10-09-2026, 07:33 AM
Zabardast aur jhakkas
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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
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10-09-2026, 07:33 AM
Zabardast aur jhakkas
10-09-2026, 12:34 PM
Waiting
10-09-2026, 03:35 PM
Please update dal do yaar.
10-09-2026, 04:55 PM
Intezaar
10-09-2026, 07:35 PM
I hope against hope the writer will not abandon this extremely hot and erotic story.
11-09-2026, 12:29 AM
(This post was last modified: 11-09-2026, 12:21 PM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
(06-09-2026, 12:51 AM)Deepak.kapoor Wrote: I know a lot of people are waiting for the upload. I have some time available in the next two to three Days. Let's see if I can put something together in this free time. But fans need to understand that a writer needs two things for writing. One is time to write, and another is the right frame of mind to write. I sincerely tried twice last weekend but couldn't get into the right flow. I will try this weekend again. Update : 70% of next episode is ready as i got some momentum today .
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
12-09-2026, 08:11 PM
13-09-2026, 12:06 PM
Really thrilling and sizzling writings!
Waiting for the next update
13-09-2026, 01:02 PM
13-09-2026, 01:18 PM
13-09-2026, 03:11 PM
13-09-2026, 03:31 PM
13-09-2026, 05:42 PM
13-09-2026, 06:22 PM
14-09-2026, 05:49 AM
अध्याय -21
अम्मी ने अपनी गर्दन हल्की सी पीछे की, उनकी आँखें हवस और बेबसी में पूरी तरह डूबने लगी थीं। उन्होंने बेहद उखड़ी और कांपती सांसों के साथ फुसफुसाते हुए पूछा, "तो अब क्या?"
"तो अब यह..."
विशाल ने अपने हाथों को उनके नाज़ुक बाज़ू से हटाकर सीधे उनकी पतली, मखमली कमर पर कस दिया और एक ज़ोरदार झटके के साथ अपनी लोअर बॉडी से चिपका लिया।
अम्मी के मुँह से एक कामुक और तेज़ 'आह्ह...' निकली, जब उनके नाज़ुक पेट और जांघों के ऊपरी हिस्से ने विशाल के पजामे के पीछे उस सख्त, गर्म लोहे जैसे 10 इंच के लंड की चुभन को महसूस किया।
उनके जिस्म में वासना का एक भयंकर करंट दौड़ गया।
"यह लिपस्टिक..." विशाल ने अपने चेहरे को उनके गुलाबी होठों के बिल्कुल करीब लाकर कहा। उसकी हवस से भरी सांसें अम्मी के चेहरे को झुलसा रही थीं।
"कल रात से इसके जायके का पागलपन सवार है मेरे सिर पर... इसका असली स्वाद तो मुझे अभी, इसी वक़्त चखना है।"
और अगले ही पल, विशाल ने अम्मी के उन म्यूटेड बेरी लिपस्टिक से सजे रसीले होठों पर किसी भूखे की तरह धावा बोल दिया।
यह कोई शराफत भरा चुंबन नहीं था—यह हवस, नग्न अधिकार और एक गैर औरत के जिस्म को सरेआम रौंदने की ज़हरीली प्यास का एक नंगा मेल था।
विशाल ने अम्मी के दोनों होठों को बुरी तरह अपने मुँह के अंदर दबोच लिया। वह उनके निचले रसीले होंठ को अपने दांतों से बेरहमी से काटते हुए, उनके मुँह के रस को किसी प्यासे जानवर की तरह घट-घट चूसने लगा।
अम्मी ने शुरुआत के चंद सेकंडों के लिए प्रतिरोध दिखाया। उनके कांपते गोरे हाथ विशाल के चौड़े, फौलादी सीने पर उसे पीछे धकेलने के लिए उठे, लेकिन जैसे ही विशाल के लंड की अकड़ उनके पेट पर और गहरे दबाव के साथ धंसी, उनका सारा विरोध पल भर में पिघलकर पानी-पानी हो गया।
वासना के उस तीखे स्वाद और ज़िल्लत के सुख ने अम्मी की रूह को गुलाम बना लिया। उन्होंने एक हल्की सुबकी के साथ अपना मुँह पूरा खोल दिया। उनकी गीली, गरम और कसमसाती हुई ज़बान खुद-ब-खुद विशाल के मुँह की गहराइयों में सरकती चली गई और उसकी ज़बान के साथ लिपटकर एक नग्न, बेशरम जंग लड़ने लगी।
उन्होंने अपनी बाहें विशाल की गर्दन के गिर्द कस के लपेट लीं, और अपने भरे हुए जिस्म को उसके सख्त जिस्म पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ना शुरू कर दिया।
मेरे कानों में उनकी गंदी, गीली और कामुक आवाज़ें गूँजने लगीं। श्लक... मम्मह... थप्प... सलाइवा और ज़बानों की इस जंग की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मुझे लकड़ी के भारी दरवाज़े के बाहर तक साफ़ सुनाई दे रही थी।
विशाल ने किस को तोड़ते हुए, अम्मी के निचले रसीले होंठ को अपने तीखे दांतों में फँसाया और पूरी ताकत से ज़ोर से खींचा, जैसे वो उन्हें वहीं कच्चा चबा जाना चाहता हो। जब उसने अपने दांतों की पकड़ छोड़ी, तो अम्मी के सूजे हुए लाल होठों और विशाल के मुँह के बीच थूक और लार की एक लंबी, चमकती हुई रेशमी तार खिंच गई।
अम्मी की आँखें बेसुध होकर बंद थीं, उनका गोरा चेहरा पसीने की बूंदों और बेशर्म लाली से दहक रहा था। वो म्यूटेड बेरी लिपस्टिक अब बुरी तरह फैलकर उनकी ठुड्डी और गालों तक बिखर चुकी थी। उस पल वो मेरी शराफ़त की मूरत 'अम्मी' बिल्कुल नहीं लग रही थीं, बल्कि हवस से तड़पती हुई कोई बेकाबू औरत नज़र आ रही थीं।
"उफ़्फ़..." आयशा बुरी तरह हांफ रही थीं। उनके गहरे गले से उनके भारी मम्मों का उभार इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हिल रहा था कि कमीज़ का हर एक धागा तना जा रहा था।
आयशा ने अपनी थरथराती उंगली से अपने कटे और सूजे हुए होंठों को छुआ, "तुमने... तुमने मेरी पूरी लिपस्टिक खराब कर दी, जानवर... अब मैं बाहर सब के सामने कैसे जाऊँगी? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे?"
