04-08-2026, 08:38 PM
Hello friends how are you all?????
It's Rajan 
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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
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04-08-2026, 08:43 PM
भाग ~ २२
अनीता घर के बरामदे में खाट पर लेटी हुई थी। दोपहर में खाने के बाद अपने मां बापू की तरह वो भी आराम कर रही थी। यूं तो गर्मी थी लेकिन मंद मंद चलती हवा बरामदे में भी आ रही थी इस लिए थोड़ी राहत थी। वो बार बार आँखें बंद कर के सोने की कोशिश करती मगर हर बार बंद पलकों में उसे अपने भाई राजू का चेहरा उभर आता था। वो चाह कर भी उसके बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पा रही थी। जब राजू का चेहरा उभरता तो वो सोचने लगती कि पिछले कुछ दिनों से उसके और राजू के बीच कितना लगाव हो गया था। इतना ही नहीं दोनों के बीच इतना गहरा प्यार भी हो गया था कि दोनों ही एक दूसरे की खुशी के बारे में सोचते रहते थे। माना कि उस प्यार की यथार्थ सच्चाई उसे बाद में पता चली थी या ये कहा जाए कि उसे एहसास हुआ था लेकिन एक सच तो यही था कि जब से दोनों के बीच ये प्यार का एहसास जागृत हुआ था तब से दोनों ही बेहद खुश रहने लगे थे। दोनों ही एक दूसरे का खयाल रखने लगे थे। इसके पहले बचपन से ही दोनों के बीच हर रोज़ झगड़ा ही होता आया था। अनीता जब ये सब सोचती तो उसे याद आता कि कैसे उसका भाई उसकी एक मुस्कान के लिए कुछ भी कर जाता था। पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी राजू ने उसकी खुशी के लिए किया था वो सब उसे याद आता और फिर अनायास ही उसका कोमल दिल जोर जोर से धड़क उठता। तभी उसने बेचैनी से करवट ली और एकाएक ही उसके मन में खयाल उभरा कि क्या उसने राजू से दूरी बना कर सही किया है? मतलब कि जो कुछ हुआ है उसमें अकेले सिर्फ राजू की तो गलती नहीं थी, उसकी भी तो गलती थी। जैसे उसे देर से एहसास हुआ था कि ये प्यार भाई बहन वाला नहीं है उसी तरह राजू को भी तो देर से ही एहसास हुआ था। बल्कि ये कहना चाहिए कि उसके बताने पर ही उसे पता चला था। यानि अगर वो न बताती तो राजू यही समझता रहता कि ये प्यार भाई बहन वाला ही है। तो फिर कहां राजू की इसमें गलती हुई? सच तो ये है कि गलती किसी की भी नहीं है क्योंकि दोनों ही इस प्यार के असल सच से वाकिफ नहीं थे। ये सब सोचते ही अनीता ने एक गहरी सांस ली। उसे थोड़ी राहत भी महसूस हुई। अगले ही पल उसके मन में सवाल उभरा कि भले ही गलती किसी की नहीं है लेकिन सच का पता चल जाने के बाद क्या फिर से दोनों का वैसे ही एक दूसरे के साथ रहना सही होगा? अनीता को याद आया कि राजू ने उससे कहा था कि कोई चीज गलत तब होती है जब उसमें मर्यादाएं पार की जाएं। कुछ ऐसा किया जाए जिसे गांव समाज के लोग सही नहीं मानते। अनीता अंजाने में एक बार फिर इस सबके बारे में गहराई से सोचने में गुम हो गई। बार बार उसके मन में यही खयाल उभरता कि जब वो दोनों आपस में कुछ गलत करेंगे ही नहीं तो भला कैसे कोई इसे गलत कहेगा? भाई बहन के रिश्ते में भी तो गहरा प्यार ही होता है और दोनों भाई बहन एक दूसरे की हर खुशी का खयाल रखते हैं। यानि प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार तब कहलाएगा जब वो दोनों प्रेमी प्रेमिका की तरह एक दूसरे के उन अंगों का स्पर्श करेंगे जिन अंगों को वो भाई बहन के रूप में स्पर्श नहीं कर सकते। अचानक अनीता को याद आया कि उसने कई बार राजू के सामने अपना कुर्ता उतारा था। उसने सोचा ये भी तो गलत ही था। भला कोई बहन अपने भाई के सामने कुर्ता उतार कर अपना वो अंग कैसे उजागर कर सकती है जिसे गलत माना जाता है? अनीता ये सोचते ही एकदम से बेचैन हो उठी। उसके मन में यही बात उभरी कि हां ये पूरी तरह गलत था। उसे अपने भाई के सामने ऐसा नहीं करना चाहिए था। भला कौन बहन ऐसा करती है? अनीता को इस बात का पता ही न चला कि वो ये सब बातें सोचते सोचते किस भँवर में फंसती चली जा रही थी। थोड़ी देर बाद उसी भंवर में फंसी वो सो गई। ************ जब मैं मंजू काकी के घर के अंदर पहुंचा तो देखा काकी एक तरफ बरामदे में बिछी खाट पर लेटी हुईं थी। उनकी दोनों बेटियां मुझे वहां पर नजर न आईं। किसी के आने की आहट से उन्होंने करवट बदल कर बाहर की तरफ देखा। मुझ पर नजर पड़ते ही उनके चेहरे के भाव बड़ी तेजी से बदले और फिर उनके होठों पर मुस्कान उभर आई। "मैं ऊपर वाले से प्रार्थना ही कर रही थी कि काश इस वक्त वो तुम्हें यहां भेज दे।" काकी ने उठते हुए कहा─"और देख लो उसने तुम्हें सच में भेज दिया। आओ मेरे पास बैठो।" मैं जा कर चुपचाप उनकी खाट पर बैठ गया। एकाएक ही मेरी धडकनें बढ़ गईं थी। चेहरे पर पसीना झिलमिला आया था। मैंने चारों तरफ ये देखने के लिए निगाहें दौड़ाईं कि उनकी दोनों बेटियां कहां हैं? "तुम्हारी दोनों बहनें अभी थोड़ी ही देर पहले अपनी काकी के घर गईं हैं।" काकी ने जैसे मेरे मन की बात पढ़ लिया था─"और तुम्हारे काका तो अभी अभी बाहर गए हैं।" "तो इस वक्त तुम अकेली ही हो घर में?" मैं धड़कते दिल से पूछ बैठा। "हां अकेली ही हूं।" काकी के होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान उभर आई─"और अब जब तुम भी आ गए हो तो यही चाहती हूं कि तुम मेरी मुराद पूरी कर दो।" काकी के कहने का मतलब मैं फौरन समझ गया। मैं जल्दी कुछ बोल न सका लेकिन मेरे अंदर पलक झपकते ही हलचल मच गई। "तुमने सोचने का समय मांगा था राजू।" उधर काकी ने कहा─"तो बोलो क्या तुमने सोच लिया है? बताओ न राजू...क्या सोचा है तुमने?" सच तो ये था कि मेरे अंदर से यही आवाज आ रही थी कि फौरन हाँ बोल दे। जिस चीज के लिए गांव के लोग जाने कहां कहां जुगाड़ लगाते फिरते हैं वो चीज तो तुम्हें खुद ही आसानी से मिल रही है। फिर क्यों काकी को हां नहीं कहता? मैं वाकई चाहता था कि झपट कर काकी को दबोच लूँ और फिर उनको जम के चोदना शुरू कर दूं लेकिन जाने क्यों मैं थोड़ा झिझक रहा था। एक घबराहट भी थी कि कहीं इस चक्कर में मैं किसी बड़ी मुसीबत में न फंस जाऊं। तभी मंजू काकी खाट से उठीं। फिर बाहर चली गईं। मुझे समझ न आया कि अचानक वो बाहर क्यों चली गईं? "बाहर वाला द्वार बंद करने गई थी।" थोड़ी देर में आते ही काकी ने खुद ही बताया─"मैं नहीं चाहती कि गलती से भी कोई भूल हो जाए जिससे किसी को पता चल जाए।" मैं कुछ न बोला। ये अलग बात है कि द्वार बंद करने की बात सुन कर मेरी धड़कनें और भी तेज चलने लगीं। तभी काकी मेरे एकदम करीब आ कर खड़ी हो गईं। "क्या हुआ राजू? अब क्या सोच रहे हो?" "कु..कुछ नहीं।" "देखो राजू, तुम्हें बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है।" काकी ने जैसे मुझे समझाया─"और तुम्हें किसी बात से डरने की भी जरूरत नहीं है। हमारे बीच जो भी होगा उसके बारे में सिर्फ हमें ही पता रहेगा। हम कभी किसी को कुछ नहीं बताएंगे।" "अ..