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लंच ब्रेक की घंटी बजते ही सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“चल… साइड में। आज पूरा पूछूँगी।”
वो मुझे स्टाफ रूम के पीछे वाली छोटी सी बालकनी में ले गई, जहाँ आमतौर पर कोई नहीं आता। दरवाज़ा बंद किया, फिर मेरे सामने खड़ी हो गई। आँखों में शरारत थी।
“अब बोल रुही… सुबह तो आधा-अधूरा बताया। अब बता… जब रामू जी का वो मोटा लंड पहली बार तेरी चूत में घुसा था, तब सच में क्या महसूस हुआ?”
मैंने दीवार की तरफ पीठ टिका ली। गाल पहले से ही लाल थे। आँखें झुकाईं।
“सोनिया… मत ले नाम… बहुत शर्म आती है।”
“क्यों शर्म? रामू जी का लंड ना लूँ क्या?” उसने हँसते हुए मेरा ठुड्डी उठाया। “बोल… कैसा लगा जब उन्होंने अपना मोटा, काला, नसों वाला लंड तेरे टाइट छेद में धकेला?”
मेरी साँस अटक गई। याद आते ही जाँघों के बीच गर्मी फैल गई।
“बहुत… बहुत मोटा था सोनिया। पहली बार लगा जैसे कुछ फट जाएगा। दर्द हुआ… लेकिन साथ में एक अजीब सी मिठास भी। उन्होंने धीरे-धीरे पूरा अंदर तक डाल दिया… और जब उनकी झांट मेरी झांट से छुई तो… मैं काँप उठी। उनके बड़े हाथ मेरी कमर पकड़े हुए थे… इतनी मजबूती से कि मैं हिल भी नहीं पा रही थी।”
सोनिया ने और करीब आकर फुसफुसाया, “और जब उन्होंने हिले? तेज-तेज?”
मैंने आँखें बंद कर लीं। आवाज काँप रही थी।
“जब तेज किया… तो मेरी चीखें निकलने लगीं। ‘आह्ह… रामू जी… धीरे…’ लेकिन वो नहीं माने। हर धक्के के साथ उनका लंड इतना गहरा जा रहा था कि मुझे लग रहा था मेरी कोख में समा जाएगा। मैं उनकी छाती पर नाखून गाड़ रही थी… और खुद बोल रही थी, ‘और जोर से… और अंदर…’”
सोनिया हँसी। “देखा! तू खुद माँग रही थी रामू जी का लंड। और जब उन्होंने तुझे ऊपर बैठाया?”
“जब ऊपर बैठाया… तो उनका लंड पूरा अंदर था। मैं उनकी गोद में बैठी हिल रही थी… और वो मेरे स्तन चूस रहे थे। इतनी जोर से चूस रहे थे कि निपल सूज गए थे। मैं उनकी गर्दन में मुँह छुपाए कराह रही थी। उस पल… सच में लगा कि मैं सिर्फ उनकी हूँ।”
सोनिया ने मेरा बाल पीछे किया और धीरे से बोली, “रुही सिंह… या अब रुही कामत?”
मेरी आँखें भर आईं। गला बैठ गया।
“सोनिया… हाँ। मैं… मैं रुही सिंह से रुही कामत बन गई हूँ दिल से। सनी का सिर्फ नाम है। लेकिन दिल… पूरा दिल रामू जी का हो चुका है। उनके बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी, उनका वो मोटा लंड… सब कुछ। मैं… मैं उनसे प्यार करने लगी हूँ। सच्चा प्यार।”
सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। “प्यार? या सिर्फ उनकी चोदने की आदत?”
मैंने सिर उठाया। आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज में सच्चाई।
“प्यार सोनिया। जब वो मुझे दुल्हन बनाकर चोदते हैं… जब मेरे चरण चूमने को कहते हैं… जब मेरे बाल सहलाते हुए बोलते हैं ‘मेरी औरत’… तो लगता है जैसे मेरी पूरी जिंदगी उन्हीं के लिए है। मैं… मैं जीवन भर उनकी सेवा करना चाहती हूँ। उनके पैर दबाना, उनका खाना बनाना, रात को उनकी लंड चूसना, जितनी बार चाहें चोदने देना… सब। मैं उनकी रखैल सही… लेकिन दिल से उनकी पत्नी बनना चाहती हूँ।”
सोनिया कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से मुस्कुराई। आवाज में मजाक भी था, थोड़ी सी जलन भी।
“वाह रुही कामत… रामू जी की पूरी रंडी बनने वाली हो। उनके मोटे लंड की गुलाम। बता… क्या-क्या सेवा करेगी तू?”
मैं शर्म से और लाल हो गई, लेकिन अब रोक नहीं पा रही थी।
“सब कुछ। सुबह उठकर उनके पैर छूना… उनका लंड मुँह में लेकर जगाना। दिन में जितनी बार बोलें, साड़ी उठाकर खड़ी-खड़ी चोदने देना। रात को उनके नीचे लेटना… या ऊपर बैठना… या कुत्ते की तरह… जो भी वो चाहें। उनके थूक पीना, उनके वीर्य को निगलना… सब। मैं… मैं उनकी हूँ सोनिया। पूरी तरह।”
सोनिया ने मेरी कमर पर हाथ रखा और कान में फुसफुसाया, “और अगर रामू जी तुझे किसी और के साथ चोदने को कहें? या किसी के सामने?”
मेरी साँस रुक गई। दिल जोर से धड़का।
“तो… तो चोदूँगी। क्योंकि मैं उनकी हूँ। उनकी इच्छा ही मेरी इच्छा है अब।”
सोनिया ने मेरा गाल सहलाया। “पागल हो गई तू रामू जी के लंड पर। चल… लंच कर ले। वरना लोग ढूँढेंगे। लेकिन शाम को जब वो लेने आए… तो मुझे मैसेज करना। और कल… और डिटेल सुननी है। खासकर जब तू उनके चरण चूम रही थी।”
मैंने सिर झुकाया। बाल चेहरे पर गिर गए।
“ठीक है… लेकिन इतना मत छेड़ सोनिया। दिल से शर्म आती है… और… और बहुत मजा भी।”
हम दोनों अंदर की तरफ मुड़ीं। मेरे कदम भारी थे। मन में सिर्फ एक ही चेहरा घूम रहा था—रामू जी का। उनकी दाढ़ी, उनके बड़े हाथ, और वो मोटा लंड जो अब मेरी जिंदगी का केंद्र बन चुका था।
रुही सिंह खत्म हो चुकी थी।
अब सिर्फ रुही कामत बची थी… रामू जी की।
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Superb…. Keep up the heat and Ruhi’s submission. Waiting for Ramu’s dirty ugly friends to tease Ruhi to the limit and then fuck her….
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Ruhi ramu ke bache maa bane uske sath humesha ke liye ramu ke sath sttle ho jaye in dono ke bich me koi aur ke na lao please request hai
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शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे। ऑफिस के गेट के बाहर रामू जी का ऑटो खड़ा था। उन्होंने शीशा घुमाया, मुझे देखा और धीरे से मुस्कुराए। दाढ़ी में वो ही शरारती मुस्कान तैर रही थी, आँखों में भूख।
मैं जल्दी-जल्दी गेट से निकली ही थी कि फोन बज उठा। सनी का नाम चमक रहा था। दिल बैठ गया, लेकिन फोन उठा लिया।
“हेलो…”
सनी की आवाज़ आई, “रुही, आज लेट हो जाऊँगा। क्लाइंट के साथ डिनर करना है। तुम घर चली जाना, खाना खा लेना। रात को ग्यारह-बारह बजे तक पहुँचूँगा।”
मैंने धीरे से कहा, “ठीक है…” और फोन काट दिया।
रामू जी ने ऑटो का दरवाज़ा खोला। मैं अंदर बैठते ही उनके करीब झुकी और फुसफुसाई, “सनी लेट आएगा… क्लाइंट के साथ डिनर है। रामू जी… चलो। मुझे मेरे असली ससुराल ले चलो। आपके उस छोटे से प्यारे से कमरे में।”
रामू जी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने तंबाकू का पान मुँह में दबाया, हल्के से हँसे और ऑटो स्टार्ट कर दी।
“चल… मेरी दुल्हन। आज पूरी रात मेरी है।”
ऑटो बस्ती की तरफ मुड़ गई। जैसे-जैसे गली संकरी होती गई, आसपास के लोग नज़र आने लगे। चाय की दुकान पर बैठे दो-तीन लड़के, पान की दुकान वाला, सब्जी बेचने वाला बूढ़ा… सबकी नज़रें ऑटो पर ठहर गईं।
एक लड़का जोर से बोला, “अरे देखो तो! रामू भैया आज फिर अपनी मेमसाहेब लाए हैं। कितनी गोरी है रे!”
दूसरा लड़का हँसा, “भैया की तो लॉटरी लग गई यार। इतनी माल को लेकर बस्ती में घूम रहा है!”
पान की दुकान वाले ने पान ठोकते हुए कहा, “रामू, आज रात लंबी करने का प्लान है क्या? कमरा तो छोटा है, लेकिन काम बड़ा होगा!”
