20-08-2026, 12:40 PM
Shot update
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Thriller बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ?
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26-08-2026, 12:32 PM
Mind control? Just Like eros apartment kay tharki watchman
28-08-2026, 08:19 AM
28-08-2026, 11:14 PM
चैताली टेबल पर अपनी पीठ के बल लेट गई। उसके भारी मम्मे टेबल की सतह पर फैल गए। हरीश उसके पैरों के बीच आया और उसने उसकी सूती पैंटी को एक तरफ खिसका दिया। वहां की त्वचा गुलाबी और नम थी।
हरीश ने अपना चेहरा नीचे कीया और उसकी चूत के बाहरी हिस्से को चाटना शुरू कीया। उसने अपनी जीभ से उसके क्लीटोरिस को सहलाया, जिससे चैताली के शरीर में एक हल्की सी सिहरन दौड़ी। वह सम्मोहित थी, लेकीन उसका शरीर स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया दे रहा था। 'चप-चप' की आवाजें कमरे के सन्नाटे को चीर रही थीं। हरीश ने गहराई से उसकी चूत को चाटा, उसकी गंध और स्वाद का आनंद लिया।
"अब अपनी पैंटी उतारो और कालीन पर लेट जाओ। मिशनरी पोजीशन में," हरीश ने आदेश दिया।
चैताली ने पैंटी उतारी और नीचे कालीन पर लेट गई। उसके पैर खुले हुए थे। हरीश उसके बीच में आया और अपनी उंगलियों से उसके गीलेपन को महसूस कीया। उसने एक, फिर दो, और फिर तीन उंगलियां उसके अंदर डालीं।
"कीतनी गीली हो तुम, चैताली। तुम्हारा यह छेद मेरा इंतज़ार कर रहा था," हरीश ने गंदी बात करते हुए अपनी चौथी उंगली भी अंदर ठूंस दी। वह अब पूरी तरह से तैयार थी।
हरीश ने अपने हाथ की हथेली में थोड़ा थूक लिया और उसे अपने लन्ड पर रगड़ा ताकी लुब्रिकेशन हो सके। उसने धीरे से अपने लन्ड की नोक को उसकी चूत के द्वार पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेलना शुरू कीया।
"आह..." चैताली के मुंह से एक हल्की सी आह निकली, हालांकी वह अभी भी सम्मोहित थी।
जैसे-जैसे वह अंदर जा रहा था, उसके शरीर की जकड़न हरीश को और उत्तेजित कर रही थी। उसने धीरे-धीरे पंप करना शुरू कीया। पहले गति धीमी थी, फिर धीरे-धीरे वह तेज होने लगा। मांस के टकराने की 'थप-थप' की आवाज़ें आने लगीं।
"तुम एक असली रंडी हो, चैताली। देखो कैसे मेरा लंड तुम्हारे अंदर जा रहा है," हरीश ने उसकी कमर को मजबूती से पकड़ते हुए जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कीए।
चैताली का शरीर हर धक्के के साथ हिल रहा था। उसके मम्मे ऊपर-नीचे उछल रहे थे। हरीश की सांसें तेज हो गई थीं। कुछ मिनटों की तीव्र मेहनत के बाद, उसने एक गहरी आह भरी और अपना सारा वीर्य उसके गर्भाशय के अंदर खाली कर दिया।
वह कुछ देर तक उसके ऊपर ही लेटा रहा, अपनी सांसों को सामान्य होने दिया। फिर उसने उसे धीरे से उठाया और उसे 'डॉगी पोजीशन' में आने का आदेश दिया।
28-08-2026, 11:34 PM
वह कुछ देर तक उसके ऊपर ही लेटा रहा, अपनी सांसों को सामान्य होने दिया। फिर उसने उसे धीरे से उठाया और उसे 'डॉगी पोजीशन' में आने का आदेश दिया।
"अब घुटनों और हाथों के बल झुक जाओ। मुझे तुम्हे पीछे से चोदना है," हरीश ने आदेश दिया।
चैताली झुक गई, उसके भारी कूल्हे अब हरीश के सामने पूरी तरह खुले हुए थे। उसकी चूत अब पहले से कहीं ज्यादा लुब्रिकेटेड थी, क्योंकी उसमें वीर्य और प्राकृतिक रस का मिश्रण था।
हरीश ने बिना कीसी देरी के पीछे से अपना लन्ड उसके अंदर घुसा दिया। इस बार वह पूरी ताकत से प्रहार कर रहा था। हर धक्के के साथ उसकी अंडकोष चैताली के कूल्हों से टकरा रहे थे, जिससे एक तेज ' थप-थप ' की आवाज़ आ रही थी।
"उफ़! यह छेद कीतना तंग और गरम है!" हरीश चिल्लाया। उसने आगे झुककर चैताली के लटके हुए बूब्स को अपने हाथों में लिया और उसे जोर-जोर से मरोड़ने लगा।
चैताली की कमर नीचे की ओर झुकी हुई थी और वह केवल हरीश की गति के साथ हिल रही थी। हरीश की पकड़ उसकी कमर पर इतनी मजबूत थी की वहां उंगलियों के निशान पड़ गए थे। जब उसे लगा की वह फिर से चरम सीमा पर पहुँचने वाला है, तो उसने अचानक अपना लन्ड बाहर खींच लिया।
उसने चैताली के बालों को मजबूती से पकड़कर उसके सिर को पीछे की ओर खींचा और अपना सारा लोड उसके चेहरे पर खाली कर दिया। सफेद गाढ़ा वीर्य उसकी आंखों, गालों और होंठों पर बिखर गया।
हरीश ने एक गहरी सांस ली और सुकून से उसके बगल में लेट गया। उसने कुछ देर तक उसे गले लगाया, जैसे वह कोई खिलौना हो।
29-08-2026, 10:51 PM
(This post was last modified: 30-08-2026, 08:18 PM by MohdIqbal. Edited 3 times in total. Edited 3 times in total.)
