04-09-2026, 09:25 AM
Very nice writing
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Thriller बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ?
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04-09-2026, 09:25 AM
Very nice writing
12-09-2026, 10:03 PM
"देख भाई, यह दृश्य वैसा ही है जैसा किसी पुराने राजमहल में दासी का स्वागत होता था," हरीश ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा और सोफे की नरम गद्दियों पर अपना वजन डालते हुए विवेक के बगल में बैठ गया। कमरे की हवा में एक अजीब सी उत्तेजना और तनाव था। हरीश ने अपनी नजरें कमरे में खड़ी चैताली पर टिकाईं, जो उनकी नजरों में महज एक खिलौने की तरह थी। हरीश की आवाज में एक आदेशात्मक लहजा था जब उसने कहा, "अब बहुत देर हो चुकी है, चैताली को काम पर लगाओ। इसे समझाओ कि इसका असली मकसद क्या है और आज इसकी सेवा का स्तर क्या होना चाहिए।"
चैताली, जो पहले से ही उनकी इच्छाओं के सामने समर्पण कर चुकी थी, बिना एक शब्द बोले धीरे से उनके चरणों की ओर बढ़ी। उसने अपनी कमर झुकाई और बड़ी विनम्रता के साथ उनके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गई, जैसे वह उनकी दासी हो। विवेक और हरीश दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर एक साथ अपनी पैंट्स ढीली कीं, जिससे उनके उत्तेजित लन्ड बाहर निकल आए।
चैताली ने अपनी नजरें नीचे झुकाईं और सबसे पहले विवेक के कठोर लन्ड की ओर बढ़ी। उसने बड़े प्यार और कुशलता से उसे अपने मुँह में लेना शुरू किया। वह धीरे-धीरे उसे चूसने लगी, उसकी जीभ बड़ी बारीकी से लन्ड के ऊपरी हिस्से और उसके चारों ओर घूम रही थी, जिससे विवेक के चेहरे पर सुखद झुर्रियां पड़ गईं। लेकिन हरीश भी अब और इंतजार नहीं करना चाहता था। चैताली ने अपनी कुशलता का प्रदर्शन करते हुए एक साथ दोनों की सेवा करना शुरू किया। वह बारी-बारी से कभी विवेक के लन्ड को तो कभी हरीश के लन्ड को अपनी गर्म और नम गुफा में समाहित कर रही थी। कमरे की शांति अब पूरी तरह टूट चुकी थी; अब वहाँ केवल 'श्लिक-श्लिक' और 'स्क्वेलच' जैसी गीली और कामुक आवाजें गूँज रही थीं। चैताली की तकनीक इतनी सटीक और प्रभावी थी कि दोनों लड़के अपनी सुध-बुध खोने लगे और उनके मुँह से गहरी आहें निकलने लगीं।
जब उत्तेजना अपने चरम पर पहुँचने लगी, तब हरीश ने एक लंबी सांस ली और कहा, "बस, अब इसे यहाँ से हटाओ और बेडरूम में ले चलो। असली खेल तो अब शुरू होगा।"
वे धीरे-धीरे चलते हुए बेडरूम में दाखिल हुए, जहाँ की रोशनी मध्यम थी। विवेक ने बिना देर किए चैताली को बिस्तर की नरम चादरों पर लिटाया और उसे 'मिशनरी पोजीशन' में कर दिया, जिससे उसके शरीर के सभी अंग स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे। विवेक की प्यास अभी बुझी नहीं थी, वह तुरंत उसके पैरों के बीच में गया और उसकी चूत को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। इस अचानक और तीव्र स्पर्श से चैताली के पूरे शरीर में एक बिजली जैसी सिहरन दौड़ गई। वह अपनी आँखें बंद कर हल्के-हल्के कराहने लगी, उसे महसूस हो रहा था कि वह आनंद की गहराइयों में डूब रही है।
लेकिन, जैसे-जैसे विवेक और गहराई तक जाने लगा, उसके चेहरे के भाव बदल गए। आनंद की जगह अचानक झल्लाहट और चिड़चिड़ेपन ने ले ली। उसने अचानक अपना सिर पीछे खींचा और एक अजीब सा चेहरा बनाया।
