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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
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Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
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Wowww tooo hot update maja a gya kia kamal ki story hai maza hi maza
[+] 1 user Likes Rizzi1198's post
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Thanks for posting the story the continuously, we need more softcore, don't let sher to take over that heroine easily...I really like ur plot.. expecting more erotic screen plot and more characters in the story. Thanks and appreciate ur hardwork
[+] 1 user Likes Maniverse's post
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Everytime setting the bar higher and higher

Kaise itna acha likh sakte hain

Har baar new twist and turns

Maza aa gaya

Aise hi likhate raho
[+] 1 user Likes Crazy007's post
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Wwwoooowwww.. awesome update….
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नया मोड़ —1
 
शेर झटके से अपनी आँखें खोलकर बिस्तर पर उठ बैठा। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं और पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था।
 
जैसे ही उसने अपनी जाँघों के पास महसूस हुई उस अजीब सी चिपचिपाहट की तरफ ध्यान दिया, उसका मुँह खुला का खुला रह गया। उसका पजामा उसके अपने ही गाढ़े वीर्य से पूरी तरह गंदा और गीला हो चुका था।
 
कुछ पलों तक तो शेर बदहवास सा कमरे की दीवारों और छत को ताकता रहा। धीरे-धीरे उसका दिमाग ठिकाने आया और उसे हकीकत का अहसास हुआ। दोपहर में तांत्रिक के ठिकाने से लौटने के बाद वह अपने कमरे में आकर सो गया था।
 
वह पूरा कामुक नज़ारा—मीरा का फव्वारे के नीचे नंगे होकर नहाना, उसका पैंटी चाटना, मीरा की चूत में जीभ और उंगली डालना, और फिर उसे दीवार से सटाकर बेरहमी से पेलना—सब कुछ महज एक बेहद  कामुक सपना था!
 
हकीकत सामने आते ही शेर का सारा मज़ा काफूर हो गया और गुस्से के मारे उसका चेहरा लाल पड़ गया।
 
शेर (बिस्तर पर ज़ोर से मुक्का मारते हुए और खुद को गालियाँ देते हुए चीखा): "अबे चूतिया है क्या बे तू शेर?! साला हरामज़ादा! पूरी ज़िंदगी बस ऐसे ही हिला-हिलाकर मुट्ठ ही मारता रहेगा क्या?! कितनी बार सपने में मुट्ठ मार-मार के ही काम चलाएगा तू?!"
 
वह बिस्तर से उठा और पजामे के उस गीले धब्बे को देखकर नफरत और खीझ से भर गया।
 
शेर (दाँत भींचकर कमरे में टहलते हुए, मीरा को कोसने लगा): "साली मीरा... तूने तो मेरा जीना हराम करके रख दिया है! न दिन को चैन है, न रात को सुकून! हकीकत में तो नखरे दिखाती है, और सपनों में आकर भी ऐसे तड़पाती है! साला पागल बनाकर छोड़ दिया है उस औरत ने मुझे!"
 
शेर ने नफरत से अपना गंदा पजामा उतारा और बाथरूम की तरफ बढ़ा, ताकि उस गीलेपन को धो सके।
 
लेकिन उसके दिमाग में तांत्रिक का दिया हुआ वो टोटका और मीरा के जिस्म की वही आग अब भी सुलग रही थी।
 
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शाम ढलने लगी थी । सरताज घर वापस लौटे थे, लेकिन उनके पीछे-पीछे जब चंदन बाबा की चिर-परिचित, शांत और सौम्य काया भीतर दाखिल हुई, तो मानों पूरे घर का बोझिल माहौल एक पल में ही छंट गया। घर का सूनापन अचानक एक गहरी मिठास और अपनत्व से भर गया।
 
चंदन बाबा को इस तरह अचानक घर की देहलीज पर खड़ा देखकर मीरा और ज्योति की आँखें अविश्वास और असीम खुशी से चमक उठीं।
 
ज्योति, जो अब तक अपने खिलौनों में व्यस्त थी, चंदन बाबा का चेहरा देखते ही अपनी सुध-बुध खो बैठी। वह खिलौने वहीं छोड़कर उनके पास भागी और बिना एक पल गँवाए उनसे कसकर लिपट गई।
 
चंदन बाबा के चेहरे पर एक तृप्त मुस्कान खिल उठी। उन्होंने तुरंत अपनी मजबूत और ममतामयी बांहों में ज्योति को ऊपर उठा लिया, उसे अपने सीने से सटाया और माथा चूमते हुए गद्गद आवाज में बोले, "मेरी लाडली! अरे, मैंने अपनी प्यारी राजकुमारी बेटिया को बहुत मिस किया रे! इतने दिन बीत गए, मेरी नटखट बिटिया को देखे बिना जैसे चैन ही नहीं मिल रहा था।"
 
ज्योति ने उनके गाल पर अपना नन्हा हाथ फेरा और अपने चुलबुले अंदाज में शिकायत करते हुए बोली, "बाबा! आप इतने दिन कहाँ गायब थे? आपको मेरी याद नहीं आती थी क्या? देखिए, मैंने आपके बिना कोई शरारत भी नहीं की।"
चंदन बाबा खिलखिलाकर हंस पड़े, "अरे मेरी रानी, तेरी याद तो हर घड़ी आती थी। बस जरा काम का फेर था। अब देख, तेरा बाबा आ गया न!"
 
दोनों का यह निश्छल प्रेम देखकर मीरा के कदम अपने आप आगे बढ़ गए। उसकी आँखें आदर और उत्साह से भरी थीं। उसने तुरंत आगे बढ़कर चंदन बाबा के चरण स्पर्श करने के लिए अपने दोनों हाथ नीचे झुकाए।
 
लेकिन चंदन बाबा ने झटके से दो कदम पीछे हटते हुए मीरा को वहीं रोक दिया। उनके चेहरे पर संकोच और स्नेह का एक अनूठा भाव तैर आया। वे अपनी सहज और स्नेह भरे लहजे में झिझकते हुए बोले, "अरे-अरे मीरा बेटी! यह क्या कर रही हो? मुझ गरीब पर यह पाप मत चढ़ाओ। तुम तो इस घर की साक्षात लक्ष्मी हो, कुलवधू हो। मेरे जैसे सीधे-सादे इंसान के आगे ऐसे पैर मत छुओ बेटी।"
 
मीरा ने झुकी हुई नजरें उठाईं और उनकी आँखों में झांका, जहाँ केवल आदर और निश्छल अपनापा था।
 
उसने अपने हाथ जोड़ लिए और भरे गले से बोली, "बाबा, आप यह क्या कह रहे हैं? आप केवल इस घर के बड़े ही नहीं, हमारे लिए पिता समान हैं। बेटियों को अपने बड़ों का आशीर्वाद लेने से कोई कैसे रोक सकता है? आपके हाथ का स्पर्श ही हमारे लिए सबसे बड़ा सहारा है।"
 
चंदन बाबा ने ज्योति को गोद में संभाले रखते हुए ही मीरा के सिर पर अपना दाहिना हाथ रखा और भावुक होकर बोले, "बेटी, आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ ही है। पर सच पूछो तो तुम्हारे इस मान-सम्मान ने ही मुझे इस घर से बांध रखा है। वरना हम जैसे आम लोगों को भला इतना आदर कहाँ मिलता है?"
 