हरीश उसके ऊपर झुक गया, उसकी छाती उसकी पीठ से दब गई, और उसने अपनी जीभ उसकी रीढ़ की हड्डी के बीचोंबीच फिरा दी।
"मैं चाहता हूँ की इस बार तुम ऊपर रहो," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "मैं तुम्हें चोदते हुए तुम्हारा चेहरा देखना चाहता हूँ।" वह सोफे पर वापस बैठ गया और उसे अपनी ओर खींच लिया। चैताली उसके ऊपर बैठ गई, उसकी जांघें उसकी कमर को जकड़ रही थीं। चैताली ने नीचे उसकी ओर देखा, उसकी आँखें अभी भी धुंधली थीं, उसके होंठ खुले हुए थे। उसने धीरे-धीरे खुद को नीचे कीया, हरीश के लन्ड का सिरा चैताली की चूत को छेड़ रहा था, फिर वह धीरे-धीरे नीचे उतरती गई, इंच-दर-इंच, जब तक की हरीश का मोटा लौड़ा उसके अंदर गहराई तक समा नहीं गया। चैताली ने एक लंबी, कंपकंपी भरी आह भरी, उसका सिर पीछे की ओर झुक गया। उसके मम्मे हिल रहे थे, निप्पल छत की ओर इशारा कर रहे थे। वह धीरे-धीरे हिलने लगी, एक धीमी, घर्षण भरी गति जिससे दबाव सीधे उसकी क्लिटोरिस पर केंद्रित हो रहा था। "हे भगवान... हाँ..." चैताली की आवाज़ में कुछ हद तक स्वाभाविक स्वर लौट आया था, हालाँकी सम्मोहक सुझाव ने उसे वश में रखा हुआ था। "इसे रगड़ो, चैताली। अपनी मोटी चूत को मेरे लन्ड पर रगड़ो," हरीश ने आदेश दिया, उसके हाथ उसके बूब्स को थामने के लिए ऊपर उठे और उन्हें ज़ोर से दबाया। घर्षण बेहद सुखद था। उनकी गीली त्वचा के आपस में रगड़ने की आवाज़ - एक चपचपाहट भरी, फिसलने वाली आवाज़ - हवा में गूंज रही थी। चैताली की हरकतें और अनियमित हो गईं, उसकी साँसें छोटी, तेज़ हो गईं। वह चरम सीमा के करीब थी, उसकी आंतरिक मांसपेशियां लयबद्ध लहरों में उसके चारों ओर धड़क रही थीं। "मैं... मैं बस..." "अभी नहीं," हरीश कराहते हुए बोला, क्योंकी वह भी चरम सुख के करीब था। "मैं चाहता हूँ की तुम चिल्लाकर कहो, मुझे बताओ की तुम मेरी रंडी हो। मुझे बताओ की तुम्हें चुदाई होना पसंद है।" "मैं... मैं तुम्हारी रंडी हूँ!" चैताली रोते हुए बोली, उसकी आवाज़ कांप रही थी। "मुझे चुदाई पसंद है! प्लीज़... मुझे ज़ोर से फ़क करो!" हरीश ने उसके कूल्हों को पकड़ा और ऊपर की ओर ज़ोरदार झटके देने लगा, उसके नीचे आने की गति के साथ तालमेल बिठाते हुए। झटके ज़ोरदार थे, उनके शरीर आपस में टकराकर एक कच्ची, कामुक आवाज़ पैदा कर रहे थे। उसे उसके चरम सुख की गर्मी महसूस हो रही थी, उसकी चूत की दीवारें कसकर सिकुड़ रही थीं। "मैं आ रहा हूँ" वह दहाड़ा। उसने आखिरी बार ज़ोर से ऊपर की ओर धक्का दिया और जितना हो सके उतना अंदर तक धंस गया। उसके शरीर से वीर्य का ज़बरदस्त विस्फोट हुआ, जो सीधे उसके सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) तक जा पहुँचा। वह कराह उठा, उसका शरीर उस तीव्र सुख के झटकों से कांप रहा था, उसका लन्ड उसके अंदर धड़क रहा था और वह लगातार उसके अंदर वीर्य छोड़ रहा था। चैताली उसके सीने पर गिर पड़ी, चरम सुख की लहरें उस पर छा रही थीं। वह सिसक रही थी—सालों से दबी हुई चाहत और अकेलेपन का गुबार निकल रहा था—और उसका शरीर उसके शरीर से सटकर कांप रहा था। वे कई मिनट तक वहीं लेटे रहे, बस उनके दिलों की ज़ोरदार, एक-सी धड़कनें और बाहर गुड़गांव के ट्रैफ़िक की दूर से आती आवाज़ सुनाई दे रही थी। हरीश को एक