05-08-2026, 08:54 AM
Awesome update bhai, really love the story development, waiting to see what happens in the next part.
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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
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05-08-2026, 08:54 AM
Awesome update bhai, really love the story development, waiting to see what happens in the next part.
05-08-2026, 11:17 PM
Awesome update.. Thanks…
Waiting for longest update on this weekend
Ekdum chutiyapa story hai. Koyee sense nahi banti hai. Koyee bhi padhi likhi aurat sirf ek kasam ki wajah se apni izzat nilam nahi kar degi. wo bhi yeh jante hue ke samne wala uski stithi ka fayda utha raha hai.
Har story mein acche logon ko hi kyon takleef uthani padti hai.
06-08-2026, 11:45 PM
Eagerly waiting……..
08-08-2026, 02:28 AM
(This post was last modified: 08-08-2026, 02:41 AM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
(06-08-2026, 09:21 AM)Pirate7007 Wrote: Ekdum chutiyapa story hai. Koyee sense nahi banti hai. Koyee bhi padhi likhi aurat sirf ek kasam ki wajah se apni izzat nilam nahi kar degi. wo bhi yeh jante hue ke samne wala uski stithi ka fayda utha raha hai. I thank you for negative feedback . At last after reading 25 pages of story You find courage to give feedback . Regarding kasam or vachan , Even lord Ram , spent 14 years just because his father gave word to his wife . I know it is hard to believe . Rest I am sure , if you are looking for realistic stories , you would not have watched any mainstream Hindi , English & south indian movies . In fact , None of stories in this forum , you can call it realistic . i agree with your observation that kasam was weak threat which even villian of this story realize . in second last episode he is already working on how to consolidate his hold , if heroine rebel . I have already developed 7-8 more episode . keep on reading to see how he consolidate his hold. Thanks Anyway for reading so far and posting comment .
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
08-08-2026, 03:10 AM
खौफ और साजिश—9
उसकी सांसें शेर की सांसों से भी ज़्यादा तेज़ हो चुकी थीं। भले ही उसका दिमाग इस कृत्य से नफरत कर रहा था, लेकिन उसके बदन के भीतर छिपी उत्तेजना अब धीरे-धीरे उसके आंसुओं पर हावी हो रही थी। उसके मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ अब हल्की-हल्की कामुक आहों में बदलने लगी थीं— "आह्ह्... उफ़्फ़... श्श्श्..."—जिसे देखकर शेर की आँखों में जीत का वहशीपन और गहरा हो गया। शेर ने मीरा के गालों पर बहते आंसुओं को देखा, तो उसने अपने हाथों की पकड़ को थोड़ा सा ढीला किया । उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और मीरा के गाल पर बहते गरम आँसू को बेशर्मी से चाट लिया। शेर (आँसू चाटने के बाद जीभ से चिढ़ाता है): "अरे-अरे मेमसाब! रोना बंद कीजिए... अगर अब एक भी आँसू आपकी इस गोरी आँख से टपका, तो मैं फिर से आपका पूरा चेहरा अपनी जीभ से चाट डालूँगा! समझे आप?" मीरा (कांपते हुए, अपनी आँखें भींचकर सिसकती है): "नहीं... शेर... मुझे छोड़ दो... मैं बर्बाद हो जाऊँगी... आह्ह्..." शेर (कुटिल मुस्कान के साथ, उसकी कमर पर अपनी उंगलियाँ नचाते हुए ताना कसता है): "अरे कैसी बर्बादी मेमसाब? हमारा वो समझौता याद है न? यह कोई ज़बरदस्ती थोड़े ही है! ज़रा सोचिए... अपनी लाडली ज्योति बिटिया की उस अनमोल जिंदगी के सामने, इस गोरे जिस्म का यह थोड़ा सा मज़ा क्या मायने रखता है? मैंने तो आपके परिवार के लिए अपना खून बहाया है मेमसाब, और आप इस गरीब नौकर को अपनी इस जवानी का थोड़ा सा रस देने में इतना नखरा दिखा रही हैं?" शेर (कामुक ठहाका लगाते हुए आगे जोड़ता है): "और सच-सच बताइए मेमसाब... आपका यह गरम बदन जो ऐसे थिरक रहा है और मुँह से 'आह्ह्-उफ़्फ़' निकल रहा है, क्या इसे सच में इस नौकर की छुअन पसंद नहीं आ रही? बदन तो आपका पूरा मज़ा ले रहा है!" मीरा (शर्म और बेकाबू कामुक अहसास से बेबस होकर आह भरती है): "उफ़्फ़... श्श्श्... शेर... ऐसा मत बोलो... प्लीज..." शेर (अपनी आँखें सिकोड़कर, सीधे मीरा की आँखों में ताकते हुए हुक्म देता है): "तो फिर प्यारी मेमसाब, मेरी रानी... इन गोरे-गोरे हाथों को आगे बढ़ाइए।" शेर (ज़हरीली फुसफुसाहट में कहता है): "अपने हाथों से अपने इस नीले ब्लाउज के बटनों को एक-एक करके खोलिए... और फिर अपनी उस चोली को भी उतारकर फेंक दीजिए। मुझे अपनी इस प्यारी मालकिन के उन दोनों रसीले, सुडौल मम्मों को बिल्कुल नंगा देखना है। खोलो बटन मेमसाब... देर मत करो, अपनी इस जवानी का पूरा खजाना आज अपने इस नौकर-सह-राजा के हवाले कर दो!" मीरा ने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा, जहाँ शायद उसका भगवान भी आज खामोश था। उसके बदन में उठती कामुक तरंगें और दिमाग में बेटी का खौफ—दोनों मिलकर उसकी रूह को छलनी कर रहे थे। उसकी काँपती हुई उंगलियाँ अब धीरे-धीरे उसके ब्लाउज के बटनों को एक-एक करके ढीला करने लगीं। हर बटन के खुलने के साथ उसकी छाती की धड़कनें तेज़ हो रही थीं । शेर (उत्तेजना से अपनी राल टपकाते हुए, उसकी छाती को घूरते हुए): "हाँ... मेमसाब... ऐसे ही... धीरे-धीरे। देखो, इस शेर का दिल कितनी ज़ोर से धड़क रहा है। रोना मत, बस खोलती जाओ..." मीरा के हाथों ने जैसे खुद को किसी मशीन के हवाले कर दिया था। उसने दूसरा, फिर तीसरा और आखिरकार ब्लाउज का आखिरी हुक भी अलग कर दिया। ब्लाउज के दोनों हिस्से दरक कर दोनों तरफ फैल गए, जिससे उसके भीतर की गहरे नीले रंग की महीन ब्रा और उससे दबा हुआ उसका भरा-पूरा वक्षस्थल आधा बेपर्दा हो गया। शेर की आँखें वासना के मारे फटने को हो गईं। शेर (अपनी जीभ होठों पर फेरते हुए, ब्रा के हुक पर हाथ टिकाता है): "आह्ह् मीरा रानी! क्या गज़ब के मम्मे हैं आपके... ब्रा के इस पतले कपड़े में से भी कैसे बाहर आने को तड़प रहे हैं! अब देर मत कीजिए रानी साहब, इस आखरी रुकावट को भी हटा ही दीजिए।" मीरा ने थरथराते हाथों से ब्रा की पट्टी को पीछे सरकाया और ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा के ढीले होते ही उसके दोनों भरे-पूरे, गोरे मम्मे पूरी तरह आज़ाद होकर शेर की नज़रों के सामने बेपर्दा हो गए। शेर ने मीरा के दोनों सुडौल मम्मों को बिल्कुल नंगा देखा, तो कुछ पलों के लिए उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह उनकी बेमिसाल खूबसूरती को देखकर पूरी तरह भौंचक्का रह गया। मीरा का वक्षस्थल बेहद सुडौल, कसा हुआ और कसावट से भरा था—उसमें ज़रा सा भी ढीलापन नहीं था। उनके अग्रभाग पर सजे गुलाबी निप्पल इस वक्त खौफ, ठंडक और जिस्मानी उत्तेजना के मिले-जुले अहसास से पूरी तरह अकड़कर बाहर की तरफ तन चुके थे। शेर अपनी भूखी नज़रों से उसके मम्मों की खूबसूरती को पीता रहा, फिर उसने अपनी आँखें ऊपर उठाकर सीधे मीरा की डबडबाई, बेबस आँखों में झांका। शेर (कामुक उन्माद में हांफते हुए, अपनी उंगलियों से उसके कसावदार मम्मे की गोलाई को सहलाकर फुसफुसाया): "आह्ह् मीरा रानी... कसम से, दिल ही नहीं भरता इन रसीले उभारों को देखने से!" शेर (चेहरे पर एक शैतानी, चिढ़ाने वाली मुस्कान लाते हुए ताना कसता है): "कल भी देखा था मैंने इन मम्मों का कमाल... कल तो तुमने इन्हें मेरी छाती पर बुरी तरह रगड़ा था, याद है न? पर देखो... आज फिर से इन्हें इस तरह बेपर्दा देखकर यह शेर पूरी तरह पागल हो गया है!" शेर (उसके अकड़े हुए गुलाबी निप्पल पर चुटकी काटते हुए ज़हरीली फुसफुसाहट में बोला): "और ज़रा देखिए तो सही रानी साहब... आपकी यह छाती कैसे फड़क रही है, और ये गुलाबी निप्पल कैसे अकड़कर खड़े हैं! अब बताओ रानी... यह डर के मारे तन गए हैं, या फिर इस नौकर के हाथों से कुचले जाने की वासना में?" मीरा (निप्पल पर उसकी छुअन महसूस होते ही तड़प उठती है, उसके मुँह से बेकाबू आह निकल जाती है): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... श्श्श्... ऐसा... ऐसा मत बोलो... प्लीज..." शेर ने अपने दोनों मजबूत हाथों को मीरा की नंगी, चिकनी कमर पर जमाया और एक झटके में खींचकर उसे अपनी फैलाकर रखी जाँघ पर बैठा लिया। अब मीरा शेर की एक जाँघ पर लाचार और बेबस बैठी हुई थी। शेर की चौड़ी जाँघ मीरा की दोनों नंगी जाँघों के बिल्कुल बीचों-बीच आ फँसी थी, जिससे उसका घुटना सीधे मीरा की योनि के सबसे नाज़ुक हिस्से से जा टकराया। कपड़े का नामोनिशान नहीं बचा था; साड़ी कमर तक लिपटी हुई बेतरतीब बिखरी थी और ऊपर से उसकी पूरी छाती, उसके दोनों सुडौल मम्मे और गुलाबी निप्पल पूरी तरह नंगे होकर दोपहर की रोशनी में चमक रहे थे। शेर (मीरा की योनि पर अपनी जाँघ का सीधा दबाव बनाते हुए कामुक हँसी हँसा): "वाह मीरा रानी... वाह! अब आई न तुम सही जगह पर। ज़रा देखो तो सही कि मालकिन और नौकर का यह मिलन कितना सुंदर लग रहा है!" शेर की जाँघ का सख्त स्पर्श सीधे अपनी योनि पर महसूस होते ही मीरा के वजूद में खौफ और कामुकता की एक ऐसी भयानक बिजली दौड़ी कि वह सिहर उठी। खौफ और तेज़ सांसों के चलने के कारण उसके नंगे मम्मे बड़ी तेज़ी से ऊपर-नीचे फड़कने लगे। मीरा (सांसें फूलने और घबराहट के मारे तड़पते हुए): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... प्लीज... यह क्या कर रहे हो... मत दबाओ वहाँ... श्श्श्..." शेर (उसकी नंगी छाती के तेज़ थिरकन को वासना से ताकते हुए चिढ़ाता है): "अरे-अरे रानी साहब! ज़रा संभालिए अपने इन रसीले उभारों को... कैसे थर-थर कांप रहे हैं! आपकी योनि से लेकर इस सीने तक जो आग लगी है, वो साफ़ बता रही है कि आपको मेरी जाँघ का यह दबाव कितना मज़ा दे रहा है।" शेर को अपनी जाँघ के सीधे दबाव से मीरा की पैंटी वाले हिस्से की नमी और गीलापन साफ़ महसूस हो रहा था। लेकिन उसकी निगाहें तो मीरा के उन दोनों नंगे सुडौल मम्मों पर टिकी थीं, जो इस वक्त उसके मुँह के ठीक थे। शेर (मीरा के नंगे, कड़क निप्पलों को घूरते हुए): "वाह! इन्हीं रसीले उभारों से मीरा रानी ने कभी ज्योति को दूध पिलाया था..." शेर यह अच्छी तरह जानता था कि ज्योति मीरा और उसके पति की गोद ली हुई बेटी है, जिसे बचाने का अहसान उसने अपनी जान दांव पर लगाकर चुकाया था। शेर (मीरा की नंगी छाती के करीब अपना चेहरा लाते हुए में फुसफुसाया): "ज़रा सोचिए मीरा रानी... जिस ज्योति को बचाने के लिए मैंने अपना खून बहाया, उसी बेटी की जान की सलामती के बदले इस गरीब शेर का भी तो हक बनता है न कि वह अपनी रानी के इन मम्मों से अपनी प्यास बुझाए?" शेर (उसके गुलाबी निप्पल पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए ताना कसता है): "ज़रा देखिए तो सही रानी जी... कैसे ये गुलाबी निप्पल फुलाकर मुझे पुकार रहे हैं! चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि 'आ शेर... आ और इन्हें अपने मुँह में भरकर ज़ोर-ज़ोर से चूस ले!'" शेर (कामुक ठहाका लगाकर): "जब आपकी नीयत ही पिघल चुकी है और मम्मे मुझे न्योता दे रहे हैं, तो इस नौकर को भला इंकार करने का क्या हक?" मीरा (उसकी बातें सुनकर और मम्मों पर उसकी सांसों की तपन महसूस करके तड़प उठती है): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... नहीं... प्लीज...