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Agree.. take your time..
But please do share a big update..
And if possible alongwith lot of pics and gifs..
It gives more kick to the story..
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It's a most pleasurable update bro. Take ur time and give us a big update. UR FAN. It's been three days but still i couldn't forget any line from ur story.
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Weekend is around..
Hope to get really a big update..
Please Please Please put some gifs or pics also…
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Can we get big update today
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(01-08-2026, 07:49 AM)anushka Wrote: Can we get big update today
Not Today but in day or two . update is ready , but need refinement . Each update is around 15-20 pages in word document . i have to split Hindi portion as Xossipy does not allow more than certain words length maybe 65000 something like that .
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01-08-2026, 11:26 AM
(This post was last modified: 01-08-2026, 11:31 AM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
Mistake , i meant to post somewhere else .
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01-08-2026, 11:29 AM
(This post was last modified: 01-08-2026, 11:30 AM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
Mistake .
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खौफ और साजिश—7
शेर (कमरे की धुंधली छत को घूरते हुए, मन ही मन एक शैतानी हँसी हँसते हुए): कितनी भोली है तू मीरा मैडम... । कैसे मेरी इस धीमी और सुलगती हुई कामुकता और इन शातिर शर्तों के जाल में फँसकर खुद-ब-खुद मेरे इस सांवले जिस्म पर टूट पड़ी।
उसने अपनी छाती के उन घने बालों को छुआ, जहाँ मीरा के तने हुए निप्पलों के रगड़ के निशान अभी भी महसूस हो रहे थे।
शेर (अपनी आँखों को मूँदते हुए, उस अहसास को दोबारा जीने की कोशिश में): अपनी मर्ज़ी से... अपनी खुद की मर्ज़ी से अपने उन रसीले और सुर्ख मुम्मों को मेरी इस तपती हुई छाती पर रगड़ रही थी। अब तू चाहे लाख खुद को दिलासा दे ले कि तू पाक-साफ है, पर तेरे भीतर का जिस्मानी सच अब बाहर आ चुका है। तेरे बदन में जो आग मैंने आज लगा दी है, वो अब तुझे चैन से जीने नहीं देगी। दिन-रात, सोते-जागते, तुझे अपने उन कोमल मुम्मों पर इस नौकर के सीने के सख्त बालों की रगड़ और अपनी जाँघों के बीच मेरा यह कड़ा प्रहार महसूस होता रहेगा। तू इस तड़प में खुद-ब-खुद वापस मेरे पास आएगी...
यह सोचकर शेर का हाथ अपनी लुंगी के ऊपर और कस गया।
वह जानता था कि जंग का सबसे बड़ा हिस्सा वह आज जीत चुका है।
--------------
उधर अपने कमरे में पहुँचते ही मीरा ने सबसे पहले बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और सीधे शॉवर के नीचे जाकर खड़ी हो गई।
उसका पूरा वजूद अभी भी शेर की छुअन और अपने खुद के जिस्म के उस पागलपन से बुरी तरह काँप रहा था।
काँपते हाथों से उसने अपनी साड़ी और पेटीकोट को ढीला किया और उन्हें बदन से अलग कर दिया। जैसे ही वह अपने बदन के आखिरी कपड़े, यानी अपनी पैन्टी को उतारने के लिए नीचे झुकी और उसे अपनी जाँघों से नीचे सरकाया, उसकी नज़र उस महीन कपड़े के बीचों-बीच बने उस गहरे, गीले निशान पर थमी की थमी रह गई।
उस गहरे गीले निशान को देखते ही मीरा के पूरे बदन में करंट दौड़ गया।
शेर का वह चुभता हुआ जुमला उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूँज उठा: "शायद आपको भी बाथरूम में जाकर अपनी गीली पैन्टी उतारते वक्त खुद को रोकना पड़ेगा..."
मीरा (शर्म, आत्मग्लानि के एक गहरे सैलाब में डूबते हुए, दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर फुसफुसा उठी): "नहीं... नहीं... मैं ऐसी नहीं हूँ... मैं उस के सामने नहीं बहकी..."
उसने तुरंत घबराकर उस पैन्टी को एक कोने में फेंक दिया, जैसे वह कोई सुलगता हुआ अंगारा हो। उसने काँपते हाथों से शॉवर के नॉब को घुमा दिया।
अगले ही पल, ऊपर से ठंडे पानी की तेज़ और तीखी धार उसके इस बेहद गर्म, तपते हुए बदन पर आकर गिरने लगी।
पानी की बूंदें जैसे ही उसकी छाती, उसके अभी भी सुर्ख और तने हुए मुम्मों और उसकी जाँघों के बीच की उस संवेदनशील गर्मी से टकराईं, उसके मुँह से एक ठंडी सिसकारी निकल गई।
पानी की तेज़, सर्द बौछारें मीरा के तपे हुए बदन से टकराकर बिखर रही थीं, लेकिन उसके भीतर सुलगती आग को शांत करने में नाकाम थीं।
उसने गुस्से और गहरे आत्म-उत्पीड़न के भाव से साबुन की बट्टी को उठाया और पागलों की तरह अपनी त्वचा पर रगड़ने लगी।
वह चाहती थी कि शेर के बदन की वह तीखी, गँवारू महक, उसकी चौड़ी हथेलियों का वह स्पर्श, और उसके सीने के कड़े बालों की एक-एक चुभन का अहसास इस झाग के साथ बहकर नाले में चला जाए।
साबुन रगड़ते-रगड़ते उसके कोमल स्तन और गोरी जाँघें सुर्ख लाल पड़ने लगी थीं, पर उसे जैसे कोई दर्द ही महसूस नहीं हो रहा था।
शॉवर के बहते ठंडे पानी और आँखों से बहते खारे आंसुओं के बीच उसका रोना अब बेकाबू सिसकियों का रूप ले चुका था।
वह दीवाल का सहारा लेकर खड़ी थी, उसका सिर टाइल्स से टिका हुआ था। अपनी ही देह के इस अप्रत्याशित विश्वासघात और शेर की शातिर चालों के आगे घुटने टेक देने की लाचारी उसे भीतर से खोखला कर रही थी।
मीरा ( काँपती और रुआंसी आवाज़ में खुद से बड़बड़ाते हुए): "मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूँ... कितनी लाचार और अक्ल की अंधी हूँ! जब तक वह कसम का वास्ता देकर मुझे छूता रहा, तब तक मैं खुद को इस दिलासे के झूठ में लपेटकर सोती रही कि यह सब मैं सिर्फ ज्योति की सुरक्षा के लिए सह रही हूँ... कि इसमें मेरी कोई रज़ामंदी नहीं है, मेरा कोई गुनाह नहीं है..."
उसने ज़ोर से अपनी आँखें बंद कीं, लेकिन पलकों के पीछे अंधेरा छाने के बजाय वही मंज़र और साफ़ हो गया।
उसे अपने ही जिस्म का वह उठना-गिरना, शेर के सीने के बालों से टकराते अपने संवेदनशील निप्पल और जाँघों के बीच का वह गीला, डरावना सुख साफ़-साफ़ महसूस होने लगा।
मीरा (दीवार पर अपनी मुट्ठी टिकाते हुए, सिसकियों के बीच दर्द से घुटकर): "पर आज? आज तो मैंने खुद अपने हाथों से अपनी गरिमा का गला घोंट दिया। सिर्फ़ उस नीच नौकर के सामने अपने झूठे अभिमान को सच साबित करने की बचकानी ज़िद में... मैं उसकी इस कदर ग़ुलाम बन गई? मैं सीधे उसके बिछाए जाल में फँस गई! उसने जैसे उँगली हिलायी, मैं नाचती रही... अपने इन मम्मों को खुद अपने ही हाथों से बेपर्दा करके, अपनी पूरी मर्ज़ी से... हाँ, अपनी खुद की रज़ामंदी से उसके काले, तपते सीने पर रगड़ती रही!"
यह सोचते ही उसकी जाँघों के बीच छिपी वह बेहद संवेदनशील नस दोबारा एक भीनी और गर्म सिहरन से फड़क उठी, जिसने उसकी आत्मग्लानि को और बढ़ा दिया।
उसने गुस्से में अपने भीगे बालों को पीछे की तरफ झटका।
मीरा (बेबसी और हताशा से भरे स्वर में): "और इस सब के बदले मुझे मिला क्या... सिर्फ़ एक दिन की कसम से झूठी मोहलत! कल सवेरा होते ही वह फिर कोई नया खेल रचेगा, पर मैं इस खौफ़नाक चक्रव्यूह से खुद को आज़ाद कैसे करूँगी?"
शॉवर की बूंदें लगातार उसकी पीठ और छाती को भिगोती रहीं, पर वह जानती थी कि शरीर तो साफ हो जाएगा, लेकिन उसकी रूह पर लगा वह निशान अब कभी नहीं मिटने वाला था।
-------------
सरताज (दफ्तर की थकावट मिटाने के लिए अपनी सिक्युरिटी वर्दी के बटन खोलते हुए): "आज दिन भर मीटिंग्स का चक्कर रहा मीरा, खैर यह बताओ कि शेर का ज़ख्म कैसा है? कुछ इम्प्रूवमेंट हुई?"
मीरा (प्लेट में गर्म रोटियाँ परोसते हुए अपनी घबराहट छुपाने की कोशिश करती है): "हाँ, दोपहर को गई थी हाल-चाल पूछने, ज़ख्म भर रहे हैं उसके।"
मीरा (मन ही मन में): "आपकी बीवी बेवकूफ बन के आई है उसके हाथों... क्या बताऊँ कि मेरे साथ क्या-क्या हुआ।"
सरताज (सब्ज़ी का एक निवाला मुँह में डालते हुए स्वाद लेकर कहते हैं): "हाँ, थोड़ा समय तो लगेगा ही, बस उस पर थोड़ा ध्यान रखना कि कोई लापरवाही न हो।"
मीरा (नज़रें चुराकर मेज की सफाई करने का नाटक करते हुए धीरे से कहती है): "जी, मैं पूरी नज़र रखती हूँ, आप खाने पर ध्यान दीजिए और बताइए सब्ज़ी में नमक ठीक है या नहीं?"
सरताज (मीरा का हाथ अपने हाथ में लेकर प्यार से मुस्कुराते हैं): "नमक बिल्कुल सही है, पर तुम आज थोड़ी थकी और परेशान सी क्यों लग रही हो?"
मीरा (एक हलकी सी बनावटी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए): "नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।"
मीरा (मन ही मन में): "किस मुँह से बताऊँ आपको कि मेरे साथ क्या हो रहा है।"
सरताज (पानी का गिलास हाथ में लेते हुए सहज भाव से पूछते हैं): "ज्योति किधर है, नज़र नहीं आ रही?"
मीरा (पलकें झुकाकर आवाज़ में): "वह आज जल्दी सो गई थी।"
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सरताज (बिस्तर पर लेटे हुए, छत को घूरते हुए सोचता है): "कुछ तो है जो मीरा को अंदर ही अंदर परेशान कर रहा है।"
सरताज (करवट बदलते हुए): "कभी हंसती-खिलखिलाती दिखती है, तो अचानक ही किसी गहरे खौफ में सिमट जाती है।"
सरताज (एक ठंडी सांस भरते हुए): "मेरी यह सिक्युरिटी की ड्यूटी... मैं खुद अपनी पत्नी को पूरा वक्त नहीं दे पा रहा हूँ।"
सरताज (परेशानी में अपना माथा सहलाते हुए): "कोठी के मामलों में अब किस पर भरोसा करूँ?काश! चंदन बाबा आज ठीक होते..."
चंदन पिछले दस से भी ज़्यादा सालों से इस घर का सबसे वफ़ादार ड्राइवर और गृह-सेवक रहा है। अट्ठावन वर्ष की ढलती उम्र और लंबे समय की निस्वार्थ सेवा के कारण, घर के हर छोटे-बड़े सदस्य के दिल में उसके लिए एक ख़ास जगह है।
उसकी सादगी, तजुर्बे और घर के प्रति अपार समर्पण का ही नतीजा है कि सरताज और मीरा दोनों ही उसे महज़ एक नौकर नहीं मानते। वे बड़े आदर और अपनेपन के साथ उसे 'चंदन बाबा' कहकर पुकारते हैं।
सरताज (अतीत की उस घटना को याद करते हुए): "बेचारे चंदन बाबा का अचानक इतना बड़ा एक्सीडेंट हो गया, तभी तो रिप्लेसमेंट के तौर पर शेर को रखना पड़ा।"
सरताज (सोचते हुए): "कल ही चंदन बाबा का हाल-चाल पूछता हूँ।"
सरताज (उम्मीद के साथ): "अगर उनकी हालत थोड़ी भी ठीक हुई होगी, तो उन्हें वापस घर ले आता हूँ।"
सरताज (निर्णय लेते हुए): "अगर वह पूरी तरह ठीक न भी हुए हों, तो भी उनसे वापस आने की गुज़ारिश करूँगा।"
आखिर वह मीरा को अपनी बिटिया की तरह मानते हैं। वह ज़रूर मीरा की तकलीफ और उसकी परेशानी को समझ पाएंगे।
सरताज (खुद से बड़बड़ाते हुए): "इतने सालों में उनके रहते मीरा कभी इस तरह नहीं घबराई थी।"
मीरा बाथरोब पहनकर बाथरूम से बाहर आई और उसने सरताज को छत की तरफ घूरते हुए देखा।
मीरा यह बात अच्छी तरह जानती थी कि उसके पति उसके चेहरे की उदासी और खिंचाव को लेकर बेहद चिंतित हैं।
सरताज बहुत ही परवाह करने वाले पति थे, लेकिन मीरा आज ऐसे हालात में फँसी थी कि वह चाहकर भी उनसे दिल का हाल साझा नहीं कर सकती थी।
मीरा (उनके करीब आकर प्यार से पूछती है): "क्या सोच रहे हैं?"
सरताज ने नज़रें उठाकर मीरा की तरफ देखा और उनका दिल हुआ कि वह अपनी पूरी योजना उसे बता दें।
फिर उन्होंने मन ही मन सोचा कि पहले चंदन बाबा से मिल लें, उसके बाद ही मीरा को यह सरप्राइज देंगे।
सरताज (एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहते हैं): "कुछ खास नहीं मीरा, बस दफ्तर के ही कुछ मामलों के बारे में सोच रहा था।"
इतना कहते ही सरताज ने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे खींचकर अपनी बाँहों में भर लिया।
सरताज ने मीरा को प्यार से अपनी गोद में बिठाया और उसके मासूम चेहरे को निहारते हुए उसे चूमा।
सरताज (मीरा के गालों को थपथपाते हुए धीरे से बोले): "मुझे माफ कर दो मीरा..."
मीरा (हैरानी से उनकी आँखों में देखते हुए पूछती है): "आप अचानक किस बात के लिए माफी माँग रहे हैं?"
सरताज (उसके चेहरे और बंद होती आँखों को पागलों की तरह चूमते हुए कहते हैं): "मैं तुम्हें अपनी नौकरी की वजह से पूरा वक्त ही नहीं दे पाता हूँ।"
सरताज (एक लंबी सांस खींचकर उसकी जुल्फों को सहलाते हुए बोले): "तुम्हें तो पता ही है कि एक IPS ऑफिसर की ड्यूटी कैसी और कितनी सख्त होती है..."