"भाई, यह क्या है! ये बाल बहुत ज्यादा चुभ रहे हैं! सारे बाल मेरे मुँह में आ रहे हैं," विवेक ने शिकायत भरे लहजे में कहा।
यह सुनकर हरीश जोर से ठहाका मारकर हँसा। उसने विवेक के कंधे पर हाथ रखा और मजाक उड़ाते हुए कहा, "अरे पगले, इसी को तो असली मज़ा कहते हैं। यह एक 'देसी अनुभव' है, जिसे तूने अब तक महसूस नहीं किया था। इसे स्वीकार कर और आगे बढ़।"
अब विवेक पूरी तरह से तैयार और उत्तेजित था। उसने अपनी पैंट पूरी तरह से उतार कर फेंक दी और चैताली के पैरों को पकड़कर उसे और चौड़ा कर दिया ताकि वह अंदर जा सके। उसने अपना उत्तेजित लन्ड उसकी चूत के द्वार पर रखा और पूरी ताकत से अंदर घुसने की कोशिश की। लेकिन, उसे महसूस हुआ कि रास्ता बहुत कठिन है, वह आसानी से अंदर नहीं जा पा रहा था।
"अरे, यह क्या! यह तो एकदम सूखी है! घुस ही नहीं रहा," विवेक ने झुंझलाते हुए कहा।
हरीश ने एक अनुभवी गुरु की तरह निर्देश दिया, "चैताली, अब समय आ गया है कि तुम अपनी मदद खुद करो। अपनी हथेली पर थूक निकालो और उससे अपनी चूत और विवेक के लौड़े को अच्छी तरह चिकना करो, ताकि रास्ता आसान हो जाए।"
12-09-2026, 10:32 PM
"दोस्त, अगर तूने अभी अपनी पकड़ ढीली की, तो शायद तू इस रूहानी एहसास को अपनी पूरी जिंदगी में दोबारा कभी नहीं पा सकेगा।" हरीश की आवाज में एक अजीब सा मज़ाक और चुनौती थी, लेकीन उस कमरे के भीतर का माहौल उस मज़ाक से कहीं ज्यादा तनावपूर्ण, भारी और उत्तेजना से भरा हुआ था।
चैताली ने एक बहुत गहरी और लंबी सांस ली, जैसे वह खुद को इस आने वाले तूफ़ान के लिए तैयार कर रही हो। उसने धीरे से अपने होठों के बीच जमा गाढ़े थूक को बाहर निकाला; वह प्रचुर मात्रा में था और उसकी चिपचिपाहट इस बात का जीता-जागता सबूत थी की वह भी उतनी ही उत्तेजित और प्यासी है जितना की विवेक। उसने बहुत ही सावधानी और धीमी गति से, लगभग एक अनुष्ठान की तरह, उस लुब्रिकेंट को अपने निजी अंगों के छिद्र पर लगाया। उसके बाद उसने विवेक के उत्तेजित और कठोर लन्ड पर उसे मलना शुरू कीया, ताकी घर्षण कम हो और रास्ता आसान हो जाए। यह मिलन जितना संभव हो उतना ही सहज और सुखद हो, क्यों की उसकी प्राकृतिक तंगता कीसी भी अनजाने या जल्दबाज़ी भरे अनुभव को दर्दनाक बना सकती थी।
जब उसे महसूस हुआ की अब रास्ता पूरी तरह साफ है और उसका शरीर स्वागत के लिए तैयार है, तब विवेक ने अपनी पूरी शारीरिक और मानसिक ताकत बटोरी। उसकी सांसें अब तेज और उखड़ी-उखड़ी चल रही थीं और माथे पर पसीने की नन्ही बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। उसने एक जोरदार, निर्णायक और गहरा धक्का दिया। जैसे ही वह धीरे-धीरे, इंच-दर-इंच उसके भीतर समाने लगा, चैताली के गले से एक दबी हुई, लेकीन तीव्र चीख निकली, जो उसकी उत्तेजना और दबाव दोनों का मिश्रण थी।
"आह्ह्ह!" विवेक के मुंह से एक जोरदार और लंबी कराह निकली, जो उसकी उत्तेजना की चरम सीमा को दर्शा रही थी। उसने अपनी आँखें कसकर मीच लीं और लगभग कांपती हुई आवाज में फुसफुसाया, "हे भगवान, यह कीतनी तंग है! ऐसा लग रहा है जैसे मैं कीसी गरम, मखमली और संकरी सुरंग में फंस गया हूँ जिससे बाहर निकलना नामुमकीन है।"