ऐसा नीच ख्याल भी मुँह पर मत लाओ… श्श्श्..." "ख्याल क्यों न लाऊँ मेमसाब? मेरा तो पूरा हक बनता है!" इतना कहते ही शेर ने अपना मुँह आगे बढ़ाया और मीरा के एक सुडौल मम्मे पर सीधे डाका डाल दिया। उसके ने उस मखमली उभार को कसकर अपने भीतर भर लिया और वह उसके गुलाबी निप्पल को किसी भूखे नवजात बच्चे की तरह ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा। उसका एक चौड़ा हाथ मीरा की पूरी तरह नंगी पीठ पर जा जमा, ताकि वह उसके तड़पते जिस्म को मजबूती से सहारा दे सके और उसे पीछे न हटने दे। वहीं, नीचे शेर ने अपनी जाँघ को मीरा की टाँगों के बीच और गहराई में रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी सख्त जाँघ का सीधा हमला अब मीरा की पूरी तरह गीली हो चुकी चूत पर होने लगा था, जहाँ हर रगड़ के साथ कपड़ों के आर-पार भी तीखा दबाव पड़ रहा था। मीरा (ऊपर मम्मे पर तीखे चूसने के अहसास और नीचे चूत पर होते ज़बरदस्त हमले से तड़प उठी, उसकी आँखें मुँद गईं): "आअाह्ह्... उफ़्फ़... श्श्श्... शेर... छोड़ो... मर जाऊँगी... आह्ह्!" शेर (मम्मे को मुँह में भरे-भरे ही गुर्राते हुए, अपनी जीभ से उसके कड़क निप्पल को चूस-चूस कर मसलता रहा): "उम्मम्म्म... आह्ह् रानी... क्या मक्खन जैसा रस है... नीचे से तो चूत पानी छोड़ रही है और ऊपर से मम्मे मुँह में पिघल रहे हैं!" पूरी तरह से एक मम्मे को चूसने और उसकी छाती पर अपनी लार की छाप छोड़ने के बाद, शेर ने आखिरकार अपना मुँह ऊपर उठाया। उसने सीधे मीरा आँखों में अपनी नज़रें गाड़ दीं। शेर (कमीनेपन से मुस्कुराया): "क्यों मेमसाब? क्या अब भी आप यह कहना चाहती हैं कि इस सब में आपकी रज़ामंदी नहीं है?" मीरा इस घोर अपमान और अपने ही बदन के इस धोखे को सह नहीं सकी। उसने शर्म और गिल्ट के मारे अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाने की कोशिश की। लेकिन शेर उसकी इस खामोशी से रुकने वाला नहीं था। उसने तुरंत अपना एक हाथ नीचे बढ़ाया और उसकी साड़ी को सरकाते हुए उसकी नंगी जाँघों के बीच गहराई में घुसा दिया। बिना एक पल गँवाए, उसने उसकी गीली पैंटी को एक तरफ खिसकाया और अपनी एक उंगली सीधे उसकी चूत में गहराई तक घुसा दी। मीरा (अचानक हुए इस तीखे हमले से तड़प उठी): "आह्ह्ह्! शेर... मर गई... निकालो इसे... प्लीज!" उसका दिमाग चीख-चीख कर इस कृत्य से नफरत कर रहा था, सरताज का चेहरा याद करके ग्लानी से भर रहा था, लेकिन उसका ३२ साल का जवां और कामुक बदन इस लगातार हो रहे तीखे शारीरिक आक्रमण के आगे अपनी सुध-बुध खोने लगा था। शेर ने उस उंगली को कुछ पलों तक उसकी कामुक नमी में अंदर-बाहर किया, जिससे मीरा का पूरा शरीर थरथरा उठा। फिर उसने झटके से उंगली को बाहर निकाला और उस चूत के रस से भीगी हुई गीली उंगली को सीधे मीरा की आँखों के सामने ला दिया। शेर (अपनी भीगी हुई उंगली को उसकी आँखों के सामने नचाते हुए): "अब बोलिए मेमसाब! क्या अब भी कहेंगी कि इसमें आपकी मर्ज़ी नहीं है? आपकी ज़ुबान तो झूठ बोल सकती है, पर आपकी चूत से टपका यह रस कभी झूठ नहीं बोलता!" शेर (उस उंगली को अपनी जीभ से बेशर्मी से चाटते हुए मुस्कुराया): "देखिए... आपकी ही जवानी की गवाही दे रहा है यह पानी!" मीरा ने अपने कांपते हाथों से शेर की भीगी उंगली को अपने चेहरे के सामने से हटाया। उसकी आँखों में बेबसी के साथ-साथ एक अजीब सी जलती हुई नफरत थी। मीरा (अपनी बहती आँखों को पोंछते हुए, कांपती लेकिन सख्त आवाज़ में बोली): "नहीं शेर... जो तू सोच रहा है वो सच नहीं है! मैंने कल भी तुझसे यही कहा था, और आज फिर कह रही हूँ... मैं सिर्फ अपनी कसम से बंधी हुई हूँ, वरना तुझे अपने शरीर पर हाथ भी न लगाने देती!" मीरा ( हांफते स्वर में बोली): "यह आहें, यह बदन की उत्तेजना... यह किसी भी औरत के जिस्म में हो जाएगी अगर तू इस तरह उसके बदन को छुएगा! यह शरीर की एक अनजानी लाचारी है, मेरी रज़ामंदी नहीं!" मीरा (शेर की जाँघ से खुद को अलग करने का प्रयास करते हुए गिल्ट और दर्द में सिसक उठी): "इसका सबूत मैंने तुझे कल भी दिया था और आज भी दे रही हूँ... मैं जा रही हूँ अपने कमरे में। आज के लिए बहुत हुआ! यह इस बात का सबूत है कि मैं जो भी सह रही हूँ, सिर्फ और सिर्फ अपनी औलाद के लिए सह रही हूँ।" मीरा (शेर की आँखों में घूरते हुए, अपनी रुंधी हुई आवाज़ में चीख पड़ी): "तू जानता है कि ज्योति मेरी सगी नहीं, अपनाई हुई बेटी है... फिर भी मेरा कलेजा कांप जाता है कि मेरी बच्ची को कुछ हो न जाए! और एक तू है नीच... जो मेरी इस ममता और मेरी कसम का बार-बार नज़ायज़ फ़ायदा उठाए जा रहा है!" इतना कहकर मीरा ने अपनी साड़ी और पल्लू को किसी तरह संभाला और अपने कांपते पैरों से रसोई से बाहर अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए, जबकि उसका पूरा वजूद इस घोर अपमान से कांप रहा था। --------------- मीरा के कमरे की तरफ जाते ही रसोई में सन्नाटा छा गया। शेर अपनी कुर्सी पर ही बैठा रह गया, लेकिन उसका चेहरा गुस्से और निराशा से लाल हो चुका था। उसने अपने ही सिर पर हाथ मारा और दाँत भींचकर खुद को गालियाँ देने लगा। शेर (मन ही मन खुद पर झुंझलाते हुए, गुस्से में बड़बड़ाया): "अबे चूतिया है क्या बे तू शेर?! क्या ज़रूरत थी तुझे फिर से वही गंदा सवाल पूछने की?! जब सब कुछ इतना सही और स्मूथ चल रहा था, तो तुझे अपनी औकात दिखाने की क्या खुजली मची थी?!" वह अपनी उसी गीली उंगली को देखने लगा, जिसे थोड़ी देर पहले मीरा के चेहरे के सामने लहराकर अपनी जीत की डफली बजा रहा था। शेर (कुर्सी पर मुक्का मारते हुए खुद को कोसता है): "साला बनी-बनाई बात बिगाड़ दी! मालकिन अपने हाथ से अपने मम्मे दे रही थी, बदन पिघल रहा था... और तूने एक फालतू सवाल पूछकर सारा खेल ही खराब कर दिया! अब देख, फिर से वही कसम, वही ज्योति, और वही नफरत का राग शुरू हो गया।" शेर (ठंडी सांस खींचता है): "सब्र नहीं है तेरे में शेर... थोड़ा और सब्र रखता तो आज मालकिन पूरी की पूरी तेरी ज़द में होती। पर नहीं, तुझे तो तुरंत मालकिन का गुरूर तोड़ना था! अब बैठ यहाँ अकेले, पूरी प्रोग्रेस का सत्यानाश करके!" शेर ने कुर्सी से उठकर अपनी पेंट में तने हुए सख्त लंड को सुधारा और रसोई के दरवाजे की तरफ देखा, जहाँ से मीरा अभी-अभी निकली थी। मीरा के वे आखिरी शब्द उसके कानों में फिर से गूंजे— "आज के लिए बहुत हुआ..." शेर (अपने होंठों पर अपनी जीभ फिराते हुए, एक धूर्त और उम्मीद से भरी मुस्कान लाया): "रुक... उसने क्या कहा था? 'आज के लिए बहुत हुआ'... इसका मतलब... इसका मतलब कल फिर चांस है! खेल खत्म नहीं हुआ है बे शेर!" वह अपनी जाँघों को सहलाने लगा जहाँ थोड़ी देर पहले मीरा की नंगी, मखमली टाँगें फँसी हुई थीं, और वह गीलापन अब भी उसकी पैंट पर मौजूद था। शेर (पछतावे से सिर झटकते हुए फिर से बड़बड़ाया): "पर यार... काश मैं वो चूतियापा न करता! साला कितना बेवकूफ हूँ मैं। अभी तो सिर्फ एक उंगली घुसाई थी... चूत से इतना रस बह रहा था कि अगर थोड़ी देर और अपनी ज़ुबान बंद रखता और बस मम्मे चूसता रहता, तो कसम से आज ही यह मालकिन मेरा पूरा लंड अपने मुँह में या चूत में ले लेती!" शेर (अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए कमीनेपन से मुस्कुराया): "कोई बात नहीं शेर... सब्र का फल मीठा होता है। आज उसने मम्मे खुद नंगे किए, चूत में उंगली भी सह ली... कल जब ज्योति बिटिया के नाम की कसम दोबारा याद दिलाऊँगा, तो मालकिन को पूरी तरह इस शेर के नीचे आना ही पड़ेगा। कल का सूरज इस शेर के लिए और रंगीन होने वाला है!" शेर मुस्कुरा ही रहा था कि अचानक उसके दिमाग की बत्ती जली। उसे मीरा का वो बेबाक अंदाज़ और सीधे उठकर चले जाना याद आया। शेर (गंभीर होकर ,सोचने लगा): "अबे शेर, ज़्यादा हवा में मत उड़! इस कसम की भी एक हद है। आज जैसे ही बात हद से आगे बढ़ी, मालकिन अपनी कसम और ज्योति को भूलकर सीधे उठकर चली गई। अगर इसे पूरी तरह गुलाम बनाना है, तो सिर्फ ज़ुबान की कसम से काम नहीं चलेगा... इसे आंखों के सामने खौफ दिखाना पड़ेगा कि अगर यह पलटी, तो ज्योति की जान सच में खतरे में पड़ जाएगी। तभी यह मालकिन पूरी तरह घुटने टेकेगी।" उसे याद आया कि तांत्रिक ने उससे ज्योति के बाल लाने को कहा था, ताकि वह कोई ऐसा टोटका या विद्या बना सके जिससे मीरा के दिल में खौफ का सीधा शिकंजा कस जाए। शेर तुरंत चुपचाप घर के अंदर वाले बाथरूम की तरफ बढ़ा। उसने इधर-उधर देखा और बेसिन के पास रखी कंघी उठाई, जिसमें ज्योति के कुछ टूटे हुए बाल उलझे हुए थे। उसने बड़ी होशियारी से उन बालों को समेटा और एक छोटी सी पुड़िया में लपेटकर अपनी जेब में डाल लिया। काम खत्म होते ही घर के दरवाजे से बाहर निकल आया। सड़क पर आकर उसने एक ऑटो को हाथ दिया और उसमें बैठकर सीधे उस पुराने तांत्रिक के ठिकाने की तरफ निकल पड़ा। शेर (ऑटो में बैठकर खिड़की से बाहर ताकते हुए, कुटिलता से मुस्कुराया): "अब आएगा असली मज़ा मीरा रानी... एक बार तांत्रिक बाबा का यह काळा जादू और खौफ तुम्हारे सिर चढ़ा, फिर तुम खुद चलकर इस शेर की सेज पर आओगी और कभी इनकार करने की हिम्मत नहीं कर पाओगी!" ------------ कमरे में पहुँचते ही मीरा ने अंदर से कुंडी बंद कर ली और सीधे ड्रेसिंग टेबल के बड़े से शीशे के सामने जाकर खड़ी हो गई। वह ज़ोर-ज़ोर से सिसक रही थी, उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और चेहरा आंसुओं से पूरी तरह भीगा हुआ था। जैसे ही उसकी नज़र शीशे में अपने अक्स पर पड़ी, उसकी रूह कांप उठी। उसकी साड़ी बेतरतीब लटकी हुई थी और नीले रंग का ब्लाउज पूरी तरह खुला पड़ा था। मीरा ने कांपती उंगलियों से अपने पेट के पास देखा—जहाँ नाभि के ठीक बगल में शेर के तीखे दाँतों का गहरा, लाल-बैंगनी कट का निशान चमक रहा था। उस ज़ख्म पर शेर की लार का गीलापन अब भी सूखा नहीं था। फिर उसने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसके दोनों भरे-पूरे, सुडौल मम्मे शेर के हाथों से बेरहमी से मसले जाने के कारण पूरी तरह लाल पड़े हुए थे। गुलाबी निप्पल अब भी कसकर अकड़े हुए थे, जो चीख-चीखकर उस वहशी छुअन की कहानी बयां कर रहे थे। मीरा (अपने पेट के लाल निशान को छूते हुए, सिसकियों के बीच नफरत से बोली): "जानवर है साला... एक नंबर का नीच और हैवान है!" लेकिन अगले ही पल, जब उसने शीशे में अपने बेपर्दा मम्मों की रंगत और अपने बदन की उस खौफनाक उत्तेजना को देखा, तो उसकी आत्मा गिल्ट के भयानक बोझ से दब गई। मीरा (अपनी छाती पर हाथ रखते हुए, रोते-रोते खुद पर लानत भेजने लगी): "पर... पर हे भगवान! मेरी यह देह क्यों बहक जाती है उसके एक स्पर्श से? क्यों मेरा बदन उस हैवान के छूते ही ऐसे पिघलने लगता है? मैं सरताज से प्यार करती हूँ... फिर इस ज़िल्लत और दर्द में भी मेरा जिस्म उस नीच नौकर के आगे घुटने क्यों टेक देता है?" वह फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर फूट-फूट कर रोने लगी। अपनी मासूम बेटी ज्योति को बचाने की कीमत पर वह हर पल अपनी ही नज़र में गिरती जा रही थी—एक तरफ माँ का फर्ज था, और दूसरी तरफ उसके अपने ही बदन का यह खौफनाक धोखा। मीरा ने भारी कदमों से बाथरूम की तरफ रुख किया। उसका सिर्फ एक ही मकसद था—उस हैवान की लार, थूक और गंदे स्पर्श की एक-एक छाप को साबुन और पानी से अपने जिस्म से धो डालना। बाथरूम का दरवाजा बंद करके उसने कांपते हाथों