मीरा (सरताज के चेहरे को प्यार से चूमते हुए बोली): "मैं आपकी मजबूरी अच्छे से समझती हूँ, आपको मुझसे माफी माँगने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
मीरा (मन ही मन गहरी ग्लानि से भर उठती है): "असल में गुनेहगार तो मैं हूँ, जिसने जाने-अनजाने आपका इतना बड़ा विश्वास तोड़ा है।"
मीरा (अंदर ही अंदर घुटते हुए सोचती है): "मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि मैं शेर की उन गंदी करतूतों और ब्लैकमेल के बारे में आपसे कैसे कुछ कहूँ।"
सरताज ने धीरे-धीरे मीरा के होंठों को चूमना शुरू कर दिया, और फिर उसकी जीभ मीरा के मुँह के अंदर सरक गई।
मीरा सरताज के मुँह के भीतर ही हल्की सी कराह भरी आवाज़ निकालती है और उसका साथ देते हुए उसे दीवानगी से वापस चूमने लगती है।
मीरा (मन ही मन राहत की सांस लेते हुए सोचती है): "कम से कम मैंने उस हैवान शेर की गंदी और नीच जीभ को अपने मुँह के अंदर तक नहीं पहुँचने दिया।"
फिर उन दोनों ने एक-दूसरे के जिस्म में खोकर बहुत देर तक जम के प्यार किया।
सरताज ने बड़ी ही नज़ाकत से मीरा के गले को चूमा और चाटा, फिर उसके सुडौल स्तनों को प्यार से सहलाते हुए अपने मुँह में लेकर धीरे-धीरे चूसा।
सरताज के प्यार करने का तरीका उस इंसान जैसा था, जो अपनी दुनिया की सबसे बेशकीमती और नाज़ुक चीज़ को बड़ी हिफ़ाज़त से सहलाता है।
वहीं दूसरी तरफ शेर ने तो उसके बदन को एक जंगली दरिंदे की तरह नोचा था—उस आदमी की तरह, जो उसे बस इस्तेमाल करना चाहता हो।
संतुष्ट कर देने वाले प्यार के बाद, दफ्तर की थकावट से बेहाल सरताज को फौरन ही गहरी नींद आ गई।
मीरा वहीं करवट लिए लेटी रही और बिना पलक झपकाए अपने पति के शांत चेहरे को निहारती रही।
वह मन ही मन सरताज और शेर के बीच के उस ज़मीन-आसमान के अंतर के बारे में सोचने लगी।
एक सरताज हैं—जो उसकी हर एक छोटी-सी खुशी के लिए पूरी दुनिया से अकेले लड़ सकते हैं।
और दूसरी तरफ वह हैवान शेर है—जो सिर्फ वासना में अंधा होकर उसकी हर लाचारी और मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तड़प रहा है।
एक को उससे रूह से मोहब्बत थी, तो दूसरे को सिर्फ और सिर्फ उसका गोरा बदन चाहिए था।
अगली सुबह जब सरताज बिस्तर से उठे, तो उन्होंने देखा कि मीरा थकावट के कारण गहरी नींद में सो रही है।
सरताज ने बिना कोई आहट किए चुपचाप अपनी सिक्युरिटी की वर्दी पहनी और दफ्तर के लिए तैयार हो गए।
घर से निकलते वक्त उन्होंने अपनी सोई हुई पत्नी के माथे को बड़े प्यार से चूमा और गाड़ी की तरफ बढ़ गए।
गाड़ी में बैठते ही सरताज ने अपने ड्राइवर को दफ्तर जाने से पहले सीधे चंदन के घर की तरफ चलने का हुक्म दिया।
चंदन बाबा के घर पहुँचकर सरताज ने देखा कि हादसे के बाद अब वह लगभग 90% तक ठीक हो चुके हैं और बिना किसी सहारे के चल पा रहे हैं।
सरताज (चंदन का हाथ पकड़कर आदर से बोले): "बाबा, आपकी सेहत अब काफी बेहतर लग रही है, मुझे कोठी में आपके सहारे की फिर से सख्त ज़रूरत है।"
चंदन (अपने मालिक को देखकर मुस्कुराते हुए बोले): "साहब, मैं तो खुद इतने लंबे आराम से ऊब चुका हूँ, पर यह बताइए कि मेरी जगह जो नया लड़का शेर आया था, वह कैसा काम कर रहा है?"
सरताज (सहज अंदाज़ में जवाब देते हुए बोले): "काम-काज तो वह ठीक ही कर रहा है बाबा, उसमें कोई कमी नहीं है।"
सरताज (मन ही मन खटकते हुए सोचते हैं): "पता नहीं क्यों, पर उस इंसान पर मेरा दिल कभी पूरा भरोसा नहीं कर पाता... उसकी नीयत मुझे ठीक नहीं लगती।"
सरताज ने अपने इस शक और तजुर्बे को फिलहाल अपने तक ही सीमित रखा और चंदन बाबा से ज़ाहिर नहीं होने दिया।
सरताज (चंदन बाबा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद गंभीरता से बोले): "बाबा, असल में मुझे आपकी मदद इसलिए चाहिए ताकि हम समझ सकें कि मीरा को अंदर ही अंदर क्या चीज़ परेशान कर रही है।"
चंदन (चिंता से चौंकते हुए बोले): "बिटिया रानी परेशानी में हैं? क्या हुआ है उन्हें साहब?"
सरताज (धीमी और सख्त आवाज़ में हिदायत देते हुए बोले): "यह बात सिर्फ आपके और मेरे बीच रहनी चाहिए बाबा, इसके बारे में किसी तीसरे को कानों-कान खबर नहीं होनी चाहिए।"
चंदन (अपनी छाती पर हाथ रखकर वफादारी से बोले): "आप बेफिक्र रहिए साहब, मेरी बिटिया की सलामती और आपकी बात की लाज मेरे लिए सबसे ऊपर है, मैं आज ही कोठी लौट रहा हूँ।"
सरताज (राहत की गहरी सांस लेते हुए बोले): "बस यही भरोसा मुझे आप पर था बाबा, आपके वहाँ रहने से मीरा को बहुत हिम्मत मिलेगी और मुझे भी तसल्ली रहेगी।"
सरताज (गाड़ी के दरवाज़े के पास खड़े होकर चंदन बाबा से बोले): "बाबा, अभी हाल ही में शेर ने अपनी जान पर खेलकर हमारी बिटिया ज्योति को एक बहुत बड़े हादसे से बचाया था, और उस चक्कर में वह खुद भी काफी ज़ख्मी हो गया था।"
सरताज (मन ही मन गहरी सोच में डूबते हुए): "कहने को तो उसने मेरी बच्ची की जान बचाई है, लेकिन मेरा सिक्युरिटीिया दिमाग यह मानने को तैयार नहीं है... मुझे शक है कि इस सबके पीछे उसका कोई बहुत बड़ा और गंदा मक़सद छिपा है।"
सरताज (अपने चेहरे के भावों को संभालते हुए): "इसलिए बाबा, आप शाम तक पूरी तरह तैयार रहिएगा, मैं शाम को दफ्तर से लौटते वक्त आपको गाड़ी में यहीं से पिक कर लूँगा।"
चंदन बाबा (इशारे में सिर हिलाते हुए बोले): "ठीक है साहब, मैं शाम को अपना सामान लेकर आपका इंतज़ार करूँगा।"
इतना कहकर सरताज अपनी गाड़ी में बैठे और सीधे अपने दफ्तर की तरफ रवाना हो गए।
सुबह उठते ही शेर के दिमाग में विचारों का जाल बुनना शुरू हो गया था। वह अपनी खटिया पर बैठा मूंछों पर ताव देते हुए आगे की चालें सोचने लगा।
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "कल तो सचमुच मज़ा ही आ गया... क्या रगड़ा था मीरा मैडम के जिस्म को! कितनी भोली हैं मीरा मेमसाहिब, बस ज्योति की कसम के डर से धीरे-धीरे सब कुछ सौंपती जा रही हैं।"
शेर (एक कामुक मुस्कान के साथ): "कितना मज़ा आता है उनको इस तरह टूटते हुए देखने में... क्या आहें निकल रही थीं उनके मुँह से, जब वह अपने रसीले मम्मों को मेरी छाती पर रगड़ रही थीं!"
शेर (आँखों में वहशी चमक लाते हुए सोचता है): "इतनी गोरी, एक IPS ऑफिसर की बीवी को ऐसे नंगा करके ज़लील करने का अपना अलग ही मज़ा है... शंकर भाई की आत्मा को भी अब जाकर शांति मिल रही होगी कि मैं उनकी मौत का बदला किस तरह ले रहा हूँ।"
शेर (अपनी दाढ़ी सहलाते हुए): "ज्योति की कसम का आईडिया तो बहुत ज़बरदस्त था, लेकिन... अगर किसी दिन मीरा मेमसाहिब ने कसम मानने से ही साफ इंकार कर दिया तो?"
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "अगर उस मेमसाहिब ने कसम तोड़ने का दिल बना ही लिया, तो फिर मैं क्या उखाड़ लूँगा?"
शेर (सोचने लगा): "खाली धमकियों के दम पर कब तक काम चलेगा... अगर उसने सीधे मुँह मना कर दिया और मुझे अपने जिस्म के करीब भटकने भी न दिया, तो मेरे हाथ क्या आएगा?"
शेर (चिंता में अपनी ठोढ़ी खुजाते हुए बोला): "सच तो यह है कि मैं सचमुच ज्योति बच्ची का बाल भी बाँका नहीं कर सकता... साहब सिक्युरिटी अफसर हैं, ज़रा सी भी ऊँच-नीच हुई तो मेरी खाल खींचकर भूसा भर देंगे।"
शेर (एक खौफनाक और कामुक मुस्कान के साथ बड़बड़ाया): "नहीं! मुझे उस रसीले बदन को हर हाल में हासिल करना ही होगा... सिर्फ कसम का खौफ काफी नहीं है।"
शेर (अपनी मुट्ठी कसते हुए ठान लेता है): "मुझे मीरा पर अपनी पकड़ और मज़बूत करनी होगी, कोई ऐसा ठोस सबूत या फंदा बनाना होगा जिससे वह चाहकर भी इस कसम से पीछे न हट सके।"
तभी शेर के दिमाग में उस तांत्रिक बाबा का ख्याल आया, जो काले जादू का खतरनाक खेल खेला करता था।
शेर (अपनी आँखों में चमक लाते हुए सोचने लगा): "हाँ! वह तांत्रिक बाबा... जो किसी भी इंसान को घर बैठे बीमार और लाचार कर दिया करता था!"
शेर (अतीत का नज़ारा याद करते हुए): "मैंने अपनी आँखों से देखा था कि कैसे वह उस इंसान के नाम की कपड़े की गुड़िया बनाता था, और जैसे ही उस गुड़िया पर सुइयां चुभोता या वार करता, वहाँ दूर बैठा इंसान तड़पने और बीमार पड़ने लगता था।"
शेर (अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता है): "ज्योति बच्ची के लिए मुझे भी बिल्कुल वैसा ही कुछ इंतज़ाम करना होगा!"
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "अगर मीरा मेमसाहिब ने मेरी बात मानने से इंकार किया या कसम तोड़ी, तो मैं तांत्रिक के उस काले जादू से ज्योति को बीमार कर दूँगा..."
शेर (अपनी मुट्ठी भींचते हुए): "जब बच्ची बिना किसी वजह के बिस्तर पर तड़पेगी और डॉक्टर भी कुछ समझ नहीं पाएंगे, तब मीरा को यकीन हो जाएगा कि यह सब उसकी कसम तोड़ने का ही नतीजा है!"
शेर (कामुक मुस्कान के साथ बड़बड़ाया): "फिर तो मेमसाहिब अपनी बच्ची की जान बचाने के लिए रोती-बिलखती हुई खुद मेरे कदमों में गिरेगी... और अपने इस रसीले जिस्म को हमेशा के लिए मेरे हवाले कर देगी!"
शेर बिना वक्त गंवाए तुरंत उस तांत्रिक बाबा को फोन मिलाता है।
शेर (आवाज़ में उतावली और लालच लाते हुए बोला): "प्रणाम बाबा, मुझे एक बहुत ज़रूरी काम के लिए आपकी मदद चाहिए।"
तांत्रिक बाबा (गंभीर और भारी आवाज़ में): "हाँ बोल शेर, क्या बात है?"
शेर तांत्रिक बाबा को विस्तार से बताता है कि कैसे वह अपना बदला लेने के लिए एक इंसान को अपने इशारों पर नचाना चाहता है, और इसीलिए उसे उस पर काला जादू करवाने के लिए तांत्रिक बाबा की मदद चाहिए।
तांत्रिक बाबा (गंभीरता से): "यह कोई बड़ी बात नहीं है, मैं यह काम कर दूँगा... लेकिन यह विद्या तभी काम करेगी, जब तू मुझे उस इंसान के शरीर का थोड़ा सा बाल लाकर देगा।"
तांत्रिक बाबा (तरीका समझाते हुए बोले): "चाहे तू उसकी कंघी से गिरे हुए बाल उठा ले या फिर उसके शरीर से चुपचाप थोड़े से बाल काट ले, पर बाल होना बहुत ज़रूरी है! और हाँ... इस तंत्र-साधना का ख़र्च पूरे एक लाख रुपये लगेगा।"
शेर बिना किसी हिचकिचाहट के तांत्रिक बाबा की शर्त और एक लाख रुपये की फीस पर तुरंत राज़ी हो गया।
तांत्रिक बाबा (समय का हिसाब देते हुए बोले): "जैसे ही तू मुझे बाल लाकर देगा, उसके ठीक दो दिन बाद मैं उस गुड़िया को सिद्ध करके तैयार कर दूँगा।"
शेर (एक शातिर मुस्कान के साथ बड़बड़ाया): "बस दो दिन... ठीक है बाबा, मैं आज ही उस बच्ची के बाल का इंतज़ाम करके आपके पास पहुँचता हूँ।"
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Khauf Aur Saazish—7
Sher (kamre ki dhundhli chhat ko ghoorte hue, man hi man ek shaitani hansi hanste hue): Kitni bholi hai too Meera madam... . Kaise meri is dheemi aur sulagti hui kaamukta aur in shaatir sharton ke jaal mein phanskar khud-b-khud mere is saanwle jism par toot padi.
Usne apni chhati ke un ghane baalon ko chhua, jahaan Meera ke tane hue nipplon ke ragad ke nishaan abhi bhi mehsus ho rahe the.
Sher (apni aankhon ko moonde hue, us ehsaas ko dobaara jeene ki koshish mein): Apni marzi se... apni khud ki marzi se apne un raseele aur surkh mummon ko meri is tapti hui chhati par ragad rahi thi. Ab too chahe laakh khud ko dilaasa de le ki too paak-saaf hai, par tere bheetar ka jismani sach ab baahar aa chuka hai. Tere badan mein jo aag maine aaj laga di hai, wo ab tujhe chain se jeene nahi degi. Din-raat, sote-jaagte, tujhe apne un komal mummon par is naukar ke seene ke sakht baalon ki ragad aur apni jaanghon ke beech mera yeh kada prahaar mehsus hota rahega. Too is tadap mein khud-b-khud waapas mere paas aayegi...
Yeh sochkar Sher ka haath apni lungi ke uupar aur kas gaya.
Vah jaanta tha ki jang ka sabse bada hissa vah aaj jeet chuka hai.
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Udhar apne kamre mein pahunchte hi Meera ne sabse pehle bathroom ka darwaza andar se band kiya aur seedhe shower ke neeche jaakar khadi ho gayi.
Uska poora wajood abhi bhi Sher ki chhuan aur apne khud ke jism ke us paagalpan se buri tarah kaamp raha tha.
Kaampte haathon se usne apni saree aur petticoat ko dheela kiya aur unhen badan se alag kar diya. Jaise hi vah apne badan ke aakhri kapde, yaani apni panty ko utaarne ke liye neeche jhuki aur usse apni jaanghon se neeche sarkaaya, uski nazar us mahin kapde ke beechon-beech bane us gahre, geele nishaan par thami ki thami rah gayi.
Us gahre geele nishaan ko dekhate hi Meera ke poore badan mein current daud gaya.
Sher ka vah chubhta hua jumla uske kaanon mein pighle hue seese ki tarah goonj utha: "Shayad aapko bhi bathroom mein jaakar apni geeli panty utaarte waqt khud ko rookna padega..."
Meera (sharm, aatmaglaani ke ek gahre sailaab mein doobte hue, dono haathon se apna chehra dhakkar phusphusaa uthi): "Nahi... nahi... main aisi nahi hoon... main us ke saamne nahi bahki..."
Usne turant ghabraakar us panty ko ek kone mein pheenk diya, jaise vah koi sulagta hua angaara ho. Usne kaampte haathon se shower ke knob ko ghuma diya.
Agle hi pal, uupar se thande paani ki tez aur teekhi dhaar uske is behad garm, tapte hue badan par aakar girne lagi.
Paani ki boonden jaise hi uski chhati, uske abhi bhi surkh aur tane hue mummon aur uski jaanghon ke beech ki us sanvedansheel garmi se takraaiin, uske muunh se ek thandi siskaari nikal gayi.
Paani ki tez, sard baujhaaren Meera ke tape hue badan se takraakar bikhar rahi theen, lekin uske bheetar sulagti aag ko shaant karne mein naakaam theen.
Usne gusse aur gahre aatma-utpeedan ke bhaav se sabun ki batti ko uthaya aur paaglon ki tarah apni tvacha par ragadne lagi.
Vah chahti thi ki Sher ke badan ki vah teekhi, ganwaaru mahak, uski chaudi hatheliyon ka vah sparsh, aur uske seene ke kade baalon ki ek-ek chubhan ka ehsaas is jhaag ke saath bahkar naale mein chala jaaye.
Sabun ragadte-ragadte uske komal stan aur gori jaanghen surkh laal padne lagi theen, par usse jaise koi dard hi mehsus nahi ho raha tha.
Shower ke bahte thande paani aur aankhon se bahte khaare aansoon ke beech uska roona ab bekaabu siskiyon ka roop le chuka tha.