अब विवेक पूरी तरह से अपनी भावनाओं और आदिम इच्छाओं के वश में था। वह एक कुंवारा था, जिसने अब तक केवल अपनी बंद आंखों और कल्पनाओं में इन लम्हों को जिया था। वास्तविकता की यह तीव्रता, यह स्पर्श और यह अहसास उसके लिए लगभग असहनीय था। उसके भीतर एक आदिम आवेग जाग उठा था जिसने तर्क-वितर्क को पीछे छोड़ दिया था। बिना कीसी लय या ताल के, उसने अपनी कमर को तेजी से आगे-पीछे करना शुरू कर दिया। वह पागलों की तरह उसे रगड़ने लगा, जैसे वह इस दुर्लभ अनुभव के हर एक कतरे, हर एक अहसास को पूरी तरह सोख लेना चाहता हो।
कमरे के गहरे सन्नाटे में केवल एक ही शोर गूंज रहा था—मांस का मांस से टकराने वाली वह विशिष्ट और गीली 'चप-चप' की आवाज। यह आवाज इतनी स्पष्ट और तीव्र थी की कमरे में मौजूद तीसरा व्यक्ति भी उसे अपनी त्वचा पर महसूस कर सकता था। विवेक की गति इतनी उग्र और बेकाबू थी की चैताली का पूरा शरीर बिस्तर की चादरों पर बेतरतीब ढंग से ऊपर-नीचे उछल रहा था। वह बस उस लहर के साथ बह रही थी, उसका पूरा शरीर विवेक की ताकत और जुनून के सामने पूरी तरह समर्पित और न्यस्त था।
अचानक, जैसे ही वह चरम सीमा के सबसे करीब पहुँचा, विवेक की आँखें कसकर बंद हो गईं। उसके शरीर की हर एक मांसपेशी, पैर की उंगलियों से लेकर गर्दन तक, पूरी तरह तन गई। उसने एक आखिरी, सबसे जोरदार और गहरा धक्का दिया और वह चरम आनंद (climax) के विस्फोट पर पहुँच गया। उसके शरीर के भीतर जमा सारा वीर्य एक जोरदार विस्फोट के साथ चैताली की गहराइयों में समा गया। वह पूरी तरह खाली हो चुका था, उसकी सारी उत्तेजना अब एक गहरी, भारी शांति में बदल रही थी। वह बुरी तरह हाँफते हुए, पसीने से तर-बतर होकर, चैताली के ऊपर ही ढह गया, उसकी सांसें अभी भी उखड़ी हुई थीं और दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
तभी हरीश का एक जोरदार ठहाका गूंजा। वह बिस्तर के पास खड़ा होकर यह पूरा दृश्य देख रहा था और अब अपनी हंसी को रोकने में असमर्थ था।
"बस? इतना ही था?" हरीश जोर से हँसते हुए और विवेक का मजाक उड़ाते हुए बोला। "दो मिनट भी नहीं टिक पाया तू? क्या बात है, एथलीट साहब! तुम्हारी स्टैमिना तो बस तुम्हारी बातों तक ही सीमित थी, असलियत तो कुछ और ही है!"
विवेक का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया। वह जानता था की वह हरीश के मजाक का केंद्र बन चुका है, लेकीन उसके चेहरे पर इस समय एक अजीब सी, गहरी संतुष्टि थी। उसने एक लंबी और सुकून भरी सांस ली और कहा, "भाई, पहली बार था... कंट्रोल करना नामुमकीन था। इस अहसास के आगे दुनिया की हर चीज फेल है।"
अभी वे दोनों इस बात पर चर्चा ही कर रहे थे और माहौल थोड़ा हल्का हुआ ही था की अचानक दरवाजे की घंटी जोर से बजी।
'डिंग-डोंग'
उस एक आवाज ने कमरे की पूरी हवा और ऊर्जा को बदल दिया। दोनों लड़के एक ही पल में पत्थर की तरह जम गए। उनकी धड़कनें फिर से तेज हो गईं, लेकीन इस बार वजह कामुकता नहीं, बल्कि डर और घबराहट थी। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ देखा, उनकी आँखों में एक ही सवाल था—इस वक्त, इस हालत में, दरवाजे पर कौन हो सकता है?
13-09-2026, 08:24 PM
(This post was last modified: 13-09-2026, 08:26 PM by kamal06. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
(12-09-2026, 10:32 PM)MohdIqbal Wrote: nice update ....