से अपनी बची-कुची साड़ी, ब्लाउज और ब्रा को पूरी तरह उतारकर फर्श पर फेंक दिया। लेकिन जैसे ही उसने अपनी नीली रेशमी पैंटी को नीचे सरकाया, उसकी नज़र उस पर पड़ी नमी पर जा टिकी। पैंटी का बीच का हिस्सा पूरी तरह गीला और चिपचिपा हो चुका था। मीरा (उस नमी को देखकर खौफ और घोर आत्म-ग्लानि से कांप उठी): "हे ईश्वर... नहीं..." उसे तुरंत रसोई का वो खौफनाक पल याद आ गया—जब शेर ने उसकी जाँघों को अपनी जाँघों में दबोचकर अपनी एक खुरदुरी उंगली उसकी योनि में बेदर्दी से घुसा दी थी। उस वक्त उसका पूरा शरीर एक तीखे झटके से अकड़ गया था और योनि से कामुक रस का फव्वारा छूट पड़ा था। जैसे ही बाथरूम के एकांत में मीरा के दिमाग में उस उंगली की घुसावट और ज़बरदस्ती का ख्याल दोबारा कौंधा, उसके बदन ने एक बार फिर खौफनाक प्रतिक्रिया दे दी। मीरा ने महसूस किया कि उसकी योनि के अंदर फिर से वही हल्की सी थिरकन और नमी रिसने लगी थी। इतना ही नहीं, उसके दोनों नंगे मम्मे—जो शेर के हाथों से मसले जाने के कारण पहले से ही लाल और दर्द से भरे थे—इस ख्याल मात्र से ही एक बार फिर कसकर अकड़ गए और उनके गुलाबी निप्पल कड़क होकर दुखने लगे। मीरा (अपनी नंगी छाती को अपने दोनों हाथों से भींचकर, रोते-हांफते हुए घुटनों पर बैठ गई): "उफ़्फ़... आह्ह्... यह क्या हो रहा है मुझे? सिर्फ सोचने भर से मेरा जिस्म फिर से गीला हो रहा है?! क्यों... क्यों मेरा बदन उस हैवान की हैवानियत को इस तरह याद रख रहा है?" शीशे के सामने खड़ी नंगी मीरा अपनी ही देह से नफरत करने लगी थी। उसने तुरंत फव्वारा (शावर) चालू किया और ठंडे पानी की धार के नीचे खड़ी हो गई। वह साबुन से अपने पेट, मम्मों और जाँघों को बेरहमी से रगड़ने लगी, मानो अपनी त्वचा को छीलकर उस नीच नौकर के हर नामोनिशान को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना चाहती हो।
Deepak Kapoor
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
08-08-2026, 03:15 AM
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Khauf Aur Saazish—9
Uski saansen Sher ki saanson se bhi zyaada tez ho chuki theen. Bhale hi uska dimaag is kritya se nafrat kar raha tha, lekin uske badan ke bheetar chhipi uttejna ab dheere-dheere uske aansoon par haavi ho rahi thi. Uske muunh se nikalne wali siskiyan ab halki-halki kaamuk aahon mein badalne lagi theen— "Aahh... ufff... shhh..."—jisse dekhkar Sher ki aankhon mein jeet ka vahshipan aur gahra ho gaya. Sher ne Meera ke gaalon par bahte aansoon ko dekha, to usne apne haathon ki pakad ko thoda sa dheela kiya . Usne apni jeebh baahar nikaali aur Meera ke gaal par bahte garm aansoo ko besharmi se chaat liya. Sher (aansoo chaatne ke baad jeebh se chidaata hai): "Are-are memsab! Roona band kijie... agar ab ek bhi aansoo aapki is gori aankh se tapka, to main phir se aapka poora chehra apni jeebh se chaat daalunga! Samjhe aap?" Meera (kaampte hue, apni aankhen bheenchte hue sisakti hai): "Nahi... Sher... mujhe chhod do... main barbaad ho jaaungi... aahh..." Sher (kutil muskaan ke saath, uski kamar par apni uungliyan naachaate hue taana kasta hai): "Are kaisi barbaadi memsab? Hamara wo samjhaauta yaad hai na? Yeh koi zabardasti thode hi hai! Zara sochije... apni laadli Jyoti bitiya ki us anmol zindagi ke saamne, is gore jism ka yeh thoda sa maza kya maayne rakhta hai? Maine to aapke parivaar ke liye apna khoon bahaaya hai memsab, aur aap is gareeb naukar ko apni is jawaani ka thoda sa ras dene mein itna nakhra dikha rahi hain?" Sher (kaamuk thahaaka lagaate hue aage jodta hai): "Aur sach-sach bataiye memsab... aapka yeh garm badan jo aise thirak raha hai aur muunh se 'aahh-ufff' nikal raha hai, kya isse sach mein is naukar ki chhuan pasand nahi aa rahi? Badan to aapka poora maza le raha hai!" Meera (sharm aur bekaabu kaamuk ehsaas se bebas hokar aah bharti hai): "Ufff... shhh... Sher... aisa mat boolo... please..." Sher (apni aankhen sikodkar, seedhe Meera ki aankhon mein taakte hue hukum deta hai): "To phir pyaari memsab, meri rani... in gore-gore haathon ko aage badhaaiye." Sher (zaheeraali phusphusaahat mein kahta hai): "Apne haathon se apne is neele blouse ke buttonon ko ek-ek karke khooliye... aur phir apni us choli ko bhi utaarkar pheenk dijie. Mujhe apni is pyaari maalkin ke un dono raseele, sudaul mammon ko bilkul nanga dekhna hai. Khoolo button memsab... deer mat karo, apni is jawaani ka poora khajaana aaj apne is naukar-sah-raaja ke hawaale kar do!" Meera ne ek baar phir aasmaan ki taraf dekha, jahaan shayad uska Bhagwan bhi aaj khaamosh tha. Uske badan mein uthti kaamuk tarangen aur dimaag mein beti ka khauf—dono milkar uski rooh ko chhalni kar rahe the. Uski kaampti hui uungliyan ab dheere-dheere uske blouse ke buttonon ko ek-ek karke dheela karne lagiin. Har button ke khulne ke saath uski chhati ki dhadkanen tez ho rahi theen . Sher (uttejna se apni raal tapkaate hue, uski chhati ko ghoorte hue): "Haan... memsab... aise hi... dheere-dheere. Dekho, is Sher ka dil kitni zor se dhadak raha hai. Roona mat, bas khoolti jaao..." Meera ke haathon ne jaise khud ko kisi machine ke hawaale kar diya tha. Usne doosra, phir teesra aur aakhirkaar blouse ka aakhri hook bhi alag kar diya. Blouse ke dono hisse darak kar dono taraf phail gaye, jisse uske bheetar ki gahre neele rang ki mahin bra aur usse daba hua uska bhara-poora vakshasthal aadha beparda ho gaya. Sher ki aankhen vaasna ke maare phatne ko ho gayiin. Sher (apni jeebh hotHon par pheerte hue, bra ke hook par haath tikaata hai): "Aahh Meera rani! Kya gazab ke mamme hain aapke... bra ke is patle kapde mein se bhi kaise baahar aane ko tadap rahe hain! Ab deer mat kijie rani sahab, is aakhri rukaawat ko bhi hata hi dijie." Meera ne thartharaate haathon se bra ki patti ko peeche sarkaaya aur bra ka hook khool diya. Bra ke dheele hote hi uske dono bhare-poore, gore mamme poori tarah azaad hokar Sher ki nazaron ke saamne beparda ho gaye. Sher ne Meera ke dono sudaul mammon ko bilkul nanga dekha, to kuch palon ke liye uski aankhen phati ki phati rah gayiin. Vah unki bemisaal khoobsurati ko dekhkar poori tarah bhaunchakka rah gaya. Meera ka vakshasthal behad sudaul, kasa hua aur kasaawat se bhara tha—usmein zara sa bhi dheelaapan nahi tha. Unke agrabhaag par saje gulaabi nipple is waqt khauf, thandak aur jismani uttejna ke mile-jule ehsaas se poori tarah akadkar baahar ki taraf tan chuke the. Sher apni bhookhi nazaron se uske mammon ki khoobsurati ko peeta raha, phir usne apni aankhen uupar uthaakar seedhe Meera ki dabdabaai, bebas aankhon mein jhaanka. Sher (kaamuk unmaad mein haanfte hue, apni uungliyon se uske kasaawdaor mamme ki golai ko sahlaakar phusphusaaya): "Aahh Meera rani... kasam se, dil hi nahi bharta in raseele ubhaaron ko dekhne se!" Sher (chehre par ek shaitani, chidaane wali muskaan laate hue taana kasta hai): "Kal bhi dekha tha maine in mammon ka kamaal... kal to tumne inhen meri chhati par buri tarah ragada tha, yaad hai na? Par dekho... aaj phir se inhen is tarah beparda dekhkar yeh Sher poori tarah paagal ho gaya hai!" Sher (uske akde hue gulaabi nipple par chutki kaatte hue zaheeraali phusphusaahat mein boola): "Aur zara dekhiye to sahi rani sahab... aapki yeh chhati kaise phadak rahi hai, aur ye gulaabi nipple kaise akadkar khade hain! Ab bataao rani... yeh dar ke maare tan gaye hain, ya phir is naukar ke haathon se kuchle jaane ki vaasna mein?" Meera (nipple par uski chhuan mehsus hote hi tadap uthti hai, uske muunh se bekaabu aah nikal jaati hai): "Aahh... ufff... Sher... shhh... aisa... aisa mat boolo... please..." Sher ne apne dono majboot haathon ko Meera ki nangi, chikni kamar par jamaaya aur ek jhatke mein kheenchkar usse apni phailaakar rakhi jaangh par baitha liya. Ab Meera Sher ki ek jaangh par laachar aur bebas baithi hui thi. Sher ki chaudi jaangh Meera ki dono nangi jaanghon ke bilkul beechon-beech aa phansi thi, jisse uska ghutna seedhe Meera ki yoni ke sabse naajuk hisse se ja takraaya. Kapde ka naamonishaan nahi bacha tha; saree kamar tak lipati hui betarteeb bikhri thi aur uupar se uski poori chhati, uske dono sudaul mamme aur gulaabi nipple poori tarah nange hokar dopahar ki roshni mein chamak rahe the. Sher (Meera ki yoni par apni jaangh ka seedha dabaav banaate hue kaamuk hansi hansa): "Waah Meera rani... waah! Ab aai na tum sahi jagah par. Zara dekho to sahi ki maalkin aur naukar ka yeh milan kitna sundar lag raha hai!" Sher ki jaangh ka sakht sparsh seedhe apni yoni par mehsus hote hi Meera ke wajood mein khauf aur kaamukta ki ek aisi bhayaanak bijli daudi ki vah sihar uthi. Khauf aur tez saanson ke chalne ke kaaran uske nange mamme badi tezi se uupar-neeche phadakne lage. Meera (saansen phoolne aur ghabrahat ke maare tadapte hue): "Aahh... ufff... Sher... please... yeh kya kar rahe ho... mat dabaao wahan... shhh..." Sher (uski nangi chhati ke tez thirakan ko vaasna se taakte hue chidaata hai): "Are-are rani sahab! Zara sambhaaliye apne in raseele ubhaaron ko... kaise thar-thar kaamp rahe hain! Aapki yoni se lekar is seene tak jo aag lagi hai, wo saaf bata rahi hai ki aapko meri jaangh ka yeh dabaav kitna maza de raha hai." Sher ko apni jaangh ke seedhe dabaav se Meera ki panty wale hisse ki nami aur geelapan saaf mehsus ho raha tha. Lekin uski nigahaen to Meera ke un dono nange sudaul mammon par tiki theen, jo is waqt uske muunh ke theek the. Sher (Meera ke nange, kadak nipplon ko ghoorte hue): "Waah! Inhi raseele ubhaaron se Meera rani ne kabhi Jyoti ko doodh pilaaya tha..." Sher yeh achhi tarah jaanta tha ki Jyoti Meera aur uske pati ki good li hui beti hai, jisse bachaane ka ahsaan usne apni jaan daanv par lagaakar chukaaya tha. Sher (Meera ki nangi chhati ke kareeb apna chehra laate hue phusphusaaya): "Zara sochije Meera rani... jis Jyoti ko bachaane ke liye maine apna khoon bahaaya, usi beti ki jaan ki salaamati ke badle is gareeb Sher ka bhi to haq banta