Vah deewal ka sahara lekar khadi thi, uska sir tiles se tika hua tha. Apni hi deh ke is apratyaashit vishwaasghaat aur Sher ki shaatir chaalon ke aage ghutne teek dene ki laachari usse bheetar se khokhla kar rahi thi.
Meera (kaampti aur ruaansi aawaz mein khud se badbadaate hue): "Main kitni badi bewakoof hoon... kitni laachar aur aakl ki andhi hoon! Jab tak vah kasam ka waasta dekar mujhe chhoota raha, tab tak main khud ko is dilaase ke jhooth mein lapetkar soti rahi ki yeh sab main sirf Jyoti ki suraksha ke liye sah rahi hoon... ki ismein meri koi razaamandi nahi hai, mera koi gunaah nahi hai..."
Usne zor se apni aankhen band kiin, lekin palkon ke peeche andhera chhaane ke bajaay wahi manzar aur saaf ho gaya.
Usse apne hi jism ka vah uthna-girna, Sher ke seene ke baalon se takraate apne sanvedansheel nipple aur jaanghon ke beech ka vah geela, daraawna sukh saaf-saaf mehsus hone laga.
Meera (deewar par apni mutthi tikaate hue, siskiyon ke beech dard se ghutkar): "Par aaj? Aaj to maine khud apne haathon se apni garima ka gala ghongt diya. Sirf us neech naukar ke saamne apne jhoothe abhimaan ko sach saabit karne ki bachkani zid mein... main uski is kadar ghulaam ban gayi? Main seedhe uske bichhaaye jaal mein phans gayi! Usne jaise uungli hilaayi, main naachti rahi... apne in mammon ko khud apne hi haathon se beparda karke, apni poori marzi se... haan, apni khud ki razaamandi se uske kaale, tapte seene par ragadti rahi!"
Yeh सोचते hi uski jaanghon ke beech chhipi vah behad sanvedansheel nas dobaara ek bheeni aur garm siharan se phadak uthi, jisne uski aatmaglaani ko aur badha diya.
Usne gusse mein apne bheoge baalon ko peeche ki taraf jhatka.
Meera (bebasi aur hataasha se bhare swar mein): "Aur is sab ke badle mujhe mila kya... sirf ek din ki kasam se jhoothi mohlat! Kal sawera hote hi vah phir koi naya khel rachega, par main is khaufnaak chakraavyooh se khud ko azaad kaise karungi?"
Shower ki boonden lagaataar uski peeth aur chhati ko bhigooti rahiin, par vah jaanti thi ki shareer to saaf ho jaayega, lekin uski rooh par laga vah nishaan ab kabhi nahi mitne wala tha.
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Sartaj (daftaar ki thakaawat mitaane ke liye apni security officer vardee ke button khoolte hue): "Aaj din bhar meetings ka chakkar raha Meera, khair yeh bataao ki Sher ka zakhm kaisa hai? Kuch improvement hui?"
Meera (plate mein garm rotiyan paroste hue apni ghabrahat chhipaane ki koshish karti hai): "Haan, dopahar ko gayi thi haal-chaal poochhne, zakhm bhar rahe hain uske."
Meera (man hi man mein): "Aapki beewi bewakoof ban ke aai hai uske haathon... kya bataoon ki mere saath kya-kya hua."
Sartaj (sabzi ka ek niwaala muunh mein daalte hue swaad lekar kahte hain): "Haan, thoda samay to lagega hi, bas us par thoda dhyaan rakhna ki koi laaparwahi na ho."
Meera (nazaren churaakar mej ki safai karne ka naatak karte hue dheere se kahti hai): "Ji, main poori nazar rakhti hoon, aap khaane par dhyaan dijie aur bataiye sabzi mein namak theek hai ya nahi?"
Sartaj (Meera ka haath apne haath mein lekar pyaar se muskuraate hain): "Namak bilkul sahi hai, par tum aaj thodi thaki aur pareshan si kyon lag rahi ho?"
Meera (ek halki si banaawati muskaan chehre par laate hue): "Nahi, aisi to koi baat nahi hai."
Meera (man hi man mein): "Kis muunh se bataoon aapko ki mere saath kya ho raha hai."
Sartaj (paani ka glass haath mein lete hue sahaj bhaav se poochhte hain): "Jyoti kidhar hai, nazar nahi aa rahi?"
Meera (palken jhukaakar aawaz mein): "Vah aaj jaldi so gayi thi."
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Sartaj (bistar par lete hue, chhat ko ghoorte hue sochta hai): "Kuch to hai jo Meera ko andar hi andar pareshan kar raha hai."
Sartaj (karwat badalte hue): "Kabhi hansti-khilkhilaati dikhti hai, to achanak hi kisi gahre khauf mein simat jaati hai."
Sartaj (ek thandi saans bharte hue): "Meri yeh security officer ki duty... main khud apni patni ko poora waqt nahi de paa raha hoon."
Sartaj (pareshani mein apna maatha sahlaate hue): "Kothi ke maamlon mein ab kis par bharosa karoon?"
Sartaj: "Kaash! Chandan baba aaj theek hote..."
Chandan pichhle das se bhi zyaada saalon se is ghar ka sabse wafaadaar driver aur grih-sevak raha hai. Atthaawan varsh ki dhaltee umr aur lambe samay ki niswaarth seva ke kaaran, ghar ke har chhote-bade sadasya ke dil mein uske liye ek khaas jagah hai.
Uski saadgi, tajurbe aur ghar ke prati apaar samarpan ka hi nateeja hai ki Sartaj aur Meera dono hi usse mahaz ek naukar nahi maante. Ve bade aadar aur apnepan ke saath usse 'Chandan baba' kahkar pukaarte hain.
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Sartaj (ateet ki us ghatna ko yaad karte hue): "Bechaare Chandan baba ka achanak itna bada accident ho gaya, tabhi to replacement ke taur par Sher ko rakhna pada."
Sartaj (sochte hue): "Kal hi Chandan baba ka haal-chaal poochhta hoon."
Sartaj (ummeed ke saath): "Agar unki haalat thodi bhi theek hui hogi, to unhen waapas ghar le aata hoon."
Sartaj (nirnay lete hue): "Agar vah poori tarah theek na bhi hue hon, to bhi unse waapas aane ki guzaarish karunga."
Aakhir vah Meera ko apni bitiya ki tarah maante hain. Vah zaroor Meera ki takleef aur uski pareshani ko samajh paayenge.
Sartaj (khud se badbadaate hue): "Itne saalon mein unke rahte Meera kabhi is tarah nahi ghabraayi thi."
Meera bathrobe pahankar bathroom se baahar aai aur usne Sartaj ko chhat ki taraf ghoorte hue dekha.
Meera yeh baat achhi tarah jaanti thi ki uske pati uske chehre ki udaasi aur khinchaav ko lekar behad chintit hain.
Sartaj bahut hi parwah karne wale pati the, lekin Meera aaj aise haalaat mein phansi thi ki vah chaahkar bhi unse dil ka haal saajha nahi kar sakti thi.
Meera (unke kareeb aakar pyaar se poochhti hai): "Kya soch rahe hain?"
Sartaj ne nazaren uthaakar Meera ki taraf dekha aur unka dil hua ki vah apni poori yojana usse bata dein.
Phir unhone man hi man me socha ki pehle Chandan baba se mil lein, uske baad hi Meera ko yeh surprise denge.
Sartaj (ek halki si muskaan ke saath kahte hain): "Kuch khaas nahi Meera, bas daftaar ke hi kuch maamlon ke baare mein soch raha tha."
Itna kehte hi Sartaj ne Meera ka haath pakda aur usse kheenchkar apni baahon mein bhar liya.
Sartaj ne Meera ko pyaar se apni god mein bithaaya aur uske maasoom chehre ko nihaarte hue usse chooma.
Sartaj (Meera ke gaalon ko thapthapaate hue dheere se boole): "Mujhe maaf kar do Meera..."
Meera (hairani se unki aankhon mein dekhte hue poochhti hai): "Aap achanak kis baat ke liye maafi maang rahe hain?"
Sartaj (uske chehre aur band hoti aankhon ko paaglon ki tarah choomte hue kahte hain): "Main tumhe apni naukri ki वजह se poora waqt hi nahi de paata hoon."
Sartaj (ek lambi saans kheenchkar uski julfon ko sahlaate hue boole): "Tumhe to pata hi hai ki ek IPS officer ki duty kaisi aur kitni sakht hoti hai..."
Meera (Sartaj ke chehre ko pyaar se choomte hue booli): "Main aapki majboori achhe se samajhti hoon, aapko mujhse maafi maangne ki koi zaroorat nahi hai."
Meera (man hi man gahri glaani se bhar uthti hai): "Asal mein gunehgaar to main hoon, jisne jaane-anjaane aapka itna bada vishwaas tooda hai."
Meera (andar hi andar ghut-te hue sochti hai): "Mujhe samajh hi nahi aa raha ki main Sher ki un gandi kartooton aur blackmail ke baare mein aapse kaise kuch kahoon."
Sartaj ne dheere-dheere Meera ke hontHon ko choomna shuru kar diya, aur phir uski jeebh Meera ke muunh ke andar sarak gayi.
Meera Sartaj ke muunh ke bheetar hi halki si karaah bhari aawaz nikaalti hai aur uska saath dete hue usse deewangi se waapas choomne lagti hai.
Meera (man hi man rahat ki saans lete hue sochti hai): "Kam se kam maine us haiewaan Sher ki gandi aur neech jeebh ko apne muunh ke andar tak nahi pahunchne diya."
Phir un dono ne ek-doosre ke jism mein khookar bahut deer tak jam ke pyaar kiya.
Sartaj ne badi hi nazaakat se Meera ke gale ko chooma aur chaata, phir uske sudaul stanon ko pyaar se sahlaate hue apne muunh mein lekar dheere-dheere choosa.
Sartaj ke pyaar karne ka tareeka us insaan jaisa tha, jo apni duniya ki sabse beshkeemti aur naajuk cheez ko badi hifaazat se sahlaata hai.
Wahi doosri taraf Sher ne to uske badan ko ek jangli darinde ki tarah noocha tha—us aadmi ki tarah, jo usse bas istemaal karna chahta ho.
Santusht kar dene wale pyaar ke baad, daftaar ki thakaawat se behaal Sartaj ko fauran hi gahri neend aa gayi.
Meera wahi karwat liye leti rahi aur bina palak jhapaaye apne pati ke shaant chehre ko nihaarti rahi.
Vah man hi man Sartaj aur Sher ke beech ke us zameen-aasmaan ke antar ke baare mein sochne lagi.
Ek Sartaj hain—jo uski har ek chhoti-si khushi ke liye poori duniya se akele lad sakte hain.
Aur doosri taraf vah haiewaan Sher hai—jo sirf vaasna mein andha hokar uski har laachari aur majboori ka fayda uthaane ke liye tadap raha hai.
Ek ko usse rooh se mohabbat thi, to doosre ko sirf aur sirf uska gora badan chahiye tha.
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Agli subah jab Sartaj bistar se uthe, to unhone dekha ki Meera thakaawat ke kaaran gahri neend mein so rahi hai.
Sartaj ne bina koi aahat kiye chupchaap apni security officer ki vardee pahni aur daftaar ke liye taiyaar ho gaye.
Ghar se nikalte waqt unhone apni soi hui patni ke maathe ko bade pyaar se chooma aur gaadi ki taraf badh gaye.
Gaadi mein baithte hi Sartaj ne apne driver ko daftaar jaane se pehle seedhe Chandan ke ghar ki taraf chalne ka hukum diya.
Chandan baba ke ghar pahunchkar Sartaj ne dekha ki haadse ke baad ab vah lagbhag 90% tak theek ho chuke hain aur bina kisi sahaare ke chal paa rahe hain.
Sartaj (Chandan ka haath pakadkar aadar se boole): "Baba, aapki sehat ab kaafi behtar lag rahi hai, mujhe kothi mein aapke sahaare ki phir se sakht zaroorat hai."
Chandan (apne maalik ko dekhkar muskuraate hue boole): "Sahab, main to khud itne lambe aaraam se oob chuka hoon, par yeh bataiye ki meri jagah jo naya ladka Sher aaya tha, vah kaisa kaam kar raha hai?"
Sartaj (sahaj andaaz mein jawaab dete hue boole): "Kaam-kaaj to vah theek hi kar raha hai baba, usmein koi kami nahi hai."
Sartaj (man hi man khatakte hue सोचते hain): "Pata nahi kyon, par us insaan par mera dil kabhi poora bharosa nahi kar paata... uski neeyat mujhe theek nahi lagti."
Sartaj ne apne is shak aur tajurbe ko filhaal apne tak hi seemit rakha aur Chandan baba se zaahir nahi hone diya.
Sartaj (Chandan baba ke kandhe par haath rakhte hue behad gambheerata se boole): "Baba, asal mein mujhe aapki madad isliye chahiye taaki hum samajh saken ki Meera ko andar hi andar kya cheez pareshan kar rahi hai."
Chandan (chinta se chaunkte hue boole): "Bitiya rani pareshani mein hain? Kya hua hai unhen sahab?"
Sartaj (dheemi aur sakht aawaz mein hidaayat dete hue boole): "Yeh baat sirf aapke aur mere beech rahni chahiye baba, iske baare mein kisi teesre ko kaanon-kaan khabar nahi honi chahiye."
Chandan (apni chhati par haath rakhkar wafaadari se boole): "Aap befikr rahiye sahab, meri bitiya ki salaamati aur aapki baat ki laaj mere liye sabse uupar hai, main aaj hi kothi laut raha hoon."
Sartaj (raahat ki gahri saans lete hue boole): "Bas yahi bharosa mujhe aap par tha baba, aapke wahan rahne se Meera ko bahut himmat milegi aur mujhe bhi tasallii rahegi."
Sartaj (gaadi ke darwaze ke paas khade hokar Chandan baba se boole): "Baba, abhi haal hi mein Sher ne apni jaan par khelkar hamari bitiya Jyoti ko ek bahut bade haadse se bachaaya tha, aur us chakkar mein vah khud bhi kaafi zakhmi ho gaya tha."
Sartaj (man hi man gahri soch mein doobte hue): "Kahne ko to usne meri bachhi ki jaan bachaayi hai, lekin mera policia dimaag yeh maanne ko taiyaar nahi hai... mujhe shak hai ki is sabke peeche uska koi bahut bada aur ganda maqsad chhipa hai."
Sartaj (apne chehre ke bhaavon ko sambhaalate hue): "Isliye baba, aap shaam tak poori tarah taiyaar rahiyoga, main shaam ko daftaar se laut-te waqt aapko gaadi mein yahin se pick kar loonga."
Chandan baba (ishaare mein sir hilaate hue boole): "Theek hai sahab, main shaam ko apna saamaan lekar aapka intezaar karunga."
Itna kahkar Sartaj apni gaadi mein baithe aur seedhe apne daftaar ki taraf rawana ho gaye.
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Subah uthte hi Sher ke dimaag mein vicharon ka jaal bunna shuru ho gaya tha. Vah apni khatiya par baitha moonchhon par taav dete hue aage ki chaalen sochne laga.
Sher (man hi man badbadaaya): "Kal to sachmuch maza hi aa gaya... kya ragda tha Meera madam ke jism ko! Kitni bholi hain Meera memsahib, bas Jyoti ki kasam ke dar se dheere-dheere sab kuch saumptee ja rahi hain."
Sher (ek kaamuk muskaan ke saath): "Kitna maza aata hai unkon is tarah toot-te hue dekhne mein... kya aahen nikal rahi theen unke muunh se, jab vah apne raseele mammon ko meri chhati par ragad rahi theen!"
Sher (aankhon mein vahshi chamak laate hue sochta hai): "Itni gori, ek IPS officer ki beewi ko aise nanga karke zaleel karne ka apna alag hi maza hai... Shankar bhai ki aatma ko bhi ab jaakar shaanti mil rahi hogi ki main unki maut ka badla kis tarah le raha hoon."
Sher (apni daadhi sahlaate hue): "Jyoti ki kasam ka idea to bahut zabardast tha, lekin... agar kisi din Meera memsahib ne kasam maanne se hi saaf inkaar kar diya to?"
Sher (man hi man badbadaaya): "Agar us memsahib ne kasam tootne ka dil bana hi liya, to phir main kya ukhaad loonga?"
Sher (sochne laga): "Khaali dhamkiyon ke dam par kab tak kaam chalega... agar usne seedhe muunh manna kar diya aur mujhe apne jism ke kareeb bhatakne bhi na diya, to mere haath kya aayega?"