विशाल ने एक घटिया, शरारती मुस्कान के साथ अपनी उंगली अम्मी के गीले, फैले हुए लाल होठों पर फेरी और फिर उसी उंगली को अपने मुँह में डालकर बड़े मजे से चूस लिया।
"सोचेंगे कि दुल्हन से ज़्यादा सुहागरात का असली मज़ा तो आयशा जी ले रही हैं," विशाल ने अम्मी की आँखों में आँखें डालकर हवस भरी आवाज़ में फुसफुसाया, "और अभी तो सिर्फ लिपस्टिक खराब की है आयशा... अभी तो तुम्हारा पूरा हुलिया बिगाड़ना और तुम्हें पूरी तरह बिस्तरे पर रौंदना बाकी है।"
अम्मी ने थोड़ा पीछे हटते हुए, अपने चेहरे पर एक बेहद कातिल मुस्कुराहट बिखेरी। उन्होंने जान-बूझकर अपने कंधे पीछे की ओर खींचे, ताकि उनकी कमीज़ के नीचे दबे भारी सीने का उभार और ज़्यादा साफ और नुमाया होकर विशाल के सामने आ जाए।
"बातें कम करो ... सिर्फ 2 मिनट हैं तुम्हारे पास। जो करना है जल्दी करो, वरना मैं चली... मैं यहाँ 2 मिनट से ज़्यादा रुक ही नहीं सकती," अम्मी ने अपनी नशीली आँखों से उसे ताकते हुए उकसाया।
"2 मिनट में तो मैं तुम्हें वो याद दिला दूँगा जो तुम्हारे शौहर ने सालों में नहीं किया," विशाल गुर्राया।
उसका भारी हाथ अम्मी की नाज़ुक कमर पर रेंगता हुआ ऊपर की तरफ उठा... और सीधा उनके भरे हुए, कसे हुए मम्मे पर जा टिका।
उसने अपने पूरे पंजे की ताकत से उनके दाहिने मम्मे को बुरी तरह दबोच लिया। यद्यपि यह सब कपड़े के ऊपर से हो रहा था, पर उसकी पकड़ इतनी सख्त, नंगी और बेरहम थी कि अम्मी का पूरा जिस्म झटके से अकड़ गया। विशाल की चौड़ी उंगलियाँ उनके मखमली माँस के अंदर गहराई तक धँसती चली गईं।
अम्मी के सूजे हुए होठों से एक तेज़, दबी हुई कामुक चीख फूटी—"आआाह्ह्ह!"
उनकी आँखें एक पल के लिए खौफ और बेपनाह मजे के अहसास से फटी की फटी रह गईं, जैसे पूरे बदन में बिजली का भयंकर करंट दौड़ गया हो। उनकी सांसें गले में ही अटक कर रह गईं।
उनके घुटने इतने कमज़ोर पड़ गए कि अगर विशाल ने अपनी ताकत से उन्हें अपनी ओर न खींचा होता, तो वो वहीं फर्श पर गिर पड़तीं।
उन्होंने फौरन कांपते हाथों से विशाल की कलाई को पकड़ लिया। मुझे लगा कि वो अब अपनी बची-कुची गैरत दिखाएंगी, उसके हाथ को झटककर हटाएंगी और उस कमीने को एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद करेंगी।
लेकिन... ऐसा कुछ नहीं हुआ।
उन्होंने विशाल के हाथ को हटाया तक नहीं! बल्कि इसके उल्टे, उन्होंने अपने सीने को और आगे करके विशाल की सख्त हथेली पर दबा दिया, मानो उस पल वो पूरी तरह अपना आपा खो चुकी हों।
अम्मी ने अपनी सुराहीदार गर्दन पीछे की तरफ फेंक दी, उनकी आँखें बेसुध होकर मुँध गईं और उनके लाल होते चेहरे पर एक ऐसी राहत तैर गई, जैसे वो बरसों से इसी स्पर्श की तड़प में जल रही थीं।
"विशाल... ओ गॉड..." अम्मी बुरी तरह हांफते हुए फुसफुसाने लगीं, "तुमने... तुमने तो सच में दाबोच ही लिया..."
"हाँ जी आयशा जी, दबोच लिया!" विशाल ने उनके भारी उभार को अपनी पूरी हथेली में भरते हुए, उसे नीचे से ऊपर तक किसी बहुमूल्य चीज़ की तरह तोलते हुए कहा, "और क्या कमाल की चीज़ पकड़ी है मैंने यार... तेरे मम्मे कितने सॉफ्ट हैं आयशा! यह तो मेरे बड़े से हाथ में भी पूरे समा नहीं पा रहे हैं। कल रात भी जब इन्हें कसकर दबाया था, तभी से मेरे हाथ तरस रहे थे इन्हें दोबारा मसलने के लिए!"
अम्मी ने नशा-भरी आँखें खोलकर विशाल को देखा। उनका दिमाग चीख-चीखकर कह रहा था कि दूर हट जाएँ, भाग जाएँ यहाँ से...
लेकिन उनका बदन, उनका सुलगता हुआ रोंम-रोंम कुछ और ही चाह रहा था। बरसों की दबी हुई प्यास ने उनके होश-ओ-हवास पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था। उनके सूजे, रसीले होठों से अचानक ही बेहद बेशरम सवाल निकल गया।
"बड़े हैं?" अम्मी ने नशीली, हस्की आवाज़ में पूछा, और अपनी पतली कमर को आगे धकेलकर अपने मखमली सीने को विशाल की सख्त हथेली में और ज़्यादा ठूँस दिया।
"अरे बड़े क्या आयशा जी... पूरे दशहरी आम की तरह भारी और रसीले लग रहे हैं!" विशाल ने अपनी उंगलियों को उनके मम्मे के गोश्त में और गहराई तक गाड़ते हुए कहा। "कितने नरम हैं... और अंदर तक कितने भरे हुए। लग रहा है जैसे अभी इस कमीज़ की सिलाई फाड़कर बाहर निकल पड़ेंगे। देखो तो सही, मेरे ज़रा से छूने भर से कैसे अकड़ गए हैं!"
अम्मी ने हवस और बेबसी की मस्ती में अपना निचला कटे जैसा होंठ दांतों तले दबा लिया, "आआाह्ह्ह्ह्ह... विशाल... मत बोलो ऐसा..."
यह सुनते ही विशाल ने कपड़े के नीचे पत्थर की तरह सख्त हो चुके उनके निप्पल को अपने अंगूठे और पहली उंगली के बीच चुटकी में दबोचा और बुरी तरह मरोड़ दिया।
"स्स्सससीईई... आआाह्ह्ह!" अम्मी तड़पकर मचल उठीं।
उनका पूरा भरा हुआ जिस्म किसी तनी हुई कमान की तरह मुड़ गया। दर्द और बेपनाह सुख के इस भयंकर अहसास में उन्होंने विशाल के चौड़े कंधे पर अपने तीखे नाखुन गाड़ दिए। "वहाँ... उफ़्फ़ विशाल... वहाँ तो सीधे कलेजे में करंट लग रहा है..."
"सच-सच बताना आयशा... क्या पहली बार किसी मर्द ने तुम्हें इस तरह यहाँ छुआ है?" विशाल ने कमीनी शरारत से पूछा, जबकि उसका हाथ बिना रुके लगातार उनके मम्मे को कपड़े के ऊपर से मसल रहा था।
"हाँ... उफ़्फ़ हाँ..." अम्मी ने अपनी आँखें बंद करके सच उगल दिया। उनकी आवाज़ में एक बेशरम और गंदी ईमानदारी थी, "बरसों से... बरसों से मेरे यह उभार प्यासे तड़प रहे थे विशाल... तुम्हारे इन निर्दयी हाथों ने आज इन्हें फिर से ज़िंदा कर दिया..."
