhi): "Are Jyoti beta... mat karo, main poori bheeg rahi hoon!" Lekin Jyoti ko masti soojh rahi thi, vah khilkhilaate hue Meera par paani ki dhaar maarti rahi. Dekhte hi dekhte kuch hi minuten mein Meera sir se paanv tak poori bheeg gayi. Uska safed silk robe aur neeche ki slip paani se saraabor hokar uske gore jism se ekdam chipak gaye, jisse uske shareer ke saare sudaul utaar-chadhaav saaf ubhar aaye. Safed kapda bheegte hi lagbhag paardaarshi ho gaya—uske ubhre hue mamme, mammon ki dhaal aur raanon ka kasaav saaf jhalakne laga. Baageeche ke doosre koone mein khade Chandan baba aur paas khade Sher—dono ki aankhen hairat aur havas ke maare phati ki phati rah gayiin! Tabhi Jyoti daudkar aai aur paani ki pipe Sher ke haath mein thamaate hue booli, "Sher bhaiya, ab mere uupar bhi paani daalo!" Sher (kameeni muskaan chhipaakar boola): "Haan-haan Jyoti beti, abhi daalta hoon!" Sher ne pipe haath mein li aur Jyoti par paani daalte-daalte apni asli chaal chal di. Usne jaanboojhkar pipe ka muunh Meera ki taraf ghumaa diya. Ab paani ki tez dhaar seedhe Meera ke bheoge hue robe par gir rahi thi—kabhi uske aazaad jhoolte mammon par, to kabhi uski dono jaanghon ke bilkul beech mein! Paani ke dabaav aur bahaav se Meera ke robe ki doori dheeli hokar khool gayi. Bheega hua safed robe kandhon se sarkakar side ho gaya, aur andar ki patli slip mein Meera ka sudaul, paani se nahaya hua badan poori tarah beparda hone laga. Meera paani se bachne ke liye apne haathon se seene ko dhakne ki koshish kar rahi thi, par Sher ki pipe ki tez dhaar baar-baar uske jism ke sabse kaamuk hisson ko nishaana bana rahi thi. Jaise hi Meera paani ki seedhi dhaar se bachne ke liye jhatke se peeche ghoomi, Sher ki aankhen uski bheegi hui peeth aur paani se chipke robe ke andar jhaangkti uski ubhri hui gaand par gad gayiin. Lekin Meera ke ghoomte hi, baageeche ke doosre koone mein khade Chandan baba ko saamne ka poora nazaara saaf-saaf dikh gaya. Meera ke bheoge robe ki doori poori tarah khool chuki thi. Andar pahni patli safed silk ki slip thande paani se bheegkar uske gore badan par chipak gayi thi. Thande paani ke jhonkon se uske dono sudaul mamme ekdam akadkar sakht ho chuke the, aur patle kapde ke paar se uske gulaabi nipple baahar ki taraf saaf ubharkar jhaangke rahe the. Neeche raanon ke paas se paani mein bheegi hui uski panty ki jhalak alag hi kaamuk lag rahi thi. Yeh nazaara dekhte hi Chandan baba ke bheetar teenon vichaar ek bhayankar maansik yuddh mein ulajh gaye. "Mujhe Sher ko dikhaana hooga ki main bhi uski tarah havas mein andha ho chuka hoon..." unhone man hi man socha. Sher ka bharosa jeetne ke liye unhone apni aankhen phaad liin aur muunh khoolkar khade ho gaye, taaki Sher ko yahi lage ki ve poori tarah is drishya ke nashe mein doob chuke hain. Iske saath hi, unke dimaag ke ek koone mein Sartaj ka khayaal kaundha. "Mujhe Sartaj ka saath nibhaana hai... mujhe is neech ki har chaal naakaam karni hai," unhone khud ko yaad dilaane ki koshish ki. Lekin in dono mukhaoton ke peeche unka asli, bhatakta aur vaasna se bhara man is kadar haavi ho chuka tha ki ve chaahkar bhi apni aankhen us drishya se hata nahi paa rahe the. "Hey Bhagwan... kya roop hai iska!" unka bhatakta man andar hi andar cheekh utha aur unki nigahaen Meera ke bheoge jism par poori tarah jam gayiin. Nason mein daudti viagra, raat ki neeli filmon ki ashleelta aur saamne bikhre is nange jism ke husn ne 60 saal ke us 'saadhu' ke