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Adultery Ruhi a house wife
बाथरूम के अंदर पहुँचते ही रामू जी ने रुही को धीरे से नीचे उतार दिया।
दरवाज़ा उन्होंने बंद नहीं किया। वह आधा खुला ही रह गया। पीछे लिविंग रूम की हल्की आवाज़ें अभी भी आ रही थीं।
रुही को बहुत जोर से पेशाब लग रही थी। पेट के निचले हिस्से में दबाव बढ़ चुका था। वह जल्दी-जल्दी अपनी छोटी लाल पैंटी के इलास्टिक में उंगलियाँ डालकर नीचे सरकाने लगी। हाथ काँप रहे थे। शर्म और जल्दी दोनों से उसका चेहरा लाल हो रहा था।
तभी रामू की भारी, मर्दाना आवाज़ गूंजी—
“रुक जा।”
रुही का हाथ झटके से थम गया। वह सहम गई। आँखें उठाकर उसने रामू की तरफ देखा। उनकी आँखों में नशा था, और एक साफ हुक्म।
“पैंटी मत उतार,” उन्होंने दोबारा कहा। आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी। “मेरे कहे बिना कुछ मत करना।”
रुही की साँस अटक गई। वह दोनों हाथों से अपनी पैंटी पकड़े खड़ी रह गई। शर्म से गर्दन झुक गई, लेकिन शरीर में एक अजीब सी सिहरन भी दौड़ गई। वे देख रहे हैं… दरवाज़ा खुला है… और वे मुझे रोक रहे हैं।
रामू ने अपनी टी-शर्ट ऊपर से खींचकर उतार दी। फिर जींस का बटन खोला और उसे नीचे सरका दिया। अब वे सिर्फ काले अंडरवियर में खड़े थे। उनका मज़बूत, गहरा शरीर बाथरूम की हल्की रोशनी में साफ दिख रहा था।
रुही की नज़रें उनकी चौड़ी छाती और फिर नीचे की तरफ चली गईं। वह जल्दी से नज़रें चुरा लेना चाहती थी, लेकिन नहीं चुरा पाई। शर्म और रोमांच दोनों से उसका शरीर काँप रहा था।
रामू करीब आए। उन्होंने रुही की ठुड्डी पकड़कर चेहरा ऊपर उठाया।
“इतनी जल्दी क्या थी?” उन्होंने धीरे लेकिन सख्ती से पूछा। “मैंने कहा था न… मैं करवाऊँगा तुझे मूत।”
रुही की आवाज़ बहुत कमजोर निकली, “रामू जी… बहुत जोर से लग रही है… छोड़ दो न… मैं जल्दी से कर लूँगी…”
“नहीं।” रामू ने साफ मना कर दिया। “पैंटी मैं उतारूँगा। तू खड़ी रह।”
रुही सहम गई। उसने अपने हाथ पैंटी से हटा लिए। दोनों हाथ शरीर के दोनों तरफ लटक गए। आँखें झुकी हुई थीं, साँसें तेज़ चल रही थीं। शर्म से वह जल रही थी, लेकिन अंदर एक गहरी उत्तेजना भी थी—कि वे उसे पूरी तरह कंट्रोल कर रहे हैं। यहाँ तक कि पेशाब करने की इजाजत भी उनके हाथ में है।
रामू ने उसके चेहरे को देखा। फिर धीरे से बोले—
“देख मुझे। आँखें मत झुका।”
रुही ने काँपते हुए आँखें उठाईं। उनकी आँखों में उसकी पूरी बेबसी नज़र आ रही थी।
“अच्छी लड़की,” रामू ने कहा। “अब शांत रह। सब मैं करूँगा।”
रुही बस खड़ी रही। शर्म, डर, और एक कामुक रोमांच—तीनों उसके शरीर में एक साथ दौड़ रहे थे। दरवाज़ा अभी भी खुला था… और वह उनके सामने पूरी तरह समर्पित खड़ी थी।
रामू जी का लंड अंडरवियर के अंदर तनकर सख्त खड़ा था। कपड़े के ऊपर से उसकी मोटी शक्ल साफ दिख रही थी। उन्होंने रुही को पकड़कर टॉयलेट सीट पर बिठा दिया। पैंटी नहीं उतारी। वह अभी भी उसकी छोटी लाल पैंटी में ही बैठी थी। पेशाब का दबाव बहुत बढ़ चुका था, लेकिन वे कुछ नहीं बोले।
फिर रामू करीब आए। इतने करीब कि उनकी जाँघें रुही के चेहरे के बिल्कुल सामने थीं।
रुही शर्म से पानी-पानी हो गई। उसने आँखें बंद कीं और अपना मुँह रामू की कमर में छुपा लिया। उनकी गर्म त्वचा और अंडरवियर की पतली कपड़े की गंध उसके नथुनों में भर गई।
इतने में रामू का तना हुआ लंड, अंडरवियर के ऊपर से ही, उसके मुँह पर दब गया। मुलायम लेकिन सख्त दबाव। रुही की साँस रुक गई। वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन शर्म और समर्पण ने उसे वहीं रोक दिया।
अंडरवियर से आती पेशाब की हल्की गंध, पसीने की तेज़ मर्दाना खुशबू, और रामू के शरीर की गर्मी—तीनों मिलकर रुही को पागल किए दे रहे थे। उसकी आँखें बंद थीं, साँसें तेज़ चल रही थीं। मुँह के पास वह गर्म, तना हुआ मोटा लंड महसूस कर रही थी।
रामू ने उसके बाल पकड़कर सिर थोड़ा और अपनी तरफ दबाया। आवाज़ भारी थी—
“इधर से मत हट। यहीं रख मुँह।”
रुही ने सिसकी ली। आवाज़ बहुत कमजोर निकली, “रामू जी… शर्म आ रही है… बहुत…”
“शर्म रख,” उन्होंने कहा। “मेरी गंध ले। अच्छी तरह से सूंघ। ये तेरे मर्द की गंध है।”
रुही का शरीर काँप रहा था। वह उनके अंडरवियर में मुँह छुपाए हुए थी। लंड का दबाव उसके होठों और नाक पर था। गंध इतनी तेज़ और मर्दाना थी कि उसके पेट के निचले हिस्से में मरोड़ सी उठने लगी। पेशाब का दबाव और उत्तेजना एक साथ मिल गए थे।
उसने धीरे से होंठ खोले। अंडरवियर का कपड़ा उसके होठों से छू गया। गर्म। नम।
रामू ने ऊपर से देखा और धीरे से बोला, “अच्छी लड़की… ऐसे ही रह। मेरी गंध में डूबी रह।”
रुही कुछ नहीं बोली। सिर्फ उनकी कमर से चिपकी रही। शर्म से उसका पूरा चेहरा जल रहा था, लेकिन वह मुँह नहीं हटा रही थी। अंडरवियर के अंदर दबे उस तने हुए लंड की गर्माहट और गंध उसे अंदर तक पागल किए दे रही थी।
वह बस वहीं बैठी रही… टॉयलेट सीट पर… पैंटी में… और अपने मर्द की मर्दाना गंध में पूरी तरह डूबी हुई।
रुही के अंदर उस पल एक गहरा भावनात्मक संघर्ष चल रहा था।
एक तरफ शर्म थी — बहुत भारी, शारीरिक शर्म।
वह टॉयलेट सीट पर बैठी थी, पैंटी पहने, दरवाज़ा खुला, और अपने मुँह को रामू के अंडरवियर में छुपाए हुए थी। उनकी मर्दाना गंध, पसीना और तने हुए लंड का दबाव उसके होठों पर था। यह सोचकर कि सोनिया और जामिल कुछ कदम बाहर हैं, उसका चेहरा जल रहा था। पुरानी रुही — जो अकड़ में रहती थी, जो सनी के सामने सिर ऊँचा रखकर चलती थी — वह रुही इस दृश्य को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
दूसरी तरफ समर्पण की भूख थी।
जितना शर्म आ रही थी, उतना ही अंदर कोई आवाज़ कह रही थी — “यही सही जगह है। यहीं रह। हटना मत।” रामू का हुक्म, उनकी गंध, उनका कंट्रोल… सब कुछ उसे एक अजीब सी शांति दे रहा था। फैसले की ज़िम्मेदारी उसके पास नहीं थी। बस सहना था। और सहने में उसे राहत मिल रही थी।
तीसरा संघर्ष था उत्तेजना और ग्लानि के बीच।
शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था। गंध से उसके पेट में मरोड़ उठ रही थी, जाँघें भींच रही थीं, साँसें तेज़ थीं। लेकिन मन के एक कोने में सनी की आवाज़ घूम रही थी — “बेबी, क्या कर रही हो?” उस झूठ का बोझ, उस थप्पड़ का स्मरण, “कमत परिवार की बहू” वाले शब्द… सब मिलकर एक भारी ग्लानि पैदा कर रहे थे। और ठीक उसी ग्लानि के नीचे उत्तेजना और तेज़ हो रही थी।
चौथा और सबसे गहरा संघर्ष था पहचान का।
वह अब खुद से पूछ रही थी — “मैं कौन हूँ?”
सनी की बीवी? या रामू की बुलबुल?
जो औरत कभी अपना फैसला खुद करती थी, वह अब पेशाब करने की इजाजत का इंतज़ार कर रही थी। यह बदलाव उसे डरा रहा था, लेकिन साथ ही एक गहरी, काली सी स्वीकृति भी दे रहा था। जैसे वह पुरानी पहचान को खोकर कोई नई, अधिक असली पहचान पा रही हो।
इस पूरे संघर्ष में सबसे खतरनाक बात यह थी कि विरोध की शक्ति धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।
शर्म थी, आँसू थे, घबराहट थी… लेकिन “ना” कहने की क्षमता नहीं बची थी। हर बार जब रामू कुछ कहते, तो शरीर मान जाता। मन बाद में शर्म करता। और यही चक्र उसे और अंदर खींच रहा था।
रुही उस पल दो हिस्सों में बँटी हुई थी —
एक हिस्सा चीख रहा था कि यह बहुत गिरना है,
दूसरा हिस्सा फुसफुसा रहा था कि यही उसकी जगह है।
और उस संघर्ष में… दूसरा हिस्सा धीरे-धीरे जीत रहा था।
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रामू जी धीरे से नीचे झुके।
रुही के हाथ अपने-आप उनके चौड़े कंधों पर जा रखे। उंगलियाँ उनकी गर्म त्वचा पर काँप रही थीं। रामू ने उसकी मिनी नाइटी के किनारे पकड़े और धीरे-धीरे जाँघों से ऊपर सरका दिए। नाइटी कमर तक उठ गई। फिर उन्होंने सिर झुकाया और उसकी नरम, गोरी जाँघों पर होंठ रख दिए।
पहले हल्के चुम्बन। फिर धीरे-धीरे और अंदर की तरफ। दाँत हल्के से त्वचा को दबाते, जीभ से चाटते। रुही की कमर लचक गई। साँस अटक गई। रोमांच और उत्तेजना इतनी तेज़ थी कि उसकी चूत से एक-दो बूँद पेशाब बिना नियंत्रण के निकल गई। गर्म बूँदें उसकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर बह गईं।
रामू ने महसूस किया। उन्होंने सिर उठाए बिना ही कहा, “हूँ… निकल रही है?”
रुही शर्म से मर रही थी। आवाज़ काँपती हुई निकली, “रामू जी… छोड़ो… मैं… कंट्रोल नहीं कर पा रही…”
रामू ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने उसकी छोटी लाल पैंटी के इलास्टिक में उंगलियाँ डालकर उसे जाँघों से नीचे सरका दिया। पूरी तरह नहीं उतारी—सिर्फ घुटनों तक लाकर छोड़ दी। पैंटी उसके पैरों में उलझी रह गई। अब उसकी चिकनी, मुंडा हुआ चूत पूरी तरह खुली थी।
रुही की हालत खराब थी। शर्म और उत्तेजना दोनों चरम पर थीं। उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया। आँखें बंद थीं।
रामू ने अपना बड़ा हाथ उसकी चूत पर फेरा। दो उंगलियाँ उसके गीले होंठों के बीच से गुज़रीं। फिर उन्होंने मर्दाना हँसी के साथ कहा—
“देख… कितनी गीली हो गई है तेरी चूत। इतनी शर्म आ रही है, फिर भी पानी छोड़ रही है।”
रुही ने सिर झुकाया। आवाज़ में रोना था, “मत छुओ… प्लीज… बहुत शर्म आ रही है… रामू जी…”
रामू उनकी बात अनसुनी करके और नीचे झुके। उन्होंने उसकी चिकनी चूत पर सीधे होंठ रख दिए। पहले एक लंबा, गहरा चुम्बन। फिर जीभ निकालकर उसके गीले होंठों के बीच चाटा। रुही की कमर उछल गई। एक सिसकारी निकल गई।
रामू ने मुँह लगाए हुए ही कहा, “क्या चिकना माल है तू। बिल्कुल मुलायम… साफ…।” उन्होंने फिर चाटा। “भेंचोद, वो पागल चूतिया सनी कितना बदकिस्मत है… इतना कीमती माल छोड़कर दूसरे शहर धन कमाने निकल गया। इसकी चूत यहाँ पड़ी तरस रही है, और वो बिज़नेस की फिक्र में है।”
रुही के आँसू निकल आए। शर्म से वह जल रही थी, लेकिन शरीर उनकी जीभ के आगे बेबस था। उसने बहुत हिम्मत करके, काँपती आवाज़ में कहा—
“आज… आज ही शेव की है… आपके लिए…”
रामू ने सिर उठाया। उनके होंठ चमक रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए रुही की आँखों में देखा।
“मेरे लिए?” उन्होंने दोहराया। आवाज़ में संतुष्टि थी। “अच्छी लड़की। तू सीख रही है। अब याद रख… ये चूत सिर्फ मेरे लिए साफ रहेगी। समझी?”
रुही ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। आवाज़ लगभग फुसफुसाहट थी—
“हाँ… रामू जी… सिर्फ आपके लिए…”
रामू ने फिर से उसका सिर अपनी जाँघों के बीच दबाया और नीचे जाकर दोबारा उसकी चिकनी चूत चूमने लगे। इस बार और जोर से, और भूखे होकर। रुही की सिसकारियाँ बाथरूम में गूँजने लगीं। शर्म अभी भी थी… लेकिन अब वह उनके मुँह के आगे पूरी तरह खुल चुकी थी।
रामू जी ने अपनी दोनों उंगलियों से रुही की चूत की फाँकों को धीरे से लेकिन मजबूती से खोल दिया। गुलाबी, चिकनी और गीली हुई पंखड़ियाँ उनके अंगूठे और उंगली के बीच फैल गईं। उन्होंने नज़दीक से देखा और भारी आवाज़ में कहा—
“चल… अब मूत।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। शर्म से उसका पूरा चेहरा, गर्दन और छाती तक लाल हो गया। उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया और काँपती आवाज़ में बोली—
“रामू जी… ऐसे कैसे…? प्लीज… आप बाहर चले जाइए न… मैं अकेली कर लूँगी… बहुत शर्म आ रही है… प्लीज…”
रामू की आँखें सिकुड़ गईं। उनकी आवाज़ में हल्का गुस्सा और पूरा मर्दाना हक झलक रहा था—
“सुना नहीं तूने? मैंने कहा मूत। अभी। मेरे सामने। मेरी उंगलियों के बीच। ये मेरा हक है। तू मेरी है। तेरा मूत भी मेरा है। चल… निकाल।”
रुही डर गई। आँखों में आँसू आ गए। शरीर काँप रहा था। पेशाब का दबाव पहले से ही बहुत ज्यादा था। अब उनके सख्त हुक्म ने बचाव की आखिरी दीवार भी तोड़ दी। वह सिसकते हुए बोली—
“रामू जी… माफ़ करना… मैं… मैं कर रही हूँ…”
फिर उसने आँखें बंद कर लीं और अपने आप को छोड़ दिया।
पहले एक हल्की धार निकली। फिर दबाव इतना ज्यादा था कि पेशाब की तेज़ धार “शूऊऊऊ… शूऊऊ…” की आवाज़ के साथ फूट पड़ी। गरम पेशाब की धार रामू की उंगलियों और हथेली पर सीधे जाकर गिरने लगी। उनकी उंगलियाँ पूरी तरह गीली हो गईं। धार की आवाज़ बाथरूम में साफ गूँज रही थी। रुही की जाँघें काँप रही थीं। वह दोनों हाथों से अपना मुँह दबाए हुए सिसक रही थी।
रामू ने उसकी फाँकों को और फैलाए रखा। पेशाब उनकी हथेली से होते हुए नीचे टॉयलेट में गिर रही थी। उन्होंने मर्दाना संतुष्टि के साथ कहा—
“हाँ… ऐसे ही। पूरी निकाल। दबा मत। मैं देख रहा हूँ तेरा मूत। कितनी तेज़ धार है तेरी…”
रुही रोते-रोते बोली, “बहुत शर्म आ रही है… रामू जी… माफ़ कर दो… अब और मत देखो…”
“शर्म रख अपनी,” रामू ने सख्ती से कहा। “मैं तेरा मर्द हूँ। तू मेरे सामने मूत रही है तो क्या हुआ? तू मेरी बहू है। मेरी औरत है। तेरा ये शरीर, ये चूत, ये मूत… सब मेरा है। समझी?”