मैं शर्म से पूरी लाल हो गई। साड़ी का पल्लू चेहरे पर खींच लिया, आँखें झुका लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। रामू जी शीशे में से मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।
“शर्म क्यों कर रही है?” उन्होंने धीरे से पूछा। “ये सब जानते हैं कि तू मेरी है।”
मैंने और पल्लू खींच लिया। “रामू जी… चुप करो… सब सुन रहे हैं।”
ऑटो एक संकरी गली में घुसी। दोनों तरफ कच्चे मकान, खुली नालियाँ, बच्चों का शोर। रामू जी का छोटा सा कमरा गली के आखिर में था। ऑटो रोकते ही आसपास के दो-तीन और लड़के इकट्ठे हो गए।
एक ने सीटी बजाई, “वाह भाभी! आज तो पूरा जेवर पहन के आई हो। रामू भैया की दुल्हन लग रही हो!”
दूसरे ने कहा, “भैया, आज हमें भी चाय पिला दो ना! इतनी प्यारी भाभी लाए हो तो…”
मैं ऑटो से उतरते ही और लाल हो गई। पैर काँप रहे थे। रामू जी ने मेरा हाथ पकड़ा, बड़े हाथ से कसकर।
“हट जाओ सब। आज मेरी औरत है। कल बात करना।” उन्होंने हँसते हुए कहा और मुझे अपने पीछे कर लिया।
कमरे का दरवाज़ा खोला। अंदर वही छोटा सा कमरा—एक चारपाई, एक खिड़की जिस पर फटी सी पर्दा लटकी थी, एक छोटी सी अलमारी, और कोने में पानी का मटका। हवा में तंबाकू और पुराने कपड़ों की हल्की सी गंध।
रामू जी ने दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई। फिर मुड़कर मुझे घूरा। आँखों में वो भूख थी जो मुझे हर बार कमजोर कर देती है।
“आज सनी लेट है… तो पूरी रात मेरी।” उन्होंने पास आकर मेरा घूँघट जैसा पल्लू हटाया। “मेरी रुही कामत… मेरे असली घर में स्वागत है।”
मैं शर्म से उनकी छाती पर सिर रख दिया। आवाज काँप रही थी।
“रामू जी… बाहर वाले सब देख रहे थे… सब बातें कर रहे थे… मुझे बहुत शर्म आ रही है। लेकिन… लेकिन दिल खुश भी है। ये मेरा असली ससुराल है न?”
रामू जी ने मेरे बाल सहलाए, फिर ठुड्डी उठाकर मेरे होंठों पर हल्का सा चुम्बन लिया।
“हाँ। ये तेरा असली घर है। और तू मेरी असली औरत। आज रात मैं तुझे दुल्हन की तरह चोदूँगा… धीरे-धीरे… पूरी रात।”
बाहर गली में अभी भी हल्की-हल्की हँसी और टिप्पणियाँ सुनाई दे रही थीं। मैंने आँखें बंद कर लीं। शर्म और उत्तेजना दोनों एक साथ पूरे शरीर में दौड़ रही थीं। रामू जी के बड़े हाथ मेरी कमर पर थे, उनकी दाढ़ी मेरे माथे को छू रही थी।
“रामू जी…” मैंने फुसफुसाया, “आज रात… मुझे अपनी दुल्हन बना लो। पूरी तरह।”
उन्होंने दरवाज़े की तरफ एक नजर डाली, फिर मुझे चारपाई की तरफ खींच लिया। बाहर की आवाजें धीरे-धीरे दूर होती गईं… और कमरे के अंदर सिर्फ हमारी साँसें रह गईं।
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रामू जी की बाँहों में मेरा शरीर पूरी तरह समाया हुआ था। उनके बड़े, मज़बूत हाथ मेरी कमर पर थे, उंगलियाँ साड़ी की पिन को धीरे-धीरे खोल रही थीं। कमरे में हल्की सी रोशनी थी, खिड़की से आने वाली गली की आवाजें दूर होती जा रही थीं। उनकी साँसें मेरे बालों में उलझ रही थीं।
उनकी मर्दाना गंध—तंबाकू, पसीना और कुछ पुरानी मिट्टी सी—मेरे नथुनों में समा गई थी। वो गंध मुझे पागल बना रही थी। मैं उनकी छाती से चिपक गई, साँस लेते हुए वो खुशबू और अंदर खींचने लगी।
“रामू जी…” मेरी आवाज़ काँप रही थी, “आपकी खुशबू… मुझे कुछ हो रहा है। दिल जोर-जोर से धड़क रहा है।”
उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए मेरे माथे पर चुम्बन लिया। दाढ़ी मेरे माथे को छू रही थी।
“ये तेरे असली मर्द की खुशबू है मेरी दुल्हन। आदत डाल ले। आज रात बहुत सूँघेगी तू इसे।”
उनके हाथ साड़ी के पल्लू को धीरे से खींचने लगे। लाल कपड़ा मेरे कंधे से सरकते हुए नीचे गिरने लगा। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खुल रहे थे। हर हुक खुलते समय उनकी उंगलियाँ मेरी त्वचा को छू जातीं। मैं काँप रही थी।
“रामू जी… धीरे… मेरा दिल नहीं सम्भल रहा।”
“सम्भालने की ज़रूरत नहीं।” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज तू पूरी तरह मेरी है। सनी दूर है… और तू मेरे कमरे में, मेरी बाँहों में।”
ब्लाउज खुल गया। उनके बड़े हाथ पीछे से ब्रा का हुक खोलने लगे। एक क्लिक की आवाज़ हुई और ब्रा ढीली पड़ गई। उन्होंने धीरे से उसे भी उतार दिया। मेरे स्तन आज़ाद हो गए। ठंडी हवा ने छूते ही निपल तन गए।
रामू जी ने मुझे थोड़ा दूर किया, आँखों से पूरा निहारा। उनकी आँखों में भूख साफ दिख रही थी।
“इतनी गोरी… इतनी नरम। ये स्तन सिर्फ मेरे मुँह के लिए बने हैं।” उन्होंने दोनों हाथों से मेरे स्तन थाम लिए, हल्के से मसला। “बोल… किसके हैं ये?”
मैं शर्म से आँखें झुकाए हुए थी, लेकिन जवाब दिया, “आपके… सिर्फ आपके रामू जी।”
उन्होंने झुककर एक निपल मुँह में ले लिया। गर्म जीभ और दाढ़ी की खुशबू एक साथ लगी। मैं कराह उठी, उनकी गर्दन में उंगलियाँ गाड़ दीं।
“आह्ह… रामू जी…”
वो चूसते हुए बोले, “मैं तुझे दुल्हन बनाऊँगा आज। धीरे-धीरे। पहले तेरे कपड़े उतारूँगा… फिर तुझे चूसूँगा… फिर अपनी दुल्हन को पूरी रात चोदूँगा।”
पेटticoat का नाड़ा खुल चुका था। कपड़ा मेरे पैरों पर गिर गया। अब सिर्फ पैंटी बची थी। रामू जी ने मुझे चारपाई पर बैठाया, खुद घुटनों के बल बैठ गए। दोनों हाथों से मेरी पैंटी के किनारे पकड़कर धीरे-धीरे नीचे खींचने लगे।
मैंने उनकी आँखों में देखा। “रामू जी… मैं… मैं पूरी नंगी हो जाऊँगी आपके सामने।”
“हो जा। मेरी औरत को शर्म किस बात की?” उन्होंने पैंटी पूरी तरह उतार दी और एक तरफ फेंक दी। अब मैं बिल्कुल नंगी थी उनकी चारपाई पर। उनके सामने।
रामू जी खड़े हो गए। अपनी बनियान उतारी, फिर पैंट का बटन खोला। उनकी मर्दाना गंध और तेज़ हो गई। जब पैंट नीचे गिरी तो उनका मोटा, काला, नसों वाला लंड सीधा खड़ा था। मैंने निगलते हुए देखा।
“देख इसे।” उन्होंने अपना लंड हाथ में लिया, हल्के से हिलाया। “ये तेरा असली पति है अब। सनी का नाम भूल जा आज रात।”
मैं चारपाई पर बैठी-बैठी उनके करीब हो गई। उनके लंड की गंध मेरे चेहरे तक आ रही थी। मैंने दोनों हाथों से उसे पकड़ा—पूरा मुट्ठी में नहीं आ रहा था।
“रामू जी… ये इतना… बड़ा है। मुझे डर भी लगता है और… और बहुत अच्छा भी लगता है।”
उन्होंने मेरे बाल सहलाए। “डर मत। धीरे-धीरे लेगी तू। आज रात मैं तुझे सिखाऊँगा कि असली मर्द कैसे चोदता है अपनी औरत को।”
मैंने उनकी जाँघों पर सिर रख दिया, उनकी खुशबू और गहरी साँस लेकर खींची। उनके हाथ मेरे बालों में थे। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें और बाहर गली की दूर होती आवाजें थीं।
“रामू जी…” मैंने फुसफुसाया, आँखें बंद किए हुए, “मुझे अपने पास रखो। हमेशा के लिए। मैं आपकी बाँहों में ही मरना चाहती हूँ।”