16-09-2026, 11:06 PM
कमरे के भीतर का सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी किसी हथौड़े की तरह गूंज रही थी। तभी, अचानक सन्नाटे को चीरते हुए दरवाजे की घंटी बजी—'टिंग टोंग'। उस एक आवाज ने कमरे के वातावरण को जैसे स्थिर कर दिया। विवेक और हरीश, जो अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे, अचानक बिजली के झटके की तरह चौंक गए। दोनों लड़के अपनी जगह पर बिल्कुल पत्थर की तरह जम गए, उनकी सांसें जैसे रुक सी गईं।
विवेक के चेहरे पर घबराहट साफ झलक रही थी। उसने अपनी गर्दन धीरे से घुमाई और धीमी, कांपती हुई आवाज में पूछा, "कौन हो सकता है इस वक्त? क्या किसी ने हमें देख लिया?" उसकी आँखों में डर था कि कहीं उनकी इस गुप्त गतिविधि का खुलासा न हो जाए।
हरीश ने विवेक की घबराहट देखी और एक लंबी, गहरी चैन की साँस ली। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आई। उसने लापरवाही से कंधे उचकाते हुए कहा, "अरे यार, इतना रिलैक्स हो जा, तू फालतू में तनाव ले रहा है। मैंने आधे घंटे पहले पिज्जा ऑर्डर किया था, वही होगा।"
जैसे ही विवेक को यह पता चला कि बाहर कोई अजनबी नहीं बल्कि एक डिलीवरी बॉय है, उसके दिमाग में एक शरारत कौंधी। उसकी घबराहट अचानक एक कुटिल मुस्कान में बदल गई। उसने हरीश की ओर देखा और धीमी आवाज में फुसफुसाया, "भाई, एक जबरदस्त आइडिया आया है। क्यों न हम इस रंडी को ही पिज्जा लेने भेजें? देखने में भी मजा आएगा और काम भी हो जाएगा।"
हरीश थोड़ा हैरान हुआ, उसने अपनी भौंहें सिकोड़ी और पूछा, "पर कैसे? वह इस हालत में बाहर कैसे जाएगी?"
विवेक की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने चालाकी से सुझाव दिया, "सिर्फ उस नीली कमीज में। नीचे कुछ नहीं... बिल्कुल खाली। बस एक पतला सा कपड़ा।"
हरीश को यह विचार न केवल पसंद आया, बल्कि वह इस खेल में पूरी तरह उतर गया। उसने चैताली की ओर देखा, जो अब तक चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी। उसने एक अधिकारपूर्ण लहजे में उसे आदेश दिया, "चैताली, उठो। जाओ, दरवाजा खोलो और पिज्जा लेकर आओ। लेकिन मेरी एक शर्त है—तुम सिर्फ अपनी वह नीला कमीज पहनोगी, उसके नीचे या ऊपर एक धागा भी नहीं होना चाहिए।"
चैताली, जो उनकी इच्छाओं के सामने बेबस थी, धीरे से उठी। उसने पास पड़ी अपनी पारदर्शी नीली कमीज उठाई और उसे अपने बदन पर डाल लिया। वह कपड़ा इतना महीन और पतला था कि वह शरीर को ढकने के बजाय उसे और अधिक उजागर कर रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी छातियाँ उस नाजुक कपड़े के नीचे साफ झलक रही थीं, और हर सांस के साथ वह कपड़ा उसकी त्वचा से चिपक रहा था। जब वह दरवाजे की ओर चलने लगी, तो उसके भारी और सुडौल कूल्हे बिना किसी कपड़े के अवरोध के लयबद्ध तरीके से हिल रहे थे, जिससे कमरे में एक अजीब सी उत्तेजना भर गई।
उसने धीरे से दरवाजा खोला और बाहर की ठंडी हवा के संपर्क में आई। बाहर एक युवा डिलीवरी बॉय खड़ा था। जैसे ही उसने दरवाजा खुलते देखा और चैताली को सामने पाया, उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं और वह हक्का-बक्का रह गया। उसने अपनी पूरी जिंदगी में ऐसा नजारा नहीं देखा था—एक खूबसूरत महिला, जिसने सिर्फ एक पतली, पारदर्शी कमीज पहनी थी। डिलीवरी बॉय की नजरें चैताली के शरीर पर जम गईं, उसने देखा कि कैसे उसके निप्पल उस पतले कपड़े को बाहर की ओर धकेल रहे थे, जैसे वे दुनिया को अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे हों। वह लड़का पूरी तरह सम्मोहित हो गया, उसके हाथ में मौजूद पिज्जा का बॉक्स लगभग फिसलने ही वाला था।
चैताली के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसने बिना किसी हिचकिचाहट या शर्म के, एक यांत्रिक तरीके से पिज्जा लिया और बिना एक शब्द बोले वापस लिविंग रूम की ओर मुड़ गई। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ और वह वापस अंदर आई, उसने बिना देर किए वह नीली कमीज भी उतार फेंकी और फिर से पूरी तरह नंगी हो गई, जैसे कि वह वस्त्र उसके लिए एक बोझ था।
तीनों ने मिलकर उस गरमा-गरम पिज्जा का आनंद लिया। हंसी-मजाक और बातों के बीच पिज्जा तो खत्म हो गया, लेकिन उस छोटे से खेल ने उनकी भूख को शांत करने के बजाय और अधिक बढ़ा दिया था। अब कमरे का माहौल और भी ज्यादा भारी और उत्तेजक हो चुका था।
हरीश ने अपनी नजरें चैताली के बदन पर टिकाते हुए एक गहरी सांस ली और धीमी, भारी आवाज में कहा, "चलो, अब मेरी बारी है।"
01-10-2026, 09:02 AM
waiting for next update ........