रुही ने सिर्फ सिर हिलाया। आँसू उसकी आँखों से बह रहे थे। पेशाब अभी भी निकल रही थी—अब धार थोड़ी धीमी हो चली थी, लेकिन रुक नहीं रही थी। रामू की उंगलियाँ पूरी तरह गीली और गर्म थीं। उन्होंने जानबूझकर अपनी उंगली को उसकी चूत के छेद पर फेरा, जहाँ से अभी पेशाब निकल रही थी।
“देख,” उन्होंने कहा, “मेरा हाथ तेरे मूत से कितना गीला हो गया। अब बता… कैसा लग रहा है मेरे सामने मूत करके?”
रुही की आवाज़ टूट रही थी, “शर्म… बहुत शर्म आ रही है… लेकिन… मैं कुछ नहीं कर सकती… आप… आप जैसा कह रहे हो…”
रामू ने उसकी फाँकों को अभी भी खुला रखा और आखिरी बूँदें निकलने तक इंतज़ार किया। जब धार लगभग रुक गई तो उन्होंने अपनी गीली उंगलियों को उसकी चूत पर धीरे से फेरा और कहा—
“अच्छी लड़की। अब याद रख… जब भी मैं कहूँ, तू मेरे सामने मूतेगी। कोई शर्म नहीं। कोई मना नहीं। ये मेरा मर्दाना हक है। और तू मेरी समर्पित बहू है।”
रुही पूरी तरह टूट चुकी थी। शर्म, डर, उत्तेजना और समर्पण सब एक साथ। उसने आँखें बंद किए हुए सिर्फ इतना फुसफुसाया—
“हाँ… रामू जी… आपका हक है… मैं… मैं आपकी हूँ…”
पेशाब की आखिरी बूँदें टपक रही थीं। रामू का हाथ अभी भी उसकी खुली चूत पर था—गीला, गर्म और मालिकाना। और रुही… बस उनकी उंगलियों के बीच बैठी अपनी शर्म और समर्पण को एक साथ जी रही थी।
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पेशाब की आखिरी बूँदें टपक चुकी थीं।
रामू जी ने अपनी गीली उंगलियाँ रुही की चूत से हटाईं। फिर उन्होंने उसके दोनों बगलों से पकड़कर उसे धीरे से खड़ा कर दिया। रुही की टाँगें अभी भी काँप रही थीं। आँखें लाल थीं, गालों पर आँसूओं के निशान थे। वह खड़ी तो हो गई, लेकिन सिर नीचे झुकाए रही।
रामू ने उसकी छोटी लाल पैंटी को दोनों हाथों से पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ खींच दिया। इलास्टिक उसकी जाँघों पर चढ़ते हुए कमर तक आ गया। उन्होंने पैंटी को ठीक से बैठाया, दोनों तरफ से समेटा। फिर उसकी मिनी नाइटी के किनारों को नीचे किया और उसे ठीक से उसके शरीर पर बिठा दिया। जैसे कोई बहुत कीमती चीज़ को संभाल रहा हो।
रुही ने यह सब चुपचाप महसूस किया।
उनके हाथों का यह ख्याल रखना… पेशाब करवाने के बाद की यह नरमी… उसे अंदर तक छू गया। शर्म अभी भी थी, लेकिन उसके नीचे एक गहरी, मीठी सी भावना उठ रही थी। वे मुझे इस्तेमाल भी करते हैं, और फिर संभालते भी हैं।
उसने काँपती आवाज़ में धीरे से कहा, “रामू जी… आप…”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। आँखों में अभी भी नशा और मालिकाना भाव था, लेकिन इस बार थोड़ी नरमी भी थी।
“क्या?” उन्होंने पूछा।
रुही ने उनकी आँखों में देखते हुए फुसफुसाया, “आपका इस तरह ख्याल रखना… मुझे… बहुत भा गया।”
रामू हल्के से मुस्कुराए। उन्होंने उसके गीले गाल पर अंगूठे से आँसू पोछे। “तू मेरी है। तेरा ख्याल रखना भी मेरा हक है। तेरा अपमान करना भी, तेरी सेवा करना भी।”
फिर उन्होंने एक कदम पीछे लिया।
रुही की नज़रें उनकी तरफ थीं। रामू ने अपने काले अंडरवियर के इलास्टिक में उंगलियाँ डालीं और उसे नीचे सरका दिया। उनका लंड बाहर निकल आया—मोटा, लंबा, पूरी तरह तनकर डंडे की तरह खड़ा। नसों से भरा हुआ, सिर चमकदार, और इतना सख्त कि हिलने पर भी सीधा खड़ा रह रहा था। उसकी नोक से हल्की सी चमकदार बूँद निकल रही थी।
रुही की साँस अटक गई। आँखें उस पर जम गईं। शर्म के मारे वह नज़रें हटाना चाहती थी, लेकिन हटा नहीं पाई। इतना तना हुआ, इतना भारी… और अभी-अभी उसी लंड के मालिक ने उसे मूतने पर मजबूर किया था।
रामू ने अपना लंड जड़ से पकड़ा और धीरे से एक बार ऊपर-नीचे किया। फिर रुही की तरफ देखकर बोले—
“देख। तेरे मूत करवाने के बाद भी इतना तना हुआ है। तूने कितना गिला किया है मुझे… अब इसकी जिम्मेदारी भी तेरी है।”
रुही का गला सूख गया। उसने धीरे से कहा, “रामू जी… ये… बहुत बड़ा लग रहा है…”
रामू करीब आए। उनका तना हुआ लंड रुही के पेट से छूने लगा। उन्होंने उसका हाथ पकड़कर अपनी लंड पर रख दिया।
“पकड़,” उन्होंने कहा। “अच्छी तरह से महसूस कर। ये तेरा मालिक है। और तू इसकी मालकिन बनने वाली है… लेकिन मेरे तरीके से।”
रुही का हाथ काँप रहा था। उनकी गर्म, सख्त नसों वाली लंड उसकी हथेली में थी। वह शर्म से मर रही थी, लेकिन उंगलियाँ अपने-आप उसके चारों तरफ सिमट गईं।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे कहा, “अब बता… कैसा लग रहा है? मूतने के बाद तेरे मर्द का लंड अपने हाथ में लेकर?”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। आवाज़ बहुत कमजोर थी—
“बहुत… बहुत सख्त… और… गरम… रामू जी…”
रामू की मर्दाना हँसी बाथरूम में गूँजी। उन्होंने रुही का सिर अपने सीने से लगा लिया। उनका तना हुआ लंड दोनों के बीच दब गया।
“अच्छी लड़की,” उन्होंने कहा। “अब तू पूरी तरह तैयार है। चल… बाहर चलते हैं। सोनिया और जामिल को भी दिखाना है कि मेरी बहू किस हाल में है।”
रुही ने उनके गले में बाँहें डाल दीं। शर्म, उत्तेजना, और एक गहरी समर्पण की भावना से उसका शरीर अभी भी काँप रहा था। लेकिन वह अब विरोध नहीं कर रही थी। बस उनके साथ चलने को तैयार थी।
रुही जैसे ही चलने को तैयार हुई, रामू जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुक,” उन्होंने कहा। आवाज़ में फिर से वह मर्दाना हक था। “मुझे भी तो मूत करवा दे।”
रुही की आँखें बड़ी हो गईं। शर्म से उसका चेहरा दोबारा लाल हो गया। उसने काँपते हाथों से उनका तना हुआ लंड पकड़ा और टॉयलेट की तरफ मोड़ने लगी।
रामू ने सिर हिलाया। “ऐसे नहीं। अपने घुटनों पर बैठ।”
रुही एक पल के लिए ठिठक गई। फिर उसने आज्ञाकारी पत्नी की तरह धीरे से घुटनों के बल बैठ गई। ठंडी फर्श उसके घुटनों से छूई। उसने सिर उठाकर रामू की तरफ देखा। उनकी आँखों में साफ हुक्म था।
“अब,” रामू ने कहा, “मेरे लंड को साइड से अपने मुँह में ले। पूरा मत ले… बस साइड से। और मुँह खुला रख।”
रुही ने शर्म से आँखें झुकाईं। फिर उसने उनके मोटे, नसों वाले लंड को हाथ से पकड़ा और साइड से अपने आधे खुले मुँह में रख लिया। गरम, सख्त मांस उसके होठों और जीभ से छू रहा था। वह काँप रही थी।
रामू ने उसका सिर दोनों हाथों से थाम लिया। “अच्छी लड़की… अब शांत रह।”
फिर उन्होंने पेशाब करना शुरू किया।
पहले एक हल्की धार। फिर तेज़। गरम पेशाब की धार उनके लंड से निकलकर सीधे रुही के मुँह के अंदर और कोनों से बाहर बहने लगी। नसों के पास से गुज़रती हुई धार का अहसास रुही को साफ महसूस हो रहा था—गरमाहट, दबाव, और वह अजीब सा स्वाद। पेशाब उसके मुँह में भर गई। कुछ गले के अंदर चला गया, कुछ होठों से बाहर रिसकर ठुड्डी पर बहने लगा।
रुही की आँखें भर आईं। वह सिसक रही थी, लेकिन मुँह नहीं हटा रही थी। रामू का लंड उसके मुँह में था, और वे उसके मुँह में मूत रहे थे।
जब धार रुक गई तो रामू ने धीरे से कहा—
“अब निकाल मत। निगल। जो बचा है।”
रुही ने आँखें बंद कीं और गले में बची हुई पेशाब को निगल लिया। स्वाद खट्टा, गरम और अजीब था। लेकिन उसने प्यार और श्रद्धा के साथ पूरा पी लिया। एक बूँद भी बाहर नहीं गिराया।
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। उनके अंगूठे से उसकी ठुड्डी पर लगी पेशाब पोछी। “अच्छी बहू। अब अपना काम पूरा कर।”
उन्होंने हुक्म दिया, “चल… अब अपने मर्द का लंड चाट के साफ कर। अच्छी तरह। एक बूँद भी न बचे।”
रुही ने काँपते हुए सिर आगे किया। उसने उनके अभी-अभी मूत चुके लंड को जीभ से चाटना शुरू किया। पहले नोक से। फिर नीचे की तरफ। नसों के ऊपर जीभ फेरती हुई। बची हुई पेशाब की बूँदें उसकी जीभ पर आ गईं और वह उन्हें भी चाट-चाट कर साफ करती गई। कुछ बूँदें उसके गले तक चली गईं। उसने उन्हें भी निगल लिया।
चाटते हुए वह धीरे से बोल रही थी, आवाज़ में शर्म और समर्पण दोनों थे—
“रामू जी… साफ कर रही हूँ… आपके लंड को… आपकी बहू…”
रामू ने उसके बाल सहलाए। “हाँ… ऐसे ही। प्यार से। श्रद्धा से। ये लंड तेरा देवता है आज से।”
जब पूरा लंड साफ हो गया तो रुही ने अपने आप ही उनके अंडरवियर को ऊपर खींच दिया। तना हुआ लंड कपड़े के अंदर समा गया। फिर उसने अंडरवियर के ऊपर से ही उनके लंड को एक लंबा, नरम चुम्बन दे दिया। जैसे कोई प्रणाम कर रही हो।
रामू ने उसे देखकर मुस्कुराया। “अब तैयार है?”
रुही ने सिर हिलाया। आँखें अभी भी नम थीं। “हाँ… रामू जी।”
रामू ने उसे गोद में नहीं, बल्कि अपने कंधे पर उठा लिया। रुही का सिर उनके पीठ की तरफ लटक गया, बाल बिखर गए। उन्होंने उसका एक हाथ अपने सीने पर रखा और बाथरूम से बाहर की तरफ चल पड़े।
बाहर सोनिया और जामिल की हल्की हँसी अभी भी सुनाई दे रही थी।
और रुही… अपने मर्द के कंधे पर लटकी हुई… उनके मूत का स्वाद अभी भी मुँह में लिए… पूरी तरह से समर्पित चली जा रही थी।
रुही रामू जी के कंधे पर लटकी हुई थी।
बाल उनके पीठ पर बिखरे हुए थे। चेहरा नीचे की तरफ झुका था। हर कदम के साथ उनका कंधा उसके पेट में धंस रहा था। बाथरूम पीछे छूट रहा था… और आगे लिविंग रूम था, जहाँ सोनिया और जामिल इंतज़ार कर रहे थे।
उसके मन में एक साथ कई लहरें उठ रही थीं।
शर्म सबसे पहले थी।
बहुत भारी, बहुत गहरी।
मैंने अभी-अभी उनके मुँह में मूत लिया है… उनके लंड को चाट-चाट कर साफ किया है… उनकी पेशाब का स्वाद अभी भी मेरे गले में है।
और अब मैं उनके कंधे पर लटकी हुई बाहर जा रही हूँ… जैसे कोई जीती हुई वस्तु।
शर्म इतनी तेज़ थी कि आँखें जल रही थीं। वह सोचना भी नहीं चाहती थी कि सोनिया उसकी इस हालत को देखेगी। जामिल देखेगा। लोग देखेंगे।
लेकिन शर्म के ठीक नीचे रोमांच था।
एक काली, गरम सी लहर।
वे मुझे कंधे पर उठाए हुए हैं… जैसे मैं उनकी हूँ ही।
मेरा शरीर उनका है। मेरी शर्म उनका खेल है। मेरा मूत, मेरी चूत, मेरा मुँह… सब उन्होंने ले लिया।
यह सोचते ही उसके पेट के निचले हिस्से में फिर से मरोड़ उठ गई। जितना अपमान हुआ था, उतना ही शरीर उत्तेजित हो रहा था। शर्म और रोमांच एक-दूसरे में मिलकर एक नशा बना रहे थे।
और सबसे गहराई में समर्पण था।
अब वह विरोध की आवाज़ बहुत कमजोर पड़ चुकी थी।
मैंने घुटनों के बल बैठकर उनका मूत पिया।
मैंने खुद कहा—‘आपकी बहू’।
अब भागने का कोई रास्ता नहीं। और… सच पूछो तो भागने का मन भी नहीं।
समर्पण में एक अजीब सी शांति थी। जैसे लंबे समय से बोझ ढोने के बाद कोई आखिरकार झुक गया हो, और झुकने में ही राहत मिल गई हो।
फिर उसका मन तुलना करने लगा।
सनी…
सनी कभी ऐसा नहीं कर सकता था। सनी उसके शरीर को इस तरह अपना नहीं सकते थे। सनी न तो उसे इस तरह तोड़ सकते थे, न इस तरह संभाल सकते थे। सनी के साथ सब कुछ साफ-सुथरा, हल्का, और अधूरा रहता था। वहाँ शर्म नहीं थी… लेकिन आग भी नहीं थी।
और रामू जी…
वे गंदे थे। सख्त थे। निर्मम भी थे। लेकिन उनकी गंदगी में एक सच्चाई थी। उनके हुक्म में एक कब्ज़ा था। उनके मूत में, उनके थप्पड़ में, उनके ख्याल रखने में… एक पूरा मर्द था। जो लेता भी था और अपने पास रखता भी था।
रुही ने मन ही मन सोचा—
सनी मुझे अपनी बीवी बनाकर रखे हुए हैं।
रामू जी ने मुझे अपनी बहू बना लिया है।
बीवी होने में इज़्ज़त थी…
बहू होने में समर्पण है।
और इस पल, उनके कंधे पर लटकी हुई, उनके मूत का स्वाद मुँह में लिए, रुही को समर्पण ही अधिक असली लग रहा था।
शर्म अभी भी जला रही थी।
रोमांच अभी भी काँप रहा था।
लेकिन समर्पण… समर्पण अब उसकी साँस बन चुका था।
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Awesome aur ekdom ashadaran update
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Outstanding, sensational and sizzling writings!
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Zabardast aur jhakkas update
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zabardast, mast aur bahut badhiya update!
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रामू जी रुही को अपने कंधे पर उठाए हुए बाथरूम से बाहर निकले।
रुही का सिर उनकी पीठ की तरफ लटक रहा था, बाल बिखरे हुए, चेहरा अभी भी शर्म से गरम। उनके हर कदम के साथ उसका शरीर हल्के से हिल रहा था। पेशाब और उनके लंड का स्वाद अभी भी उसके मुँह में बचा हुआ था।
लिविंग रूम में पहुँचते ही सोनिया और जामिल दोनों की निगाहें उन पर पड़ गईं।
सोनिया पहले तो हैरान हुई, फिर धीरे-धीरे उसकी मुस्कान फैल गई। उसने जामिल की बाँह पर हाथ मारते हुए कहा—
“अरे देखो तो… रामू भाई पूरी तरह से अपनी बहू को कंधे पर लाद के ला रहे हैं। बेचारी की क्या हालत की है अंदर!”
