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Adultery Ruhi a house wife
दोनों मर्द लव सीटों पर बैठे रहे।
रामू जी ने अपनी टाँगें फैला दी थीं, एक हाथ रुही की कमर पर था। जामिल सामने वाली सीट पर बैठा था, लुंगी में आराम से, सोनिया उसके बिल्कुल पास। टीवी ऑन था। कोई पुराना रोमांटिक गाना धीमी आवाज़ में बज रहा था—“तुम ही हो” वाला ट्रैक। कमरे की रोशनी जानबूझकर कम कर दी गई थी। सिर्फ टेबल लैंप और टीवी की हल्की रोशनी थी।
सोनिया उठी। “चल रुही, मर्दों की सेवा कर। आज रात हम दोनों मेहरबान बनकर रहेंगे।”
रुही भी उठी। दोनों किचन में गईं। सोनिया ने फ्रिज से बीयर की बोतलें और व्हिस्की निकाली। प्लेट में नमकीन, बादाम, और कुछ तले हुए स्नैक्स लगाए। रुही ने गिलास निकाले। हाथ काँप रहे थे।
जब दोनों वापस आईं तो सोनिया ने जामिल के सामने गिलास रखा। “बना अपना पेग।”
जामिल ने व्हिस्की डाली, थोड़ा पानी मिलाया। रामू ने भी अपना गिलास लिया। सोनिया ने भी अपने लिए हल्का पेग बना लिया। फिर तीनों ने रुही की तरफ देखा।
सोनिया बोली, “रुही, तू भी ले ले एक। हल्का सा। आज तो मौका है।”
रुही ने सिर हिलाया। “नहीं… मैंने कभी शराब नहीं पी। मुझे नहीं पीनी।”
रामू ने उसकी कमर सहलाते हुए कहा, “एक घूँट ले ले। कुछ नहीं होगा। आज रात तू फ्री है न।”
जामिल भी मुस्कुराया। “भाभी, एक पेग से कुछ नहीं होता। मैडम भी पहले नहीं पीती थीं।”
रुही ने और सिर झुका लिया। “नहीं रामू जी… सच में नहीं। आप लोग पीजिए। मैं स्नैक्स लगाती हूँ।”
तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और हँस दिए। फिर अपने-अपने गिलास उठाने लगे। पहली चुस्की ली। कमरे में शराब की हल्की सी गंध फैल गई। गाना बदल चुका था। अब कोई और धीमा रोमांटिक गाना बज रहा था।
सोनिया ने एक प्लेट स्नैक्स उठाई और जामिल के पास जाकर बैठ गई। उसने अपनी उंगलियों से एक बादाम लिया और जामिल के मुँह के पास ले गई। “खुला मुँह।”
जामिल ने मुँह खोला। सोनिया ने बादाम उसके मुँह में रखा, फिर अपनी उंगली उसके होंठों पर फेर दी। जामिल ने उसकी उंगली हल्के से चूस ली। सोनिया हँसी। “आज तू बहुत भूखा लग रहा है।”
रुही ये देखकर शर्मा गई, लेकिन रामू ने उसे अपनी तरफ खींच लिया। “तू भी आ। मेरे पास बैठ।”
रुही रामू के बिल्कुल पास बैठ गई। रामू ने अपना गिलास एक हाथ में लिया और दूसरे हाथ से रुही को और सटा लिया। रुही ने प्लेट से एक छोटा सा समोसा उठाया और काँपते हाथों से रामू के मुँह तक ले गई।
“खा लो… रामू जी।”
रामू ने समोसा मुँह में लिया, लेकिन रुही की उंगलियों को भी अपने होंठों से छू लिया। फिर धीरे से बोला, “हाथ मत हटा। और खिला।”
रुही की साँसें तेज़ हो गईं। उसने दूसरी चीज़ उठाई और फिर से उनके मुँह में दी। हर बार रामू उसके हाथ को थोड़ा और देर तक अपने होंठों के पास रखते। कभी-कभी उंगली को हल्के से दाँतों से दबा देते।
सामने सोनिया जामिल को खिला रही थी। कभी उसके गाल पर उंगली फेरती, कभी खुद उसके गिलास से एक घूँट ले लेती। जामिल का हाथ सोनिया की जाँघ पर था, नाइटी के अंदर तक।
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर कहा, “देख रुही, ऐसे खिलाती हैं अपने मर्द को। थोड़ा और करीब बैठ। शर्मा मत।”
रुही ने और करीब सरक ली। अब उसका शरीर लगभग रामू की छाती से सट चुका था। रामू ने उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया। एक हाथ से गिलास पी रहे थे, दूसरे हाथ से रुही की पीठ सहला रहे थे।
“तेरी खुशबू बहुत अच्छी आ रही है आज,” रामू ने कान में कहा। “पूरे शरीर पर लगाई है न?”