"आदर इंसान के पद से नहीं, उसके दिल और उसके कर्मों से होता है बाबा," मीरा की आँखों से अश्रुओं की एक बूंद ढुलककर गाल पर आ गई। "आपके आने से लगता है जैसे इस घर को उसकी रूह वापस मिल गई।"
 
चंदन बाबा के इन सादे, सहज और ममत्व भरे शब्दों को सुनकर मीरा का दिल भर आया था। उसकी आँखें आंसुओं से डबडबा गईं, पर वे आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस सुरक्षा और आत्मीयता के थे, जो चंदन बाबा के इस घर में कदम रखते ही सबने महसूस की थी।
 
मीरा ने मन ही मन राहत की एक लंबी और ठंडी सांस ली। उसके दिल पर जो एक भारी बोझ कई दिनों से बना हुआ था, वह कुछ पल के लिए हल्का होता हुआ महसूस हुआ।
 
वह चंदन बाबा की ओर देखते हुए सोचने लगी, "भगवान का लाख-लाख शुक्र है... अब चंदन बाबा के इस घर में रहने से उस हैवान शेर की रोज़-रोज़ की घटिया हरकतों और मानसिक टॉर्चर पर कुछ तो लगाम लगेगी। "
 
चंदन बाबा का एक अलग ही रोब और आदर है इस घर में। अब वो नीच इंसान कम से कम किसी बुजुर्ग की मौजूदगी में अपनी घिनौनी और घटिया हरकतें करने से पहले सौ बार सोचेगा। कम से कम बाबा के सामने तो उसे अपनी हैवानियत को दबाकर रखना ही पड़ेगा।
 
यह सोचकर मीरा के मन को जो सुकून मिला, उसकी झलक उसके चेहरे पर साफ तैर आई। उसकी आँखों में चमकती उसी खुशी और राहत के साथ वह मुड़ी और सरताज की ओर कदम बढ़ा दिए।
 
मीरा उस वक्त एक बेहद खूबसूरत और नफासत भरी काली साड़ी पहने हुए थी। काली साड़ी के उस गहरे रंग में उसका गोरा रंग और भी ज्यादा खिल रहा था, और साड़ी का पल्लू उसके कंधों पर सलीके से ढला हुआ था।
 
मीरा ने सरताज के करीब जाकर खुद को उसकी बांहों के घेरे में सौंप दिया। उसने बेहद प्यार और अपनत्व से सरताज के सीने पर अपना सिर टिकाया और शिकायत भरे, पर बेहद मीठे लहजे में बोली, "आपने तो मुझे बताया ही नहीं? मन ही मन इतनी बड़ी बात छिपाकर रखी थी... आप इतने बड़े-बड़े सरप्राइज कब से देने लग गए?"
 
सरताज ने मुस्कुराते हुए मीरा को अपनी बांहों में कस लिया। उसके हाथ मीरा की पतली कमर और पेट पर आ टिके, जहाँ काली साड़ी का रेशमी कपड़ा उसकी त्वचा को स्पर्श कर रहा था। सरताज की उंगलियों की गर्माहट और उसकी बांहों की मजबूत पकड़ ने मीरा के भीतर एक अजीब सा सुकून और सुरक्षा का एहसास भर दिया।
 
सरताज ने मीरा की ओर देखा, उसकी आँखों में झांका और मीरा को अपने और करीब खींचते हुए उसके कान के पास धीरे से कहा, "मैं तुम्हारे इस खूबसूरत चेहरे पर हमेशा ऐसी ही बेफिक्र और सच्ची खुशी देखना चाहता था मीरा। पिछले कुछ दिनों से तुम्हारा मन उदास रहता था, और मैं बस तुम्हें इस तरह मुस्कुराते हुए देखना चाहता था... तभी तो यह सरप्राइज छिपाकर रखा था।"
 
सरताज की बातें सुनकर मीरा के होठों पर एक शर्मीली और दिलकश मुस्कान आ गई। वह उसकी बांहों की गर्माहट में कुछ पल के लिए अपनी सारी परेशानियां भूल जाना चाहती थी।
 
तभी सरताज ने हल्के से मुस्कुराते हुए उसकी पीठ सहलाई और कहा, "चलो, अब ऐसे ही दरवाजे पर ही खड़े रहोगे क्या? बाबा थके हुए आए हैं, अब उन्हें प्यार से अंदर ले के चलो और उनके विश्राम का प्रबंध करो।"
 
सरताज के चेहरे पर भी मीरा को इतना खुश देखकर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई थी। अपनी पत्नी के इस खिलखिलाते रूप को तरसते हुए उन्होंने न जाने कितने दिन गुजारे थे।
 
दरअसल, घर आते वक्त गाड़ी चलाते समय ही उन्होंने चंदन बाबा को अकेले में एक बेहद अहम हिदायत दे दी थी। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि बाबा को बिना किसी की नज़र में आए मीरा की परेशानी और उसके खिंचाव की असली वजह ढूंढनी है।
 
लेकिन इस पूरे मिशन में सबसे सख्त शर्त यही थी कि यह बात बिल्कुल राज़ रहनी चाहिए। मीरा या घर के किसी भी सदस्य को जरा सा भी शक नहीं होना चाहिए।
 
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घर पहुँचकर सरताज ने चंदन बाबा को रहने के लिए वही आउटहाउस वाला क्वार्टर दे दिया, जहाँ शेर पहले से रह रहा था। अब मजबूरी यह थी कि दोनों को एक ही क्वार्टर में साथ रहना था।
 
जब शेर को पता चला कि चंदन बाबा पूरी तरह ठीक होकर वापस आ गए हैं, तो उसने तुरंत अपने चेहरे पर झूठी खुशी का नकाब ओढ़ लिया।
 
शेर (चंदन बाबा के गले मिलते हुए, बाहर से बेहद खुश होने का नाटक करते हुए बोला): "वाह बाबा! आपकी वापसी देखकर तो दिल बाग-बाग हो गया! भगवान का शुक्र है कि आप बिल्कुल भले-चंगे होकर लौट आए। अब आपके रहने से क्वार्टर में भी रौनक रहेगी!"
 
लेकिन जैसे ही वह चंदन बाबा से अलग हुआ और उसकी नज़र मुस्कुराती हुई मीरा पर पड़ी, उसके मन के भीतर गुस्से और गालियों का भयानक बवंडर फूट पड़ा। उसने साफ़ देख लिया था कि इस बुड्ढे के आते ही मीरा का चेहरा कैसे खिल उठा था और वह कितनी राहत महसूस कर रही थी।
 
शेर (मन ही मन सरताज, चंदन और मीरा को मां-बहन की नंगी गालियाँ देते हुए, नफरत से बड़बड़ाया): "भोसड़ी के सरताज की औलाद! साले मादरचोद को चैन ही नहीं है! एक तो खुद दिन-रात चूतियापा फैलाता है, और ऊपर से इस रांड के पिल्ले, गांडू बुड्ढे को सीधे मेरी ही छाती पर लाके पटक दिया! साला बहन का लौड़ा सरताज और यह भड़वा चंदन... दोनों मिलकर मेरी गाँड मारने में लगे हैं!"
 
शेर (मीरा के राहत भरे चेहरे को घूरते हुए ज़हर उगलता है): "और इस साली रंडी मीरा को देखो... कैसे मुँह फाड़-फाड़ के बत्तीसी दिखा रही है! साली सोच रही होगी कि इस बुड्ढे के आने से मेरे हाथ से बच गई! साली को लगता है कि अब शेर उसका कुछ उखाड़ नहीं पाएगा। साली को पता ही नहीं है कि शेर किस खेत की मूली है! तेरी चूत का घमंड तो मैं ही तोड़ूँगा, चाहे जो हो जाए!"
 
शेर (खौलते गुस्से में बड़बड़ाया): "हाँ, इस भड़वे चंदन के चौबीसों घंटे मेरी छाती पर चढ़े रहने से मालकिन के साथ टाइम बिताना और उसे पेले में लेना थोड़ा मुश्किल ज़रूर होगा... पर साली रंडी, तू ज़्यादा हवा में मत उड़! कुछ न कुछ जुगाड़ तो बैठा ही लूँगा। इस बुड्ढे की आँख बचाकर भी तुझे अपनी जाँघों के नीचे न लाया, तो मेरा नाम भी शेर नहीं!"
 
अब एक ही छत के नीचे दो अलग-अलग इरादे पनप रहे थे—एक तरफ चंदन बाबा सरताज के कहने पर घर की शांति और मीरा का सच जानने की टोह में थे, तो दूसरी तरफ शेर अपनी वासना और गंदी साजिशों के बीच इस नई रुकावट को चीरने का रास्ता खोजने में जुट गया था।

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रात गहराने लगी थी और सब लोग रात के खाने के लिए एक साथ इकट्ठा हुए। चंदन बाबा ने अपनी संकोची आदत के मुताबिक मेज पर बैठने से हिचकिचाते हुए मना कर दिया और कहा कि वे बाद में  खा लेंगे।
 
लेकिन मीरा ने चंदन बाबा का हाथ पकड़ लिया और उन्हें आदरपूर्वक खींचते हुए सीधे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बिठा दिया। उसने बड़े लाड और हक से कहा, "बाबा, आज बिल्कुल भी नखरे नहीं चलेंगे! आप कल से तो वैसे भी अपने काम पर लग ही जाओगे, और आज का सारा काम शेर संभाल रहा है। इसलिए आज आप हमारे ही साथ बैठकर खाना खाएंगे।"
 
शेर यह सब दूर खड़ा चुपचाप देख रहा था और अंदर ही अंदर ईर्ष्या की आग में बुरी तरह सुलग रहा था। मीरा का चंदन बाबा का हाथ पकड़ना उसे सख्त नागवार गुजर रहा था, जैसे उसकी आँखों में मिर्च लग गई हो।
 
वह मन ही मन गंदी-गंदी गालियां बकते हुए सोचने लगा, "साली रांड! पहले तो इसे सिर्फ सरताज के साथ चिपकते और लाड जताते देखना पड़ता था, और अब इस सड़ियल बुड्ढे के साथ भी वही नौटंकी चल रही है! आज तक कभी मेरा हाथ पकड़कर तो मुझे इतनी इज्जत से डाइनिंग टेबल पर नहीं बिठाया इसने!"
 