जामिल जोर से हँसा। “भैया, बाथरूम में इतना समय लगा दिया… लग रहा है खूब सेवा ले ली अपनी बहू से।”
रामू ने रुही को धीरे से सोफे पर उतारा। रुही तुरंत उनके सीने से चिपक गई, चेहरा छुपाने की कोशिश करती हुई। नाइटी थोड़ी सी बिखरी हुई थी, पैंटी ठीक से चढ़ी हुई, लेकिन उसकी हालत साफ बता रही थी कि अंदर बहुत कुछ हो चुका है।
रामू ने उसके बाल पीछे करते हुए कहा, “हाँ… खूब सेवा ली। मूत भी करवाया, अपना भी करवाया… और चाट-चाट के साफ भी करवाया।”
सोनिया की आँखें चमक उठीं। वह आगे झुककर रुही का चेहरा देखने की कोशिश करने लगी।
“रुही… सच में? तूने रामू भाई का मूत पी लिया?” उसने हैरानी और मज़े दोनों के स्वर में पूछा। “बेचारी… कितनी गिर गई है तू। और फिर भी इनसे लिपटी हुई है।”
रुही ने आँखें और बंद कर लीं। आवाज़ बहुत कमजोर निकली, “मत पूछो सोनिया… बहुत शर्म आ रही है…”
जामिल ने सोनिया को अपनी तरफ खींचते हुए कहा, “मैडम, अब तो ये पूरी तरह रामू भैया की हो गई। देखो कैसे दुबकी हुई है। सनी की बीवी कहीं खो गई लगती है।”
रामू ने रुही को अपनी गोद में खींच लिया। उसका एक हाथ उसकी कमर पर था, दूसरा उसके गाल पर।
“अब ये कामत परिवार की बहू है,” उन्होंने साफ कहा। “आज रात और भी बहुत कुछ बाकी है। दो रात पूरी हैं… अभी तो शुरुआत है।”
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर धीरे से कहा, “रुही… सिर उठा। इतना मत शरमा। तूने जो किया है… वो अब छुपाने लायक नहीं रहा। हम सब जानते हैं।”
रुही ने धीरे से आँखें खोलीं। आँसू अभी भी कोनों में थे। उसने रामू की आँखों में देखा, फिर सोनिया की तरफ। मुँह खोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। बस उनके सीने में और गहराई से दुबक गई।
कमरे में एक भारी, कामुक सी चुप्पी छा गई।
रामू के हाथ उसकी कमर पर घूम रहे थे। सोनिया जामिल से सट चुकी थी। और रुही… शर्म, रोमांच और समर्पण के मिश्रण में डूबी हुई… बस अपने मर्द की बाँहों में थी।
अब आगे की रात और भी लंबी होने वाली थी।

जामिल अब सिर्फ अंडरवियर में था।
काली टाइट अंडरवियर में उसका शरीर और भी मज़बूत लग रहा था। और सबसे ज्यादा नज़र उसके उभार पर जाकर ठहर गई। अंडरवियर के अंदर उसका लंड इतना तना हुआ और भारी था कि कपड़े के ऊपर से ही उसकी मोटाई और लंबाई साफ अंदाज़ा हो रही थी। नसें तक हल्की-हल्की उभर रही थीं।
रुही की निगाह अनजाने में वहीं अटक गई। एक पल के लिए तो वह अपनी आँखें हटाना भूल ही गई।
यह… कितना बड़ा है…
रामू जी से भी मोटा और लंबा लग रहा है। इतना सख्त…
उसके मन में एक अजीब सी लहर दौड़ी। शर्म भी हुई कि वह किसी और मर्द के औज़ार को घूर रही है, लेकिन उत्सुकता और एक गुप्त सी उत्तेजना ने उसे बाँध लिया।
सोनिया की मौज है…
इतना विशाल लंड उसकी चूत को बाजता होगा।
कैसे लेती होगी वह इसे अंदर? कितनी चीखती होगी जब जामिल पूरा धकेलता होगा?
रुही के मन में तस्वीरें बनने लगीं—सोनिया की टाँगें जामिल की कमर पर लिपटी हुईं, उसकी कराहें, जामिल का भारी शरीर उसके ऊपर उठता-गिरता… वह विशाल लंड बार-बार उसकी चूत को चीरता हुआ।
इतने में सोनिया की आवाज़ आई।
“क्या देख रही है रुही?” सोनिया ने शरारती मुस्कान के साथ पूछा। उसने जानबूझकर जामिल के करीब सरककर अपना हाथ उसके उभार पर रख दिया। “मेरे वाले को घूर रही है?”
रुही झटके से नज़रें हटा लीं। गाल तुरंत लाल हो गए। “नहीं… मैं… कुछ नहीं…”
जामिल हँस पड़ा। उसकी हँसी भारी थी। “देखने में कोई बुराई नहीं भाभी। मैडम भी अक्सर बताती हैं कि मेरा थोड़ा बड़ा है। है न सोनिया?”
सोनिया ने उसके अंडरवियर के ऊपर से ही हल्के से दबाते हुए कहा, “बड़ा नहीं… बहुत बड़ा। कभी-कभी तो लगता है कि पूरा अंदर ले पाऊँगी भी या नहीं। लेकिन ले लेती हूँ… चीख-चीख कर।”
रुही की साँसें तेज़ हो गईं। वह रामू जी से और कसकर चिपक गई, लेकिन उसकी नज़र फिर से एक पल के लिए जामिल के उभार पर चली गई।
रामू ने सब देख लिया था। उन्होंने रुही के कान में धीरे से कहा, “देख रही है न? सोनिया के मर्द का भी कमाल का है। लेकिन याद रख… तू सिर्फ मेरे लंड की है। समझी?”
रुही ने सिर हिलाया। आवाज़ बहुत धीमी थी, “हाँ… रामू जी… सिर्फ आपके…”
लेकिन मन के अंदर एक छोटी सी आवाज़ अभी भी चल रही थी—
सोनिया कितनी चीखती होगी…
जब इतना मोटा लंड उसकी चूत में पूरा उतरता होगा…
क्या वह भी कभी रोती होगी दर्द से… या सिर्फ मज़े में कराहती होगी?
सोनिया ने रुही की हालत भांपते हुए कहा, “रुही, तू इतनी शर्मा क्यों रही है? तू भी तो अभी-अभी रामू भाई का मूत पीकर आई है। अब किसी और के लंड को देखने में क्या शर्म?”
जामिल ने अपना हाथ सोनिया की कमर पर रखते हुए जोड़ा, “सही कह रही हैं मैडम। आज रात सब खुले हैं। छुपाने की कोई बात नहीं।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। शर्म और एक अजीब सी उत्तेजना दोनों से उसका शरीर गर्म हो रहा था। वह रामू की छाती में मुँह छुपाए बैठी रही… लेकिन मन में जामिल के विशाल उभार और सोनिया की चीखों की कल्पना अभी भी घूम रही थी।
रुही अभी भी रामू जी की छाती से चिपकी हुई थी। आँखें बंद किए हुए, लेकिन मन शांत नहीं था। जामिल के अंडरवियर के उस भारी उभार की तस्वीर बार-बार आँखों के सामने आ रही थी।
सोनिया ने जामिल के और करीब सरकते हुए रुही की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में हल्की सी चिढ़ाने वाली मिठास थी—
“रुही… तू सच में सोच रही है ना? कि मैं इस लंड को कैसे लेती हूँ?” उसने जामिल के उभार पर हल्के से थपकी दी। “बोल, सोच रही है?”
रुही ने सिर हिलाया, लेकिन जवाब नहीं दिया। शर्म से उसका गला सूख रहा था।
जामिल ने सोनिया को अपनी गोद में खींच लिया। सोनिया की एक जाँघ उसके ऊपर चढ़ गई। उसने रुही से कहा, “भाभी, मैडम जब इसे लेती हैं ना… तो पहले बहुत चीखती हैं। धीरे-धीरे पूरा उतरता है… फिर वो खुद कमर हिलाने लगती हैं। कभी-कभी तो आँसू भी आ जाते हैं… लेकिन छोड़ती नहीं।”
सोनिया हँसी। “सच है। कभी-कभी लगता है फट जाएगी… लेकिन मज़ा भी उतना ही आता है। रुही, तू बता… रामू भाई का जब पहली बार गया था तो तू कितना रोई थी?”
रामू ने रुही के बालों में उंगलियाँ फेरते हुए जवाब दिया, “बहुत रोई थी। चीखी भी थी। लेकिन अब देखो… कितनी अच्छी बहू बन गई है। मेरे मूत तक पी लेती है।”
रुही की साँस अटक गई। उसने रामू के कान में धीरे से कहा, “इतना मत बताओ न… बहुत शर्म आ रही है…”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। “शर्म रख। आज रात शर्म की कोई जगह नहीं। तू मेरी है… और ये दोनों भी जानते हैं।”
इतने में जामिल ने सोनिया की नाइटी का एक स्ट्रैप गिरा दिया। सोनिया ने रोकने की बजाय उसकी तरफ और झुक गई। जामिल का हाथ उसकी छाती पर था। दोनों की साँसें तेज़ हो रही थीं।
सोनिया ने आँखें आधी बंद करते हुए रुही से कहा, “देख… अब जामिल जी मुझे छू रहे हैं। तू भी रामू भाई से और चिपक जा। आज रात लंबी है… और हम सब यहीं हैं।”
रुही ने अनजाने में फिर से जामिल के उभार की तरफ एक झलक ली। इतना मोटा… इतना तना हुआ। मन में फिर वही ख्याल आया—
सोनिया की चूत इसे कैसे समाती होगी…
कितनी बार चीखती होगी रात में…
रामू ने उसका ध्यान अपनी तरफ खींचते हुए कहा, “मेरी तरफ देख। सिर्फ मेरी तरफ। तू सोनिया की चूत की फिक्र मत कर। तेरी चूत की फिक्र मैं करूँगा।”
फिर उन्होंने रुही को अपनी गोद में और कस लिया। उनका तना हुआ लंड उसकी जाँघ से सट रहा था। रुही का शरीर काँप उठा।
कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। बातें कम हो रही थीं, साँसें तेज़ हो रही थीं। सोनिया जामिल के ऊपर लगभग बैठ चुकी थी। और रुही… शर्म और उत्तेजना के बीच फँसी हुई… बस अपने मर्द की बाँहों में थी।
रात अब और गहरी होने वाली थी।
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बोतल फिर घूमी। इस बार वह सोनिया पर रुकी।
“सोनिया, ट्रूथ ऑर डेयर?” जामिल ने पूछा।
सोनिया ने बिना हिचकिचाहट के कहा, “डेयर।”
जामिल की आँखें चमक उठीं। “तो… रामू भाई के लंड को अंडरवियर के ऊपर से एक बार हाथ से पकड़। और रुही को दिखाते हुए बता कि कैसा लग रहा है।”
रुही की साँस अटक गई। उसने रामू को देखने की कोशिश की, लेकिन रामू शांत बैठे रहे। सोनिया उठी और रामू के पास गई। उसने झुककर उनके अंडरवियर के ऊपर से ही मोटे तने हुए लंड को हथेली में ले लिया। धीरे से दबाया।
“बहुत सख्त है… और मोटा भी,” सोनिया ने साफ कहा। “रुही, तेरे मर्द का लंड अच्छा है। भारी है।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। शर्म से उसका शरीर काँप रहा था। रामू ने सोनिया का हाथ हटाते हुए कहा, “बस। अब वापस जा।”
सोनिया हँसती हुई अपनी जगह पर लौट गई।
अब बारी रुही की दोबारा आई। बोतल उसके सामने रुकी।
“ट्रूथ ऑर डेयर, बुलबुल?” सोनिया ने पूछा।
रुही ने काँपती आवाज़ में कहा, “ट्रूथ…”
सोनिया ने तुरंत पूछा, “अपने रामू जी के किस अंग या मर्दानगी की बात तुझे सबसे ज्यादा पसंद है? या फिर उनके प्रति तेरे समर्पण की कोई बात बता।”
रुही कुछ देर चुप रही। रामू का हाथ उसकी कमर पर था। आखिरकार उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“मुझे… उनका हुक्म सबसे ज्यादा पसंद है। जब वे सख्ती से कुछ कहते हैं… तो मैं मना नहीं कर पाती। और… मुझे ये भी पसंद है कि वे मुझे अपनी बहू कहते हैं। इससे… मुझे लगता है कि मैं सच में उनकी हो गई हूँ।”
कमरे में हल्की सी चुप्पी छा गई। फिर जामिल ने धीरे से सीटी बजाई। “शाबाश भाभी। साफ बात कही।”
रामू ने रुही के माथे पर चुम्बन लिया। “अच्छी लड़की।”
अब बोतल जामिल पर रुकी। उसने डेयर चुना।
सोनिया ने कहा, “जामिल… रुही के पैर के अंगूठे को चूम। और चूमते हुए ये कह कि ‘रामू भैया की बहू’।”
जामिल बिना किसी संकोच के झुका। रुही ने अपना पैर पीछे खींचना चाहा, लेकिन रामू ने उसकी जाँघ दबाई। “हिल मत।”
जामिल ने रुही के नंगे पैर के अंगूठे पर होंठ रख दिए। एक लंबा चुम्बन लिया और साफ कहा, “रामू भैया की बहू।”
रुही की आँखों में आँसू आ गए। शर्म इतनी थी कि वह बोलना भी नहीं चाहती थी। उसने बस रामू से और कसकर लिपट गई।
गेम जारी था।
शराब फिर से रामू के मुँह से रुही के मुँह में उतर रही थी। कपड़े और ढीले हो रहे थे। सच और डेयर दोनों और गंदे होते जा रहे थे। और रुही… हर बार थोड़ी और गहरी समर्पित होती जा रही थी।

बोतल फिर घूमी। इस बार वह बहुत देर तक घूमती रही और आखिरकार रामू के सामने रुकी।
“रामू जी… ट्रूथ ऑर डेयर?” सोनिया ने पूछा। उसकी आवाज़ में जानबूझकर चुनौती थी।
रामू ने रुही की तरफ देखा। फिर धीरे से बोले, “डेयर।”
सोनिया की आँखें चमक उठीं। वह झुकी और धीरे से बोली—
“तो… अपनी बहू को अभी सबके सामने ये कहने को कहो—‘मैं सनी की बीवी नहीं, कामत परिवार की रंडी हूँ’। और रुही को खुद ये वाक्य बोलना होगा।”
कमरे में हवा जैसे ठहर गई।
रुही के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने तुरंत रामू का हाथ पकड़ लिया। “रामू जी… प्लीज… ये मत… मैं नहीं बोल सकती…”
रामू ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। आँखों में नशा और पूरा मालिकाना भाव था।
“बोलेगी,” उन्होंने सख्ती से कहा। “मेरी डेयर है। पूरा वाक्य बोल। साफ-साफ।”
रुही की आँखें भर आईं। होंठ काँप रहे थे। सोनिया और जामिल दोनों चुपचाप देख रहे थे—सोनिया के चेहरे पर शरारती मुस्कान, जामिल के चेहरे पर उत्सुकता।
रुही ने बहुत देर तक सिर झुकाए रखा। फिर आँसुओं भरी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए कहा—
“मैं… मैं सनी की बीवी नहीं… कामत परिवार की… रंडी हूँ…”
आखिरी शब्द उसके गले से टूटकर निकला। जैसे ही उसने कहा, उसके शरीर में एक तेज़ सिहरन दौड़ गई—शर्म की, और उसके नीचे एक अजीब सी गहरी उत्तेजना की।
सोनिया ने धीरे से ताली बजाई। “वाह… अब तो बात बन गई। जामिल, देखा? कितनी आसानी से अपनी पहचान बदल दी इसने।”
जामिल ने सिर हिलाया। “रामू भैया की बहू अब खुद को रंडी भी कह रही है। मज़ा आ गया।”
रामू ने रुही को अपनी छाती से चिपका लिया। उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे कहा, “अच्छी लड़की। अब से यही तेरा सच है। दोहरा… एक बार और।”
रुही रोते-रोते दोबारा बोली, “मैं कामत परिवार की रंडी हूँ…”
इस बार उसकी आवाज़ में रोना कम, और समर्पण ज्यादा था।
गेम का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। बस एक वाक्य ने सब कुछ और गहरा, और खतरनाक, और रोचक बना दिया था।
अब अगला डेयर या ट्रूथ… और भी आगे बढ़ने वाला था।

जैसे ही आखिरी शब्द उसके मुँह से निकला—“…कमत परिवार की रंडी हूँ”—रुही के अंदर कुछ टूट गया।
शरीर तो वहीं रामू की गोद में था, लेकिन मन कहीं बहुत दूर गिर रहा था। आँखों के आगे अंधेरा-सा छा गया। गला सूख गया। दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी।
मैंने क्या कह दिया…?