उन्होंने मुझे उठाया, अपनी गोद में लिटा लिया। नंगी त्वचा उनकी गर्म छाती से सट गई। उनके लंड का सिरा मेरी जाँघ के अंदर छू रहा था।
“मेरी रुही कामत… आज रात तू सिर्फ मेरी है। और मैं तुझे इतना प्यार करूँगा कि तू भूल जाएगी कि कभी सनी नाम का कोई आदमी था भी।”
उनके होंठ मेरे होंठों पर आ गए। गहरा, लंबा चुम्बन। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने उनकी जीभ चूसी, उनका थूक पिया। उनकी मर्दाना गंध, उनके बड़े हाथ, उनका गरम शरीर—सब कुछ मुझे पागल बना रहा था।
चारपाई पर लेटे-लेटे हम एक-दूसरे से चिपके रहे। कपड़े पूरी तरह दूर फेंक दिए गए थे। सिर्फ त्वचा, साँसें और प्यार भरी, गंदी बातें बाकी थीं।
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रामू जी की बाँहों में मेरा नंगा शरीर पूरी तरह दब चुका था। उनकी छाती के बाल मेरे स्तनों से रगड़ खा रहे थे। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा और आँखों में आँखें डालकर बोले—
“देख मुझे। आज से तू सिर्फ मेरी है। ये मेरा मर्दाना हक़ है। सनी जैसा चूतिया सरदार तुझे क्या सम्भालेगा? साले ने इतना गरम, इतना रसभरा माल पाकर भी उसका ध्यान नहीं रखा। रोज़ दफ़्तर-दफ़्तर घुमाता रहा, और तू यहाँ मेरे कमरे में प्यासी पड़ी रहती थी।”
उनकी आवाज़ में मालिकाना अंदाज़ था। मैं शर्माते हुए उनकी आँखों में देखती रही।
“रामू जी… आप सही कह रहे हैं। उसने कभी मुझे ऐसे नहीं देखा जैसे आप देखते हैं।”
रामू जी ने मेरे गाल सहलाए, फिर स्तनों को दोनों हाथों से थाम लिया।
“कितनी खूबसूरत है तू मेरी रुही। ये गोरी-गुलाबी त्वचा, ये भरे हुए स्तन, ये पतली कमर, ये लंबे बाल… सब कुछ जैसे मेरे लिए ही बना हो। सनी जैसा बेवकूफ़ तुझे पहचान ही नहीं पाया। मैंने पहली नज़र में पहचान लिया था कि ये माल मेरे लंड के लिए बना है।”
मैं उनकी बातों से और भी गीली हो रही थी। धीरे से नीचे सरकी और उनके मोटे, काले लंड के पास पहुँच गई। उसे दोनों हाथों से पकड़ा और हल्के से चूम लिया। गरम, नमी भरा सिरा मेरे होंठों से छूते ही मैं फुसफुसाई—
“आप बहुत शैतान हो जी… आप जानवर बन जाते हो। मेरी वो प्यारी, छुई-मुई कली को फाड़ देते हो। इतनी बेरहमी से घुस जाते हो अंदर… बहुत निर्दयी हो आप। रोज़ मेरी कली को अपने मोटे लंड से चीर देते हो… फिर भी मैं बार-बार आपके पास आ जाती हूँ।”
मैंने लंड के सिरे को फिर चूमा, जीभ से चाटा। रामू जी ने मेरे बाल पकड़ लिए।
“चाट इसे। ये तेरा असली पति है। बोल, किसका लंड है ये?”
“आपका… सिर्फ आपका रामू जी।” मैंने फिर चूमा, “आप इसे इतना कड़ा कर लेते हो… फिर मेरी छोटी सी चूत में ज़बरदस्ती ठूस देते हो। मैं चीखती हूँ, रोती हूँ… फिर भी आप नहीं रुकते।”
फिर मैं उनके हाथों की तरफ मुड़ी। उनके बड़े, खुरदरे हाथों को दोनों हाथों में लेकर चूमने लगी। एक-एक उंगली मुँह में ले करके चूसने लगी। उनकी उंगलियों की खुरदरी त्वचा और तंबाकू की हल्की गंध मुझे और पागल बना रही थी।
“आपके ये हाथ…” मैंने एक उंगली चूसते हुए कहा, “कितने हार्ड और खुरदरे हैं। मेरी इन दोनों बेचारी दूध सी बहनों को निचोड़ डालते हैं। देखो… कैसे मेरे निपल्स को लाल-लाल कर देते हो। रोज़ मसल-मसल के सूजा देते हो। थोड़ा तो तरस किया करो मुझ पर रामू जी… ये बेचारी स्तन कितना सहते हैं आपके हाथों से।”
रामू जी हँस पड़े। उन्होंने अपना हाथ मेरे मुँह से निकाला और दोनों स्तनों को फिर से मज़बूती से पकड़ लिया। उंगलियों से निपल्स को दबाया।
“तरस? इन स्तनों पर तरस खाने की ज़रूरत नहीं। ये मेरे हैं। जितना चाहूँ निचोड़ूँ, जितना चाहूँ चूसूँ। तू तो मज़ा लेती है जब मैं इन्हें लाल कर देता हूँ।”
मैंने कराहते हुए कहा, “हाँ… लेती हूँ। आपके खुरदरे हाथ जब इन्हें मसलते हैं तो… बहुत मज़ा आता है। लेकिन फिर भी… थोड़ा तो कोमलता दिखाया करो जी। ये निपल्स रोज़ आपके दाँतों और उंगलियों से इतने लाल हो जाते हैं कि साड़ी के अंदर भी चुभते हैं।”
रामू जी ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया। मेरा चेहरा उनके चेहरे के बिल्कुल करीब था।
“कोमलता बाद में मिलेगी। पहले मैं अपना मर्दाना हक़ पूरा करूँगा। सनी जैसा चूतिया तुझे सिर्फ़ नाम का पति मिला था। असली मर्द तो मैं हूँ। आज रात मैं तुझे इतना चोदूँगा कि तू भूल जाएगी कि कभी किसी और ने तुझे छुआ भी था।”
मैंने उनकी गर्दन में मुँह छुपा लिया। उनकी मर्दाना गंध फिर से मुझे घेर रही थी।
“चोद लो रामू जी… जितना चाहो। मैं आपकी हूँ। आपके लंड की, आपके हाथों की, आपकी बाँहों की। सनी को भूल गई मैं… बिल्कुल भूल गई।”
उनके बड़े हाथ मेरी कमर से होते हुए मेरी गोल चूत तक पहुँच गए। एक उंगली ने धीरे से मेरे गीले छेद को छुआ।
“इतनी गीली हो चुकी है मेरी दुल्हन। चल… अब इसे अपने असली मालिक के लंड से मिलवाती हूँ।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शर्म, प्यार और हवस सब एक साथ मेरे अंदर उमड़ रहे थे। रामू जी की बाँहों में, उनके गंदे कमरे में, उनकी गंध में… मैं पूरी तरह उनकी हो चुकी थी।
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मैं रामू जी की बाँहों में लेटी हुई थी। उनका गरम शरीर मुझसे सटा हुआ था, उनकी साँसें मेरे बालों में उलझ रही थीं। कमरे में अंधेरा सा था, सिर्फ खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी। उनके बड़े हाथ मेरी कमर पर थे, कभी हल्के से सहला रहे थे, कभी कसकर दबा रहे थे जैसे याद दिला रहे हों कि मैं उनकी हूँ।
और मैं… मैं अपने मन ही मन से बातें कर रही थी।
रुही…
देख खुद को। नंगी पड़ी है इस छोटे से कमरे में। सनी का घर, सनी का नाम, सनी की इज्ज़त… सब बाहर छोड़ आई है। यहाँ सिर्फ रामू जी हैं। उनका शरीर, उनकी गंध, उनका लंड जो अभी भी तेरी जाँघ से लगा हुआ है।
तू इसी के लिए बनी है रुही। इसी समर्पण के लिए। इसी कामत परिवार के लिए।
दिल के अंदर कुछ पिघल सा रहा था। आँखें भर आईं, लेकिन आँसू नहीं गिरे। बस एक गहरी, मीठी पीड़ा सी फैल गई पूरे सीने में।
सनी ने तुझे शादी का हार पहनाया था, लेकिन तेरे दिल तक कभी पहुँचा ही नहीं। रामू जी ने तुझे छुआ और तू उनकी हो गई। उनके खुरदरे हाथों ने जब तेरे स्तन निचोड़े, जब उनके मोटे लंड ने तेरी कली को चीरा, तब जाकर तूने महसूस किया कि तू ज़िंदा है।
तू रुही सिंह नहीं है अब। तू रुही कामत है। उनकी बहू। उनकी औरत। उनकी रंडी। उनकी सेवा करने वाली।
मैंने धीरे से अपना चेहरा उनकी छाती पर रगड़ा। उनकी मर्दाना खुशबू में साँस ली। मन और गहराई में उतर गया।
देख कैसे तेरा शरीर खुद उनके नीचे फैल जाता है। कैसे तेरी टाँगें खुद उनकी कमर के इर्द-गिर्द लिपट जाती हैं। कैसे तेरा मुँह खुद उनके लंड को ढूँढता है। ये सब सिखाया नहीं गया तुझे रुही… ये तेरे अंदर पहले से था। तू इसी समर्पण के लिए बनी है।