Sher (chinta mein apni thodhi khujaate hue boola): "Sach to yeh hai ki main sachmuch Jyoti bachhi ka baal bhi baanka nahi kar sakta... sahab security officer officer hain, zara si bhi oonch-neech hui to meri khaal kheenchkar bhoosa bhar denge."
Sher (ek khaufnaak aur kaamuk muskaan ke saath badbadaaya): "Nahi! Mujhe us raseele badan ko har haal mein haasil karna hi hoga... sirf kasam ka khauf kaafi nahi hai."
Sher (apni mutthi kaste hue thaan leta hai): "Mujhe Meera par apni pakad aur majboot karni hogi, koi aisa thos saboot ya phanda banaana hoga jisse vah chaahkar bhi is kasam se peeche na hat sake."
Tabhi Sher ke dimaag mein us tantrik baba ka khayaal aaya, jo kaale jaadu ka khatarnaak khel khela karta tha.
Sher (apni aankhon mein chamak laate hue sochne laga): "Haan! Vah tantrik baba... jo kisi bhi insaan ko ghar baithe beemaar aur laachar kar diya karta tha!"
Sher (ateet ka nazaara yaad karte hue): "Maine apni aankhon se dekha tha ki kaise vah us insaan ke naam ki kapde ki gudiya banaata tha, aur jaise hi us gudiya par suiyan chubhota ya waar karta, wahan door baitha insaan tadapne aur beemaar padne lagta tha."
Sher (apni daadhi par haath pheerta hai): "Jyoti bachhi ke liye mujhe bhi bilkul waisa hi kuch intezaam karna hoga!"
Sher (man hi man badbadaaya): "Agar Meera memsahib ne meri baat maanne se inkaar kiya ya kasam toodi, to main tantrik ke us kaale jaadu se Jyoti ko beemaar kar doonga..."
Sher (apni mutthi bheenchte hue): "Jab bachhi bina kisi wajah ke bistar par tadapegi aur doctor bhi kuch samajh nahi paayenge, tab Meera ko yakeen ho jaayega ki yeh sab uski kasam toodna ka hi nateeja hai!"
Sher (kaamuk muskaan ke saath badbadaaya): "Phir to memsahib apni bachhi ki jaan bachaane ke liye rooti-bilakhti hui khud mere kadmon mein giregi... aur apne is raseele jism ko hamesha ke liye mere hawaale kar degi!"
Sher bina waqt ganwaaye turant us tantrik baba ko phone milaata hai.
Sher (aawaz mein utaawali aur laalach laate hue boola): "Pranaam baba, mujhe ek bahut zaroori kaam ke liye aapki madad chahiye."
Tantrik baba (gambheer aur bhaari aawaz mein): "Haan bool Sher, kya baat hai?"
Sher tantrik baba ko vistaar se bataata hai ki kaise vah apna badla leene ke liye ek insaan ko apne ishaaron par naachaana chahta hai, aur isliye usse us par kaala jaadu karwaane ke liye tantrik baba ki madad chahiye.
Tantrik baba (gambheerata se): "Yeh koi badi baat nahi hai, main yeh kaam kar doonga... lekin yeh vidya tabhi kaam karegi, jab too mujhe us insaan ke shareer ka thoda sa baal laakar dega."
Tantrik baba (tareeka samjhaate hue boole): "Chahe too uski kanghi se gire hue baal utha le ya phir uske shareer se chupchaap thode se baal kaat le, par baal hona bahut zaroori hai! Aur haan... is tantra-saadhna ka kharch poore ek laakh rupaye lagega."
Sher bina kisi hichkichaahat ke tantrik baba ki shart aur ek laakh rupaye ki fees par turant raazi ho gaya.
Tantrik baba (samay ka hisaab dete hue boole): "Jaise hi too mujhe baal laakar dega, uske theek do din baad main us gudiya ko siddh karke taiyaar kar doonga."
Sher (ek shaatir muskaan ke saath badbadaaya): "Bas do din... theek hai baba, main aaj hi us bachhi ke baal ka intezaam karke aapke paas pahunchta hoon."
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Note : in first chapter or second chapter Chandan was around 40 to 50 age . now his role is developing in next few chapter and i needed his age to adjust to 58 to 60 . Will fix eralier chapters once i get time .
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Zabardast update...meera ko wash me kar ke usko gande task karwao public place me
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Awesome update.. what a twist…
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खौफ और साजिश—8
आज दोपहर कोठी में एक अजीब सा सन्नाटा था। सरताज सुबह ही अपनी ड्यूटी पर निकल चुके थे और ज्योति भी अपनी कॉलेज बस से कॉलेज जा चुकी थी। मीरा घर में अकेली थी।
आज उसने हल्के नीले रंग की एक खूबसूरत जॉर्जेट की साड़ी पहनी थी, जिसके साथ गहरे नीले रंग का स्लीवलेस ब्लाउज उसकी गोरी बाहों को पूरी तरह बेपर्दा कर रहा था। वह रसोई में खड़ी कुछ काम कर रही थी कि तभी दरवाजे पर आहट हुई।
मीरा ने चौंककर पीछे देखा। शेर रसोई के दरवाजे पर खड़ा था, उसका एक पैर अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं था, इसलिए वह हल्का सा लंगड़ाकर चल रहा था।
उसे इस तरह रसोई में दाखिल होते देख मीरा के भीतर का खौफ जाग उठा। उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा।
मीरा (हाथ में पकड़े बर्तन को कसकर भींचते हुए, घबराहट छुपाकर): "शेर?! तुम... तुम यहाँ रसोई में क्यों आए? तुम्हारी चोटें अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई हैं, तुम्हें अपने क्वार्टर में आराम करने को कहा था ना? जाओ और आराम करो।"
शेर (लंगड़ाते हुए दो कदम और आगे बढ़ाते हुए, चेहरे पर बेहद मासूम मुस्कान लाकर): "अरे मेमसाब... आप तो बेकार ही गुस्सा हो रही हैं। अकेले क्वार्टर की उस चारपाई पर लेटे-लेटे मेरा दम घुट रहा था। बहुत बोर हो रहा था। तो मैंने सोचा कि क्यों न आकर आपसे दो पल बात ही कर लूँ... दिल बहल जाएगा। आखिर मालिक और बिटिया भी तो घर पर नहीं हैं।"
शेर की आवाज़ भले ही बहुत शांत और सामान्य थी, लेकिन जब उसने 'मालिक और बिटिया घर पर नहीं हैं' वाले शब्दों पर ज़ोर दिया, तो मीरा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
शेर की नज़रें अब धीरे से ऊपर उठीं और मीरा के उस स्लीवलेस ब्लाउज से झांकती गोरी बाहों और उसकी नीली साड़ी के पल्लू से ढके वक्षस्थल पर जाकर ठहर गईं।
उसकी आँखों में वही पुरानी, भूखी चमक धीरे-धीरे वापस लौट रही थी।
उसने अपनी आँखें मीरा की नंगी, गोरी बाहों से सरकाते हुए उसकी कमर के उस हिस्से पर टिका दीं जहाँ से साड़ी थोड़ी खिसकी हुई थी।
वह धीरे से आगे बढ़ा और रसोई के कोने में रखी एक कुर्सी को खींचकर उस पर बैठ गया। बैठते ही उसकी नज़रों ने मीरा के पूरे बदन का एक्स-रे करना शुरू कर दिया।
शेर (कुर्सी पर आराम से टेक लगाते हुए, अपनी आँखें मीरा के वक्षस्थल पर गड़ाकर बेहद धीमी और रसभरी आवाज़ में): "मेमसाब... सच कहें तो आज आप इस नीली साड़ी और बिना बाज़ू वाले ब्लाउज में बहुत खूबसूरत लग रही हैं। कसम से... ऐसा लग रहा है जैसे टीवी में किसी बड़ी मॉडल को देख रहा हूँ। इस नीले रंग में आपकी ये गोरी त्वचा चमक रही है।"
मीरा (शेर की इन नंगी तारीफों से असहज होकर, अपने पल्लू को खींचकर छाती पर और कसते हुए कांपती आवाज़ में): "शेर! प्लीज... भगवान के लिए ऐसी बातें मत बोलो। अपनी जुबान को लगाम दो। तुम भूल रहे हो कि तुम किससे और कहाँ खड़े होकर बात कर रहे हो।"
शेर (एक कुटिल मुस्कान के साथ): "क्यों मेमसाब? भला एक खूबसूरत चीज़ की तारीफ करना कोई गुनाह है क्या? जो सामने दिख रहा है, इस शेर की आँखें तो बस उसे सराह रही हैं। इसमें इतना गुस्सा होने वाली क्या बात है?"
मीरा (रसोई के प्लेटफॉर्म का सहारा लेकर खुद को संभालते हुए, सख्त लहजे में): "नहीं शेर, तुम तारीफ नहीं कर रहे, तुम्हारी नीयत खराब हो रही है। और तुम अपनी हदें पार कर रहे हो। हमारे बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं है जो तुम्हारी इन बेहूदा और गंदी बातों को जायज़ ठहरा सके।"
शेर (मीरा की बात सुनते ही अचानक ठहाका लगाकर हंसने लगा): "रिश्ता नहीं है मेमसाब?"
शेर (कुर्सी से थोड़ा आगे झुककर अपनी आवाज़ को फुसफुसाहट में तब्दील करता है): "अरे... रिश्ता तो कल ही बन गया था जब आपके ये दोनों मम्मे मेरी छाती पर रगड़ खा रहे थे।"
शेर (अपनी छाती पर हाथ फेरते हुए कामुक मुस्कान के साथ बोला): "मुझे तो उनकी वो नरमी अभी तक अपने बदन पर महसूस हो रही है।"
शेर (अपनी आँखें मूँदकर उस मंज़र को याद करते हुए फुसफुसाया): "क्या लाजवाब नजारा था वो..."
शेर (मीरा के जिस्म को भूखी नज़रों से घूरते हुए आगे कहता है): "...आपके वे नंगे मम्मे, उन पर चमकते वो गुलाबी टिप्स और आपकी वो मदहोश कर देने वाली आहें!"
कल का वह शर्मनाक मंज़र याद आते ही मीरा का पूरा चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो गया।
रसोई के शांत माहौल में शेर की आवाज़ खंजर की तरह उसकी रूह में उतर रही थी। शेर कुर्सी पर पूरा वजन डालकर पीछे की तरफ झुका, उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर बांध लिए और बड़ी ही धूर्तता और अधिकार भरी नज़रों से मीरा के कांपते हुए बदन को निहारने लगा।
शेर (कुर्सी पर बैठे-बैठे ही, एक मुस्कान के साथ): "मेमसाब, जब आप इस नीली साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज में बिल्कुल किसी मॉडल जैसी लग ही रही हैं..."
शेर (कामुक लहजे में आगे कहता है): "...तो इस गरीब नौकर की भी एक छोटी सी इच्छा पूरी कर दीजिए। मैं चाहता हूँ कि आप अभी मेरे लिए एक मॉडल की तरह कैटवॉक करके दिखाएं।"
मीरा (दहशत से अपनी आँखें फैलाते हुए, ज़ोर-ज़ोर से सिर हिलाने लगी): "नहीं... नहीं शेर! यह... यह मुझसे बिल्कुल नहीं होगा!"
शेर (अपनी नज़रें उसकी पतली कमर पर टिकाते हुए फुसफुसाया): "अपनी कमर को थोड़ा मटकाते हुए ज़रा चल कर दिखाइए तो..."
मीरा (कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ते हुए बोली): "तुम... तुम पूरी तरह पागल हो गए हो क्या?"
मीरा (स्वाभिमान से चिल्लाई): "मैं इस घर की इज़्ज़तदार बहू हूँ, किसी तमाशे की औरत नहीं जो तुम्हारे सामने यहाँ इस तरह नाचूँ या वॉक करके दिखाऊँ!"
शेर (उसकी बात सुनते ही अपने चेहरे के हाव-भाव एकदम सख्त कर लेता है): "नहीं होगा?! तो इसका मतलब सीधे-सीधे यही हुआ न मीरा मेमसाब... कि आप अपनी उस पवित्र कसम से मुकर रही हैं?"
'कसम' का नाम सुनते ही मीरा के जिस्म का सारा खून जैसे एक पल में जम गया।
मीरा (अपनी छाती पर हाथ रखते हुए): "मेरी मासूम बेटी को इस गंदे खेल के बीच में मत लाओ, भगवान के लिए रुक जाओ।"
शेर (उसकी आँखों में झांकते हुए कहता है): "आप अपनी ही लाडली बेटी ज्योति की जान की कसम को तोड़ रही हैं! याद है न... अगर कसम टूटी, तो उस मासूम बिटिया की जान पर क्या खौफनाक आफत आ सकती है?"
शेर : "ठीक है, मत कीजिए मेरी बात पूरी... पर फिर अपनी बिटिया के साथ आगे होने वाले किसी भी हादसे के लिए मुझे दोष मत दीजिएगा!"
ममता की बेबसी और खौफ के आगे मीरा के संस्कारी कदम आखिरकार डगमगा ही गए।
मीरा (अपनी बहती आँखों को सुखाते हुए कांपते हाथों से अपनी साड़ी का नीला पल्लू उठाती है): "ठीक है शेर... मैं करती हूँ।"
शेर (मुस्कुराते हुए): "मेमसाब, अपने इस आँसुओं से भरे उदास चेहरे को ठीक कीजिए। मुझे आपके चेहरे पर एक मॉडल जैसी कातिलाना मुस्कान चाहिए।"
शेर (हुक्म से कहता है): "उठाइए अपनी इस साड़ी का यह नीला पल्लू और इसे अपनी कमर में इस तरह खोसिए कि मुझे आपका पूरा नंगा पेट और गोरी नाभि साफ नज़र आए।"
शेर (वहशी लहजे में आगे जोड़ता है): "फिर वैसे ही कमर लचकाते और मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाकर सीधे मेरे पास आइए। याद रखिएगा मैडम, अगर आपने यह सही से नहीं किया तो आपको यह दोबारा करना पड़ेगा!"
मीरा (पल्लू को अपनी कमर में खोसते हुए अपना गोरा पेट और नाभि शेर के सामने नंगा कर देती है): उसके चेहरे पर मजबूरी का दर्द साफ छलक रहा था, पर वह अपने कांपते होंठों पर एक झूठी मुस्कान लाने की कोशिश करती है।
शेर (अपनी भूखी नज़रों से उसके नंगे पेट को ताकने लगता है): "शाबाश मेमसाब! अब ज़रा अपनी पतली कमर को लचकाते हुए, किसी मॉडल की तरह चलकर मेरे पास तक आइए।"
मीरा (धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाती है): वह अपनी कमर को हल्का सा मटकाते हुए, भारी दिल से रसोई के फर्श पर शेर की तरफ चलने लगती है।
शेर (उसकी लचकत-मटकत चाल और नंगे हुए पेट को देखकर सीटी बजाता है): "वाह मेमसाब, वाह! क्या कातिलाना चाल है, IPS साहब भी क्या याद रखेंगे कि उनकी बीवी मेरे इशारों पर कैसे ठुमके लगाती है!"
मीरा चलते-चलते शेर की कुर्सी के बिल्कुल करीब आकर रुक जाती है।
शेर : "यह हुई न बात! अब लग रही हैं आप असली मॉडल... पर इतनी दूरी क्यों मेमसाब, ज़रा और पास आइए।"
शेर (अपनी कुर्सी से धीरे-धीरे खड़ा होता है और चेहरे पर चिढ़ाने वाली मुस्कान सजाकर मीरा को सिर से पैर तक ताकता है): "वाह मेमसाब, वाह! चाल तो आपने एकदम कातिलाना दिखाई है... पर सच कहूँ तो आपकी इस वॉक में अभी वह बात नहीं आई जो मैं देखना चाहता था।"
शेर : "आपका यह महंगा पल्लू ... बीच में बार-बार आकर इस नौकर के मज़े में खलल डाल रहा है।"
इतना कहकर शेर ने अचानक उसके पल्लू को खींचा, जिससे साड़ी का पल्लू सिमटकर उसके दोनों मम्मों के बीच एक पतली सी कपड़े की पट्टी बनकर रह गया।
शर्म, अपमान और खौफ के मारे मीरा की छाती धौंकनी की तरह चलने लगी, और पल्लू के नीचे छिपे उसके दोनों मम्मे बेबसी से ऊपर-नीचे फड़कने लगे।
शेर (मीरा की तड़प का मज़ा लेते हुए उसकी आँखों में आँखें डालकर हंसता है): "अरे-अरे मेमसाब! इतनी तेज़ी से सांसें क्यों फूल रही हैं आपकी? अभी से घबरा गईं? देखिए तो, आपका यह पल्लू भी आपके उभारों के बीच खुद को छिपाने की कोशिश कर रहा है!"