ठंडी जीत का एहसास हुआ। उसने उस औरत—मिसेज़ चैताली घोष—को देखा; वह सम्मानित एग्जीक्यूटिव, वह गरिमामयी विधवा—अब पसीने से तर-बतर, कांपती हुई और काम-तृप्ति के बाद बेहाल हालत में थी। उसने धीरे से उसे अपने ऊपर से हटाया, हालाँ की उस हरकत में कोई नरमी नहीं थी। वह उठा और बाथरूम की ओर चला गया, जहाँ उसने तौलिए से खुद को साफ़ कीया। जब वह वापस लौटा, तो चैताली अभी भी सोफ़े पर लेटी हुई थी; उसकी आँखें धीरे-धीरे झपक रही थीं, और वह नशा या सम्मोहन धीरे-धीरे उतर रहा था, पर पूरी तरह गया नहीं था।
30-08-2026, 08:27 PM
"अब जाओ और बाथरूम में खुद को साफ करो," उसने आदेश दिया।
चैताली उठी और बाथरूम की ओर चली गई। जब वह वापस आई, तो वह साफ-सुथरी थी और उसके चेहरे पर वही भावशून्य अभिव्यक्ति थी।
"अब अपने कपड़े पहन लो," हरीश ने कहा।
चैताली ने अपनी साड़ी और ब्लाउज पहनना शुरू कीया। हरीश ने चालाकी से उसकी पैंटी को उठाकर सोफे के पीछे छिपा दिया। चैताली ने अपनी पैंटी ढूंढी, लेकीन वह नहीं मिली। चूंकी वह सम्मोहित थी, उसने सवाल नहीं कीया और बिना पैंटी के ही अपनी साड़ी पहन ली।
जब वह पूरी तरह तैयार हो गई, तो हरीश ने उसकी आंखों में देखा और जोर से चुटकी बजाई।
"अब जागो!"
चैताली अचानक होश में आई। उसे ऐसा लगा जैसे वह कीसी गहरे सपने से जागी हो। वह थोड़ी भ्रमित थी, लेकीन उसे याद नहीं था की पिछले कुछ घंटों में क्या हुआ था।
"अरे, मैं यहाँ कैसे?" उसने इधर-उधर देखा।
"आंटी, आप शायद थकान की वजह से थोड़ी देर के लिए सो गई थीं। अब शाम हो गई है, मैं आपको छोड़ देता हूँ या आप खुद जा सकती हैं," हरीश ने बड़ी मासूमियत से कहा।
चैताली ने अपनी घड़ी देखी और घबरा गई। "ओह! मुझे घर जाना चाहिए। धन्यवाद हरीश बेटा।"
वह कार में बैठी और अपने घर की ओर निकल गई।
जब कार चली गई, तो हरीश के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई। वह सीधे अपने लिविंग रूम की ओर गया और अपने लैपटॉप को चालू कीया। उसने लिविंग रूम के दो अलग-अलग कोनों में छोटे-छोटे हिडन कैमरे लगाए थे।
हरीश बैठा था और उस गीली जगह को देख रहा था जहाँ चैताली के रस और उसके वीर्य का मिश्रण सोफ़े पर गिर गया था। वह पीछे की ओर झुका और हँसा—एक धीमी, गहरी आवाज़ में। अब उसके पास एक बेहतरीन खिलौना था, और सबसे अच्छी बात यह थी कि वही वापस आने के लिए गिड़गिड़ाएगी।
उसने फुटेज प्ले कीया। स्क्रीन पर चैताली का वह धीरे-धीरे साड़ी उतारना, उसकी ब्रा का उतरना, और फिर उसका घुटनों के बल बैठकर उसका लंड चूसना—सब कुछ एचडी क्वालिटी में था। हरीश ने उस हिस्से को रिप्ले कीया जहाँ वह उसके पीछे से प्रहार कर रहा था और उसके मम्मे हिल रहे थे।
"वाह... क्या माल है। और उसे पता भी नहीं की वह मेरी कीतनी बड़ी गुलाम बन चुकी है," हरीश ने खुद से कहा और दोबारा अपनी पैंट नीचे कर ली।
उधर, चैताली अपने घर पहुंची। घर में सन्नाटा था, आदित्य अभी तक कॉलेज से नहीं लौटा था। वह सीधे अपने बेडरूम में गई और कपड़े बदलने लगी।
जैसे ही उसने अपनी साड़ी और ब्लाउज उतारा, उसे अचानक महसूस हुआ की उसके नीचे कुछ गायब है।
"मेरी पैंटी कहाँ गई?" उसने हैरानी से अपने चारों ओर देखा। उसने याद करने की कोशिश की की क्या उसने इसे ऑफिस में ही उतार दिया था, या फिर..?