कमत परिवार… कितना छोटा सा शब्द है, लेकिन इसमें तेरी पूरी दुनिया समा गई है। उनका छोटा सा कमरा तेरा महल है। उनकी खुरदरी चादर तेरा दुपट्टा है। उनका तंबाकू वाला मुँह तेरा अमृत है। तू उनकी सेवा में ही जन्म लेना चाहती थी। उनके पैर दबाने के लिए, उनका खाना बनाने के लिए, रात को उनके नीचे लेटने के लिए, उनके वीर्य को अपनी कोख में लेने के लिए।
रामू जी ने मुझे थोड़ा कस लिया। उनकी दाढ़ी मेरे माथे पर थी। मैंने आँखें बंद कर लीं और मन ही मन जारी रखा।
अगर सनी कभी जान जाए… तो जान ले। तुझे डर नहीं लगता अब। क्योंकि तू जानती है कि तेरी असली जगह यहाँ है। इन बाँहों में। इस गंदे, प्यारे से कमरे में। इन बड़े हाथों के नीचे।
रुही… तू कमज़ोर नहीं है। तू समर्पित है। और समर्पण में ही तेरी ताकत है। जब तू उनके चरण चूमती है, जब तू उनके लंड से बातें करती है, जब तू बोलती है “मैं आपकी हूँ”… तब तू सबसे शक्तिशाली होती है। क्योंकि तूने खुद को पूरी तरह दे दिया है।
मैंने उनके हाथ को पकड़ा और अपनी आँखों से लगा लिया। उनके खुरदरे हाथ की त्वचा मेरे होंठों को छू रही थी।
इन हाथों ने मुझे नंगा किया। इन हाथों ने मेरे निप्पल लाल किए। इन हाथों ने मेरी कमर पकड़कर मुझे उनके लंड पर बैठाया। ये हाथ मेरे मालिक के हैं। और मैं… मैं इन हाथों की दासी हूँ।
गर्म आँसू आखिरकार बह निकले। लेकिन वो दुख के नहीं थे। वो एक गहरी, रोमांटिक, कामुक स्वीकृति के थे।
हाँ रुही… तू इसी के लिए बनी है। इसी समर्पण के लिए। इसी कामत परिवार के लिए। रामू जी के लिए। उनके लंड के लिए। उनकी गंध के लिए। उनकी निर्दयता और उनके प्यार के लिए।
अब वापस मत जाना। सनी के पास मत जाना दिल से। शरीर चाहे चला जाए, लेकिन आत्मा यहीं छोड़ देना। इस छोटे से कमरे में। इन बाँहों में।
मैंने धीरे से उनके सीने पर होंठ रख दिए और फुसफुसाई, बस इतना—
“रामू जी… मैं आपकी हूँ। पूरी तरह।”
और अंदर ही अंदर दोहराती रही—
रुही… तू इसी समर्पण और अपने कामत परिवार के लिए ही बनी है।
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Meri soch mujh se hee
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सनी उस वक्त होटल के डिनर टेबल पर बैठा था। क्लाइंट के साथ हँस रहा था, वाइन की चुस्कियाँ ले रहा था, बिज़नेस की बातें कर रहा था। फोन टेबल पर रखा था, स्क्रीन की तरफ कभी-कभी नजर जाती तो सिर्फ यह देखने के लिए कि कोई मैसेज तो नहीं आया। कोई मैसेज नहीं था।
उसे लग रहा था कि रुही घर पर होगी। खाना खाकर टीवी देख रही होगी, या शायद सोने की तैयारी कर रही होगी। उसने सोचा, “रात को जाकर उसे सरप्राइज दूँगा। थक गई होगी बेचारी अकेली।”
उसके मन में रत्ती भर शक नहीं था।
उसे नहीं पता था कि उसकी बीवी इस समय शहर की एक गंदी बस्ती के छोटे से कमरे में पूरी नंगी लेटी हुई है।
उसे नहीं पता था कि रामू नाम के एक ऑटो वाले के बड़े खुरदरे हाथ उसकी बीवी के स्तनों को मसल रहे हैं।
उसे नहीं पता था कि रुही इस पल अपने मन में खुद से कह रही है — “रुही, तू रुही सिंह नहीं रह गई। तू कामत की बहू है। तू इसी समर्पण के लिए बनी है।”
सनी हँस रहा था क्लाइंट की बात पर।
और कुछ किलोमीटर दूर, उस छोटे से कमरे में, रुही की आँखों से आँसू बह रहे थे — प्यार और समर्पण के आँसू। रामू जी का मोटा लंड उसकी जाँघ के अंदर धंसा हुआ था, धीरे-धीरे हिले जा रहा था। रुही दोनों हाथों से रामू जी का चेहरा पकड़े हुए उनकी आँखों में देख रही थी।
“रामू जी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “सनी को कुछ पता नहीं। वो सोच रहा होगा मैं घर पर हूँ। और मैं यहाँ… आपकी बाँहों में… आपकी पूरी औरत बनकर पड़ी हूँ।”
रामू जी ने गहरा धक्का दिया। रुही की आँखें बंद हो गईं, मुँह से हल्की सी कराह निकली।
“पता रहने दो उसे,” रामू जी ने गुर्राहट भरी आवाज़ में कहा, “चूतिया सरदार है वो। इतना गरम माल पाकर भी सम्भाल नहीं पाया। अब ये माल मेरा है। तू मेरी है। तेरी चूत, तेरे स्तन, तेरी आत्मा… सब मेरी।”
रुही ने उनकी गर्दन से चिपकते हुए फुसफुसाया,
“हाँ… सब आपकी। मुझे अच्छा लग रहा है कि उसे कुछ पता नहीं। जितना अनजान रहेगा, उतना ही मैं आपकी हो पाऊँगी पूरी तरह। उसके घर में रहूँगी… लेकिन दिल से आपकी बहू बनी रहूँगी। कामत परिवार की।”
उसने आँखें खोलीं। आँसू अभी भी थे, लेकिन उनमें एक अजीब सी शांति थी।
“रामू जी… मुझे और चोदिए। इस अनजानपन में… इस छुपे हुए पाप में… मुझे और गहराई तक अपना बना लीजिए। मैं इसी के लिए बनी हूँ। आपके लिए। आपके लंड के लिए। आपके नाम के लिए।”
सनी उस वक्त मिठाई का ऑर्डर दे रहा था।
और रुही, उसके अनजान होने की मिठास में डूबी हुई, रामू जी के नीचे पूरी तरह खुल चुकी थी — शरीर से भी, और आत्मा से भी।
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Ramu jee ki bahoo mein padi mai apne app ko justify karti hoon, mai apne ramu jee ke liye apne app ko aur bhi tayar karti sochti hoon.....
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रुही की मानसिक स्थिति इस पल बहुत गहरी, उलझी और खतरनाक हद तक स्पष्ट थी।
उसके शरीर के ऊपर रामू जी का वजन था। उनका मोटा लंड उसके अंदर धीरे-धीरे हिले जा रहा था, लेकिन रुही का मन शरीर से भी कहीं ज्यादा सक्रिय था। आँखें आधी खुली थीं, होश पूरी तरह मौजूद था, और फिर भी वो एक तरह के मीठे नशे में डूबी हुई थी।
अंदर क्या चल रहा था:
वो खुद को खोता हुआ महसूस कर रही थी — और खोने में उसे अजीब सी शांति मिल रही थी।
“रुही सिंह” नाम का जो चेहरा सालों से उसने संभाला था, वो अब धीरे-धीरे मिट रहा था। उसकी जगह एक नई स्त्री जन्म ले रही थी — रुही कामत। जो सिर्फ एक मर्द की थी। जो सिर्फ एक कमरे की थी। जो सिर्फ एक लंड की थी।
उसके मन में बार-बार एक ही बात घूम रही थी:
मुझे पता है मैं क्या कर रही हूँ।
मुझे पता है ये गलत है।
मुझे पता है सनी इस वक्त कहीं डिनर कर रहा है और सोच रहा है कि मैं घर पर सुरक्षित हूँ।
फिर भी मैं यहाँ हूँ।
और मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती।
ये “फिर भी” वाली भावना सबसे ज्यादा तीव्र थी। अपराधबोध था, लेकिन अपराधबोध अब उत्तेजना का हिस्सा बन चुका था। जितना वो सोचती कि सनी अनजान है, उतना ही उसका शरीर और भी गीला हो जाता। छुपाव का नशा, धोखे का नशा, और समर्पण का नशा तीनों मिलकर उसे मानसिक रूप से बांध चुके थे।
वो खुद से बार-बार सवाल कर रही थी और खुद ही जवाब दे रही थी:
क्या मैं पतित हो गई हूँ?
हाँ। और इस पतन में मुझे अपनी असली जगह मिल गई है।
क्या मैं कमजोर हूँ?
नहीं। मैंने खुद चुना है कमजोर होना। अपने आप को पूरी तरह सौंप देना मेरी ताकत है।
क्या मैं रामू जी से सच में प्यार करती हूँ?