मेरे कानों में खून दौड़ने लगा। मेरी माँ... अपनी ज़बान से मान रही थीं कि वह मेरे बाप के साथ कभी खुश नहीं रहीं... और उन्हें इस कमीने विशाल के हाथों में वो सब मिल रहा था, जिसकी हवस में वो सदियों से जल रही थीं।
"तो फिर अब से ये दोनों मेरे हैं," विशाल ने पूरी ठसक और नंगे हक से कहा, और अपने दूसरे खाली हाथ को उठाकर अम्मी के बाएं मम्मे पर भी जमा दिया।
अब उनके दोनों भारी, रसीले उभार विशाल के भूखे पंजों के कब्ज़े में थे। "सुन लिया आयशा? ये दोनों अब सिर्फ और सिर्फ मेरे खिलौने हैं!"
अम्मी ने एक गहरा, कामुक और तृप्त सांस खींचा। उन्होंने अपनी सुराहीदार गर्दन झुकाकर अपना सिर विशाल के सीने पर टिका दिया।
"हाँ विशाल... तुम्हारे हैं... तरसाओ मत मुझे... जो करना है करो इनके साथ... " अम्मी अब पूरी तरह अपनी आबरू भूलकर उसके सामने मिन्नतें कर रही थीं।
विशाल ने अम्मी के दोनों भरे हुए, मखमली उभारों को अपने बड़े-बड़े पंजों में कसकर जकड़ रखा था। उसने दोनों हाथों को अंदर की तरफ दबाते हुए अम्मी के मम्मों को आपस में चिपका दिया, जिससे उनके सीने की क्लीवेज एक गहरी घाटी की तरह और गहरी हो गई।
कुर्ती के गहरे गले के ऊपर से उनका गोरा, माखन जैसा मांस उबलकर बाहर की तरफ आ गया था, मानो उस टाइट कपड़े की बंदिशों को तोड़कर अभी विशाल के हाथों में बिखर जाना चाहता हो।
"आह... विशाल... धीरे..." अम्मी की गर्दन पीछे लुढ़क गयी, उनके बाल हवा में झूल गए। "दर्द हो रहा है..."
"होने दो," विशाल ने गुर्राते हुए कहा, और अपना चेहरा उनके दोनों उभारों के बीच बनी उस गहरी लकीर में रगड़ दिया। "मैं चाहता हूँ कि ये बाहर आ जाएँ। मेरा मन कर रहा है कि मैं यह महंगी कमीज़ अभी फाड़ दूँ और इन दूध जैसे गोलों को नंगा कर दूँ।"
अम्मी ने मस्ती में अपनी उंगलियां विशाल के बालों में फँसा लीं और उसका सर अपने सीने पर दबा दिया। "आआाह्ह्ह्ह्ह्ह….अभी नहीं विशाल…..."
मेरी सांसें अटक गयीं। विशाल ने अपना सर उठाया, उसकी आँखें हवस से लाल थीं। "हाँ….अभी नहीं... अभी अगर फाड़ दिया तो बाहर तमाशा हो जाएगा। लेकिन ... जब हम अकेले होंगे... तब मैं तुम्हारे जिस्म पर धागा भी नहीं रहने दूँगा।"
उसने अपने हाथ वहाँ से हटाए नहीं, बल्कि उन्हें और ज़ोर से मसलते हुए, अपना निचला हिस्सा अम्मी की तरफ धकेला।
विशाल ने अपना सख्त लुंड-जो उसके कुर्ते के नीचे एक साफ़, कठोर उभार बन चुका था ,सीधा अम्मी के पेट और उनकी जांघों के बीच वाले हिस्से पर रगड़ दिया।
"ओह्ह..." अम्मी की आँखें पलट गयीं। उनका पूरा वजूद कांप उठा।
"महसूस कर रही हो?" विशाल फुसफुसाया। उसने अपने हिप्स को गोल घुमाते हुए , अपनी सख्ती को अम्मी की सबसे सेंसिटिव जगह पर रगड़ा। "यह सिर्फ तुम्हारे लिए तैयार हुआ है, आयशा। बताओ, कैसा लग रहा है?"
अम्मी ने बुरी तरह हांफते हुए, अपने दोनों हाथ विशाल की कमर पर डाल दिए। उनका पूरा जिस्म आग की तरह तप रहा था।
उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं।
"फक, आयशा..." विशाल ने अम्मी के माथे पर अपना माथा टिकाते हुए कहा। "मुझ से अब रहा नहीं जा रहा... तुम्हारा यह जिस्म... यह खुशबू... मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
उसने अचानक अम्मी की कमीज़ के दामन को पकड़ लिया और उसे ऊपर उठाने की कोशिश की। "मैं अभी... इसी वक्त तुम्हारे अंदर जाना चाहता हूँ। यहाँ कोई नहीं आएगा।"
अम्मी ने एकदम से उसका हाथ पकड़ लिया और उसे ज़ोर से नीचे धकेल दिया। "नहीं... विशाल, नहीं। रुको।"
"क्यों रुकूँ?" विशाल गुर्राया, उसने अपने क्रॉच को उनके पेट पर रगड़ा, ज़िद करते हुए।
"क्यों तड़पा रही हो? देखो मेरा क्या हाल है। बस शलवार नीचे करो और मुझे एंटर होने दो। दो मिनट लगेंगे।"
"पागल मत बनो," अम्मी ने उसे हल्का सा धक्का दिया, हालाँकि उनकी आँखों में भी वही भूख थी, पर डर और होश भी था।
"यहाँ? इस धूल और मिट्टी में?"
"तो क्या फर्क पड़ता है?" विशाल ने उनकी गर्दन पर पागलों की तरह किस करते हुए मनाने की कोशिश की, उसका हाथ उनके नाड़े की तरफ बढ़ा। "हमें बस एक दूसरे से मतलब है। मिट्टी हो या बिस्तर... मैं बस तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ। अभी।"
"मुझे फर्क पड़ता है!" अम्मी ने झटके से उसका हाथ अपने सीने से हटा दिया।
उन्होंने हड़बड़ाकर अपनी बिखरी हुई कमीज़ संभाली और अपनी उखड़ती सांसों पर काबू पाने की नाकाम कोशिश करने लगीं।
शायद उनके अंदर की सोई हुई औरत को अपनी मर्यादा, परिवार और इस जगह का ख्याल आ गया था, इसलिए वह बदहवास होकर विशाल से दूर हटने की कोशिश कर रही थीं।
विशाल ने पूरी तरह फ्रस्ट्रेट होकर एक गहरी सांस ली और पास की दीवार पर ज़ोर से मुक्का मारा।
"तुम तड़पाने में बेहद माहिर हो आयशा... तो अब क्या करूँ मैं इसका?" उसने गुस्से, हवस और बेताबी से पैंट के ऊपर तने हुए अपने विशालकाय, उभरे हुए लंड की तरफ इशारा किया। "क्या इसे ऐसे ही तड़पता हुआ छोड़ दूँ?"