hai na ki vah apni rani ke in mammon se apni pyaas bujhaaye?" Sher (uske gulaabi nipple par apni garm saansen chhodte hue taana kasta hai): "Zara dekhiye to sahi rani ji... kaise ye gulaabi nipple phulaakar mujhe pukaar rahe hain! Chilla-chillaakar kah rahe hain ki 'Aa Sher... aa aur inhen apne muunh mein bharkar zor-zor se choos le!'" Sher (kaamuk thahaaka lagaakar): "Jab aapki neeyat hi pighal chuki hai aur mamme mujhe nyota de rahe hain, to is naukar ko bhala inkaar karne ka kya haq?" Meera (uski baaten sunkar aur mammon par uski saanson ki tapan mehsus karke tadap uthti hai): "Aahh... ufff... Sher... nahi... please... aisa neech khayaal bhi muunh par mat laao... shhh..." "Khayaal kyon na laoon memsab? Mera to poora haq banta hai!" Itna kehte hi Sher ne apna muunh aage badhaaya aur Meera ke ek sudaul mamme par seedhe daaka daal diya. Usne us makhmali ubhaar ko kaskar apne bheetar bhar liya aur vah uske gulaabi nipple ko kisi bhookhe navjaat bachhe ki tarah zor-zor se choosne laga. Uska ek chauda haath Meera ki poori tarah nangi peeth par ja jama, taaki vah uske tadapte jism ko majbooti se sahara de sake aur usse peeche na hatne de. Wahi, neeche Sher ne apni jaangh ko Meera ki taangon ke beech aur gahrai mein ragadna shuru kar diya. Uski sakht jaangh ka seedha hamla ab Meera ki poori tarah geeli ho chuki choot par hone laga tha, jahaan har ragad ke saath kapdon ke aar-paar bhi teekha dabaav pad raha tha. Meera (uupar mamme par teekhe choosne ke ehsaas aur neeche choot par hote zabardast hamle se tadap uthi, uski aankhen moond gayiin): "Aaaahhh... ufff... shhh... Sher... chhodo... mar jaaungi... aahh!" Sher (mamme ko muunh mein bhare-bhare hi gurraate hue, apni jeebh se uske kadak nipple ko choos-choos kar masalta raha): "Ummmm... aahh rani... kya makkhan jaisa ras hai... neeche se to choot paani chhod rahi hai aur uupar se mamme muunh mein pighal rahe hain!" Poori tarah se ek mamme ko choosne aur uski chhati par apni laar ki chhaap chhodne ke baad, Sher ne aakhirkaar apna muunh uupar uthaaya. Usne seedhe Meera ki aankhon mein apni nazaren gaad diin. Sher (kameenepan se muskuraaya): "Kyon memsab? Kya ab bhi aap yeh kahna chahtiin hain ki is sab mein aapki razaamandi nahi hai?" Meera is ghor apmaan aur apne hi badan ke is dhokhe ko sah nahi saki. Usne sharm aur guilt ke maare apne dono haathon se apna chehra chhipaane ki koshish ki. Lekin Sher uski is khaamoshi se rukne wala nahi tha. Usne turant apna ek haath neeche badhaaya aur uski saree ko sarkate hue uski nangi jaanghon ke beech gahrai mein ghusa diya. Bina ek pal ganwaaye, usne uski geeli panty ko ek taraf khisakaaya aur apni ek uungli seedhe uski choot mein gahrai tak ghusa di. Meera (achanak hue is teekhe hamle se tadap uthi): "Aahhh! Sher... mar gayi... nikaalo isse... please!" Uska dimaag cheekh-cheekh kar is kritya se nafrat kar raha tha, Sartaj ka chehra yaad karke glaani se bhar raha tha, lekin uska 32 saal ka jawaan aur kaamuk badan is lagaataar hote teekhe shaareerik aakraman ke aage apni sudh-budh khoone laga tha. Sher ne us uungli ko kuch palon tak uski kaamuk nami mein andar-baahar kiya, jisse Meera ka poora shareer tharthara utha. Phir usne jhatke se uungli ko baahar nikaala aur us choot ke ras se bheegi hui geeli uungli ko seedhe Meera ki aankhon ke saamne la diya. Sher (apni bheegi uungli ko uski aankhon ke saamne naachaate hue): "Ab booliye memsab! Kya ab bhi kahungiin ki ismein aapki marzi nahi hai? Aapki zubaan to jhooth bool sakti hai, par aapki choot se tapka yeh ras kabhi jhooth nahi boolta!" Sher (us uungli ko apni jeebh se besharmi se chaatte hue muskuraaya): "Dekhiye... aapki hi jawaani ki gawaahi de raha hai yeh paani!" Meera ne apne kaampte haathon se Sher ki bheegi uungli ko apne chehre ke saamne se hataaya. Uski aankhon mein bebasi ke saath-saath ek ajeeb si jalti hui nafrat thi. Meera (apni bahti aankhon ko pochhte hue, kaampti lekin sakht aawaz mein booli): "Nahi Sher... jo too soch raha hai wo sach nahi hai! Maine kal bhi tujhse yahi kaha tha, aur aaj phir kah rahi hoon... main sirf apni kasam se bandhi hui hoon, warna tujhe apne shareer par haath bhi na lagaane deti!" Meera (haanfte swar mein booli): "Yeh aahen, yeh badan ki uttejna... yeh kisi bhi aurat ke jism mein ho jaayegi agar too is tarah uske badan ko chhooega! Yeh shareer ki ek anjaani laachari hai, meri razaamandi nahi!" Meera (Sher ki jaangh se khud ko alag karne ka prayaas karte hue guilt aur dard mein sisak uthti hai): "Iska saboot maine tujhe kal bhi diya tha aur aaj bhi de rahi hoon... main jaa rahi hoon apne kamre mein. Aaj ke liye bahut hua! Yeh is baat ka saboot hai ki main jo bhi sah rahi hoon, sirf aur sirf apni aulaad ke liye sah rahi hoon." Meera (Sher ki aankhon mein ghoorte hue, apni rundhi hui aawaz mein cheekh padi): "Too jaanta hai ki Jyoti meri sagi nahi, apnaai hui beti hai... phir bhi mera kaleja kaamp jaata hai ki meri bachhi ko kuch ho na jaaye! Aur ek too hai neech... jo meri is mamta aur meri kasam ka baar-baar najaayaz fayda uthaaye ja raha hai!" Itna kahkar Meera ne apni saree aur pallu ko kisi tarah sambhaala aur apne kaampte pairon se rasoi se baahar apne kamre ki taraf kadam badhaa diye, jabki uska poora wajood is ghor apmaan se kaamp raha tha. --------------- Meera ke kamre ki taraf jaate hi rasoi mein sannaata chhaa gaya. Sher apni kursi par hi baitha rah gaya, lekin uska chehra gusse aur niraasha se laal ho chuka tha. Usne apne hi sir par haath maara aur daant bheenchkar khud ko gaaliyan dene laga. Sher (man hi man khud par jhunjhlaate hue, gusse mein badbadaaya): "Abe chootiya hai kya be too Sher?! Kya zaroorat thi tujhe phir se wahi ganda sawaal poochhne ki?! Jab sab kuch itna sahi aur smooth chal raha tha, to tujhe apni aukaat dikhaane ki kya khujli machi thi?!" Vah apni usi bheegi uungli ko dekhne laga, jisse thodi deer pehle Meera ke chehre ke saamne lahraakar apni jeet ki daphli baja raha tha. Sher (kursi par mukka maarte hue khud ko koosta hai): "Saala bani-banaai baat bigaad di! Maalkin apne haath se apne mamme de rahi thi, badan pighal raha tha... aur toone ek faaltoor sawaal poochhkar saara khel hi kharaab kar diya! Ab dekh, phir se wahi kasam, wahi Jyoti, aur wahi nafrat ka raag shuru ho gaya." Sher (thandi saans kheenchta hai): "Sabr nahi hai tere mein Sher... thoda aur sabr rakhta to aaj maalkin poori ki poori teri zad mein hoti. Par nahi, tujhe to turant maalkin ka guroor toodna tha! Ab baith yahaan akele, poori progress ka satyaanaash karke!" Sher ne kursi se uthkar apni pant mein tane hue sakht lund ko sudhaara aur rasoi ke darwaze ki taraf dekha, jahaan se Meera abhi-abhi nikli thi. Meera ke ve aakhri shabd uske kaanon mein phir se goonje— "Aaj ke liye bahut hua..." Sher (apne hotHon par apni jeebh phiraate hue, ek dhoort aur ummeed se bhari muskaan laaya): "Ruk... usne kya kaha tha? 'Aaj ke liye bahut hua'... iska matlab... iska matlab kal phir chance hai! Khel khatam nahi hua hai be Sher!" Vah apni jaanghon ko sahlaane laga jahaan thodi deer pehle Meera ki nangi, makhmali taangen phansi hui theen, aur vah geelapan ab bhi uski pant par maujood tha. Sher (pachhtaave se sir jhatakte hue phir se badbadaaya): "Par yaar... kaash main wo chootiyapa na karta! Saala kitna bewakoof hoon main. Abhi to sirf ek uungli ghusaai thi... choot se itna ras bah raha tha ki agar thodi deer aur apni zubaan band rakhta aur bas mamme choosta rahta, to kasam se aaj hi yeh maalkin mera poora lund apne muunh mein ya choot mein le letee!" Sher (apni moonchhon par haath pheerte hue kameenepan se muskuraaya): "Koi baat nahi Sher... sabr ka phal meetha hota hai. Aaj usne mamme khud nange kiye, choot mein uungli bhi sah li... kal jab Jyoti bitiya ke naam ki kasam dobaara yaad dilaunga, to maalkin ko poori tarah is Sher ke neeche aana hi padega. Kal ka sooraj is Sher ke liye aur rangeen hone wala hai!" Sher muskura hi raha tha ki achanak uske dimaag ki batti jali. Usse Meera ka wo bebaak andaaz aur seedhe uthkar chale jaana yaad aaya. Sher (gambheer hokar, sochne laga): "Abe Sher, zyaada hawa mein mat ud! Is kasam ki bhi ek had hai. Aaj jaise hi baat had se aage badhi, maalkin apni kasam aur Jyoti ko bhoolkar seedhe uthkar chali gayi. Agar isse poori tarah ghulaam banaana hai, to sirf zubaan ki kasam se kaam nahi chalega... isse aankhon ke saamne khauf dikhaana padega ki agar yeh meera alti, to Jyoti ki jaan sach mein khatre mein pad jaayegi. Tabhi yeh maalkin poori tarah ghutne tekegei." Usse yaad aaya ki tantrik ne usse Jyoti ke baal laane ko kaha tha, taaki vah koi aisa tooka ya vidya bana sake jisse Meera ke dil mein khauf ka seedha shikanja kas jaaye. Sher turant chupchaap ghar ke andar wale bathroom ki taraf badha. Usne idhar-udhar dekha aur basin ke paas rakhi kanghi uthaai, jismein Jyoti ke kuch toote hue baal uljhe hue the. Usne badi hoshiyaari se un baalon ko sameta aur ek chhoti si pudiya mein lapetkar apni jeb mein daal liya. Kaam khatam hote hi ghar ke darwaze se baahar nikal aaya. Sadak par aakar usne ek auto ko haath diya aur usmein baithkar seedhe us puraane tantrik ke thikaane ki taraf nikal pada. Sher (auto mein baithkar khidki se baahar taakte hue, kutilta se muskuraaya): "Ab aayega asli maza Meera rani... ek baar tantrik baba ka yeh kaala jaadu aur khauf tumhare sir chadha, phir tum khud chalakar is Sher ki sej par aaongi aur kabhi inkaar karne ki himmat nahi kar paaongi!" -------------- Kamre mein pahunchte hi Meera ne andar se kundi band kar li aur seedhe dressing table ke bade se sheeshe ke saamne jaakar khadi ho gayi. Vah zor-zor se sisak rahi