और अगर किसी को पता चल गया तो??" "नहीं पता चलेगा।" काकी ने कहा─"वैसे भी हमें कौन सा ये काम रोजाना करना है। हम सिर्फ दो या तीन बार करेंगे। मुझे पूरा भरोसा है कि इतने में ही मेरी कोख में तुम्हारा बीज ठहर जाएगा।" मैं काकी को अजीब भाव से देखने लगा। असल में उनकी इस बात से मैं थोड़ा मायूस सा हो गया कि वो सिर्फ दो या तीन बार ही मेरे साथ चुदाई करेंगी। जबकि मेरा दिल तो अब ये चाहने लगा था कि काकी के साथ मैं हमेशा मजा करूं। "क्या हुआ, ऐसे क्यों देख रहे हो राजू?" "क्या सच में हम सिर्फ इतनी ही बार करेंगे?" "हां इतने में मैं तुम्हारे बच्चे की मां बन सकती हूं।" काकी ने कहा फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ महसूस हुआ तो बोलीं─"हाय! दय्या राजू तुम्हारे कहने का मतलब क्या था? कहीं तुम ये तो नहीं कहना चाहते कि तुम मेरे साथ आगे भी ये काम करना चाहते हो?" काकी की इस बात पर मैं अंदर ही अंदर हड़बड़ा गया और अनायास ही मेरा सिर झुक गया। उधर काकी समझ गईं कि उनकी शंका सच थी। "अगर तुम सच में मुझे एक बेटे की मां बना दोगे।" काकी ने अचानक मेरा चेहरा ऊपर करके कहा─"तो मैं तुमसे वादा करती हूं कि तुम जब भी मेरे साथ ऐसा करने को कहोगे तो मैं तुम्हें इंकार नहीं करूंगी।" मैंने काकी की आंखों में सच्चाई और दृढ़ता देखी। वो बड़े प्यार से मुझे देख रहीं थी। मेरा दिल अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगा था। "चलो अब देर मत करो।" फिर उन्होंने कहा─"अभी हमारे पास अच्छा मौका है। कहीं ऐसा न हो कि मेरी बेटियां आ जाएं।" कहने के साथ ही काकी फटाफट अपनी साड़ी खोलने लगीं। ये देख मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मेरे अंदर ये सोच कर जबरदस्त हलचल मच गई कि अब वो होने वाला है जिसके बारे में मैंने सिर्फ सुना था। कुछ ही देर में काकी ने साड़ी खोल कर एक तरफ रख दी और फिर ब्लाउज खोलने लगीं। मैं बिना पलकें झपकाए उनके गदराए हुए बदन को देखे जा रहा था। जैसे ही उन्होंने सारे बटन खोल कर ब्लाउज को उतारा तो उनकी चूचियों के दोनों बड़े बड़े उभार उजागर हो गए। भूरे रंग के चूचक मटर के दाने से भी बड़े थे। उन्हें देख मेरा गला सूखने लगा। उधर काकी ने जैसे ही मुझे अपनी तरफ अपलक घूरता देखा तो उन्हें एकदम से शर्म आ गई। होठों पर शर्म मिश्रित मुस्कान भी उभर आई। "ऐसे क्यों देख रहे हो राजू?" फिर वो बोलीं─"पहली बार तो ऐसे नहीं देख रहे हो मुझे।" मैं एकदम से सकपका गया और इधर उधर देखने लगा। "चलो अब तुम भी अपने कपड़े उतार लो।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"हमें सब कुछ जल्दी करना होगा। तुम्हारी बहनें आ गईं तो कुछ नहीं हो पाएगा।" मैं शर्मा तो रहा था लेकिन अंदर से यही चाहता था कि काकी को जल्दी से चोदना शुरू कर दूं। आख़िर घर से इसी लिए तो आया था यहां। मैंने उठ कर फटाफट अपने नीचे के कपड़े उतार दिए। मेरा लंड तो काकी को ऊपर से नंगा देखते ही खड़ा होने लग गया था। जैसे ही मैंने कच्छा उतारा तो वो लहरा उठा। "हाय! दय्या, तुम तो सच में जवान हो गए हो राजू।" काकी ने आश्चर्य से मुंह पर हाथ रख कर कहा─"तुम्हें देख के कोई नहीं कह सकता कि तुमने अपने कच्छे में इतना बड़ा औजार छुपा रखा होगा।" काकी के मुख से तारीफ सुन कर मुझे अच्छा भी लगा और थोड़ी शर्म भी आई। इसी लिए मैंने अपने लंड को हाथ से छुपाने की कोशिश की। मगर काकी ने फौरन आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया। "अब इसको मत छुपाओ मेरे राजा।" काकी ने मेरा हाथ हटा कर लंड को पकड़ लिया─"इसी के द्वारा तो मुझे एक बेटे की मां बनना है। तुम्हारे बेटे की मां बनना है। हां राजू, जब ऐसा हो जाएगा तो एक तरह से तुम मेरे बेटे के बापू बन जाओगे। उफ्फ! देखो क्या क्या बोले जा रही हूं मैं।" काकी हौले हौले मेरा लंड सहलाने लगीं थी जिससे वो अगले कुछ ही पलों में पूरी तरह अकड़ गया। उनके हाथों के स्पर्श से मेरे पूरे बदन में मजे की चिंगारियां फूटने लगीं थी। सहसा मेरी नजर उनकी चूचियों पर पड़ी तो मैंने बेधड़क हाथों को बढ़ा कर उन्हें पकड़ लिया और धीरे धीरे दबाने लगा। "हां दबा लो राजू।" काकी ने कहा─"जितना मन करे दबा लो। अब से ये तुम्हारी ही हैं। जोर जोर से दबाओ और चाहो तो मुंह में ले कर चूसो भी।" मैं एकदम से उतावला हो चुका था। काकी की चूचियों को जोर जोर से दबाने लगा। उनकी मुलायम चूचियों का मर्दन करने में मुझे बड़ा मजा आ रहा था। दूसरी तरफ काकी मेरे लंड को अब हिलाने लगीं थी। मेरा लंड बुरी तरह अकड़ चुका था। "आह्ह्ह्ह्ह् राजू सिर्फ दबाते ही रहोगे क्या?" काकी बोल पड़ीं─"इनको मुंह में ले कर भी चूसो न।" कहने के साथ ही काकी मेरे चेहरे को पकड़ कर अपनी एक चूची का निप्पल मेरे होठों पर रगड़ने लगी। मुझे अजीब सी झुरझुरी हुई और अगले ही पल मैंने मुंह खोल कर उनके चूचक को भर लिया। "शश्श्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् ऐसे ही राजू।" काकी मस्ती में सिसक उठीं─"जोर जोर से चूसो। ये समझो कि इसमें से दूध निकल रहा है।" काकी मेरे सिर के बालों में उगलियाँ घुमाने लगीं और मैं सच में किसी बच्चे की तरह उनकी चूची को चूसने लगा। चूची से दूध तो नहीं निकल रहा था लेकिन फिर भी मुझे मजा आ रहा था। मन्जू काकी ऊपर से पूरी नंगी थी इस लिए मैं चूची को चूसने के साथ साथ कभी दूसरी चूची को जोर से मसल दे रहा था तो कभी उनके जिस्म पर हाथ फिराने लगता था। इधर काकी पूरी तरह मस्ती में सिसकियां भरे जा रहीं थी। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् अब इस वाली को भी चूसो मेरे राजा।" काकी ने थोड़ा जोर दे कर अपनी दूसरी चूची पर मेरा मुंह सरकाया। मेरे थूक से उनकी चूची गीली हो चुकी थी लेकिन न उन्हें इसकी परवाह थी और ना ही मुझे। मैं दूसरी चूची को भी जोर जोर से चूसने लगा। काकी मस्ती में आँखें बंद किए सिसकियां भर रहीं थी। थोड़ी देर बाद जब मेरी सांसें उखड़ने लगीं तो मैंने चूची से मुंह हटा लिया। काकी की सासें अब तक भारी हो चलीं थी। चेहरे पर सुर्खी छा गई थी। "आओ अब खाट पर चलते हैं।" काकी ने मुझे खींचते हुए कहा। उन्होंने मुझे खाट पर बैठाया और खुद नीचे एड़ियों पर बैठ गईं। मैं खाट के किनारे ही बाट पर बैठा था इस लिए मेरा अकड़ा हुआ लंड उन्हें साफ दिख रहा था। काकी ने झट उसे पकड़ लिया। "उफ्फ! कितना तगड़ा दिख रहा है ये।" काकी ने लंड की चमड़ी को पीछे करते हुए कहा─"और इसके अंदर का ये सुपाड़ा तो एकदम गुलाबी है।" मैं मज़े में था बोला कुछ नहीं। तभी काकी ने झट से सिर झुका कर उसे हौले से चूम लिया। मेरे पूरे बदन में मजे की तरंग दौड़ गई। पूरा बदन कांप गया। "शश्श्श्श्श् काकी क्या आज फिर से तुम इसे मुंह में ले कर चूसोगी?" मैंने मजे की तरंग में पूछा। "क्या तुम चाहते हो कि मैं चूसूं?" "ह..हां काकी।" "ठीक है।" काकी ने सुपाड़े को निकाला और उसे मुंह में भर लिया। गर्म और लिसलिसे स्पर्श का एहसास होते ही मैं बुरी तरह कांप उठा। उधर काकी ने मुंह में लिए लिए ही अंदर से अपनी जीभ मेरे लिंग के छेद पर कुरेदने सी लगीं। "शश्श्श्श्श् काकी।" मुझे आँखें बंद कर सिसकी लेते देख काकी ने अपना एक हाथ मेरी जांघ पर रखा और दूसरे हाथ से लंड को पकड़े सुपाड़े को चूसने लगीं। अगले ही पल मजे की ऐसी तरंग उठने लगी कि मेरा बुरा हाल होने लगा। पूरे जिस्म का लहू लंड की तरफ दौड़ते हुए आता महसूस होने लगा। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् काकी मुझे कुछ हो रहा है।" मैं मजे के अथाह सागर में डूबा बोल पड़ा─"लगता है अंदर से कुछ बाहर आ रहा है।" मेरे द्वारा ऐसा सुनने पर काकी ने झट से मेरा लंड मुँह से निकाल दिया। शायद वो समझ गईं थी कि अगर कुछ देर और उन्होंने ऐसे ही चूसा तो मेरा वीर्य निकल जाएगा। "अरे! क्या हुआ काकी?" जैसे ही उन्होंने लंड मुँह से निकाला तो मैंने आँखें खोल कर हैरानी से पूछा─"फिर से चूसो न। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।" "हां मुझे पता है।" काकी ने मुस्कुराते हुए कहा─"लेकिन अगर मैंने थोड़ी देर और इसे चूसा तो तुम्हारा वीर्य निकल जाएगा। जबकि मैं चाहती हूं कि तुम्हारा वीर्य मेरी चूत में जाए।" उनके मुख से चूत शब्द सुनते ही मैं भौचक्का सा रह गया। उधर वो झट से उठीं और खाट पर आ कर सीधा लेट गईं। "अब बैठे मत रहो राजू।" फिर उन्होंने मुझसे कहा─"जल्दी से आओ और मुझे चोदना शुरू कर दो।" "पर मैं कैसे करूं काकी?" मैंने खड़े हो कर कहा─"मैंने तो कभी किया ही नहीं है।" "तुम ऊपर तो आओ मेरे राजा।" काकी ने प्यार से कहा─"मैं तुम्हें बताऊंगी कि कैसे करना है।" "ठीक है।" मैं जल्दी से खाट पर चढ़ गया। उधर काकी ने अपनी दोनों टांगों को फैला लिया था। मुझे अपनी टांगों के बीच घुटनों के बल आने को कहा तो मैंने वैसा ही किया। मेरा लंड बुरी तरह अकड़ा हुआ था और उसके छेद पर कुछ चिपचिपा सा झलक रहा था। "अब अपने लंड को पकड़ो।" उन्होंने अपने हाथों से अपनी चूत की फांकों को फैलाते हुए बताया─"और यहां जो छेद दिख रहा है इसमें अपना लंड डालो।" मैं थोड़ा और आगे खिसका और जैसा उन्होंने बताया था वैसा ही करने लगा। मैंने देखा काकी की बुर के चारों तरफ काले घने बाल थे। उनके द्वारा फांकों को फैलाए जाने से मुझे गुलाबी रंग का छेद दिखने लगा था। मैंने धाड़ धाड़ बजती अपनी धड़कनों के साथ लंड को उस छेद पर टिकाया। "हां ऐसे ही।" तभी काकी ने कहा─"अब आहिस्ता आहिस्ता अंदर घुसाओ।" मैंने ऐसा ही किया। काकी की बुर में जैसे ही सुपाड़ा घुसा तो मुझे अपने लंड पर अजीब सी गर्मी का एहसास हुआ। मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई और साथ ही मजे की भी अनुभूति हुई। "शश्श्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" तभी काकी की सिसकी निकल गई─"हाय राजू, तुम्हारा औजार तुम्हारे काका के औजार से बड़ा है इस लिए मुझे थोड़ा खिंचाव महसूस हो रहा है जो थोड़ा पीड़ा दे रहा है।" "क्या सच में काकी?" "हां, लेकिन तुम चिंता मत करो।" काकी ने कहा─"इस वक्त मुझे पीड़ा की परवाह नहीं है। मैं चाहती हूं कि तुम अपनी काकी को ऐसे चोदो कि मैं मस्त हो जाऊं। मुझे इतना चोदो कि मेरी प्यास बुझ जाए। मुझे ऐसा चोदो कि मैं तुम्हारे बेटे की मां बन जाऊं।" मेरे लंड का सुपाड़ा उनकी बुर में जा चुका था। अब मैं उसे और अंदर घुसेड़ने में लगा हुआ था। मैंने महसूस किया कि काकी की बुर अंदर से गीली है। "शश्श्श्श्श् राजू।" काकी मचलते हुए बोलीं─"थोड़ा जल्दी डालो न अपने औजार को।" कहने के साथ ही उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी चूचियां भींचने लगीं। दूसरी तरफ से अपनी टांगों को मेरी कमर में लपेट लिया। "अब एक ही बार में जोर का धक्का लगा कर अपना औजार मेरी बुर में डाल दो।" काकी ने मस्ती में कहा। मैंने ऐसा ही किया। अपने दोनों हाथों को मैंने उनके अगल बगल खाट पर टिकाया और जोर से कमर को आगे की तरफ धकेल दिया। अगले ही पल उनकी गीली बुर में मेरा लन्ड आधे से ज्यादा घुस गया। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् राजू।" काकी को हल्का दर्द हुआ मगर उन्होंने मुझे यही कहा कि एक बार और ऐसे ही जोर से धक्का लगाओ। मैंने महसूस किया कि उनकी बुर में मेरा लन्ड फंस सा गया है। उनके कहने पर मैंने फिर से धक्का मारा। इस बार मेरा पूरा लंड उनकी बुर में समा गया लेकिन इसके साथ ही मेरे मुख से भी दर्द भरी सिसकी निकल गई। "क्या हुआ राजू?" "थोड़ा दर्द हो रहा है।" "हां तुम पहली बार ऐसा कर रहे हो न इसी लिए।" काकी ने जैसे समझाया─"लेकिन फिक्र मत करो। ऐसा पहली बार में किसी किसी के साथ होता है। अब तुम धीरे धीरे धक्के लगाना शुरू करो।" काकी के कहने पर मैं धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। मुझे थोड़ा दर्द जरूर हुआ था लेकिन अब धक्के लगाने से मजा भी आने लगा था। जब मजा आने लगा तो मैं अनायास ही और जोर जोर से धक्के लगाने लगा। मेरे ऐसा करते ही काकी पलक झपकते ही मस्ती में डूबने लगीं। मेरा ये पहली बार था इस लिए बीच बीच में मेरा रिदम गड़बड़ा जाता था मगर मैं फिर भी लगा रहा। "हाय राजू, तुम्हारा औजार तो मेरी बच्चादानी में महसूस हो रहा है।" काकी सिसकी लेते हुए बोलीं─"और ये इतना मोटा है कि मुझे अपनी बुर में अजीब सा खिंचाव महसूस हो रहा है पर....पर मजा भी आ रहा है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् ऐसे ही जोर जोर से धक्के लगाओ मेरे राजा। आज अपनी काकी को जी भर के चोदो।" एक तो वैसे ही गर्मी थी दूसरे गर्मी वाला काम हो रहा था। हम दोनों ही पसीने में बुरी तरह नहा चुके थे। सांसें भारी हो चलीं थी। मगर मजा ऐसा था कि किसी चीज की परवाह नहीं थी। अचानक मेरी नजर उनकी उछलती चूचियों पर पड़ी तो मैंने एक हाथ बढ़ा कर उनकी एक चूची को पकड़ लिया और बुरी तरह भींचने लगा। मेरे ऐसा करते ही काकी और भी मचलने लगीं। उन्होंने एकदम से मेरे चेहरे को पकड़ा और अपनी तरफ झुकाया। जैसे ही मेरा चेहरा उनके चेहरे के करीब पहुंचा तो उन्होंने सिर उठा कर मुझे चूमना शुरू कर दिया। इस क्रिया में धक्के लगाने में मुझे कठिनाई होने लगी। एक हाथ पर जोर ही नहीं पड़ रहा था। "हाय राजू, मेरे प्यारे राजू।" मेरे चेहरे के हर एक हिस्से पर चूमते हुए काकी भाव विभोर सी हो कर बोलीं─"मन करता है अब तुम्हें अपने से दूर न जाने दूं। काश! तुम ही मेरे मरद होते। काश तुम ही रोजाना मुझे चोदते तो आज मैं बेटियों के साथ साथ एक बेटे की मां भी बन गई होती। उफ्फ, मेरे राजा अपनी काकी को चोदो न....रुक क्यों गए?" "वो..वो ऐसे में ठीक से बन नहीं रहा है।" "अच्छा ठीक है जैसे बने वैसे करो।" काकी ने मेरा चेहरा छोड़ दिया तो मैं फिर से पहले जैसी अवस्था में आ गया और झट से जोर जोर से धक्के लगाने लगा। मेरे हर धक्के पर काकी की चूचियां उछल पड़तीं थी। आज से पहले मैंने कभी ऐसा काम नहीं किया था लेकिन आज इस काम के साथ जैसे मेरे जीवन की एक नई शुरुआत हो गई थी। काकी को चोदने में मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैं अब और भी तेज तेज धक्के लगाने लगा था। हर धक्के के साथ मेरे अंदर मजे की लहर दौड़ती और ऐसा महसूस होता जैसे कोई चीज बड़ी तेजी से मेरे लंड की तरफ खिंचती चली आ रही है। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् राजू...मेरे राजा।" काकी मस्ती में सिसकियां भरते हुए बोलीं─"हाय कितना मजा आ रहा है। तुम तो अपने काका से भी बढ़िया चोदते हो। इतनी देर में तो तुम्हारे काका दो तीन भर ढेर हो गए होते पर तुम एक बार भी नहीं हुए। मतलब...तुम सच में असली मर्द हो। चोदो राजू....हाय अपनी काकी को जोर जोर से चोदो। आज मेरी चूत को फाड़ डालो। इस निगोड़ी की सारी प्यास मिटा दो मेरे राजा।" काकी मस्ती में जाने क्या क्या बोले जा रहीं थी। इधर मैं उनकी बातें सुनते हुए धक्के लगाए जा रहा था। मेरी सासें अब उखड़ने लगीं थी। उधर काकी मस्ती में कभी अपनी टांगों का दबाव दे कर मुझे कस लेती तो कभी मेरी पीठ को सहलाने लगतीं। अचानक काकी का बर्ताव अजीब सा हो गया। वो नीचे से अपनी कमर उठा कर अजीब तरह से सिर इधर उधर करने लगीं। "हाय राजू...और जोर जोर से धक्के लगाओ।" काकी मस्ती में चीख सी पड़ी─"फाड़ दो मेरी बुर को। उफ्फ कितना मजा आ रहा है रे।" थोड़ी ही देर में काकी ऐंठने लगीं। उन्होंने मुझे इतनी ताकत से जकड़ लिया कि मैं चाह कर भी अपनी कमर न हिला सका। उनका जिस्म कांप रहा था, झटके खा रहा था। कुछ ही पलों में वो एकदम शांत और ढीली पड़ गईं। जैसे ही उनकी जकड़ से मैं आजाद हुआ तो मैंने फिर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। काकी खाट पर शांत पड़ीं थी और मुझे बड़े प्यार से देखे जा रहीं थी। मेरे हर धक्के पर वो ऊपर की तरफ उछल जातीं मगर वो मुझे रोक नहीं रहीं थी। थोड़ी ही देर में वो फिर से मस्ती में आ गईं और फिर से मेरा साथ देने लगीं। इधर अब मैं मजे के चरम पर था। मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैं हवाओं में उड़ता महसूस कर रहा था। "शश्श्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् काकी लगता है मेरा पेशाब आने वाला है।" मैं मजे की इंतिहा में बोल पड़ा। "वो पेशाब नहीं है मेरे राजा।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"वो तो तुम झड़ने वाले हो। तुम्हारा वीर्य निकलने वाला है। तुम अपना सारा वीर्य मेरी चूत में ही डालना।" अगले कुछ ही पलों में मैं बुरी तरह झटके खाते हुए झड़ने लगा। मेरा सारा वीर्य काकी की बुर में समाता जा रहा था। एक के बाद एक जाने कितनी पिचकारियां मेरे लंड से निकलीं। काकी ने मुझे एक बार फिर से जकड़ लिया था। शायद वो नहीं चाहती थीं कि मेरे वीर्य की एक बूंद भी बाहर गिरे। मजे के अनंत आसमान में पहुंचने के बाद मैं वापस धरातल पर आ गया था। मंजू काकी के ऊपर ही ढेर हो कर मैं गहरी गहरी सासें ले रहा था। उधर काकी बड़े ही प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेर रहीं थी। उनके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी और संतुष्टि दिख रही थी। जारी है.......... It's Rajan ![]()
04-08-2026, 08:45 PM
(09-06-2026, 03:39 PM)rajeev13 Wrote: Don't worry... We will wait Next two update posted brother...need your valuable feedback And sorry....job ki vajah se update likhne ka time nahi mil pata It's Rajan ![]()
07-08-2026, 07:14 AM
Superb story man ,please give a same big update as early as possible
09-08-2026, 07:09 AM
(07-08-2026, 07:14 AM)KkkNad Wrote: Superb story man ,please give a same big update as early as possible Thank you brother Next update will come today It's Rajan ![]()
09-08-2026, 07:30 AM
भाग ~ २३
मंजू काकी को चोदने के बाद मैं कुछ देर में अपने घर आ गया था। मैं घर के बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाट पर लेट गया था। अपने चेहरे की खुशी को मैं चाह कर भी छुपा नहीं पा रहा था। पता नहीं क्यों मैं इस खुशी में बार बार मुस्कुरा उठता था। बार बार वही सब याद आ जाता और मैं फिर मुस्कुरा उठता। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवन में जब मैं किसी के साथ चुदाई करूंगा तो वो पहली इंसान मेरे ही परिवार की मेरी सगी काकी होगी। इसके पहले तो मैं अपने दोस्त बबलू के साथ ऐसे कामों के बस किस्से ही सुनता आया था। किस्सा सुनते वक्त जरूर मन करता था कि काश मैं भी ऐसा करूं लेकिन फिर बाद में ये सारे खयाल मन से निकल जाते थे। मगर पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ था उससे मेरे जीवन की जैसे दिशा की बदल गई थी। जिस अनैतिक सम्बन्ध को मैं अपने परिवार की किसी महिला अथवा लड़की के साथ अंजाम देने का सोच तक नहीं सकता था वो अनैतिक सम्बन्ध आज पूरे होशो हवास में मैं बना चुका था। हालांकि ऐसा करने वाला मैं पहला शख्स नहीं था बल्कि मुझसे पहले खुद मेरे बापू ने ही ऐसा किया था। ज़ाहिर है बाप का खून वैसी ही सोच वाला तो होगा ही। खैर जो भी हो पर मैं आज बहुत खुश था। मंजू काकी ने मुझे समझाया था कि इस बारे में मैं भूल कर भी किसी से कुछ न बताऊं वरना अंजाम ठीक नहीं होगा हमारे लिए। मैं खुद भी ये बात अच्छे से समझता था इस लिए किसी से इस बात का जिक्र करने का सवाल ही नहीं था। इसके अलावा काकी ने जो खास बात कही थी वो ये थी कि हम कभी भी ऐसा काम दुबारा कर सकते हैं। खैर ऐसे ही सोचो के साथ दिन गुजरा और वापस खेत पर जाने का समय हो गया। मां और बापू खेत के लिए निकल गए। जाते जाते मां ने कहा था कि थोड़ी देर में मैं भी अनीता को ले कर आ जाऊं। अनीता की बात चली तो मुझे खयाल आया कि उसके साथ भी तो हमारी एक कहानी बनने जा रही थी मगर ऐन वक्त पर सब कुछ जैसे खत्म सा हो गया था। हालांकि बाद में मैंने स्थिति को सम्हाल लेने की पूरी कोशिश की थी और लगा भी था कि शायद हालात पहले जैसे हो जाएंगे मगर अब ये अनीता पर ही निर्भर था कि वो इस संबंध में क्या चाहती है? सच कहूं तो जब मैं अनीता के साथ होता था तो मुझे एक अलग ही तरह का एहसास होता था। मेरा यही मन करता था कि उसके लिए वो सब कुछ कर जाऊं जो शायद मेरे बस में भी न हो। मेरे और उसके बीच का जो रिश्ता था उसमें हवस या वासना नहीं थी बल्कि एक प्रेम वाला भाव था। हां, कभी कभी मेरी नजरें उसकी चूचियों पर चली जाती थीं और मैं अपने भोलेपन या नादानी में उससे उल्टा सीधा बोल भी देता था मगर इस सबके बावजूद मेरे अंदर उसके प्रति कोई गलत भावना नहीं होती थी। मैंने सोच लिया कि मैं अनीता को फिर से समझाने की कोशिश करूंगा। यानी मेरी कोशिश रहेगी कि हमारे बीच फिर से पहले जैसा माहौल बन जाए। थोड़ी देर बाद मैं उठा और घर के अंदर चला गया। अंदर आया तो देखा अनीता नर्दे के पास बर्तन मांज रही थी। उसने हरे रंग का कुर्ता पहन रखा था। दुपट्टा उसने नहीं ले रखा था इस लिए कुर्ते के खुले गले से उसकी चूचियों के उभार दिख जाते थे। "अभी कितनी देर लगेगी तुझे?" मैंने उसके सामने ही कुछ कदम की दूरी पर बैठ कर पूछा─"मां ने हमें खेत आने को कहा है।" अनीता ने एक नजर मुझे देखा और फिर बर्तन धोने लगी। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया था। इससे मुझे अच्छा तो नहीं लगा लेकिन मैं गुस्सा भी नहीं हुआ। असल में मैं नहीं चाहता था कि हमारे बीच मामला बिगड़ जाए और हम दोनों वापस पहले की तरह लड़ना झगड़ना शुरू कर दें। "अच्छा सुन, मैं लाला की दुकान पर जा रहा हूं।" मैं कुछ सोचते हुए बोला─"तुझे कुछ खाना हो तो बता दे।" अनीता ने एक बार फिर नजर उठा कर मुझे देखा मगर इस बार भी वो कुछ न बोली। उसके इस बर्ताव पर मैं अंदर ही अंदर परेशान और बेचैन हो उठा। "लगता है मेरी सबसे सुंदर बहन अभी भी नाराज है।" मैंने मायूस हो कर कहा─"हे भगवान अब तू ही बता मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरी बहन अपने भाई से बात करना शुरू कर दे?" अनीता ने ये सुना तो उसने इस बार थोड़ा घूर कर देखा मुझे। मैं ये सोच कर खुश हुआ कि इस बार वो गुस्से में ही सही लेकिन कुछ न कुछ जरूर कहेगी लेकिन उसने कुछ न कहा। बल्कि वापस बर्तन धोने में लग गई। मेरा तो भेजा ही घूम गया। समझ में ही न आया कि अब क्या करूं? "देख अगर तू मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं फिर से बबलू के साथ घूमना फिरना शुरू कर दूंगा।" मैंने इस बार नाराज होने का नाटक किया─"सिर्फ तेरे कहने पर मैंने उससे दोस्ती खत्म की है मगर अब जब तू ही ऐसा करेगी तो मैं क्या करूंगा?" "खबरदार अगर तूने उस कमीने के साथ घूमने का सोचा।" अनीता इस बार आँखें तरेर कर बोल पड़ी। "हां तो तू भी ऐसे मुंह न मोड़ मुझसे।" मैंने थोड़ा उसके पास सरक कर कहा─"तू मुझसे बात नहीं करेगी तो मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा।" "क्यों अच्छा नहीं लगेगा तुझे?" अनीता ने शंकित भाव से मुझे देखा। "बस नहीं लगेगा तो नहीं लगेगा।" मैंने हाथ झटक कर कहा। "ऐसा तो तभी होता है जब किसी की प्रेमिका अपने प्रेमी से बात नहीं करती।" अनीता ने घूरते हुए कहा─"इसका मतलब तू मुझे अपनी प्रेमिका ही मान रहा है, है ना?" "यार क्यों फालतू की बात सोचती है?" मैं झल्ला कर बोला। "क्यों न सोचूं?" अनीता ने कहा─"तेरी बातों से यही तो महसूस हो रहा है मुझे।" "तुझे सिर्फ प्रेमी प्रेमिका ही महसूस हो रहा है?" मैं हताश हो कर बोला─"तुझे भाई बहन का प्यार महसूस नहीं हो रहा?" "अगर ऐसा होता तो मुझे जरूर महसूस होता।" अनीता ने कहा─"मगर तेरी बातें मुझे कुछ और ही महसूस करवाती हैं।" "अगर मैं तुझे प्रेमिका समझता तो तुझसे वैसा ही बर्ताव करता।" मैंने कहा─"तुझसे वो भी करने को कहता जो प्रेमी प्रेमिका करते हैं लेकिन क्या मैंने ऐसा कुछ करने को कहा तुझसे?" इस बार अनीता कुछ न बोली। वो एकटक मुझे देखती रही। चेहरे पर असमंजस के साथ साथ कशमकश के भी भाव थे। "देख, तू बेकार में ये सब सोच रही है।" मैंने कहा─"जरा सोच कि पिछले कुछ दिनों से हमारे बीच कितना लगाव हो गया था। हम दोनों कितना खुश थे। हम दोनों को इस तरह साथ देख मां भी कितना खुश हो गई थी।" अनीता को जैसे जवाब न सूझा। वो इधर उधर देखने लगी। बर्तन धोना तो जैसे वो भूल ही गई थी। "अच्छा सुन हम दोनों एक काम करते हैं।" मैंने कहा─"हम अभी जब खेत चलेंगे तो वहां श्यामू काका से इस बारे में पूछेंगे।" "ये क्या कह रहा है तू?" "अरे मेरा मतलब है कि मैं उनसे पूछूंगा कि क्या भाई बहन का प्यार प्रेमी प्रेमिका के प्यार जैसा होता है?" मैंने कहा─"मेरे पूछने पर काका खुद ही बताएंगे कि ऐसा होता है कि नहीं?" "न...नहीं नहीं तू उनसे कुछ नहीं पूछेगा।" अनीता ने हड़बड़ा कर कहा। "क्यों?" "तू न सच में पागल है।" अनीता ने आँखें दिखाते हुए कहा─"जब तू उनसे पूछेगा तो क्या सोचेंगे वो? " "अब भला वो क्या सोचेंगे?" मैंने कहा─"वो तो यही सोचेंगे न कि मैं बस उनसे पूछ रहा हूं।" "एकदम बुद्धू है तू।" अनीता ने अपने माथे पर हल्के से मार कर कहा─"अरे! वो तेरे पूछने पर ये सोच सकते हैं कि कहीं तेरे और मेरे बीच में ऐसा ही कुछ तो नहीं है जिससे तू उनसे ये पूछ रहा है?" "अरे हां यार।" मैं एकदम से हैरान हो कर बोल पड़ा─"ये तो मैंने सोचा ही नहीं।" "इसी लिए कहा बुद्धू है तू।" अनीता ने घूरते हुए कहा─"तुझे उनसे इस बारे में कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है।" "तो फिर किससे पूछूँ?" "आख़िर तुझे किसी से पूछना ही क्यों है?" "वो इस लिए कि तुझे भरोसा हो जाए कि मैं तुझे प्रेमिका नहीं बल्कि अपनी बहन मान कर ही प्यार करता हूँ।" अनीता खामोशी से देखने लगी मुझे। "तू जा यहां से और मुझे बर्तन धोने दे।" "पहले बता कि क्या अब भी मुझसे नाराज है?" "मैं नाराज नहीं हूं।" "तो फिर बात क्यों नहीं कर रही?" "बस ऐसे ही। अब तू जा।" "ठीक है जा रहा हूं।" मैंने उठते हुए कहा─"पर ये तो बता कि लाला की दुकान से तेरे लिए क्या ले कर आऊं?" "मुझे कुछ नहीं चाहिए।" "ठीक है, फिर मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीद लूंगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा। "क्या बोला तूने?" अनीता ने चौंक कर मुझे देखा─"तू...तू मतलब तू...सच में...।" "अरे गलत समझ रही है तू।" मैंने उसकी बात बीच में ही काट कर कहा─"मैं तुझे अपनी प्रेमिका थोड़ी कह रहा हूं। वो तो मैं किसी और को बोल रहा हूं।" "कि..किसी और को??" अनीता के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया─"तेरी कोई प्रेमिका भी है?" "और नहीं तो क्या?" मैंने एकाएक गर्व से सीना फुला लिया। "क..कौन है वो?" अनीता ने आँखें फैला कर पूछा─"जल्दी बता कौन है तेरी प्रेमिका?" "नहीं बताऊंगा।" मैंने दो टूक भाव से कहा। "राजू बता दे नहीं तो मां को बता दूंगी।" "बोला न, नहीं बताऊंगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"वैसे तू क्यों जानना चाहती है?" अनीता को जवाब न सूझा। वो बगले झांकने लगी मगर जल्दी ही खुद को सम्हाला उसने। "देख राजू ये तू गलत कर रहा है।" फिर उसने कहा─"मां बापू को पता चला तो सोच ले क्या होगा?" "चिंता मत कर तू।" मैंने कहा─"मैं उन्हें पता ही नहीं लगने दूंगा। अच्छा अब तू बर्तन धो, मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीदने जा रहा हूं।" इससे पहले कि अनीता कुछ बोलती मैं तेजी से बाहर की तरफ निकल गया। मैंने पलट कर ये भी नहीं देखा कि मेरे इस बर्ताव से अनीता पर क्या प्रभाव पड़ा है। *********** मंजू काकी ने मुझे दो रुपए दिए थे। उसी पैसे से मैंने लाला की दुकान से नमकीन गुड़ खरीदा और फिर वापस घर की तरफ चल पड़ा। एक तरफ जहां मैं काकी के बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पा रहा था वहीं अब मैं अनीता को भी भुला नहीं पा रहा था। अनीता से मैंने कह तो दिया था कि अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीदने जा रहा हूं जबकि असल में मेरी कोई प्रेमिका थी ही नहीं। मैं तो बस उसे चिढ़ा रहा था और देखना चाहता था कि मेरी ऐसी बात से उस पर क्या असर पड़ता है? मंद मंद मुस्कुराता हुआ मैं थोड़ी ही देर में घर पहुंच गया। गुड़ और नमकीन को मैंने अपनी साफी में बांध लिया था और उसे इस तरह छुपा लिया था कि वो आसानी से किसी को दिखे न। घर पहुंचा तो देखा अनीता बरामदे में बैठी थी और कुछ सोच रही