रुही ने धीरे से सिर हिलाया। “हाँ… आपके लिए।”
थोड़ी देर और बीती। तीनों के गिलास आधे हो चुके थे। माहौल और भी भारी, और भी गर्म हो चला था। गाने की आवाज़ धीमी थी, लेकिन रोमांटिक बोल कमरे में तैर रहे थे।
सोनिया अब जामिल की गोद में लगभग बैठ चुकी थी। जामिल उसके बालों में उंगलियाँ फेर रहा था। सोनिया ने रुही से कहा, “बुलबुल, तू भी अपने रामू की गोद में चली जा। इतनी दूर-दूर क्या बैठी है।”
रुही ने रामू की आँखों में देखा। रामू ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी टाँगें थोड़ी और फैला दीं। रुही धीरे से उनकी गोद में खिसक गई। रामू का एक हाथ उसकी कमर पर आ गया, नाइटी के अंदर। गरम हथेली उसकी नंगी त्वचा पर थी।
रामू ने गिलास से एक घूँट लिया और फिर रुही की तरफ देखा। “आज रात तू बहुत प्यारी लग रही है। इतनी शर्मीली… और इतनी तैयार।”
रुही ने अपना सिर उनकी छाती पर रख दिया। शर्म से उसका चेहरा जल रहा था, लेकिन शरीर उनके स्पर्श की माँग कर रहा था। उसने फिर से एक बादाम उठाया और रामू के मुँह में दिया। इस बार रामू ने उसकी पूरी उंगली मुँह में ले ली और धीरे-धीरे चूसा।
रुही की आँखें बंद हो गईं।
सामने सोनिया और जामिल भी अब एक-दूसरे से सट चुके थे। बातें कम हो गई थीं। सिर्फ हल्की हँसी, गिलासों की आवाज़, और टीवी से आते रोमांटिक गाने।
चारों के बीच एक अजीब सी, कामुक शांति फैल गई थी।
रात अब正式 शुरू होने वाली थी।
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रामू जी ने अचानक रुही का चेहरा दोनों हाथों में ले लिया।
उनकी आँखों में नशा और हवस दोनों थे। उन्होंने रुही के होठों पर अपने होठ रख दिए—पहले हल्के से, फिर जोर से। जीभ अंदर घुस आई। रुही की आँखें बंद हो गईं। वह उनकी जीभ चूसने लगी, जैसे सिखाई गई हो। रामू का एक हाथ उसके बालों में था, दूसरा नाइटी के अंदर उसकी कमर को कसकर पकड़े हुए। चुम्बन लंबा होता जा रहा था, गीला और गहरा।
जब उन्होंने होंठ अलग किए तो रुही की साँसें उखड़ी हुई थीं। रामू ने प्लेट से एक छोटा सा नमकीन टुकड़ा लिया, अपने मुँह में डाला, थोड़ा चबाया… फिर रुही के मुँह के पास ले गए।
“खोल,” उन्होंने धीरे से कहा।
रुही ने होठ खोले। रामू ने आधा चबाया हुआ नमकीन उसकी जीभ पर रख दिया। उनकी उंगलियाँ भी रुही के मुँह में चली गईं। रुही ने शर्माते हुए चबाया, लेकिन रामू की उंगलियों को चूसना नहीं भूली।
सामने वही नज़ारा था।
सोनिया जामिल की गोद में लगभग बैठी हुई थी। जामिल उसका मुँह चूम रहा था, जीभ अंदर तक डाले हुए। फिर उसने भी स्नैक अपने मुँह में लिया और सोनिया के मुँह में दे दिया। सोनिया ने उसकी उंगलियाँ चूसते हुए निगल लिया। दोनों के बीच कोई संकोच नहीं बचा था।
रुही ने आँखें बड़ी करके उनकी तरफ देखा।
सोनिया की आवाज़ बदल चुकी थी। वह जामिल को अब “जामिल जी” कह रही थी। “आप और लीजिए… जामिल जी।” और जामिल उसे “मैडम” की जगह सिर्फ “सोनिया” कह रहा था। “सोनिया, और करीब आ।”
रुही की हैरानी चेहरे पर साफ थी। सोनिया ने उसकी तरफ देखा और हल्के से मुस्कुराई। आवाज़ में नशा था, लेकिन बात साफ थी।
“क्या देख रही है रुही?” सोनिया ने जामिल के होंठों से होंठ अलग करते हुए कहा। “जिस मर्द के नीचे सारी रात लेटना हो… उसके लिए दिल में खुद-ब-खुद प्यार और इज़्ज़त आने लगती है। दिन में मैं इसे जामिल और ‘तुम’ कहती हूँ, ताकि किसी को शक न हो। लेकिन रात को… रात को ये जामिल जी होते हैं। और मैं इनकी सोनिया।”
जामिल ने सोनिया की नाइटी का एक स्ट्रैप नीचे गिरा दिया। “सही कह रही है ये। रात को इज़्ज़त और हवस दोनों साथ चलते हैं।”
रामू ने रुही को और कस लिया। “सुन लिया तूने? तू भी यही है मेरी। दिन में कुछ भी बन… रात को सिर्फ मेरी।”
फिर दोनों मर्दों के हाथ और बेकाबू हो गए।
रामू के बड़े हाथ रुही की नाइटी के अंदर घुस आए। एक हाथ ने उसके स्तन को जोर से मसला, निपल को उंगलियों के बीच दबाया। दूसरा हाथ उसकी जाँघ के अंदर तक चला गया, पैंटी के ऊपर से उसकी चूत को दबाने लगा। रुही की कमर उठ गई। मुँह से हल्की सी सिसकारी निकल गई—“आह्ह… रामू जी…”
सामने जामिल ने सोनिया की नाइटी ऊपर कर दी थी। उसके दोनों हाथ सोनिया के नंगे स्तनों को मसल रहे थे। सोनिया की गर्दन पीछे की तरफ झुक गई। वह जामिल के कान में कराह रही थी—“जामिल जी… धीरे… नहीं… जोर से…”
कमरे में अब सिर्फ गाने की धीमी आवाज़ नहीं रह गई थी।
दोनों औरतों की सिसकारियाँ, कराहें, और मर्दों की भारी साँसें कमरे में गूँजने लगीं। रुही बार-बार अपना मुँह रामू के कंधे में छुपा रही थी, लेकिन सिसकारी रुक नहीं रही थी। हर मसाई के साथ उसका शरीर और संवेदनशील होता जा रहा था।
सोनिया की आवाज़ अधिक खुली थी। वह बिना संकोच के जामिल के हाथों के नीचे कराह रही थी।
चारों के बीच की हवा अब पूरी तरह कामुक हो चुकी थी। शराब, रोमांटिक गाने, और एक-दूसरे के सामने खुलते शरीर… सब कुछ मिलकर रात को एक नई दिशा दे रहा था।
रुही ने आँखें बंद कर लीं। रामू के हाथ उसके शरीर को बुरी तरह मसल रहे थे… और वह बस सिसक रही थी।
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रामू जी अब थोड़े नशे में आ चुके थे। आँखें लाल थीं, साँसें भारी, और हाथों में एक अलग तरह की बेकाबू ताकत।
उन्होंने अचानक रुही का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया। बड़ी-बड़ी हथेलियाँ उसके गालों के दोनों तरफ दब गईं। अंगूठे उसके होठों के कोनों पर थे। धीरे से लेकिन मजबूती से उन्होंने रुही का मुँह खोल दिया।
रुही की आँखें उत्तेजना की वजह से पहले से बंद थीं। वह समझ नहीं पाई कि रामू क्या करने वाले हैं। उसका मुँह खुला रह गया—होठ काँपते हुए, साँसें तेज़।
रामू ने अपना गिलास उठाया। एक बड़ा सा घूँट शराब का भरा। गला भर गया। फिर उन्होंने झुककर अपना मुँह रुही के खुले मुँह पर रख दिया और पूरी शराब उसके मुँह में उड़ेल दी।
गर्म, तीखी शराब सीधे रुही की जीभ पर गिरी। कुछ तो उसके गले के अंदर चली गई, बाकी मुँह में भर गई। रुही को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। उसकी आँखें अचानक खुल गईं। वह घबरा गई। गला जलने लगा। वह खांसने लगी।
“उँह्ह… खांस… खांस…”
ज्यादातर शराब उसके मुँह से बाहर निकलकर सोफे के साइड पर और उसकी नाइटी पर गिर गई। कुछ बूँदें उसकी ठुड्डी से होती हुई गर्दन पर बहने लगीं। रुही खांसते हुए रामू के हाथों से अपना चेहरा छुड़ाने की कोशिश करने लगी, आँखों में पानी आ गया था।
सामने से जोर की हँसी फूटी।
जामिल जोर-जोर से हँस रहा था। सोनिया भी अपना मुँह ढांककर हँस रही थी।
“अरे बाप रे!” सोनिया हँसते हुए बोली, “रामू भाई, ये क्या कर दिया! बेचारी बुलबुल तो घबरा गई!”