तभी उसे अपने गुप्तांगों में एक अजीब सी जलन और भारीपन महसूस हुआ। उसने अपना हाथ नीचे ले जाकर छुआ। उसकी चूत की त्वचा सूजी हुई थी और वह अंदर से काफी संवेदनशील महसूस कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई चीज उसके अंदर बहुत गहराई तक गई हो।
"यह दर्द कैसा है? और मेरी पैंटी कैसे गायब हो गई?" उसने आईने में खुद को देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकीन उसकी आंखों में एक अनजाना डर और भ्रम था।
उसे याद नहीं आ रहा था की वह हरीश के घर पर क्या कर रही थी, लेकीन उसके शरीर की हर नस उसे बता रही थी की आज उसके साथ कुछ बहुत ही असामान्य और गहन हुआ है। वह चुपचाप बिस्तर पर लेट गई, लेकीन उसके दिमाग में हरीश की वह रहस्यमयी मुस्कान बार-बार घूम रही थी।
30-08-2026, 10:31 PM
दो दिन बाद.......
हरीश अपने कमरे के अंधेरे में बैठा था, केवल उसके लैपटॉप की स्क्रीन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। वह उन वीडियो को बार-बार देख रहा था जिन्हें उसने कुछ दिन पहले रिकॉर्ड किया था। स्क्रीन पर चैतली थी—एक 42 वर्षीय बंगाली महिला, जिसका शरीर किसी पकवान की तरह रसीला और भरा हुआ था। वीडियो में वह पूरी तरह से बेसुध थी, उसकी आँखें खाली थीं, लेकिन उसका शरीर हरीश के हर आदेश का पालन कर रहा था। वह देख रहा था कि कैसे चैतली ने अपने ही हाथों से अपनी ब्लाउज उतारी थी और कैसे उसकी भारी बोब्बे बाहर निकलकर झूल रही थीं।
हरीश ने अपना मोटा और बड़ा लण्ड बाहर निकाला और लैपटॉप पर चल रहे वीडियो को देखते हुए एक हाथ से मुठ मारने लगा। दूसरे हाथ में उसने चैताली की काली पैंटी पकड़ रखी थी और उसे सूंघ रहा था, जिसे उसने पिछली मुलाकात में चुराया था। उस पैंटी में अभी भी चैताली के गुप्तांगों की तीखी गंध बसी हुई थी।
हरीश ने एक गहरी साँस ली। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। वह उस पल को याद कर रहा था जब उसने चांदी के उस पेंडेंट के जरिए उसकी इच्छाशक्ति को तोड़ दिया था। चैतली, जो समाज में एक सम्मानित महिला थी, एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव थी, वह हरीश के सामने सिर्फ एक खिलौना बन गई थी।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। हरीश ने लैपटॉप बंद किया और दरवाजा खोला। सामने विवेक खड़ा था। 18 साल का विवेक, एक एथलीट, जिसकी चौड़ी छाती और मजबूत कंधे उसकी टी-शर्ट को कस रहे थे। वह अभी कॉलेज में था और अपनी उम्र के हिसाब से काफी गबरू था।
"क्या हाल है भाई?" विवेक ने अंदर आते हुए पूछा।
हरीश ने उसे सोफे पर बिठाया और एक शरारती अंदाज में मुस्कुराया। "हाल तो बढ़िया है, लेकिन आज मैं तुझे कुछ ऐसा दिखाने वाला हूँ जो तेरी दुनिया बदल देगा।"
विवेक ने अपनी भौहें सिकोड़ीं। "क्या मतलब? कोई नया गेम है क्या?"
हरीश ने लैपटॉप खोला और वह क्लिप चला दी जिसमें चैतली उसे ब्लो-जॉब(उसका लौड़ा चूस रही थी) दे रही थी। विवेक की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने स्क्रीन पर देखा कि कैसे वह अधेड़ उम्र की महिला, जिसकी त्वचा सांवली और शरीर मांसल था, पूरी शिद्दत से हरीश के लन्ड को अपने मुँह में लिए हुए थी। फिर क्लिप बदली और अब चैतली डॉगी स्टाइल में थी, उसकी भारी कूल्हे हरीश के हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे।
विवेक ने अपना गला साफ किया, उसकी साँसें तेज हो गई थीं। "भाई... यह... यह कौन है? और यह सब कैसे हुआ? क्या यह सच में राजी थी?"