02-10-2026, 12:20 PM
please continue!
02-10-2026, 09:30 PM
"इस बार का हिसाब मैं पूरी तरह से बराबर करूँगा, और यह यकीन दिलाता हूँ की तुम इसे लंबे समय तक याद रखोगे," हरीश ने अपनी भारी, गूँजती हुई आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में एक अजीब सी, शिकारी चमक थी, जो कीसी गहरे जुनून या प्रतिशोध की ओर इशारा कर रही थी। उसके शब्दों में मात्र एक बात नहीं थी, बल्कि एक सीधी चुनौती थी, जैसे वह अब तक इस पूरे खेल में सिर्फ एक मूक दर्शक रहा हो, जिसने कीनारे बैठकर सब कुछ देखा, और अब वह अपना हक माँगने और उस अधिकार को इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसके चेहरे पर एक क्रूर आत्मविश्वास था, जो यह बता रहा था की अब नियंत्रण उसके हाथों में आने वाला है।
दूसरी ओर विवेक था, जो कुछ मिनटों के एक छोटे से ब्रेक से अभी-अभी लौटा था। वह ब्रेक उसके लिए कीसी रिचार्ज की तरह था, वह अब पूरी तरह से ऊर्जावान, उत्तेजित और वासना की आग में जल रहा था। उसके शरीर में खून कीसी उबलते हुए लावा की तरह तेज़ी से दौड़ रहा था और उसकी शारीरिक इच्छाएं अपने चरम बिंदु पर पहुँच चुकी थीं। उसने एक शरारती, लगभग शैतानी मुस्कान के साथ हरीश की तरफ देखा और एक गहरी सांस लेते हुए कहा, "भाई, अभी तो खेल की पहली पारी शुरू हुई है। तुम्हें लग रहा है की मैं थक गया हूँ? मेरी रगों में अभी भी वह आग धधक रही है और मुझे एक बार फिर से उसकी सिहरन को महसूस करना है। लेकीन याद रखना, इस बार खेल के नियम बदल चुके हैं... इस बार हम 'डॉगी स्टाइल' आज़माएंगे।"
विवेक ने एक पल की भी देरी नहीं की। उसने अपनी पकड़ मज़बूत की और चैताली का कोमल हाथ पकड़कर उसे एक झटके के साथ कमरे के बीचों-बीच रखी उस भारी, पुरानी लकड़ी की कॉफी टेबल की ओर खींच लिया। वह उसे ले जाते समय उसकी स्थिति के बारे में नहीं सोच रहा था, बल्कि उसके मन में केवल अपना अधिकार जताने की इच्छा थी। उसने बड़ी बेरहमी और पूर्ण अधिकार के साथ चैताली को टेबल के ऊपर हाथों और घुटनों के बल झुकने पर मजबूर कर दिया। चैताली की कमर नीचे की ओर झुकी हुई थी, जिससे उसका पिछला हिस्सा हवा में उठा हुआ था और वह पूरी तरह से उनके सामने समर्पित और असुरक्षित थी। वह स्थिति ऐसी थी जैसे वह उनके सामने एक भेंट के रूप में रखी गई हो। विवेक ने बिना समय गंवाए पीछे से आकर उसकी जांघों को मज़बूती से पकड़ा और उन्हें फैला दिया, जिससे उसके शरीर का वह गुप्त रास्ता पूरी तरह खुल गया। बिना कीसी भूमिका के, उसने अपने कठोर और उत्तेजित लन्ड को एक ज़ोरदार झटके के साथ उसकी गहराई में घुसा दिया। अपनी चूत पर हुए इस क्रूर आक्रमण से चैताली दर्द से चीख उठी।
जैसे ही वह उसके शरीर के भीतर दाखिल हुआ, विवेक को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह कीसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया हो। वह पूरी तरह से अपनी कामुकता के वश में था। उसने अपनी पूरी शारीरिक ताकत झोंक दी और चैताली को पीछे से ज़ोर-ज़ोर से ठोकना शुरू कर दिया। हर एक धक्के के साथ मांस के टकराने की एक गूँजती हुई आवाज़ ‘थापक – थापक’ पूरे सन्नाटे वाले कमरे में फैल रही थी। वह भारी लकड़ी की टेबल उस प्रचंड दबाव और झटकों से हिल रही थी, मानो वह भी इस वासना के बोझ तले चरमरा रही हो, लेकीन विवेक की रफ्तार कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही थी।