जामिल ने ठहाका लगाया, “भैया, धीरे-धीरे सिखाना चाहिए था! पहली बार में ही पूरा घूँट उतार दिया मुँह में!”
रुही अभी भी खांस रही थी। उसने अपना मुँह हाथों से ढक लिया था। गला जल रहा था, आँखों में पानी था, और शर्म से उसका पूरा चेहरा लाल हो चुका था। नाइटी का ऊपरी हिस्सा गीला हो गया था।
रामू भी हँसने लगे। नशे में उनकी हँसी और भारी लग रही थी। उन्होंने रुही के बाल पीछे किए और उसके गीले होठों को अंगूठे से पोछा।
“इतना घबरा क्यों गई?” उन्होंने हँसते हुए कहा, “थोड़ी शराब पी ली तो कुछ नहीं होता। मेरे मुँह से ली न… और भी मीठी लगनी चाहिए थी।”
रुही ने आँखें उठाईं। आवाज़ में खांसी और शर्म दोनों थीं, “रामू जी… आपने… अचानक… मुझे उम्मीद नहीं थी… गला… जल गया…”
सोनिया अभी भी हँस रही थी। “देखा जामिल! पहली बार में ही रामू भाई ने इसे अपनी तरह की शराब पिला दी। अब तो इसकी आदत पड़ जाएगी।”
जामिल ने सोनिया को अपनी तरफ खींचते हुए कहा, “मैडम… अब सोनिया, तू भी तैयार रह। अगली बार मैं भी ऐसा ही करूँगा।”
रुही ने फिर से अपना चेहरा रामू की छाती में छुपा लिया। शरीर अभी भी काँप रहा था—खांसी से, शर्म से, और अंदर ही अंदर एक अजीब सी उत्तेजना से। रामू के मुँह से आई हुई शराब का स्वाद अभी भी उसकी जीभ पर था।
रामू ने उसके बाल सहलाते हुए धीरे कहा, “अगली बार संभल के पीइयो। आज रात और भी बहुत कुछ मेरे मुँह से लेना पड़ेगा तुझे।”
रुही ने कुछ जवाब नहीं दिया। बस उनकी छाती से सटी रही। गला अभी भी हल्का जल रहा था… और दिल जोर-जोर से धधक रहा था।
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रामू जी का तीसरा पेग भी खत्म हो चुका था। नशा अब आँखों में साफ उतर आया था। आवाज़ भारी हो गई थी, हाथों में एक अलग तरह की मर्दाना सख्ती आ गई थी।
उन्होंने फिर से रुही का चेहरा पकड़ा। दोनों हाथों से गाल दबाए और मुँह खोलने की कोशिश की।
“खोल,” उन्होंने कहा।
रुही ने सिर हिलाया। आवाज़ में डर और संकोच दोनों थे, “नहीं रामू जी… प्लीज। गला जल जाता है… एक बार काफी था…”
रामू की आँखें सिकुड़ गईं। नशे में उनकी सहानुभूति कम हो चुकी थी। उन्होंने रुही के चेहरे पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा—जोर का नहीं, लेकिन काफी सख्त था कि रुही की गर्दन झटक गई। गाल पर हल्की लालिमा फैल गई।
फिर उन्होंने बहुत ही मर्दाना, भारी और सख्त आवाज़ में कहा,
“मैंने कहा खोल। ये मेरा हक़ है। तू मेरी है। आज रात तेरा मुँह भी मेरा है। खोल।”
रुही की आँखें भर आईं। वह बेबस हो गई। थप्पड़ की जलन गाल पर थी, और रामू की आवाज़ में वो मालिकाना अंदाज़ था जिससे इंकार करने की हिम्मत नहीं बचती थी। उसने काँपते हुए धीरे-धीरे अपने होठ खोल दिए। आँखें बंद कर लीं। बेचारी की तरह इंतज़ार करने लगी।
रामू ने बड़ा घूँट भरा। फिर अपना मुँह उसके खुले मुँह पर रख दिया और पूरी शराब उसके अंदर उड़ेल दी।
रुही ने इस बार निगलने की कोशिश की। गला फिर जला, आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन उसने बाहर नहीं फेंकी। कुछ बूँदें कोनों से बह निकलीं, बाकी उसने बर्दाश्त कर ली।
रामू ने उसका मुँह नहीं छोड़ा।
“और,” उन्होंने बस इतना कहा।
फिर से घूँट भरा। फिर से रुही के मुँह में डाल दिया।
तीसरी बार। चौथी बार।
हर बार रुही के गाल पर उनकी उंगलियों का दबाव बढ़ता जा रहा था। हर बार वह थोड़ी और काँप रही थी। आँसू उसकी आँखों से लगातार बह रहे थे—शर्म के, जलन के, और एक अजीब सी समर्पण वाली कमजोरी के।
पाँचवी बार जब रामू ने फिर शराब उनके मुँह से उसके मुँह में डाली, तो रुही ने सिर्फ एक हल्की सी सिसकारी निकाली। अब वह विरोध नहीं कर रही थी। बस मुँह खोले हुए, आँखें बंद किए, उनकी दी हुई हर घूँट को निगल रही थी।
सामने सोनिया और जामिल चुपचाप देख रहे थे। सोनिया की साँसें तेज़ थीं। जामिल ने उसके कान में कुछ कहा, लेकिन आवाज़ कमरे तक नहीं पहुँची।
रामू ने आखिरी बार रुही के गीले होठों को अपने अंगूठे से पोछा। उसकी आवाज़ अभी भी सख्त थी, लेकिन उसमें एक मालिकाना संतुष्टि थी।
“अब समझ गई? जब मैं कहूँ, तब खोलना। तेरा मुँह मेरा है।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। गला जल रहा था, होठ काँप रहे थे, और गाल पर थप्पड़ की हल्की जलन बाकी थी। उसने बस धीरे से सिर हिलाया और फुसफुसाई—
“हाँ… रामू जी।”
उसकी आवाज़ में अब सिर्फ समर्पण बचा था। बेबसी और एक गहरी, डूबी हुई स्वीकृति।
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रामू जी का हाथ अभी भी रुही के गाल पर था। थप्पड़ की हल्की जलन बाकी थी। गले में शराब की जलन बाकी थी। लेकिन सबसे ज्यादा जलन अंदर थी—कहीं सीने के पीछे।
रुही की आँखें अभी भी बंद थीं। वह साँस लेने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर साँस के साथ एक अजीब सा घुटन सा महसूस हो रहा था। शरीर रामू के बिल्कुल सटा हुआ था, उनके बड़े हाथ उसकी कमर पर मालिकाना अंदाज़ में रखे हुए थे। बाहर से वह पूरी तरह समर्पित दिख रही थी। अंदर कुछ और चल रहा था।
एक हिस्सा उससे नाराज़ था।
तुमने मना किया था। उन्होंने थप्पड़ मारा। उन्होंने ज़बरदस्ती तुम्हारे मुँह में शराब डाली। बार-बार।