eemaan ko poori tarah raakh kar diya tha. Unki dhoti ke andar ka lund lohe ki chhad ki tarah aisa akadki ki unki saansen ukhad gayiin, aur ve khud ko vaasna ke us bahakte hue daldal mein utarne se rook nahi paaye. Chandan (apni raal tapkaate hue, aankhen phaade man hi man haanfkar budbudaaya): "Ufff... Hey Ram! Sher bilkul sahi kahta hai... Meera bitiya to sachmuch poori maal hai! Saala, Bollywood ki saari heroinen iske saamne paani bharengi! Kal raat jo neeli filmon mein auraten dekhi theen, wo to is badan ke aage kuch bhi nahi hain... kya uphaan hai iske mammon mein!" Chandan baba ke muunh se 'bitiya' shabd nikla to zaroor, par ab usmein koi baap wala pyaar nahi, balki sirf havas ki gandi boo aa rahi thi. Udhar door khada Sher, Chandan ke is badle hue roop aur unki dhoti ke ubhaar ko taadkar hansi hans raha tha. Usse samajh aa gaya tha ki buddha ab poori tarah se uske rang mein rang chuka hai. Sher (Jyoti ki taraf dekhkar cheekha): "Jyoti beti! Pakdo apni mamma ko... dekho bhaag rahi hain!" Jyoti befikri mein hanste hue Meera ki taraf jhapati. Isi beech Sher ne pipe ka pressure aur tez kar diya aur dhaar seedhe Meera ke bheoge hue jism par maar di. Meera paani se bachne ke liye tezi se peeche hatne lagi, par Jyoti ne daudkar peeche se uska bheega hua robe kaskar pakad liya. Kheenchataanmi mein bheoge kapde ka dabaav badha aur robe poori tarah Meera ki baahon se chhootkar neeche zameen par gir gaya. Ab Meera ke badan par sirf paani se tar-batar, paardaarshi jaisi patli safed slip bachi thi, jo uske gore jism se aise chipki thi jaise uske uupar koi kapda hi na ho. Paani ki tez bauchhaar se badhavaas hokar Meera bina dekhe baageeche ke doosri taraf bhaagi—jahaan Chandan baba khade the. Paani ke bahaav aur geeli ghaas par fisalne ki वजह se Meera ka santulan bigad gaya aur vah seedhe jaakar Chandan baba se zordaar tareeqe se takraa gayi! Dhakke ka prabhaav itna tez tha ki Chandan baba khud ko sambhaal nahi paaye aur peeth ke bal ghaas par gir pade, aur Meera seedhe unke uupar aa giri. Nazaara poori tarah ashleel ho chuka tha. Meera ka paani mein bheega hua badan poori tarah Chandan baba ke seene se chipka hua tha. Patli slip ke paar se uske thande paani se akde hue, sakht mamme seedhe Chandan baba ki chhati par buri tarah pis rahe the. Girte waqt khud ko aur Meera ko sambhaalne ke chakkar mein Chandan baba ke dono haath apne aap Meera ke bheoge hue shareer par chale gaye—aur unki chaudi hatheliyan seedhe Meera ki nangi jaisi paani se chipki gaand par jaakar kas gayiin! Chandan baba ke nathune Meera ke bheoge hue baalon aur uske garm-thande jism ki mahak se bhar gaye. Unke neeche dabe kadak ang par Meera ki jaanghon ki ragad saaf mehsus ho rahi thi. Saat saal ke is shareef aur nek insaan ka saara sanyam, saare sanskaar us ek second mein dagmagaane lage. Ek taraf to unka man is pavitra rishte ko bachaane ki duhai de raha tha, par doosri taraf ek dhalti umr ke mard ki dabi hui havas aur vaid ki dawa ki aanch Meera ki kayaamat jaisi sundarta ke saamne ghutne teek rahi thi. Ve chaahkar bhi apne haathon ko peeche kheench nahi paaye aur uungliyon ka dabaav apne aap badhta chala gaya. Udhar thodi doori par khada Sher pipe thaame zaheereeli hansi hans raha tha. Uska bichhaaya jaal poori tarah kaamyaab ho chuka tha—ab Chandan baba is khel ke seedhe hissedaar bante dikh rahe the. Meera ke akde hue mamme jab unki chhati se buri tarah pise, to viagra aur neeli filmon ki bhadki