मैंने खुद को रंडी कह दिया… सबके सामने…
एक तेज़, काँपती हुई लहर उसके सीने से उठकर आँखों तक आ गई। आँसू अब रुकने वाले नहीं थे। वे उसके गालों पर बहने लगे—चुपचाप, लेकिन लगातार। वह रोना भी नहीं चाहती थी, लेकिन शरीर उसके नियंत्रण में नहीं रह गया था।
शर्म अब सिर्फ शर्म नहीं रह गई थी। वह अपमान की एक गहरी, काली परत बन चुकी थी जो उसकी त्वचा के नीचे उतर रही थी। जैसे कोई उसके अंदर की पुरानी रुही को खींचकर बाहर फेंक रहा हो—वह रुही जो सनी की बीवी थी, जो अकड़ में चलती थी, जो कभी किसी के सामने इस तरह घुटनों पर नहीं बैठी थी।
और सबसे भयानक बात यह थी कि…
उसी अपमान के नीचे एक और भावना उठ रही थी। बहुत शर्मनाक। बहुत गिरी हुई।
एक अजीब सी राहत।
एक काली सी शांति।
जैसे उसने आखिरकार कुछ ऐसा कह दिया हो जो वह बहुत दिनों से अपने अंदर दबाए हुए थी। जैसे झूठ का बोझ थोड़ा हल्का हो गया हो।
मैंने कह दिया…
अब छुपाने को कुछ नहीं बचा…
अब मैं सच में उनकी रंडी हूँ…
यह ख्याल आते ही उसके शरीर में एक और तेज़ सिहरन दौड़ गई—इस बार शर्म के साथ-साथ उत्तेजना की। जाँघें अपने-आप भींच गईं। साँस अटक गई। वह और भी ज्यादा रामू से चिपक गई, जैसे कोई उसे और गिरा देगा अगर उसने उनका सहारा छोड़ दिया।
रामू ने उसके आँसू पोंछे। लेकिन रुही ने आँखें नहीं खोलीं। वह नहीं देखना चाहती थी सोनिया की मुस्कान, जामिल की निगाहें, या अपनी हालत।
अंदर ही अंदर वह खुद से पूछ रही थी—
अब मैं कौन हूँ?
सनी की बीवी… या सच में इनकी रंडी?
और पहली बार, जवाब साफ नहीं आ रहा था।
सिर्फ आँसू आ रहे थे…
और उनके नीचे, एक डरी हुई, काँपती हुई स्वीकृति।
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बोतल फिर घूमी। इस बार वह सोनिया के सामने रुकी।
रामू ने धीरे से बोतल को देखा, फिर सोनिया की तरफ। उनकी आवाज़ में हल्की सी मुस्कान और पूरा अधिकार था—
“सोनिया… डेयर।”
सोनिया ने भौंहें उठाईं। “बोलो रामू भाई… क्या करना है?”
रामू ने रुही को अपनी गोद में और कसते हुए साफ कहा, “अपनी नाइटी उतार। अभी। सिर्फ ब्रा और पैंटी में रह।”
सोनिया एक पल के लिए रुही की तरफ देखती हुई मुस्कुराई। फिर बिना किसी हिचकिचाहट के खड़ी हो गई। उसने दोनों हाथों से अपनी लाल सैटिन नाइटी के स्ट्रैप्स नीचे किए और धीरे-धीरे उसे शरीर से खिसका दिया। नाइटी उसके पैरों पर गिर गई।
अब वह सिर्फ गुलाबी ब्रा और छोटी काली पैंटी में खड़ी थी। उसके पूर्ण स्तन ब्रा में ठूसे हुए थे, कमर और जाँघें खुली हुईं। जामिल ने तुरंत उसका हाथ पकड़कर उसे वापस अपनी गोद में खींच लिया।
“शाबाश,” जामिल ने उसके कान में कहा।
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर आँखें मारीं। “देखा रुही? मैंने उतार दी। तू अभी भी नाइटी में है… लेकिन कब तक?”
रुही की निगाह सोनिया के शरीर पर चली गई और फिर झटके से हट गई। शर्म और एक अजीब सी उत्तेजना दोनों से उसका चेहरा गर्म हो रहा था। उसने रामू से और सटते हुए धीरे कहा, “रामू जी… अब मेरी बारी मत लाना प्लीज…”
रामू ने उसके बाल सहलाते हुए जवाब दिया, “अभी नहीं। तेरी नाइटी अभी रहने दे। लेकिन देखती रह… खेल लंबा है।”
सोनिया अब जामिल की गोद में सिर्फ ब्रा-पैंटी में बैठी थी। जामिल का हाथ उसकी पीठ पर घूम रहा था। माहौल और खुल चुका था।
बोतल फिर से मध्य में रख दी गई।
अब अगला मौका किसी का भी हो सकता था… और रुही जानती थी कि उसकी नाइटी अभी बची हुई है, लेकिन कब तक—यह अब रामू के हाथ में था।

बोतल रुही के सामने रुकी।
सोनिया ने धीरे से पूछा, “बुलबुल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रुही की आवाज़ काँप रही थी। उसने रामू की आँखों में एक पल के लिए देखा, फिर नज़र झुका ली।
“डेयर…” उसने फुसफुसाया।
सोनिया की आवाज़ में हल्की सी क्रूर मिठास थी, “तो रामू भाई के लंड को… अंडरवियर के ऊपर से चूस। जब तक मैं न कहूँ, मुँह मत हटा।”
रुही ने सिर उठाया। आँखें पहले से ही नम थीं। “सोनिया… इतना मत करो… मैं… मैं सबके सामने नहीं कर सकती…”
रामू ने उसका हाथ पकड़ा। उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन उसमें एक भारी, अटल निर्णय था—
“तू कर सकती है। क्योंकि तू मेरी है। और मेरी औरत डेयर से भागती नहीं। घुटनों पर बैठ।”
रुही कुछ पल अचल बैठी रही। फिर धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत भारी फैसला ले रही हो, वह सोफे से उतरकर उनके सामने घुटनों के बल बैठ गई। सिर नीचे था। कंधे काँप रहे थे।
रामू ने उसके बालों को बहुत हल्के से सहलाया। “देख मुझे।”
रुही ने आँखें उठाईं। आँसू उसकी पलकों पर टिके थे।
“मुझे डर लग रहा है,” उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। “शर्म भी आ रही है… बहुत।”
रामू ने उसका गाल थामा। “डर और शर्म दोनों मेरे हैं अब। तू बस कर जो मैं कह रहा हूँ।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। उसने आगे झुककर उनके अंडरवियर के तने हुए उभार पर अपने होंठ रख दिए। गरम। सख्त। कपड़े के ऊपर से भी उसकी मौजूदगी इतनी भारी थी कि रुही की साँस अटक गई। वह धीरे-धीरे चूसने लगी—काँपते हुए, सिसकते हुए।
सोनिया चुपचाप देख रही थी। उसकी आवाज़ में अब मज़ाक कम, और एक अजीब सी गंभीरता थी—
“देख जामिल… यह सिर्फ डेयर नहीं कर रही। यह खुद को सौंप रही है।”
जामिल ने धीरे से जवाब दिया, “हम्म… आँखों में वैसी ही हालत है जैसी कभी-कभी आपकी होती है।”
रुही चूसती रही। आँसू अब उसके गालों पर बह रहे थे। मन के अंदर एक आवाज़ बार-बार कह रही थी—
मैं गिर रही हूँ…
और मैं खुद गिरने दे रही हूँ…
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फँसाईं। दबाव नहीं था, सिर्फ कब्ज़ा था।
“बोल,” उन्होंने धीरे कहा। “मुँह लगाए हुए बोल… तू कौन है?”
रुही के होंठ उनके उभार से सटे थे। आवाज़ लगभग टूट रही थी—
“आपकी… आपकी बहू… आपकी रंडी…”
रामू की साँस भारी हो गई। उन्होंने उसका सिर और पास खींच लिया।
“अच्छी लड़की,” उन्होंने फुसफुसाया। “अब तू समझ गई है।”
रुही ने जवाब में सिर्फ एक लंबी, काँपती सिसकारी दी… और चूसती रही।
शर्म अभी भी जला रही थी।
लेकिन समर्पण अब उससे कहीं भारी पड़ चुका था।

बोतल फिर घूमी। इस बार वह सोनिया के सामने रुकी।
रुही अभी भी रामू के सामने घुटनों पर ही थी। आँखें नम, होंठ थोड़े सूजे हुए। माहौल पहले से ही काफी भारी था।
जामिल ने मुस्कुराते हुए पूछा, “सोनिया… ट्रूथ ऑर डेयर?”
सोनिया ने रुही की हालत पर एक नज़र डाली, फिर धीरे से बोली, “डेयर।”
रामू ने इस बार डेयर दिया। उनकी आवाज़ में हल्की सी मर्दाना क्रूरता थी—
“जामिल की बालों वाली बगलों को चाट। दोनों। अच्छी तरह से। जब तक मैं न कहूँ, मुँह मत हटा।”
सोनिया की भौंहें हल्की सी उठीं। वह हैरान नहीं हुई, बल्कि एक अजीब सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई। “रामू भाई… आप भी कम नहीं हो।”
फिर भी वह बिना मना किए जामिल के पास गई। जामिल ने अपना एक हाथ ऊपर उठाया। उसकी बगल के घने काले बाल साफ दिख रहे थे। मर्दाना पसीने की हल्की गंध भी आ रही थी।
सोनिया झुकी। उसने आँखें बंद किए बिना जामिल की बगल पर अपनी जीभ फेर दी। पहले हल्के से, फिर लंबी-लंबी जीभ चलाते हुए चाटने लगी। बाल उसकी जीभ से चिपक रहे थे। गंध तेज़ थी।
जामिल की साँस भारी हो गई। उसने सोनिया के बाल पकड़कर उसका मुँह और अंदर दबा दिया। “हाँ… ऐसे ही… अच्छी तरह चाट।”
सोनिया ने एक बगल अच्छी तरह चाटी, फिर जामिल ने दूसरा हाथ ऊपर किया। वह दूसरी बगल पर भी उसी श्रद्धा से जीभ फेरने लगी। कभी-कभी होंठों से चूस भी लेती थी।
रुही यह सब घुटनों पर बैठे हुए देख रही थी। उसके मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था।
सोनिया… इतनी आसानी से…
जामिल की बगल चाट रही है… बाल और पसीने के साथ…
और वह शर्मा भी नहीं रही…
सोनिया ने चाटते हुए ही आँखें खोलकर रुही की तरफ देखा। मुँह अभी भी जामिल की बगल से सटा हुआ था। आवाज़ अस्पष्ट थी—
“देख… रुही… मैं भी गिरती हूँ… बस तू जितना शर्माती नहीं।”
रामू ने रुही के बाल सहलाते हुए धीरे कहा, “देख ले। हर औरत अपने मर्द की गंध चाटती है। तू भी चाट चुकी है मेरी… मूत की, पसीने की। फर्क सिर्फ इतना है कि तू अभी भी शर्माती है… और सोनिया नहीं।”
सोनिया ने दोनों बगलें चाट लीं। जब वह मुँह हटाती है तो उसके होंठ चमक रहे थे, और चेहरे पर एक अजीब सी तृप्ति थी।
“हो गया,” उसने साँस लेते हुए कहा। “रामू भाई… अब संतुष्ट?”
रामू ने सिर हिलाया। “हाँ। अच्छी थी।”
गेम जारी था। लेकिन अब कमरे में एक और परत खुल चुकी थी—शर्म की नहीं, बल्कि गंध, शरीर और बिना शर्त समर्पण की।
रुही अभी भी घुटनों पर थी… और सोच रही थी कि अगला डेयर उसका हुआ तो क्या होगा।
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बोतल फिर घूमी। इस बार वह रामू के सामने रुकी।
सोनिया ने तुरंत कहा, “रामू भाई… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रामू ने रुही की तरफ देखा। वह अभी भी उनके सामने घुटनों पर ही बैठी थी। उन्होंने धीरे से जवाब दिया, “डेयर।”
सोनिया की आँखों में शरारत चमक उठी। उसने मुस्कुराते हुए कहा—
“तो… अपनी बहू के कोमल, नाज़ुक पैरों को चूमो और चाटो। दोनों पैर। अच्छी तरह से। रुही को देखती रहना।”
रुही की आँखें बड़ी हो गईं। उसने तुरंत सिर हिलाया, “नहीं… रामू जी… प्लीज… मेरे पैर नहीं… बहुत शर्म की बात है…”
रामू ने उसका मुँह बंद करने के लिए एक उंगली उसके होंठों पर रख दी। “शांत रह। डेयर मेरी है।”
फिर वे खुद धीरे से नीचे झुके। रुही के नंगे पैर उनके सामने थे—छोटे, गोरे, कोमल। उन्होंने पहले उसके दाएँ पैर को दोनों हाथों में लिया। हल्के से उठाया और उसके अंगूठे पर होंठ रख दिए।
एक लंबा, नरम चुम्बन।
फिर जीभ निकालकर उन्होंने उसके अंगूठे को ऊपर से नीचे तक चाटा। नाखून के किनारे, उंगलियों के बीच… धीरे-धीरे, पूरी तवज्जो से। रुही का शरीर झटके से काँप उठा। वह दोनों हाथों से अपना मुँह दबाए हुए सिसक रही थी।
“रामू जी… मत… बहुत शर्म आ रही है…” उसकी आवाज़ टूट रही थी।
रामू ने जवाब नहीं दिया। वे उसके दूसरे पैर पर चले गए। इस बार उन्होंने पूरा तलवा चाटा—एड़ी से लेकर उंगलियों तक। जीभ की गर्माहट और गीलापन रुही के पैरों पर फैल रहा था। वे कभी उसके पैर की उंगलियों को मुँह में ले लेते, कभी तलवे पर लंबे-लंबे चाटते।
सोनिया और जामिल दोनों चुपचाप देख रहे थे। सोनिया ने धीरे से कहा, “देखो… रामू भाई कितनी श्रद्धा से चाट रहे हैं। जैसे कोई पूजा कर रहे हों।”
जामिल ने जवाब दिया, “बहू के पैर हैं न… भैया के लिए ये भी पूजा ही है।”
रुही की आँखों से आँसू बह रहे थे। शर्म इतनी थी कि वह उनका चेहरा भी नहीं देख पा रही थी। लेकिन शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था—पैर की उंगलियाँ अपने-आप मुड़ रही थीं, साँसें तेज़ थीं।
रामू ने दोनों पैर चूम और चाट लिए। आखिर में उन्होंने रुही के दोनों पैरों को अपनी हथेलियों में लेकर उसके तलवों पर अपना माथा टिका दिया। कुछ सेकंड तक वैसे ही रहे।
फिर सिर उठाया और रुही की आँखों में देखा।
“तेरे पैर भी मेरे हैं,” उन्होंने धीरे लेकिन साफ कहा। “जैसे तेरी चूत है… जैसे तेरा मुँह है… वैसे ही ये कोमल पैर भी।”
रुही कुछ बोल नहीं पाई। बस रोते हुए उनके कंधों से लिपट गई।
गेम जारी था… लेकिन इस डेयर ने एक और परत खोल दी थी—न सिर्फ रुही की शर्म की, बल्कि रामू के मालिकाना समर्पण की भी।

बोतल फिर घूमी। इस बार वह जामिल के सामने रुकी।
रामू ने धीरे से पूछा, “जामिल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
जामिल ने सोनिया की तरफ देखा। सोनिया की आँखों में पहले से ही जान थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “डेयर।”
रुही अभी भी रामू की गोद में दुबकी हुई थी। आँखें लाल थीं, शरीर काँप रहा था। वह जानती थी कि अब जो होने वाला है वह और खुला, और अश्लील होगा।
सोनिया ने खुद ही डेयर दिया, आवाज़ में हल्की सी साँस फूलना था—
“मेरी चूत को… पैंटी के ऊपर से चाट। अच्छी तरह। जब तक मैं मना न करूँ।”
जामिल ने कोई सवाल नहीं किया। उसने सोनिया को सोफे पर थोड़ा पीछे धकेला। सोनिया ने खुद ही अपनी टाँगें फैला दीं। छोटी काली पैंटी के बीच में पहले से ही हल्का सा गीला निशान दिख रहा था।
जामिल उसके बीच में झुक गया। उसने दोनों हाथों से सोनिया की जाँघें पकड़ीं और अपना मुँह उसकी पैंटी पर रख दिया। पहले हल्के चुम्बन। फिर जीभ निकालकर उसने पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत को चाटना शुरू कर दिया—लंबे, धीमे, दबाव वाले चाट। कपड़ा जीभ से चिपक रहा था। सोनिया की कमर तुरंत लचक गई।
“आह्ह… जामिल जी…” सोनिया की आवाज़ निकल गई। उसने जामिल का सिर और अपनी तरफ दबा लिया। “और… ऐसे ही… जोर से चाट…”
जामिल पैंटी के ऊपर से ही उसकी फाँकों को जीभ से दबाने लगा। कभी बीच वाले गीले हिस्से को चूस लेता, कभी पूरी चूत को पैंटी समेत चाटता। कपड़ा और ज्यादा गहरा रंग का हो गया था। सोनिया की सिसकारियाँ अब छुप नहीं रही थीं।
रुही यह सब देख रही थी। उसकी साँसें खुद तेज़ हो गई थीं। मन में ख्याल आया—
सोनिया कितनी आसानी से खुल गई…
पैंटी के ऊपर से ही इतनी कराह रही है…
जामिल की जीभ…
रामू ने रुही के कान में धीरे कहा, “देख। तेरी सहेली कितनी मजे से अपनी चूत चटवा रही है। तू भी कभी ऐसी ही खुल जाएगी मेरे सामने… सबके सामने।”
रुही ने सिर हिलाया। आवाज़ नहीं निकली। बस रामू से और कसकर चिपक गई। उसकी अपनी चूत भी पैंटी में गीली हो रही थी—शर्म के बावजूद।
सोनिया की टाँगें काँप रही थीं। जामिल लगातार चाट रहा था। पैंटी अब पूरी तरह गीली चमक रही थी। सोनिया ने आखिरकार जामिल का सिर पकड़कर कहा—