शेर (अपनी उंगलियों से उसकी साड़ी के नेफे को नीचे खिसकाते हुए नीच लहजे में फुसफुसाता है): "जब साहब घर पर नहीं हैं, तो इस गोरे बदन को ऐसे कपड़े में लपेटकर छिपाने का क्या फायदा? ज़रा इसे थोड़ा और नीचे सरकने दीजिए..."
शेर ने बेदर्दी से उसकी साड़ी को नाभि के काफी नीचे तक दबा दिया, जिससे मीरा की गोरी, सुराहीदार नाभि और पूरा का पूरा नंगा पेट शेर की प्यासी नज़रों के सामने पूरी तरह नुमायाँ हो गया।
शेर (उसकी नाभि को देखकर): "अब आया न असली मज़ा मेमसाब!"
इस अपमान को मीरा अब और बर्दाश्त न कर सकी। गुस्से और आत्मसम्मान की ज्वाला में जलते हुए उसने अपना हाथ हवा में उठाया और शेर के चेहरे पर एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद करना चाहा।
लेकिन शेर ने हवा में उसके हाथ को बीच में दबोच लिया।
शेर (उसके चेहरे के बिल्कुल करीब सांसें छोड़ते हुए आगे बोला): "अगर आप यह सब नहीं करना चाहतीं, तो सीधे-सीधे कह दीजिए न कि आप अपनी बेटी ज्योति की कसम नहीं निभा सकतीं!"
शेर (उसकी कलाई पर दबाव और बढ़ाते हुए ताना कसता है): "वरना चुपचाप अपनी इस गुस्ताखी के लिए मुझसे सॉरी बोलिए, और अपने इस रसीले मुँह से कहिए कि आगे से ऐसी हिम्मत कभी नहीं करेंगी।"
जब मीरा की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। उसने मीरा की कलाई छोड़ दी और पीछे मुड़कर बाहर जाने के लिए कदम बढ़ा दिए।
शेर को इस तरह वापस लौटते देख मीरा के दिल की थम गईं। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही खौफनाक ख्याल कौंधा—कि उसकी इस हरकत से बेटी की कसम टूट रही है और ज्योति की जान खतरे में पड़ जाएगी।
मीरा (घबराहट में कांपती हुई आवाज़ में): "सॉरी... शेर, मुझे माफ कर दो!"
शेर (जाते-जाते रुका, लेकिन बिना पीछे मुड़े अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोला): "क्या कहा? ज़रा तेज़ बोलिए मेमसाब... मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।"
मीरा (अपने आँसू पोछते हुए बेबसी और अपमान की घूँट पीकर गिड़गिड़ाई): "सॉरी शेर... आगे से कभी मना नहीं करूँगी, तुम जैसा कहोगे वैसा ही करूँगी।"
शेर धीरे-धीरे वापस मीरा के पास आया और अपने हाथों को उसके भीगे हुए गालों पर रख दिया।
उसकी चौड़ी, गंदी उंगलियां मीरा के थरथराते और लाल पड़े चेहरे पर धीरे-धीरे घूमने लगीं, जैसे वह उसकी बेबसी का एक-एक पल महसूस कर रहा हो।
शेर (मीरा की आँखों में घूरते हुए मुस्कुराकर बोला): "आप रोती हुई बिल्कुल अच्छी नहीं लगतीं मेमसाब..."
इतना कहकर शेर मीरा के चेहरे के और करीब झुका और अपनी जीभ निकालकर उसके गाल पर बहते हुए गरम आँसू को चाट लिया।
शेर की इस हरकत से मीरा के मुँह से एक रुंधी हुई सिसकी निकल गई।
मीरा (मन ही मन गुस्से और घिन से जलते हुए): "जी चाहता है इस हैवान को पूरे ज़ोर से धक्का देकर दूर फेंक दूँ... अपने इस जिस्म को इसकी गंदी नीयत से बचा लूँ!"
लेकिन अगले ही पल उसकी नज़रों के सामने अपनी मासूम बेटी ज्योति का चेहरा घूम गया, और उसका उठता हुआ गुस्सा खौफ के आगे टूट कर बिखर गया।
मीरा (कांपते होंठों को भींचते हुए मन ही मन बेबसी से रो पड़ी): "नहीं मीरा... अपनी बेटी की कसम का ख्याल कर... तुझे सहना होगा।"
मीरा खामोश खड़ी रही, अपनी आँखें मूँदकर इस कड़वे अपमान का ज़हर चुपचाप पी गई।
मीरा के भीगे चेहरे को अपनी जीभ से बेशर्मी से चाटने के बाद, शेर दो कदम पीछे हटा।
उसने मीरा के चेहरे की ताकते हुए अचानक अपने हाथ से उसकी गांड पर एक थप्पड़ जड़ दिया।
शेर (थप्पड़ मारते ही मुस्कुराया): "हाँ! अब आया न चेहरे पर थोड़ा सा रंग मेमसाब..."
शेर (अपनी कुर्सी की तरफ वापस मुड़ते हुए रोबदार आवाज़ में बोला): "अब वापस उस कोने में जाइए, और फिर से कैटवॉक करके मेरे पास आइए।"
इतना कहकर वह अपनी कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठ गया।
शेर (अपनी आँखें उसकी नंगी नाभि और पतली कमर पर टिकाते हुए हुक्म देता है): "याद रहे मेमसाब, इस बार एकदम सही होना चाहिए... चेहरे पर मॉडल वाली कातिलाना मुस्कान और कमर में वही मदहोश कर देने वाली लचक होनी चाहिए।"
शेर (फुसफुसाहट के साथ चेतावनी देता है): "ज़रा सा भी ढीलापन दिखा, तो समझ लीजिएगा कि आपको यह बार-बार दोहराना पड़ेगा!"
मीरा इस असहनीय अपमान को जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थी।
मीरा (मन ही मन अपने आँसू पीते हुए बेबसी से सोचती है): "मुझे यह घिनौना खेल खत्म करना ही होगा... ज्योति की खातिर मुझे इस की हर बात माननी होगी।"
उसने अपनी बहती आँखों को संभाला और अपने कांपते, होंठों पर एक बनावटी, कातिलाना मुस्कान बिखेर दी।
शेर (उसकी इस कातिलाना चाल को देखकर अपनी उंगलियों से एक ज़ोरदार सीटी बजाता है): "वाह मेमसाब, वाह! क्या बात है! अब आया न असली नज़ारा!"
शेर (कुर्सी पर बैठकर अपनी जाँघ ठोकते हुए चीखकर ताना मारता है): "क्या लाजवाब मम्मे हैं आपके मेमसाब... इस पतली सी पट्टी में दबाकर रखे हैं, फिर भी कैसे तड़प रहे हैं!"
शेर (अपनी भूखी नज़रों को उसकी नंगी कमर पर गड़ाते हुए चिढ़ाता है): "और वाह! क्या चिकना और गोरा पेट है आपका... साहब तो रोज़ देखते होंगे, पर आज तो इस गरीब नौकर की आँखें ठंडी हो गईं!"
शेर (गहरी सुराहीदार नाभि को घूरते हुए ): "और इस नाभि का तो पूछो ही मत मेमसाब... बिल्कुल कयामत ढा रही है! ज़रा और लचकिए, थोड़ा और मटकाकर पास आइए!"
मीरा अपने नंगे पेट और गोरी नाभि को दिखाती हुई, अपनी कमर को धीरे-धीरे लचकाकर रसोई के फर्श पर आगे बढ़ने लगी।
उसके हर कदम के साथ उसके मम्मे पल्लू के बीच हिल रहे थे, और चेहरे पर एक झूठी, कामुक मुस्कान सजी हुई थी।
शेर (उसकी चाल और खूबसूरती को नज़रों से ताकते हुए सीटी बजाता है): "लाजवाब मेमसाब! बस ऐसे ही... धीरे-धीरे लचकते हुए सीधे करीब चली आइए।"
जैसे-जैसे मीरा अपनी कमर लचकाते हुए शेर की तरफ बढ़ रही थी, अचानक उसे अपनी टांगों के बीच एक अजीब सी गर्माहट और गीलापन महसूस हुआ।
मीरा (मन ही मन गहरे सदमे से सिहर उठी): "यह... यह मुझे क्या हो रहा है? नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है?!"
उसकी आत्मा इस घिनौने अहसास से कांप उठी।
मीरा (अपनी आँखें भींचते हुए बेबसी से बड़बड़ाई): "यह... यह बिल्कुल भी आनंददायक नहीं हो सकता! मैं ऐसी औरत नहीं हूँ... मैं एक इज़्ज़तदार माँ हूँ, एक अफसर की बीवी हूँ! यह मेरा जिस्म मेरे साथ कैसा गंदा धोखा कर रहा है?"
शेर (उसकी चाल में आई हल्की सी रुकावट मुस्कान के साथ चिढ़ाता है): "क्या हुआ मेमसाब? कदम क्यों रुक गए? चेहरे की मुस्कान कहाँ गायब हो गई?"
शेर (उसकी थरथराती टांगों और नंगी नाभि को भूखी नज़रों से ताकते हुए): "ज़रा और पास आइए... आपकी देह का यह खिंचाव बता रहा है कि यह नौकर सिर्फ हुक्म ही नहीं चला रहा, बल्कि आपके जिस्म के सुप्त शोले भी भड़का रहा है!"
शेर वहीं बैठा रहा, जैसे ही मीरा उसके ठीक सामने आकर खड़ी हुई, शेर ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और उसकी पतली कमर को दोनों तरफ से जकड़कर अपनी फैली हुई जाँघों के ठीक बीच में खींच लिया।
अब मीरा का बदन शेर के घुटनों से पूरी तरह सट गया, और वह चाहकर भी पीछे नहीं हट सकती थी।
कुर्सी पर नीचे बैठे होने के कारण शेर की आँखें सबसे पहले मीरा के पेट के उस नंगे हिस्से पर जाकर टिक गईं, जो साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज के बीच से साफ झांक रहा था।
शेर (मीरा के गोरे पेट पर अपनी भूखी नज़रें टिकाते हुए): "वाह मेमसाब! दूर से तो सिर्फ लचक दिख रही थी, पर पास आकर तो आपका यह गोरा पेट चमक रहा है।"
शेर की गंदी निगाहें धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ीं और मीरा के भरे-पूरे वक्षस्थल पर जाकर ठहर गईं। खौफ, तनाव और तेज़ सांसों के चलने के कारण मीरा की छाती बहुत तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
शेर (मीरा की तेज़ चलती सांसों की धड़कन को इतने करीब से महसूस करते हुए, अपनी जीभ को होंठों पर फेरकर): "आह्ह् मेमसाब... इतनी तेज़ सांसें? इस नौकर के इतने करीब आते ही आपका यह सीना कैसे फड़कने लगा है!"
शेर (उसकी आँखों में झांककर कमीनेपन से मुस्कुराता है): "बताइए तो सही मेमसाब... यह बदन इतना कांप क्यों रहा है? यह डर के मारे थरथरा रहा है... या फिर इस गरीब नौकर के छुअन का मज़ा आने लगा है?"
मीरा (डर के मारे अपनी आँखें बंद करने की कोशिश करते हुए, सिसककर बोली): "शेर... प्लीज... अब और नहीं... तुमने कहा था सिर्फ पास आने के लिए... मुझे जाने दो..."
शेर ने उसकी गुहार पर कोई ध्यान नहीं दिया।
मीरा के पेट के ठीक बीचों-बीच स्थित उसकी गहरी और खूबसूरत नाभि पूरी तरह शेर की नज़रों के सामने नंगी हो गई। गोरी त्वचा के बीच वह नाभि किसी गहरे राज़ की तरह दिख रही थी, जिस पर शेर का पूरा ध्यान टिक गया और उसकी साँसें और भारी होने लगीं।
शेर (अपनी उंगली को मीरा की नाभि के ठीक पास की त्वचा पर हल्के से सहलाते हुए, फुसफुसाहट में बोला): "देख रही हो मेमसाब? तुम्हारी यह नाभि... कसम से किसी खजाने से कम नहीं है!"
शेर (उसकी नाभि में उंगली गड़ाने करते हुए): "साहब तो अपनी ड्यूटी में व्यस्त रहते होंगे, पर इस नाभि की गहराई और खूबसूरती का कद्रदान तो शेर बना है!"
शेर की उंगली जब मीरा की नाज़ुक नाभि के पास रेंग रही थी, तो मीरा का पूरा बदन ख़ौफ़ और वासना के अनचाहे अहसास से थर-थर काँप रहा था।
शेर ने कुछ पल उसकी नाभि को अपनी नज़रों से घूरा, और फिर अचानक अपना सिर ऊपर उठाकर सीधे मीरा की डबडबाई आँखों में देखा।
शेर (मीरा की कमर पर अपनी पकड़ को और मज़बूत करते हुए, बेहद धीमी, भारी और हुक्म देती आवाज़ में): "मेमसाब, मैं चाहता हूँ कि आप खुद अपने इन गोरे हाथों को आगे बढ़ाएं, और अपनी इस नीली साड़ी के पल्लू को खुद अपने काँधे से नीचे सरका दें। "
मीरा (सिसकते हुए, अपने दोनों हाथों को अपनी छाती पर): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा मत करो... मैं मर जाऊँगी... प्लीज मुझ पर रहम करो..."
शेर (चेहरे पर मुस्कान लाकर, अपनी आवाज़ को और तीखा करते हुए): "चूँ भी मत करना मेमसाब! याद रखो, ज्योति बिटिया।"
शेर (उसकी थरथराती नाभि पर चुटकी काटते हुए चिढ़ाता है): "मेरी बात ध्यान से सुनो... पहले अपना पल्लू नीचे गिराओ, फिर दो कदम और आगे बढ़कर अपने इस गोरे, नंगे पेट को सीधे मेरे चेहरे और मेरे होठों से ले जाकर रगड़ो।"
मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बहकर उसकी गर्दन पर गिर रही थी। उसकी ममता शेर की धमकी के आगे पूरी तरह घुटने टेक चुकी थी।
लेकिन इसी खौफ और लाचारी के बीच, मीरा को अपने जिस्म में एक खौफनाक आग सुलगती हुई महसूस हुई।
मीरा (मन ही मन रोते हुए खुद पर लानत भेजती है): "हे भगवान, यह मुझे क्या हो रहा है? मैं इस हैवान से नफरत करती हूँ... फिर भी मेरा जिस्म इसके नीच इरादों के आगे ऐसे घुटने क्यों टेक रहा है? यह कैसा पाप है जो मेरा बदन इस यातना में भी मज़ा ढूंढ रहा है?"
शेर ने मीरा के चेहरे पर छाए इस दोहरे खिंचाव को भांप लिया और वासना से हांफते हुए उसके और करीब आया।
शेर (मीरा के कांपते होंठों को ताकते हुए फुसफुसाहट में बोला): "और हाँ मेमसाब, सिर्फ पेट रगड़ने से काम नहीं चलेगा। जब आपका पेट मेरे मुँह के सामने होगा, तो आप खुद अपनी ज़ुबान से मुझसे कहेंगी..."
शेर (उसकी नंगी नाभि पर उंगली से गोल घेरा बनाते हुए हुक्म देता है): "कहो कि 'शेर, अपनी जीभ बाहर निकालो... और चाट जाओ मेरे इस नंगे पेट को... अपनी प्यास बुझा लो।' चलो मेमसाब, अपनी इस रेशमी आवाज़ में ये शब्द बोलो!"
मीरा की ममता पूरी तरह बेबस हो चुकी थी। अपनी मासूम बेटी ज्योति को सलामत देखने के लिए उसने अपनी बची-कुची मर्यादा को भी कुर्बान कर दिया।
मीरा ने कांपते हाथों से अपनी नीली साड़ी के पल्लू को पकड़ा और भारी दिल से उसे अपने कंधे से नीचे ढलका दिया।
रेशमी कपड़ा सरककर उसके पैरों में जा गिरा, जिससे उसके स्लीवलेस ब्लाउज़ में जकड़े भरे-पूरे मम्मे और नंगा हुआ पेट शेर की निगाहों के सामने था।
मीरा (अपनी बहती आँखों को मूँदकर, कांपती और रुंधी हुई आवाज़ में बोली): "शेर... अपनी... अपनी जीभ बाहर निकालो... और चाट जाओ मेरे इस नंगे पेट को... अपनी प्यास बुझा लो..."