थी। बर्तन धोने के बाद अब वो खेत चलने के लिए तैयार थी। जैसे ही उसे मेरे आने का आभास हुआ तो उसने सिर उठा कर मुझे देखा। "तो खरीद लाया अपनी प्रेमिका के लिए सामान?" फिर उसने अजीब भाव से पूछा। "हां खरीद लाया।" मैं बरबस ही मुस्कुरा उठा─"अच्छा अब अगर तू तैयार हो गई है तो चल हमें खेत जाना है।" "मैं तो तैयार ही बैठी हूं।" अनीता ने कहा─"पर तू अपनी प्रेमिका के लिए जो खरीदने गया था उसे देने नहीं गया क्या?" "हां वो जाना है मुझे।" मैंने मन ही मन मुस्कुरा कर कहा─"सोच रहा हूं कि तुझे खेत छोड़ दूंगा और फिर सबकी नजर बचा के चुपके से अपनी प्रेमिका के पास निकल जाऊंगा।" "अच्छा।" अनीता की आँखें फैलीं─"तू खेत चल। मैं वहां सबको बताऊंगी कि तू क्या गुल खिला रहा है आजकल।" "देख तू मेरी बहन है तो तुझे इसमें मेरा ही साथ देना चाहिए।" मैंने कहा─"ये नहीं कि सबसे अपने भाई को पिटवाए।" "मैं जरूर साथ देती लेकिन तू काम ही ऐसा कर रहा है कि तुझे पिटवाना ही पड़ेगा।" "हाय कितनी जालिम बहन दी है भगवान ने मुझे।" मैंने ऊपर आसमान की तरफ देखा और फिर उससे बोला─"कोई बात नहीं, अपनी प्रेमिका के लिए तेरा ये जुल्म भी सह लूंगा। वैसे भी मैंने सुना है कि जो प्रेमी प्रेमिका होते हैं उनकी डगर कभी भी आसान नहीं होती। मतलब पग पग पर उन्हें ये दुनिया वाले दुख दर्द ही देते हैं।" "ओहो तुझे ये सब भी मालूम है??" "प्रेम की डगर में चलने वालों को धीरे धीरे सब पता चल ही जाता है।" "राजू सच सच बता, क्या सच में तेरी कोई प्रेमिका है?" अनीता ने इस बार थोड़ा गंभीर हो कर पूछा। "अब तुझसे झूठ क्यों बोलूंगा भला?" अनीता एकटक देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव गर्दिश करते दिखे। इधर मैं उसकी हालत को समझने की कोशिश कर रहा था। "अब चल न, देर क्यों कर रही है?" मैंने बात को बदलते हुए कहा─"तुझे खेत छोड़ने के बाद मुझे अपनी प्रेमिका से मिलने भी जाना है।" अनीता ने मुझे बड़ी गहरी नजरों से देखा। उसकी काली कजरारी आंखों में अजीब सा खिंचाव महसूस किया मैंने। वो मेरे एकदम पास ही खड़ी थी। वो बस थोड़ी सी ही सांवली थी लेकिन उसके नैन नक्श बड़े ही आकर्षक थे। तभी तो मैं उसकी तरफ खिंच रहा था। उसमें एक अलग ही आकर्षण था। उसे अपलक देखते हुए मैं यही सोच रहा था कि सचमुच मेरी बहन बहुत सुंदर है और मासूम भी। अचानक मैं थोड़ा चौंक पड़ा क्योंकि तभी उसकी कजरारी आंखों में मुझे हल्के आंसू तैरते नजर आए। "अब तुझे क्या हुआ?" मैं अंदर ही अंदर हिल गया। मेरे पूछने पर उसने एकदम से मेरा हाथ पकड़ा और उसे उठा कर अपने सिर पर रख लिया, फिर बोली─"मेरे सिर की कसम खा कर बोल कि सच में तेरी कोई प्रेमिका है।" "पागल है क्या?" मैंने हड़बड़ा कर झट से अपना हाथ खींच लिया─"मैं क्यों फालतू में कसम खाऊं? और वैसे भी तुझे इस बात से मतलब ही क्या है?" "नहीं, तुझे मेरी कसम खा कर बताना ही होगा।" "तूने आज भांग वांग खा लिया है क्या?" मैं उससे दो कदम पीछे हो कर बोला─"ये कैसी फालतू की बात कर रही है? अब देर मत कर। खेत चल जल्दी।" "देख राजू तंग न कर मुझे।" अनीता रुआंसे स्वर में बोली─"मुझे सच सच बता दे तेरी कोई प्रेमिका है कि नहीं?" "बताया तो है तुझे।" मैंने कहा─"बार बार क्यों पूछ रही है?" "मैं तब तक पूछूंगी जब तक तू मेरी कसम खा कर नहीं बताएगा।" "मुझे नहीं खाना तेरी कसम।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा─"तुझे मानना है तो मान या न मान। अब खेत चल....और अगर नहीं चलना तो मैं अकेले ही जा रहा हूं।" कहने के साथ ही मैं बाहर की तरफ चल पड़ा। मैं जानता था कि मेरी बातों ने अनीता को दुख पहुंचा दिया है लेकिन उसे वापस पटरी पर लाने का मेरे पास अब यही एक रास्ता था। मेरे बाहर आते ही वो भी भागते हुए आ गई। नीम के पेड़ के पास खड़े हो कर मैंने देखा उसने घर का दरवाजा बंद किया, फिर उसमें ताला लगाने लगी। कुछ ही पलों में ताला लगा कर वो मेरी तरफ आने लगी। सच कहूं तो मुझे वो बहुत ही प्यारी लग रही थी। अपने सीने के उभारों को छुपाने के लिए उसने दुपट्टे को अच्छे से फैला रखा था। जब वो मेरे एकदम पास आ गई तो मैंने देखा उसके चेहरे पर दुख के भाव थे। मैं जब चल पड़ा तो वो भी मेरे पीछे चल पड़ी। मेरे अंदर हलचल मची हुई थी। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मन कर रहा था कि उससे बात करूं लेकिन खुद को रोके हुए था। पूरे रास्ते हमारे बीच बात नहीं हुई। ऐसे ही हम दोनों खेत पहुंच गए। जब हम खेत पहुंच गए तो वो मुझे बार बार देखने लगी। शायद वो ये देखना चाहती थी कि मैं अपनी प्रेमिका से मिलने जा रहा हूं या नहीं? और जब मैं खेत से कहीं न गया तो उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए। वो पूछना चाहती थी कि मैं क्यों नहीं जा रहा मगर सबके सामने नहीं पूछा। एक बात और उसने ये बात किसी को बताई भी नहीं, जोकि मैं पहले से ही जानता था। खैर खलिहान में गहाई का काम शुरू हो चुका था। हम दोनों अपने अपने पाले में बैलों के पीछे पीछे चलने लगे थे। बीच बीच में हम दोनों की नज़रें आपस में मिलतीं लेकिन न वो कुछ कहती ना ही मैं। कुछ समय बाद छोटे काका के कहने पर हम दोनों को आराम करने का मौका मिला। हमारी जगह पर सुनीता और रानी ने पाला सम्हाल लिया था। मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा फिर आम के बाग की तरफ अकेले ही चल पड़ा। मैंने अनीता से साथ चलने को नहीं कहा था। जारी है........... It's Rajan ![]()
16-08-2026, 11:33 AM
Beautiful story waiting for next
21-08-2026, 02:11 AM
Update
26-08-2026, 07:39 PM
It's Rajan ![]()
26-08-2026, 07:42 PM
भाग ~ २४
मैं बगीचे में पहुंचा ही था कि महसूस हुआ मुझे टट्टी लग आई है। वैसे तो सुबह मैं दिशा मैदान करने गया था मगर पता नहीं कैसे मुझे इस वक्त दिशा मैदान जाने को मजबूर हो जाना पड़ रहा था। बगीचे के पीछे तरफ एक छोटी सी नदी थी जिसमें बड़ी नदी का पानी तब आता था जब लोगों को अपने खेतों की सिंचाई करनी होती थी। मैंने सोचा इससे पहले कि अनीता आ जाए मैं दिशा मैदान कर लेता हूं। जल्दी ही मैं बगीचे के पीछे वाले हिस्से की तरफ पहुंच गया। बगीचे से नदी तरफ जाने के लिए थोड़ा ढलान था इस लिए जैसे ही मैं ढलान में उतरने लगा तो सहसा मुझे अजीब सी आवाज सुनाई दी। पहले तो मुझे लगा पेड़ों पर बैठा कोई पक्षी होगा लेकिन जब फिर से आवाज आई तो मेरे कान खड़े हो गए। कुछ ही पलों में मैं उस आवाज से पहचान गया कि वो आवाज किसी पक्षी की नहीं बल्कि इंसान की है। आवाज ऐसी थी कि सुन कर और समझ कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं फौरन ही दबे पांव आवाज की दिशा में बढ़ चला। ढलान के बाएं तरफ झाड़ियों के अलावा बेशरम के बड़े बड़े पेड़ थे। थोड़ा आगे गया तो मुझे झाड़ियों के आगे एक इंसान की झलक दिखी। वो अजीब तरह से हिल रहा था। तभी फिर से आवाज आई। आवाज किसी औरत की थी और जिस तरह से वो आवाज निकाल रही थी वैसी आवाज तभी निकलती है जब कोई मर्द उसे चोद रहा हो। मेरी धड़कनें एकाएक ही तेज हो गईं। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि इस वक्त इतनी गर्मी में इस जगह कोई ऐसा काम कर रहा होगा। ये तो मैं समझ चुका था कि यहां पर कोई चुदाई के काम में लगा हुआ है लेकिन मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता बढ़ गई कि आखिर वो कौन हो सकता है? मैं दबे पांव आगे बढ़ा तो जल्दी ही मुझे वो आदमी साफ दिखा। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। उसने ऊपर एक सफेद कमीज पहन रखी थी जो उसके पसीने से भीगी हुई थी, जबकि नीचे उसकी लुंगी थी जो ऊपर कमर में लिपटी हुई थी। उसका काले रंग का पिछवाड़ा एकदम नंगा था और पूरी टांगें भी। किसी औरत के ऊपर सवार हो कर वो अपनी कमर हिलाए जा रहा था। उसके नीचे लेटी औरत की दोनों टांगें फैली हुईं थी और वो रह रह कर कभी सिसकियां लेती तो कभी आहें भरती। उन दोनों को खड़ी दोपहर में चुदाई करते देख मेरा दिल अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगा था। ये तीसरी बार था जब मैं किसी आदमी को चुदाई करते देख रहा था। पहले आदमी खुद मेरे बापू थे, दूसरे मझले काका और तीसरा ये। मैं अब ये जानने के लिए और भी ज्यादा उत्सुक हो उठा कि ये दोनों आखिर हैं कौन? मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी लेकिन फिर मैंने सोचा कि इस वक्त घबराने की जरूरत मुझे नहीं बल्कि इन दोनों को है। आखिर गलत काम तो यही कर रहे हैं। ये सोचते ही मैं आगे बढ़ा और एकदम से उन दोनों के सामने ही जा कर खड़ा हो गया। "ये क्या कर रहे हो तुम दोनों?" मैंने बेधड़क थोड़ा ऊंचे स्वर में पूछा। किसी को एकदम से आ गया देख और साथ ही ये बात सुनते ही वो दोनों बुरी तरह उछल पड़े। ऐसा लगा जैसे अचानक ही दोनों के ऊपर आसमानी बिजली आ गिर पड़ी हो। आदमी को देखते ही मैं पहचान गया और उस औरत को भी। वो दोनों हमारे ही गांव के लेकिन निचली जाति के मजदूर थे। आदमी चालीस के आसपास की उम्र का था जबकि औरत सत्ताइस अट्ठाईस के आसपास की थी। गांव के रिश्ते में वो आदमी मेरा काका लगता था जबकि औरत भौजी लगती थी। "बिरजू काका तुम ये क्या कर रहे हो भौजी के साथ?" दोनों डरे सहमे और भौचक्के से जब देखते ही रहे तो मैंने फिर पूछा। इस बार जैसे वो दोनों ही नींद से जागे। हड़बड़ा कर दोनों उठे और अपने नंगेपन को छुपाने लगे। इस चक्कर में मेरी नजर काका के काले मगर मुरझाए लंड पर पड़ी और उधर भौजी की काली नंगी बुर के साथ साथ खुले हुए ब्लाउज से उसकी सांवली चूचियों पर पड़ चुकी थी। "र..राजू..बे..बेटा तुम यहां कैसे?" बिरजू काका अपनी लुंगी को फटाफट नीचे कर झट से उठते हुए बोला। "मैं तो इधर दिशा मैदान के लिए आया था पर नहीं पता था कि तुम लोग यहां गंदा काम कर रहे होगे।" मैंने डरी सहमी और घबराई हुई उस भौजी को देखते हुए कहा जो जल्दी जल्दी ब्लाउज के बटन बंद करने में लगी हुई थी। "म..माफ़ कर दो राजू।" बिरजू घबराया सा बोल पड़ा─"भगवान के लिए किसी को इस बारे में मत बताना नहीं तो बदनामी हो जाएगी।" "वो तो होगी ही।" बिरजू को इस तरह डरा हुआ देख मेरा हौसला बढ़ गया था─"तुम अपने ही भतीजे की मेहरारू के साथ ये जो गंदा काम कर रहे थे न उसके बारे में मैं राकेश को जा कर बताऊंगा।" "नहीं नहीं राजू।" बिरजू बुरी तरह घबरा कर मेरे पैरों में ही गिर गया─"भगवान के लिए किसी को मत बताना।" मैंने देखा बिरजू काका की हालत खराब हो गई थी। उधर भौजी की हालत तो उससे भी ज्यादा बिगड़ गई थी। जब उसने ये सुना था कि मैं ये बात उसके मरद से बता दूंगा तो वो रोने ही लग गई। "तुम्हें शरम नहीं आई काका ऐसा करते हुए?" मैंने उसे और डराया─"ये तो तुम्हारी बहू है न फिर कैसे तुम इनके साथ इतना गंदा काम कर सकते हो?" कहते हुए मैं औरत की तरफ पलटा और उससे बोला─"और तुम भौजी, तुमको भी शर्म नहीं आई..छी। अपने ही चाचा ससुर के साथ यहां पर चु..चुदाई कर रही थी?" मेरे मुख से चुदाई शब्द सुनते ही भौजी का शर्म से बुरा हाल हो गया। उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे। "ग..गलती हो गई राजू।" फिर वो रोते गिड़गिड़ाते बोली─"भगवान के लिए माफ कर दो। अब से ऐसा कभी नहीं करूंगी। तुम कृपया उनसे(उसका मरद) मत बताना वरना वो मुझे घर से निकाल देंगे।" अभी मैं उसे कुछ बोलने ही वाला था कि तभी मेरी नजर थोड़ी दूर खड़ी अनीता पर पड़ गई। पता नहीं वो कब यहां आ गई थी? उसे देखते ही मैं झटका सा खा गया। मन में एक ही खयाल उभरा कि क्या उसने भी ये सब देख लिया होगा और बातें सुन ली होंगी? हालांकि वो थोड़ी दूर थी मगर आवाज तो सुनाई ही दे सकती थी उसे। मेरे अंदर फौरन विचार उभरा कि इस वक्त उसका यहां पर रहना ठीक नहीं होगा। मैं सोचने लगा कि क्या करूं? "राजू बेटा...माफ कर दो।" तभी बिरजू काका बोल पड़ा─"सब मेरी ही गलती थी। मैंने ही इसे बहकाया था। तुम कृपया किसी को मत बताना। मैं अपने बच्चों की कसम खा के कहता हूं कि अब से ऐसा कभी नहीं करूंगा।" "अच्छा ठीक है।" मैं अब उन दोनों को यहां से जल्दी टरकाने का सोचा─"तुम दोनों फटाफट निकल जाओ यहां से।" उसके बाद मैं तेजी से अनीता की तरफ चल पड़ा। जब मैं उसके पास पहुंचा तो वो मुझे अजीब तरह से देखने लगी। "तू यहां क्या कर रही है?" मैंने थोड़ा कठोरता से कहा─"चल यहां से।" अनीता कुछ पलों तक मुझे देखती रही फिर चुपचाप वापस बगीचे की तरफ चल पड़ी। मैंने एक बार पलट कर पीछे देखा तो वो दोनों जाते दिखे। "तूने बताया नहीं वहां क्यों गई थी?" बगीचे के अंदर आते ही मैंने अनीता से पूछा। "और तू क्यों गया था वहां?" उसने पलट कर उल्टा सवाल किया। "मैं दिशा मैदान के लिए गया था।" "अच्छा तो तू वहां उन लोगों के पास खड़ा हो कर दिशा मैदान कर रहा था?" अनीता ने घूरते हुए कहा। "बकवास न कर।" मैंने उसे आँखें दिखाई─"और चुपचाप जा यहां से।" "नहीं जाऊंगी।" अनीता अड़ गई─"पहले सच सच बता किस लिए गया था वहां?" उसके इस तरह सवाल करने पर मुझे गुस्सा तो आया लेकिन मैं नहीं चाहता था कि उससे मेरा मन मुटाव हो जाए। इस लिए मैंने आँखें बंद कर के दो तीन गहरी गहरी साँसें ली। "यार भरोसा कर मैं सच में वहां दिशा मैदान के लिए ही गया था।" फिर मैंने थोड़ा शांत हो कर कहा─"लेकिन वहां जाते ही मुझे अजीब सी आवाजें सुनाई देने लगीं थी। मैं ये जानने के लिए उत्सुक हो गया था कि आखिर यहां पर इस तरह की आवाजें कहां से और क्यों आ रही हैं? अब मुझे क्या पता था कि वहां पर वो लोग होंगे।" अनीता अपलक देख रही थी मुझे। इधर एकाएक ही मुझे थोड़ा शर्म महसूस होने लगी। "तू न बहुत बिगड़ गया है आजकल।" तभी वो बोली। "म..