thi, uski aankhen laal ho chuki theen aur chehra aansoon se poori tarah bheoga hua tha. Jaise hi uski nazar sheeshe mein apne aks par padi, uski rooh kaamp uthi. Uski saree betarteeb latki hui thi aur neele rang ka blouse poori tarah khula pada tha. Meera ne kaampti uungliyon se apne pet ke paas dekha—jahaan naabhi ke theek bagal mein Sher ke teekhe daanton ka gahra, laal-baingani cut ka nishaan chamak raha tha. Us zakhm par Sher ki laar ka geelapan ab bhi sookha nahi tha. Phir usne apni nazaren uupar uthaaiin. Uske dono bhare-poore, sudaul mamme Sher ke haathon se berahmi se masle jaane ke kaaran poori tarah laal pade hue the. Gulaabi nipple ab bhi kaskar akde hue the, jo cheekh-cheekhkar us vahshi chhuan ki kahaani bayaank kar rahe the. Meera (apne pet ke laal nishaan ko chhoote hue, siskiyon ke beech nafrat se booli): "Jaanwar hai saala... ek number ka neech aur haiewaan hai!" Lekin agle hi pal, jab usne sheeshe mein apne beparda mammon ki rangat aur apne badan ki us khaufnaak uttejna ko dekha, to uski aatma guilt ke bhayaanak bojh se dab gayi. Meera (apni chhati par haath rakhte hue, roote-roote khud par laanat bhejti lagi): "Par... par Hey Bhagwan! Meri yeh deh kyon bahak jaati hai uske ek sparsh se? Kyon mera badan us haiewaan ke chhoote hi aise pighalne lagta hai? Main Sartaj se pyaar karti hoon... phir is zillat aur dard mein bhi mera jism us neech naukar ke aage ghutne kyon teek deta hai?" Vah pharsh par ghutnon ke bal baith gayi aur apne dono haathon se apna chehra dhakkar phoot-phoot kar roone lagi. Apni maasoom beti Jyoti ko bachaane ki keemat par vah har pal apni hi nazar mein girti ja rahi thi—ek taraf maa ka pharj tha, aur doosri taraf uske apne hi badan ka yeh khaufnaak dhokha. Meera ne bhaari kadmon se bathroom ki taraf rukh kiya. Uska sirf ek hi maqsad tha—us haiewaan ki laar, thook aur gande sparsh ki ek-ek chhaap ko sabun aur paani se apne jism se dhoo daalna. Bathroom ka darwaza band karke usne kaampte haathon se apni bachi-kuchi saree, blouse aur bra ko poori tarah utaarkar pharsh par pheenk diya. Lekin jaise hi usne apni neeli reshmi panty ko neeche sarkaaya, uski nazar us par padi nami par ja tiki. Panty ka beech ka hissa poori tarah geela aur chipchipa ho chuka tha. Meera (us nami ko dekhkar khauf aur ghor aatma-glaani se kaamp uthi): "Hey Ishwar... nahi..." Usse turant rasoi ka wo khaufnaak pal yaad aa gaya—jab Sher ne uski jaanghon ko apni jaanghon mein daboochkar apni ek khurduri uungli uski yoni mein bedardi se ghusa di thi. Us waqt uska poora shareer ek teekhe jhatke se akad gaya tha aur yoni se kaamuk ras ka fawwaara chhoot pada tha. Jaise hi bathroom ka ekaant mein Meera ke dimaag mein us uungli ki ghusaawat aur zabardasti ka khayaal dobaara kaundha, uske badan ne ek baar phir khaufnaak pratikiya de di. Meera ne mehsus kiya ki uski yoni ke andar phir se wahi halki si thirakan aur nami risne lagi thi. Itna hi nahi, uske dono nange mamme—jo Sher ke haathon se masle jaane ke kaaran pehle se hi laal aur dard se bhare the—is khayaal maatra se hi ek baar phir kaskar akad gaye aur unke gulaabi nipple kadak hokar dukhne lage. Meera (apni nangi chhati ko apne dono haathon se bheenchte hue, roote-haanfte hue ghutnon par baith gayi): "Ufff... aahh... yeh kya ho raha hai mujhe? Sirf sochne bhar se mera jism phir se geela ho raha hai?! Kyon... kyon mera badan us haiewaan ki haiewaniyat ko is tarah yaad rakh raha hai?" Sheeshe ke saamne khadi nangi Meera apni hi deh se nafrat karne lagi thi. Usne turant fawwaara (shower) chaalu kiya aur thande paani ki dhaar ke neeche khadi ho gayi. Vah sabun se apne pet, mammon aur jaanghon ko berahmi se ragadne lagi, maano apni tvacha ko chheelkar us neech naukar ke har naamonishaan ko hamesha-hamesha ke liye mita dena chahti ho.
Deepak Kapoor
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08-08-2026, 04:03 AM
Wowwww fantastic update thanks for your precious time to update really worth it absolutely great going
08-08-2026, 07:22 AM
(04-08-2026, 11:33 PM)Deepak.kapoor Wrote: Never ever have I seen such a detailed description of a scene, this is next level stuff, hats off bhai,, you are too good, no one like you here, keep it up bhai..
08-08-2026, 09:32 AM
Wonderful.... excellent narration..... eagerly waiting for next.....
08-08-2026, 11:38 AM
(08-08-2026, 03:19 AM)Deepak.kapoor Wrote: This update was so good, left on a cliffhanger but we understand, if you want gifs let me know I will get them as per story.
08-08-2026, 09:55 PM
(08-08-2026, 11:38 AM)Qutub Minar Wrote: This update was so good, left on a cliffhanger but we understand, if you want gifs let me know I will get them as per story. One request: try not to reply to the button that reposts the whole story; that makes reading difficult for readers. You can send GIFs to PM. But be aware they should be high quality.
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09-08-2026, 09:16 AM
Its too much of asking.. can we get update today.. being sunday..
Pppllllllzzzzzzzz… if possible….
09-08-2026, 08:49 PM
Waiting…….
11-08-2026, 05:42 AM
खौफ और साजिश—10
शेर ने बड़ी होशियारी से बाथरूम का दरवाज़ा खोला और बिना एक भी कपड़े के, पूरी तरह नंगा अंदर दाखिल हो गया। फव्वारे के बहते पानी की छम-छम आवाज़ और आँखों में जमे साबुन के झाग के कारण मीरा को शुरुआत में शेर की मौजूदगी का बिल्कुल भी अहसास नहीं हुआ। वह बेखबर होकर अपने बदन को रगड़-रगड़ कर धोने में लगी हुई थी। उधर, शेर जैसे ही बाथरूम में घुसा, सामने का नज़ारा देखकर उसके कदम वहीं जम गए। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं और मुँह खुला का खुला रह गया। पानी की बूंदों से नहाया हुआ मीरा का बिल्कुल नंगा, गोरा बदन दोपहर की रोशनी में किसी तराशी हुई संगमरमर की मूरत की तरह चमक रहा था। ऊपर से पानी की धार उसके भरे-पूरे मम्मों से होती हुई उसके चिकने पेट और नाभि को भिगोती हुई नीचे बह रही थी। शेर की निगाहें धीरे-धीरे नीचे सरकीं और उसकी सुराहीदार जाँघों के बीच जा टिकीं। मीरा की योनि बिल्कुल साफ़, चिकनी और बेदाग थी, और उसकी गोरी, मखमली जाँघों की रंगत देखकर शेर का लण्ड पल भर में लोहे की तरह सख्त होकर अकड़ गया। शेर ( मन ही मन कामुक उन्माद में हांफने लगा): "वाह रे किस्मत! .. ऊपर वाले ने सीधे जन्नत का दरवाज़ा ही खोल दिया! ऐसी साफ़-सुथरी और मक्खन जैसी चूत और इतनी गोरी जाँघें तो मैंने सपनों में भी नहीं देखी थीं!" शेर ने बिना कोई आवाज़ किए अपने नंगे कदमों को आगे बढ़ाया और उसकी नज़र नीचे फर्श पर पड़ी गीली, नीली पैंटी पर पड़ी। उसने झुककर फर्श से मीरा की इस्तेमाल की हुई, गीली पैंटी उठा ली। पानी की छम-छम के बीच पीछे किसी की गर्म साँसों और साये का अहसास होते ही मीरा झटके से घूमी। सामने शेर को बिल्कुल नंगा देखकर उसकी चीख निकल गई। उसने बदहवासी में अपने दोनों हाथों से अपने नंगे मम्मों और जाँघों को ढकने की नाकाम कोशिश की। मीरा (खौफ और नफरत से थर-थर कांपते हुए, चीख पड़ी): "शेर?! तू... तू यहाँ क्या कर रहा है?! निकल यहाँ से! मैंने तुझे बाहर भी साफ़ कह दिया था कि मैं तेरी तरफ देखना भी नहीं चाहती! मेरी नज़रों के सामने से दूर हो जा नीच!" लेकिन शेर के चेहरे पर वही शैतानी मुस्कान फैली हुई थी। उसकी नज़र मीरा की बात पर कम और अपने हाथ में उसकी गीली, नीली पैंटी पर ज़्यादा थी। उसका ध्यान पैंटी पर लगे गीले दाग पर था और वह उसे अपने हाथ से महसूस कर रहा था। शेर (पैंटी को उंगलियों में घुमाते हुए, कामुक ठहाका लगाता है): "अरे-अरे मीरा रानी! इतना झूठ भी मत बोलिए... मुँह से तो ऐसे डांट रही हैं जैसे मुझसे घिन आ रही हो, पर ज़रा इस बेचारी पैंटी की हालत तो देखिए!" शेर ने उस पैंटी को अपनी नाक के पास लाकर एक गहरी सांस खींची, और फिर मीरा की आँखों में आँखें डालकर बेशर्मी से मुस्कुराया। शेर (ताज़े रस से भीगे हिस्से की तरफ इशारा करते हुए ताना कसता है): "देखिए तो सही... कैसे आपके इस रसीले पानी से पूरी पैंटी तर-बतर हो रही है! अगर मुझसे इतनी ही नफरत है रानी साहब, तो यह चूत का पानी क्या आपके साहब की याद में बह रहा है? बदन तो आपका तरस रहा है मेरे लिए!" इतना कहते ही शेर ने मीरा के सामने ही उस पैंटी के भीगे हुए हिस्से पर अपनी जीभ टिका दी और उसे बुरी तरह चाटना शुरू कर दिया। शेर (पैंटी को चाटते हुए, कामुकता से आँखें मूँदकर गुर्राया): "उम्मम्म्म... वाह मीरा! क्या गज़ब का स्वाद है... मज़ा आ गया! आपकी इस जवानी का रस तो शहद से भी ज़्यादा मीठा है!" मीरा (अपनी ही पैंटी को उस हैवान के मुँह में देखकर घोर अपमान और बेकाबू कामुक लज़्ज़त के तीखे संगम से तड़प उठी): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... नीच... नीच इंसान... मत कर ऐसा... श्श्श्..." शेर ने पैंटी को चाटना बंद किया और उसे एक तरफ फेंक दिया। उसकी आँखें वासना के मारे लाल हो चुकी थीं। उसने फव्वारे के बहते पानी के नीचे मीरा की तरफ अपने नंगे जिस्म को बढ़ाया और सीधे उसकी आँखों में देखा। शेर (अपनी जीभ से होठों को चाटते हुए कमीनेपन से फुसफुसाया): "अरे मीरा रानी... जब इस कपड़े में इतना स्वाद है, तो आपकी असली जगह पर कितना रस होगा? आपका यह गरम बदन चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि 'शेर, इस सूखी पैंटी को क्या चाट रहा है, आ और मेरी असली जगह से सीधा स्वाद ले!'" मीरा (पानी के नीचे कांपती हुई, बदहवासी में सिर हिलाती है): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा मत कर... खुदा के लिए बाहर निकल जा... आह्ह्..." लेकिन शेर ने उसकी एक न सुनी। उसने झटके से मीरा को पीछे दीवार से सटा दिया। पानी की ठंडी धार दोनों के नंगे शरीरों पर गिर रही थी। शेर ने मीरा के दोनों हाथों को ऊपर उठाकर दीवार से चिपका दिया और अपनी चौड़ी काली जाँघों से उसकी गोरी, नंगी टाँगों को चौड़ा करके फैला दिया। मीरा की आँखें डर के मारे फैली हुई थीं, हाथ दोनों ऊपर थे, और उसके दोनों स्तन ऊपर की तरफ उठे हुए थे, जिन पर गुलाबी निप्पल डर या उत्तेजना के मारे खड़े थे। मीरा की साफ़, चिकनी और गीली योनि अब सीधे शेर के मुँह के सामने नंगी थी, शेर की निगाहें योनि के बीच डर के मारे थरथराते होंठों पर पड़ी। "अरे मीरा जी, देखो तो कैसे खुल रही है मेरे को देख के।" शेर ने अपना सिर नीचे झुकाया और सीधे मीरा की योनि पर अपना मुँह जमा दिया। उसने अपनी गर्म, जीभ बाहर निकाली और उसकी योनि के सबसे नाज़ुक हिस्से को नीचे से ऊपर तक