hui aag ne Chandan ke dimaag par poori tarah kabza kar liya. Girte waqt Chandan ke haath bekhayaali mein Meera ki gaand par to gaye the, lekin jaise hi unki uungliyon ne us bheegi hui safed panty ke paar se Meera ki sudaul, bhari hui gaand ka maansal kasaav mehsus kiya, unki hatheliyon ki pakad anjaane mein kasti chali gayi. Chandan baba ne Meera ki gaand ko apni badi hatheliyon se dabooch liya. Ve khud ko koosne hue bhi us anchaahe, maadak sukh ke ras mein kheinchte chale ja rahe the. Udhar door khada Sher apni kaamyaabi par man hi man atthahaas kar raha tha. Usne is ashleel pal ko aur bhadkaane ke liye pipe ki tez dhaar seedhi un dono par maar di. Ab thanda paani Chandan baba aur Meera dono ko buri tarah bhigoo raha tha. Paani ke tez bahaav aur zameen par fisalne ki वजह se Chandan baba ki safed dhoti kamar se poori tarah khool chuki thi. Unki kaali, gathili aur baalon se bhari jaanghen poori tarah nangi ho gayiin theen aur ve Meera ki gori, bheegi hui nangi chikni jaanghon ke theek beech mein kaskar phans chuki theen! Paani ki thandak aur Meera ki sudaul jaanghon ke seedhe sparsh se Chandan baba ke badan mein bijli si daud gayi. Unki khuli hui dhoti ke neeche se unka kadak lund Meera ke paani se bheoge kapdon ke paar uski jaanghon ke beech tezi se ragad khaane laga. Meera paani ki dhaar aur achanak hue is haadse se itni badhavaas thi ki vah samajh hi nahi paa rahi thi ki neeche uske baba tulya Chandan ke haath uski panty ko kis tarah dabooch rahe hain, aur unki gathili jaanghen uski taangon ke beech kya mehsus kar rahi hain. Bheoge hue paani ki bauchhaar ke beech jaise hi Chandan baba ne nazar uthaayi, unki aankhen seedhe Sher se ja miliin. Sher chehre par ek shaitani, kameeni muskaan liye khada tha. Usne Chandan baba ki taraf dekha aur aankh maarte hue uungliyon ke ishaare se kaha— "Aur kas le baba! Daba ke maza le is mauke ka... apne haath uupar khisak aur thoda aur seene se sata le is maalkin ko!" Sher ke is uksaave ne Chandan baba ke bheetar Sartaj ke liye jaari naatak ko asli havas mein badal diya. Ve Sher ko yeh dikhaane ke liye bhi aatur the ki ve uske khel mein shaamil hain, aur saath hi Meera ki nasheeli deh ke moze ne unki shareefiyat ki bachi-khuchi door bhi tood di. Chandan baba ki chaudi hatheliyan Meera ki bheegi panty se sarkati hui uupar ki taraf badhiin. Haathon ke is bahaav ke saath Meera ki patli, bheegi hui silk ki slip bhi uupar kheinchte lagi, jisse Chandan baba ke haath seedhe uski nangi, gori peeth par ja tike. Chandan baba (man hi man kaamukta mein bekaabu hote hue): "Ahhh... kya makhmali chamdi hai! Meera ka yeh jism... aaj to Bhagwan ne khud mere haathon mein saump diya hai." Saamne ka manzar behad kaamuk ho chuka tha—Meera ke sudaul, paani se nahaye mamme slip ke kapde se baahar nikalakar beparda hone ki kagaar par the, aur unka kadaav seedhe Chandan baba ki chhati par pis raha tha. Chandan baba (man hi man haiewaaniyat bhari muskaan ke saath): "Chhoo le Chandan... aaj koi rookne wala nahi hai. Sartaj to samajhega ki too farz nibhaa raha hai, aur yeh bechaari samajh rahi hai ki yeh sirf ek haadsa hai! Kya bewakoof banaaya hai dono ko!" Udhar yeh sab dekh rahe Sher ke hotHon par ek darindagi bhari muskaan phail gayi. Sher (man hi man dhithaai se hanste hue): "Waah baba waah! Baahar se bada saadhu banta hai aur andar bahti Ganga mein haath dhoo raha hai! Is boodhe ko to viagra aur havas ne poori tarah andha kar diya hai." Sher (man