शेर के चेहरे पर जीत की एक मुस्कान तैर गई। उसने अपनी गर्म जीभ बाहर निकाली। मीरा ने बेबसी में एक कदम आगे बढ़ाकर अपने गोरे, सुगठित और नंगे पेट को शेर के चेहरे और होठों से ले जाकर रगड़ दिया।
शेर ने अपनी गीली जीभ मीरा के चिकने पेट पर फेरना शुरू कर दिया। वह उसके गोरे पेट को बुरी तरह चाटने लगा और उसकी सुराहीदार नाभि को अपने होठों में भरकर ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा।
मीरा (पेट पर शेर की गर्म और गीली जीभ का स्पर्श महसूस होते ही सिहर उठी): "आह्ह्... उफ़्फ़... श्श्श्..."
जैसे ही शेर ने उसकी नाभि को अपने मुँह में खींचकर चूसना शुरू किया, मीरा के जिस्म में बिजली की एक लहर दौड़ गई। एक तरफ जहाँ उसकी आत्मा इस घिनौने काम से घृणा कर रही थी और गिल्ट में जल रही थी, वहीं दूसरी तरफ उसका बेकाबू बदन शेर की इस छुअन से आनंद की चरम सीमाओं को छूने लगा।
मीरा (मन ही मन रोते हुए खुद को कोसने लगी): "हे ईश्वर! मुझे उठा क्यों नहीं लेते? यह हैवान मेरी आबरू की धज्जियां उड़ा रहा है... और मेरा नीच बदन इस ज़िल्लत में भी प्यासा होकर तड़प रहा है! मैं अपनी ही नज़रों में कितनी गिर चुकी हूँ..."
लेकिन बदन का रस और उत्तेजना इतनी हावी हो चुकी थी कि मीरा की सिसकियां धीरे-धीरे कामुक आहाटों में बदलने लगीं।
मीरा (शेर के सिर को बेबसी में थामते हुए, अपनी सांसों को रोक न सकी): "आह्ह्... श्श्श्... शेर... उफ़्फ़... यह तुम... क्या कर रहे हो... आह्ह्..."
मीरा के मुँह से निकली उस हल्की सी आह को शेर के कानों ने तुरंत पकड़ लिया। उसकी आँखों में जीत की चमक कौंध गई। उसने अपना मुँह मीरा के पेट से थोड़ा सा हटाया, लेकिन अपनी दोनों हथेलियों से उसकी पतली कमर को और कसकर अपनी जाँघों के बीच भींच लिया।
उसने नीचे से ऊपर की तरफ मीरा के लाल और आंसुओं से भीगे चेहरे को देखा।
शेर (कामुक हँसी हंसते हुए, अपनी लार से सने होठों को जीभ से चाटकर): "अरे... अरे मेमसाब! यह क्या? आपके मुँह से ये कैसी आवाजें निकल रही हैं? कसम से... ऐसा लग रहा है कि मालकिन को इस सेवा में मज़ा आने लगा है।"
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शेर (उसकी थरथराती नाभि पर हाथ फेरते हुए): "मुँह से तो बड़ा मना कर रही थीं, पर आपका यह गरम बदन तो कुछ और ही गवाही दे रहा है! बदन की यह आग छुपाए नहीं छुपती मेमसाब..."
मीरा (घबराहट और शर्मिंदगी से अपनी आँखें भींचते हुए, हांफते स्वर में): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा मत बोलो... मुझे छोड़ दो... बस करो..."
मीरा (मन ही मन आत्मा के गिल्ट और नफरत में जलते हुए सोचती है): "हे ईश्वर, यह हैवान क्या कह रहा है? क्या सच में मेरा बदन इस ज़िल्लत में पिघल रहा है? नहीं... मैं ऐसी औरत नहीं हूँ! मैं एक इज़्ज़तदार माँ हूँ, सरताज की वफादार पत्नी हूँ... मुझे इस घिनौने अहसास से बचा लो!"
शेर (उंगली से मीरा की नाभि के पास लगी अपनी लार को फैलाते हुए, हुक्म देती आवाज़ में): "मेमसाब! खेल तो अभी शुरू हुआ है। जैसे पहले बोला था, वैसे ही अब बोलती रहो।"
शेर (उसकी कमर में अपनी उंगलियां गड़ाते हुए मुस्कान के साथ बोला): "अपनी इस मदहोश आवाज़ में मुझसे खुद कहो... मुझसे पूछो कि मैं तुम्हारे इस गोरे, नंगे पेट का और क्या हाल करूँ? बोलो मेमसाब, जब तक तुम खुद अपनी ज़ुबान से नहीं कहोगी, यह शेर आगे नहीं बढ़ेगा। बोलो कि मैं इस पेट का क्या हाल करूँ?!"
मीरा पूरी तरह मौन हो चुकी थी। अपमान की इतनी गहरी खाई में वह गिर चुकी थी कि उसकी जुबान ने उसका साथ देना बंद कर दिया था।
लेकिन शेर को उसका यह मौन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था। वह मीरा के भीतर की मालकिन को पूरी तरह कुचलकर उसे अपने इशारों पर नाचने वाली एक बेबस मूरत बना देना चाहता था।
जब मीरा ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, तो शेर के चेहरे पर गुस्सा उभर आया। उसने अपना मुँह आगे बढ़ाया और मीरा की नाभि के ठीक पास की कोमल त्वचा को अपने दाँतों के बीच भींचकर एक ज़ोरदार तीखा कट मार दिया।
मीरा (दर्द से तड़प उठती है, उसकी चीख रसोई की दीवारों से टकराती है): "आह्ह्ह! शेर... मर गई... छोड़ो... प्लीज छोड़ो!"
दर्द की एक तेज़ लहर मीरा के पूरे बदन में दौड़ गई। शेर ने दाँत तब तक नहीं हटाए जब तक मीरा के जिस्म पर उसके तीखे दाँतों के गहरे लाल निशान नहीं उभरा आए। दर्द और अपनी बेटी की सलामती का खौफ इस कदर हावी हुआ कि मीरा का बचा-कुचा हौसला भी पूरी तरह टूट गया।
वह पूरी तरह टूट चुकी थी। उसने रोते और सिसकते हुए आखिरकार अपनी ज़ुबान खोली और वही शब्द कहे जो वह शैतान सुनना चाहता था।
मीरा (अत्यधिक दर्द, सिसकियों और बेबसी के चरम पर थरथराते हुए): "हा... हाँ शेर... और... और चूसो... मेरे... मेरे इस पूरे पेट को... अपनी लार से गीला कर दो..."
इन शब्दों के निकलते ही शेर ने अपनी जीभ बाहर निकाली और जहाँ उसने काटा था, उस ज़ख्म और लाल निशान पर अपनी गर्म, गीली जीभ फेरना शुरू कर दिया।
जैसे ही शेर की जीभ ने उस कटे हुए ज़ख्म को चाटा, मीरा का पूरा वजूद कांप उठा। कटे हुए स्थान पर जलन और जीभ की सहलाती गर्माहट के संगम ने मीरा की योनि में एक भयानक, बिजली जैसा करंट दौड़ा दिया।
मीरा (अचानक आए उस तीखे झटके से आँखें फटी की फटी रह गईं, उसके मुँह से बेकाबू आह निकल गई): "आअाह्हह... उफ़्फ़... श्श्श्... यह... यह क्या है..."
शेर (उसके पेट पर जीभ रगड़ते हुए): "वाह मेमसाब... यही आवाज़ तो सुननी थी मुझे!"
सरताज ने आज तक मीरा को कभी रत्ती भर भी दर्द नहीं दिया था। उनका प्यार हमेशा धीमा, नाज़ुक और सम्मान से भरा होता था।
मीरा ने अपनी पूरी ज़िंदगी में दर्द और उत्तेजना के इस खौफनाक मेल का अहसास कभी नहीं किया था—जहाँ ऊपर तीखा दर्द जल रहा था, वहीं नीचे उसकी योनि कामुक रस से गीली होकर प्यास से थिरकने लगी थी।
मीरा (मन ही मन गहराते गिल्ट में तड़पते हुए खुद को कोसने लगी): "हे भगवान! यह कैसा पाप हो रहा है मुझसे? सरताज ने तो मुझे हमेशा फूलों की तरह रखा... और यह नीच हैवान मुझे दर्द दे रहा है, मुझे नोच रहा है... फिर भी मेरी योनि में यह कैसा ज़हरीला आनंद फूट रहा है? मेरा बदन इतना नीच कैसे हो सकता है?"
मीरा (शेर के बालों में अनजाने में उंगलियां फंसाते हुए, दर्द और बेकाबू मजे की दोहरी आग में सिसकने लगी): "आह्ह्... शेर... उफ़्फ़... मत चाटो वहाँ... आह्ह्... मर जाऊँगी... श्श्श्..."
शेर (उसके पेट पर जीभ रगड़ते हुए, उसकी थरथराती जाँघों को भांपकर ठहाका लगाता है): "वाह मेमसाब! आपके पेट का यह ज़ख्म तो आपकी जवानी की सबसे मीठी आवाज़ें बाहर निकाल रहा है!"
उसका एक हाथ मीरा की नाज़ुक कमर को जकड़े हुए था, तो दूसरा हाथ उसकी जाँघों के पास हरकत करने लगा।
शेर ने नीचे झुककर मीरा की नीली साड़ी के घेरे को सीधे उसकी जाँघों तक ऊपर की तरफ खींच दिया। साड़ी के सरकते ही मीरा की गोरी, मखमली टाँगें पूरी तरह नंगी हो गईं।
शेर की आँखें फटी की फटी रह गईं। इतनी सुंदर, इतनी बेदाग और चिकनी टाँगें देखकर उसके मुँह में पानी आ गया। शेर ने तुरंत अपने दोनों पैरों को आगे बढ़ाया और मीरा की उन काँपती हुई नंगी टाँगों को अपनी जाँघों के बीच फँसा लिया कि अब उसका एक इंच भी हिल पाना नामुमकिन हो गया।
इस नए और गहरे शारीरिक हमले से मीरा पूरी तरह शेर के शिकंजे में कैद हो चुकी थी। ऊपर से पल्लू हटा हुआ था और नीचे से साड़ी पूरी तरह खिंची हुई थी। शेर ने एक बार फिर उसकी डरी हुई आँखों में देखा और अपनी अगली माँग उसके सामने रख दी।
शेर (कामुक उन्माद में हाँफते हुए, मीरा की नंगी टाँगों को दबाकर): "वाह मेमसाब, वाह! इतनी चिकनी टाँगें आज तक तो सिर्फ फिल्मों में ही देखी थीं। अब आ रहा है असली मज़ा!"
शेर (उसकी कमर में उंगलियाँ गड़ाते हुए, मुस्कान के साथ हुक्म देता है): "अब ज़रा अपने इन गोरे हाथों से मेरे दोनों हाथों को पकड़िए... और धीरे-धीरे उन्हें ऊपर ले जाकर सीधे अपने इन सुडौल मम्मों पर रख दीजिए। और हाँ, अपनी इसी रसीली ज़ुबान से मुझसे कहिए भी!"
शेर (उसकी आँखों में झाँककर चिढ़ाते हुए फुसफुसाता है): "कहिए कि 'शेर, मेरे इन सुडौल मम्मों को भी छुओ और उनसे भी उतना ही प्यार करो जितना मेरे पेट से किया है... वे तड़प रहे हैं शेर के हाथों में आने के लिए!'"
मीरा (घोर अपमान से बुरी तरह चीखने लगी, उसका सिर चकराने लगा था): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा मत करवाओ... मैं बर्बाद हो जाऊँगी... सरताज मुझे जान से मार देंगे... प्लीज... अपनी कसम का इतना बड़ा फायदा मत उठाओ..."
शेर (अपनी जाँघों के बीच उसकी नंगी टाँगों को और कसकर भींचते हुए): "अरे-अरे मेमसाब! साहब का नाम बीच में लाकर मूड मत खराब कीजिए। इस वक्त इस रसोई में आपके साहब नहीं, सिर्फ यह नौकर है और आप हैं!"
मीरा के काँपते हुए, दूध जैसे गोरे हाथ जब शेर की हथेलियों से छुए, तो उसके पूरे वजूद में घृणा का एक तेज़ करंट दौड़ा।
लेकिन शेर की जाँघों के बीच फँसी उसकी अपनी नंगी टाँगें और दिमाग पर मंडराता ज्योति की कसम का साया... इन दोनों ने मिलकर उसकी बची-कुची इच्छाशक्ति को पूरी तरह पंगु बना दिया था।
मीरा ने रोते हुए, अपनी उंगलियों से शेर की कलाई को पकड़ा। उसने धीरे-धीरे शेर के दोनों भारी हाथों को अपनी गीली नाभि और पेट के ऊपर से सरकाते हुए ऊपर की तरफ खींचना शुरू किया।
शेर ने अपने हाथों को पूरी तरह ढीला छोड़ दिया था; वह इस पल का पूरा आनंद लेना चाहता था जहाँ मालकिन खुद एक दासी की तरह उसके हाथों को अपनी छाती की तरफ ले जा रही थी।
जैसे ही मीरा ने शेर की हथेलियों को अपने गहरे नीले रंग के स्लीवलेस ब्लाउज के ठीक ऊपर रखा, शेर के मुँह से एक गहरी, संतुष्ट आह निकल गई।
शेर (अपनी हथेलियों को मीरा के वक्षस्थल पर जमाते हुए, आँखें मूँदकर हँसी हंसता है): "आह्ह् मेमसाब... क्या मखमली चीज़ है! पर अपनी ज़ुबान मत भूलिए... !"
मीरा (ग्लानि और घोर अपमान के चरम पर, थरथराते स्वर में बोली): "शेर... मे... मेरे इन मम्मों को... भी छुओ..."
शेर (अपनी आँखें खोलकर, मुस्कुराते हुए उसकी छाती पर थोड़ा दबाव बढ़ाता है): "अरे मेमसाब, आधी लाइन से इस नौकर का दिल नहीं भरता! पूरी बात बोलिए!"
मीरा (अपनी आँखें बंद , अपनी आत्मा का गला घोंटते हुए कहती है): "...और... और इनसे भी... उतना ही प्यार करो... जितना... जितना मेरे पेट से किया है...वे तड़प रहे हैं शेर के हाथों में आने के लिए"
इन शब्दों का मीरा के मुँह से निकलना था कि शेर के हाथों की उंगलियाँ हरकत में आ गईं। उसने मीरा के दोनों भरे-पूरे अंगों को अपनी हथेलियों में बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया।
शेर (उसकी छाती को दबोचते हुए): "यह हुई न बात मेमसाब! आपकी यह आवाज़ सुनकर तो इस शेर का सीना और चौड़ा हो गया!"
ब्लाउज की तंग कटिंग के भीतर मीरा का बदन इस तीखे हमले से तड़प उठा। शेर का मुँह अब दोबारा आगे बढ़ा और वह मीरा के पेट को अपनी लार से भिगोते हुए ऊपर की तरफ आने लगा, ताकि वह सीधे उसके वक्षस्थल पर अपने दाँत गड़ा सके।
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Khauf Aur Saazish—8
Aaj dopahar kothi mein ek ajeeb sa sannaata tha. Sartaj subah hi apni duty par nikal chuke the aur Jyoti bhi apni college bus se college ja chuki thi. Meera ghar mein akele thi.
Aaj usne halke neele rang ki ek khoobsurat georgette ki saree pahni thi, jiske saath gahre neele rang ka sleeveless blouse uski gori baahon ko poori tarah beparda kar raha tha. Vah rasoi mein khadi kuch kaam kar rahi thi ki tabhi darwaze par aahat hui.
Meera ne chaunk-kar peeche dekha. Sher rasoi ke darwaze par khada tha, uska ek pair abhi bhi poori tarah theek nahi tha, isliye vah halka sa langdaakar chal raha tha.
Usse is tarah rasoi mein daakhil hote dekh Meera ke bheetar ka khauf jaag utha. Uski reedh mein siharan daud gayi, lekin usne khud ko sambhaalate hue poochha.
Meera (haath mein pakde bartan ko kaskar bheenchte hue, ghabrahat chhipaakar): "Sher?! Tum... tum yahaan rasoi mein kyon aaye? Tumhari choten abhi poori tarah theek nahi hui hain, tumhe apne quarter mein aaraam karne ko kaha tha na? Jaao aur aaraam karo."
Sher (langdaate hue do kadam aur aage badhaate hue, chehre par behad maasoom muskaan laakar): "Are memsab... aap to bekaar hi gussa ho rahi hain. Akele quarter ki us chaarpai par lete-lete mera dam ghut raha tha. Bahut bore ho raha tha. To maine socha ki kyon na aakar aapse do pal baat hi kar loon... dil bahal jaayega. Aakhir maalik aur bitiya bhi to ghar par nahi hain."
Sher ki aawaz bhale hi bahut shaant aur saamaanya thi, lekin jab usne 'maalik aur bitiya ghar par nahi hain' wale shabdon par zor diya, to Meera ka dil zor se dhadakne laga.