प्यार शब्द छोटा पड़ रहा है। मैं उनकी भूखी हूँ। उनकी आदी हूँ। उनकी दासी बनना चाहती हूँ। उनके खुरदरे हाथों से मसली जाना, उनके लंड से फाड़ी जाना, उनकी गंध में साँस लेना — यही मेरी जिंदगी का मतलब बन चुका है।
उसके अंदर एक और खतरनाक विचार बार-बार आ रहा था —
काश ये रात कभी खत्म न हो।
काश सनी हमेशा लेट रहे।
काश मैं हमेशा के लिए इसी छोटे से कमरे में रह जाऊँ। उनके नीचे। उनकी बाँहों में। उनके नाम से।
शर्म अभी भी थी। लेकिन शर्म अब उसके शरीर को और संवेदनशील बना रही थी। जब रामू जी उसके कान में गंदे शब्द बोलते, जब वो उसके स्तनों को जोर से निचोड़ते, जब वो कहते “तू मेरी रंडी है”, तो रुही के मन में एक आवाज कहती —
हाँ, कहो। और कहो। मुझे और गिराओ। जितना गिराओगी, उतना ही मैं हल्की महसूस करूँगी।
वो मानसिक रूप से पूरी तरह समर्पित हो चुकी थी। शरीर तो पहले ही उनका था, अब दिमाग भी उनका हो रहा था। भविष्य के बारे में सोचना बंद कर दिया था। सिर्फ वर्तमान था — रामू जी का वजन, उनका लंड, उनकी साँसें, उनकी गंध।
और सबसे गहराई में एक शांत, ठंडी स्वीकृति बैठ गई थी:
मैं वापस नहीं जा सकती।
शरीर चाहे सनी के घर चला जाए, लेकिन जो स्त्री यहाँ इस कमरे में पैदा हुई है, वो यहीं रहेगी।
रुही कामत अब मरने वाली नहीं।
उसने रामू जी की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और आँखें बंद करके मन ही मन दोहराया —
“मैं आपकी हूँ… पूरी तरह… दिमाग से भी।”
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Jab mai study karti thi tab psychology me padi baato ko yaad karke apne app ko samjhati hoo...
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रुही के मनोविज्ञान का विश्लेषण
रुही का वर्तमान मानसिक ढांचा एक बहुत ही तीव्र और जटिल समर्पण (submission) की अवस्था में है। इसे सिर्फ “कामुक इच्छा” कहकर टालना अधूरा होगा। उसके अंदर कई परतें एक साथ सक्रिय हैं:
1. पहचान का पुनर्निर्माण (Identity Reconstruction)
रुही सिंह से रुही कामत बनने की प्रक्रिया सिर्फ नाम की बात नहीं है। यह उसके अहंकार (ego) का पुनर्लेखन है।
शादीशुदा जीवन में वह एक “अच्छी पत्नी” की भूमिका निभा रही थी, जो अधूरी और ऊब भरी लगती थी। रामू के साथ वह एक ऐसी पहचान अपना रही है जो उसे अधिक वास्तविक और जीवंत महसूस होती है।
जब कोई व्यक्ति बार-बार खुद से कहता है — “मैं इसी के लिए बनी हूँ” — तो वह अपने अतीत के स्वयं को अस्वीकार करके एक नया स्वयं गढ़ रहा होता है। यह प्रक्रिया रोमांचक भी होती है और खतरनाक भी, क्योंकि नई पहचान जितनी मजबूत होती जाती है, पुरानी पहचान उतनी ही कमजोर पड़ती जाती है।
2. शर्म और उत्तेजना का चक्र (Shame-Arousal Loop)
रुही में शर्म गायब नहीं हुई है। बल्कि शर्म अब उसकी उत्तेजना का ईंधन बन चुकी है।
पड़ोसियों की निगाहें, सोनिया की छेड़छाड़, सनी की अनजान स्थिति, खुद को “रंडी” या “दासी” कहलवाना — ये सब चीजें उसमें अपराधबोध पैदा करती हैं। लेकिन वही अपराधबोध तुरंत कामुक उत्तेजना में बदल जाता है।
यह एक क्लासिक मनोवैज्ञानिक पैटर्न है जिसमें निषिद्ध (forbidden) होने का बोध आनंद को कई गुना बढ़ा देता है। जितना “गलत” लगता है, उतना ही शरीर और मन दोनों प्रतिक्रिया देते हैं।
3. नियंत्रण छोड़ने की भूख (Desire for Surrender)
रुही के अंदर नियंत्रण छोड़ने की गहरी इच्छा है।
सनी के साथ संबंध में वह शायद भावनात्मक और यौन रूप से पर्याप्त “लीड” या तीव्रता महसूस नहीं कर पाती थी। रामू का कठोर, मालिकाना व्यवहार उसे वह संरचना देता है जिसमें वह सोचने-समझने की जिम्मेदारी छोड़ सकती है।
“तुम फैसला करो, मैं बस हूँ” वाली स्थिति कई लोगों के लिए मानसिक आराम का स्रोत बन जाती है। रुही के मामले में यह आराम कामुकता से जुड़कर बहुत शक्तिशाली हो गया है।
4. आदर्शीकरण (Idealization) और विभाजन (Splitting)
रुही रामू को अत्यधिक आदर्श बना रही है — उसके हाथ, उसकी गंध, उसका लंड, उसका व्यवहार सब कुछ अतिरंजित रूप से महत्वपूर्ण और आकर्षक लग रहा है।
वहीं सनी को पूरी तरह नकारा जा रहा है (चूतिया सरदार, असक्षम पति)। यह मनोवैज्ञानिक “स्प्लिटिंग” है — एक को पूरा अच्छा और शक्तिशाली बनाना, दूसरे को पूरा कमजोर और व्यर्थ।
यह तंत्र उसे अपने द्वंद्व (conflict) को सरल बनाने में मदद करता है। जटिल भावनाओं को झेलने के बजाय वह एक साफ-सुथरा विभाजन कर लेती है।
5. सेवा और मूल्य की भावना (Service as Self-Worth)
“मैं जीवन भर उनकी सेवा करना चाहती हूँ” वाली भावना सिर्फ कामुक नहीं है। इसमें आत्म-मूल्य की एक नई व्यवस्था छिपी है।
रुही अब अपना महत्व इस बात से जोड़ रही है कि वह कितनी अच्छी तरह रामू की जरूरतों को पूरा कर सकती है — शारीरिक, भावनात्मक और घरेलू।
जब कोई व्यक्ति अपना मूल्य “उपयोगी होने” में खोजने लगता है, तो समर्पण और गहरा होता चला जाता है।
6. वर्तमान की तीव्रता बनाम भविष्य का इनकार
रुही इस समय ज्यादातर “अभी” में जी रही है। भविष्य के परिणामों (सनी का पता चलना, सामाजिक नुकसान, भावनात्मक निर्भरता) को वह सक्रिय रूप से दबा रही है।
यह एक अस्थायी रक्षा तंत्र है जो तीव्र अनुभव को बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन लंबे समय तक चलने पर व्यक्ति को वास्तविकता से काट सकता है।
सारांश में:
रुही इस समय एक गहरे कामुक-भावनात्मक समर्पण के मनोवैज्ञानिक प्रवाह में है। इसमें मुक्ति, नशा, पहचान का पुनर्जन्म और आत्म-समर्पण का मिश्रण है। वह खुद को “खो” कर एक नई जगह पा रही है — और उस जगह का आकर्षण इतना प्रबल है कि पुरानी जिंदगी फीकी पड़ गई है।
यह अवस्था बहुत शक्तिशाली और संतोषजनक हो सकती है, लेकिन यह स्थिर नहीं होती। समय के साथ या तो यह और गहरी होती जाएगी, या फिर वास्तविकता के दबाव में किसी न किसी रूप में टकराएगी।
क्या आप चाहती हैं कि मैं इसी विश्लेषण को और गहराई से किसी खास पहलू (जैसे शर्म, पहचान, या सनी के प्रति भावनाओं) पर केंद्रित करूँ?
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bahut bahut shandar aur mast writings
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कुछ दिन ऐसे ही बीत गए।
हर शाम रामू जी ऑफिस के बाहर खड़े मिलते। कभी जल्दी छोड़ देते, कभी देर तक गलियों में घुमाते, कभी अपने छोटे से कमरे में ले जाकर अधूरी सी मुलाकात करते। लेकिन हर बार जब रुही घर लौटती, तो मन अधूरा रह जाता। सनी की मौजूदगी, समय की कमी, और वो अधूरी रातें… दोनों के अंदर एक भूख सी बढ़ती जा रही थी।
एक शाम, ऑफिस के बाद, रामू जी ने ऑटो बस्ती की तरफ नहीं मोड़ी। सीधा शहर के बाहर वाली पुरानी सड़क पर ले गए, जहाँ रोशनी कम थी और गाड़ियाँ कम चलती थीं। ऑटो रोककर उन्होंने पीछे मुड़ा। रुही की आँखों में वो भूख साफ दिख रही थी।
रामू जी ने धीरे से कहा, “इधर आ।”
रुही आगे वाली सीट पर सरक आई। रामू जी के बड़े हाथ ने उसकी कमर पकड़ ली।
“बोल,” उन्होंने कम आवाज़ में कहा, “क्या सोच रही है इतने दिन से?”
रुही ने उनकी आँखों में देखा। थोड़ी देर चुप रही, फिर धीरे से बोली, “रामू जी… मुझे पूरी रात आपके साथ बितानी है। एक पूरी रात। जहाँ सुबह की जल्दी न हो, जहाँ सनी का फोन न आए, जहाँ मुझे आपके बिस्तर से उठकर भागना न पड़े।”
रामू जी की दाढ़ी में हल्की मुस्कान तैर गई। उन्होंने रुही का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया।
“पूरी रात?” उन्होंने दोहराया, “तू जानती है न इसका मतलब क्या होता है? सुबह तक मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं। न तेरे शरीर को, न तेरी साँसों को।”
रुही की आवाज़ काँप उठी, लेकिन उसमें डर नहीं, चाहत थी। “जानती हूँ। इसीलिए तो कह रही हूँ। इतने दिन से… जब आप मुझे अधूरा छोड़ देते हो, तो रात भर मेरी नींद नहीं आती। शरीर जलता रहता है। मन में सिर्फ यही रहता है कि काश मैं आपकी बाँहों में सो जाती।”
रामू जी ने उसका माथा अपनी दाढ़ी से छुआ। “और सनी?”