दूसरा हिस्सा… शांत था। लगभग राहत महसूस कर रहा था।
कम से कम फैसला किसी और ने ले लिया। तुम्हें सोचना नहीं पड़ा। बस मानना पड़ा।
यही टेंशन उसे अंदर से फाड़ रही थी।
शर्म थी—सोनिया और जामिल के सामने इतना बेबस होने की।
डर था—कि रामू का नशा और बढ़ेगा, और वो और आगे बढ़ेंगे।
और उसके नीचे, बहुत गहराई में, एक काली सी उत्तेजना थी। जिसने थप्पड़ खाया था, जिसने ज़बरदस्ती मुँह खोला था, वही हिस्सा अब और गीला हो रहा था।
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। “आँखें खोल।”
रुही ने धीरे से आँखें खोलीं। आँसू अभी भी कोनों में थे। वह उनकी आँखों में नहीं देख पा रही थी। नज़र झुकी हुई थी।
“देख मुझे,” रामू ने कहा। आवाज़ में नशा था, लेकिन सख्ती बाकी थी।
रुही ने आँखें उठाईं। एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं। उस एक पल में बहुत कुछ था—मालिकाना हक, थोड़ी सी क्रूरता, और उसके पीछे एक अजीब सा कब्ज़ा। रुही की पुतलियाँ काँपीं। उसने फिर से नज़र झुका ली।
अंदर आवाज़ें चल रही थीं।
तुमने खुद चाहा था दो रात उनके नीचे बिताना।
तुमने खुद कहा था—‘जैसे चाहो’।
अब जब वे ‘जैसे चाहो’ कर रहे हैं, तो सीना क्यों तन रहा है?
लेकिन सीना तन रहा था। आँसू आ रहे थे। और उसी समय जाँघें भींच रही थीं।
सोनिया की हल्की हँसी दूर से सुनाई दी। जामिल कुछ बोल रहा था। लेकिन रुही को उनकी बातें साफ नहीं सुनाई दे रही थीं। पूरा ध्यान अंदर की खिंचाव पर था—समर्पण और विरोध के बीच की वो पतली सी रेखा, जो अब लगभग टूट चुकी थी।
रामू ने उसका सिर अपनी छाती से लगा लिया। हाथ उसके बालों में था। बाहर से ये आलिंगन लग रहा था। अंदर रुही महसूस कर रही थी कि अब भागने की कोई जगह नहीं बची।
दो रात अभी शुरू भी नहीं हुई थीं।
और वह पहले ही हार चुकी थी।
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Fantastic and fascinating writing ✍️
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Pls add hot gif to story
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[Image: grok-1786945562108.jpg]
[Image: grok-1786945737461.jpg]
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It would be great if u add gif in paragraph for each sexual act like u did n starting pages
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Can see it heading towards swap of Ruhi and Sonia. Let it be trap laid for Ruhi by all the other three… will be fantastic; Ruhi getting fucked by Zamil. And she being submissive to Ramu Amd Zamil both; while Sonia films everything
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Bhai please request hai ruhi ko kisi aur se nhi chudwana ye story sirf ruhi aur ramu ke bich rahene ruhi ramu ke bache ke maa bane uske sath humesha ke liye ek chote se se kamre me rahe
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Bahut badhiya update
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बहुत बढ़िया और एकदम शानदार अपडेट!
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wah! bahut hi mast, zabardast aur behad hi exciting story writings!
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बस कमाल है यार!आपकी लिखाई बहुत गर्म और मसालेदार है!
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शराब का हल्का नशा अब रुही पर भी चढ़ने लगा था। सिर थोड़ा घूम रहा था, शरीर में एक अजीब सी गर्माहट फैल रही थी। वह और ज्यादा रामू जी से चिपक गई। उनकी चौड़ी छाती से अपना गाल सटा लिया, एक हाथ उनकी कमर पर रख दिया। नाइटी अब लगभग अर्थहीन हो चुकी थी—सिर्फ पतली पैंटी बची थी।
सामने जामिल और सोनिया की हालत और आगे बढ़ चुकी थी। जामिल ने सोनिया को अपनी गोद में खींच लिया था। दोनों के होठ जुड़े हुए थे—गहरे, गीले चुम्बन। सोनिया की हल्की सिसकारियाँ सुनाई दे रही थीं। जामिल का हाथ उसकी पीठ पर फिसल रहा था।
रुही यह देखकर और शर्मा गई, लेकिन अंदर ही अंदर उत्तेजना भी बढ़ रही थी। उसने अपना चेहरा रामू की छाती में और छुपा लिया।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए हँसते हुए कहा, “देख कितनी शर्मा रही है मेरी बुलबुल। नशा चढ़ा है न? अब और चिपक। छुपने की जगह यही है।”
सोनिया ने चुम्बन तोड़ा। होंठ चमक रहे थे। उसने रुही की तरफ देखा और मुस्कुराई।
“अरे रुही… इतनी लाल क्यों हो गई? हम तो बस चूम रहे हैं। तू तो रामू भाई के मुँह से शराब भी पी चुकी है। अब शर्म किस बात की?”
जामिल भी हँसा। उसकी आवाज़ में मजाक और तंज दोनों थे। “भाभी, सच बताओ… अंदर से कितना गीली हो चुकी हो? शर्माने का नाटक मत करो। हम सब जानते हैं कि तुम यहाँ क्यों हो।”
रुही ने आँखें और बंद कर लीं। आवाज़ बहुत धीमी निकली, “मत बोलो न… बहुत शर्म आ रही है…”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। नशे में उनकी आँखें चमक रही थीं।
“शर्म आ रही है? तू मेरी रखैल है। इनके सामने भी। बोल, तू मेरी क्या है?”