हरीश ने सोफे पर पीछे झुकते हुए कहा, "राजी? भाई, बस समझ ले कि वह मेरे इशारों पर नाचती है। वह एक कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करती है, लेकिन अंदर से वह एक ऐसी भूखी रंडी है जिसे बस सही तरीके से जगाने की जरूरत है।"
विवेक ने स्क्रीन पर चैतली के उभारों को देखा। वह एक कुंवारा लड़का था, जिसने अब तक किसी महिला को करीब से नहीं देखा था। उसके मन में कामुकता का तूफान उठ खड़ा हुआ। "भाई, वह तो कमाल की लग रही है। वह सांवली रंगत और वह भारी शरीर... कसम से, मेरा मन कर रहा है कि मैं भी उसे एक बार चखूँ।"
हरीश हँसा। "मुझे पता था तू यही कहेगा। देख, तू मेरा जिगरी दोस्त है, इसलिए मैं मना नहीं करूँगा। लेकिन इसके लिए प्लानिंग करनी होगी।"
विवेक उत्तेजित होकर आगे झुका। "कैसी प्लानिंग? मुझे बस बता क्या करना है।"
"कल तू कॉलेज बंक कर दे," हरीश ने आदेश देते हुए कहा। "बस इंतज़ार करियो। मैं उसे तैयार करूँगा और फिर तुझे बताऊंगा कि उसे कहाँ मिलना है। याद रख, जब वह तेरे पास आए, तो तुझे बस उसे संभालना है।"
31-08-2026, 12:51 AM
(This post was last modified: 31-08-2026, 01:15 AM by MohdIqbal. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
अगली सुबह, हरीश अपनी मोटरसाइकिल से 'वटिका लिमिटेड' के ऑफिस पहुँचा। वह बाहर खड़ा होकर इंतजार करने लगा। कुछ समय बाद, एक मारुति रिट्ज कार आकर रुकी। कार से चैताली उतरी। उसने नीले रंग का सलवार-कमीज पहना था और गले में गुलाबी दुपट्टा था। उसका कमीज थोड़ा पारदर्शी था, जिससे उसकी सफेद ब्रा की रूपरेखा साफ नजर आ रही थी। उसकी 38 की छातियाँ हर कदम के साथ हल्का सा हिल रही थीं।
हरीश ने मौका देखा और जानबूझकर उससे टकरा गया।
"ओह! आई एम सॉरी, चैताली जी!" हरीश ने चेहरे पर मासूमियत लाते हुए कहा।
चैताली ने चौंककर देखा और मुस्कुराई। "अरे हरीश! तुम यहाँ कैसे? क्या काम था?"
"बस, पास में ही एक मीटिंग थी, तो सोचा आपसे मिल लूँ। आप आज बहुत सुंदर लग रही हैं," हरीश ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।
चैतली थोड़ी शर्माई। "शुक्रिया। लेकिन मुझे ऑफिस के अंदर जाना है, समय हो रहा है।"
"अरे, अभी तो 15 मिनट बाकी हैं। पास में ही एक नया कॉफी आउटलेट खुला है, चलिए एक कॉफी पीते हैं। मेरी तरफ से ट्रीट," हरीश ने प्रस्ताव रखा।
चैताली ने अपनी घड़ी देखी और फिर हरीश की ओर। "ठीक है, जल्दी से चलते हैं।"
कॉफी शॉप के एक शांत कोने में बैठकर जब चैताली कॉफी का घूँट ले रही थी, हरीश ने धीरे से अपनी जेब से वह चांदी का पेंडेंट निकाला। उसने उसे चैताली की आँखों के ठीक सामने हिलाना शुरू किया।
"चैताली .... मेरी बात सुनो," हरीश की आवाज अब गहरी और अधिकारपूर्ण हो गई थी। "तुम्हारी पलकें भारी हो रही हैं। तुम गहरी नींद में जा रही हो। मेरा हर शब्द तुम्हारा आदेश है।"
चैताली की आँखें धीरे-धीरे स्थिर हो गईं। उसकी चेतना लुप्त हो गई और वह एक जीवित पुतले की तरह हरीश को देखने लगी।
"अब सुनो," हरीश ने कहा। "तुम वापस ऑफिस जाओ। तुम बिल्कुल सामान्य व्यवहार करोगी। लेकिन जब मैं तुम्हें फोन करूँगा, तुम बिना सवाल किए मेरे निर्देशों का पालन करोगी। समझी?"
"जी... समझ गई," चैताली ने एक सपाट आवाज में जवाब दिया।
हरीश ने पेंडेंट वापस रखा और मुस्कुराया। उसने चैताली को खड़े होने के लिए कहा। फिर हरीश ने अपना फ़ोन निकला और चैताली की एक पिक खींची जिसमे उसके नयन नक्श और भर पुर फिगर अच्छी तरह नज़र आ रहा था। "अब जाओ।"
चैताली उठी और चुपचाप अपने ऑफिस की ओर चल दी।
हरीश ने तुरंत विवेक को फोन लगाया। "भाई, जाल बिछ चुका है। तू बताए हुए लोकेशन पर पहुँच जा।"
कुछ समय बाद, विवेक का मैसेज आया: "मैं पहुँच गया हूँ। वह कहाँ है?"
हरीश ने चैताली की फोटो विवेक को भेज दी। "यह रहा तेरा शिकार। इसे पहचान ले।"
फिर हरीश ने चैताली को कॉल किया। "चैतली, अभी ऑफिस से ब्रेक लो और अपनी कार लेकर सेक्टर 14 लोकल मार्केट के उस पुराने बरगद के पेड़ के पास आओ। वहाँ कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा है।"
सम्मोहित चैतली ने बिना एक पल गंवाए चुप चाप ऑफिस से निकली और अपनी कार में मार्केट की ओर चल दी।
31-08-2026, 01:26 AM
(This post was last modified: 01-09-2026, 10:39 PM by MohdIqbal. Edited 3 times in total. Edited 3 times in total.)