“बस… अभी काफी है… वरना यहीं भीग जाऊँगी…”
जामिल ने आखिरी एक गहरा चाट लिया और मुँह हटाया। उसके होंठ चमक रहे थे। उसने सोनिया की तरफ देखकर मुस्कुराया।
“स्वादिष्ट,” उसने साफ कहा।
सोनिया साँस लेती हुई हँसी। “रामू भाई… अब आपकी बारी का इंतज़ार है। गेम अभी खत्म नहीं हुआ।”
कमरे में अब सिर्फ साँसें और हल्की सिसकारियाँ बची थीं।
गेम और गहरा होता जा रहा था।
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बोतल फिर घूमी। इस बार वह फिर से रुही के सामने रुकी।
कमरे में एक अजीब सी चुप्पी छा गई। सब जानते थे कि अब बारी गंभीर होने वाली है।
सोनिया ने धीरे से पूछा, “बुलबुल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रुही के होंठ काँपे। उसने रामू की आँखों में देखा। इस बार उनकी आँखों में फैसला पहले से ही लिखा था।
“डेयर…” उसने बहुत कमज़ोर आवाज़ में कहा।
सोनिया ने थोड़ी देर तक उसे देखा, फिर साफ कहा—
“अपनी नाइटी उतार दे। अभी। सबके सामने।”
रुही जैसे बिजली से सही हो गई। आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत सिर हिलाया और दोनों हाथों से अपनी नाइटी के किनारों को कसकर पकड़ लिया।
“नहीं… नहीं… सोनिया प्लीज… ये मत… मैं नहीं उतार सकती… प्लीज डेयर बदल दो…”
उसकी आवाज़ में घबराहट साफ थी। आँसू पहले से ही आँखों में तैर रहे थे।
सोनिया ने सिर हिलाया। “नहीं बुलबुल। डेयर यही है।”
रुही ने फिर रामू की तरफ रुख किया। दोनों हाथ जोड़कर, आवाज़ में गिड़गिड़ाहट भरते हुए बोली—
“रामू जी… प्लीज… आप ही कह दो… डेयर बदलवा दो… मैं सब कर लूँगी… जो कहोगे कर लूँगी… लेकिन नाइटी मत उतरवाओ… प्लीज… बहुत शर्म आ रही है… मैं नहीं कर सकती सबके सामने…”
रामू चुप थे। उनकी निगाहें रुही पर टिकी थीं—सख्त, अटल।
रुही अब लगभग रो रही थी। वह सोनिया और जामिल दोनों की तरफ भी मुड़ी।
“सोनिया… जामिल… प्लीज… डेयर बदल दो न… मैं घुटनों पर बैठ जाती हूँ… जो कहोगे कर लूँगी… लेकिन ये मत… मेरी नाइटी मत उतरवाओ… मैं मना करती हूँ… प्लीज…”
जामिल ने धीरे से सीटी बजाई। “देखो… कितनी गिड़गिड़ा रही है। पहले मूत भी पी लिया, किसी और के लंड को चूमा भी… अब नाइटी पर अड़ गई।”
सोनिया ने रुही के करीब झुककर कहा, “बुलबुल… अब बहुत देर हो चुकी है। तू पहले ही बहुत कुछ कर चुकी है। नाइटी सिर्फ एक कपड़ा है। उतार।”
रुही ने फिर से रामू के पैरों से लिपटते हुए कहा, “रामू जी… आप मेरी सुन लो… एक बार… बस एक बार मेरी बात मान लो… प्लीज… मैं आपकी बहू हूँ… आपकी रंडी हूँ… जो कहो मानूँगी… लेकिन ये डेयर बदल दो…”
उसके आँसू अब लगातार बह रहे थे। शरीर काँप रहा था। दोनों हाथों से नाइटी को इतनी ज़ोर से पकड़े हुए थी जैसे कोई उसे छीन लेगा।
कमरे में तनाव इतना बढ़ गया था कि साँसें भी भारी लग रही थीं।
सबकी निगाहें अब रामू पर थीं—देखने के लिए कि वह अपनी बहू की गिड़गिड़ाहट पर क्या फैसला करते हैं।
रामू नशे में थे। आँखें लाल और भारी थीं। शराब की गंध उनकी साँसों में घुली हुई थी। उन्होंने रुही के बालों में उंगलियाँ फँसाईं और उसका चेहरा अपनी तरफ उठाया।
“उतार,” उन्होंने सीधी, भारी आवाज़ में कहा। “नाइटी उतार। अभी।”
रुही ने सिर हिलाया। आँसू पहले से ही बह रहे थे। “रामू जी… प्लीज… माफ़ कर दो… मैं नहीं कर सकती… बहुत शर्म आ रही है… प्लीज…”
रामू हँसे। नशे में उनकी हँसी और गहरी लग रही थी। उन्होंने रुही की ठुड्डी पकड़ी और सोनिया-जामिल की तरफ इशारा करते हुए कहा—
“ये भी तो देखें… कि मेरा माल कितना चिकना और सेक्सी है। तू क्यों छुपा रही है? उतार।”
रुही ने दोनों हाथों से नाइटी को और कसकर पकड़ लिया। आवाज़ में गिड़गिड़ाहट साफ थी—
“रामू जी… माफ़ कर दो न… मैं सब कर लूँगी… जो कहोगे कर लूँगी… लेकिन नाइटी मत उतरवाओ… प्लीज… मैं नहीं कर सकती सबके सामने… मेरी इज़्ज़त… प्लीज सुन लो…”
रामू ने उसका हाथ नाइटी से हटाने की कोशिश की, लेकिन रुही ने और ज़ोर से पकड़ रखा था। वह लगभग रोते हुए बोली—
“मैं आपकी हूँ… आपकी बहू हूँ… आपकी रंडी हूँ… आप जो कहो मानती हूँ… लेकिन ये मत… माफ़ कर दो रामू जी… एक बार माफ़ कर दो… मैं घुटनों पर बैठ जाती हूँ… आपके पैर पकड़ती हूँ… लेकिन नाइटी मत उतरवाओ…”
सोनिया चुपचाप देख रही थी। जामिल भी कुछ नहीं बोल रहा था। माहौल बहुत तना हुआ था।
रामू ने रुही के गाल पर हल्के से थपकी दी—जोर की नहीं, लेकिन नशे में उनकी सहनशक्ति कम थी।
“इतना नाटक मत कर,” उन्होंने कहा। “तू पहले ही बहुत कुछ कर चुकी है। मूत पी लिया, किसी और के लंड को चूमा… अब नाइटी पर अड़ गई? उतार। मेरा माल सबको दिखना चाहिए।”
रुही अब फफक रही थी। उसने रामू के पैरों से लिपटते हुए कहा—
“माफ़ कर दो… प्लीज माफ़ कर दो… मैं नहीं कर सकती… बहुत शर्म आ रही है… मैं मर जाऊँगी शर्म से… रामू जी… आप ही बचा लो… डेयर बदल दो… कुछ और कह दो… जो कहोगे कर लूँगी… बस ये मत…”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। नशे में उनकी आँखें तेज़ थीं।
“तू मेरी है,” उन्होंने धीरे लेकिन सख्ती से कहा। “तेरा शरीर मेरा है। तेरी शर्म भी मेरी है। अब उतार… या मैं खुद उतारूँगा।”
रुही की साँसें उखड़ रही थीं। आँसू उसके गालों पर बह रहे थे। वह नाइटी को पकड़े हुए काँप रही थी—मना करती हुई, गिड़गिड़ाती हुई, फिर भी उनके सामने घुटनों पर ही।
“माफ़ कर दो रामू जी…” वह बार-बार यही कह रही थी। “माफ़ कर दो… मैं नहीं कर सकती… प्लीज…”
कमरे में सिर्फ उसकी टूटी हुई आवाज़ और रामू की भारी साँसें गूँज रही थीं।
रामू का चेहरा सख्त हो गया। नशे में उनकी आँखें और तेज़ लग रही थीं। उन्होंने रुही के बाल पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया।
“मैंने कहा उतार,” उन्होंने भारी आवाज़ में कहा। “अब और नाटक नहीं।”
रुही अभी भी नाइटी को दोनों हाथों से पकड़े हुए रो रही थी। “रामू जी… प्लीज… माफ़ कर दो… मैं—”
थप्पड़ की आवाज़ कमरे में गूँज गई।
रामू ने उसके गाल पर एक सख्त थप्पड़ मारा। रुही का चेहरा एक तरफ झटक गया। गाल पर तुरंत लाल निशान उभर आया। आँखों से आँसू और तेज़ी से बहने लगे। वह सिसकते हुए उनके पैरों पर गिर गई।
“उतार,” रामू ने दोबारा हुक्म दिया। आवाज़ में अब कोई नरमी नहीं बची थी। “वरना और मारेगा।”
रुही काँपते हाथों से अपनी नाइटी के किनारों को पकड़ा। रोते-रोते उसने उसे ऊपर की तरफ खींचना शुरू किया। नाइटी उसके सिर से निकलकर हाथों में आ गई। उसने उसे एक तरफ गिरा दिया।
अब वह सिर्फ छोटी लाल पैंटी में खड़ी थी। गोरा, चिकना शरीर सबके सामने था—स्तन, कमर, जाँघें। शर्म से वह तुरंत दोनों टाँगें क्रॉस करके खड़ी हो गई। एक हाथ से अपनी छाती छुपाने की कोशिश करती, दूसरे हाथ से नीचे की तरफ। लेकिन छुप नहीं पा रही थी।
वह बस खड़ी-खड़ी रो रही थी। कंधे काँप रहे थे। गाल पर थप्पड़ का निशान चमक रहा था। आँसू उसकी ठुड्डी से होते हुए छाती पर बह रहे थे।
सोनिया और जामिल दोनों चुपचाप देख रहे थे। कोई नहीं हँसा इस बार। माहौल बहुत भारी हो गया था।
रामू ने रुही के सामने खड़े होकर उसके रोते हुए चेहरे को देखा। फिर धीरे से कहा—
“अब दिख रहा है… मेरा माल कितना चिकना है। रो… रो ले। लेकिन खड़ी रह। टाँगें क्रॉस करके मत छुप। सीधी खड़ी हो।”
रुही ने और जोर से सिसकी ली। टाँगें क्रॉस किए हुए, रोते हुए, वह बस वहीं खड़ी रही—शर्म से नंगी, थप्पड़ खाई हुई, और पूरी तरह से उनके हुक्म में।

रुही सिर्फ छोटी लाल पैंटी में खड़ी थी। टाँगें क्रॉस किए हुए, एक हाथ से छाती छुपाने की नाकाम कोशिश करती हुई, दूसरे हाथ से नीचे। गाल पर थप्पड़ का लाल निशान साफ चमक रहा था। आँसू लगातार बह रहे थे। वह सिसक-सिसक कर रो रही थी—शर्म से, डर से, और उस गहरी बेबसी से जो अब उसकी साँस बन चुकी थी।
जामिल की निगाहें रुही के शरीर पर ठहर गईं।
गोरी, चिकनी त्वचा। भारी लेकिन नाज़ुक स्तन। पतली कमर। गोल जाँघें। पैंटी के अंदर छुपी हुई वह जगह जिसे वह सिर्फ कल्पना में देख सकता था। उसके मुँह में पानी आ गया। एक बूँद लार उसके होंठ के कोने से निकलकर ठुड्डी की तरफ बढ़ी। उसने जल्दी से पोंछ लिया, लेकिन आँखें नहीं हटाईं।
रामू भैया कितने किस्मत वाले हैं…
इतनी कोमल कबूतरी को कैसे दबोच रखा है…
रोज़ इसे नचाता होगा। रोता हुआ मुँह देखता होगा। थप्पड़ मारता होगा। और फिर इसे अपनी गोद में भर लेता होगा।
इसका शरीर कितना मुलायम लगेगा हाथ में…
जब यह रोती होगी तो और भी मज़ेदारी लगती होगी।
जामिल के मन में ख्याल आ रहे थे—रुही की टाँगें फैलाकर, उसके आँसू पोंछते हुए, उसके कान में गंदे शब्द कहते हुए। वह निगल गया। उसका लंड अंडरवियर में और तन गया।
रामू खड़े होकर अपनी बहू को देख रहे थे। नशे में भी उनके चेहरे पर एक गहरी, शांत सी गर्व की भावना थी।
यह मेरी है।
मेरी प्रॉपर्टी।
इसे मैंने तोड़ा है। इसे मैंने रंडी बनाया है। इसे मैंने अपने मूत से नहलाया है।
अब सब देख रहे हैं कि मेरा माल कितना चिकना, कितना शर्मसार, कितना आज्ञाकारी है।
रो… रो ले। तेरे आँसू भी मेरे हैं।
उन्होंने रुही के रोते हुए चेहरे को देखा और अंदर ही अंदर संतुष्टि महसूस की। यह उनका कब्ज़ा था—पूरा, बिना किसी हिस्से के।
सोनिया की निगाहें भी रुही पर थीं। वह जामिल की गोद में बैठी हुई, चुपचाप देख रही थी। उसके मन में एक अजीब सा मिश्रण चल रहा था—उत्तेजना, जलन, और एक गहरी कामुक कल्पना।
रामू भाई जैसे भेड़िये ने इस बकरी को कैसे नोचा होगा…
जब पहली बार इसका घूँघट उठाया होगा… जब इसे रोते हुए चोदा होगा…
यह कितनी चीखी होगी। कितनी मना की होगी। और फिर कैसे इसकी टाँगें खुद फैल गई होंगी।
भेड़िया जब बकरी को दबोचता है ना… तो पहले उसके गले में दाँत गाड़ता है। फिर धीरे-धीरे खाता है।
रामू ने भी यही किया होगा। पहले तोड़ा, फिर पाला, फिर अपना बना लिया।
सोनिया ने अनजाने में अपनी जाँघें भींच लीं। जामिल का हाथ उसकी कमर पर था, लेकिन उसकी सोच रुही के नंगे शरीर और रामू की सख्ती पर अटकी हुई थी।
रुही इस पूरे समय बस रो रही थी।
आँसू उसकी छाती पर गिर रहे थे। गाल जल रहा था। शरीर सबके सामने था। वह टाँगें क्रॉस किए हुए खड़ी थी—जितना हो सके खुद को समेटने की कोशिश में। मन में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
सब देख रहे हैं…
मेरा शरीर… मेरे आँसू… मेरी हालत…
मैं अब कुछ भी नहीं बचा पाई…
कमरे में भारी चुप्पी थी।
सिर्फ रुही की सिसकियाँ और चारों के अंदर चल रहे ख्यालों का तनाव।
रामू ने आखिरकार कदम बढ़ाया। उन्होंने रुही के पास जाकर उसका रोता हुआ चेहरा थामा और धीरे से कहा—
“रो ले। लेकिन सिर ऊपर रख। मेरा माल रोते हुए भी सुंदर लगता है।”
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Ekdum lajawab aur dhamaka update
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Bahut badhiya ek umda update
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रुही अभी भी टाँगें क्रॉस किए खड़ी थी। छोटी लाल पैंटी के सिवा कुछ नहीं। गाल पर थप्पड़ का निशान। आँसू छाती पर बह रहे थे। कमरे में चारों जोड़ी निगाहें उस पर टिकी थीं—और सबसे भारी निगाह जामिल की थी।
जामिल का अंडरवियर और तन चुका था। उसके होठों के कोने से फिर लार की एक बूँद बची। वह निगल गया, लेकिन आँखें नहीं हटाईं। मन में वही बात घूम रही थी—
कबूतरी… इतनी कोमल… इतनी रोती हुई…
रामू भैया रोज़ इसे ऐसे ही तोड़ते होंगे।
हाथ लगाने की हिम्मत नहीं… लेकिन देखने से कौन रोक सकता है।
रामू ने जामिल की निगाह पकड़ ली। नशे में भी उनकी आवाज़ साफ और मालिकाना थी।
“देख ले जामिल। जितना मन करे देख। लेकिन हाथ नहीं। ये मेरी प्रॉपर्टी है। मेरी बहू है। सिर्फ मेरी।”
जामिल ने सिर झुकाया। “हाँ भैया। बस देख रहा हूँ… किस्मत आपकी।”
सोनिया ने धीरे से जामिल की जाँघ दबाई, लेकिन बोली रुही से ही—
“देख रुही… तेरे मर्द कितना गर्व से तुझे सबके सामने खड़ा किए हुए हैं। रो… लेकिन सिर नीचे मत कर।”
रुही के अंदर उस पल कुछ और टूटा।
बाहर वह रो रही थी। अंदर आवाज़ें आपस में लड़ रही थीं।
सनी की बीवी… कामत परिवार की रंडी…
नाइटी उतर चुकी। थप्पड़ खा चुका गाल। मूत पी चुका मुँह।
अब ये शरीर सब देख रहे हैं। जामिल की लार टपक रही है। सोनिया मुस्कुरा रही है।
और रामू जी… गर्व से खड़े हैं जैसे उन्होंने कोई इनाम जीत लिया हो।
एक हिस्सा चीख रहा था—भाग, कपड़ा पहन, घर जा।
दूसरा हिस्सा, जो अब ज्यादा भारी था, फुसफुसा रहा था—
भाग कर क्या करेगी? सनी के पास अधूरी थी। यहाँ कम से कम तू पूरी तरह किसी की है।
आँसू और तेज़ बहे। उसने धीरे से, टूटी आवाज़ में कहा—
“रामू जी… मैं… खड़ी नहीं रह सकती अब…”
रामू पास आए। उन्होंने उसे गोद में उठा लिया—जैसे कोई अपनी चीज़ संभाल रहा हो। रुही तुरंत उनके गले से चिपक गई। टाँगें अभी भी सिकुड़ी हुई थीं। रामू उसे सोफे पर ले गए और अपनी गोद में बिठा दिया। उसका नंगा पीठ उनकी छाती से सट गया। पैंटी अभी भी उस पर थी।
“अब यहीं बैठ,” उन्होंने कान में कहा। “रो ले। लेकिन याद रख—तू मेरी है। ये सब देख रहे हैं क्योंकि मैं चाहता हूँ कि देखें।”
जामिल की निगाह फिर रुही की जाँघों और पैंटी पर चली गई। रामू ने उसे घूरते देखा और दोहराया—
“सिर्फ देख। छूने की कोशिश की तो बात खत्म।”
जामिल ने हाथ उठाए। “नहीं भैया। बस देख रहा हूँ।”
सोनिया ने बोतल को फिर घुमाया। बोतल रुही के सामने रुकी।
“बुलबुल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रुही ने रामू की छाती में मुँह छुपाए हुए फुसफुसाया, “डेयर मत… प्लीज… ट्रूथ…”
सोनिया मुस्कुराई। “ठीक। ट्रूथ। साफ-साफ बोल—तेरी चूत अभी कितनी गीली है? और किसकी वजह से?”