रुही की आँखों में पानी आ गया। उत्तेजना और अपमान दोनों एक साथ। उसने फुसफुसाते हुए कहा, “आपकी… आपकी औरत… आपकी बुलबुल…”
सोनिया ताली बजाते हुए हँसी। “वाह! देख जामिल, कितनी जल्दी मान गई। रुही, तू तो पूरी तरह बिक चुकी है। सनी के घर की बहू होकर किसी ऑटो वाले की रंडी बनी घूम रही है।”
जामिल ने सोनिया को और कस लिया और रुही से बोला, “सही कह रही हैं मैडम। तुम्हारा पति सोच रहा होगा पत्नी गर्ल्स नाइट मनाने गई है… और तुम यहाँ घुटनों के बल बैठने वाली हो अपने यार के सामने।”
रुही का पूरा शरीर काँप रहा था। शर्म से गर्दन तक लाल हो चुकी थी, लेकिन जाँघें अपने-आप भींच रही थीं। वह रामू से और चिपक गई, जैसे छुपना चाहती हो।
रामू ने उसके कान में गरम साँस छोड़ते हुए कहा, “सुन रही है न? ये सब सच बोल रहे हैं। तू मेरी है। इनके सामने भी मैं तुझे अपना समझता हूँ। आज रात तेरी सारी शर्म निकाल दूँगा।”
सोनिया ने फिर से जामिल को चूमते हुए कहा, “रामू भाई, इसे और दबाओ। ये जब शर्माती है ना… तो और मज़ेदार लगती है। रुही, सिर उठा। इतना मत छुप। तू हमारी जैसी ही है… बस थोड़ी ज्यादा बेचारी।”
रुही ने धीरे से सिर उठाया। आँखें नम थीं। उसने रामू की आँखों में देखा और सिर्फ इतना कहा—
“रामू जी… बस करो… मैं… मैं और नहीं सुन सकती…”
लेकिन उसकी आवाज़ में विरोध कम, और समर्पण ज्यादा था। शरीर पूरी तरह उनके सहारे झुक चुका था। नशा, शर्म, उत्तेजना और अपमान—सब मिलकर उसे और गहरे उनकी बाँहों में धकेल रहे थे।
सामने सोनिया और जामिल फिर से एक-दूसरे में खो गए थे। और रुही… रामू की छाती से चिपकी हुई, उनकी हर बात सह रही थी।

रामू जी का नशा अब अच्छी तरह चढ़ चुका था। उन्होंने रुही को अपनी गोद में और खींच लिया। एक हाथ उसकी कमर पर था, दूसरा उसके बालों में। फिर उन्होंने सोनिया और जामिल की तरफ देखा और धीरे-धीरे मुस्कुराए।
“सुनो… पहली बार की बात बताऊँ?” रामू की आवाज़ में नशा और मज़ा दोनों थे। “जब पहली बार मेरा लंड इसकी चूत में घुसा था…”
रुही की आँखें तुरंत बड़ी हो गईं। उसने रामू का मुँह बंद करने की कोशिश की, “रामू जी… नहीं… मत बताओ… प्लीज…”
रामू ने उसका हाथ हटा दिया और हँसते हुए जारी रखा। “अरे सुनने दो इन्हें। पहली बार जब मैंने इसे बिस्तर पर लिटाया और अपना लंड इसकी चूत पर रखा… तो ये काँप रही थी। जैसे ही मैंने अंदर धकेला, ये चीख पड़ी। जोर से। आँखों से आँसू आ गए। दोनों हाथों से मेरी छाती धकेलने लगी और रो-रोकर बिनती करने लगी—‘रामू जी धीरे… प्लीज धीरे करो… दर्द हो रहा है… निकल जाओ…’।”
सोनिया जोर से हँस पड़ी। जामिल भी ठहाका लगा रहा था।
“अरे बाप रे!” सोनिया ने कहा, “बेचारी इतनी नज़ुक थी क्या? चिड़ियाँ जैसी चीख रही होगी।”
जामिल ने सिर हिलाया, “सच में भैया, ये तो बहुत नाज़ुक कली लगती है। बेचारी को तो प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता चोदना चाहिए। जबरदस्ती मत करना।”
रामू ने रुही के गाल पर थपकी दी और बोला, “मैं क्या करूँ? ये सरदारनी का पति… उसका लंड या तो छोटा होगा या कमजोर। वरना इतने सालों में इस हिरनी को अच्छी तरह चीर क्यों नहीं पाया? पहली बार मेरे अंदर जाते ही ये रोने लग गई। इतनी टाइट थी इसकी चूत कि मुझे भी धीरे जाना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे… जब मैं पूरा अंदर तक घुस गया, तो ये खुद अपनी टाँगें और फैलाने लगी।”
रुही का चेहरा शर्म से जल रहा था। आँखों में आँसू थे, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। सिर्फ रामू से और ज्यादा चिपक गई।
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर कहा, “रुही… तू सच में इतनी रोई थी पहली बार? बेचारी। अब तो आदत हो गई होगी न रामू भाई के बड़े वाले की?”
जामिल ने भी तंज कसते हुए कहा, “भाभी, अब तो बताओ… पहले चीखती थी, अब माँगती हो क्या?”