अम्मी ने शर्म और झिझक से फौरन अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लिया।
लेकिन विशाल एक कदम आगे बढ़ा, उसने अम्मी की कलाई पकड़ी और उनके कांपते हुए हाथ को कपड़े के ऊपर से ही सीधे अपने सख्त और गर्म लंड पर ले जाकर दबा दिया। अम्मी की हथेली के नीचे विशाल की नसों का फड़कना साफ महसूस हो रहा था।
"सब्र करो..." अम्मी ने अपना हाथ वहाँ से छुड़ाने की हल्की सी नाकाम कोशिश करते हुए विशाल की आँखों में देखा और नशीली फुसफुसाहट में कहा, "सब्र का फल... बहुत मीठा होता है।"
आयशा (मन में): "हे अल्लाह! यह मैं क्या करने जा रही थी? मैं तो यहाँ सायमा को इस दरिंदे से बचाने आई थी... लेकिन जब भी मैं इस विशाल के पास होती हूँ, तो मेरे जिस्म और दिमाग को आखिर हो क्या जाता है? मुझे हर हाल में इससे दूर जाना होगा... मुझे खुद को संभालने और सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए।"
"कब तक?" विशाल ने चिढ़कर पूछा। "और इंतज़ार नहीं होता मुझसे, आयशा!"
आयशा ने जल्दी से अपना दिमाग चलाते हुए कहा। "रात के करीब 10 बजे... जब सायमा की डोली रुखसत हो जाएगी।"
आयशा मन ही मन सोच रही थीं कि इस बहाने उन्हें सोचने और खुद को संभालने का थोड़ा वक्त मिल जाएगा।
पर विशाल ने फौरन इनकार में सिर हिला दिया, "नहीं! मुझे तुमसे रुखसती से पहले मिलना है। हर हाल में।"
"रुखसती से पहले? लेकिन हम मिलेंगे कहाँ?" आयशा ने घबराकर पूछा।
विशाल ने अम्मी की आँखों में देखते हुए बड़ी बेबाकी से कहा, "तुम्हारे कमरे में मिलेंगे।"
"मेरे कमरे में?" अम्मी ने साफ़ ना में सिर हिलाया। "सवाल ही पैदा नहीं होता! मेरे कमरे को तो इन लोगों ने औरतों का मुख्य विश्राम कक्ष बना रखा है। वहाँ माँ जी का सारा सामान फैला पड़ा है और आधी से ज़्यादा औरतें वहीं अपना रूप-श्रृंगार सँवार रही हैं। वहाँ तो चैन से सांस लेने तक की जगह नहीं है, मिलना तो दूर की बात है।"
विशाल ने पूरी तरह से फ्रस्ट्रेट होकर कहा, "तो फिर कहाँ? हवेली का हर एक कमरा मेहमानों से ठसाठस भरा हुआ है।"
आयशा ने मन ही मन राहत की सांस ली और सोचा, 'शुक्र है अल्लाह का, बची... कम से कम अभी के लिए तो पीछा छूटा।'
विशाल ने कुछ देर गहरे विचार में डूबकर सोचा, और फिर अचानक उसके चेहरे पर वही कमीनी मुस्कुराहट तैर गई।
"एक जगह खाली है," विशाल ने आँखों में चमक लाते हुए कहा।
अम्मी ने अचरज से पूछा, "कौन सी जगह?"
"हवेली के पीछे एनेक्सी का कमरा नंबर 3!" विशाल ने जवाब दिया।
"गेस्ट विंग?" अम्मी ने चौंककर कहा, "वहाँ तो सारे बाराती ठहरे हुए होंगे!"
"नहीं होंगे," विशाल ने अम्मी को समझाते हुए कहा, "सारे बाराती अभी मेन हॉल में खाना खाने में बिजी हैं, और खाना खाते ही वो सीधा मेन गेट पर जाएँगे रुखसती के इंतज़ाम के लिए। वो सारे कमरे अभी बिल्कुल सुनसान और खाली पड़े हैं... मुझे अच्छी तरह पता है क्योंकि हम सब वहीं तो ठहरे हुए हैं।"
"लेकिन मैं इतनी भीड़ और रिश्तेदारों के बीच में से अकेले कैसे निकलूँगी?" आयशा ने झिझकते हुए सवाल किया।
आयशा दरअसल मन ही मन बहाने बना रही थीं ताकि विशाल की इस योजना को कुछ देर के लिए और टाला जा सके और उन्हें सोचने का मौका मिल जाए।
"बहाना बिल्कुल आसान है," विशाल ने उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा। "तुम अपनी माँ से कह देना कि तुम्हारे कमरे में बहुत शोर और भीड़भड़ाका है, जिसकी वजह से तुम्हारे सिर में तेज़ माइग्रेन का दर्द उठ रहा है। तुम्हें आधे घंटे के लिए बिल्कुल शांति और खामोशी चाहिए ताकि तुम थोड़ा लेट सको। इसीलिए तुम आराम करने के लिए खाली गेस्ट विंग की तरफ जा रही हो जहाँ बिल्कुल शोर न हो।"
आयशा विशाल का यह शातिर दिमाग और फुलप्रूफ प्लान सुनकर भौचक्की रह गईं। उनके दिमाग में एक ही ख्याल आया—'हे अल्लाह, कितना चालाक और कमीना है यह लड़का! हर बात का कोई न कोई घटिया रास्ता ढूँढ ही लेता है।'
आयशा ने मन ही मन यह सब सोचा, पर विशाल की तरफ देखते हुए अपनी उखड़ती सांसों के साथ फुसफुसाकर बोलीं, "हर बात का काट और जवाब तैयार रहता है न तुम्हारे पास?"
विशाल: "बिल्कुल! रूम नंबर 3... वहाँ खिड़कियों के भारी पर्दे गिरे होंगे। तुम्हें आना ही होगा आयशा, मुझे कोई बहाना या इनकार नहीं चाहिए।"
विशाल अचानक आयशा की तरफ एक कदम और बढ़ा और उसने बिना किसी चेतावनी के दोबारा अपने दोनों हाथों में अम्मी के भारी, सुडौल मम्मों को भर लिया।
अम्मी: "अरे! यह... यह क्या कर रहे हो विशाल?"
विशाल: "अरे, अभी थोड़ी देर पहले तुमने ही तो कहा था कि यह अब सिर्फ मेरे हैं... तो बस, अपने ही खिलौनों से प्यार कर रहा हूँ आयशा!"