शेर कड़वाहट और जहर का घूंट पीकर रह गया, और न चाहते हुए भी चेहरे पर नकली मुस्कान लाकर सबके लिए खाना परोसने लगा।
 
लेकिन जब भी किसी का ध्यान उस पर नहीं होता, शेर की गंदी निगाहें मीरा की ओर घूम जातीं। मीरा की काली साड़ी के बीच से झांकता उसका गोरा, नंगा पेट शेर की नजरों में चढ़ चुका था, और वह मौका मिलते ही चोरी-छिपे उसकी कमर और पेट के हिस्से को अपनी हवस भरी आँखों से घूरने से बाज नहीं आ रहा था।

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डिनर के बाद सरताज अपने कमरे में बिस्तर पर लेटे हुए सीलिंग की तरफ ताक रहे थे। उनके दिमाग में रह-रहकर बस मीरा का चेहरा ही घूम रहा था। वे अच्छी तरह जानते थे कि मीरा के मन में कुछ न कुछ ऐसा जरूर चल रहा है जो उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रहा है।
 
"आखिर ऐसी क्या बात है जो मीरा को इतना परेशान कर रही है?" सरताज ने सोचते हुए एक गहरी सांस ली। "चंदन बाबा के घर में कदम रखते ही उनका मूड एकदम से बदल गया। उनके आते ही चेहरे पर जो सुकून और राहत आई, वो साफ बता रही थी कि वो किसी गहरे तनाव में थीं। लेकिन वो मुझसे यह बात क्यों छिपा रही हैं?"
 
इस सोच के साथ ही सरताज के दिल में एक कसक और मलाल सा उठने लगा। उन्हें दुख हुआ कि मीरा अपनी परेशानी अपने पति से न बांटकर मन ही मन घुट रही थी। "क्या हमारे बीच दूरी आ गई है? क्या वो अब मुझ पर पहले जितना भरोसा नहीं करती कि अपनी तकलीफ शेयर कर सके?"
 
लेकिन अगले ही पल सरताज ने अपने इस ख्याल को झटक दिया। "नहीं... ऐसा नहीं हो सकता। आज शाम को ही तो वो कितने प्यार से मेरे पास आई थी, मेरी बांहों में खुद को समेट लिया था। उसके स्पर्श में वही पुराना समर्पण और मोहब्बत थी।"
 
उन्होंने खुद को ही कोसते हुए सोचा, "शायद गलती मेरी ही है। मेरी नौकरी, मेरी व्यस्तताओं और काम के झंझटों की वजह से मैं उसे वक्त ही नहीं दे पाता। आज इतने दिनों बाद सिर्फ चंदन बाबा को वापस लाने के एक छोटे से सरप्राइज से वो कितनी खुश हो गई थी! उसका खिलखिलाता चेहरा बता रहा था कि वो बस मेरे थोड़े से ध्यान और वक्त की भूखी है।"
 
सरताज ने मन ही मन एक ठोस फैसला किया। "मुझे अपना यह शेड्यूल बदलना ही होगा। काम तो जिंदगी भर चलता रहेगा, पर मैं अपनी मीरा को इस तरह इग्नोर नहीं कर सकता। वो अगर सीधी है, अपने मुंह से अपनी तकलीफें या मांगें नहीं बोलती, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मैं उसे 'ग्रंटेड' ले लूं। मैं जल्द ही सब कुछ मैनेज करके मीरा को कहीं दूर किसी अच्छे वेकेशन पर लेकर जाऊंगा, ताकि हम दोनों एक-दूसरे को फिर से वो वक्त दे सकें जिसके हम हकदार हैं।"
 
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उधर बाथरुम के भीतर, सफेद रंग की सिल्क स्लिप पहने मीरा शीशे के सामने खड़ी खुद को निहार रही थी। पानी की कुछ बूंदें उसकी गर्दन और कंधों से ढुलक रही थीं। शीशे में अपनी परछाई को देखते हुए वह एक बार फिर गहरी सोच में डूब गई।
 
"सरताज मुझे कितना प्यार करते हैं..." उसने एक लंबी सांस खींचते हुए मन ही मन सोचा। "बिना मेरे कहे ही वे समझ गए कि कोई बात मुझे अंदर ही अंदर परेशान कर रही है। मेरी उसी परेशानी को दूर करने के लिए वे चंदन बाबा को वापस घर ले आए, ताकि मुझे कोई तकलीफ न हो। और एक मैं हूँ, जो अपनी इतनी बड़ी मुसीबत उनके साथ शेयर ही नहीं कर पा रही।"
 
उसके मन में अचानक झल्लाहट और बेबसी का बवंडर उठने लगा। "लेकिन मैं भी क्या करूँ? अगर मैंने सरताज को सच बताया, तो वह कसम... उस कसम का खौफ मुझे तोड़े दे रहा है। वह हैवान शेर किस तरह उस कसम का वास्ता देकर रोज मुझे अंदर तक नोच रहा है, मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहा है। और अगर सरताज को ज़रा सा भी इस बात का पता चल गया, तो वे अपने गुस्से में उस शेर को जिंदा ही गाड़ देंगे! फिर इस घर का, हमारे परिवार का क्या होगा?"
 
शीशे में अपनी उदास आँखों को देखते हुए मीरा का इरादा अचानक सख्त हो गया।
 
उसने अपने मन को मजबूत किया, "नहीं, मुझे ही हिम्मत दिखानी होगी। मुझे ही शेर को सीधे-सीधे समझाना होगा कि वह मुझे उस कसम के जाल से आजाद करे। अगर वह अब भी बाज नहीं आया और नहीं माना, तो भाड़ में जाए सब कुछ... मैं सरताज को खुद अपने मुंह से सारा सच-सच बता दूंगी। चाहे जो अंजाम हो!"
 
यह फैसला करते ही जैसे उसके दिल का एक बड़ा बोझ हल्का हो गया। वह बाथरुम का दरवाजा खोलकर बाहर कमरे में आई।
 
कमरे की हल्की डिम लाइट में सरताज बिस्तर पर उसका ही इंतजार कर रहे थे। मीरा बिना एक पल गंवाए सीधे बिस्तर पर आई और सरताज के सीने से सटकर उनकी मजबूत बांहों के घेरे में आ बैठी।
 
सरताज ने भी तुरंत अपने हाथ उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस लिए और उसकी जुल्फों को सहलाने लगे। मीरा ने अपना चेहरा उनके सीने में छुपा लिया, उस सुकून और सुरक्षा को महसूस करते हुए जो उसे सिर्फ अपने पति की आगोश में मिलती थी।
 
मीरा ने सरताज के सीने पर अपना सिर टिके-टिके ही धीरे से कहा, "थैंक यू सरताज..."
 
सरताज ने उसकी मुलायम जुल्फों में उंगलियां फेरते हुए हल्के से मुस्कुराकर पूछा, "किस लिए बाबा? अचानक यह थैंक यू किस बात का?"
 
मीरा ने अपना चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया और सरताज की आँखों में देखते हुए कहा, "आप सब जानते हैं... मुझे थोड़ा वक्त दीजिए, पर मुझ पर इस तरह भरोसा बनाए रखने के लिए बहुत-बहुत थैंक यू।"
 
सरताज ने उसे अपनी बांहों के मजबूत घेरे में और कसकर भींच लिया। उनकी आवाज़ में बेइंतहा मोहब्बत और भरोसा था, "मीरा, मैंने तुम पर कभी शक किया ही नहीं। तुम मेरी जिंदगी हो। बस... मैं तुम्हारे इस हसीन चेहरे पर हमेशा वही पुरानी हंसी और बेफिक्र मुस्कान देखना चाहता हूँ।"
 
मीरा कुछ पल के लिए सरताज के इस निश्छल प्यार में खो गई।
 
फिर उसके मन में चल रही कसम की कशमकश अचानक उसकी जुबान पर आ गई। उसने हिचकिचाते हुए कहा, "सरताज... आपसे एक सलाह लेनी थी।"
 
"हाँ पूछो, कैसी सलाह?" सरताज ने प्यार से उसकी ओर देखा।
 
मीरा ने अपनी घबराहट को छुपाने की कोशिश करते हुए पूछा, "क्या... अगर मैं किसी की कसम खा लूं, और गलती से या मजबूरी में मुझसे वह कसम टूट जाए... तो जिसके नाम की कसम खाई गई हो, क्या सच में उसको कोई हानि या नुकसान हो सकता है?"
 