रुही ने आँखें झुकाए हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मत पूछो… बहुत शर्म आ रही है…”
फिर उसने रामू की छाती से अपना गाल सटाया और फुसफुसाई, “रामू जी… अब तो आपने मुझे कामत परिवार की बहू बना दिया है। मैं आपकी हूँ… बस इतना ही कहना है।”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। आँखों में मालिकाना संतुष्टि थी।
“हाँ,” उन्होंने साफ कहा, “कमत परिवार की बहू। मेरी बहू। जो मेरे लंड पर रोई थी, अब उसी लंड की दीवानी है। सुन लिया तुम दोनों ने? ये मेरी है।”
सोनिया ने ताली बजाई। “वाह! बहू बन गई। जामिल, देखो कैसे शर्म से लाल होकर अपने यार से लिपट गई है। बेचारी नज़ुक कली… अब तो पूरी तरह खिल चुकी है रामू भाई के हाथों।”
जामिल हँसते हुए बोला, “सही है भैया। अब इसे संभाल के रखना। इतनी नाज़ुक लगती है… लेकिन अंदर से शायद बहुत प्यासी हो।”
रुही अब पूरी तरह रामू से लिपटी हुई थी। दोनों बाँहें उनकी गर्दन में डाले, चेहरा उनकी छाती में छुपाए। शर्म से उसका शरीर काँप रहा था, लेकिन वह अलग होने की कोशिश नहीं कर रही थी। उल्टे और कसकर चिपक गई थी।
उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—
हाँ… अब मैं कामत परिवार की बहू हूँ।
इनके सामने भी।
और मुझे शर्म आ रही है… लेकिन छोड़ना भी नहीं चाहती।
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बातें चल ही रही थीं कि अचानक रुही के फोन की घंटी बज उठी।
तीखी, तेज़ आवाज़।
रुही के शरीर में जैसे करंट लग गया। उसने झटके से फोन उठाया। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—Sunny।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। हाथ काँप रहे थे। वह जल्दी से फोन को पलटकर सोफे के किनारे की तरफ छुपाने की कोशिश करने लगी, लेकिन रामू की निगाह उससे तेज़ थी।
रामू ने उसका हाथ पकड़ लिया। स्क्रीन उनकी आँखों के सामने आ गई।
“सनी…” उन्होंने धीरे से नाम पढ़ा। फिर मुस्कुराए। नशे में उनकी मुस्कान और खतरनाक लग रही थी। “तेरा चूतिया पति फोन कर रहा है।”
रुही फुसफुसाई, आवाज़ में घबराहट साफ थी, “रामू जी… प्लीज… मत… मैं बाद में बात करती हूँ…”
रामू ने फोन उसके हाथ में ही दबाया और सख्त आवाज़ में कहा, “उठा। अभी। उस चूतिये का फोन उठा और बोल… कि तू अपने यार की गोद में बैठी है।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। “नहीं… रामू जी… प्लीज ऐसा मत कहो… मैं नहीं उठा सकती…”
सोनिया जोर से हँस पड़ी। उसने ताली बजाते हुए कहा, “अरे उठा ले रुही! इतना डर क्यों लग रहा है? बोल दे ना कि तू रामू भाई की गोद में बैठी है। देखें वो क्या कहता है।”
जामिल भी हँस रहा था। “भाभी, हिम्मत करो। एक बार सच बोल दो तो दिल हल्का हो जाएगा।”
रुही का पूरा शरीर काँप रहा था। फोन अभी भी बज रहा था। स्क्रीन बार-बार रोशनी कर रही थी—Sunny Calling… Sunny Calling…
उसके मन में तूफान था।
अगर उठा लिया तो क्या बोलूँगी?
अगर नहीं उठाया तो सनी शक करेगा…
रामू जी देख रहे हैं… सोनिया हँस रही है…
मेरी हालत खराब हो रही है…
आँसू उसकी आँखों में आ गए। उसने रामू की तरफ मदद माँगती हुई निगाहों से देखा। “रामू जी… मैं… मैं नहीं कर सकती ये… बहुत डर लग रहा है… प्लीज आप ही कुछ करो…”
रामू ने उसका चेहरा पकड़ा। आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी।
“मैंने कहा उठा। तू मेरी है। आज रात मेरा हुक्म चलेगा। फोन उठा और बोल—‘मैं अपने यार की गोद में बैठी हूँ’। बस इतना। बाकी मैं देख लूँगा।”
सोनिया ने आग में घी डालते हुए कहा, “हाँ हाँ, बोल दे रुही। ‘सनी, मैं रामू की गोद में हूँ’। कितना मज़ा आएगा। बेचारी बुलबुल अब फँस गई है।”
फोन की घंटी रुकने ही वाली थी। आखिरी घंटी बज रही थी।
रुही की साँसें उखड़ रही थीं। हाथ काँप रहे थे। वह फोन को देख रही थी… फिर रामू को… फिर सोनिया को।
मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
अब क्या करूँ?
उठाऊँ तो सब कुछ खत्म…
न उठाऊँ तो रामू जी नाराज़…
उसने आँखें बंद कर लीं। आँसू उसकी पलकों से बह निकले। फोन अभी भी उसके काँपते हाथ में था… और तीनों जोड़े की निगाहें उस पर टिकी हुई थीं।
रुही ने आँखें बंद कीं… और फोन उठा लिया।
“हेलो…” आवाज़ इतनी काँप रही थी कि खुद को पहचानना मुश्किल था।
दूसरी तरफ सनी की सिंपल, नॉर्मल आवाज़ आई—
“बेबी? क्या कर रही हो? सब ठीक है न?”
और उसी पल रुही के दिमाग में तूफान आ गया।
क्या कर रही हूँ?
कैसे बताऊँ सनी… कि तुम्हारी बेबी को अभी तुम्हारे सामने वाले कमरे में रामू जी ने दबोच रखा है।
तुम्हारी वो बेबी, जो घर में इतनी अकड़ में रहती थी… जो कभी-कभी तुमसे भी ऊँची आवाज़ में बात कर लिया करती थी… वो अभी रामू जी के थप्पड़ खाकर, उनकी गोद में दुबकी हुई बैठी है।
गाल अभी भी हल्का जल रहा है।
और मैं… मैं उनके सीने से चिपकी हूँ।
उसके गले में जैसे कुछ अटक गया।
कैसे बोलूँ कि तुम्हारी बीवी अभी आधी नंगी है… सिर्फ एक छोटी सी पैंटी में… और सामने सोनिया और जामिल बैठे हँस रहे हैं।
कैसे बताऊँ कि थोड़ी देर पहले तुम्हारी बेबी ने रामू जी के मुँह से शराब पी है… बार-बार… क्योंकि उन्होंने कहा था “खोल”।
कैसे कहूँ कि मैंने खुद उनसे कहा था—‘अब आपने मुझे कामत परिवार की बहू बना दिया है’।
आँसू उसकी आँखों में फिर से भर आए। वह रामू की छाती से और कसकर चिपक गई, जैसे कोई उसे वहाँ से खींच ले जाएगा।
सनी… तुम पूछ रहे हो “क्या कर रही हो?”
मैं क्या जवाब दूँ?
कि तुम्हारी बीवी अपने यार की गोद में बैठी है?
कि वो यार अभी मेरे बालों में उंगलियाँ फेर रहा है और मुझे देख रहा है कि मैं तुमसे क्या झूठ बोलती हूँ?
कि सोनिया सामने बैठी है और मुझे आँखें मार रही है?