"दरवाज़ा तुम्हें खुला ही मिलेगा," विशाल ने उनके मम्मों को अपनी हथेलियों में सहलाते हुए बड़े बेबाक अंदाज़ में कहा। फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक शरारती और घटिया मुस्कुराहट तैर गई, "एनेक्सी के कमरा नंबर 3 में तुम्हें बहुत अच्छे से प्यार करूँगा। बिल्कुल पूरा नंगा करके! उस वक्त तुम्हारा कोई बहाना नहीं चलेगा आयशा।"
"वही तो मैं भी चाहती हूँ..." अम्मी ने अपनी बिखरी हुई जुल्फों को सँवारते हुए नशीली आवाज़ में कहा। "मैं भी उतनी ही प्यासी हूँ विशाल, जितने तुम हो... शाम को एनेक्सी में पूरा हिसाब-किताब बराबर करेंगे।"
(पर आयशा के मन में कुछ और ही उथल-पुथल मच रही थी—'हे अल्लाह! अब कुछ नहीं हो सकता... मेरी आबरू तो वैसे भी तेल लेने गई। बड़ी तीस मार खाँ बन रही थी, पर इसके आगे सब हार गई।')
"ठीक है," विशाल ने उनकी बात मानते हुए कहा। "अब यहाँ से जाओ, इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाए और मैं तुम्हें यहीं ज़मीन पर पटक दूँ!"
"जा रही हूँ..." अम्मी ने फुसफुसाकर कहा और दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ा दिए।
"अरे रुको!" विशाल ने पीछे से टोकते हुए चुटकी ली, "बाहर जाने से पहले अपनी लिपस्टिक तो ठीक कर लो। चेहरा देखकर ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने तुम्हारा मुँह बुरी तरह नोच डाला हो!"
"तुम चुप ही रहो!" अम्मी ने झेंपते और शर्माते हुए कहा। उन्होंने जल्दी से ज़मीन पर गिरे अपने दुपट्टे को उठाया, उसे झाड़ा और सलीके से सिर पर ओढ़ लिया।
फिर उन्होंने पास के लकड़ी के संदूक पर रखे अपने क्लच और मोबाइल को उठाया। क्लच की ज़िप खोलकर एक वेट टिश्यू निकाला और शीशे में देखे बिना ही अपने होठों और ठुड्डी पर फैली लिपस्टिक को अच्छी तरह साफ़ किया। इस्तेमाल किए हुए उस लाल टिश्यू को वहीं संदूक के पास फेंककर वे बाहर निकलने के लिए दरवाज़े की ओर बढ़ गईं।
दरवाज़े के पीछे छिपा मेरा वजूद थर-थर कांप रहा था, मेरी सांसें जैसे सीने में ही अटक कर रह गई थीं। वो बाहर आ रही थीं!
मैंने बिना एक पल की देरी किए, तुरंत वहाँ से पीछे हटने का फैसला किया। मेरा सिर खौल रहा था, लेकिन अब मेरे पास उनकी इस घटिया मुलाकात का पूरा प्लान था।
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
14-09-2026, 05:57 AM
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
14-09-2026, 05:58 AM
Ammi ne apni gardan halki si peeche ki, unki aankhein hawas aur bebasi mein poori tarah doobne lageen thheen. Unhone behad ukhdi aur kaampti saanson ke saath phusphusaate hue poochha, "To ab kya?"
"To ab yeh..." Vishal ne apne haathon ko unke naazuk baazu se hataakar seedhe unki patli, makhamali kamar par kas diya aur ek zordaar jhatke ke saath apni lower body se chipka liya. Ammi ke munh se ek kaamuk aur tez 'Aahhh...' nikli, jab unke naazuk pet aur jaanghon ke oopri hisse ne Vishal ke pyjama ke peeche us sakht, garam lohe jaise 10 inch ke lund ki chhubhan ko mehsoos kiya. Unke jism mein vaasana ka ek bhayankar current daud gaya. "Yeh lipstick..." Vishal ne apne chehre ko unke gulaabi hothon ke bilkul kareeb laakar kaha. Uski hawas se bhari saansen Ammi ke chehre ko jhulsa rahi thheen. "Kal raat se iske zaayqe ka paagalpan sawaar hai mere sir par... iska asli swaad to mujhe abhi, isi waqt chakhna hai." Aur agle hi pal, Vishal ne Ammi ke un muted berry lipstick se saje raseele hothon par kisi bhookhe ki tarah dhaava bol diya. Yeh koi sharaafat bhara choumban nahi tha—yeh hawas, nagn adhikaar aur ek gair aurat ke jism ko sareaam raundne ki zaheeri pyaas ka ek nanga mel tha. Vishal ne Ammi ke dono hothon ko boori tarah apne munh ke andar daboch liya. Wah unke nichle raseele honth ko apne daanton se berahmi se kaatte hue, unke munh ke ras ko kisi pyaase jaanwar ki tarah ghat-ghat choosne laga. Ammi ne shuruaat ke chand secondon ke liye pratirodh dikhaya. Unke kaampte gore haath Vishal ke chaude, faulaadi seene par use peeche dhakelne ke liye uthe, lekin jaise hi Vishal ke lund ki akad unke pet par aur gahre dabaav ke saath dhansi, unka saara virodh pal bhar mein pighalkar paani-paani ho gaya. Vaasana ke us teekhe swaad aur zillat ke sukh ne Ammi ki rooh ko gulaam bana liya. Unhone ek halki subki ke saath apna munh poora khol diya. Unki geeli, garam aur kasmasaati hui zabaan khud-ba-khud Vishal ke munh ki gahraaiyon mein sarakti chali gai aur uski zabaan ke saath lipatkar ek nagn, besharm jang ladne lagi. Unhone apni baahein Vishal ki gardan ke gird kas ke lapet leen, aur apne bhare hue jism ko uske sakht jism par zor-zor se ragadna shuru kar diya. Mere kaanon mein unki gandi, geeli aur kaamuk aawaazein goonjne lageen. Shlak... Mammah... Thapp... Saliva aur zabaanon ki is jang ki aawaaz itni tez thhi ki mujhe lakdi ke bhaari darwaaze ke baahar tak saaf sunai de rahi thhi. Vishal ne kiss ko todte hue, Ammi ke nichle raseele honth ko apne teekhe daanton mein phansaaya aur poori taaqat se zor se kheincha, jaise wo unhein waheen kachha chaba jaana chahta ho. Jab usne apne daanton ki pakad chhori, to Ammi ke sooje hue laal hothon aur Vishal ke munh ke beech thook aur laar ki ek lambi, chamakti hui reshami taar kheench gai. Ammi ki aankhein besudh hokar band thheen, unka gora chehra paseene ki boondon aur besharm laali se dahak raha tha. Wo muted berry lipstick ab boori tarah phailkar unki thuddi aur gaalon tak bikhar chuki thhi. Us pal wo meri sharaafat ki moorat 'Ammi' bilkul nahi lag rahi thheen, balki hawas se tadapti hui koi beqaaboo aurat nazar aa rahi thheen. "Ufff..." Ayesha boori tarah haanf rahi thheen. Unke gahre gale se unke bhaari mammon ka ubhaar itni tezi se oopar-neeche hil raha tha ki kameez ka har ek dhaaga tana ja raha tha. Ayesha ne apni tharathraati ungli se apne kate aur sooje hue hothon ko chhoo'a, "Tumne... tumne meri poori lipstick kharaab kar di, jaanwar... ab mein baahar sab ke saamne kaise jaungi? Log dekhenge to kya सोचेंगे (sochenge)?" Vishal ne ek ghatia, sharaarati muskaan ke saath apni ungli