विवेक मार्किट में खड़ा था। उसने देखा की एक मारुति रिट्ज कार आकर रुकी। कार से एक औरत उतरी जिसने काला चश्मा पहना हुआ था और गले में ऑफिस का आईडी कार्ड लटका था। वह धूप में पसीने से तरबतर थी, जिससे उसका नीला कमीज उसके शरीर से चिपक गया था। पहली नज़र में वह ऐसी नहीं लगी जिसके साथ सेक्स किया जाए। उसका रंग सांवला था, चेहरा बिल्कुल साधारण और घरेलू-सा था, और शरीर भरा-पूरा था।
विवेक ने सोचा की इसे थोड़ा तड़पाया जाए। वह चुपचाप उसके पीछे चलने लगा। चैताली मार्केट में इधर-उधर घूम रही थी, जैसे वह कुछ ढूँढ रही हो, लेकीन उसका चेहरा भावशून्य था। विवेक उसकी भारी कमर और हिलते हुए कूल्हों को निहार रहा था। उसके मन में गंदी बातें चल रही थीं।
बाज़ार में चैताली का पीछा करते और उसे गौर से देखते हुए, विवेक को एहसास हुआ कि उस औरत के बारे में उसकी पहली सोच शायद गलत थी। वह एक शरीफ़, घरेलू हाउसवाइफ़ जैसी दिखती थी, लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जो किसी कामुक और बेबाक औरत का संकेत दे रहा था—जैसे कोई माहिर वेश्या हो। उसके चलने के अंदाज़ से वह एक सेक्सी औरत लग रही थी। उसकी हल्की पारदर्शी कमीज़ के आर-पार उसकी ब्रा साफ़ दिख रही थी, उसके स्तन बड़े और भारी लग रहे थे। उसके कूल्हे चौड़े थे और हर कदम पर उसकी गांड हिलती डुलती थी। अब उसे पक्का यकीन हो गया था कि वह उसके साथ सेक्स करना चाहता है।
विवेक उसके पास गया और आत्मविश्वास के साथ बोला, "चैताली जी? मैं हरीश का दोस्त विवेक हूँ। वह मुझे आपके बारे में बता चुका है। चलिए मेरे साथ।"
चैताली ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी खामोशी में एक तरह की सहमति थी, एक ऐसी रजामंदी जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। उसने बस धीरे से अपना सिर हिलाया।
विवेक ने अपनी भारी-भरकम रॉयल एनफील्ड बुलेट की ओर देखा। उसने किक मारी और इंजन एक गूँजती हुई दहाड़ के साथ ज़िंदा हो उठा। बुलेट की वह खास 'थम्प-थम्प' वाली आवाज़ पूरे माहौल में फैल गई, जिससे आसपास की शांति अचानक टूट गई। बाइक के वाइब्रेशन विवेक के पैरों तक महसूस हो रहे थे, और उसकी धड़कनें भी उसी रफ़्तार से तेज़ हो रही थीं।
उसने पीछे मुड़कर चैताली की तरफ देखा और अपनी ठुड्डी से पीछे बैठने का इशारा किया। चैताली ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही सलीके से, लेकिन जानबूझकर, बाइक की सीट पर अपनी जगह बनाई। वह इस तरह से बैठी कि उनके बीच हवा के गुजरने की भी जगह नहीं बची थी। वह विवेक के बिल्कुल करीब थी—इतनी करीब की विवेक उसकी सांसों की गर्मी अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता था।
जैसे ही चैताली ने खुद को व्यवस्थित किया, उसकी भारी और उभरी हुई छातियाँ विवेक की चौड़ी और सख्त पीठ से पूरी तरह सट गईं। वह दबाव इतना गहरा था कि विवेक के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। वह महसूस कर सकता था कि चैताली का शरीर उसके शरीर के सांचे में पूरी तरह फिट हो चुका था।
अचानक, विवेक ने तेज़ी से क्लच छोड़ा और रेस दी। बाइक ने एक ज़ोरदार झटका लिया और आगे की ओर झपटी। उस झटके के कारण संतुलन बनाने के लिए चैताली ने विवेक को कसकर पकड़ लिया। उसके हाथ विवेक की कमर पर जकड़े हुए थे, लेकिन उसका ऊपरी हिस्सा और भी ज़्यादा मजबूती से विवेक की पीठ से चिपक गया। अब वह दबाव और भी गहरा हो गया था; उन दो बड़े और नरम गोलों का दबाव विवेक की रीढ़ की हड्डी तक महसूस हो रहा था।