Sher ki nazaren ab dheere se uupar uthiin aur Meera ke us sleeveless blouse se jhaankti gori baahon aur uski neeli saree ke pallu se dhake vakshasthal par jaakar thehar gayiin.
Uski aankhon mein wahi puraani, bhookhi chamak dheere-dheere waapas laut rahi thi.
Usne apni aankhen Meera ki nangi, gori baahon se sarkate hue uski kamar ke us hisse par tika diin jahaan se saree thodi khisaki hui thi.
Vah dheere se aage badha aur rasoi ke kone mein rakhi ek kursi ko kheenchkar us par baith gaya. Baithte hi uski nazaron ne Meera ke poore badan ka X-ray karna shuru kar diya.
Sher (kursi par aaraam se teek lagaate hue, apni aankhen Meera ke vakshasthal par gadaakar behad dheemi aur rasbhari aawaz mein): "Memsab... sach kahen to aaj aap is neeli saree aur bina baazoo wale blouse mein bahut khoobsurat lag rahi hain. Kasam se... aisa lag raha hai jaise TV mein kisi badi model ko dekh raha hoon. Is neele rang mein aapki ye gori tvacha chamak rahi hai."
Meera (Sher ki in nangi tareefon se asahaj hokar, apne pallu ko kheenchkar chhati par aur kaste hue kaampti aawaz mein): "Sher! Please... Bhagwan ke liye aisi baaten mat boolo. Apni zubaan ko lagaam do. Tum bhool rahe ho ki tum kisse aur kahan khade hokar baat kar rahe ho."
Sher (ek kutil muskaan ke saath): "Kyon memsab? Bhala ek khoobsurat cheez ki tareef karna koi gunaah hai kya? Jo saamne dikh raha hai, is Sher ki aankhen to bas usse saraah rahi hain. Ismein itna gussa hone wali kya baat hai?"
Meera (rasoi ke platform ka sahara lekar khud ko sambhaalate hue, sakht lahje mein): "Nahi Sher, tum tareef nahi kar rahe, tumhari neeyat kharaab ho rahi hai. Aur tum apni haden paar kar rahe ho. Hamare beech aisa koi rishta nahi hai jo tumhari in behooda aur gandi baaton ko jaayaz thehra sake."
Sher (Meera ki baat sunte hi achanak thahaaka lagaakar hanste laga): "Rishta nahi hai memsab?"
Sher (kursi se thoda aage jhuk-kar apni aawaz ko phusphusaahat mein tabdeel karta hai): "Are... rishta to kal hi ban gaya tha jab aapke ye dono mamme meri chhati par ragad kha rahe the."
Sher (apni chhati par haath pheerte hue kaamuk muskaan ke saath boola): "Mujhe to unki wo narmi abhi tak apne badan par mehsus ho rahi hai."
Sher (apni aankhen moondehue us manzar ko yaad karte hue phusphusaaya): "Kya laajaawaab nazaara tha wo..."
Sher (Meera ke jism ko bhookhi nazaron se ghoorte hue aage kahta hai): "...Aapke ve nange mamme, un par chamakte wo gulaabi tips aur aapki wo madhosh kar dene wali aahen!"
Kal ka vah sharmnaak manzar yaad aate hi Meera ka poora chehra sharm aur apmaan se laal ho gaya.
Rasoi ke shaant mahaul mein Sher ki aawaz khanjar ki tarah uski rooh mein utar rahi thi.
Sher kursi par poora wazan daalkar peeche ki taraf jhuka, usne apne dono haath apni chhati par baandh liye aur badi hi dhoortata aur adhikaar bhari nazaron se Meera ke kaampte hue badan ko nihaarne laga.
Sher (kursi par baithe-baithe hi, ek muskaan ke saath): "Memsab, jab aap is neeli saree aur sleeveless blouse mein bilkul kisi model jaisi lag hi rahi hain..."
Sher (kaamuk lahje mein aage kahta hai): "...To is gareeb naukar ki bhi ek chhoti si ichha poori kar dijie. Main chahta hoon ki aap abhi mere liye ek model ki tarah catwalk karke dikhaayen."
Meera (dahashat se apni aankhen phailaate hue, zor-zor se sir hilaane lagi): "Nahi... nahi Sher! Yeh... yeh mujhse bilkul nahi hoga!"
Sher (apni nazaren uski patli kamar par tikaate hue phusphusaaya): "Apni kamar ko thoda matkaate hue zara chal kar dikhaaiye to..."
Meera (kaampte haathon se apni saree ka pallu kaskar pakadte hue booli): "Tum... tum poori tarah paagal ho gaye ho kya?"
Meera (svaabhimaan se chillaai): "Main is ghar ki izzatdaar bahu hoon, kisi tamaashe ki aurat nahi jo tumhare saamne yahaan is tarah naachoon ya walk karke dikhaoon!"
Sher (uski baat sunte hi apne chehre ke haav-bhaav ekdam sakht kar leta hai): "Nahi hoga?! To iska matlab seedhe-seedhe yahi hua na Meera memsab... ki aap apni us pavitra kasam se mukar rahi hain?"
'Kasam' ka naam sunte hi Meera ke jism ka saara khoon jaise ek pal mein jam gaya.
Meera (apni chhati par haath rakhte hue): "Meri maasoom beti ko is gande khel ke beech mein mat laao, Bhagwan ke liye ruk jaao."
Sher (uski aankhon mein jhaankte hue kahta hai): "Aap apni hi laadli beti Jyoti ki jaan ki kasam ko tood rahi hain! Yaad hai na... agar kasam toodi, to us maasoom bitiya ki jaan par kya khaufnaak aafat aa sakti hai?"
Sher: "Theek hai, mat kijie meri baat poori... par phir apni bitiya ke saath aage hone wale kisi bhi haadse ke liye mujhe dosh mat dijiyega!"
Mamta ki bebasi aur khauf ke aage Meera ke sanskaari kadam aakhirkaar dagmaga hi gaye.
Meera (apni bahte aansoon ko sukhaate hue kaampte haathon se apni saree ka neela pallu uthaati hai): "Theek hai Sher... main karti hoon."
Sher (muskuraate hue): "Memsab, apne is aansoon se bhare udaas chehre ko theek kijie. Mujhe aapke chehre par ek model jaisi kaatilaana muskaan chahiye."
Sher (hukum se kahta hai): "Uthaaiye apni is saree ka yeh neela pallu aur isse apni kamar mein is tarah khosiye ki mujhe aapka poora nanga pet aur gori naabhi saaf nazar aaye."
Sher (vahshi lahje mein aage jodta hai): "Phir waise hi kamar lachkaate aur muskuraate hue dheere-dheere kadam badhaakar seedhe mere paas aaiye. Yaad rakhiyega madam, agar aapne yeh sahi se nahi kiya to aapko yeh dobaara karna padega!"
Meera (pallu ko apni kamar mein khoste hue apna gora pet aur naabhi Sher ke saamne nanga kar deti hai): Uske chehre par majboori ka dard saaf chhalak raha tha, par vah apne kaampte hotHon par ek jhoothi muskaan laane ki koshish karti hai.
Sher (apni bhookhi nazaron se uske nange pet ko taakne lagta hai): "Shaabaash memsab! Ab zara apni patli kamar ko lachkaate hue, kisi model ki tarah chalakar mere paas tak aaiye."
Meera (dheere-dheere apne kadam badhaati hai): Vah apni kamar ko halka sa matkaate hue, bhaari dil se rasoi ke pharsh par Sher ki taraf chalne lagti hai.
Sher (uski lachakat-matakat chaal aur nange hue pet ko dekhkar seeti bajaata hai): "Waah memsab, waah! Kya kaatilaana chaal hai, IPS sahab bhi kya yaad rakhenge ki unki beewi mere ishaaron par kaise thumke lagaati hai!"
Meera chalte-chalte Sher ki kursi ke bilkul kareeb aakar ruk jaati hai.
Sher: "Yeh hui na baat! Ab lag rahi hain aap asli model... par itni doori kyon memsab, zara aur paas aaiye."
Sher (apni kursi se dheere-dheere khada hota hai aur chehre par chidaane wali muskaan sajaakar Meera ko sir se pair tak taakta hai): "Waah memsab, waah! Chaal to aapne ekdam kaatilaana dikhaayi hai... par sach kahoon to aapki is walk mein abhi vah baat nahi aai jo main dekhna chahta tha."
Sher: "Aapka yeh mahanga pallu... beech mein baar-baar aakar is naukar ke maze mein khalala daal raha hai."
Itna kahkar Sher ne achanak uske pallu ko kheincha, jisse saree ka pallu simatkar uske dono mammon ke beech ek patli si kapde ki patti bankar rah gaya.
Sharm, apmaan aur khauf ke maare Meera ki chhati dhaunkani ki tarah chalne lagi, aur pallu ke neeche chhipe uske dono mamme bebasi se uupar-neeche phadakne lage.
Sher (Meera ki tadap ka maza lete hue uski aankhon mein aankhen daalkar hansta hai): "Are-are memsab! Itni tezi se saansen kyon phool rahi hain aapki? Abhi se ghabraa gayiin? Dekhiye to, aapka yeh pallu bhi aapke ubhaaron ke beech khud ko chhipaane ki koshish kar raha hai!"
Sher (apni uungliyon se uski saree ke nefe ko neeche khisakaate hue neech lahje mein phusphusaata hai): "Jab sahab ghar par nahi hain, to is gore badan ko aise kapde mein lapetkar chhipaane ka kya fayda? Zara isse thoda aur neeche sarkane dijie..."
Sher ne bedardi se uski saree ko naabhi ke kaafi neeche tak daba diya, jisse Meera ki gori, suraahidaar naabhi aur poora ka poora nanga pet Sher ki pyaasi nazaron ke saamne poori tarah numayaan ho gaya.
Sher (uski naabhi ko dekhkar): "Ab aaya na asli maza memsab!"
Is apmaan ko Meera ab aur bardaasht na kar saki. Gusse aur aatmasammaan ki jwala mein jalte hue usne apna haath hawa mein uthaaya aur Sher ke chehre par ek zordaar thappad raseed karna chaaha.
Lekin Sher ne hawa mein uske haath ko beech mein dabooch liya.
Sher (uske chehre ke bilkul kareeb saansen chhodte hue aage boola): "Agar aap yeh sab nahi karna chahtiin, to seedhe-seedhe kah dijie na ki aap apni beti Jyoti ki kasam nahi nibha saktiin!"
Sher (uski kalai par dabaav aur badhaate hue taana kasta hai): "Warna chupchaap apni is gustaakhi ke liye mujhse sorry booliye, aur apne is raseele muunh se kahie ki aage se aisi himmat kabhi nahi karengiin."
Jab Meera ki taraf se koi jawaab nahi aaya. Usne Meera ki kalai chhod di aur peeche mudkar baahar jaane ke liye kadam badhaa diye.
Sher ko is tarah waapas laut-te dekh Meera ke dil ki tham gayiin. Uske dimaag mein sirf ek hi khaufnaak khayaal kaundha—ki uski is harkat se beti ki kasam toot rahi hai aur Jyoti ki jaan khatre mein pad jaayegi.
Meera (ghabrahat mein kaampti hui aawaz mein): "Sorry... Sher, mujhe maaf kar do!"
Sher (jaate-jaate ruka, lekin bina peeche mude apne chehre par muskaan laate hue boola): "Kya kaha? Zara tez booliye memsab... mujhe kuch sunai nahi diya."
Meera (apne aansoo pochhte hue bebasi aur apmaan ki ghoont peekar gidgidaai): "Sorry Sher... aage se kabhi manna nahi karungi, tum jaisa kahoge waisa hi karungi."
Sher dheere-dheere waapas Meera ke paas aaya aur apne haathon ko uske bheoge hue gaalon par rakh diya.
Uski chaudi, gandi uungliyan Meera ke thartharaate aur laal pade chehre par dheere-dheere ghoomne lagiin, jaise vah uski bebasi ka ek-ek pal mehsus kar raha ho.
Sher (Meera ki aankhon mein ghoorte hue muskuraakar boola): "Aap rooti hui bilkul achhi nahi lagtiin memsab..."
Itna kahkar Sher Meera ke chehre ke aur kareeb jhuka aur apni jeebh nikaalkar uske gaal par bahte hue garm aansoo ko chaat liya.
Sher ki is harkat se Meera ke muunh se ek rundhi hui siski nikal gayi.
Meera (man hi man gusse aur ghin se jalte hue): "Jee chahta hai is haiewaan ko poore zor se dhakka dekhkar door pheenk doon... apne is jism ko iski gandi neeyat se bacha loon!"
Lekin agle hi pal uski nazaron ke saamne apni maasoom beti Jyoti ka chehra ghoom gaya, aur uska uthta hua gussa khauf ke aage toot kar bikhar gaya.
Meera (kaampte hotHon ko bheenchte hue man hi man bebasi se ro padi): "Nahi Meera... apni beti ki kasam ka khayaal kar... tujhe sahna hoga."
Meera khaamosh khadi rahi, apni aankhen moondehue is kadve apmaan ka zahar chupchaap pee gayi.
Meera ke bheoge chehre ko apni jeebh se besharmi se chaatne ke baad, Sher do kadam peeche hata.
Usne Meera ke chehre ki taakte hue achanak apne haath se uski gaand par ek thappad jad diya.
Sher (thappad maarte hi muskuraaya): "Haan! Ab aaya na chehre par thoda sa rang memsab..."
Sher (apni kursi ki taraf waapas mudte hue roobdaor aawaz mein boola): "Ab waapas us kone mein jaaiye, aur phir se catwalk karke mere paas aaiye."
Itna kahkar vah apni kursi par pair phailaakar baith gaya.
Sher (apni aankhen uski nangi naabhi aur patli kamar par tikaate hue hukum deta hai): "Yaad rahe memsab, is baar ekdam sahi hona chahiye... chehre par model wali kaatilaana muskaan aur kamar mein wahi madhosh kar dene wali lachak honi chahiye."
Sher (phusphusaahat ke saath chetaawani deta hai): "Zara sa bhi dheelaapan dikha, to samajh lijiyega ki aapko yeh baar-baar dohraana padega!"
Meera is asahneey apmaan ko jald se jald khatam karna chahti thi.
Meera (man hi man apne aansoo peete hue bebasi se sochti hai): "Mujhe yeh ghinowna khel khatam karna hi hoga... Jyoti ki khaatir mujhe is ki har baat maanni hogi."
Usne apni bahti aankhon ko sambhaala aur apne kaampte, hotHon par ek banaawati, kaatilaana muskaan bikher di.
Sher (uski is kaatilaana chaal ko dekhkar apni uungliyon se ek zordaar seeti bajaata hai): "Waah memsab, waah! Kya baat hai! Ab aaya na asli nazaara!"
Sher (kursi par baithkar apni jaangh thokte hue cheekhkar taana maarta hai): "Kya laajaawaab mamme hain aapke memsab... is patli si patti mein dabaakar rakhe hain, phir bhi kaise tadap rahe hain!"
Sher (apni bhookhi nazaron ko uski nangi kamar par gadaate hue chidaata hai): "Aur waah! Kya chikna aur gora pet hai aapka... sahab to roz dekhte honge, par aaj to is gareeb naukar ki aankhen thandi ho gayiin!"
Sher (gahri suraahidaar naabhi ko ghoorte hue): "Aur is naabhi ka to poochho hi mat memsab... bilkul kayaamat dhaa rahi hai! Zara aur lachkiye, thoda aur matkaakar paas aaiye!"
Meera apne nange pet aur gori naabhi ko dikhaati hui, apni kamar ko dheere-dheere lachkaakar rasoi ke pharsh par aage badhne lagi.
Uske har kadam ke saath uske mamme pallu ke beech hil rahe the, aur chehre par ek jhoothi, kaamuk muskaan saji hui thi.
Sher (uski chaal aur khoobsurati ko nazaron se taakte hue seeti bajaata hai): "Laajaawaab memsab! Bas aise hi... dheere-dheere lachaktek hue seedhe kareeb chali aaiye."
Jaise-jaise Meera apni kamar lachkaate hue Sher ki taraf badh rahi thi, achanak usse apni taangon ke beech ek ajeeb si garmaahat aur geelapan mehsus hua.
Meera (man hi man gahre sadme se sihar uthi): "Yeh... yeh mujhe kya ho raha hai? Nahi! Aisa kaise ho sakta hai?!"
Uski aatma is ghinowne ehsaas se kaamp uthi.