यह सवाल सुनते ही सरताज का माथा ठनका। वे हैरान रह गए और सीधे होकर बैठते हुए मीरा की आँखों में आँखें डालकर पूछने लगे, "मीरा... तुम अचानक ऐसा अजीब सवाल क्यों पूछ रही हो? क्या बात है?"
 
मीरा सरताज की उस तीखी और फिक्रमंद नजरों का सामना नहीं कर पाई। उसे लगा कि कहीं सरताज को उसके डर का अंदाजा न लग जाए, इसलिए उसने तुरंत अपना चेहरा सरताज के चौड़े सीने में छुपा लिया।
 
वह उसके दिल की धड़कनों को महसूस करते हुए रुंधे गले से बोली, "प्लीज... आप बस मेरे इस सवाल का जवाब दे दीजिए ना, प्लीज।"
 
सरताज ने मीरा को अपने सीने से और थोड़ा सटा लिया और उसकी उंगलियों को अपने हाथ में थामते हुए शांति से समझाया, "मीरा, मैं सिख धर्म का पालन करता हूँ और हमारे धर्म के हिसाब से ऐसी कसमों का कोई वजूद या मतलब नहीं होता। हमारा धर्म हमें बस यही सिखाता है—सच्चे रहो, ईमानदार बनो, हर इंसान को इज्जत दो, लेकिन इसके साथ ही किसी भी अन्याय या गलत बात को बर्दाश्त मत करो।"
 
उन्होंने मीरा के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उसकी आँखों में सीधे देखते हुए आगे कहा, "मैं जानता हूँ कि तुम * धर्म में पली-बढ़ी हो, जहाँ बहुत से लोग कसमों की पवित्रता और उनके प्रभाव पर गहरा विश्वास रखते हैं। लेकिन एक इंसान के नाते मेरा यही मानना है कि अगर तुम किसी का नाम लेकर कसम खाती भी हो, तो तुम्हारे कसम तोड़ने से उस इंसान का कोई अहित या नुकसान कभी नहीं हो सकता।"
 
सरताज ने मीरा को दिलासा देते हुए कहा, "और सबसे बड़ी बात—अगर कोई इंसान किसी गलत काम को अंजाम देने के लिए या तुम्हें दबाने के लिए कसम का सहारा ले रहा है, तो ऐसी कसम को तोड़ देना ही सबसे सही और धर्म का काम है।"
 
सरताज के मुंह से यह बात सुनते ही मीरा को मानों जीवन की सबसे बड़ी राहत मिल गई।
 
उसके दिल पर पत्थरों जैसा जो भारी बोझ टिका हुआ था, वह एक झटके में उतर गया। उसकी आँखों में एक नया उजाला और आत्मबल आ गया।
 
उसने मन ही मन पक्का इरादा कर लिया कि अब वह उस हैवान शेर को अपनी नन्हीं बेटी ज्योति के सिर पर झूठी कसम का सहारा लेकर अपना नाजायज फायदा उठाने नहीं देगी। चाहे कुछ भी हो जाए, अब वह शेर के हाथों की कठपुतली बनकर मानसिक और शारीरिक टॉर्चर नहीं सहेगी।
 
उधर, सरताज बिस्तर पर लेटे-लेटे मीरा के चेहरे के बदलते भावों को गौर से देख रहे थे। उनके दिमाग में रह-रहकर यही ख्याल कौंध रहा था कि मीरा का यह कसम वाला सवाल कहीं न कहीं उसकी मौजूदा परेशानी से ही जुड़ा हुआ है। वे अभी इस बात की गहराई में जाने का सोच ही रहे थे कि मीरा ने उन्हें सोचने का मौका ही नहीं दिया।
 
मीरा, जो अब कसम के उस खौफनाक जाल से आजाद हो चुकी थी, एक नए अहसास और आजादी की उमंग से भर उठी थी।
 
उसने आगे बढ़कर बिना कुछ कहे सरताज के होठों पर अपने होंठ टिका दिए और उन्हें एक बेबाक और शिद्दत भरे प्यार की आगोश में खींच लिया। सरताज भी अपनी पत्नी के इस दीवानेपन और समर्पण में बह गए। दोनों के बीच की दूरियां और खिंचाव उस रात पूरी तरह मिट गए, और उन्होंने एक-दूसरे को बेपनाह और रूहानी मोहब्बत में डुबो दिया।
 
जुनून और तृप्ति से भरी इस हसीन रात के बाद, लगभग 10:30 बजे के आसपास दोनों एक-दूसरे की बांहों में सिमटकर सुकून की गहरी नींद में सो गए।

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रात के 12 बज चुके थे। पूरे कोठी परिसर में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। शेर हाथ में बीड़ी दबाए बगीचे के अंधेरे कोने में टहल रहा था।
 
उसका दिमाग खौल रहा था—क्वार्टर में चंदन बुड्ढा घोड़े बेचकर सो रहा था, लेकिन शेर की आँखों से नींद गायब थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस बुड्ढे के रहते मीरा तक कैसे पहुँचे।
 
तभी उसकी नज़र मुख्य कोठी की तरफ गई। मीरा और सरताज के बेडरूम की लाइट बंद हो चुकी थी।
 
सब कुछ शांत था कि अचानक सरताज के फोन की घंटी बजी। कुछ ही पलों में सरताज फोन कान से लगाए ड्राइंग रूम की तरफ आता दिखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जल्दबाज़ी थी।
 
बातचीत खत्म होते ही सरताज ने बिना वक्त गँवाए अपनी सिक्युरिटी की वर्दी पहनी, और तेज़ी से बाहर निकलकर अपनी ऑफिशियल गाड़ी की तरफ बढ़ा। शायद शहर में कोई बड़ी इमरजेंसी या सरकारी काम आ पड़ा था।
 
गाड़ी का सायरन हल्का सा बजा और उसकी हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई मेन गेट से बाहर निकल गईं।
 
गाड़ी के जाते ही शेर के शातिर दिमाग में एक ज़बरदस्त बत्ती जली!
 
शेर (अंधेरे में कमीनी मुस्कान लाते हुए मन ही मन फुसफुसाया): "अबे भाई! किस्मत हो तो ऐसी! साला साहब खुद ही रास्ता साफ़ करके चला गया! यानी इस वक्त कोठी के उस बड़े बेडरूम में मीरा रानी अकेली सो रही है... बिल्कुल बेखबर और अकेली!"
 
शेर ने तुरंत अपनी बीड़ी ज़मीन पर मसलकर बुझा दी।
 
शेर (मूंछों पर हाथ फेरते हुए): "चंदन क्वार्टर में सो रहा है, साहब ड्यूटी पर निकल गया... और मालकिन बिस्तर पर अकेली है। अगर चुपचाप दबे पाँव अंदर घुस जाऊँ और सीधा उसके बिस्तर पर जाकर उसके बगल में लेट जाऊँ? रात के इस गहरे अंधेरे में, नींद के आगोश में लिपटी मीरा को बिना शोर मचाए दबाने और छूने का इससे बेहतरीन मौका फिर नहीं मिलेगा!"
 
उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। पूरा बगीचा और कोठी अंधेरे की चादर में लिपटी थी। शेर ने दबे पाँव,  मुख्य कोठी के पिछले दरवाज़े की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। उसके दिल की धड़कनें तेज़ थीं, और दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी—अंधेरे कमरे में अकेली सो रही मीरा का वो गर्म जिस्म।
 
उधर मुख्य बेडरूम में मीरा बिल्कुल बेखबर, गहरी नींद के आगोश में सो रही थी। कमरे में एसी की हल्की ठंडक थी। मीरा ने उस वक्त बदन पर सिर्फ एक पतली सी सफेद स्लिप और नीची कमर की काली पैंटी पहन रखी थी।
 
वह स्लिप बेहद छोटी थी जो मुश्किल से उसकी सुडौल हिप्स तक पहुँचकर खत्म हो रही थी। उसकी दोनों मखमली, गोरी टाँगें पूरी तरह नंगी थीं, हालांकि उसने अपने जिस्म पर एक पतली सी चादर ओढ़ रखी थी।
 
सरताज इतनी खामोशी में बाहर निकले थे कि मीरा को उनके जाने की भनक तक नहीं लगी।
 
इसी बीच, शेर ने बड़ी शातिरता से बेडरूम का दरवाज़ा ढकेला और एक साये की तरह चुपचाप कमरे के अंदर दाखिल हो गया।
 
उसने अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन कर ली थी और हाथ को इस तरह ढका हुआ था कि रोशनी सिर्फ ज़मीन और बिस्तर के आसपास ही पड़े, ताकि कोई अचानक जाग न जाए।
 
मोबाइल की हल्की सी पीली रोशनी में जैसे ही शेर की नज़र सामने बड़े से किंग-साइज़ बेड पर पड़ी, उसकी साँसें अटक गईं।
Deepak Kapoor
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Naya Mod — 1

Sher jhatke se apni aankhen khoolkar bistar par uth baitha. Uski saansen tez chal rahi theen aur poora shareer paseene se tar-batar tha.

Jaise hi usne apni jaanghon ke paas mehsus hui us ajeeb si chipchipahat ki taraf dhyaan diya, uska muunh khula ka khula rah gaya. Uska pajama uske apne hi gaadhe veerya se poori tarah ganda aur geela ho chuka tha.

Kuch palon tak to Sher badhavaas sa kamre ki deewaron aur chhat ko taakta raha. Dheere-dheere uska dimaag thikaane aaya aur usse hakeekat ka ehsaas hua. Dopahar mein tantrik ke thikaane se lautne ke baad vah apne kamre mein aakar so gaya tha.

Vah poora kaamuk nazaara—Meera ka fawwaare ke neeche nange hokar nahana, uska panty chaatna, Meera ki choot mein jeebh aur uungli daalna, aur phir usse deewar se sataakar berahmi se pelna—sab kuch mahaz ek behad kaamuk sapna tha!

Hakeekat saamne aate hi Sher ka saara maza kaafoor ho gaya aur gusse ke maare uska chehra laal pad gaya.

Sher (bistar par zor se mukka maarte hue aur khud ko gaaliyan dete hue cheekha): "Abe chutiya hai kya be too Sher?! Saala haraamzaada! Poori zindagi bas aise hi hila-hilaakar mutth hi maarta rahega kya?! Kitni baar sapne mein mutth maar-maar ke hi kaam chalaayega too?!"

Vah bistar se utha aur pajame ke us geele dhabbe ko dekhkar nafrat aur kheejh se bhar gaya.

Sher (daant bheenchkar kamre mein tahalte hue, Meera ko koosne laga): "Saali Meera... toone to mera jeena haraam karke rakh diya hai! Na din ko chain hai, na raat ko sukoon! Hakeekat mein to nakhre dikhaati hai, aur sapnon mein aakar bhi aise tadpaati hai! Saala paagal banaakar chhod diya hai us aurat ne mujhe!"

Sher ne nafrat se apna ganda pajama utaara aur bathroom ki taraf badha, taaki us geelapan ko dhoo sake.

Lekin uske dimaag mein tantrik ka diya hua wo tooka aur Meera ke jism ki wahi aag ab bhi sulag rahi thi.

------------

Shaam dhalne lagi thi . Sartaj ghar waapas laute the, lekin unke peeche-peeche jab Chandan baba ki chir-parichit, shaant aur saumya kaaya bheetar daakhil hui, to maano poore ghar ka bojhail mahaul ek pal mein hi chhant gaya. Ghar ka soonaapan achanak ek gahri meethas aur apnepan se bhar gaya.

Chandan baba ko is tarah achanak ghar ki dehaleez par khada dekhkar Meera aur Jyoti ki aankhen avishwaas aur aseem khushi se chamak uthiin.

Jyoti, jo ab tak apne khilounon mein vyast thi, Chandan baba ka chehra dekhte hi apni sudh-budh kho baithi. Vah khiloune wahi chhodkar unke paas bhaagi aur bina ek pal ganwaaye unse kaskar lipat gayi.

Chandan baba ke chehre par ek tript muskaan khil uthi. Unhone turant apni majboot aur mamtamayi baanhon mein Jyoti ko uupar uthaa liya, usse apne seene se sataaya aur maatha choomte hue gadgad aawaz mein boole, "Meri laadli! Are, maine apni pyaari raajkumari betiya ko bahut miss kiya re! Itne din beet gaye, meri natkhat bitiya ko dekhe bina jaise chain hi nahi mil raha tha."

Jyoti ne unke gaal par apna nannha haath phera aur apne chulbule andaaz mein shikayat karte hue booli, "Baba! Aap itne din kahan gaayab the? Aapko meri yaad nahi aati thi kya? Dekhiye, maine aapke bina koi sharaarat bhi nahi ki."
Chandan baba khilkhilaakar hans pade, "Are meri rani, teri yaad to har ghadi aati thi. Bas zara kaam ka pheur tha. Ab dekh, tera baba aa gaya na!"

Dono ka yeh nishchhal prem dekhkar Meera ke kadam apne aap aage badh gaye. Uski aankhen aadar aur utsaah se bhari theen. Usne turant aage badhkar Chandan baba ke charan sparsh karne ke liye apne dono haath neeche jhukaaye.

Lekin Chandan baba ne jhatke se do kadam peeche hatte hue Meera ko wahi rook diya. Unke chehre par sankoch aur sneh ka ek anootHa bhaav tair aaya. Ve apni sahaj aur sneh bhare lahje mein jhijhakte hue boole, "Are-are Meera beti! Yeh kya kar rahi ho? Mujh gareeb par yeh paap mat chadhaao. Tum to is ghar ki saakshaat Lakshmi ho, kulvadhu ho. Mere jaise seedhe-saade insaan ke aage aise pair mat chhoo beti."

Meera ne jhuki hui nazaren uthaaiin aur unki aankhon mein jhaanka, jahaan keval aadar aur nishchhal apanaapa tha.

Usne apne haath jod liye aur bhare gale se booli, "Baba, aap yeh kya kah rahe hain? Aap keval is ghar ke bade hi nahi, hamare liye pita samaan hain. Betiyon ko apne badon ka aasheervaad leene se koi kaise rook sakta hai? Aapke haath ka sparsh hi hamare liye sabse bada sahara hai."

Chandan baba ne Jyoti ko god mein sambhaale rakhte hue hi Meera ke sir par apna daahina haath rakha aur bhaavuk hokar boole, "Beti, aasheervaad to hamesha tumhare saath hi hai. Par sach poochho to tumhare is maan-sammaan ne hi mujhe is ghar se baandh rakhha hai. Warna hum jaise aam logon ko bhala itna aadar kahan milta hai?"

"Aadar insaan ke pad se nahi, uske dil aur uske karmon se hota hai baba," Meera ki aankhon se ashruon ki ek boond dhalakkar gaal par aa gayi. "Aapke aane se lagta hai jaise is ghar ko uski rooh waapas mil gayi."

Chandan baba ke in saade, sahaj aur mamatva bhare shabdon ko sunkar Meera ka dil bhar aaya tha. Uski aankhen aansoon se dabdaba gayiin, par ve aansoo dukh ke nahi, balki us suraksha aur aatmiyata ke the, jo Chandan baba ke is ghar mein kadam rakhte hi sabne mehsus ki thi.

Meera ne man hi man raahat ki ek lambi aur thandi saans li. Uske dil par jo ek bhaari bojh kai dinon se bana hua tha, vah kuch pal ke liye halka hota hua mehsus hua.

Vah Chandan baba ki oor dekhte hue sochne lagi, "Bhagwan ka laakh-laakh shukr hai... ab Chandan baba ke is ghar mein rahne se us haiewaan Sher ki roz-roz ki ghatia harkaton aur maansik torture par kuch to lagaam lagegi."

Chandan baba ka ek alag hi roob aur aadar hai is ghar mein. Ab wo neech insaan kam se kam kisi buzurg ki maujoodgi mein apni ghinowni aur ghatia harkaten karne se pehle sau baar sochega. Kam se kam baba ke saamne to usse apni haiewaaniyat ko dabaakar rakhna hi padega.