Ammi ke geele, phaile hue laal hothon par pheri aur phir usi ungli ko apne munh mein daalkar bade maze se choos liya. "Sochenge ki dulhan se zyaada suhaagraat ka asli maza to Ayesha ji le rahi hain," Vishal ne Ammi ki aankhon mein aankhein daalkar hawas bhari aawaaz mein phusphusaya, "aur abhi to sirf lipstick kharaab ki hai Ayesha... abhi to tumhara poora hulya bigaadna aur tumhein poori tarah bistare par raundna baaki hai." Ammi ne thoda peeche hatte hue, apne chehre par ek behad kaatil muskuraahat bikheri. Unhone jaan-boojhkar apne kandhe peeche ki oor kheinche, taaki unki kameez ke neeche dabe bhaari seene ka ubhaar aur zyaada saaf aur numaaya hokar Vishal ke saamne aa jaaye. "Baatein kam karo... sirf 2 minute hain tumhare paas. Jo karna hai jaldi karo, warna mein chali... mein yahan 2 minute se zyaada ruk hi nahi sakti," Ammi ne apni nasheeli aankhon se use taakte hue uksaaya. "2 minute mein to mein tumhein wo yaad dila dunga jo tumhare shauhar ne saalon mein nahi kiya," Vishal gurraya. Uska bhaari haath Ammi ki naazuk kamar par raengta hua oopar ki taraf utha... aur seedha unke bhare hue, kase hue mamme par ja tika. Usne apne poore panje ki taaqat se unke daahine mamme ko boori tarah daboch liya. Yadyapi yeh sab kapde ke oopar se ho raha tha, par uski pakad itni sakht, nangi aur berahm thhi ki Ammi ka poora jism jhatke se akad gaya. Vishal ki chaudi ungliyaan unke makhamali maans ke andar gahrai tak dhansi chali gayeen. Ammi ke sooje hue hothon se ek tez, dabi hui kaamuk cheekh footi—"Aaaahhhh!" Unki aankhein ek pal ke liye khauf aur bepanaah maje ke ahsaas se phati ki phati reh gayeen, jaise poore badan mein bijli ka bhayankar current daud gaya ho. Unki saansen gale mein hi atak kar reh gayeen. Unke ghutne itne kamzoor pad gaye ki agar Vishal ne apni taaqat se unhein apni oor na kheincha hota, to wo waheen farsh par gir padeen. Unhone fauran kaampte haathon se Vishal ki kalai ko pakad liya. Mujhe laga ki wo ab apni bachi-kuchi gairat dikhaengi, uske haath ko jhatakkar hataengi aur us kameene ko ek zordaar thappad raseed karengi. Lekin... aisa kuchh nahi hua. Unhone Vishal ke haath ko hataya tak nahi! Balki iske ulte, unhone apne seene ko aur aage karke Vishal ki sakht hatheli par daba diya, maano us pal wo poori tarah apna aapa kho chuki hon. Ammi ne apni suraahidaar gardan peeche ki taraf phenk di, unki aankhein besudh hokar moond gayeen aur unke laal hote chehre par ek aisi raahat tair gai, jaise wo barson se isi sparsh ki tadap mein jal rahi thheen. "Vishal... oh god..." Ammi boori tarah haanfte hue phusphusaane lageen, "tumne... tumne to sach mein daboch hi liya..." "Haan ji Ayesha ji, daboch liya!" Vishal ne unke bhaari ubhaar ko apni poori hatheli mein bharte hue, use neeche se oopar tak kisi bahumoolya cheez ki tarah taolte hue kaha, "Aur kya kamaal ki cheez pakdi hai maine yaar... tere mamme kitne soft hain Ayesha! Yeh to mere bade se haath mein bhi poore sama nahi paa rahe hain. Kal raat bhi jab inhein kaskar dabaya tha, tabhi se mere haath taras rahe the inhein dobaara masalne ke liye!" Ammi ne nasha-bhari aankhein kholkar Vishal ko dekha. Unka dimaag cheekh-cheekhkar keh raha tha ki door hat jaayen, bhaag jaayen yahan se... Lekin unka badan, unka sulagta hua rom-rom kuchh aur hi chaah raha tha. Barson ki dabi hui pyaas ne unke hosh-o-havaas par poori tarah qabza kar liya tha. Unke sooje, rasiile hothon se achanak hi behad besharm sawaal nikal gaya. "Bade hain?" Ammi ne nasheeli, husky aawaaz mein poochha, aur apni patli kamar ko aage dhakellkar apne makhamali seene ko Vishal ki sakht hatheli mein aur zyaada thhoons diya. "Are bade kya Ayesha ji... poore Dashahari aam ki tarah bhaari aur raseele lag rahe hain!" Vishal ne apni ungliyon ko unke mamme ke gosht mein aur gahrai tak gaadte hue kaha. "Kitne narm hain... aur andar tak kitne bhare hue. Lag raha hai jaise abhi is kameez ki silai phaadkar baahar nikal padenge. Dekho to sahi, mere zara se chhoone bhar se kaise akad gaye hain!" Ammi ne hawas aur bebasi ki masti mein apna nichla kate jaise honth daanton tale daba liya, "Aaaahhhhhh... Vishal... mat bolo aisa..." Yeh sunte hi Vishal ne kapde ke neeche patthar ki tarah sakht ho chuke unke nipple ko apne angoothe aur pehli ungli ke beech chutki mein dabocha aur boori tarah marod diya. "Sssssssseeeee... aaaahh!" Ammi tadapkar machal utheen. Unka poora bhara hua jism kisi tani hui kamaan ki tarah mud gaya. Dard aur bepanaah sukh ke is bhayankar ahsaas mein unhone Vishal ke chaude kandhe par apne teekhe naakhun gaad diye. "Wahan... ufff Vishal... wahan to seedhe kaleje mein current lag raha hai..." "Sach-sach bataana Ayesha... kya pehli baar kisi mard ne tumhein is tarah yahan chhoo'a hai?" Vishal ne kameeni sharaarat se poochha, jabki uska haath bina ruke lagaataar unke mamme ko kapde ke oopar se masal raha tha. "Haan... ufff haan..." Ammi ne apni aankhein band karke sach ugal diya. Unki aawaaz mein ek besharm aur gandi eemaandaari thhi, "Barson se... barson se mere yeh ubhaar pyaase tadap rahe the Vishal... tumhare in nirdayi haathon ne aaj inhein phir se zinda kar diya..." Mere kaanon mein khoon daudne laga. Meri maa... apni zabaan se maan rahi thheen ki wah mere baap ke saath kabhi khush nahi raheen... aur unhein is kameene Vishal ke haathon mein wo sab mil raha tha, jiski hawas mein wo sadiyon se jal rahi thheen. "To phir ab se ye dono mere hain," Vishal ne poori thasak aur nange haq se kaha, aur apne doosre khaali haath ko uthaakar Ammi ke baayen mamme par bhi jama diya. Ab unke dono bhaari, raseele ubhaar Vishal ke bhookhe panjon ke qabze mein the. "Sun liya Ayesha? Ye dono ab sirf