सम्मोहित चैताली अब पीछे से हो रही इस ज़बरदस्त चोदाई की आदी हो रही थी। दर्द की चीखें अब मज़ा भरी हल्की कराहों में बदल गई थीं। हालाँकि उसे दिमागी तौर पर पता नहीं था की विवेक उसका इतना बेरहमी से इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन उसकी कामुक भावनाएँ जाग गई थीं और वह इस सेक्स का मज़ा लेने लगी थी।
तभी हरीश ने इस मौके का फायदा उठाया। वह बिल्ली की तरह चुपचाप रेंगते हुए चैताली के चेहरे के सामने आ गया। उसने देखा की चैताली पीछे से मिल रहे उन हिंसक और शक्तिशाली धक्कों के कारण बेबस होकर कराह रही थी, उसकी आँखें आधी बंद थीं और वह अपनी चेतना खो रही थी। हरीश ने बिना कीसी नरमी के अपना लन्ड निकाला और उसे चैताली के मुँह में पूरी ताकत से ठूंस दिया। अब चैताली की स्थिति अत्यंत विचित्र और कामुक हो चुकी थी, वह दोनों तरफ से इस्तेमाल की जा रही थी। पीछे से विवेक के हिंसक धक्के उसे आगे की तरफ धकेल रहे थे, और आगे से हरीश का लन्ड चैताली के गले की गहराई तक पहुँच रहा था। चैताली वास्तव में एक 'मानव सैंडविच' बन चुकी थी, जिसके पास बचने का कोई रास्ता नहीं था सिवाय उनके आनंद को पूरा करने के।
"हाँ... ऐसे ही चूस इसे, मेरी रंडी" हरीश ने चरम उत्तेजना में चिल्लाते हुए कहा। उसके शब्दों में एक कीस्म का स्वामित्व और वर्चस्व था, जिसने उस माहौल को और भी अधिक कामुक और आदिम बना दिया था।
विवेक भी अब अपनी सुध-बुध पूरी तरह खो चुका था। उसकी साँसें इतनी तेज़ थीं की वह हाँफ रहा था, और पसीना उसके माथे से टपक कर नीचे गिर रहा था। उसने उत्तेजना में चीखते हुए कहा, "देख रहे हो हरीश, देख कैसे हिल रही है यह कुतिया, क्या गजब की गांड है इसकी, जैसे कोई मशीन हो, इसे तो बस ऐसे ही चलाना चाहिए"
वे दोनों काफी देर तक, अपनी पूरी ऊर्जा और वासना के साथ चैताली को इसी तरह एक खिलौने की तरह इस्तेमाल करते रहे। कमरे में अब केवल उनकी भारी और उखड़ी हुई साँसों, गालियों और शरीर के टकराने की लयबद्ध आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। समय जैसे ठहर गया था, दुनिया बाहर कहीं खो गई थी और वहाँ केवल वासना का एक भीषण तांडव चल रहा था।
अंततः, वह क्षण आया जब विवेक अपनी चरम सीमा पर था। उसने अपनी पूरी जान लगाकर एक आखिरी और सबसे जोरदार धक्का दिया, और अपनी सारी गहराई तक पहुँचकर चैताली के चूत के अंदर अंदर अपना गर्म, गाढ़ा वीर्य खाली कर दिया। ठीक उसी पल, जैसे कीसी पूर्व-निर्धारित समय की बात हो, हरीश ने भी अपना नियंत्रण खोया और चैताली के मुँह के भीतर अपना सारा माल खाली कर दिया।
जब वह वासनाओं का तूफान शांत हुआ, तो दोनों मर्द बुरी तरह थक चुके थे। वे बुरी तरह हाँफते हुए पास के सोफे पर गिर पड़े, उनके शरीर पसीने से पूरी तरह तर-बतर थे और उनकी साँसें अभी भी तेज़ थीं। चैताली अभी भी उसी पोजीशन में कॉफी टेबल पर पड़ी थी—पूरी तरह निढाल और निर्जीव सी, लेकीन उसकी देह पर पसीने और वीर्य की एक चमकती हुई परत जमी थी, जो इस बात की मूक गवाह थी की अभी-अभी वहाँ कीस स्तर की कामुकता और बर्बरता बीती थी।
विवेक के वीर्य की एक धीमी धार, चैताली के योनि-रस के साथ मिलकर, उसकी चूत से बाहर निकली और धीरे-धीरे उसकी भरी-पूरी जांघों पर नीचे की ओर बहने लगी।
02-10-2026, 09:35 PM
just one request. Let Aditiya also fuck his mom. Then let him join the fun in gangbanging her. And eventually Aditya and his friends should start exposing her public to pimping her out!