Yeh sochkar Meera ke man ko jo sukoon mila, uski jhalak uske chehre par saaf tair aai. Uski aankhon mein chamakti usi khushi aur raahat ke saath vah mudi aur Sartaj ki oor kadam badhaa diye.

Meera us waqt ek behad khoobsurat aur nafaasat bhari kaali saree pahni hui thi. Kaali saree ke us gahre rang mein uska gora rang aur bhi zyaada khil raha tha, aur saree ka pallu uske kandhon par saleeqe se dhala hua tha.

Meera ne Sartaj ke kareeb jaakar khud ko uski baahon ke ghere mein saump diya. Usne behad pyaar aur apnepan se Sartaj ke seene par apna sir tikaaya aur shikayat bhare, par behad meethe lahje mein booli, "Aapne to mujhe bataaya hi nahi? Man hi man itni badi baat chhipaakar rakhi thi... aap itne bade-bade surprise kab se dene lag gaye?"

Sartaj ne muskuraate hue Meera ko apni baahon mein kas liya. Uske haath Meera ki patli kamar aur pet par aa tike, jahaan kaali saree ka reshmi kapda uski tvacha ko sparsh kar raha tha. Sartaj ki uungliyon ki garmaahat aur uski baahon ki majboot pakad ne Meera ke bheetar ek ajeeb sa sukoon aur suraksha ka ehsaas bhar diya.

Sartaj ne Meera ki oor dekha, uski aankhon mein jhaanka aur Meera ko apne aur kareeb kheenchte hue uske kaan ke paas dheere se kaha, "Main tumhare is khoobsurat chehre par hamesha aisi hi befikr aur sachhi khushi dekhna chahta tha Meera. Pichhle kuch dinon se tumhara man udaas rehta tha, aur main bas tumhe is tarah muskuraate hue dekhna chahta tha... tabhi to yeh surprise chhipaakar rakha tha."

Sartaj ki baaten sunkar Meera ke hotHon par ek sharmeeli aur dilkash muskaan aa gayi. Vah uski baahon ki garmaahat mein kuch pal ke liye apni saari pareshaniyan bhool jaana chahti thi.

Tabhi Sartaj ne halke se muskuraate hue uski peeth sahlaayi aur kaha, "Chalo, ab aise hi darwaze par hi khade rahoge kya? Baba thake hue aaye hain, ab unhen pyaar se andar le ke chalo aur unke vishraam ka prabandh karo."

Sartaj ke chehre par bhi Meera ko itna khush dekhkar ek sukoon bhari muskaan aa gayi thi. Apni patni ke is khilkhilaate roop ko taraste hue unhone na jaane kitne din gujaare the.

Darasal, ghar aate waqt gaadi chalaate samay hi unhone Chandan baba ko akele mein ek behad aham hidaayat de di thi. Unhone spasht kah diya tha ki baba ko bina kisi ki nazar mein aaye Meera ki pareshani aur uske khinchaav ki asli wajah dhoondhni hai.

Lekin is poore mission mein sabse sakht shart yahi thi ki yeh baat bilkul raaz rahni chahiye. Meera ya ghar ke kisi bhi sadasya ko zara sa bhi shak nahi hona chahiye.

---------

Ghar pahunchkar Sartaj ne Chandan baba ko rahne ke liye wahi outhouse wala quarter de diya, jahaan Sher pehle se rah raha tha. Ab majboori yeh thi ki dono ko ek hi quarter mein saath rahna tha.

Jab Sher ko pata chala ki Chandan baba poori tarah theek hokar waapas aa gaye hain, to usne turant apne chehre par jhoothi khushi ka naqaab odh liya.

Sher (Chandan baba ke gale milte hue, baahar se behad khush hone ka naatak karte hue boola): "Waah baba! Aapki waapsi dekhkar to dil baag-baag ho gaya! Bhagwan ka shukr hai ki aap bilkul bhale-change hokar laut aaye. Ab aapke rahne se quarter mein bhi raunaq rahegi!"

Lekin jaise hi vah Chandan baba se alag hua aur uski nazar muskuraati hui Meera par padi, uske man ke bheetar gusse aur gaaliyon ka bhayaanak bavandar phoot pada. Usne saaf dekh liya tha ki is buddhe ke aate hi Meera ka chehra kaise khil utha tha aur vah kitni raahat mehsus kar rahi thi.

Sher (man hi man Sartaj, Chandan aur Meera ko maan-behen ki nangi gaaliyan dete hue, nafrat se badbadaaya): "Bhosdi ke Sartaj ki aulaad! Saale maadarchod ko chain hi nahi hai! Ek to khud din-raat chutiyapa phailaata hai, aur uupar se is raand ke pille, gaandu buddhe ko seedhe meri hi chhati par laake patak diya! Saala behan ka lauda Sartaj aur yeh bhadwa Chandan... dono milkar meri gaand maarne mein lage hain!"

Sher (Meera ke raahat bhare chehre ko ghoorte hue zahar ugalta hai): "Aur is saali randi Meera ko dekho... kaise muunh phaad-phaad ke battisi dikhaa rahi hai! Saali soch rahi hogi ki is buddhe ke aane se mere haath se bach gayi! Saali ko lagta hai ki ab Sher uska kuch ukhaad nahi paayega. Saali ko pata hi nahi hai ki Sher kis kheet ki mooli hai! Teri choot ka ghamand to main hi toodunga, chahe jo ho jaaye!"

Sher (khoulte gusse mein badbadaaya): "Haan, is bhadwe Chandan ke chaubeeson ghante meri chhati par chadhe rahne se maalkin ke saath time bitaana aur usse pele mein lena thoda mushkil zaroor hoga... par saali randi, too zyaada hawa mein mat ud! Kuch na kuch jugaad to baitha hi loonga. Is buddhe ki aankh bachaakar bhi tujhe apni jaanghon ke neeche na laaya, to mera naam bhi Sher nahi!"

Ab ek hi chhat ke neeche do alag-alag iraade panap rahe the—ek taraf Chandan baba Sartaj ke kahne par ghar ki shaanti aur Meera ka sach jaanne ki toh mein the, to doosri taraf Sher apni vaasna aur gandi saazishon ke beech is nai rukaawat ko cheerne ka raasta khoojne mein jut gaya tha.

-------------

Raat gahraane lagi thi aur sab log raat ke khaane ke liye ek saath ikattHa hue. Chandan baba ne apni sankochi aadat ke mutaabik mej par baithne se hichkichate hue manna kar diya aur kaha ki ve baad mein khaa lenge.

Lekin Meera ne Chandan baba ka haath pakad liya aur unhen aadarpoorvak kheenchte hue seedhe dining table ki kursi par bitha diya. Usne bade laad aur haq se kaha, "Baba, aaj bilkul bhi nakhre nahi chalenge! Aap kal se to waise bhi apne kaam par lag hi jaaoge, aur aaj ka saara kaam Sher sambhaal raha hai. Isliye aaj aap hamare hi saath baithkar khaana khaayenge."

Sher yeh sab door khada chupchaap dekh raha tha aur andar hi andar eershya ki aag mein buri tarah sulag raha tha. Meera ka Chandan baba ka haath pakadna usse sakht naagavaar guzar raha tha, jaise uski aankhon mein mirch lag gayi ho.

Vah man hi man gandi-gandi gaaliyan bakte hue sochne laga, "Saali randi! Pehle to isse sirf Sartaj ke saath chipakte aur laad jataate dekhna padta tha, aur ab is sadiyal buddhe ke saath bhi wahi nautanki chal rahi hai! Aaj tak kabhi mera haath pakadkar to mujhe itni izzat se dining table par nahi bithaaya isne!"

Sher kadvaahat aur zahar ka ghoont peekar rah gaya, aur na chahte hue bhi chehre par nakli muskaan laakar sabke liye khaana parosne laga.

Lekin jab bhi kisi ka dhyaan us par nahi hota, Sher ki gandi nigahaen Meera ki oor ghoom jaatiin. Meera ki kaali saree ke beech se jhaankta uska gora, nanga pet Sher ki nazaron mein chadh chuka tha, aur vah mauka मिलते hi chori-chhipa uski kamar aur pet ke hisse ko apni havas bhari aankhon se ghoorte se baaj nahi aa raha tha.