मैं?? "हां तू।" "पर मैं कहां बिगड़ गया हूं?" अनीता ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला मगर जल्दी ही उसने अपने होंठ भींच लिए। उसके चेहरे पर बेबसी और कशमकश साफ दिखाई दी। जब वो कुछ न बोली तो मैने कहा─"मैं दिशा मैदान जा रहा हूं। बहुत जोर की लग आई है। काका लोग अगर आएं तो बता देना कि मैं कहां गया हूं।" अनीता सख्ती से मुझे घूरती रही जबकि मैं पलट कर फिर से नदी की तरफ चल दिया। बल्कि चल क्या दिया इस बार दौड़ ही पड़ा क्योंकि सच में बहुत तेज लग आई थी। ********** जब मैं वापस आया तो अनीता को एक पेड़ के नीचे बैठे पाया। गर्मी के चलते उसने अपना दुपट्टा निकाल कर एक तरफ रख दिया था। उसके दोनों घुटने ऊपर की तरफ मुड़े थे। उसके दोनों हाथ घुटनों को समेटे हुए थे और अपना चेहरा उसने घुटनों के ऊपर ही ठुड्ढी के बल पर टिका रखा था। उसकी नजरें शून्य में टिकी हुईं थी। चेहरे पर गहन सोचो के भाव गर्दिश कर रहे थे। उसको बगीचे में इस तरह अकेले बैठा देख मेरे अंदर हलचल सी मच गई। मुझे अच्छी तरह एहसास था कि वो सिर्फ मेरी वजह से ही यहां पर बैठी हुई थी। भले ही वो मौजूदा वक्त में मुझसे ठीक से बात नहीं करती थी लेकिन उसका ये रवैया साफ जाहिर करता था कि कहीं न कहीं उसके अंदर मेरे प्रति लगाव जरूर है। "अरे! तू यहीं बैठी है?" मैंने उसके करीब पहुंच कर कहा─"खलिहान तरफ क्यों नहीं गई?" "मेरी मर्जी मैं कहीं भी बैठूँ।" उसने चेहरा उठा कर तुनकते हुए कहा─"तुझे इससे क्या। तू अपना काम कर।" "ओहो इतना गुस्सा? क्यों भला?" मैं मुस्कुरा उठा। "मुझसे बात मत कर तू।" उसने आँखें दिखाई। "ठीक है।" मैंने कहा─"अगर तू सच में यही चाहती है तो नहीं करूंगा तुझसे बात। तू यहीं बैठी रह...मैं जा रहा हूं अपनी प्रेमिका से मिलने।" "क्या कहा???" "वही जो तूने सुना।" मैंने कहा─"अगर काका लोग या मां बापू मेरे बारे में पूछें तो बता देना कि मेरा पेट दुख रहा था इस लिए घर चला गया हूं, ठीक है न?" "मैं बता दूंगी कि तेरा कोई पेट वेट नहीं दुख रहा था।" अनीता ने कहा─"मैं बता दूंगी कि तूने एक प्रेमिका बनाई है तो उसी से मिलने गया है।" "यार कैसी बहन है तू?" मैंने मासूम सी शक्ल बना के कहा─"अपने भाई के लिए छोटा सा झूठ भी नहीं बोल सकती?" "हां नहीं बोल सकती।" उसने कहा─"जब तक तू सच सच नहीं बताएगा कि कौन है तेरी प्रेमिका तो तेरे लिए किसी से कोई झूठ नहीं बोलूंगी...हां।" "अच्छा ठीक है।" मैं उसके पास ही सामने बैठ गया फिर बोला─"मैं तुझे सिर्फ इतना बता सकता हूं कि वो तेरी ही तरह बहुत सुंदर है...बस इससे आगे मैं कुछ नहीं बताऊंगा।" अनीता अजीब भाव से देखने लगी मुझे। उसकी कजरारी आंखों में अजीब से भाव दिखे। मैंने महसूस किया कि मैं पुनः उसकी तरफ खिंचने लगा हूं। "देख राजू, मैं तुझसे आखिरी बार पूछ रही हूं।" उसने जैसे चेतावनी देते हुए कहा─"मुझे बता दे कौन है वो कमीनी?" अनीता ने जैसे ही ये कहा तो मैं बरबस ही ठहाका लगा कर हंसने लगा। इतना ही नहीं मैं हंसता ही चला गया। मेरी हंसी रुकी ही नहीं। मुझे यूं पागलो की तरह हंसते देख अनीता अजीब भाव से देखने लगी। उसे समझ न आया कि अचानक मैं इस तरह क्यों हंसे जा रहा हूं? "तू पागल हो गया है क्या?" फिर वो थोड़ा गुस्से में चीखी─"इतना हँस क्यों रहा है?" "हसूं नहीं तो क्या करूं?" मैं अपनी हंसी रोकते हुए बोला─"तू बर्ताव ही ऐसा कर रही है।" "मैंने भला ऐसा कौन सा बर्ताव किया जो तू रावण की तरह हंसने लगा?" "तूने मेरी प्रेमिका को कमीनी कहा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"और जिस लहजे से तूने ऐसा कहा उससे मुझे हंसी आ गई।" "तो उसमें हंसने वाली कौन सी बात कही थी मैंने?" "अच्छा क्या तुझे कुछ समझ नहीं आया?" "बातें न घुमा...साफ साफ बता मुझे।" "अच्छा तो सुन, तेरा वो लहजा साफ साफ जाहिर करता है कि तुझे मेरी प्रेमिका से जलन हुई।" मैंने उसकी आंखों में आँखें डाल कर कहा─"तुझे ये बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी कि मेरी कोई प्रेमिका हो और मैं उसके पास जाऊं, कह दे भला कि मैं गलत कह रहा हूं?" अनीता चकित भाव से देखती रह गई मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए। उससे फौरन कुछ कहते न बना। "क्या हुआ, बोल न।" मैंने पुनः उसकी आंखों में देखा─"मानता हूं कि मैं थोड़ा बुद्धू हूं जिससे कोई बात मुझे देर से समझ आती है लेकिन इतना भी नहीं हूं कि कोई बात कभी समझ ही न आए।" "ये क्या बकवास कर रहा है तू?" "देख, अगर तू मुझे अपना भाई मानती तो तुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी कोई प्रेमिका है।" मैंने कहा─"उल्टा तू खुश होती कि तेरे भाई को कोई लड़की पसंद करती है। इतना ही नहीं इसके लिए तू मेरी मदद भी करती मगर तूने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। ऊपर से जलन में मेरी प्रेमिका को कमीनी भी कहा। इसका तो यही मतलब हुआ न कि तुझे ये अच्छा नहीं लग रहा है। मतलब तू नहीं चाहती है कि कोई लड़की मेरी प्रेमिका हो।" अनीता भौचक्की सी देखती रह गई। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ नजर आया। उसकी हालत चोरी करते पकड़े जाने जैसी हो गई थी। फिर एकाएक उसने खुद की हालत को सम्हाला। "तेरे मगज में सचमुच गोबर भरा है।" फिर उसने जाने क्या सोचते हुए कहा─"पता नहीं क्या क्या सोच लेता है तू?" "अच्छा, क्या सच में?" "हां, मुझे भला इस बात से क्यों कोई आपत्ति होगी कि तेरी कोई प्रेमिका हो?" उसने कहा─"और हां, मुझे किसी से जलन वलन नहीं हो रही है। मैं बस ये चाहती हूं कि तू फालतू में किसी गलत चक्कर में न फंसे।" "क्या यही बात तू मेरी कसम खा कर कह सकती है?" मैंने पुनः उसकी आंखों में देखा। मेरी ये बात सुनते ही वो गड़बड़ा गई। मुझसे नजरें भी न मिलाए रह सकी। मैं मुस्कुरा उठा। "क्या हुआ? मेरी कसम खा कर बोल कि यही सच है।" "मैं क्यों खाऊं तेरी कसम?" उसने तुनक कर हाथ झटका─"तूने भी तो उस समय मेरी कसम खा कर नहीं बताया था कि कौन है तेरी प्रेमिका।" "अच्छा अगर मैं तेरी कसम खा कर अपनी प्रेमिका के बारे में बता दूं।" मैंने कहा─"तो क्या तू भी मेरी कसम खा कर कहेगी कि जो तूने अभी कहा वही सच है?" "ह..हां अगर तू कसम खा के बता देगा तो मैं भी तेरी कसम खा के बता दूंगी।" उसने अजीब भाव से कहा─"वैसे भी मैं तो सच ही बोल रही थी। तुझे भरोसा ही नहीं है तो मैं क्या करूं?" "जब तुझे नहीं है मुझ पर भरोसा तो मुझे भी नहीं होगा।" "अब ज्यादा बातें न कर।" उसने घूरा─"और मेरी कसम खा के अभी बता कि कौन है तेरी प्रेमिका?" "पहले तू मेरी कसम खा के बोल।" "अब ये क्या बात हुई?" अनीता की आँखें सिकुड़ गईं─"देख ये गलत है। पहले मैंने तुझसे पूछा था तो पहले तू ही बताएगा...हां।" "मैं क्यों पहले बताऊं?" मैं मुस्कुरा उठा─"मेरी प्रेमिका को जानने के लिए तू ही इतना मरी जा रही है। बाकी मुझे ये जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है कि तू जो कह रही थी वो सच था या झूठ।" अनीता ये सुन कर असहाय भाव से देखने लगी। उसके चेहरे पर गहन बेबसी और बेचैनी उभर आई। इधर मुझे अब मजा आने लगा था ऐसी बातों से उसे परेशान कर के। जारी है.............. It's Rajan ![]()
19-09-2026, 12:38 PM
Dear Mr. Rajan, Please update the story, continue with the remaining parts and finish the same. It's not advisable to leave the readers in between.
Bhavna
19-09-2026, 11:19 PM
Update please
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