मन में एक और ख्याल आया, और वह और काँप गई—
अगर मैं सच बोल दूँ… तो सब खत्म।
अगर झूठ बोलूँ… तो रामू जी नाराज़ होंगे। उन्होंने साफ कहा था—बोल दे कि तू अपने यार की गोद में बैठी है।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। फोन कान से चिपका था, लेकिन दिमाग कहीं और था।
मैं वो रुही नहीं रही जो सुबह तुम्हें चाय देकर ऑफिस छोड़ती थी।
मैं वो औरत बन गई हूँ जो थप्पड़ खाने के बाद भी लिपटी रहती है।
जो अपने मर्द के मुँह से गिरी शराब निगल लेती है।
जो लोगों के सामने “कमत परिवार की बहू” कहलवाने में शर्म के साथ-साथ एक अजीब सी शांति भी महसूस करती है।
रामू का हाथ उसकी कमर पर थोड़ा और कस गया। जैसे याद दिला रहा हो—फोन पर हो, लेकिन तू अभी भी मेरी है।
रुही की आँखें बंद थीं। आँसू धीरे-धीरे गालों पर बह रहे थे।
सनी… तुम्हारी बेबी अभी बहुत गिरी हुई है।
और सबसे बड़ी बात…
उसे इस गिरावट में एक अजीब सा सुकून भी मिल रहा है।
फोन के उस पार सनी फिर से बोला, “बेबी? सुन रही हो? कुछ हुआ क्या?”
रुही ने सिर्फ एक लंबी, काँपती साँस भरी।
जवाब अभी भी उसके गले में अटका हुआ था।
सामने सोनिया और जामिल दोनों मुस्कुरा रहे थे। सोनिया ने आँखें मारकर इशारा किया जैसे कह रही हो—“बोल दे”। जामिल भी हल्के से हँस रहा था।
रामू जी ने रुही की कमर पर हाथ और कस दिया। उन्होंने आँखों और सिर के हल्के इशारे से साफ हुक्म दिया—जवाब दे। फोन पर बात कर।
रुही की साँस अटक गई। आँखों में आँसू आ गए। वह रामू की छाती से और चिपकी और मन ही मन सोचा—
मैं अपने रामू जी को इतना समर्पित हो चुकी हूँ… कि ना भी नहीं कह सकती।
फोन के उस पार सनी फिर बोला, “बेबी? सुन रही हो?”
रुही की आवाज़ अब भी गले में अटकी हुई थी। रामू का इशारा उसके सिर पर भारी पड़ रहा था… और वह खुद को मना करने में पूरी तरह असमर्थ पा रही थी।
रुही ने जैसे-तैसे गला साफ किया और जवाब दिया—
“हाँ… सनी, सुन रही हूँ।”
आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी। रामू जी का हाथ उसकी कमर पर मजबूती से टिका था। सोनिया और जामिल दोनों मुस्कुरा रहे थे। सोनिया ने होंठ दबाकर हँसी रोकने की कोशिश की, लेकिन आँखें चमक रही थीं।
सनी ने पूछा, “कहाँ हो अभी?”
रुही ने एक पल की हिचकिचाहट के बाद कहा, “सोनिया के घर… हाँ, यहीं हूँ।”
सामने सोनिया ने आँखें मारकर धीरे से जामिल से कुछ बुदबुदाया। जामिल भी हल्के से हँसा और उसके कान में कुछ कहा। रुही को साफ तो नहीं सुनाई दिया, लेकिन लहजा मजाकिया था।
सनी फिर बोला, “गर्ल्स नाइट कैसी चल रही है? मज़े कर रही हो न?”
रुही की नज़र रामू पर गई। उन्होंने सिर के हल्के इशारे से कहा—बोल।
उसने झूठ को जितना सामान्य बना सके, उतना बनाया—
“हाँ… मार्केट गए थे थोड़ी देर। खूब मज़े किए… शॉपिंग वगैरह। अब बस घर आकर खाना खा रहे हैं। आराम कर रहे हैं।”
बोलते हुए उसका गला सूख रहा था। रामू जी का हाथ धीरे-धीरे उसकी पीठ सहला रहा था—जैसे इनाम दे रहा हो कि उसने झूठ बोल लिया। सोनिया ने मुँह के पीछे हल्की सी हँसी दबाई। जामिल ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो “शाबाश”।
रुही के मन में शर्म की लहर दौड़ गई।
मैं झूठ बोल रही हूँ… और ये तीनों सुनकर मुस्कुरा रहे हैं।
मेरी आवाज़ में कम्पन है… सनी को पता चल जाएगा क्या?
रामू जी का हाथ मेरी कमर पर है… और मैं उनके सहारे बैठकर अपने पति से झूठ बोल रही हूँ।
सनी ने कुछ और पूछा, “अच्छा… बहुत देर तक जागना है क्या? कल सुबह मैं थोड़ा लेट उठूँगा शायद।”
रुही ने जल्दी से जवाब दिया, “नहीं… जल्दी सो जाएँगे। तू आराम से रह… मैं ठीक हूँ।”
उसने बात खत्म करने की कोशिश की। आवाज़ में थकान और घबराहट दोनों थीं।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कान के पास कहा, “अच्छा बोली। शाबाश।”
सोनिया ने जामिल से फिर कुछ बुदबुदाया। इस बार रुही को थोड़ा सुनाई दिया—“देखा… कैसे संभाल लिया बेचारी ने।” जामिल हल्के से हँसा।
रुही ने फोन कान से हटाया नहीं था, लेकिन उसकी निगाहें रामू के चेहरे पर थीं। अंदर शर्म, डर, और एक अजीब सी समर्पण वाली राहत एक साथ चल रही थी।
उसने मन ही मन सोचा—
मैं झूठ बोल पाई… क्योंकि रामू जी चाह रहे थे।
और यही बात मुझे सबसे ज्यादा शर्मिंदा कर रही है… और सबसे ज्यादा बाँध भी रही है।
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रुही और सनी की बात थोड़ी और चली।
सनी ने पूछा, “खाना क्या बना है वहाँ? ज्यादा लेट तो नहीं करना?”
रुही ने जितना सामान्य हो सका, उतना जवाब दिया, “नहीं… सादा सा खाना है। जल्दी सो जाएँगे। तू फिकर मत कर… मैं बिलकुल ठीक हूँ।”
सनी कुछ और पूछने ही वाला था कि अचानक सोनिया उठ खड़ी हुई। उसने मुस्कुराते हुए रुही का फोन ले लिया।
“दे मेरे हाथ में,” उसने धीरे से कहा। रुही ने विरोध नहीं किया। शर्म से उसका चेहरा पहले से ही लाल था।
सोनिया ने फोन कान पर रखा और बहुत ही मीठी, नॉर्मल आवाज़ में बोली—
“हेलो सनी! मैं सोनिया बोल रही हूँ। रुही थोड़ी थक गई है ना, इसलिए मैं ले ली फोन।”
सनी की आवाज़ आई, “हाँ सोनिया, सब ठीक है न? रुही मज़े में है?”