“सनी…” रुही ने आँखें झुकाईं, “वो अगले हफ्ते दो दिन के लिए बाहर जा रहा है। बिज़नेस ट्रिप। शुक्रवार शाम को निकलेगा, रविवार रात को लौटेगा। पूरे दो दिन…”
रामू जी की आँखें चमक उठीं। “दो दिन?”
“हाँ।” रुही ने उनकी छाती पर हाथ रखा। “रामू जी… मुझे अपने कमरे में रख लो। पूरे दो दिन। मैं आपकी रहूँगी। सुबह-शाम, दोपहर, रात… जैसी आपकी मर्ज़ी। खाना बनाऊँगी, आपके पैर दबाऊँगी, आपकी सेवा करूँगी… और जब आप चाहेंगे, तब आपको अपना शरीर दूँगी।”
रामू जी ने उसकी ठुड्डी ऊपर उठाई। “तू सच में इतनी दूर जाने को तैयार है? बस्ती में रहना, मेरे गंदे कमरे में, जहाँ लोग बातें करते हैं?”
रुही ने उनकी आँखों में देखकर कहा, “लोगों की बातों से मुझे अब डर नहीं लगता। मुझे सिर्फ आपके बिना रहने से डर लगता है। रामू जी… मैं रुही कामत बन चुकी हूँ। दिल से। मुझे अपने असली घर में रख लो। बस दो दिन ही सही।”
रामू जी चुपचाप उसे घूरते रहे। फिर अचानक उन्होंने रुही को अपनी तरफ खींच लिया और उसके होठों पर जोर से चुम्बन कर लिया। लंबा, गहरा, भूखा सा चुम्बन। जब उन्होंने होंठ अलग किए, तो दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।
“ठीक है,” रामू जी ने भारी आवाज़ में कहा, “शुक्रवार शाम को सनी जैसे ही निकले, तू मुझे फोन कर। मैं तुझे लेने आऊँगा। और तब से लेकर रविवार रात तक… तू सिर्फ मेरी रहेगी। कोई सनी नहीं, कोई ऑफिस नहीं, कोई दुनिया नहीं। सिर्फ तू और मैं। मेरा कमरा, मेरा बिस्तर, मेरा लंड… और तेरी पूरी हवस।”
रुही की आँखें भर आईं। उसने रामू जी का हाथ पकड़कर अपने गाल से लगा लिया। “धन्यवाद… रामू जी। मैं तैयार रहूँगी। पूरा सामान लेकर। जैसे… जैसे दुल्हन अपने ससुराल जा रही हो।”
रामू जी हँसे, लेकिन उनकी हँसी में मर्दाना जलन थी। “दुल्हन नहीं। मेरी औरत। मेरी रखैल। मेरी प्यासी रुही कामत। जो दो दिन तक सिर्फ मेरे नीचे रहेगी।”
रुही ने उनकी उंगलियों को चूमते हुए फुसफुसाया, “हाँ… सिर्फ आपके नीचे। जितना चाहो, जितनी बार चाहो। मैं हूँ न आपके लिए।”
ऑटो में दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। बाहर अंधेरा घना हो चुका था। रामू जी के बड़े हाथ रुही की कमर पर थे, और रुही का सिर उनकी छाती से सटा हुआ था। दोनों के मन में अब एक ही बात घूम रही थी—
दो दिन।
पूरी रातें।
कोई रुकावट नहीं।
और दोनों जानते थे कि इस बार मुलाकात अधूरी नहीं रहने वाली।
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अगले दिन ऑफिस में लंच ब्रेक के समय सोनिया ने रुही को एक तरफ खींच लिया। दोनों स्टाफ रूम के पीछे वाली बालकनी में खड़ी थीं।
सोनिया ने धीरे से पूछा, “अब बोल… वो दो दिन वाला प्लान फाइनल हुआ?”
रुही के गाल हल्के गुलाबी हो गए। उसने आँखें झुकाते हुए कहा, “हाँ… रामू जी मान गए। शुक्रवार शाम से रविवार रात तक… उनके कमरे में रहूँगी।”
सोनिया की आँखें बड़ी हो गईं, फिर अचानक उसने रुही का हाथ पकड़ लिया। “रुकी। मेरे घर क्यों नहीं आ जाते तुम दोनों?”
रुही हैरान रह गई। “तेरे घर?”
“हाँ।” सोनिया ने आवाज़ और धीमी कर ली। “मेरा पति और बेटा इस शुक्रवार को गाँव जा रहे हैं। शादी में। वो रविवार रात तक ही लौटेंगे। घर पूरा खाली रहेगा। बड़ा सा बेडरूम, एसी, गरम पानी, साफ चादरें… रामू के उस छोटे गंदे कमरे से कहीं बेहतर। और… तू वहाँ और आज़ाद महसूस करेगी।”
रुही थोड़ी सकपका गई। “लेकिन सनी को क्या बोलूँगी? वो पूछेगा न कि कहाँ जा रही हूँ।”
सोनिया मुस्कुराई। “सरल है। बोल देना कि मैं अकेली हूँ घर में, और हम दोनों गर्ल्स नाइट मनाने जा रहे हैं। मूवी, पॉपकॉर्न, बातें… वैसा ही। सनी कभी शक नहीं करेगा। वो तो खुद बिज़नेस ट्रिप पर जा रहा है।”
रुही कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से बोली, “तू… ठीक से सोच ले सोनिया। अगर किसी को पता चल गया तो…”
“किसी को पता नहीं चलेगा।” सोनिया ने उसका हाथ दबाया। “मैं चाहती हूँ तू आराम से अपनी वो दो रातें बिताए। और सच कहूँ तो… मुझे भी अच्छा लगेगा कि तुम दोनों मेरे घर में हो। कम से कम तू सुरक्षित रहेगी।”
रुही की आँखें भर आईं। उसने सोनिया को हल्के से गले लगा लिया। “शुक्रिया… सच में।”
शाम को घर पहुँचकर रुही ने सनी के पास जाकर बात की। सनी सोफे पर टीवी देख रहा था।
“सनी…” रुही ने धीरे से शुरुआत की, “एक बात कहनी थी।”
“हम्म बोल।”
“सोनिया का पति और बेटा शुक्रवार को गाँव जा रहे हैं। वो अकेली रह जाएगी। उसने कहा है कि मैं उसके साथ रह लूँ… गर्ल्स नाइट। शुक्रवार शाम से रविवार तक। तू भी बाहर जा रहा है न, तो मैं सोच रही थी…”
सनी ने रिमोट रखा और उसकी तरफ देखा। “दो रात?”