रुही का शरीर सख्त हो गया। उसने सिर और अंदर धंसा लिया।
“मत पूछो…”
रामू ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। “पूछ रही है। जवाब दे। मेरी बहू झूठ नहीं बोलेगी।”
रुही की आवाज़ काँपती हुई निकली। आँसू अभी भी बह रहे थे—
“गीली है… बहुत… रामू जी… आपकी वजह से… शर्म से भी… डर से भी… और… आपकी गोद में बैठने से भी…”
सोनिया ने ताली सी बजाई। “वाह। ईमानदार बहू।”
जामिल ने साँस छोड़ते हुए कहा, “भैया, ऐसी बातें सुनकर इंसान का दिल जलता है।”
रामू ने रुही की जाँघ पर हाथ रखा—पैंटी के ऊपर से। उन्होंने सिर्फ हथेली फेरी, अंदर नहीं गए। रुही झटके से सिसक पड़ी।
“देख लिया?” रामू ने जामिल से कहा। “गीली है। मेरे हाथ से। मेरे हुक्म से। मेरी प्रॉपर्टी है ये।”
फिर उन्होंने रुही के कान में धीरे कहा—
“अब एक और सच बोल। तू अभी भी सनी की बीवी सोचना चाहती है… या मेरी बहू?”
रुही देर तक चुप रही। कमरे में सिर्फ उसकी सिसकी थी। फिर उसने आँखें बंद करके, बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“आपकी बहू… रामू जी। बस आपकी।”
रामू की छाती में गर्व की एक भारी साँस उठी। उन्होंने उसके माथे पर चुम्बन लिया—नरम, मालिकाना।
“अच्छी लड़की। अब पैंटी अभी रहने दे। लेकिन याद रख… वो भी कब तक बचेगी, ये मैं तय करूँगा।”
सोनिया ने जामिल से सटते हुए धीरे कहा, “देखा? भेड़िये ने बकरी को पूरी तरह पाल लिया है। अब ये रोएगी भी तो इन्हीं की गोद में।”
रुही कुछ नहीं बोली। सिर्फ रामू से लिपटी रही—शर्म से नंगी, आँसू से भीगी, और पहली बार साफ शब्दों में अपनी पहचान उनके नाम पर छोड़ चुकी।
गेम अभी खत्म नहीं हुआ था। पैंटी अभी बची थी। जामिल अभी देख रहा था। और रामू का हाथ उसकी जाँघ पर अभी भी रखा था—जैसे कह रहा हो: यह सब मेरा है।
बोतल फिर घूमी। इस बार वह जामिल के सामने रुकी।
रामू गोद में रुही को लिए बैठे थे। रुही अभी भी सिर्फ पैंटी में थी, उनका चेहरा उनकी छाती में दुबका हुआ। सोनिया ब्रा-पैंटी में जामिल से सटी बैठी थी।
सोनिया ने मुस्कुराते हुए पूछा, “जामिल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
जामिल ने रामू की तरफ देखा, फिर कहा, “डेयर।”
सोनिया की आँखें चमक उठीं। “तो अपना लंड निकाल। सबको दिखा। खासकर रुही को।”
जामिल बिना हिचकिचाहट के उठा। उसने अंडरवियर नीचे किया। उसका लंड बाहर निकल आया—बहुत मोटा, लंबा, नसों से भरा, पूरी तरह तना हुआ। रामू से साफ बड़ा और भारी लग रहा था। नोक चमक रही थी। कमरे की रोशनी में उसकी मोटाई और ताकत दोनों साफ दिख रही थीं।
सोनिया ने गर्व से कहा, “देखो… मेरा मर्द।”
रुही ने आवाज़ सुनी तो समझ गई कुछ हो रहा है। उसने अपना मुँह और गहराई से रामू की छाती में छुपा लिया। आँखें भींच लीं।
“नहीं… नहीं देखना… रामू जी… प्लीज…”
सोनिया झुकी। “अरे बुलबुल, सिर उठा। देख तो सही। इतना छुपने की क्या बात है? तू बहुत कुछ देख चुकी है आज।”
जामिल हँसा। “भाभी, डर किस बात का? सिर्फ दिखाने की बात है। छूने को नहीं कहा।”
रुही ने सिर और अंदर धंसाया। आवाज़ दबी हुई थी, “मैं नहीं देख सकती… शर्म आती है… डर भी लगता है… प्लीज मत करो…”
रामू ने उसके बाल पकड़े। पहले तो सहलाया, फिर धीरे से सिर पीछे खींचा। रुही की आँखें अभी भी बंद थीं। आँसू पलकें भिगो रहे थे।
“आँखें खोल,” रामू ने सख्ती से कहा। “मैं कह रहा हूँ। देख।”
रुही ने सिर हिलाया। “रामू जी… माफ़ करो… मैं नहीं…”
रामू की आवाज़ और भारी हो गई। “मेरी बहू आँखें बंद करके नहीं बैठती जब मैं देखने को कहूँ। खोल। जामिल की तरफ देख। अभी।”
रुही की साँस अटक गई। वह सिसक रही थी। धीरे-धीरे, काँपती हुई, उसने आँखें खोलीं। पहले रामू को देखा—उनकी आँखों में हुक्म था। फिर उसकी निगाह अनिच्छा से जामिल की तरफ गई।
और वहीं ठहर गई।
जामिल का लंड सामने तना हुआ था—रामू से मोटा, लंबा, और कहीं ज्यादा ताकतवर लगता हुआ। नसें उभरी हुईं। इतना भारी कि रुही की साँस एक पल के लिए रुक गई। वह डर से सिसक पड़ी और तुरंत रामू से और चिपक गई, लेकिन आँखें अब हट नहीं रही थीं।
“रामू जी…” उसकी आवाज़ टूट गई। “यह… यह बहुत बड़ा है… मैं डर गई…”
सोनिया हँसी। “अब दिख गया न? इसलिए मैं चीखती हूँ। तेरा रामू भाई भी कम नहीं… लेकिन मेरा वाला और भारी है।”
जामिल ने अपना लंड जड़ से पकड़कर एक बार ऊपर-नीचे किया। “भाभी डरी क्यों? मैं छू नहीं रहा। सिर्फ देख रही हो। रामू भैया ने कहा न—देखना है तो देखो।”
रामू ने रुही की ठुड्डी थामी ताकि वह मुँह न फेर सके। “देखती रह। डरो मत, लेकिन आँखें मत बंद कर। मैं चाहता हूँ तू देखे। देख कि और मर्दों के भी होते हैं… फिर भी तू सिर्फ मेरी है।”
रुही रोते-रोते देख रही थी। शरीर काँप रहा था। शर्म, डर और एक अजीब सी दबी उत्तेजना सब एक साथ थे। वह फुसफुसाई—
“बहुत मोटा है… रामू जी… मैं… मैं डर रही हूँ… वापस आपकी छाती में जाने दो…”
रामू ने उसका सिर अपनी छाती से नहीं लगने दिया। “थोड़ी देर और देख। फिर छुपना। पहले पूरी तरह देख ले।”
जामिल ने एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया। बस खड़ा रहा, लंड बाहर, रुही की निगाह सहते हुए। सोनिया उसके बगल में बैठी गर्व से देख रही थी।
रुही की आँखों में आँसू थे, लेकिन वह देख रही थी—क्योंकि रामू ने कहा था। सिसकती हुई, डरी हुई, और पूरी तरह उनके हुक्म में।
“अब काफी हुआ,” रामू ने आखिरकार कहा। उन्होंने रुही का चेहरा अपनी छाती में दबा दिया। “छुप जा। तूने देख लिया। अब याद रख—बड़ा हो या मोटा, तू मेरे लंड की है। समझी?”
रुही ने रोते हुए सिर हिलाया। आवाज़ उनकी छाती में दब गई—
“हाँ… रामू जी… सिर्फ आपके…”
जामिल ने अंडरवियर ऊपर खींच लिया, लेकिन उभार अभी भी साफ था। सोनिया ने धीरे से कहा, “गेम अच्छा चल रहा है। बुलबुल अब बहुत कुछ देख चुकी है।”
रुही कुछ नहीं बोली। बस रामू से लिपटी रही—सिसकती, डरी, और उनके हुक्म के आगे एक बार फिर झुकी हुई।

जामिल का लंड उस कमरे में सिर्फ एक शरीर का अंग नहीं रह गया था। वह एक तुलना बन गया था, एक डर बन गया था, और रुही के मन में एक ऐसा चित्र बन गया था जिसे वह देखना नहीं चाहती थी—लेकिन देख चुकी थी।
शरीर के हिसाब से वह रामू से अलग था। रामू का लंड मोटा और सख्त था, मालिकाना था, जैसे वह रुही को कब्ज़े में लेने के लिए बना हो। जामिल का उससे भी मोटा और लंबा था। नसें ज्यादा उभरी हुईं। जड़ से लेकर नोक तक एक भारी, ताकतवर बनावट थी। खड़ा होने पर वह सिर्फ तनता नहीं था, बल्कि वजन और दबाव का अहसास देता था। रुही की निगाह जब उस पर पड़ी तो पहला ख्याल आकार का नहीं, ताकत का था—जैसे वह चीज़ शरीर में उतरे तो जगह बनाए बिना नहीं मानेगी।
रुही के लिए यह देखना शारीरिक से ज्यादा मानसिक झटका था।
वह रामू की गोद में बैठी थी, उनकी बहू कहलवा चुकी थी, उनकी रंडी भी कह चुकी थी। फिर भी किसी और मर्द का इतना बड़ा लंड देखना उसके अंदर दोहरी शर्म पैदा कर गया। एक शर्म यह कि वह देख रही है। दूसरी शर्म यह कि देखकर डर भी लग रहा है, और डर के नीचे एक वर्जित सी उत्सुकता भी। वह चाहती थी आँखें बंद कर ले, लेकिन रामू का हुक्म आँखें खोले रखे था। इसलिए वह सिसकते हुए देखती रही—जैसे कोई सज़ा का दृश्य देख रही हो।
तुलना उसके मन में अपने-आप हो गई, चाहे वह न करना चाहती।
रामू जी का लंड मेरा मालिक है।
जामिल का लंड एक चेतावनी है।
रामू का शरीर उसे तोड़ता है, फिर अपना बनाता है। जामिल का लंड उसे सिर्फ डराता है—क्योंकि वह उसका नहीं है, फिर भी इतना पास है। इसीलिए रुही का डर दोहरा था। छूने का नहीं। देखने का। और देखने के बाद मन में बन जाने वाली तस्वीर का।
सोनिया के चेहरे पर गर्व था। उसके लिए वह लंड उसकी ताकत था, उसकी चीखों का कारण था, उसके रिश्ते का केंद्र था। जामिल के लिए वह दिखावे और पुरुषत्व का प्रमाण था। रामू के लिए वह परीक्षा थी—कि रुही किसी और के बड़े लंड को देखकर भी उनकी छाती में ही लौटे।
और रुही के लिए वह लंड एक सवाल बन गया—
मैं डर क्यों गई?
क्या सिर्फ आकार से?
या इसलिए कि मैं अब इतनी झुक चुकी हूँ कि किसी भी मर्द की मर्दानगी मेरे सामने रखी जा सकती है, और मैं रामू जी की आज्ञा से उसे देखूँगी?