सोनिया ने रुही की तरफ देखा। आँखों में शरारत थी। वह मुस्कुराते हुए बोली—
“हाँ-हाँ, बिल्कुल मज़े में है। तुम फिकर मत करो। रुही सही जगह पर बैठी है… अपने मनपसंद बिस्तर पर।” उसने जानबूझकर जोर दिया। “समझे? बहुत सुरक्षित हाथों में है वो।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने सोनिया का हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन सोनिया हल्के से हट गई। रामू और जामिल दोनों धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे।
सनी ने कुछ पूछा, “सुरक्षित हाथों में? मतलब?”
सोनिया ने हल्की सी हँसी के साथ जवाब दिया, “अरे बस यूँ ही कहा। हम दोनों आराम से हैं। रुही को यहाँ बहुत सुकून मिल रहा है। तुम बिज़नेस पर ध्यान दो… तुम्हारी बीवी अच्छे हाथों में है।”
फिर सनी ने कुछ और कहा। सोनिया ने फिर डबल मीनिंग में जवाब दिया—
“हाँ, बहुत अच्छे से देख-भाल हो रही है उसकी। जो चाहिए वो मिल रहा है। तुम बिल्कुल टेंशन मत लो। रात अच्छी बीतेगी यहाँ।”
रुही अब पूरी तरह शर्म से पानी-पानी हो चुकी थी। उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और रामू की छाती में दुबक गई। उसका शरीर काँप रहा था।
सोनिया क्या-क्या बोल रही है…
सनी को कितना समझ आ रहा होगा…
मैं यहाँ बैठी हूँ और ये मेरे पति से ऐसे बातें कर रही है…
सोनिया अभी भी फोन पर थी। आवाज़ में हल्की शरारती मुस्कान साफ झलक रही थी।
“हाँ सनी, ठीक है। मैं रुही को दे देती हूँ। तुम आराम से रहना। बाई।”
उसने फोन रुही की तरफ बढ़ाया, लेकिन रुही ने सिर हिलाया। वह अभी बात करने की स्थिति में नहीं थी। सोनिया ने खुद ही फोन काट दिया।
कमरे में हल्की सी चुप्पी छा गई। फिर सोनिया हँस पड़ी।
“क्या हुआ रुही? इतना शर्म क्यों कर रही है? मैंने तो कुछ गलत नहीं कहा। सब सच ही तो बोला… तू सही जगह पर है, मनपसंद बिस्तर पर, सुरक्षित हाथों में।”
रामू ने रुही के बाल सहलाते हुए कहा, “देखा? तेरी सहेली कितनी अच्छी है। तेरे पति को भी तसल्ली दे दी।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। शर्म से उसका बुरा हाल था। वह सिर्फ रामू से और ज्यादा चिपक गई। आवाज़ में रोना तैर रहा था—
“बहुत बुरा लगा… इतना मत करो न…”
लेकिन कोई नहीं रुका। माहौल में शर्म, उत्तेजना और एक अजीब सी खुली हुई बेबाकी फैल चुकी थी।
रुही का शर्म से बुरा हाल था।
चेहरा गर्दन तक लाल हो चुका था। आँखों में पानी तैर रहा था। वह धीरे से रामू की गोद से उठ खड़ी हुई। टाँगें थोड़ी काँप रही थीं। उसने दोनों हाथों से अपनी पतली पैंटी को थोड़ा ठीक किया और नज़रें फर्श पर गड़ा दीं।
सोनिया ने तुरंत पूछा, “क्या हुआ रुही? इधर-उधर क्यों देख रही है?”
रुही ने और नीचे मुँह किया। आवाज़ बहुत धीमी और शर्माई हुई निकली—
“मैं… मुझे… शू-शू जाना है…”
जैसे ही उसने यह कहा, कमरे में हँसी फूट पड़ी।
सोनिया जोर से हँसने लगी। जामिल भी ठहाका लगा रहा था। रामू ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
जामिल ने हँसते हुए कहा, “रामू भाई, जाओ… बेचारी को पेशाब करवा के ले आओ। अकेली से नहीं होगा शायद।”
रामू ने रुही की तरफ देखा। आँखों में नशा और मज़ाक दोनों थे। उन्होंने धीरे से कहा—
“मैं बेचारी के नीचे उंगली देकर पेशाब करवाऊँ क्या?”
सोनिया और जोर से हँसी। उसने ताली बजाते हुए कहा, “हाँ हाँ! बेचारी इतनी नाज़ुक कली होगी कि पेशाब भी खुद से नहीं निकलता होगा। रामू भाई, मदद कर दो इसकी!”
तीनों की हँसी से पूरा कमरा गूँज रहा था।
रुही की हालत और खराब हो गई। शर्म से उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और दोबारा रामू से जाकर लिपट गई। उनकी छाती में मुँह छुपा लिया। शरीर काँप रहा था।
“मत हँसो… प्लीज…” उसकी आवाज़ में रोना तैर रहा था।
रामू ने उसकी कमर पकड़ी और एक झटके में उसे गोद में उठा लिया। रुही ने डर और शर्म से उनके गले में दोनों बाँहें डाल दीं और कसकर चिपक गई। उसका चेहरा उनकी गर्दन में छुपा था।
रामू ने हँसते हुए कहा, “चल… तेरे को मूत करवा लाता हूँ। इतनी शर्मा मत। सब देख रहे हैं तो क्या हुआ।”
सोनिया पीछे से चिल्लाती हुई बोली, “रामू भाई, संभाल के ले जाना! बेचारी का हाथ छोड़ मत देना… कहीं गिर न जाए!”
जामिल ने भी कहा, “हाँ भैया, नाज़ुक कली है। संभल के।”
रामू रुही को गोद में उठाए हुए बाथरूम की तरफ चल पड़े। रुही उनके गले से चिपकी हुई थी। आँखें बंद थीं। शर्म के मारे वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। हर कदम के साथ सोनिया और जामिल की हँसी पीछे सुनाई दे रही थी।
रामू ने उसके कान में धीरे कहा, “इतना मत शरमा। मैं हूँ न। मूत भी मैं ही करवाऊँगा तुझे।”
रुही ने और कसकर उनके गले में मुँह छुपा लिया। अब वह सिर्फ उनकी बाँहों में थी… और बाथरूम का दरवाज़ा करीब आ रहा था।
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Please don't let Salim fuck Ruhi
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(18-08-2026, 06:56 PM)Invisible Wrote: Please don't let Salim fuck Ruhi

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