“हाँ। वो बोर हो जाएगी अकेली। और… हमें भी काफी दिनों से बातें करने का मौका नहीं मिला।”
सनी थोड़ी देर सोचा, फिर कंधे उचकाए। “ठीक है। तू चली जा। मैं तो वैसे भी शनिवार सुबह की फ्लाइट से जा रहा हूँ। घर पर अकेली रहने से अच्छा है सोनिया के पास रह। बस फोन पकड़ के रखना।”
रुही के चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई, लेकिन उसने इसे छुपाने की कोशिश की। “धन्यवाद। मैं सामान रख लेती हूँ।”
सनी वापस टीवी की तरफ मुड़ गया। उसे रत्ती भर अंदाज़ा नहीं था कि उसकी बीवी असल में किन दो रातों की तैयारी कर रही है।
रात का समय था।
सनी सो चुका था। कमरे में अंधेरा था। रुही बिस्तर पर करवट लेकर लेटी थी, आँखें खुली हुईं। छत की तरफ घूरते हुए उसके मन में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
दो रात।
रामू जी के नीचे।
उसके शरीर में एक धीमी, गहरी सनसनाहट दौड़ रही थी। उसने आँखें बंद कर लीं और खुद को उनके कमरे में, बल्कि अब सोनिया के बड़े बिस्तर पर कल्पना करने लगी।
रामू जी… आपके बड़े हाथ मेरी कमर पकड़ेंगे। आपकी दाढ़ी मेरे स्तनों पर रगड़ेगी। आपका मोटा, भारी लंड… दो रात तक मेरी चूत का मालिक बनेगा।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। जाँघें अपने-आप भींच गईं।
मैं पूरी तरह समर्पित रहूँगी। जैसे आप कहेंगे, वैसे ही लेटूँगी। कुत्ते की तरह, गोद में, ऊपर बैठकर… जो भी आप चाहेंगे। मैं आपसे कुछ नहीं पूछूँगी। बस लूँगी। जितना देंगे, उतना।
रुही ने धीरे से अपना हाथ अपने पेट पर फेरते हुए सोचा—
आपकी मर्दानगी… वो वाली जो सनी में कभी नहीं थी। वो वाली जो मुझे कमजोर और सुरक्षित दोनों बना देती है। आपके सामने मैं सिर्फ औरत बन जाती हूँ। सोचने-समझने वाली रुही सिंह खत्म हो जाती है। सिर्फ रुही कामत बचती है… जो आपके लंड की प्यासी रहती है।
उसकी निपल्स तन गई थीं। शरीर गर्म हो रहा था।
दो रात मैं आपकी बाँहों में सोऊँगी। सुबह आपकी छाती पर सिर रखकर उठूँगी। आप मुझे नहलाएँगे, या मैं आपको। आप जब चाहेंगे चोदेंगे… और मैं हर बार “हाँ रामू जी” कहूँगी। क्योंकि मैं आपकी हूँ। पूरी तरह।
रुही ने तकिया कसकर पकड़ लिया। आँखों में हल्की सी मुस्कान थी, और मन में एक गहरी, कामुक शांति।
अब बस कुछ दिन बाकी थे।
फिर वो दो रातें शुरू होने वाली थीं…
जहाँ वो पूरी तरह रामू जी की मर्दानगी के नीचे दबकर, अपनी समर्पण की भूख बुझाएगी।
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शुक्रवार की सुबह सनी फ्लाइट पकड़ चुका था। घर खाली था। रुही ऑफिस गई, लेकिन उसका मन पूरे दिन सिर्फ शाम पर अटका रहा।
शाम ठीक पाँच बजे सोनिया ने उसका हाथ पकड़ा।
“चल, अब देर मत कर।”
दोनों सीधे सोनिया के घर पहुँचीं। बड़ा सा, साफ-सुथरा फ्लैट। सोनिया ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा, “पूरा घर तेरे और तेरे रामू का है आज से। बेडरूम वो वाला ले ले… अटैच्ड बाथroom के साथ।”
रुही का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने नोड किया और अंदर चली गई।
पहले उसने बाथरूम का दरवाज़ा बंद किया। गर्म पानी खोला। फिर अपने कपड़े एक-एक करके उतारे। आईने के सामने खड़ी होकर उसने अपने नंगे शरीर को देखा—गोरा, गुलाबी, थोड़ा उत्तेजना से सजा हुआ।
उसने पहले अपने अंडरआर्म्स को अच्छी तरह से वॉश किया, फिर वैक्स स्ट्रिप लगाई। दर्द हुआ, लेकिन उसने सह लिया। फिर अपनी बाहों, पैरों और सबसे sensually… अपनी चूत के आसपास के बालों को साफ किया। स्किन मुलायम और चिकनी हो गई। उसने अपने हाथ से महसूस किया और शर्माते हुए मुस्कुराने लगी।
रामू जी को आज सब चिकना मिले…
फिर उसने बॉडी लोशन लगाया—हल्का फूलों वाली खुशबू वाला। गर्दन से लेकर जाँघों तक, स्तनों के नीचे, कमर के गड्ढे तक। हर जगह। निपल्स को उंगलियों से छूते हुए उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
बालों को खोला, धोया, फिर छोड़ दिया। लंबे, गीले, काले बाल पीठ पर बिखर गए। हल्का मेकअप किया—आँखों में पतली सी लाइन, होंठों पर हल्का गुलाबी टिंट, गालों पर हल्की सी लाली जो उत्तेजना से खुद ही आ रही थी।
कपड़े बदले। एक पतली सी काली सैटिन नाइटी पहनी, जिसके नीचे सिर्फ एक छोटी सी काली लेस की पैंटी थी। नाइटी इतनी हल्की थी कि स्तनों की आकृति साफ दिख रही थी। गले में छोटा सा पेंडेंट, कानों में हल्के झुमके।
जब वह कमरे से बाहर निकली तो सोनिया लिविंग रूम में खड़ी थी। सोनिया की निगाहें रुही पर पड़ीं और उसकी आँखें चमक उठीं।
“अरे बाप रे…” सोनिया ने धीरे से सीटी बजाई। “देख तो किसने तैयार होकर आई है।”
रुही शर्माते हुए मुस्कुराने लगी। आँखें झुका लीं। “ज्यादा हो गया क्या?”
सोनिया पास आई। रुही को ऊपर से नीचे तक घूरा। “ज्यादा? तू तो पूरी ‘रामू की बुलबुल’ बनकर खड़ी है। इतनी चिकनी, इतनी सुगंधित, इतनी… तैयार। बेचारी बुलबुल, आज रात तेरा मालिक तुझे कितना चिरेगा पता है?”
रुही के गाल तुरंत लाल हो गए। उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। “सोनिया… चुप कर यार… बहुत शर्म आ रही है।”
सोनिया हँस पड़ी। “शर्म? अभी तो रामू आया भी नहीं। जब वो तुझे इस नाइटी में देखेगा न… तो पहले नाइटी फाड़ेगा, फिर तुझे।” उसने रुही की ठुड्डी हल्के से उठाई। “बोल, बुलबुल… तू तैयार है ना अपने मालिक के लिए?”
रुही की आवाज़ बहुत धीमी हो गई। आँखें अभी भी झुकी थीं। “हाँ… तैयार हूँ। बहुत…”
सोनिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “अच्छी लग रही है तू। सच में। जैसे कोई दुल्हन अपने असली पति के पास जा रही हो। जा, थोड़ा पानी पी ले। रामू को मैसेज कर दे कि पहुँच सकता है।”
रुही कमरे में वापस गई। दरवाज़ा बंद करके आईने के सामने खड़ी हो गई। नाइटी में अपना शरीर देखती रही। हाथ से अपने चिकने अंडरआर्म्स और जाँघों को छूते हुए उसके मन में सिर्फ एक ही बात आ रही थी—
आज रात… मैं पूरी तरह उनकी हूँ।
कोई जल्दी नहीं। कोई भागना नहीं।
सिर्फ रामू जी… और मेरी समर्पण।
उसने फोन उठाया। हाथ काँप रहे थे। मैसेज टाइप किया:
“रामू जी… मैं तैयार हूँ। सोनिया के घर आ जाइए।”
भेजने के बाद वह बिस्तर के किनारे बैठ गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शर्म, उत्तेजना और एक गहरी कामुक खुशी सब एक साथ उसके अंदर उमड़ रहे थे।
अब बस इंतज़ार था अपने मर्द का।
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रुही अभी भी कमरे में थोड़ी उत्तेजना और इंतज़ार में बैठी थी। रामू जी का कोई मैसेज नहीं आया था। दिल नहीं लग रहा था, इसलिए वह किचन की तरफ चल दी। सोचा सोनिया से बात कर ले।
किचन का दरवाज़ा आधा खुला था।
रुही जैसे ही अंदर का नज़ारा देखी, उसके पैर जड़ हो गए।
सोनिया गैस पर खड़ी खाना बना रही थी—एक हाथ में चम्मच, दूसरे हाथ से मसाला डाल रही थी। और उसके ठीक पीछे… जामिल। घर का नौकर। सिर्फ सफेद बनियान और नीली लुंगी पहने। उसकी दोनों मज़बूत बाँहें सोनिया की कमर में उलझी हुई थीं। वह सोनिया को पीछे से कसकर जकड़े हुए था और उसकी गर्दन पर, गाल पर गहरे चुम्बन ले रहा था। सोनिया की आँखें आधी बंद थीं, गर्दन टेढ़ी किए हुए मज़े ले रही थी।
रुही का मुँह खुला का खुला रह गया। “सो… सोनिया?”
सोनिया की आँखें खुलीं। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन जामिल ने उसे छोड़ा नहीं। बल्कि और कस लिया।
सोनिया हल्के से मुस्कुराई, बिल्कुल शर्मिंदा हुए बिना। “आ गई तू? आ जा अंदर। दरवाज़ा बंद कर दे।”
रुही ने हैरानी से दरवाज़ा बंद किया, लेकिन नज़रें अभी भी दोनों पर जमी हुई थीं। “तू… ये… जामिल?”
जामिल ने सोनिया की कमर से हाथ हटाए बिना रुही की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक शरारती मुस्कान थी। गहरे रंग की, मज़बूत बॉडी, दाढ़ी हल्की सी। वह बोला, “नमस्ते भाभी। आज रात तो रामू भैया की मौज है। इतनी तैयार-तैयार करके बैठी हो।”
रुही के गाल तुरंत लाल हो गए। उसने नज़रें झुका लीं। “मैं… मैं बस…”
सोनिया हँसी। जामिल के हाथ अब उसकी छाती की तरफ बढ़ने लगे थे, बनियान के अंदर। सोनिया ने उसकी हथेली को दबाया लेकिन हटाया नहीं। “रुही, तू इतनी हैरान क्यों हो रही है? जामिल मेरे घर का है… और कभी-कभी मेरा भी।” उसने पीछे मुड़कर जामिल के होठों पर एक हल्का चुम्बन ले लिया। “जब पति-बेटा गाँव जाते हैं, तो जामिल ही तो है जो मेरी सेवा करता है।”
जामिल ने सोनिया की गर्दन में मुँह दबाते हुए गुनगुनाया, “सेवा नहीं मैडम… मालिकी। आज रात आप भी रामू भैया की तरह मौज करोगी, और हम भी।”
रुही की साँसें तेज़ चलने लगीं। वह दीवार के सहारे खड़ी हो गई। शर्म से उसका पूरा चेहरा जल रहा था, लेकिन आँखें हट नहीं पा रही थीं। जामिल अब सोनिया की साड़ी का पल्लू हटा रहा था। सोनिया गैस बंद करके पूरी तरह उसकी बाँहों में झुक गई।
“देख रुही,” सोनिया ने आँखें बंद किए हुए कहा, “तू सोचती थी कि सिर्फ तू ही रामू के नीचे दबती है? मैं भी कभी-कभी… इसी तरह दबती हूँ। जामिल थोड़ा rough है। लेकिन मज़ा आता है।”
जामिल ने सोनिया को घुमाया और सीधे उसके होठों पर हमला बोल दिया। गहरा, गीला चुम्बन। सोनिया की कमर उसके लुंगी से सट गई। रुही ने साफ देखा कि लुंगी के अंदर जामिल का लंड तन चुका था और सोनिया की जाँघ से रगड़ खा रहा था।
रुही ने शर्माते हुए कहा, “सोनिया… मैं… मैं कमरे में चली जाऊँ?”