यही विश्लेषण सबसे गहरा था। जामिल का लंड बड़ा था, मोटा था, ताकतवर था। लेकिन कहानी में उसकी असली भूमिका आकार नहीं, रुही की अधीनता की परीक्षा थी। वह देखकर रामू के पास से भागी नहीं। छुपने के लिए वही छाती माँगी, जिसके हुक्म ने उसे देखने पर मजबूर किया था।
इसलिए जामिल का लंड उस रात सिर्फ विशाल नहीं था।
वह रुही के डर, शर्म, तुलना और समर्पण का एक नया दर्पण बन गया था।
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बोतल घूमी। इस बार सोनिया हारी।
रामू ने नशे में भी साफ आवाज़ में कहा, “डेयर मेरी। जामिल का लंड चूस। सबके सामने। अच्छी तरह।”
रुही ने झटके से सिर उठाया। आँखों में घबराहट थी। “नहीं रामू जी… ये मत… कोई और डेयर दे दो… प्लीज… मैं नहीं देख सकती ये…”
रामू ने रुही की कमर दबाई। “तू देखने वाली है। सोनिया करने वाली है। डेयर नहीं बदलेगा।”
सोनिया ने रुही की तरफ देखा। उसके चेहरे पर शर्म कम, स्वीकार ज्यादा था। “बुलबुल, तू क्यों मना कर रही है? डेयर मेरी है।”
फिर वह जामिल के सामने घुटनों पर बैठ गई। जामिल पहले से ही बाहर था—मोटा, तना, भारी। सोनिया ने उसे जड़ से पकड़ा। एक पल उसके चेहरे को निहारा, फिर जीभ निकालकर नोक से चाटा।
“देख,” उसने रुही की तरफ आँखें उठाए बिना ही कहा, “मैं कैसे करती हूँ।”
फिर उसने मुँह खोलकर लंड को अंदर ले लिया। पहले थोड़ा, फिर और गहरा। गाल पिचक गए। लार बहने लगी। वह धीरे-धीरे चूसने लगी—कभी नोक को चूसती, कभी नीचे तक जाने की कोशिश करती। जामिल की साँस भारी हो गई। उसने सोनिया के बाल पकड़ लिए।
“हाँ… ऐसे ही… सोनिया…”
रुही ने मुँह रामू की छाती में छुपा लिया। “रामू जी… मैं नहीं देखना चाहती… प्लीज…”
रामू ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे किया। “आँखें खोल। देख। मैं कह रहा हूँ।”
रुही सिसकते हुए आँखें खोली। उसकी निगाह अनिच्छा से नीचे गई—सोनिया जामिल का मोटा लंड मुँह में लिए हुए थी। लार उसकी ठुड्डी तक बह रही थी। कभी-कभी वह लंड को मुँह से निकालकर चाटती, फिर फिर से अंदर ले लेती। आवाज़ें गीली और गहरी थीं।
रुही की आवाज़ टूट गई, “बहुत… बहुत अश्लील लग रहा है… मैं नहीं देख सकती…”
रामू ने उसकी ठुड्डी थामी। “देखती रह। मेरी बहू आँखें बंद नहीं करेगी। सोनिया तेरी सहेली है। उसका मुँह भर रहा है। तू देख।”
सोनिया ने एक पल मुँह हटाया। लंड उसकी लार से चमक रहा था। वह साँस लेती हुई रुही की तरफ मुड़ी।
“देख रही है न? डर मत। यह सिर्फ मुँह है। तू भी तो रामू भाई का अंडरवियर के ऊपर से चूस चुकी है।”
फिर उसने दोबारा जामिल को मुँह में लिया—इस बार और गहरा। जामिल की कमर हिल गई। “ऊंह… सोनिया… और ले…”
सोनिया लेती गई। आँखें कभी बंद, कभी रुही पर। जैसे जानबूझकर दिखा रही हो कि समर्पण को बिना रोए भी किया जा सकता है।
रुही रो रही थी, लेकिन देख रही थी। रामू का हाथ उसके जबड़े पर था, ताकि वह मुँह न फेर सके। उसके मन में शर्म और एक दबी हुई घबराहट दोनों थीं।
“रामू जी… काफी हो गया न… अब छुपने दो…”
रामू ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर और। जब तक मैं न कहूँ।”
सोनिया चूसती रही—गीली आवाज़ों के साथ, बाल बिखरे, घुटनों पर, पूरी तरह खुली हुई। जामिल का हाथ उसके सिर पर था। कमरा उन आवाज़ों से भर गया।
आखिरकार रामू बोले, “बस।”
सोनिया ने धीरे से मुँह हटाया। होंठ चमक रहे थे। उसने जामिल के लंड को एक आखिरी चाट दिया और उठकर उनकी गोद में चली गई।
रुही ने तुरंत चेहरा रामू की छाती में छुपा लिया। शरीर काँप रहा था।
रामू ने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “देख लिया। अब समझ गई? तू रोती है, सोनिया करती है। फर्क यही है। लेकिन दोनों अपने मर्द की हैं।”
रुही ने सिसकते हुए सिर्फ इतना कहा, “हाँ… रामू जी… मैंने देख लिया… अब और मत दिखाना…”
कमरे में सोनिया की तेज़ साँसें और रुही की दबी सिसकियाँ दोनों एक साथ चल रही थीं।
बोतल फिर घूमी। कमरे में हँसी थम चुकी थी, लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ था। बोतल धीरे-धीरे घूमकर रुही के सामने रुकी।
सोनिया ने तुरंत पूछा, “बुलबुल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रुही रामू की गोद में थी। सिर्फ पैंटी में। उसने जवाब देने की बजाय और अंदर दुबकने की कोशिश की। रामू ने धीरे से उसके बाल सहलाए, लेकिन कुछ नहीं कहा।
रुही ने काँपती आवाज़ में कहा, “डेयर मत दो… प्लीज…”
सोनिया मुस्कुराई। “डेयर ही है। अपनी ब्रा और पैंटी दोनों उतार दे। अभी। सबके सामने।”
रुही जैसे झटके से टूट गई। उसने अपना पूरा चेहरा रामू की छाती में घुसा दिया और फफककर रोने लगी।
“नहीं… नहीं… सोनिया प्लीज… ये मत… मैं नहीं उतार सकती… रामू जी… बचा लो…”
सोनिया हँस पड़ी। जामिल भी हँसने लगा।
“अरे देखो,” सोनिया बोली, “फिर वही नाटक। बुलबुल हर बार रोती है, फिर मान जाती है।”
जामिल ने कहा, “भाभी, अब क्या बचा है छुपाने को? नाइटी तो गई। अब ये दो कपड़े रह गए।”
रुही और जोर से रोने लगी। उसके कंधे काँप रहे थे। आँसू रामू की छाती पर गिर रहे थे।
“मैं नहीं कर सकती… बहुत शर्म आ रही है… पैंटी मत उतरवाओ… ब्रा भी नहीं… प्लीज कोई और डेयर दे दो…”
सोनिया ने ताली सी बजाई। “रामू भाई, अब तो बोलो। आपकी बहू फिर अड़ गई है।”
लेकिन इस बार रामू चुप रहे।
उनका हाथ रुही की पीठ पर था, लेकिन मुँह से एक शब्द नहीं निकला। न हुक्म, न मनाही, न हँसी। बस चुप। उनकी चुप्पी कमरे में हँसी से भी भारी पड़ गई।
रुही उस चुप्पी से और डर गई। वह और तेज़ रोने लगी।
“रामू जी… कुछ बोलो न… प्लीज… आप ही कह दो कि नहीं… आप चुप क्यों हो… मैं डर गई… मैं नहीं उतार सकती… माफ़ कर दो…”
सोनिया ने भौंहें चढ़ाईं। “ओहो, रामू भाई आज गंभीर हो गए। बुलबुल, तेरे मर्द कुछ बोल ही नहीं रहे। मतलब मान गए शायद।”
जामिल हँसा। “या सोच रहे हैं कितनी देर रोएगी।”
रुही ने रामू की छाती में मुँह दबाए हुए बार-बार कहा, “मैं नहीं उतारूँगी… दोनों नहीं… प्लीज रामू जी… आप ही कुछ बोलो… मैं आपकी बात मानूँगी… लेकिन ये डेयर मत होने दो…”
कुछ देर और चुप्पी रही। सिर्फ रुही की सिसकियाँ चलती रहीं। सोनिया की हँसी धीमी पड़ गई। जामिल भी अब देख रहा था कि रामू क्या करते हैं।
फिर रामू बोले। आवाज़ सख्त नहीं थी, लेकिन साफ थी।
“रो मत।”
रुही की सिसकी एकदम थम सी गई, फिर और टूटकर निकली। “रामू जी…”
रामू ने उसका चेहरा छाती से थोड़ा अलग किया। आँखों में नशा था, लेकिन इस बार उतावलापन नहीं था।
“सुन,” उन्होंने कहा। “अगर कच्छी नहीं उतरानी, तो मत उतार। रहने दे।”
रुही ने आँखें खोलीं। आँसू अभी बह रहे थे। जैसे विश्वास न हो।
“सच में…?” उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी।
रामू ने सिर हिलाया। “पैंटी रहने दे। लेकिन ब्रा उतार। इतना कर। बस ब्रा।”
सोनिया ने आवाज़ उठाई, “अरे रामू भाई, डेयर तो दोनों की थी—”
रामू ने सोनिया की तरफ देखा। “डेयर मैंने नरम कर दी। पैंटी नहीं उतरेगी। ब्रा उतरेगी।”
रुही फिर से उनकी छाती में जा छुपी। रोना रुका नहीं, लेकिन अब उसमें थोड़ी राहत भी थी।
“रामू जी… पैंटी रहने दोगे न… प्लीज… सिर्फ ब्रा… मैं… मैं कोशिश करती हूँ…”
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरीं। “रो मत। ब्रा उतार। धीरे-धीरे उतार। मैं यहीं हूँ।”
सोनिया होठ निकाले बैठी रही। “हम्म। भेड़िया आज थोड़ा नरम पड़ गया।”
जामिल ने धीरे कहा, “नरम नहीं। अपनी चीज़ संभाल रहा है।”
रुही काँपते हाथों से अपनी पीठ पीछे ले गई। उंगलियाँ ब्रा के हुक पर थीं, लेकिन रुक गईं। वह फिर रो पड़ी।
“सब देख रहे हैं… मैं नहीं कर पा रही…”
रामू ने उसके कान के पास कहा, “कर पा रही है। पैंटी नहीं उतरेगी। मैंने कहा न। अब ब्रा उतार। मेरी बात मान।”
रुही ने आँखें बंद कीं। सिसकते हुए उसने हुक खोला। ब्रा ढीली हुई। उसने उसे बाँहों से नीचे सरकाया और जल्दी से छाती पर दोनों हाथ रख लिए। ब्रा सोफे के किनारे गिर गई।
अब वह सिर्फ पैंटी में थी, हाथों से स्तन छुपाती हुई, रोती हुई, रामू की गोद में।
सोनिया ने धीरे से कहा, “चलो, आधा तो हुआ।”
रुही ने मुँह रामू से सटाए रखा। “अब और मत… प्लीज… पैंटी रहने दो… आपने कहा था…”
रामू ने उसके हाथ नहीं हटाए। सिर्फ इतना कहा, “हाँ। पैंटी रहेगी। अब शांत हो जा। तूने मेरी बात मानी।”
रुही रोती रही, लेकिन इस बार रोने में एक थकी हुई स्वीकृति भी थी। पूरी नंगी नहीं हुई थी। एक कपड़ा बच गया था। और वही एक कपड़ा उसके लिए उस पल बहुत बड़ा लगा।
रामू का हाथ उसकी पीठ पर था—न तो पूरी सख्ती से, न पूरी ममता से। बस इतना सा कहता हुआ कि फैसला अभी भी उनका ही है।

रुही अभी भी रामू की गोद में रो रही थी। दोनों हाथों से अपने स्तन छुपाए हुए थी। ब्रा सोफे पर गिरी पड़ी थी। छोटी लाल पैंटी के सिवा कुछ नहीं बचा था। गालों पर आँसू चमक रहे थे, कंधे काँप रहे थे। वह साँस भी ठीक से नहीं ले पा रही थी।
सोनिया ने धीरे से कहा, “अब इतना क्या रोना बुलबुल। ब्रा ही तो उतरी है।”
जामिल हँसा। “भाभी, हाथ हटा भी दो। कब तक छुपाओगी।”
रुही ने जवाब नहीं दिया। उसने रामू की छाती में मुँह और दबा लिया। “मत देखो… प्लीज मत देखो…”
रामू का हाथ उसकी पीठ पर था। वे कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक रुही उठ खड़ी हुई।
जैसे कोई चीज़ टूट गई हो उसके अंदर। उसने दोनों हाथों से स्तन और कसकर ढक लिए और बिना एक शब्द कहे बेडरूम की तरफ भागने लगी। उसके नंगे पैर फर्श पर थप-थप की आवाज़ कर रहे थे। पीठ खुली हुई थी। कमर की लकीर, पैंटी की पतली पट्टी, और चिकनी जाँघें भागते हुए साफ दिख रही थीं।
“रुही!” सोनिया चिल्लाई। “कहाँ भाग रही है?”
रुही ने मुड़कर भी नहीं देखा। आवाज़ रोते हुए पीछे छूटी, “मत आना… कोई मत आना… मुझे रहने दो…”
जामिल की निगाह उसके पीछे-पीछे चली गई।
वह भागती हुई गई—हाथों से स्तन दबाए, पैंटी में, बाल बिखरे, आँसू गिराती हुई। जामिल का मुँह थोड़ा खुला रह गया। उसने जीभ होठों पर फेरी। मन के अंदर बातें अपने-आप चलने लगीं।
कितनी चिकनी जाँघें हैं इसकी… भागते हुए और भी गोल लग रही हैं।
हाथों के बीच से भी सीना दब-दब के दिख रहा है। इतना नरम माल रामू भैया रोज़ देखते होंगे।
पैंटी में ये कैसे भाग रही है… शर्म से पागल हो गई है बेचारी।
अगर रुक जाती… हाथ हट जाते… तो पूरा नज़ारा हो जाता।
रामू कितने किस्मत वाले हैं। ऐसी कबूतरी को रोते हुए भी अपनी गोद में रखते हैं।
सोनिया ने जामिल की हालत देख ली। “क्या जीभ फेरे जा रहे हो? तेरी मैडम यहाँ बैठी है।”
जामिल ने मुस्कुराते हुए कहा, “देख रहा हूँ बस। भागती हुई और भी… अलग लग रही है। भैया का माल है, जानता हूँ।”
रामू उठ खड़े हुए। उनका चेहरा गंभीर था। “बैठ जामिल। पीछा नहीं करना।”
फिर उन्होंने बेडरूम की तरफ आवाज़ लगाई, “रुही। छुप मत। मैं आ रहा हूँ।”
अंदर से रुही की दबी सिसकी आई। “रामू जी… मत आइए… मुझे अकेला छोड़ दीजिए… मैं नहीं आ सकती अभी…”
सोनिया सोफे पर पीछे झुकी। “भाग गई बेचारी। अब ब्रा भी छूट गई, हिम्मत भी।”
जामिल ने फिर जीभ होठों पर फेरी। आँखें गलियारे की तरफ ही थीं, जहाँ रुही की चिकनी टाँगों का आखिरी दृश्य गायब हुआ था।
“सच कहूँ भैया,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “ऐसे रोते-भागते हुए तो और भी… मन कर गया। आपकी है, बस देख लिया।”
रामू ने उसकी तरफ तेज़ नज़र से देखा। “देख लिया तो बस। अब और मत बोल। मैं जा रहा हूँ।”
वे बेडरूम की तरफ चल दिए। पीछे सोनिया और जामिल सोफे पर रह गए। जामिल की साँस अभी भी थोड़ी तेज़ थी। उसके मन में वही तस्वीर घूम रही थी—रुही के हाथों में दबे स्तन, भागती चिकनी जाँघें, पैंटी में कसी हुई कमर, और वह रोता हुआ चेहरा जो मुड़कर भी नहीं देखा।
बेडरूम के दरवाज़े तक पहुँचकर रामू ने धीरे से कहा, “रुही, दरवाज़ा खोल। तू भागी इसलिए नहीं कि तुझे छोड़ दूँ। तू भागी इसलिए कि तुझे संभालना है।”
अंदर से सिर्फ रोना सुनाई दिया। और जामिल बाहर बैठा वही दृश्य दोहरा रहा था—रुही का शरीर, रुही की टाँगें, रुही के हाथों के नीचे दबे स्तन—और मुँह पर जीभ फेरता रह गया।
रुही ने दरवाज़ा नहीं खोला।
रामू बाहर खड़े रहे। उन्होंने फिर दस्तक दी। “रुही, खोल। मैं हूँ।”
अंदर से सिर्फ सिसकी आई। “नहीं… नहीं आइए… प्लीज… मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”
इतने में सोनिया गलियारे से आ गई। ब्रा-पैंटी में ही थी, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर हँसी नहीं थी। उसने रामू की बाँह हल्के से छुई।
“रामू भाई, आप जाइए। मैं देखती हूँ।”
रामू ने दरवाज़े की तरफ देखा। “यह मेरी है। मैं—”
“जानती हूँ,” सोनिया ने धीरे कहा। “इसीलिए जाइए। अभी आप गए तो और डरेगी। मैं सहेली हूँ। मुझे अंदर जाने दो।”
रामू कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने दरवाज़े की तरफ आवाज़ दी, “रुही, सोनिया आ रही है। मैं जा रहा हूँ।”
वे भारी कदमों से लौट गए।
सोनिया ने धीरे-धीरे दस्तक दी। एक… दो… तीन।
“रुही? मैं सोनिया हूँ। अकेली हूँ। जामिल नहीं है। रामू भाई भी चले गए। दरवाज़ा खोल।”
अंदर चुप्पी रही। फिर एक टूटी आवाज़ आई, “नहीं… सोनिया… तुम भी मत आओ… मैं ठीक हूँ… जाओ न…”
सोनिया ने माथा दरवाज़े से सटा लिया। “तू ठीक नहीं है। मैंने देखा है। खोल। बस मैं हूँ। कुछ नहीं करूँगी। गेम नहीं है अभी।”
“झूठ बोल रही हो… तुम सब हँस रहे थे…”
“हाँ,” सोनिया ने साफ कहा। “हँसी थी। अब नहीं हँस रही। खोल रुही। प्लीज।”
कुछ देर और सिसकी चलती रही। फिर कुंडी की हल्की आवाज़ हुई। दरवाज़ा दो अंगुल खुला। रुही अंदर अँधेरे में खड़ी थी—दोनों हाथों से स्तन दबाए, आँखें लाल, बाल चेहरे पर चिपके हुए।
सोनिया ने और कुछ कहा नहीं। अंदर घुसी और दरवाज़ा बंद कर दिया।
रुही जैसे ही उसे पास आई देखी, झटके से बिस्तर की तरफ भागी और उल्टा लेट गई। पेट के बल। चेहरा तकिए में धँस गया। दोनों हाथ सिर के दोनों तरफ। पीठ काँप रही थी। पैंटी के अलावा कुछ नहीं था, लेकिन वह शरीर छुपाने की बजाय रोने में डूबी हुई थी।
“मत देखो मुझे… जाओ सोनिया… प्लीज जाओ…”
सोनिया धीरे-धीरे पास गई। बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने हाथ बढ़ाकर रुही के बिखरे बाल पीछे किए।
“इतनी जोर से मत रो। साँस ले।”
रुही ने तकिया और कस लिया। “तुमने भी हँसी थी… सबने देखा… मैं मर जाऊँ… मैं यहाँ क्यों आई…”
सोनिया चुप रही। फिर उसने रुही का चेहरा बहुत प्यार से दोनों हथेलियों में लिया और तकिए से थोड़ा सा घुमाया। रुही की आँखें भीगी थीं, नाक लाल थी, होंठ काँप रहे थे।
सोनिया ने उसके गाल सहलाते हुए धीरे कहा, “मेरी सहेली इतनी नाज़ुक है… मुझे तो पता ही नहीं था।”
रुही सिसक पड़ी। “पता नहीं था… इसलिए चिढ़ाती रही तुम… इसलिए नाइटी उतरवाई… इसलिए सबके सामने…”
“हाँ,” सोनिया ने इंकार नहीं किया। “चिढ़ाया। खेल भी बनाया। लेकिन अभी देख रही हूँ तो लग रहा है तू उतनी मजबूत नहीं जितनी मैं समझती थी।”
रुही की आवाज़ तकिए में दब गई। “मैं मजबूत नहीं हूँ… मैं डर गई… बहुत डर गई…”
सोनिया ने उसके माथे से पसीना और आँसू दोनों पोंछे। “डरना गलत नहीं है। तू भागकर आई, यह भी गलत नहीं। कभी-कभी शरीर से ज्यादा दिल थक जाता है।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। आँसू फिर बह निकले। “सनी को झूठ बोला… रामू जी के आगे सब किया… अब और नहीं हो रहा मुझसे…”
सोनिया उसके चेहरे को थामे रही। अंगूठे से उसकी पलक के नीचे का आँसू पोंछती रही।
“अभी कुछ मत सोच। न सनी, न गेम, न जामिल। बस साँस ले। मैं यहीं हूँ।”
“तुम क्यों आई?” रुही ने सिसकते हुए पूछा। “हँसने?”