aur sirf mere khiloune hain!" Ammi ne ek gahra, kaamuk aur tript saans kheencha. Unhone apni suraahidaar gardan jhukaakar apna sir Vishal ke seene par tika diya. "Haan Vishal... tumhare hain... tarsao mat mujhe... jo karna hai karo inke saath... " Ammi ab poori tarah apni aabroo bhoolkar uske saamne minnatein kar rahi thheen. Vishal ne Ammi ke dono bhare hue, makhamali ubhaaron ko apne bade-bade panjon mein kaskar jakad rakha tha. Usne dono haathon ko andar ki taraf dabaate hue Ammi ke mammon ko aapash mein chipka diya, jisse unke seene ki cleavage ek gahri ghaati ki tarah aur gahri ho gai. Kurti ke gahre gale ke oopar se unka gora, maakhan jaisa maans ubalkar baahar ki taraf aa gaya tha, maano us tight kapde ki bandishon ko todkar abhi Vishal ke haathon mein bikhar jaana chahta ho. "Aah... Vishal... dheere..." Ammi ki gardan peeche ludhak gayi, unke baal hawa mein jhool gaye. "Dard ho raha hai..." "Hone do," Vishal ne gurraate hue kaha, aur apna chehra unke dono ubhaaron ke beech bani us gahri lakeer mein ragad diya. "Mein chahta hoon ki ye baahar aa jaayen. Mera man kar raha hai ki mein yeh mehnagi kameez abhi phaad doon aur in doodh jaise golon ko nanga kar doon." Ammi ne masti mein apni ungliyaan Vishal ke baalon mein phansa leen aur uska sar apne seene par daba diya. "Aaaahhhhhh….abhi nahi Vishal…..." Meri saansen atak gayeen. Vishal ne apna sar uthaya, uski aankhein hawas se laal thheen. "Haan….abhi nahi... abhi agar phaad diya to baahar tamaasha ho jaayega. Lekin... jab hum akele honge... tab mein tumhare jism par dhaaga bhi nahi rahe ne doonga." Usne apne haath wahan se hataye nahi, balki unhein aur zor se masalte hue, apna nichla hissa Ammi ki taraf dhakella. Vishal ne apna sakht lund-jo uske kurte ke neeche ek saaf, kathor ubhaar ban chuka tha, seedha Ammi ke pet aur unki jaanghon ke beech wale hisse par ragad diya. "Ohh..." Ammi ki aankhein palat gayeen. Unka poora vajood kaamp utha. "Mehsoos kar rahi ho?" Vishal phusphusaya. Usne apne hips ko gol ghumaate hue, apni sakhti ko Ammi ki sabse sensitive jagah par ragda. "Yeh sirf tumhare liye taiyaar hua hai, Ayesha. Bataao, kaisa lag raha hai?" Ammi ne boori tarah haanfte hue, apne dono haath Vishal ki kamar par daal diye. Unka poora jism aag ki tarah tap raha tha. Uski saansen ukhdi hui thheen. "Fuck, Ayesha..." Vishal ne Ammi ke maathe par apna maatha tikaate hue kaha. "Mujh se ab raha nahi ja raha... tumhara yeh jism... yeh khushboo... mujhse ab aur bardaasht nahi ho raha." Usne achanak Ammi ki kameez ke daaman ko pakad liya aur use oopar uthaane ki koshish ki. "Mein abhi... isi waqt tumhare andar jaana chahta hoon. Yahan koi nahi aayega." Ammi ne ekdam se uska haath pakad liya aur use zor se neeche dhakel diya. "Nahi... Vishal, nahi. Ruko." "Kyun rukoon?" Vishal gurraya, usne apne crotch ko unke pet par ragda, zid karte hue. "Kyun tadpa rahi ho? Dekho mera kya haal hai. Bas shalwar neeche karo aur mujhe enter hone do. Do minute lagenge." "Paagal mat bano," Ammi ne use halka sa dhakka diya, haalaanki unki aankhon mein bhi wahi bhookh thhi, par dar aur hosh bhi tha. "Yahan? Is dhool aur mitti mein?" "To kya farq padta hai?" Vishal ne unki gardan par paagalon ki tarah kiss karte hue manaane ki koshish ki, uska haath unke naade ki taraf badha. "Humein bas ek doosre se matlab hai. Mitti ho ya bistar... mein bas tumhein apna banaana chahta hoon. Abhi." "Mujhe farq padta hai!" Ammi ne jhatke se uska haath apne seene se hata diya. Unhone hadbadaakar apni bikhri hui kameez sambhaali aur apni ukhadti saanson par qaaboo paane ki naakaam koshish karne lageen. Shayad unke andar ki sooi hui aurat ko apni maryaada, parivaar aur is jagah ka khayaal aa gaya tha, isliye wah badhawaas hokar Vishal se door hatne ki koshish kar rahi thheen. Vishal ne poori tarah frustrate hokar ek gahri saans li aur paas ki deewar par zor se mukka maara. "Tum tadpaane mein behad maahir ho Ayesha... to ab kya karoon mein iska?" Usne gusse, hawas aur betaabi se pant ke oopar tane hue apne vishaalkay, ubhre hue lund ki taraf ishaara kiya. "Kya ise aise hi tadpta hua chhor doon?" Ammi ne sharm aur jhijhak se fauran apna munh doosri taraf pher liya. Lekin Vishal ek kadam aage badha, usne Ammi ki kalai pakdi aur unke kaampte hue haath ko kapde ke oopar se hi seedhe apne sakht aur garam lund par le jaakar daba diya. Ammi ki hatheli ke neeche Vishal ki nason ka phadakna saaf mehsoos ho raha tha. "Sabr karo..." Ammi ne apna haath wahan se chhudaane ki halki si naakaam koshish karte hue Vishal ki aankhon mein dekha aur nasheeli phusphusaahat mein kaha, "sabr ka phal... bahut meetha hota hai." Ayesha (man mein): "Hey ,.'! Yeh mein kya karne ja rahi thhi? Mein to yahan Saima ko is darinde se bachaane aayi thhi... lekin jab bhi mein is Vishal ke paas hoti hoon, to mere jism aur dimaag ko aakhir ho kya jaata hai? Mujhe har haal mein isse door jaana hoga... mujhe khud ko sambhaalne aur sochne ke liye thoda waqt chahiye." "Kab tak?" Vishal ne chidhkar poochha. "Aur intazaar nahi hota mujhse, Ayesha!" Ayesha ne jaldi se apna dimaag chalaate hue kaha. "Raat ke qareeb 10 baje... jab Saima ki doli rukhsat ho jaayegi." Ayesha man hi man soch rahi thheen ki is bahaane unhein sochne aur khud ko sambhaalne ka thoda waqt mil jaayega. Par Vishal ne fauran inkaar mein sir hila diya, "Nahi! Mujhe tumse rukhsati se pehle milna hai. Har haal mein." "Rukhsati se pehle? Lekin hum milenge kahan?" Ayesha ne ghabraakar poochha. Vishal ne Ammi ki aankhon mein dekhte hue badi bebaaki se kaha, "Tumhare kamre mein milenge." "Mere kamre mein?" Ammi ne saaf na mein sir hilaya. "Sawaal hi paida nahi hota! Mere kamre ko