चाटना शुरू कर दिया। मीरा (पानी की धार के बीच जैसे ही शेर की जीभ उसकी चूत के नाज़ुक हिस्से से टकराई, उसकी पूरी देह ऐंठ गई और एक तीखी चीख-सह-आह निकल गई): "आअाह्ह्ह्! उफ़्फ़... शेर... श्श्श्... यह क्या... आह्ह्!" शेर किसी भूखे जानवर की तरह मीरा की चूत के रस को अपनी जुबान पर समेटने लगा। वह उसकी योनि के दानों को अपने होठों में भरकर चूसने लगा और अपनी जीभ को गहराई तक अंदर-बाहर करने लगा। बहता हुआ पानी और उसकी गर्म लार मिलकर मीरा के निचले हिस्से में आग लगा रहे थे। मीरा (मन ही मन इस घोर पाप और ज़िल्लत से जलते हुए, पर बदन के बेकाबू मजे में तड़पते हुए अपनी कमर को अनजाने में शेर के मुँह पर रगड़ने लगी): "हे ईश्वर... मुझे मार क्यों नहीं देते? यह हैवान... यह हैवान मेरी चाट रहा है... और मेरा नीच बदन... उफ़्फ़... कितना मज़ा आ रहा है... आह्ह्... श्श्श्... शेर... मत चूस वहाँ... मर जाऊँगी... आह्ह्!" मीरा इतनी शॉक्ड थी कि उसे पता ही नहीं चला कि शेर के हाथ कब उसके हाथों को छोड़ चुके थे। वह अब भी स्तब्ध खड़ी अपने दोनों हाथ ऊपर दीवार से चिपकाए हुए थी, जैसे उसकी पूरी देह काठ की हो गई हो। शॉवर से गिरती पानी की ठंडी धार उसकी गर्दन और स्तनों से होती हुई बह रही थी। उसे अहसास ही नहीं हुआ कि शेर की पकड़ ढीली हो चुकी है, क्योंकि उसका ध्यान उस खौफ और छुअन पर ही अटका हुआ था। शेर का एक भारी, हाथ उसकी गोरी, चिकनी और भीगी हुई जांघ पर रेंग रहा था। उसकी हर उंगली मीरा की नंगी त्वचा पर एक खौफनाक सिहरन पैदा कर रही थी। वहीं उसका दूसरा हाथ नीचे सरककर उसकी गोल, सुडौल गांड पर कसकर टिका हुआ था, जहाँ उसकी उंगलियों की पकड़ मीरा की गोरी रंगत में गहरे लाल निशान छोड़ रही थी। मीरा का सांस लेना भारी हो चुका था। वह दीवार से सटी, बिना कोई हरकत किए बस शेर की इस दरिंदगी भरी छुअन को महसूस कर रही थी, जहाँ डर, अपमान और एक अनचाही कामुकता का तूफ़ान उसे अंदर ही अंदर निगल रहा था। शेर का जो हाथ मीरा की भीगी हुई जांघ पर था, वह धीरे-धीरे सरकता हुआ उसकी योनि के बिल्कुल पास आ पहुँचा। उसकी उंगलियों की भारी छुअन मीरा की संवेदनशील त्वचा पर एक अजीब सी सिहरन दौड़ा रही थी। शेर ने मीरा की योनि के पास से अपना चेहरा थोड़ा पीछे हटाया, ताकि उसकी उंगली को अंदर जाने की पूरी जगह मिल सके। जैसे ही उसकी मोटी, बेपरवाह उंगली ने मीरा की गीली और तंग योनि की गहराई में झटके से प्रवेश किया, मीरा के हलक से एक तीखी, दर्द और बेकाबू उत्तेजना से भरी चीख निकल गई—"आह्ह्!" उसका पूरा जिस्म दीवार से सटकर ऐंठ गया और उसके ऊपर उठे हुए स्तन जोर-जोर से हांफने लगे। उंगली को अंदर धकेलने के तुरंत बाद शेर ने एक पल की भी देर नहीं की और अपना मुँह दोबारा नीचे झुकाकर मीरा की योनि को फिर से दीवानों की तरह चाटना शुरू कर दिया। उंगली की गहरी हलचल और जीभ की गरम, गीली लपटों का यह दोहरा हमला मीरा को पूरी तरह से लाचार और मदहोश करने लगा। पानी की छम-छम के बीच मीरा की बेकाबू आहें और सिसकियाँ बाथरूम की दीवारों से टकराकर गूंजने लगीं। पानी की धार दोनों के तपते शरीरों पर लगातार गिर रही थी, लेकिन नीचे की आग ठंडी होने के बजाय और भड़कती जा रही थी। शेर का मुँह मीरा की योनि के रसीले उभारों पर बेदर्दी से रेंग रहा था। उसकी जीभ जब-जब मीरा की दानेदार नाज़ुक त्वचा को चाटती और चूसती, मीरा का पूरा बदन बिजली के झटके की तरह ऐंठ उठता। शेर (मुँह को उसकी चूत से थोड़ा हटाकर, जीभ से अपनी मूछों पर लगा रस चाटते हुए कामुक उन्माद में गुर्राया): "आह्ह् मीरा रानी! क्या मक्खन जैसा रस है... कसम से, आज तक ऐसा मीठा पानी नहीं पिया इस शेर ने! देखो, तुम्हारी यह चूत कैसे थिरक रही है मेरे मुँह के ऊपर!" मीरा (दीवार से चिपकी, पानी की बूंदों के बीच अपनी आँखें भींचकर तड़प रही थी): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... बस करो... अब और नहीं... श्श्श्... मर जाऊँगी मैं..." लेकिन शेर रोकने वाला नहीं था। उसने अपनी जीभ की धार को और तेज़ कर दिया और मीरा की योनि के ऊपरी दाने को अपने होठों के बीच भरकर ज़ोर से चूसने लगा, साथ ही भीतर फँसी अपनी उंगली की रफ़्तार बढ़ा दी। उस तीखे, ज़हरीले मजे का हमला इतना ज़बरदस्त था कि मीरा के घुटने जवाब देने लगे। उसके हाथ, जो दीवार पर टिके थे, ढीले पड़ गए और उसने बेबसी में शेर के गीले बालों को अपने हाथों में जकड़ लिया। वह न चाहते हुए भी अपनी कमर को आगे धकेलकर अपने कामुक हिस्से को शेर के मुँह पर और कसकर रगड़ने लगी। मीरा (गहरे गिल्ट और बेकाबू उत्तेजना के चरम पर पहुँचकर रोते-हाँफते हुए चीख उठी): "उफ़्फ़... आअाह्ह्ह्! शेर... यह... यह क्या हो रहा है... श्श्श्... मत करो इतना... आह्ह्... मेरी जान निकल जाएगी... उफ़्फ़!" शेर ने उसकी जाँघों पर अपनी पकड़ और सख्त कर दी। वह समझ गया था कि मीरा अपनी उत्तेजना के बिल्कुल करीब पहुँच चुकी है। वह किसी दरिंदे की तरह उसकी चूत के रस को घट-घट पीने लगा। मीरा की सांसें उखड़ चुकी थीं। बदन के भीतर एक भयानक तूफान उठ रहा था—जहाँ एक तरफ अपनी आत्मा का कत्ल होने का गम था, तो दूसरी तरफ एक नीच नौकर की जीभ से मिल रहा ऐसा चरम सुख जो उसे अपनी पूरी शादीशुदा जिंदगी में कभी महसूस नहीं हुआ था। मीरा (कांपती हुई, अपनी कमर को शेर के चेहरे पर झटके से मारते हुए चरम आनंद में सिहर उठी): "आह्ह्ह्... शेर... गया... सब खत्म हो गया... उफ़्फ़... श्श्श्!" मीरा का पूरा जिस्म थर-थर कांपने लगा और उसकी योनि से रस का एक और गरम फव्वारा छूट पड़ा, जो सीधे शेर की जीभ और मुँह पर बहने लगा। वह बेजान सी दीवार के सहारे ढीली पड़ गई, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और आँखें आंसुओं से भरी हुई थीं। शेर ने उस पूरे बहते रस को अपनी जीभ पर समेटा, गहरी सांस ली और खड़ा होकर सीधे मीरा के रोते हुए चेहरे को देखने लगा। शेर (अपनी जीभ होठों पर घुमाते हुए, वासना से भरी हँसी के साथ ताना मारता है): "वाह रानी साहब! मान गए आपकी इस जवानी को! मुँह से तो बड़ा 'ना-ना' कर रही थीं, पर नीचे से तो इस गरीब नौकर के मुँह में अपनी पूरी जवानी उड़ेल दी आपने!" मीरा बस बेजान सी खड़ी पानी की धार के नीचे रोती रही। उसका जिस्म शांत हो चुका था, लेकिन उसकी आत्मा गिल्ट की आग में पूरी तरह भस्म हो रही थी। शेर खड़ा हुआ, तो उसका लोहे जैसा कड़क लंड मीरा की नाभि और नंगे पेट पर रगड़ खाने लगा। उसकी निगाहें मीरा के चेहरे पर टिकी थीं, जो पानी की धार के नीचे ढीली और बेजान सी खड़ी हांफ रही थी। शेर (अपनी हथेली से मीरा के दोनों नंगे मम्मों को एक साथ दबोचते हुए और अपने सख्त लंड को उसके पेट पर दबाते हुए फुसफुसाया): "क्यों मीरा रानी? चूत का पानी निकालकर सोच रही हो कि खेल खत्म हो गया? असली खेल तो अब शुरू होगा जब यह शेर अपना यह मोटा लंड आपकी इस गोरी चूत के अंदर उतारेगा!" मीरा (चूत के पानी निकलने के बाद की थकान और गिल्ट में चूर थी, लेकिन शेर के लंड का सख्त स्पर्श अपने पेट पर महसूस होते ही खौफ से उसकी आँखें खुल गईं): "नहीं... उफ़्फ़... शेर... नहीं... यह नहीं... प्लीज... ऐसा मत करो..." शेर (कामुक ठहाका लगाकर ताना कसता है): "अरे रानी साहब, जब मुँह से चूत का पानी पीकर इतना मज़ा आया, तो सोचिए जब यह अंदर जाएगा तो कितना स्वर्ग मिलेगा! अपनी इस कसम को पूरा कीजिए और चुपचाप इस दीवार से चिपकी रहिए!" शेर ने मीरा की कमर को कसकर पकड़ा और उसके एक पैर को उठाकर अपनी जाँघ पर रख लिया। मीरा की पूरी तरह गीली और खुली हुई योनि के मुहाने पर उसने अपने कड़क, फूले हुए लंड की सुपारी को टिका दिया। पानी की धार दोनों के जिस्मों पर गिर रही थी। शेर ने अपनी कमर को थोड़ा पीछे खींचा और फिर एक ही झटके में अपना आधा लंड मीरा की बेहद टाइट और भीगी हुई चूत में उतार दिया। मीरा (दर्द, खिंचाव और उस अनजाने शारीरिक अहसास से जोर से चीख उठी, उसकी उंगलियाँ शेर के मजबूत कंधों में गड़ गईं): "आह्ह्ह्! ... मर गई... शेर निकालो इसे... उफ़्फ़... बहुत बड़ा है... आह्ह्!" शेर (अपनी कमर को वहीं रोककर, मीरा की नंगी छाती पर अपना मुँह रगड़ते हुए गुर्राया): "उम्मम्म्म... क्या टाइट चूत है आपकी रानी साहब! कसम से, जैसे कोई रेशमी मखमली गुफा हो... अभी तो आधा ही गया है, पूरा जाना बाकी है!" शेर ने बिना दया दिखाए अपनी कमर का एक और ज़ोरदार झटका मारा, और उसका पूरा लंड मीरा की योनि की गहराइयों को चीरता हुआ सीधे अंदर समा गया। मीरा (आँखें फटी की फटी रह गईं, मुँह से सांस लेना मुश्किल हो गया): "उफ़्फ़... आअाह्ह्ह्... श्श्श्... हे भगवान... यह क्या पाप हो गया... आह्ह्..." शेर ने दीवार से सटी मीरा की कमर को दोनों हाथों से भींचा और अपनी कमर को तेज़ रफ़्तार में आगे-पीछे पटकना शुरू कर दिया। पानी की छम-छम के साथ-साथ चूत के गीलेपन और लंड की रगड़ की थप्प-थप्प की खौफनाक आवाज़ पूरे बाथरूम में गूंजने लगी। शेर (अपनी रफ़्तार बढ़ाते हुए, मीरा के गालों को चूमते और ताना मारते हुए बोला): "वाह मीरा रानी... देखो तुम्हारा यह नौकर आज तुम्हारा राजा बनके तुम्हें कैसे ठोक रहा है! बोलो... आ रहा है न मज़ा?" मीरा (ऊपर से दर्द और आत्मा की चीख, लेकिन नीचे से चूत में लंड की घर्षण से उठती भयानक कामुक तरंगें... वह रोते-हाँफते हुए बेकाबू आहें भरने पर मजबूर हो गई): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... धीमे... श्श्श्... मर जाऊँगी... आह्ह्... उफ़्फ़... हे भगवान मुझे माफ कर देना... आह्ह्!" हर झटके के साथ मीरा के दोनों सुडौल मम्मे ऊपर-नीचे उछल रहे थे और शेर उन पर अपनी लार टपकाते हुए उन्हें मसले जा रहा था। मीरा गिल्ट, लाचारी और शारीरिक मजे की उस खौफनाक भंवर में पूरी तरह डूब चुकी थी जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था। बाथरूम में पानी की तेज़ धार के नीचे शेर की कमर की थप्प-थप्प की आवाज़ें और तेज़ होती चली गईं। हर झटके के साथ उसका मोटा लंड मीरा की योनि की गहराइयों को बेरहमी से नाप रहा था। मीरा का नंगा बदन दीवार से सटा हुआ थर-थर कांप रहा था। उसके दोनों सुडौल मम्मे शेर के हर धक्के के साथ तेज़ी से उछल रहे थे, जिन पर ऊपर से गिरता पानी और शेर की लार मिलकर एक अजीब सी चमक पैदा कर रहे थे। शेर (मीरा की गर्दन पर अपने दाँत गड़ाते हुए और कमर की रफ़्तार को और बढ़ाते हुए गुर्राया): "आह्ह् मीरा रानी! क्या कसाब है आपकी इस चूत में... कसम से, आपके साहब ने तो सालों में भी ऐसा मज़ा नहीं लिया होगा जो आज यह नौकर ले रहा है!" मीरा (दर्द, खिंचाव और जिस्म के भीतर उठती उस बेकाबू उत्तेजना के बवंडर में पिसती हुई, रोते-हांफते हुए चीख उठी): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... बस करो... श्श्श्... मर जाऊँगी मैं... आह्ह्... इतनी ज़ोर से मत करो... उफ़्फ़!" लेकिन शेर पर वासना का भूत सवार था। उसने मीरा की दोनों बाहों को पीछे से मरोड़कर पकड़ा और अपनी कमर को और तेज़ी से पटकना शुरू कर दिया। उसकी हर पेलम-पेल के साथ मीरा के मुँह से सिसकियाँ और कामुक आहें एक साथ फूट रही थीं— "उफ़्फ़... आअाह्ह्ह्... श्श्श्..." शेर को महसूस हुआ कि उसकी अपनी कमर में भी एक मीठा सा दर्द और खिंचाव उठ रहा है। उसका वीर्य अब चरम सीमा पर पहुँच चुका था और बाहर आने को बेताब था। शेर (अपनी आँखें मूँदकर, मीरा के मम्मों को दोनों हाथों में भरकर बेदर्दी से भींचते हुए हांफने लगा): "रानी साहब... अब... अब मेरा छूटने वाला है! आज तो इस शेर का पूरा पानी आपकी इसी गोरी चूत के अंदर ही गिरेगा!" मीरा (खौफ से आँखें फाड़े, बदहवासी में सिर हिलाते हुए चीखी): "नहीं... नहीं शेर! अंदर मत गिराना... प्लीज... बाहर निकालो... मैं बर्बाद हो जाऊँगी... सरताज मुझे मार डालेंगे... प्लीज शेर!" शेर (कामुक अट्टहास लगाते हुए, आखरी तीखे और गहरे धक्के मारते हुए बोला): "अरे कैसी बर्बादी रानी जी! जब पूरी की पूरी मेरी हो चुकी हो, तो यह रस भी तो मेरा ही अंदर जाएगा!" इतना कहते ही शेर ने एक आखरी, बेहद ज़ोरदार झटका मारा और अपने लंड को मीरा की चूत में आखरी सीमा तक दबा दिया। अगले ही पल, उसके कड़क लंड से गाढ़े और गरम वीर्य की धारें मीरा की योनि की गहराई में छूटने लगीं। शेर (चरम सुख की संतुष्टि में एक लंबी, भारी आह भरते हुए): "आह्ह्ह्... उफ़्फ़... मीरा रानी... क्या मज़ा दिया है तुमने आज!" मीरा के भीतर शेर का गरम पानी भरता जा रहा था। उस अहसास से मीरा का पूरा वजूद कांप उठा। उसकी आत्मा घोर पाप और ज़िल्लत के बोझ से पूरी तरह टूट चुकी थी, जबकि उसका शरीर उस गरम वीर्य की छुअन से सिहर रहा था। सब कुछ शांत होने के बाद, शेर ने धीरे-धीरे अपना ढीला पड़ता लंड उसकी चूत से बाहर खींचा। चूत के मुहाने से शेर का सफ़ेद वीर्य और मीरा का कामुक रस मिलकर बहता हुआ उसकी नंगी जाँघों पर से नीचे पानी में घुलने लगा। मीरा बेजान होकर दीवार के सहारे फर्श पर ढह गई। पानी की धार उसके सिर पर गिर रही थी और वह अपने मुँह पर हाथ रखकर बिना कोई आवाज़ किए फूट-फूट कर रोने लगी।