“नहीं,” सोनिया ने धीरे कहा। “देखने। कि मेरी सहेली टूट तो नहीं गई।”
रुही कुछ नहीं बोली। बस सुबकती रही। कंधे काँप रहे थे। सोनिया ने उसका सिर अपनी गोद के करीब खींच लिया, बाल सहलाए, गाल थामे रखा।
“रो ले,” उसने फुसफुसाया। “आज जितना मन करे रो ले। कोई डेयर नहीं है इस कमरे में।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। सिर्फ सोनिया के हाथ में अपना रोता हुआ चेहरा दिए सुबकती रही—धीमी, थकी, और बहुत नाज़ुक सिसकियों के साथ।
सोनिया रुही के बाल सहलाती रही। रुही अभी भी उल्टी लेटी थी, चेहरा तकिए में, सिसकियाँ अब थोड़ी धीमी पड़ चुकी थीं लेकिन रुक नहीं रही थीं।
“सुन,” सोनिया ने धीरे कहा। “हम औरतों का शरीर बना ही मर्दों को रिझाने के लिए है। तू इसे इतना छुपा-छुपा के क्यों मार रही है?”
रुही ने तकिए में मुँह दबाए कहा, “इतना आसान नहीं होता सोनिया…”
“आसान नहीं होता, सही है,” सोनिया बोली। “लेकिन सच तो यही है। भगवान ने तुझे इतना सुंदर बनाया है तो दिखाने में क्या हरज़ है? गोरी त्वचा, चिकनी जाँघें, ऐसे बदन… यह छुपाने के लिए नहीं बनाया गया।”
रुही सुबकी। “वहाँ जामिल भी था… मुझे बहुत ह्यूमिलिएशन फील हुई… जैसे मैं कोई चीज़ बन गई…”
सोनिया ने उसका चेहरा थोड़ा सा घुमाया। आँखों में अभी भी आँसू थे।
“जामिल था तो क्या हुआ? वह छू भी नहीं रहा था। देख रहा था। और तू तो अपने मर्द की बाँहों में थी। उसी मर्द ने तुझे नंगी भी देखा है, तेरे अंदर तक अपना लंड भी डाला है, तेरी बच्चेदानी में अपना बीज भी डाला है… तो शर्म कैसी? जो पहले ही तेरा पूरा शरीर जीत चुका है, उसके सामने तू और कितना छुपेगी?”
रुही की पलकें काँपीं। मन में बातें उलझ गईं।
सही कह रही है क्या?
रामू जी ने सब देख लिया है… सब ले लिया है… फिर भी जामिल की निगाह अलग थी।
निगाह भी छूती है… बिना हाथ लगाए भी छूती है।
“वह मेरा मर्द नहीं है,” रुही ने सिसकते हुए कहा। “रामू जी हैं… जामिल नहीं। इसलिए शर्म आई।”
सोनिया मुस्कुराई, लेकिन इस बार हँसी तेज़ नहीं थी। “शर्म आएगी। औरतों के लिए शर्म और ह्यूमिलिएशन तो एक गहना है रुही। गले का हार समझ। इसे दिल पर मत ले। इसे पहन। देखना, इसमें तुझे कितना मज़ा आने लगेगा।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। “मज़ा? रोते हुए मज़ा?”
“शुरू में रोना ही आता है,” सोनिया ने उसके माथे पर हाथ फेरा। “फिर आदत लगती है। फिर पता चलता है कि मर्दों की प्यासी निगाहें भी एक तरह का स्पर्श होती हैं। कोई हाथ नहीं लगाता, फिर भी शरीर गर्म हो जाता है। कोई शब्द नहीं कहता, फिर भी अंदर कुछ पिघलता है। हम औरतों को अपनी बॉडी के मज़े लेने चाहिए। छुपा-छुपा के हम खुद को सज़ा देती हैं।”
रुही चुप हो गई। आँसू बह रहे थे, लेकिन अब वह जवाब नहीं दे रही थी। अंदर आवाज़ें चल रही थीं।
गहना… शर्म को गहना कह रही है।
मैंने शर्म को सज़ा समझा। सोनिया उसे गहना समझती है।
रामू जी की बाँहों में होना सुरक्षित लगता है। जामिल की निगाह में वस्तु लगना डराता है।
लेकिन सोनिया कह रही है—डरा मत, आनंद ले।
क्या आनंद सच में आता है? या सिर्फ यही सीखना पड़ता है कि टूटना ही मज़ा है?
सोनिया उसके कान के पास और धीमे बोली, “तू नाज़ुक है, यह मैं अब समझ गई। लेकिन नाज़ुक होने का मतलब यह नहीं कि तू अपने शरीर से डरे। तू अपने मर्द की है। उसके सामने तू पहले ही खुल चुकी है। बाकी निगाहें सिर्फ साया हैं। साया से भी डरोगी तो जीना मुश्किल हो जाएगा।”
रुही ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मैं डर गई थी… भाग आया… मुझे लगा सब हँस रहे हैं मेरे नंगेपन पर।”
“हँसे भी,” सोनिया ने सच बोला। “लेकिन हँसी हमेशा दुश्मनी नहीं होती। कभी-कभी हँसी इस बात की होती है कि तू खुल रही है। मर्द ऐसी औरत को ही देखते हैं जो थोड़ी टूटती है। तू टूटी, इसलिए जामिल की जीभ होठों पर फिर गई। यह अपमान भी है, और तेरे शरीर की ताकत भी है। दोनों साथ चलते हैं।”
रुही के मन में फिर सवाल उठा।
ताकत? मेरी लाज मेरी ताकत है क्या?
या सोनिया मुझे वही सिखा रही है जो उसे खुद को सही साबित करने के लिए चाहिए?
वह आसान लगती है। मैं रोती हूँ। शायद वह चाहती है मैं भी वैसी हो जाऊँ… तो उसकी राह अकेली न रहे।
वह ये बात मुँह से नहीं बोली। बस चुप हो गई। सिसकी अब लगभग थम चुकी थी। सिर्फ कभी-कभी एक लंबी, काँपती साँस निकल जाती।
सोनिया ने उसके बाल पीछे किए। “अब और मत सोच। पानी से मुँह धो। बाल ठीक कर। थोड़ी देर अकेली रह। फिर बाहर आ जाना। कोई ज़बरदस्ती नहीं कर रहा अभी। बस इतना कर—छुपकर मत मर। बाहर आ। अपने मर्द के पास जा। बाकी बातें बाद में।”
रुही ने आँखें खोलीं। आवाज़ बहुत थकी हुई थी। “सोनिया… तुम जा रही हो?”
“हाँ। तू फ्रेश हो। मैं बाहर हूँ। रामू भाई को कह दूँगी—अभी कुछ मत पूछना। तू आने पर आ जाना।”
वह उठी। दरवाज़े तक जाकर रुक गई। मुड़कर बोली, “रुही, एक बात और। शर्म तेरे गले का गहना बने या तेरी बेड़ी—यह तू तय करेगी। मैंने अपना फैसला बहुत पहले कर लिया। तू अभी सोच। लेकिन सोचते-सोचते खुद को सज़ा मत देना।”
दरवाज़ा धीमे से बंद हुआ।
रुही बिस्तर पर वही उल्टी लेटी रही। कमरा शांत हो गया। सोनिया की बातें उसके कानों में घूम रही थीं—शरीर दिखाने के लिए है, शर्म गहना है, निगाहों का आनंद लो, अपने मर्द ने तो सब देख लिया।
वह उठ नहीं रही थी। न मना कर रही थी। न हाँ कह रही थी।
सिर्फ चुप थी।
और उसी चुप्पी में, आँसू सूखने के बाद भी, सोनिया की आवाज़ उसके मन में बैठे-बैठे काम कर रही थी।

रुही अकेले रह गई तो सबसे पहले एक खालीपन आया। रोना थम चुका था, लेकिन शांति नहीं आई थी। शांति की जगह एक धीमी, भारी उलझन बैठ गई थी—जैसे कमरे में कोई और नहीं, सिर्फ उसके दो हिस्से आमने-सामने खड़े हों।
एक हिस्सा अभी भी पुरानी रुही का था।
वही रुही जो सुबह घर से निकलती थी, जो सनी को “बेबी” कहकर फोन काटती थी, जो ऑफिस में सोनिया से शर्म के साथ सुहागरात की बातें दबाती थी। वह हिस्सा कह रहा था—
तू भागकर सही आई। जामिल की निगाह गलत थी। हँसी गलत थी। शरीर दिखाना मर्दों की भूख नहीं, तेरी इज़्ज़त का सवाल है। सोनिया तुझे हल्की करने नहीं, अपने जैसा बनाने आई है।
दूसरा हिस्सा नया था, और खतरनाक हद तक थका हुआ था।
वह कह रहा था—
इज़्ज़त किसकी बची है अब? नाइटी उतर चुकी। ब्रा उतर चुकी। रामू जी के मुँह से शराब पी चुकी। उनके मूत का स्वाद याद है। तू खुद कह चुकी—कमत परिवार की बहू, कामत परिवार की रंडी। अब किस पवित्रता की रक्षा कर रही है?
यहीं संघर्ष तीखा होता था। क्योंकि दोनों आवाज़ें झूठी नहीं लग रही थीं। पुरानी आवाज़ सही लगती थी। नई आवाज़ सच्ची लगती थी। सही और सच अलग-अलग कमरों में खड़े थे, और रुही दोनों के बीच फर्श पर बैठी थी।
सोनिया की बातें उसके शरीर पर नहीं, उसकी थकान पर काम कर रही थीं।
हम औरतों का शरीर मर्दों को रिझाने के लिए है।
यह वाक्य उसे गुस्सा भी दिलाता था, और एक अजीब सी राहत भी। गुस्सा इसलिए कि वह अपने को इससे बड़ा मानती थी। राहत इसलिए कि अगर शरीर सिर्फ दिखाने की चीज़ है, तो आज की शर्म कोई पाप नहीं, सिर्फ काम है। पाप भारी होता है। काम हल्का लगता है। थकी हुई औरत अक्सर भारी सच नहीं, हल्का झूठ पकड़ती है।
फिर जामिल वाली बात लौटती।
रामू जी की निगाह में कब्ज़ा था। जामिल की निगाह में भूख थी। दोनों निगाहें नंगी थीं, लेकिन दोनों का वजन अलग था। रामू जी की निगाह में वह “मेरी” थी। जामिल की निगाह में वह “माल” थी। रुही इसी फर्क को पकड़े हुए थी जैसे आखिरी किनारा हो।
अगर मैं यह फर्क छोड़ दूँ, तो फिर कोई फर्क बचेगा ही नहीं। फिर कोई भी देख ले, कोई भी हँस ले, कोई भी चाहे।
सोनिया कह रही थी—शर्म गहना है, ह्यूमिलिएशन का आनंद लो।
रुही के लिए शर्म गहना नहीं थी। शर्म आखिरी कपड़ा थी। पैंटी शरीर पर थी, शर्म मन पर थी। एक उतर जाए तो दूसरा भी खिंचने लगता था। इसीलिए वह भागी थी। शरीर से नहीं, उस आखिरी कपड़े को बचाने के लिए।
लेकिन भागने के बाद भी मन नहीं बचा था।
अब अकेलापन उसे और सवाल दे रहा था।
रामू जी चुप क्यों रहे थे जब सोनिया ब्रा-पैंटी दोनों उतरवाने को कह रही थी?
क्या वे मेरी रक्षा कर रहे थे, या देख रहे थे कि मैं कितनी टूटती हूँ?
उन्होंने पैंटी बचा दी। क्या यह प्रेम था? या अगली बार के लिए उधार?
यही सबसे गहरा संघर्ष था—रामू जी को मालिक मान चुकी थी, लेकिन मालिक के नरम पड़ने को भी पूरा भरोसा नहीं दे पा रही थी। भरोसा और डर अब एक ही आदमी से जुड़े थे। जो संभालता है, वही नंगा भी करता है। जो आँसू पोंछता है, वही थप्पड़ भी मारता है। ऐसे मर्द के साथ दिल दो भागों में बँट जाता है: एक हिस्सा झुकना चाहता है, दूसरा हिस्सा पूछता है कि झुकने के बाद तू बचेगी भी या नहीं।
सोनिया का चेहरा भी उसके मन में घूम रहा था। सहेली वाली गर्माहट, और खेल वाली क्रूरता। दोनों सच थे। इसलिए रुही उसे न तो पूरी बुरी कह पा रही थी, न पूरी अपनी। सोनिया ने उसे छुआ था—गाल पकड़कर, नाज़ुक कहकर—और उसी छुए हुए गाल पर वह बातें रख गई थी जो रुही को अपने शरीर से कम शर्मिंदा, अपनी शर्म से ज्यादा थका देना चाहती थीं।
रुही ने धीरे से अपने हाथ देखे। वही हाथ जो स्तन छुपाते भाग आए थे। अब वे खाली थे। छुपाने को कोई कमरा काफी नहीं था, क्योंकि देखने वाले बाहर थे, और सोचने वाला अंदर।
मन का आखिरी सवाल बहुत छोटा था, और सबसे भारी—
मैं बाहर जाऊँ तो किसके पास जाऊँ?
रामू जी के पास, क्योंकि मैं उनकी हूँ?
या अपने पास रहूँ, जबकि अपना अब बहुत कम बचा है?
वह उठकर पानी तक गई, लेकिन मुँह धोते हुए भी जवाब नहीं मिला। आईने में वही चेहरा था—लाल आँखें, गाल पर हल्के निशान, थकी हुई औरत।
आईना कुछ नहीं बोलता था। सोनिया बोल चुकी थी। रामू जी बाहर थे। सनी बहुत दूर था।
रुही की भीतरी लड़ाई इस पल जीत-हार की नहीं रह गई थी। वह अब चुनाव की लड़ाई थी—
शर्म को बेड़ी रखने की,
या उसे गहना मानकर पहन लेने की।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि पहली बार, वह साफ-साफ नहीं जानती थी कि कौन-सा चुनाव उसे बचाएगा… और कौन-सा चुनाव उसे हमेशा के लिए उनकी बहू बना देगा।
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