विवेक के दिमाग में जैसे कोई विस्फोट हुआ हो। वह इस अहसास से पागल हो रहा था। उसकी एकाग्रता अब सड़क पर नहीं, बल्कि अपनी पीठ पर महसूस होने वाली उस नरमी और गर्माहट पर थी। उसके मन में एक जंगली विचार आया, एक ऐसी चाहत जिसने उसे भीतर तक उत्तेजित कर दिया।
"साला, क्या कतई ज़हर माल है!" उसने मन ही मन बुदबुदाते हुए सोचा। उसके चेहरे पर एक कुटिल और संतुष्ट मुस्कान फैल गई। वह इस बात से बेहद खुश था की आज का सफर उसकी उम्मीदों से कहीं ज़्यादा रोमांचक होने वाला था।
वे हरीश के अपार्टमेंट पहुँचे। जैसे वे अंदर दाखिल हुए, माहौल में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी। वे लिफ्ट की ओर बढ़े। जैसे ही लिफ्ट के स्टील के दरवाजों ने उन्हें अपने भीतर समेटा और वह छोटा सा धातु का बक्सा ऊपर की ओर चढ़ने लगा, विवेक के भीतर का संयम पूरी तरह टूट गया। वह अब और एक पल भी इंतजार करने की स्थिति में नहीं था; उसके दिमाग में पिछले कुछ घंटों से केवल एक ही जुनून सवार था।
लिफ्ट की सफेद रोशनी में चैताली एक मूक मूर्ति की तरह खड़ी थी। अचानक, बिना किसी चेतावनी के, विवेक ने अपनी बाहें फैलाईं और पूरी ताकत के साथ चैताली की गर्दन को अपने मजबूत हाथों की पकड़ में जकड़ लिया। उसने उसे झटके से पीछे की ओर धकेला, जिससे चैताली की पीठ लिफ्ट की ठंडी, कठोर दीवार से जा टकराई। उस झटके से चैताली के मुंह से एक हल्की सी आह निकली, लेकिन वह हिलने की कोशिश नहीं कर रही थी। विवेक की सांसें तेज हो गई थीं। उसने अपनी पूरी इच्छाशक्ति के साथ झपटकर चैताली के होंठों को अपने कब्जे में ले लिया। वह उसे इतनी तीव्रता से चूम रहा था जैसे वह उसके अस्तित्व को सोख लेना चाहता हो। चैताली का शरीर पूरी तरह शिथिल पड़ गया था। वह कोई विरोध नहीं कर रही थी, न ही वह विवेक के जवाब में उसे चूम रही थी। वह बस एक बेजान गुड़िया की तरह स्थिर खड़ी थी, जिसकी आँखें शायद कहीं दूर किसी शून्य को ताक रही थीं, जबकि विवेक उसके करीबियत की गहराई में डूब रहा था। विवेक की उत्तेजना अब चरम पर थी। उसने अपना एक हाथ उसकी गर्दन से हटाकर नीचे की ओर ले गया और बिना किसी झिझक के उसका हाथ उसकी कमीज के कपड़े के अंदर डाल दिया। जैसे ही उसकी हथेलियाँ उसकी भारी छाती के संपर्क में आईं, उसने अपनी उंगलियों से उसे जोर से भींचा। उस स्पर्श की तीव्रता ने विवेक को जैसे पागल कर दिया। "उफ़! यकीन नहीं होता... कितने बड़े हैं ये!" उसने एक गहरी, कामुक आह भरते हुए कहा, उसकी आवाज में एक अजीब सा उन्माद था। वह अब और इंतजार नहीं करना चाहता था। उसने झटके से उसकी कमीज को ऊपर की ओर उठा दिया, जिससे चैताली का ऊपरी शरीर उजागर हो गया। उसकी सफेद रंग की ब्रा, जो उसकी त्वचा के रंग के साथ एक गहरा विरोधाभास पैदा कर रही थी, विवेक की नजरों में थी। उसने बिना समय गंवाए ब्रा को नीचे खींच लिया और उसकी एक निप्पल को अपने मुंह में ले लिया। विवेक उसे पूरी शिद्दत और जोर-जोर से चूसने लगा, जैसे वह किसी प्यासे की तरह उसकी देह का स्वाद ले रहा हो। उसी समय, उसका दूसरा हाथ खाली नहीं था; वह चैताली की कमर के घुमावों को सहला रहा था, उसकी त्वचा पर अपनी उंगलियों से एक अदृश्य नक्शा बना रहा था। चैताली अभी भी उसी मूक अवस्था में थी—एक ऐसी गुड़िया जिसे विवेक अपनी मर्जी से मोड़ रहा था, जबकि लिफ्ट धीरे-धीरे उनके मंजिल की ओर बढ़ रही थी। तभी लिफ्ट की घंटी बजी—'टिंग!'