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Dinner ke baad Sartaj apne kamre mein bistar par lete hue ceiling ki taraf taak rahe the. Unke dimaag mein rah-rahkar bas Meera ka chehra hi ghoom raha tha. Ve achhi tarah jaante the ki Meera ke man mein kuch na kuch aisa zaroor chal raha hai jo usse andar hi andar pareshan kar raha hai.

"Aakhir aisi kya baat hai jo Meera ko itna pareshan kar rahi hai?" Sartaj ne sochte hue ek gahri saans li. "Chandan baba ke ghar mein kadam rakhte hi unka mood ekdam se badal gaya. Unke aate hi chehre par jo sukoon aur raahat aai, wo saaf bata rahi thi ki wo kisi gahre tanaav mein theen. Lekin wo mujhse yeh baat kyon chhipaa rahi hain?"

Is soch ke saath hi Sartaj ke dil mein ek kasak aur malaal sa uthne laga. Unhen dukh hua ki Meera apni pareshani apne pati se na baantkar man hi man ghut rahi thi. "Kya hamare beech doori aa gayi hai? Kya wo ab mujh par pehle jitna bharosa nahi karti ki apni takleef share kar sake?"

Lekin agle hi pal Sartaj ne apne is khayaal ko jhatak diya. "Nahi... aisa nahi ho sakta. Aaj shaam ko hi to wo kitne pyaar se mere paas aai thi, meri baahon mein khud ko samet liya tha. Uske sparsh mein wahi puraana samarpan aur mohabbat thi."

Unhone khud ko hi koosne hue socha, "Shayad galti meri hi hai. Meri naukri, meri vyastataon aur kaam ke jhanjhaton ki वजह se main usse waqt hi nahi de paata. Aaj itne dinon baad sirf Chandan baba ko waapas laane ke ek chhote se surprise se wo kitni khush ho gayi thi! Uska khilkhilaata chehra bata raha tha ki wo bas mere thode se dhyaan aur waqt ki bhookhi hai."

Sartaj ne man hi man ek thos faisla kiya. "Mujhe apna yeh schedule badalna hi hoga. Kaam to zindagi bhar chalta rahega, par main apni Meera ko is tarah ignore nahi kar sakta. Wo agar seedhi hai, apne muunh se apni takleefen ya maangen nahi boolti, to iska matlab yeh bilkul nahi hai ki main usse 'granted' le loon. Main jald hi sab kuch manage karke Meera ko kahi door kisi achhe vacation par lekar jaunga, taaki hum dono ek-doosre ko phir se wo waqt de saken jiske hum haqdaaar hain."

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Udhar bathroom ke bheetar, safed rang ki silk slip pahni Meera sheeshe ke saamne khadi khud ko nihaar rahi thi. Paani ki kuch boonden uski gardan aur kandhon se dhalak rahi theen. Sheeshe mein apni parchhai ko dekhte hue vah ek baar phir gahri soch mein doob gayi.

"Sartaj mujhe kitna pyaar karte hain..." usne ek lambi saans kheinchte hue man hi man socha. "Bina mere kaye hi ve samajh gaye ki koi baat mujhe andar hi andar pareshan kar rahi hai. Meri usi pareshani ko door karne ke liye ve Chandan baba ko waapas ghar le aaye, taaki mujhe koi takleef na ho. Aur ek main hoon, jo apni itni badi museebat unke saath share hi nahi kar paa rahi."

Uske man mein achanak jh,.'aat aur bebasi ka bavandar uthne laga. "Lekin main bhi kya karoon? Agar maine Sartaj ko sach bataaya, to vah kasam... us kasam ka khauf mujhe tood de raha hai. Vah haiewaan Sher kis tarah us kasam ka waasta dekar roz mujhe andar tak noch raha hai, meri majboori ka fayda uthaa raha hai. Aur agar Sartaj ko zara sa bhi is baat ka pata chal gaya, to ve apne gusse mein us Sher ko zinda hi gaad denge! Phir is ghar ka, hamare parivaar ka kya hoga?"

Sheeshe mein apni udaas aankhon ko dekhte hue Meera ka iraada achanak sakht ho gaya.

Usne apne man ko majboot kiya, "Nahi, mujhe hi himmat dikhaani hogi. Mujhe hi Sher ko seedhe-seedhe samjhaana hoga ki vah mujhe us kasam ke jaal se aazaad kare. Agar vah ab bhi baaj nahi aaya aur nahi maana, to bhaad mein jaaye sab kuch... main Sartaj ko khud apne muunh se saara sach-sach bata doongi. Chahe jo anjaam ho!"

Yeh faisla karte hi jaise uske dil ka ek bada bojh halka ho gaya. Vah bathroom ka darwaza khoolkar baahar kamre mein aai.

----------

Kamre ki halki dim light mein Sartaj bistar par uska hi intezaar kar rahe the. Meera bina ek pal ganwaaye seedhe bistar par aai aur Sartaj ke seene se satkar unki majboot baanhon ke ghere mein aa baithi.

Sartaj ne bhi turant apne haath uski kamar ke ird-gird kas liye aur uski julfon ko sahlaane lage. Meera ne apna chehra unke seene mein chhipa liya, us sukoon aur suraksha ko mehsus karte hue jo usse sirf apne pati ki aagosh mein milti thi.

Meera ne Sartaj ke seene par apna sir tike-tike hi dheere se kaha, "Thank you Sartaj..."

Sartaj ne uski mulayam julfon mein uungliyan pheerte hue halke se muskuraakar poochha, "Kis liye baba? Achanak yeh thank you kis baat ka?"

Meera ne apna chehra thoda uupar uthaaya aur Sartaj ki aankhon mein dekhte hue kaha, "Aap sab jaante hain... mujhe thoda waqt dijie, par mujh par is tarah bharosa banaaye rakhne ke liye bahut-bahut thank you."

Sartaj ne usse apni baanhon ke majboot ghere mein aur kaskar bheench liya. Unki aawaz mein beintaaha mohabbat aur bharosa tha, "Meera, maine tum par kabhi shak kiya hi nahi. Tum meri zindagi ho. Bas... main tumhare is haseen chehre par hamesha wahi puraani hansi aur befikr muskaan dekhna chahta hoon."

Meera kuch pal ke liye Sartaj ke is nishchhal pyaar mein kho gayi.

Phir uske man mein chal rahi kasam ki kashmakash achanak uski zubaan par aa gayi. Usne hichkichaate hue kaha, "Sartaj... aapse ek salah leeni thi."

"Haan poochho, kaisi salah?" Sartaj ne pyaar se uski oor dekha.

Meera ne apni ghabrahat ko chhipaane ki koshish karte hue poochha, "Kya... agar main kisi ki kasam khaa loon, aur गलती se ya majboori mein mujhse vah kasam toot jaaye... to jiske naam ki kasam khaayi gayi ho, kya sach mein usko koi haani ya nuksaan ho sakta hai?"

Yeh sawaal sunte hi Sartaj ka maatha thanka. Ve hairan rah gaye aur seedhe hokar baithte hue Meera ki aankhon mein aankhen daalkar poochne lage, "Meera... tum achanak aisa ajeeb sawaal kyon poochh rahi ho? Kya baat hai?"

Meera Sartaj ki us teekhi aur fikramand nazaron ka saamna nahi kar pai. Usse laga ki kahi Sartaj ko uske dar ka andaaza na lag jaaye, isliye usne turant apna chehra Sartaj ke chaude seene mein chhipa liya.

Vah uske dil ki dhadkanon ko mehsus karte hue rundhe gale se booli, "Please... aap bas mere is sawaal ka jawaab de dijie na, please."

Sartaj ne Meera ko apne seene se aur thoda sata liya aur uski uungliyon ko apne haath mein thaamte hue shaanti se samjhaaya, "Meera, main Sikh dharm ka paalan karta hoon aur hamare dharm ke hisaab se aisi kasamon ka koi wajoog ya matlab nahi hota. Hamara dharm hamein bas yahi sikhaata hai—sachhe raho, eemaandaar bano, har insaan ko izzat do, lekin iske saath hi kisi bhi anyaay ya galat baat ko bardaasht mat karo."

Unhone Meera ke chehre ko apni hatheliyon mein liya aur uski aankhon mein seedhe dekhte hue aage kaha, "Main jaanto hoon ki tum ***** dharm mein pali-badhi ho, jahaan bahut se log kasamon ki pavitrata aur unke prabhaav par gahra vishwaas rakhte hain. Lekin ek insaan ke naate mera yahi maanna hai ki agar tum kisi ka naam lekar kasam khaati bhi ho, to tumhare kasam toodne se us insaan ka koi ahit ya nuksaan kabhi nahi ho sakta."