hi man chatkaane wale andaaz mein): "Daba baba, kaskar daba! Ab to too meri uungliyon par naachega!" Chandan baba ki gathili jaangh poori tarah Meera ki bheegi, gori aur chikni jaanghon ke beech phansi hui thi. Meera ne ghabraakar uthne ki koshish ki, "Are... baba! Mujhe uthne dijie..." Lekin Chandan baba ne apne haath uski nangi peeth par aur kas diye aur dhong rachte hue usse waapas apni chhati par kheench liya. Chandan (dikhaave ke liye chintaajanak aawaz mein boola, par haath uski peeth par kasta raha): "Are-are Meera bitiya! Aaram se... sambhal ke! Kahi choot to nahi aai na tumhe? Kahi fisal na jaao... rook jaao, main tumhe pakde hue hoon!" Sher (door khada hokar, pipe ki dhaar tez karte hue, man hi man atthahaas karne laga): "Waah re mere saat saal ke bhagat buddhe! Saala mujhse bhi bada hawasi nikla! Kaise haathon ko nangi peeth par phira raha hai aur 'bitiya-bitiya' chillaakar mamme apni chhati mein pele ja raha hai. Ab aaya na oont pahaad ke neeche!" Meera bebas hokar Chandan ke uupar phansi hui thi, yeh samajhe bina ki uske baba ka naqaab utar chuka hai aur unki ragad khaati hui jaanghen aur nangi peeth par sarkate haath kisi pita ke nahi, balki husn ke jaal mein ulajhe ek kaamuk mard ke hain. Jaise hi Meera ko apni haalat andaaza hua, uske badan mein siharan daud gayi. Usne apni poori taakat lagaakar Chandan baba ke seene par haath rakha aur dhakka dete hue booli, "Chandan baba, chhodie mujhe!" Chandan baba ka dil to nahi maan raha tha aur ve usse apni chhati se hi chipkaaye rakhna chahte the, par baat bigadte dekh unhen na chahte hue bhi apni pakad dheeli karni padi. Jaise hi Meera jhatke se Chandan baba ke uupar se uthi, uski slip uupar ki taraf khisak gayi. Chandan baba ki havas bhari aankhon ke theek saamne Meera ke lagbhag 75% nange, sudaul aur thande paani se akde hue mamme poori tarah beparda ho gaye. Hawa ki thandak se uske gulaabi nipple saaf jhalak rahe the. Chandan baba abhi is nazaare ko apni pyaasi aankhon se pee hi rahe the ki tabhi Jyoti khel-khel mein Meera ke uupar aa giri. Meera apna santulan sambhaal nahi pai aur jhatke se waapas neeche giri, lekin is baar Chandan baba ke haath anjaane mein aage phaile hue the. Jaise hi Meera unke uupar giri, Chandan baba ki hatheliyon mein Meera ke ve dono lagbhag nange mamme poori tarah bheench gaye. Meera ne Jyoti par chillaate hue kaha, "Kya kar rahi ho beta, mujhe choot lag jaayegi! Uupar se utho turant!" Idhar Chandan baba, jinke haathon mein Meera ke kasaav bhare mamme pehle hi dabe hue the, ve is sunhare mauke ko ganwaane wale kahan the. Unhone turant is mauke ka poora fayda uthaaya. Jyoti ka bhaar Meera par hone ki aad mein, Chandan baba ne apni hatheliyon mein phanse Meera ke un garm aur sudaul mammon ki narmaai ko poori shiddat se mehsus kiya. Vaasna se andhe hokar unhone apni pakad aur mazboot ki aur ek jhatke mein Meera ke dono mammon ko kaskar zor se daba diya. Meera ko apne mammon par Chandan baba ke haathon ka dabaav saaf mehsus hua. Jaise hi usne virodh karne ke liye apna muunh khoola, Chandan baba ne fauran kaha, "Maaf karna Meera beti... tum khud achanak mere uupar aa giri ho!" Muunh se to ve maafie maang rahe the, lekin unke haath kuch aur hi kar rahe the. Unhone behad chaalaaki bhare tareeqe se Meera ki slip ko thoda aur kinaare khisakaaya aur apni uungliyon se uske akde hue nipple ko kaskar ragad diya. Us achanak lage teekhe sparsh aur siharan se Meera ke muunh se besaakhta ek