01-09-2026, 10:52 PM
कमरे के अंदर कदम रखते ही माहौल में एक अजीब सी भारीपन और तनाव था। विवेक की उत्तेजना चरम पर थी; वह लगभग बेकाबू महसूस कर रहा था। जैसे ही वे लिविंग रूम के सोफे पर बैठे, विवेक ने बिना एक पल गंवाए चैताली को अपनी ओर खींच लिया। उसने उसे अपने बिल्कुल करीब बिठाया, इतना करीब कि दोनों की साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। विवेक की आँखों में एक भूखी तड़प थी, और वह बिना किसी हिचकिचाहट के चैताली के होंठों पर अपने होंट बसाने लगा।
दूसरी ओर, चैताली बिल्कुल स्थिर थी। उसकी खामोशी में एक अजीब सा रहस्य था—वह न तो विरोध कर रही थी और न ही पूरी तरह से प्रतिक्रिया दे रही थी। वह बस एक मूक दर्शक की तरह उस पल को महसूस कर रही थी।
तभी हरीश, जो अब तक चुपचाप इस दृश्य को देख रहा था, बीच में हस्तक्षेप करने का फैसला किया। उसकी आँखों में एक शरारती चमक थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "सिर्फ लेने से काम नहीं चलेगा, विवेक। चैताली, अब तुम्हारी बारी है। विवेक को वह सब कुछ महसूस कराओ जिसकी वह उम्मीद कर रहा है। उसे दिखाओ कि तुम उसे कितनी शिद्दत से चाहती हो।"
हरीश के इस एक इशारे ने जैसे चैताली के अंदर किसी बंद दरवाजे को खोल दिया। उसकी दुनिया पल भर में बदल गई। अचानक उसकी वह शांति एक तीव्र जुनून में बदल गई। उसने फुर्ती से अपने दोनों हाथ विवेक के गले में डाल दिए, उसे अपनी ओर और मजबूती से खींच लिया, और फिर एक गहरी, जुनून भरी फ्रेंच किस में डूब गई।
उनकी जुबानें एक-दूसरे से उलझ गईं, और एक गहरे, गीले अहसास के साथ लार का आदान-प्रदान होने लगा। यह चुंबन अब सिर्फ एक स्पर्श नहीं था, बल्कि एक प्यास थी। विवेक की साँसें अब तेज और उखड़ी हुई थीं; उसका दिल उसकी छाती में तेजी से धड़क रहा था। उत्तेजना में बहकर, उसने अनजाने में अपना हाथ नीचे बढ़ाया और उसकी सलवार के अंदर घुसने की कोशिश की, ताकि वह उस गर्माहट को महसूस कर सके।
लेकिन इससे पहले कि वह आगे बढ़ पाता, हरीश की सख्त लेकिन धीमी आवाज़ ने उसे रोक दिया।
"रुक जा, इतनी जल्दबाजी मत कर," हरीश ने उसे टोकते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा रोमांच था। "धैर्य रख, विवेक। असली तमाशा तो अब शुरू होगा।"
03-09-2026, 10:24 PM
(This post was last modified: 03-09-2026, 10:24 PM by MohdIqbal. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
हरीश ने पीछे झुकते हुए, एक धीमी लेकिन सख्त आवाज में कहा, "चैताली, अब और इंतज़ार नहीं। अपने सारे कपड़े उतारो।"
चैताली के शरीर में एक हल्की सी सिहरन दौड़ी। वह कुछ पलों के लिए ठिठकी, शायद अपने मन में इस स्थिति से लड़ रही थी, लेकिन फिर उसने एक गहरा सांस लिया और खामोशी से उठी। उसके चेहरे पर एक अजीब सा समर्पण था। उसने बिना किसी देरी के, एक ही झटके में अपनी नीली कमीज उतार दी और उसे कंधे से नीचे सरका दिया। नीला कपड़ा फर्श पर एक ढेर की तरह गिर गया। अब वह केवल अपनी सफेद ब्रा में थी, जो उसकी भारी छातियों के वजन को मुश्किल से थामे हुए थी। कपड़े का वह छोटा सा टुकड़ा उसकी देह के उभारों को दबाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। चैताली ने अपनी पीठ के पीछे हाथ ले जाकर ब्रा के हुक को खोला। जैसे ही हुक खुला, उसकी 38D की भारी छातियाँ आजाद होकर बाहर निकल आईं। उनके सिरों पर गहरे भूरे रंग के निप्पल थे, जो ठंड और उत्तेजना के कारण सख्त हो चुके थे। कमरे में मौजूद विवेक की नजरें उस नजारे पर गड़ गईं। वह अपनी जगह से थोड़ा उछला और एक लंबी सीटी बजाई। उसकी आंखों में एक जंगली चमक थी। "भाई, कसम से! क्या गजब का शरीर है! एकदम असली देसी माल। ऐसी बनावट तो सिर्फ हमारे यहाँ की मिट्टी में ही मिलती है," विवेक ने उत्तेजना में कहा, उसकी आवाज में एक तरह की भूख थी। चैताली ने विवेक की बातों को जैसे अनसुना कर दिया। उसने अपनी कमर के पास बंधी सलवार की डोरी को धीरे से खोला। जैसे ही डोरी खुली, उसकी सलवार उसके पैरों से फिसलकर नीचे गिर गईं। अब वह केवल अपनी चड्डी में थी। हरीश के इशारा करने पर चैताली ने अपनी चड्डी भी उतर दी। अब वह पूरी तरह नग्न थी, कमरे की रोशनी में उसकी देह का हर हिस्सा साफ नजर आ रहा था। उसका शरीर पूरी तरह से गोल-मटोल और सुडौल था। उसकी त्वचा का रंग गहरा सांवला था, जो रेशम की तरह चिकना और चमकदार लग रहा था। लेकिन जैसे ही विवेक की नजरें नीचे की ओर गईं, उसकी आंखें ठहर गईं। चैताली की जांघों के बीच, उसके गुप्त अंग पर घने, काले और अनकटे बालों का एक झुंड था। वे बाल इतने घने थे कि उन्होंने उसकी चूत को पूरी तरह से ढक लिया था, जैसे किसी प्राकृतिक पर्दे ने उसे छुपा रखा हो। विवेक यह देखकर अपनी हंसी नहीं रोक पाया। वह जोर से ठहाका मारते हुए बोला, "अरे भाई, देखो तो! इसने तो नीचे पूरा झाड़ू लगा रखा है! इतना घना जंगल तो मैंने आज तक नहीं देखा।" उसकी हंसी में एक तरह का मजाक था, लेकिन उसकी नजरें अभी भी चैताली के शरीर के उस हिस्से से हटने को तैयार नहीं थीं। |
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