Deepak Kapoor
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
11-08-2026, 05:46 AM
Deepak Kapoor
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11-08-2026, 05:47 AM
Khauf Aur Saazish—10
Sher ne badi hoshiyaari se bathroom ka darwaza khoola aur bina ek bhi kapde ke, poori tarah nanga andar daakhil ho gaya. Fawwaare ke bahte paani ki chham-chham aawaz aur aankhon mein jame sabun ke jhaag ke kaaran Meera ko shuruat mein Sher ki maujoodgi ka bilkul bhi ehsaas nahi hua. Vah bekhabar hokar apne badan ko ragad-ragad kar dhoone mein lagi hui thi. Udhar, Sher jaise hi bathroom mein ghusa, saamne ka nazaara dekhkar uske kadam wahi jam gaye. Uski aankhen phati ki phati rah gayiin aur muunh khula ka khula rah gaya. Paani ki boondon se nahaya hua Meera ka bilkul nanga, gora badan dopahar ki roshni mein kisi taraashi hui sangmarmar ki moorat ki tarah chamak raha tha. Uupar se paani ki dhaar uske bhare-poore mammon se hoti hui uske chikne pet aur naabhi ko bhigooti hui neeche bah rahi thi. Sher ki nigahaen dheere-dheere neeche sarkiin aur uski suraahidaar jaanghon ke beech ja tikiin. Meera ki yoni bilkul saaf, chikni aur beedaag thi, aur uski gori, makhmali jaanghon ki sangat dekhkar Sher ka lund pal bhar mein lohe ki tarah sakht hokar akad gaya. Sher (man hi man kaamuk unmaad mein haanfne laga): "Waah re kismat! .. Uupar wale ne seedhe jannat ka darwaza hi khool diya! Aisi saaf-suthri aur makkhan jaisi choot aur itni gori jaanghen to maine sapnon mein bhi nahi dekhi theen!" Sher ne bina koi aawaz kiye apne nange kadmon ko aage badhaaya aur uski nazar neeche pharsh par padi geeli, neeli panty par padi. Usne jhuk-kar pharsh se Meera ki istemaal ki hui, geeli panty utha li. Paani ki chham-chham ke beech peeche kisi ki garm saanson aur saaye ka ehsaas hote hi Meera jhatke se ghoomi. Saamne Sher ko bilkul nanga dekhkar uski cheekh nikal gayi. Usne badhavaasi mein apne dono haathon se apne nange mammon aur jaanghon ko dhakne ki naakam koshish ki. Meera (khauf aur nafrat se thar-thar kaampte hue, cheekh padi): "Sher?! Too... too yahaan kya kar raha hai?! Nikal yahaan se! Maine tujhe baahar bhi saaf kah diya tha ki main teri taraf dekhna bhi nahi chahti! Meri nazaron ke saamne se door ho ja neech!" Lekin Sher ke chehre par wahi shaitani muskaan phaili hui thi. Uski nazar Meera ki baat par kam aur apne haath mein uski geeli, neeli panty par zyaada thi. Uska dhyaan panty par lage geele daag par tha aur vah usse apne haath se mehsus kar raha tha. Sher (panty ko uungliyon mein ghumaate hue, kaamuk thahaaka lagaata hai): "Are-are Meera rani! Itna jhooth bhi mat booliye... muunh se to aise daant rahi hain jaise mujhse ghin aa rahi ho, par zara is bechaari panty ki haalat to dekhiye!" Sher ne us panty ko apni naak ke paas laakar ek gahri saans kheinchi, aur phir Meera ki aankhon mein aankhen daalkar besharmi se muskuraaya. Sher (taaze ras se bheoge hisse ki taraf ishaara karte hue taana kasta hai): "Dekhiye to sahi... kaise aapke is raseele paani se poori panty tar-batar ho rahi hai! Agar mujhse itni hi nafrat hai rani sahab, to yeh choot ka paani kya aapke sahab ki yaad mein bah raha hai? Badan to aapka taras raha hai mere liye!" Itna kehte hi Sher ne Meera ke saamne hi us panty ke bheoge hue hisse par apni jeebh tika di aur usse buri tarah chaatna shuru kar diya. Sher (panty ko chaatte hue, kaamukta se aankhen moondehue gurraaya): "Ummmmm... waah Meera! Kya gazab ka swaad hai... maza aa gaya! Aapki is jawaani ka ras to shahad se bhi zyaada meetha hai!" Meera (apni hi panty ko us haiewaan ke muunh mein dekhkar ghor apmaan aur bekaabu kaamuk lazzat ke teekhe sangam se tadap uthti hai): "Aahh... ufff... Sher... neech... neech insaan... mat kar aisa... shhh..." Sher ne panty ko chaatna band kiya aur usse ek taraf pheenk diya. Uski aankhen vaasna ke maare laal ho chuki theen. Usne fawwaare ke bahte paani ke neeche Meera ki taraf apne nange jism ko badhaaya aur seedhe uski aankhon mein dekha. Sher (apni jeebh se hotHon ko chaatte hue kameenepan se phusphusaaya): "Are Meera rani... jab is kapde mein itna swaad hai, to aapki asli jagah par kitna ras hoga? Aapka yeh garm badan chilla-chillaakar kah raha hai ki 'Sher, is sookhi panty ko kya chaat raha hai, aa aur meri asli jagah se seedha swaad le!'" Meera (paani ke neeche kaampti hui, badhavaasi mein sir hilaati hai): "Nahi... nahi Sher... aisa mat kar... Khuda ke liye baahar nikal ja... aahh..." Lekin Sher ne uski ek na suni. Usne jhatke se Meera ko peeche deewar se sata diya. Paani ki thandi dhaar dono ke nange shareeron par gir rahi thi. Sher ne Meera ke dono haathon ko uupar uthaakar deewar se chipka diya aur apni chaudi kaali jaanghon se uski gori, nangi taangon ko chauda karke phaila diya. Meera ki aankhen dar ke maare phaili hui theen, haath dono uupar the, aur uske dono stan uupar ki taraf uthe hue the, jin par gulaabi nipple dar ya uttejna ke maare khade the. Meera ki saaf, chikni aur geeli yoni ab seedhe Sher ke muunh ke saamne nangi thi, Sher ki nigahaen yoni ke beech dar ke maare thartharaate hotHon par padi. "Are Meera ji, dekho to kaise khul rahi hai mere ko dekh ke." Sher ne apna sir neeche jhukaaya aur seedhe Meera ki yoni par apna muunh jama diya. Usne apni garm, jeebh baahar nikaali aur uski yoni ke sabse naajuk hisse ko neeche se uupar tak chaatna shuru kar diya. Meera (paani ki dhaar ke beech jaise hi Sher ki jeebh uski choot ke naajuk hisse se takraai, uski poori deh aainth gayi aur ek teekhi cheekh-sah-aah nikal gayi): "Aaaahhh! Ufff... Sher... shhh... yeh kya... aahh!" Sher kisi bhookhe jaanwar ki tarah Meera ki choot ke ras ko apni zubaan par sametne laga. Vah uski yoni ke daanon ko apne hotHon mein bharkar choosne laga aur apni jeebh ko gahrai tak andar-baahar karne laga. Bahta hua paani aur uski garm laar milkar Meera ke neechle hisse mein aag laga rahe the. Meera (man hi man is ghor paap aur zillat se jalte hue, par badan ke bekaabu maze mein tadapte hue apni kamar ko anjaane mein Sher ke muunh par ragadne lagi): "Hey Ishwar... mujhe maar kyon nahi dete? Yeh haiewaan... yeh haiewaan meri chaat raha hai... aur mera neech badan... ufff... kitna maza aa raha hai... aahh... shhh... Sher... mat choos wahan... mar jaaungi... aahh!" Meera itni shocked thi ki usse pata hi nahi chala ki Sher ke haath kab uske haathon ko chhod chuke the. Vah ab bhi stabdh khadi apne dono haath uupar deewar se chipkaaye hue thi, jaise uski poori deh kaath ki ho gayi ho. Shower se girti paani ki thandi dhaar uski gardan aur stanon se hoti hui bah rahi thi. Usse ehsaas hi nahi hua ki Sher ki pakad dheeli ho chuki hai, kyonki uska dhyaan us khauf aur chhuan par hi atka hua tha. Sher ka ek bhaari, haath uski gori, chikni aur bheegi hui jaangh par reng raha tha. Uski har uungli Meera ki nangi tvacha par ek khaufnaak siharan paida kar rahi thi. Wahi uska doosra haath neeche sarkakar uski gol, sudaul gaand par kaskar tika hua tha, jahaan uski uungliyon ki pakad Meera ki gori sangat mein gahre laal nishaan chhod rahi thi. Meera ka saans lena bhaari ho chuka tha. Vah deewar se sati, bina koi harkat kiye bas Sher ki is darindagi bhari chhuan ko mehsus kar rahi thi, jahaan dar, apmaan aur ek anchaahi kaamukta ka toofan usse andar hi andar nigal raha tha. Sher ka jo haath Meera ki bheegi hui jaangh par tha, vah dheere-dheere sarkata hua uski yoni ke bilkul paas aa pahuncha. Uski uungliyon ki bhaari chhuan Meera ki sanvedansheel tvacha par ek ajeeb si siharan dauda rahi thi. Sher ne Meera ki yoni ke paas se apna chehra thoda peeche hataaya, taaki uski uungli ko andar jaane ki poori jagah mil sake. Jaise hi uski moti, beparwah uungli ne Meera ki geeli aur tang yoni ki gahrai mein jhatke se pravesh kiya, Meera ke halak se ek teekhi, dard aur bekaabu uttejna se bhari cheekh nikal gayi—"Aahh!" Uska poora jism deewar se satkar aainth gaya aur uske uupar uthe hue stan zor-zor se haanfne lage. Uungli ko andar dhakelne ke turant baad Sher ne ek pal ki bhi deer nahi ki aur apna muunh dobaara neeche jhukaakar Meera ki yoni ko phir se deewanon ki tarah chaatna shuru kar diya. Uungli ki gahri halchal aur jeebh ki garm, geeli lapaton ka yeh dohara hamla Meera ko poori tarah se laachar aur madhosh karne laga. Paani ki chham-chham ke beech Meera ki bekaabu aahen aur siskiyan bathroom ki deewaron se takraakar goonjne