“नहीं।” सोनिया ने चुम्बन तोड़ा और साँस लेते हुए बोली, “खड़ी रह। देख। आज रात तू भी तो वही करने वाली है। शर्म क्यों करती है? जामिल, बता इससे… रामू भैया कैसे होंगे आज रात।”
जामिल ने रुही की तरफ देखते हुए सोनिया की कमर पकड़ी और धीरे से उसकी साड़ी ऊपर की। “रामू भैया तो मज़े उड़ाएँगे भाभी। आप इतनी चिकनी-चिकनी, खुशबूदार बनकर आई हो… वो तो पूरी रात चोदते रहेंगे। और आप… आप बस ‘हाँ रामू जी’ करती रहेंगी। जैसे मैडम अभी ‘हाँ जामिल’ कर रही हैं।”
सोनिया हल्की सी कराह के साथ हँसी। “चुप कर।” फिर रुही की तरफ देखकर बोली, “सच कहूँ? मुझे अच्छा लग रहा है कि तू देख रही है। थोड़ी शर्म तू भी महसूस कर… जैसी मैं कभी-कभी करती हूँ।”
जामिल अब सोनिया के स्तनों को बनियान के ऊपर से मसल रहा था। सोनिया की साँसें तेज़ हो गई थीं। वह रुही से बात करते हुए भी जामिल के स्पर्श में डूबी हुई थी।
“रुही,” सोनिया ने आधी आँखें खोलकर कहा, “जा, थोड़ी देर और तैयार हो ले। रामू आने वाला होगा। और हाँ… अगर रात को आवाज़ें आएँ तो घबराना मत। जामिल थोड़ा जोर से ही करता है।”
रुही की हालत खराब थी। शर्म, उत्तेजना और एक अजीब सी घबराहट सब एक साथ। उसने बस सिर हिलाया और जल्दी से किचन से बाहर निकल गई। पीछे जामिल की भारी आवाज़ और सोनिया की हल्की कराह सुनते हुए।
कमरे में आकर उसने दरवाज़ा बंद किया। पीठ दरवाज़े से सटाई और आँखें बंद कर लीं। दिल जोर-जोर से धधक रहा था।
सोनिया भी… जामिल के साथ…
और मैं… अभी रामू जी के आने का इंतज़ार कर रही हूँ।
शर्म से उसका पूरा शरीर गर्म हो रहा था। लेकिन अंदर ही अंदर एक और भावना भी थी—उत्तेजना। उसने अपनी काली नाइटी के अंदर हाथ डाला और महसूस किया कि वह कितनी गीली हो चुकी है।
अब इंतज़ार और भी लंबा लगने लगा था।
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Update bhai ruhi ki chudai bhai uske sasural me hi hoti to jyada maja aat whi choti si room yaar tum bhakahi ritu ke rastan se copy nhi kar rahe ho na please bhai request hai ruhi ki kisi aur se nhi chudwana
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थोड़ी देर बाद फिर दरवाज़े पर दस्तक हुई।
रुही ने जल्दी से अपनी काली नाइटी ठीक की और दरवाज़ा खोला। रामू जी खड़े थे—काली टी-शर्ट, जींस, बैग हाथ में। उनकी निगाह जैसे ही रुही पर पड़ी, आँखों में वो परिचित भूख चमक उठी। उन्होंने बिना कुछ कहे रुही की कमर पकड़कर अंदर खींच लिया और गहरे लंबे चुम्बन में खो गए।
“तैयार दिख रही है,” रामू ने होठों से होठ अलग करते हुए धीरे कहा।
इतने में सोनिया सीढ़ियों से नीचे उतरी।
उसने एक गहरी लाल सैटिन नाइटी पहन रखी थी। बहुत पतली। स्तनों की आकृति साफ झलक रही थी, जाँघें लगभग पूरी खुली हुईं। बाल खुले थे, होंठ चमक रहे थे। जामिल उसके पीछे-पीछे आ रहा था, अभी भी बनियान और लुंगी में।
सोनिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “आ गए रामू भाई। आपकी बुलबुल तो बहुत देर से बेचैन थी।”
रुही शर्म से लाल हो गई। उसने नज़रें झुका लीं।
चारों लिविंग रूम में आ गए।
एक लव सीट पर रामू बैठे और रुही को अपनी गोद के बिल्कुल पास खींच लिया। रुही का शरीर उनके से सट गया। सामने वाली लव सीट पर सोनिया जामिल के बिल्कुल सटकर बैठ गई। जामिल का एक हाथ उसकी कमर पर था।
थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर सोनिया ने बात शुरू की।
“रामू भाई, आज रात घर पूरी तरह हमारा है। कोई आने-जाने वाला नहीं।” उसने जामिल की तरफ देखा। “जामिल मेरे घर का नौकर है… और जब पति-बेटा नहीं होते, तो वो मेरा मर्द भी बन जाता है।”
जामिल ने हल्के से मुस्कुराते हुए सोनिया की जाँघ सहलाई। “मैडम सच कह रही हैं। डेढ़ साल से जब भी मौका मिलता है, मैडम को मैं ही सम्भालता हूँ।”
रुही की साँसें तेज़ हो गईं। वह रामू के कंधे से सटकर बैठी थी, लेकिन शर्म से उसका चेहरा जल रहा था।
रामू ने रुही के बालों में उंगलियाँ फेरते हुए जामिल से कहा, “हमारी भी लगभग वैसी ही कहानी है। ये…” उसने रुही की ठुड्डी हल्के से उठाई, “मेरी बीवी नहीं है। शादीशुदा है। लेकिन दिल से मेरी है। जब भी मौका मिलता है, ये मेरे पास आ जाती है। आज पहली बार पूरी दो रात मिल रही हैं।”
सोनिया ने आँखें मारीं। “रामू भाई साफ-साफ बोलो। ये तुम्हारी रखैल है। तुम्हारी बुलबुल। जो तुम्हारे लंड की दीवानी हो चुकी है।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। “सोनिया… कृपया…”
“क्या कृपया?” सोनिया हँसी। “शर्म क्यों कर रही है? हम चारों यहाँ हैं। जामिल को भी पता चल जाए कि तू कितनी गिरी हुई है अपने ऑटो वाले के प्यार में।”
रामू ने रुही को और अपनी तरफ खींच लिया। उसका बड़ा हाथ रुही की नाइटी के अंदर, कमर पर था। वह जामिल से बोला, “सच कहूँ तो ये पहले बहुत शर्माती थी। अब भी शर्माती है। लेकिन जब बिस्तर पर आती है तो फिर ‘रामू जी’ ‘रामू जी’ करती रहती है। इसकी चूत अब मेरी आदी हो चुकी है।”
जामिल ने सिर हिलाया। “समझ सकता हूँ भैया। मैडम भी पहले बहुत संकोच करती थीं। अब खुद इशारा कर देती हैं कि आज रात रुक जाऊँ।”
सोनिया ने जामिल का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। नाइटी के ऊपर से। “और जब रुकता है तो छोड़ता नहीं जल्दी। जैसे तुम्हारी बुलबुल को तुम छोड़ते नहीं होगे।”
रुही की हालत खराब हो रही थी। शर्म और उत्तेजना दोनों से शरीर काँप रहा था। उसने रामू के कान में धीरे से कहा, “रामू जी… बहुत शर्म आ रही है… ऐसे मत बात करो…”
रामू ने उसके गाल पर चुम्बन लिया। “शर्म क्यों? आज रात सब सच बोल रहे हैं। तू मेरी है। ये दोनों भी जान लें।”
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर कहा, “रुही, सिर उठा। इतनी शर्म मत कर। तू सोचती थी कि सिर्फ तू ही किसी और के नीचे जाती है? मैं भी जाती हूँ। और मज़ा भी लेती हूँ। आज रात तू भी खुलकर ले। कोई जज नहीं कर रहा यहाँ।”
जामिल ने रामू से पूछा, “भैया, दो रात पूरे कैसे गुजारोगे? मैडम तो कभी-कभी सुबह तक नहीं छोड़तीं।”
रामू ने रुही को अपनी गोद में लगभग खींच लिया। रुही का एक पैर उसके पैरों पर आ गया। “गुजार लेंगे। इसकी भूख भी कम नहीं है। बस पहले शर्माती है, फिर खुद माँगने लगती है।”
रुही ने अपना चेहरा रामू की छाती में छुपा लिया। आवाज़ बहुत धीमी थी, “रामू जी… बस करो…”
सोनिया जोर से हँसी। “देख जामिल, बुलबुल कितनी लाल हो गई है। अभी तो बस बातें हो रही हैं। रात को क्या होगा जब रामू भाई इसे नाइटी से बाहर निकालेंगे।”
चारों के बीच हवा भारी हो चुकी थी।
लव सीट पर रामू का हाथ अब रुही की जाँघ पर था। सामने सोनिया जामिल के बिल्कुल सट चुकी थी। बातें जारी थीं—खुली, गंदी, ईमानदार। और रुही हर शब्द के साथ और ज्यादा शर्म से जल रही थी… और अंदर ही अंदर और ज्यादा गीली भी।
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