Sartaj ne Meera ko dilaasa dete hue kaha, "Aur sabse badi baat—agar koi insaan kisi galat kaam ko anjaam dene ke liye ya tumhe dabaane ke liye kasam ka sahara le raha hai, to aisi kasam ko tood dena hi sabse sahi aur dharm ka kaam hai."

Sartaj ke muunh se yeh baat sunte hi Meera ko maano jeevan ki sabse badi raahat mil gayi.

Uske dil par pattharon jaisa jo bhaari bojh tika hua tha, vah ek jhatke mein utar gaya. Uski aankhon mein ek naya ujaala aur aatmbal aa gaya.

Usne man hi man pakka iraada kar liya ki ab vah us haiewaan Sher ko apni nannhi beti Jyoti ke sir par jhoothi kasam ka sahara lekar apna naajaayaz fayda uthaane nahi degi. Chahe kuch bhi ho jaaye, ab vah Sher ke haathon ki kathputli bankar maansik aur shaareerik torture nahi sahegi.

Udhar, Sartaj bistar par lete-lete Meera ke chehre ke badalte bhaavon ko gaur se dekh rahe the. Unke dimaag mein rah-rahkar yahi khayaal kaundh raha tha ki Meera ka yeh kasam wala sawaal kahi na kahi uski maujooda pareshani se hi juda hua hai. Ve abhi is baat ki gahrai mein jaane ka soch hi rahe the ki Meera ne unhen sochne ka mauka hi nahi diya.

Meera, jo ab kasam ke us khaufnaak jaal se aazaad ho chuki thi, ek naye ehsaas aur aazaadi ki umang se bhar uthi thi.

Usne aage badhkar bina kuch kaye Sartaj ke hotHon par apne hontH tika diye aur unhen ek bebaak aur shiddat bhare pyaar ki aagosh mein kheench liya. Sartaj bhi apni patni ke is deewanepan aur samarpan mein bah gaye. Dono ke beech ki dooriyan aur khinchaav us raat poori tarah mit gaye, aur unhone ek-doosre ko bepanaah aur roohani mohabbat mein dooboo diya.

Junoon aur tripti se bhari is haseen raat ke baad, lagbhag 10:30 baje ke aas-paas dono ek-doosre ki baanhon mein simatkar sukoon ki gahri neend mein so gaye.

---------

Raat ke 12 baj chuke the. Poore kothi parisar mein gahra sannaata chhaa hua tha. Sher haath mein beedi dabaaye baageeche ke andhere kone mein tahal raha tha.


Uska dimaag khoul raha tha—quarter mein Chandan buddha ghoode bechkar so raha tha, lekin Sher ki aankhon se neend gaayab thi. Usse samajh nahi aa raha tha ki is buddhe ke rahte Meera tak kaise pahunche.

Tabhi uski nazar mukhya kothi ki taraf gayi. Meera aur Sartaj ke bedroom ki light band ho chuki thi.

Sab kuch shaant tha ki achanak Sartaj ke phone ki ghanti baji. Kuch hi palon mein Sartaj phone kaan se lagaaye drawing room ki taraf aata dikha. Uski aawaz mein ek ajeeb si jaldbaazi thi.

Baatcheet khatam hote hi Sartaj ne bina waqt ganwaaye apni security officer ki vardee pahni, aur tezi se baahar nikalakar apni official gaadi ki taraf badha. Shayad shahar mein koi badi emergency ya sarkari kaam aa pada tha.

Gaadi ka siren halka sa baja aur uski headlights andhere ko cheerti hui main gate se baahar nikal gayiin.

Gaadi ke jaate hi Sher ke shaatir dimaag mein ek zabardast batti jali!

Sher (andhere mein kameeni muskaan laate hue man hi man phusphusaaya): "Abe bhai! Kismat ho to aisi! Saala sahab khud hi raasta saaf karke chala gaya! Yaani is waqt kothi ke us bade bedroom mein Meera rani akele so rahi hai... bilkul bekhabar aur akele!"

Sher ne turant apni beedi zameen par masalkar bujha di.

Sher (moonchhon par haath pheerte hue): "Chandan quarter mein so raha hai, sahab duty par nikal gaya... aur maalkin bistar par akele hai. Agar chupchaap dabe paanv andar ghus jaaoon aur seedha uske bistar par jaakar uske bagal mein let jaaoon? Raat ke is gahre andhere mein, neend ke aagosh mein lipati Meera ko bina shor machaaye dabaane aur chhoone ka isse behtareen mauka phir nahi milega!"

Usne chaaron taraf nazar daudaai. Poora baageecha aur kothi andhere ki chaadar mein lipati thi. Sher ne dabe paanv, mukhya kothi ke pichhle darwaze ki taraf apne kadam badhaa diye. Uske dil ki dhadkanen tez theen, aur dimaag mein bas ek hi dhun sawaar thi—andhere kamre mein akele so rahi Meera ka wo garm jism.

Udhar mukhya bedroom mein Meera bilkul bekhabar, gahri neend ke aagosh mein so rahi thi. Kamre mein AC ki halki thandak thi. Meera ne us waqt badan par sirf ek patli si safed slip aur neechi kamar ki kaali panty pahan rakhi thi.

Vah slip behad chhoti thi jo mushkil se uski sudaul hips tak pahunchkar khatam ho rahi thi. Uski dono makhmali, gori taangen poori tarah nangi theen, haalaanki usne apne jism par ek patli si chaadar odh rakhi thi.

Sartaj itni khaamoshi mein baahar nikle the ki Meera ko unke jaane ki bhanak tak nahi lagi.

Isi beech, Sher ne badi shaatirta se bedroom ka darwaza dhakela aur ek saaye ki tarah chupchaap kamre ke andar daakhil ho gaya.

Usne apne mobile ki flashlight on kar li thi aur haath ko is tarah dhaka hua tha ki roshni sirf zameen aur bistar ke aas-paas hi pade, taaki koi achanak jaag na jaaye.

Mobile ki halki si peeli roshni mein jaise hi Sher ki nazar saamne bade se king-size bed par padi, uski saansen atak gayiin.
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What to say… what a twist and what an update..

Awesome…..
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Superb update bhai ... great work
[+] 1 user Likes Shabaz123's post
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kya yeh story aage bhi continue hogi......?
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(11-08-2026, 10:09 PM)Maniverse Wrote: Thanks for posting the story the continuously, we need more softcore, don't let sher to take over that heroine easily...I really like ur plot.. expecting more erotic screen plot and more characters in the story. Thanks and appreciate ur hardwork

Hope you like new episode . i had already developed before you put this message on website . Did not wanted to reveal story , so kept quiet .
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(14-08-2026, 06:38 AM)anushka Wrote: What to say… what a twist and what an update..

Awesome…..

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(11-08-2026, 10:18 PM)Crazy007 Wrote: Everytime setting the bar higher and higher

Kaise itna acha likh sakte hain

Har baar new twist and turns

Maza aa gaya

Aise hi likhate raho

Thanks For such Kind words . When even four lines are written with meaning , they create impact . it just tell author somebody is reading story and liking it . I see more than 2,00,000 Views but only few let me know where i need to improve and what i am doing good . 
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(14-08-2026, 10:40 AM)Shabaz123 Wrote: Superb update bhai ... great work

Thanks .For your support .
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Absolutely wonderful update great twist ab dakhty shatir sher kasa meera ka mazay leta andhere kamre man and thanks biddy for continuous updates back to back
[+] 1 user Likes Rizzi1198's post
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Hope to get a very big update in this weekend…
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Thanks for posting back to back updates.
Congratulations on 2 lakh views.
Naya Mod 1 finally introduced Chandan baba into the household.
Will be interesting to see whether Chandan baba is able to figure out Sher and his intentions.
Will he try to stop Sher or will be he moved out of the way by Sher?
Also liked that Sartaj still cares about Meera.

Now that Meera has decided she will no longer honour her promise for Jyoti to Sher, will she finally be able to put up a fight to Sher?
Also it remains to be seen how the tantrik baba angle plays out if Meera decides to break her promise.

Can't wait to find out if Meera will be able to recognise Sher in the dark of night in her bed.
Hope Sher will be able to make his dream come to reality on her bed in the next parts.

Keep it up Deepak bhai.
Waiting for your new update.
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Chandan Baba and sher together fuck meera..
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