02-10-2026, 10:53 PM
"क्या तुम सच में मानते हो की इंसान की रूह उसके शरीर के बाहर रह सकती है, या फिर यह सब बस एक भ्रम है?" विवेक ने यह सवाल अचानक पूछा, जबकी कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था और हवा में अभी भी वासना और पसीने की एक मिली-जुली गंध तैर रही थी।
कुछ पल बीत गए, समय जैसे ठहर गया था। फिर विवेक धीरे से अपनी जगह से उठा। उसकी नज़रें सामने पड़ी चैताली पर जाकर टिक गईं। वह उसे बस देख नहीं रहा था, बल्कि उसे एक ऐसी वस्तु की तरह निहार रहा था जिसे वह पूरी तरह से जीत चुका हो। चैताली की हालत अजीब थी—वह अभी भी कॉफी टेबल पर घुटनों और हाथों के बल झुकी हुई थी, बिल्कुल एक घोड़ी की मुद्रा में। उसकी स्थिति ऐसी थी की वह पूरी तरह से असहाय और समर्पित लग रही थी।
चैताली की आँखें बंद थीं, मानो वह इस भौतिक दुनिया से दूर कीसी गहरे और धुंधले सपने के गलियारे में खो गई हो। उसका सिर एक तरफ हल्का सा झुका हुआ था, जिससे उसकी गर्दन की कोमलता उभर कर आ रही थी। उसके घने, काले और लहराते बाल बेतरतीब ढंग से उसके चेहरे और गर्दन पर बिखरे हुए थे, जो उसकी वर्तमान स्थिति को और भी कामुक बना रहे थे। उसकी सांसें अभी भी तेज चल रही थीं, छाती का उतार-चढ़ाव यह बता रहा था की उसके शरीर के भीतर अभी भी उत्तेजना और थकान का संघर्ष चल रहा है।
विवेक की नज़रें जब नीचे की ओर गईं, तो उसे चैताली का वह हिस्सा दिखा जो नीचे की ओर लटक रहा था। उसके बड़े, भारी और पूरी तरह पके हुए मम्मे नीचे की ओर झुके हुए थे, और ठंड या उत्तेजना के कारण उनके निप्पल पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे, जो साफ़ तौर पर उसकी कामुकता की गवाही दे रहे थे। वहीं दूसरी ओर, उसकी कमर का निचला हिस्सा और उसकी गांड हवा में ऊपर उठी हुई थी, जैसे वह कीसी को आमंत्रित कर रही हो। उसके पैर फैले हुए थे, जिससे उसके शरीर का वह सबसे निजी हिस्सा पूरी तरह उजागर था। घने काले झांटों के बीच, उसकी चूत की वह गुलाबी दरार एकदम साफ़ और स्पष्ट दिखाई दे रही थी, जो अब तक की सारी उत्तेजना के बाद भी नम थी।
यह दृश्य विवेक के लिए इतना घातक था की उसके शरीर में फिर से बिजली जैसी लहर दौड़ गई। उसका लन्ड, जो कुछ देर पहले शांत हुआ था, एक बार फिर पूरी तीव्रता के साथ खड़ा होने लगा। उसकी रगों में खून का दबाव बढ़ गया था और उसके दिमाग में अब केवल वासना थी।
तभी विवेक के मन में एक गंदा और साहसी विचार आया। उसने गौर कीया की चैताली की चूत के ठीक ऊपर, वह छोटा सा सिकुड़ा हुआ गुदा द्वार (गांड का छेद) था, जो बहुत ही संकुचित और गहरा दिख रहा था। वह एक पल के लिए रुका, फिर उसने पास खड़े हरीश की ओर देखा और धीमी लेकीन उत्तेजित आवाज में पूछा, "भाई, क्या मैं इसकी गांड में डाल सकता हूँ? क्या लगता है, जगह है?"