lagiin. Paani ki dhaar dono ke tapte shareeron par lagaataar gir rahi thi, lekin neeche ki aag thandi hone ke bajaay aur bhadakti ja rahi thi. Sher ka muunh Meera ki yoni ke raseele ubhaaron par bedardi se reng raha tha. Uski jeebh jab-jab Meera ki daanedaar naajuk tvacha ko chaatti aur choosati, Meera ka poora badan bijli ke jhatke ki tarah aainth uthta. Sher (muunh ko uski choot se thoda hataakar, jeebh se apni moonchhon par laga ras chaatte hue kaamuk unmaad mein gurraaya): "Aahh Meera rani! Kya makkhan jaisa ras hai... kasam se, aaj tak aisa meetha paani nahi piya is Sher ne! Dekho, tumhari yeh choot kaise thirak rahi hai mere muunh ke uupar!" Meera (deewar se chipki, paani ki boondon ke beech apni aankhen bheenchte hue tadap rahi thi): "Aahh... ufff... Sher... bas karo... ab aur nahi... shhh... mar jaaungi main..." Lekin Sher rookne wala nahi tha. Usne apni jeebh ki dhaar ko aur tez kar diya aur Meera ki yoni ke uupari daane ko apne hotHon ke beech bharkar zor se choosne laga, saath hi bheetar phansi apni uungli ki raftaar badha di. Us teekhe, zaheeraale maze ka hamla itna zabardast tha ki Meera ke ghutne jawaab dene lage. Uske haath, jo deewar par tike the, dheele pad gaye aur usne bebasi mein Sher ke geele baalon ko apne haathon mein jakad liya. Vah na chahte hue bhi apni kamar ko aage dhakelkar apne kaamuk hisse ko Sher ke muunh par aur kaskar ragadne lagi. Meera (gahre guilt aur bekaabu uttejna ke charam par pahunchkar roote-haanfte hue cheekh uthi): "Ufff... aaaahhh! Sher... yeh... yeh kya ho raha hai... shhh... mat karo itna... aahh... meri jaan nikal jaayegi... ufff!" Sher ne uski jaanghon par apni pakad aur sakht kar di. Vah samajh gaya tha ki Meera apni uttejna ke bilkul kareeb pahunch chuki hai. Vah kisi darinde ki tarah uski choot ke ras ko ghat-ghat peene laga. Meera ki saansen ukhad chuki theen. Badan ke bheetar ek bhayaanak toofan uth raha tha—jahaan ek taraf apni aatma ka katl hone ka gam tha, to doosri taraf ek neech naukar ki jeebh se mil raha aisa charam sukh jo usse apni poori shaadishuda zindagi mein kabhi mehsus nahi hua tha. Meera (kaampti hui, apni kamar ko Sher ke chehre par jhatke se maarte hue charam aanand mein sihar uthi): "Aahhh... Sher... gaya... sab khatam ho gaya... ufff... shhh!" Meera ka poora jism thar-thar kaampne laga aur uski yoni se ras ka ek aur garm fawwaara chhoot pada, jo seedhe Sher ki jeebh aur muunh par bahne laga. Vah bejaan si deewar ke sahaare dheeli pad gayi, uski saansen dhaunkani ki tarah chal rahi theen aur aankhen aansoon se bhari hui theen. Sher ne us poore bahte ras ko apni jeebh par sameta, gahri saans li aur khada hokar seedhe Meera ke roote hue chehre ko dekhne laga. Sher (apni jeebh hotHon par ghumaate hue, vaasna se bhari hansi ke saath taana maarta hai): "Waah rani sahab! Maan gaye aapki is jawaani ko! Muunh se to bada 'na-na' kar rahi theen, par neeche se to is gareeb naukar ke muunh mein apni poori jawaani udeel di aapne!" Meera bas bejaan si khadi paani ki dhaar ke neeche rooti rahi. Uska jism shaant ho chuka tha, lekin uski aatma guilt ki aag mein poori tarah bhasm ho rahi thi. Sher khada hua, to uska lohe jaisa kadak lund Meera ki naabhi aur nange pet par ragad khaane laga. Uski nigahaen Meera ke chehre par tiki theen, jo paani ki dhaar ke neeche dheeli aur bejaan si khadi haanf rahi thi. Sher (apni hatheli se Meera ke dono nange mammon ko ek saath daboochte hue aur apne sakht lund ko uske pet par dabaate hue phusphusaaya): "Kyon Meera rani? Choot ka paani nikaalkar soch rahi ho ki khel khatam ho gaya? Asli khel to ab shuru hoga jab yeh Sher apna yeh mota lund aapki is gori choot ke andar utaarega!" Meera (choot ke paani nikaalne ke baad ki thakaawat aur guilt mein choor thi, lekin Sher ke lund ka sakht sparsh apne pet par mehsus hote hi khauf se uski aankhen khool gayiin): "Nahi... ufff... Sher... nahi... yeh nahi... please... aisa mat karo..." Sher (kaamuk thahaaka lagaakar taana kasta hai): "Are rani sahab, jab muunh se choot ka paani peekar itna maza aaya, to sochiye jab yeh andar jaayega to kitna swarg milega! Apni is kasam ko poora kijie aur chupchaap is deewar se chipki rahiye!" Sher ne Meera ki kamar ko kaskar pakda aur uske ek pair ko uthaakar apni jaangh par rakh liya. Meera ki poori tarah geeli aur khuli hui yoni ke muhaane par usne apne kadak, phoole hue lund ki supaari ko tika diya. Paani ki dhaar dono ke jismon par gir rahi thi. Sher ne apni kamar ko thoda peeche kheincha aur phir ek hi jhatke mein apna aadha lund Meera ki behad tight aur bheegi hui choot mein utaar diya. Meera (dard, khinchaav aur us anjaane shaareerik ehsaas se zor se cheekh uthi, uski uungliyan Sher ke majboot kandhon mein gad gayiin): "Aahhh! ... mar gayi... Sher nikaalo isse... ufff... bahut bada hai... aahh!" Sher (apni kamar ko wahi rookkar, Meera ki nangi chhati par apna muunh ragadte hue gurraaya): "Ummmmm... kya tight choot hai aapki rani sahab! Kasam se, jaise koi reshmi makhmali gufa ho... abhi to aadha hi gaya hai, poora jaana baaki hai!" Sher ne bina daya dikhaaye apni kamar ka ek aur zordaar jhatka maara, aur uska poora lund Meera ki yoni ki gahraiyon ko cheerta hua seedhe andar sama gaya. Meera (aankhen phati ki phati rah gayiin, muunh se saans lena mushkil ho gaya): "Ufff... aaaahhh... shhh... Hey Bhagwan... yeh kya paap ho gaya... aahh..." Sher ne deewar se sati Meera ki kamar ko dono haathon se bheencha aur apni kamar ko tez raftaar mein aage-peeche patakna shuru kar diya. Paani ki chham-chham ke saath-saath choot ke geelapan aur lund ki ragad ki thapp-thapp ki khaufnaak aawaz poore bathroom mein goonjne lagi. Sher (apni raftaar badhaate hue, Meera ke gaalon ko choomte aur taana maarte hue boola): "Waah Meera rani... dekho tumhara yeh naukar aaj tumhara raaja banke tumhe kaise thok raha hai! Boolo... aa raha hai na maza?" Meera (uupar se dard aur aatma ki cheekh, lekin neeche se choot mein lund ki gharshan se uthti bhayaanak kaamuk tarangen... vah roote-haanfte hue bekaabu aahen bharne par majboor ho gayi): "Aahh... ufff... Sher... dheeme... shhh... mar jaaungi... aahh... ufff... Hey Bhagwan mujhe maaf kar dena... aahh!" Har jhatke ke saath Meera ke dono sudaul mamme uupar-neeche uchhal rahe the aur Sher un par apni laar tapkaate hue unhen masle ja raha tha. Meera guilt, laachari aur shaareerik maze ki us khaufnaak bhanwar mein poori tarah doob chuki thi jahaan se waapsi ka koi raasta nahi bacha tha. Bathroom mein paani ki tez dhaar ke neeche Sher ki kamar ki thapp-thapp ki aawazen aur tez hoti chali gayiin. Har jhatke ke saath uska mota lund Meera ki yoni ki gahraiyon ko berahmi se naap raha tha. Meera ka nanga badan deewar se sata hua thar-thar kaamp raha tha. Uske dono sudaul mamme Sher ke har dhakke ke saath tezi se uchhal rahe the, jin par uupar se girta paani aur Sher ki laar milkar ek ajeeb si chamak paida kar rahe the. Sher (Meera ki gardan par apne daant gadaate hue aur kamar ki raftaar ko aur badhaate hue gurraaya): "Aahh Meera rani! Kya kasaab hai aapki is choot mein... kasam se, aapke sahab ne to saalon mein bhi aisa maza nahi liya hoga jo aaj yeh naukar le raha hai!" Meera (dard, khinchaav aur jism ke bheetar uthti us bekaabu uttejna ke bavandar mein pisati hui, roote-haanfte hue cheekh uthi): "Aahh... ufff... Sher... bas karo... shhh... mar jaaungi main... aahh... itni zor se mat karo... ufff!" Lekin Sher par vaasna ka bhoot sawaar tha. Usne Meera ki dono baahon ko peeche se marodkar pakda aur apni kamar ko aur tezi se patakna shuru kar diya. Uski har pelam-pel ke saath Meera ke muunh se siskiyan aur kaamuk aahen ek saath phoot rahi theen— "Ufff... aaaahhh... shhh..." Sher ko mehsus hua ki uski apni kamar mein bhi ek meetha sa dard aur khinchaav uth raha hai. Uska veerya ab charam seema par pahunch chuka tha aur baahar aane ko betaab tha. Sher (apni aankhen moondehue, Meera ke mammon ko dono haathon mein bharkar bedardi se bheenchte hue haanfne laga): "Rani sahab... ab... ab mera chhootne wala hai! Aaj to is Sher ka poora paani aapki isi gori choot ke andar hi girega!" Meera (khauf se aankhen phaade, badhavaasi mein sir hilaate hue cheekhi): "Nahi... nahi Sher! Andar mat giraana... please... baahar nikaalo... main barbaad ho jaaungi... Sartaj mujhe maar daalenge... please Sher!" Sher (kaamuk atthahaas lagaate hue, aakhri teekhe aur gahre dhakke maarte hue boola): "Are kaisi barbaadi rani ji! Jab poori ki poori meri ho chuki ho, to yeh ras bhi to mera hi andar jaayega!" Itna kehte hi Sher ne ek aakhri, behad zordaar jhatka maara aur apne lund ko Meera ki choot mein aakhri seema tak daba diya. Agle hi pal, uske kadak lund se gaadhe aur garm veerya ki dhaaren Meera ki yoni ki gahrai mein chhootne lagiin. Sher (charam sukh ki santushti mein ek lambi, bhaari aah bharte hue): "Aahhh... ufff... Meera rani... kya maza diya hai tumne aaj!" Meera ke bheetar Sher ka garm paani bharta ja raha tha. Us ehsaas se Meera ka poora wajood kaamp utha. Uski aatma ghor paap aur zillat ke bojh se poori tarah toot chuki thi, jabki uska shareer us garm veerya ki chhuan se sihar raha tha. Sab kuch shaant hone ke baad, Sher ne dheere-dheere apna dheela padta lund uski choot se baahar kheincha. Choot ke muhaane se Sher ka safed veerya aur Meera ka kaamuk ras milkar bahta hua uski nangi jaanghon par se neeche paani mein ghulne laga. Meera bejaan hokar deewar ke sahaare pharsh par dhah gayi. Paani ki dhaar uske sir par gir rahi thi aur vah apne muunh par haath rakhkar bina koi aawaz kiye phoot-phoot kar roone lagi.
Deepak Kapoor
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