siskaari nikal gayi, "Aah!" Jyoti ne is ek mazedaar khel samajha aur Meera ki baat ko poori tarah nazarandaaz kar diya. Vah hansti hui Meera ke uupar hi jami rahi, jisse Meera neeche poori tarah asahaay hokar dabi rah gayi. Meera ke liye is waqt hile bina hatna lagbhag naamumkin ho chuka tha. Uupar se Jyoti ka wazan tha aur neeche Chandan baba ka shareer, jinki neeyat phir chuki thi. Chandan baba ne Jyoti ke uupar baisthe rahne ka poora fayda uthaaya. Unhone apni uungliyon ki pakad Meera ki chhati par aur gahri kar di. "Beti Jyoti, zara sambhalo... Meera bitiya ko choot lag jaayegi," Chandan baba ne muunh se to Jyoti ko hataane ka dhong kiya, lekin neeche unke haath Meera ke dono mammon ko apni hatheliyon mein poori tarah sahla rahe the. Ve yeh sab itne chaalaak andaaz se kar rahe the taaki Meera ko yahi lage ki yeh sab sirf anjaane mein aur santulan khoone ki वजह se ho raha hai. Meera (man hi man ghabraate hue, chehre par sharm aur bebasi ke rang liye): "Hey Bhagwan... yeh kya ho raha hai!" Uska chehra laal pad chuka tha. Vah ab tak yahi samajh rahi thi ki baba ka yeh sparsh mahaz anjaane mein hua ek haadsa hai. Meera (khud ko tasalli dete hue, jhijhakti saanson mein): "Nahi... baba aisa nahi kar sakte. Main hi to unke uupar aa giri hoon..." Haalaanki unki uungliyon ka har dabaav, nipple par unke angoothe ki halki maalish aur apni chhati se takraata hua unka akda hua lund—sab kuch usse mehsus ho raha tha, lekin vah khud ko yahi samjha rahi thi ki yeh sab is vikat paristhiti ka hi ek hissa hai, kyonki aakhirkaar wahi to santulan khookar baba ke uupar giri thi. Meera (dheemi, kaampti phusphusaahat mein): "Baba... zara hatiye na..." Lekin Chandan baba par to viagra aur havas ka bhoot poori tarah sawaar tha. Ve apni uungliyon ko Meera ki slip ke andar sarkate hue uske nange, garm vakshasthal ki tvacha ko seedhe sahlaane lage. Jyoti ke uupar hone ka bahana banaakar ve khud ko thoda aur uupar khisakaate gaye, jisse unka kadak lund Meera ki bheegi naabhi se ragad khaata hua seedha uski pet ki neechli tvacha par dabaav banaane laga. Chandan baba (maasoombiyat ka naatak karte hue): "Meera beti... main kaise hatoon? Mere uupar to tum aur Jyoti dono chadhi hui ho! Jab tum uupar se hatogi, tabhi to main bhi uth paunga..." Muunh se to ve apni bebasi jata rahe the, lekin neeche unke haath Meera ke nange mammon ko marodjne mein lage the aur unki kamar ka halka dabaav Meera ki pet ki neechli tvacha par unke kadak lund ki maujoodgi ko saaf bayaank kar raha tha. Meera ki sahanshakti ki ab inteha ho chuki thi. Meera (gusse mein tamtaamaate chehre ke saath, Jyoti par chillaate hue): "Beta! Aapko sunai nahi deta main itni deer se kya kah rahi hoon?! Is waqt mere uupar se hato, turant!" Jyoti apni maan ki aisi kadak, teekhi aur gusse se bhari aawaz sunkar buri tarah dar gayi. Uski hansi hawa mein hi gaayab ho gayi. Jyoti (sahmi hui aawaz mein): "M... mummy... sorry..." Jyoti dar ke maare jhatke se Meera ke uupar se neeche utar gayi aur ek taraf hatkar khadi ho gayi. Raasta saaf hote hi, Meera ne apni poori taakat lagaai aur Chandan baba ki chhati par haath rakhar khud ko unke uupar se jhatke se uthaaya. Par us achanak lage jhatke ki वजह se Meera ki khisaki hui slip aur neeche sark gayi, aur uske dono sudaul mamme chhalkar slip ke baahar beparda ho gaye. Meera (haanfte hue, bebasi aur ghabraahat mein apne bheoge kapdon ko sambhaalne ki koshish karte hue): "Hey Bhagwan..." Chandan baba