हरीश ने उसकी बात सुनी और बिना कीसी खास दिलचस्पी के अपने कंधे उचका दिए। उसने बेरुखी से जवाब दिया, "देख भाई, मुझे क्या पता। तेरा मन है तो ट्राई कर ले।"
विवेक ने एक गहरी सांस ली और धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसने अपनी उंगली के सिरे को उसकी गुदा के द्वार पर रखा और धीरे से अंदर डालने की कोशिश की। जैसे ही उंगली ने उस संकुचित रास्ते में प्रवेश कीया, चैताली के शरीर में एक बिजली जैसा झटका लगा। उसकी बंद आँखों के कोने सिकुड़ गए और उसके चेहरे पर अचानक असहनीय दर्द के भाव उभर आए।
वह दर्द इतना अचानक और तीखा था की उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह अचानक सिसकने लगी, उसका शरीर हल्का सा काँपा और उसने एक धीमी कराह भरी। वह मदहोशी में थी, लेकीन दर्द ने उसे एक ऐसी जगह खींच लिया जहाँ वह कुछ समझ नहीं पा रही थी।
हरीश, जो अब तक चुपचाप देख रहा था, अचानक सचेत हुआ। उसने देखा की चैताली की हालत बिगड़ रही है। उसने विवेक का हाथ पकड़कर उसे पीछे खींचते हुए कहा, "रुक जाओ विवेक। देखो, इसे बहुत दर्द हो रहा है। गांड का मामला बहुत नाजुक होता है, बिना तैयारी के जबरदस्ती मत करो, चोट लग सकती है।"
हरीश ने एक ठंडी सांस ली और फिर जोड़ा, "वैसे भी, अब बहुत समय हो गया है। अब बस करो, उसे आराम करने दो।"
03-10-2026, 12:36 AM
लगभग दो घंटे बीत चुके थे। हरीश ने विवेक से कहा की अब उसे निकलना चाहिए। विवेक ने आखिरी बार चैताली के शरीर को निहारा और विदा ली।
"मजा आ गया भाई! शुक्रिया!" विवेक ने जाते हुए कहा।
हरीश ने चैताली को आदेश दिया, "जाओ, फ्रेश हो जाओ और अपने कपड़े पहन लो।"
चैताली ने खुद को साफ कीया और अपने नीले सलवार-कमीज में वापस आ गई। हरीश उसे अपनी मोटरसाइकील पर बैठाकर उसी मार्केट में ले गया जहाँ उसकी कार खड़ी थी।
जैसे ही वे कार के पास पहुँचे, हरीश ने उसकी आँखों में देखा और अपनी उँगलियों से एक जोरदार 'चुटकी' बजाई।
चैताली अचानक होश में आई। वह चौंक गई और इधर-उधर देखने लगी।
"तुम... तुम यहाँ कैसे? मैं यहाँ कैसे पहुँची?" उसने घबराते हुए पूछा।
हरीश ने मासूमियत से कहा, "अरे, आप तो कॉफी पीकर थोड़ी देर के लिए सो गई थीं। मैंने सोचा आपको आपके ऑफिस के पास छोड़ दूँ।"
चैताली पूरी तरह भ्रमित थी। उसका सिर भारी था और उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। "ओह... शायद मैं बहुत थक गई थी। शुक्रिया हरीश।"
वह अपनी कार में बैठी और ऑफिस की ओर चल दी। वह पूरी तरह से सामान्य महसूस कर रही थी, लेकीन उसके शरीर के अंदर एक अजीब सी भारीपन और गीलापन था जिसे वह समझ नहीं पा रही थी।
शाम को जब वह अपने ऑफिस की डेस्क पर बैठी, तो उसने महसूस कीया की उसके गले में कुछ कमी है। उसने अपनी गर्दन छुई। उसका ऑफिस आईडी कार्ड गायब था। वह गहरी सोच में पड़ गई कि उसने अपना आईडी कार्ड कहाँ रख दिया होगा।
उसने अपना बैग देखा, अपनी कार की सीटें चेक कीं, लेकीन कार्ड कहीं नहीं मिला। उसे याद नहीं आ रहा था की उसने कार्ड कहाँ खोया। वह परेशान थी, लेकीन उसे यह नहीं पता था की वह कार्ड अब कहाँ और किसके पास पहुँच गया है ।
04-10-2026, 09:58 AM
NICE UPDATE.......................
04-10-2026, 04:48 PM
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