to in logon ne auraton ka mukhya vishraam kaksh bana rakha hai. Wahan Maa ji ka saara saamaan phaila pada hai aur aadhi se zyaada auratein waheen apna roop-shringar sanvaar rahi hain. Wahan to chain se saans lene tak ki jagah nahi hai, milna to door ki baat hai." Vishal ne poori tarah se frustrate hokar kaha, "To phir kahan? Haveli ka har ek kamra mehmaanon se thasaathas bhara hua hai." Ayesha ne man hi man raahat ki saans li aur Socha, 'Shukr hai ,.' ka, bachi... kam se kam abhi ke liye to peecha chhoota.' Vishal ne kuchh der gahre vichaar mein doobkar Socha, aur phir achanak uske chehre par wahi kameeni muskuraahat tair gai. "Ek jagah khaali hai," Vishal ne aankhon mein chamak laate hue kaha. Ammi ne acharaj se poochha, "Kaun si jagah?" "Haveli ke peeche annexe ka kamra number 3!" Vishal ne jawaab diya. "Guest wing?" Ammi ne chaunk-kar kaha, "Wahan to saare baaraati thehre hue honge!" "Nahi honge," Vishal ne Ammi ko samjhaate hue kaha, "saare baaraati abhi main hall mein khaana khaane mein busy hain, aur khaana khaate hi wo seedha main gate par jaaenge rukhsati ke intazaam ke liye. Wo saare kamre abhi bilkul sunsaan aur khaali pade hain... mujhe achhi tarah pata hai kyunki hum sab waheen to thehre hue hain." "Lekin mein itni bheed aur rishtedaaron ke beech mein se akele kaise nikalungi?" Ayesha ne jhijhakte hue sawaal kiya. Ayesha darasal man hi man bahaane bana rahi thheen taaki Vishal ki is yojna ko kuchh der ke liye aur taala ja sake aur unhein sochne ka mauka mil jaaye. "Bahaana bilkul aasaan hai," Vishal ne unki aankhon mein aankhein daalkar kaha. "Tum apni Maa se keh dena ki tumhare kamre mein bahut shor aur bheedbhadaaka hai, jiski wajah se tumhare sir mein tez migraine ka dard uth raha hai. Tumhein aadhe ghante ke liye bilkul shaanti aur khaamoshi chahiye taaki tum thoda let sako. Isiliye tum aaraam karne ke liye khaali guest wing ki taraf ja rahi ho jahan bilkul shor na ho." Ayesha Vishal ka yeh shaatir dimaag aur foolproof plan sunkar bhauchakki reh gayeen. Unke dimaag mein ek hi khayaal aaya—'Hey ,.', kitna chaalaak aur kameena hai yeh ladka! Har baat ka koi na koi ghatia rasta dhoondh hi leta hai.' Ayesha ne man hi man yeh sab Socha, par Vishal ki taraf dekhte hue apni ukhadti saanson ke saath phusphusaakar boleen, "Har baat ka kaat aur jawaab taiyaar rehta hai na tumhare paas?" Vishal: "Bilkul! Room number 3... wahan khidkiyon ke bhaari parde gire honge. Tumhein aana hi hoga Ayesha, mujhe koi bahaana ya inkaar nahi chahiye." Vishal achanak Ayesha ki taraf ek kadam aur badha aur usne bina kisi chetaavani ke dobaara apne dono haathon mein Ammi ke bhaari, sudaul mammon ko bhar liya. Ammi: "Are! Yeh... yeh kya kar rahe ho Vishal?" Vishal: "Are, abhi thodi der pehle tumne hi to kaha tha ki yeh ab sirf mere hain... to bas, apne hi khilounon se pyaar kar raha hoon Ayesha!" "Darwaaza tumhein khula hi milega," Vishal ne unke mammon ko apni hatheliyon mein sahlaate hue bade bebaak andaaz mein kaha. Phir uske chehre par dheere-dheere ek sharaarati aur ghatia muskuraahat tair gai, "Annexe ke kamra number 3 mein tumhein bahut achhe se pyaar karunga. Bilkul poora nanga karke! Us waqt tumhara koi bahaana nahi chalega Ayesha." "Wahi to mein bhi chaahti hoon..." Ammi ne apni bikhri hui zulfon ko sanvaarte hue nasheeli aawaaz mein kaha. "Mein bhi utni hi pyaasi hoon Vishal, jitne tum ho... shaam ko annexe mein poora hisaab-kitaab baraabar karenge." (Par Ayesha ke man mein kuchh aur hi uthal-puthal mach rahi thhi—'Hey ,.'! Ab kuchh nahi ho sakta... meri aabroo to waise bhi tel lene gai. Badi tees maar khaan ban rahi thhi, par iske aage sab haar gai.') "Theek hai," Vishal ne unki baat maante hue kaha. "Ab yahan se jaao, isse pehle ki mera iraada badal jaaye aur mein tumhein yeheen zameen par patak doon!" "Jaa rahi hoon..." Ammi ne phusphusaakar kaha aur darwaaze ki taraf kadam badha diye. "Are ruko!" Vishal ne peeche se tokte hue chutki li, "baahar jaane se pehle apni lipstick to theek kar lo. Chehra dekhkar aisa lag raha hai jaise kisi ne tumhara munh boori tarah nooch daala ho!" "Tum chup hi raho!" Ammi ne jhenpte aur sharmaate hue kaha. Unhone jaldi se zameen par gire apne dupatta ko uthaya, use jhaada aur saleeqe se sir par odh liya. Phir unhone paas ke lakdi ke sandook par rakhe apne clutch aur mobile ko uthaya. Clutch ki zip kholkar ek wet tissue nikaala aur sheeshe mein dekhe bina hi apne hothon aur thuddi par phaili lipstick ko achhi tarah saaf kiya. Istemaal kiya hua us laal tissue ko waheen sandook ke paas phenkkar ve baahar nikalne ke liye darwaaze ki oor badh gayeen. Darwaaze ke peeche chhipa mera vajood thar-thar kaamp raha tha, meri saansen jaise seene mein hi atak kar reh gai thheen. Wo baahar aa rahi thheen! Maine bina ek pal ki deri kiye, turant wahan se peeche hatne ka faisla kiya. Mera sir khaul raha tha, lekin ab mere paas unki is ghatia mulaqaat ka poora plan tha.
Deepak Kapoor
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14-09-2026, 06:01 AM
(This post was last modified: 14-09-2026, 06:03 AM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
Both Versions are posted. Please leave your comments, rating & likes. Plan to give Next update soon . Maybe by next weekend . Also i wanted thanks fans for making this Series Cross 4,00,000 views .
Deepak Kapoor
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14-09-2026, 06:34 AM
Yes, we have got it! Thanks a lot yaar. You have again made us happy by posting this blockbuster update.
14-09-2026, 06:39 AM
Wah! Bahut khoob, dil kush kar diya aapne yaar. Bahut badhiya update dala aapne.
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