ke haathon se Meera ke garm mamme bhale hi chhoot gaye the, lekin unki bhookhi aankhen lagaataar is kaamuk nazaare ko pee rahi theen. Chandan baba (nazaren churaane ka naatak karte hue, par aankhen Meera ke mammon par hi tikaaye haklaakar boole): "Are... are Meera bitiya! Apne... apne kapde theek karo! Kahi... kahi kisi ki nazar na pad jaaye..." Yeh sunte hi Meera ka chehra sharm aur apmaan se laal-surkh ho gaya. Meera (jhatke se apne dono haathon se seene ko dhakte hue, sahmi aur sharminda aawaz mein): "Aahh... ji... ji baba..." Usne turant slip ko uupar kheenchne ki naakam koshish ki, lekin bheegi hui patli silk ki slip to ab bas naam ki hi bachi thi—uska paardaarshi kapda aur ubhre hue gulaabi nipple uski deh ka har raaz saaf bayaank kar rahe the. Vah ek pal bhi wahan rookna bardaasht nahi kar saki aur ghabraakar, bina peeche mude, bhaagte hue kothi ke mukhya darwaze ki taraf chali gayi. Yeh sab dekh rahe Sher ne turant mauka taada. Usne door se hi Chandan baba ki taraf dekha, ek kameeni aankh maari aur haath se ishaare mein jataaya ki 'kya kaam kiya hai baba!' Sher (Chandan se phusphusaakar boola): "Baba, aap Jyoti beti ko sambhaalo aur iske saath khelo... main zara maalkin ko tauliya dene andar jaata hoon!" Itna kahkar Sher ne pipe ko zameen par pheenka aur dabe paanv, bheegi Meera ke peeche-peeche mukhya kothi ke andar bhaag gaya.
Deepak Kapoor
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18-09-2026, 05:44 AM
18-09-2026, 05:29 PM
Badhiya update diya bhai...par ab jaldi se meera ki damdaar chudai bhi karwado
20-09-2026, 02:50 AM
Awesome update. Thanks for the story, dont let lion fuck easily..make her beg. More erotic scenes, include adventure and thrilling experience without sex.
20-09-2026, 04:30 AM
Waah yar kia scene likha kamaal kar gaye ye chandan to bht shatir khiladi hai dono traf sa khel raha awsome update
20-09-2026, 06:13 AM
(20-09-2026, 04:30 AM)Rizzi1198 Wrote: Waah yar kia scene likha kamaal kar gaye ye chandan to bht shatir khiladi hai dono traf sa khel raha awsome update chandan right now in fighting battle within himself . where sometime loyalty wins and sometime lust wins . Lets see how it works out in future .
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Yesterday, 10:13 PM
Eagerly waiting for the next update
Dekhte hain towel dene mein sher kitna time lagayega It's been a while he has been waiting for his turn All the twists are erotic and fun Great complex writing . Hats off to the writer
7 hours ago
Great update.
Finally Chandan baba has tasted the erotic pleasures of kneading Meera's boobs. Let's see if baba goes on to do much more under influence of viagra in future. Now we get to see if Sher can get his chance with Meera in the house, while she is almost naked and horny too after getting touched by Baba. Expect to see some steamy scene between Sher and Meera, possibly leading to them having sex finally. Great build up of the story and all characters. Maybe we can introduce another female maid character wherein she is atteacted to Sher and eventually this makes Meera jealous and brings her closer to Sher. Just a suggestion though. As always, waiting for the next update.
4 hours ago
(Yesterday, 10:13 PM)Crazy007 Wrote: Eagerly waiting for the next update Thanks For feedback . I like it when fans engage with me with meaningful comments . that motivate me to write more
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