Meera (apni aankhen bheenchte hue bebasi se badbadaai): "Yeh... yeh bilkul bhi aananddaayak nahi ho sakta! Main aisi aurat nahi hoon... main ek izzatdaar maa hoon, ek officer ki beewi hoon! Yeh mera jism mere saath kaisa ganda dhokha kar raha hai?"
Sher (uski chaal mein aai halki si rukaawat muskaan ke saath chidaata hai): "Kya hua memsab? Kadam kyon ruk gaye? Chehre ki muskaan kahan gaayab ho gayi?"
Sher (uski thartharaati taangon aur nangi naabhi ko bhookhi nazaron se taakte hue): "Zara aur paas aaiye... aapki deh ka yeh khinchaav bata raha hai ki yeh naukar sirf hukum hi nahi chala raha, balki aapke jism ke supt shole bhi bhadka raha hai!"
Sher wahi baitha raha, jaise hi Meera uske theek saamne aakar khadi hui, Sher ne apne dono haath aage badhaaye aur uski patli kamar ko dono taraf se jakadkar apni phaili hui jaanghon ke theek beech mein kheench liya.
Ab Meera ka badan Sher ke ghutnon se poori tarah sat gaya, aur vah chaahkar bhi peeche nahi hat sakti thi.
Kursi par neeche baithe hone ke kaaran Sher ki aankhen sabse pehle Meera ke pet ke us nange hisse par jaakar tik gayiin, jo saree aur sleeveless blouse ke beech se saaf jhaank raha tha.
Sher (Meera ke gore pet par apni bhookhi nazaren tikaate hue): "Waah memsab! Door se to sirf lachak dikh rahi thi, par paas aakar to aapka yeh gora pet chamak raha hai."
Sher ki gandi nigahaen dheere-dheere uupar ki taraf badhiin aur Meera ke bhare-poore vakshasthal par jaakar thehar gayiin. Khauf, tanaav aur tez saanson ke chalne ke kaaran Meera ki chhati bahut tezi se uupar-neeche ho rahi thi.
Sher (Meera ki tez chalti saanson ki dhadkan ko itne kareeb se mehsus karte hue, apni jeebh ko hotHon par pheurkar): "Aahh memsab... itni tez saansen? Is naukar ke itne kareeb aate hi aapka yeh seena kaise phadakne laga hai!"
Sher (uski aankhon mein jhaankkar kameenepan se muskuraata hai): "Bataiye to sahi memsab... yeh badan itna kaamp kyon raha hai? Yeh dar ke maare tharthara raha hai... ya phir is gareeb naukar ke chhuan ka maza aane laga hai?"
Meera (dar ke maare apni aankhen band karne ki koshish karte hue, sisakkar booli): "Sher... please... ab aur nahi... tumne kaha tha sirf paas aane ke liye... mujhe jaane do..."
Sher ne uski guhaar par koi dhyaan nahi diya.
Meera ke pet ke theek beechon-beech sthit uski gahri aur khoobsurat naabhi poori tarah Sher ki nazaron ke saamne nangi ho gayi. Gori tvacha ke beech vah naabhi kisi gahre raaz ki tarah dikh rahi thi, jis par Sher ka poora dhyaan tik gaya aur uski saansen aur bhaari hone lagiin.
Sher (apni uungli ko Meera ki naabhi ke theek paas ki tvacha par halke se sahlaate hue, phusphusaahat mein boola): "Dekh rahi ho memsab? Tumhari yeh naabhi... kasam se kisi khajaane se kam nahi hai!"
Sher (uski naabhi mein uungli gadaane karte hue): "Sahab to apni duty mein vyast rahte honge, par is naabhi ki gahrai aur khoobsurati ka qadrdaan to Sher bana hai!"
Sher ki uungli jab Meera ki naajuk naabhi ke paas reng rahi thi, to Meera ka poora badan khauf aur vaasna ke anchaahe ehsaas se thar-thar kaamp raha tha.
Sher ne kuch pal uski naabhi ko apni nazaron se ghoora, aur phir achanak apna sir uupar uthaakar seedhe Meera ki dabdabaai aankhon mein dekha.
Sher (Meera ki kamar par apni pakad ko aur majboot karte hue, behad dheemi, bhaari aur hukum deti aawaz mein): "Memsab, main chahta hoon ki aap khud apne in gore haathon ko aage badhaayen, aur apni is neeli saree ke pallu ko khud apne kandhe se neeche sarka dein."
Meera (sisakte hue, apne dono haathon ko apni chhati par): "Nahi... nahi Sher... aisa mat karo... main mar jaaungi... please mujh par raham karo..."
Sher (chehre par muskaan laakar, apni aawaz ko aur teekhi karte hue): "Choon bhi mat karna memsab! Yaad rakho, Jyoti bitiya."
Sher (uski thartharaati naabhi par chutki kaatte hue chidaata hai): "Meri baat dhyaan se सुनो... pehle apna pallu neeche giraao, phir do kadam aur aage badhkar apne is gore, nange pet ko seedhe mere chehre aur mere hotHon se le jaakar ragdo."
Meera ne apni aankhen band kar liin. Uski aankhon se aansoon ki dhaar bahkar uski gardan par gir rahi thi. Uski mamta Sher ki dhamki ke aage poori tarah ghutne teek chuki thi.
Lekin isi khauf aur laachari ke beech, Meera ko apne jism mein ek khaufnaak aag sulagti hui mehsus hui.
Meera (man hi man rote hue khud par laanat bhejti hai): "Hey Bhagwan, yeh mujhe kya ho raha hai? Main is haiewaan se nafrat karti hoon... phir bhi mera jism iske neech iraadon ke aage aise ghutne kyon teek raha hai? Yeh kaisa paap hai jo mera badan is yaatna mein bhi maza dhoondh raha hai?"
Sher ne Meera ke chehre par chhaaye is dohare khinchaav ko bhaanp liya aur vaasna se haanfte hue uske aur kareeb aaya.
Sher (Meera ke kaampte hotHon ko taakte hue phusphusaahat mein boola): "Aur haan memsab, sirf pet ragadne se kaam nahi chalega. Jab aapka pet mere muunh ke saamne hoga, to aap khud apni zubaan se mujhse kahungiin..."
Sher (uski nangi naabhi par uungli se gol ghera banaate hue hukum deta hai): "Kaho ki 'Sher, apni jeebh baahar nikaalo... aur chaat jaao mere is nange pet ko... apni pyaas bujha lo.' Chalo memsab, apni is reshmi aawaz mein ye shabd boolo!"
Meera ki mamta poori tarah bebas ho chuki thi. Apni maasoom beti Jyoti ko salaamat dekhne ke liye usne apni bachi-kuchi maryaada ko bhi qurbaan kar diya.
Meera ne kaampte haathon se apni neeli saree ke pallu ko pakda aur bhaari dil se usse apne kandhe se neeche dhalaka diya.
Reshmi kapda sarakkar uske pairon mein ja gira, jisse uske sleeveless blouse mein jakde bhare-poore mamme aur nanga hua pet Sher ki nigahon ke saamne tha.
Meera (apni bahti aankhon ko moondehue, kaampti aur rundhi hui aawaz mein booli): "Sher... apni... apni jeebh baahar nikaalo... aur chaat jaao mere is nange pet ko... apni pyaas bujha lo..."
Sher ke chehre par jeet ki ek muskaan tair gayi. Usne apni garm jeebh baahar nikaali. Meera ne bebasi mein ek kadam aage badhaakar apne gore, sugathit aur nange pet ko Sher ke chehre aur hotHon se le jaakar ragad diya.
Sher ne apni geeli jeebh Meera ke chikne pet par pheurna shuru kar diya. Vah uske gore pet ko buri tarah chaatne laga aur uski suraahidaar naabhi ko apne hotHon mein bharkar zor-zor se choosne laga.
Meera (pet par Sher ki garm aur geeli jeebh ka sparsh mehsus hote hi sihar uthi): "Aahh... ufff... shhh..."
Jaise hi Sher ne uski naabhi ko apne muunh mein kheenchkar choosna shuru kiya, Meera ke jism mein bijli ki ek lahar daud gayi. Ek taraf jahaan uski aatma is ghinowne kaam se ghrina kar rahi thi aur guilt mein jal rahi thi, wahi doosri taraf uska bekaabu badan Sher ki is chhuan se aanand ki charam seemaon ko chhoone laga.
Meera (man hi man rote hue khud ko koosne lagi): "Hey Ishwar! Mujhe utha kyon nahi lete? Yeh haiewaan meri aabroo ki dhajjiyan udaa raha hai... aur mera neech badan is zillat mein bhi pyaasa hokar tadap raha hai! Main apni hi nazaron mein kitni gir chuki hoon..."
Lekin badan ka ras aur uttejna itni haavi ho chuki thi ki Meera ki siskiyan dheere-dheere kaamuk aahaaton mein badalne lagiin.
Meera (Sher ke sir ko bebasi mein thaamte hue, apni saanson ko rook na saki): "Aahh... shhh... Sher... ufff... yeh tum... kya kar rahe ho... aahh..."
Meera ke muunh se nikli us halki si aah ko Sher ke kaanon ne turant pakad liya. Uski aankhon mein jeet ki chamak kaundh gayi. Usne apna muunh Meera ke pet se thoda sa hataaya, lekin apni dono hatheliyon se uski patli kamar ko aur kaskar apni jaanghon ke beech bheench liya.
Usne neeche se uupar ki taraf Meera ke laal aur aansoon se bheoge chehre ko dekha.
Sher (kaamuk hansi hanste hue, apni laar se sane hotHon ko jeebh se chaatkar): "Are... are memsab! Yeh kya? Aapke muunh se ye kaisi aawazen nikal rahi hain? Kasam se... aisa lag raha hai ki maalkin ko is seva mein maza aane laga hai."
Sher (uski thartharaati naabhi par haath pheerte hue): "Muunh se to bada manna kar rahi theen, par aapka yeh garm badan to kuch aur hi gawaahi de raha hai! Badan ki yeh aag chhipaaye nahi chhipti memsab..."
Meera (ghabrahat aur sharmindagi se apni aankhen bheenchte hue, haanfte swar mein): "Nahi... nahi Sher... aisa mat boolo... mujhe chhod do... bas karo..."
Meera (man hi man aatma ke guilt aur nafrat mein jalte hue sochti hai): "Hey Ishwar, yeh haiewaan kya kah raha hai? Kya sach mein mera badan is zillat mein pighal raha hai? Nahi... main aisi aurat nahi hoon! Main ek izzatdaar maa hoon, Sartaj ki wafaadaar patni hoon... mujhe is ghinowne ehsaas se bacha lo!"
Sher (uungli se Meera ki naabhi ke paas lagi apni laar ko phailaate hue, hukum deti aawaz mein): "Memsab! Khel to abhi shuru hua hai. Jaise pehle boola tha, waise hi ab boolti raho."
Sher (uski kamar mein apni uungliyan gadaate hue muskaan ke saath boola): "Apni is madhosh aawaz mein mujhse khud kaho... mujhse poochho ki main tumhare is gore, nange pet ka aur kya haal karoon? Boolo memsab, jab tak tum khud apni zubaan se nahi kahungiin, yeh Sher aage nahi badhega. Boolo ki main is pet ka kya haal karoon?!"
Meera poori tarah maun ho chuki thi. Apmaan ki itni gahri khaai mein vah gir chuki thi ki uski zubaan ne uska saath dena band kar diya tha.
Lekin Sher ko uska yeh maun bilkul bardaasht nahi tha. Vah Meera ke bheetar ki maalkin ko poori tarah kuchalkar usse apne ishaaron par naachne wali ek bebas moorat bana dena chahta tha.
Jab Meera ne uski baat ka koi jawaab nahi diya, to Sher ke chehre par gussa ubhar aaya. Usne apna muunh aage badhaaya aur Meera ki naabhi ke theek paas ki komal tvacha ko apne daanton ke beech bheenchkar ek zordaar teekha cut maar diya.
Meera (dard se tadap uthti hai, uski cheekh rasoi ki deewaron se takraati hai): "Aahhh! Sher... mar gayi... chhodo... please chhodo!"
Dard ki ek tez lahar Meera ke poore badan mein daud gayi. Sher ne daant tab tak nahi hataaye jab tak Meera ke jism par uske teekhe daanton ke gahre laal nishaan nahi ubhar aaye. Dard aur apni beti ki salaamati ka khauf is kadar haavi hua ki Meera ka bacha-kucha hausla bhi poori tarah toot gaya.
Vah poori tarah toot chuki thi. Usne roote aur sisakte hue aakhirkaar apni zubaan kholi aur wahi shabd kaye jo vah shaitan sunna chahta tha.
Meera (atyadhik dard, siskiyon aur bebasi ke charam par thartharaate hue): "Ha... haan Sher... aur... aur chooso... mere... mere is poore pet ko... apni laar se geela kar do..."
In shabdon ke nikalte hi Sher ne apni jeebh baahar nikaali aur jahaan usne kaata tha, us zakhm aur laal nishaan par apni garm, geeli jeebh pheurna shuru kar diya.
Jaise hi Sher ki jeebh ne us kate hue zakhm ko chaata, Meera ka poora wajood kaamp utha. Kate hue sthaan par jalan aur jeebh ki sahlaati garmaahat ke sangam ne Meera ki yoni mein ek bhayaanak, bijli jaisa current dauda diya.
Meera (achanak aaye us teekhe jhatke se aankhen phati ki phati rah gayiin, uske muunh se bekaabu aah nikal gayi): "Aaaahhh... ufff... shhh... yeh... yeh kya hai..."
Sher (uske pet par jeebh ragadte hue): "Waah memsab... yahi aawaz to sunni thi mujhe!"
Sartaj ne aaj tak Meera ko kabhi ratti bhar bhi dard nahi diya tha. Unka pyaar hamesha dheema, naajuk aur sammaan se bhara hota tha.
Meera ne apni poori zindagi mein dard aur uttejna ke is khaufnaak mel ka ehsaas kabhi nahi kiya tha—jahaan uupar teekha dard jal raha tha, wahi neeche uski yoni kaamuk ras se geeli hokar pyaas se thirakne lagi thi.
Meera (man hi man gahraate guilt mein tadapte hue khud ko koosne lagi): "Hey Bhagwan! Yeh kaisa paap ho raha hai mujhse? Sartaj ne to mujhe hamesha phoolon ki tarah rakha... aur yeh neech haiewaan mujhe dard de raha hai, mujhe noch raha hai... phir bhi meri yoni mein yeh kaisa zaheerala aanand phoot raha hai? Mera badan itna neech kaise ho sakta hai?"
Meera (Sher ke baalon mein anjaane mein uungliyan phansaate hue, dard aur bekaabu maze ki dohari aag mein sisakne lagi): "Aahh... Sher... ufff... mat chaato wahan... aahh... mar jaaungi... shhh..."
Sher (uske pet par jeebh ragadte hue, uski thartharaati jaanghon ko bhaanpkar thahaaka lagaata hai): "Waah memsab! Aapke pet ka yeh zakhm to aapki jawaani ki sabse meethi aawazen baahar nikaal raha hai!"
Uska ek haath Meera ki naajuk kamar ko jakde hue tha, to doosra haath uski jaanghon ke paas harkat karne laga.
Sher ne neeche jhuk-kar Meera ki neeli saree ke ghere ko seedhe uski jaanghon tak uupar ki taraf kheench diya. Saree ke sarkate hi Meera ki gori, makhmali taangen poori tarah nangi ho gayiin.
Sher ki aankhen phati ki phati rah gayiin. Itni sundar, itni beedaag aur chikni taangen dekhkar uske muunh mein paani aa gaya. Sher ne turant apne dono pairon ko aage badhaaya aur Meera ki un kaamptee hui nangi taangon ko apni jaanghon ke beech phansa liya ki ab uska ek inch bhi hil paana naamumkin ho gaya.
Is naye aur gahre shaareerik hamle se Meera poori tarah Sher ke shikanje mein kaid ho chuki thi. Uupar se pallu hata hua tha aur neeche se saree poori tarah kheinchi hui thi. Sher ne ek baar phir uski dari hui aankhon mein dekha aur apni agli maang uske saamne rakh di.
Sher (kaamuk unmaad mein haanfte hue, Meera ki nangi taangon ko dabaakar): "Waah memsab, waah! Itni chikni taangen aaj tak to sirf films mein hi dekhi theen. Ab aa raha hai asli maza!"
Sher (uski kamar mein uungliyan gadaate hue, muskaan ke saath hukum deta hai): "Ab zara apne in gore haathon se mere dono haathon ko pakdiye... aur dheere-dheere unhen uupar le jaakar seedhe apne in sudaul mammon par rakh dijie. Aur haan, apni isi raseeli zubaan se mujhse kahie bhi!"
Sher (uski aankhon mein jhaankkar chidaate hue phusphusaata hai): "Kahie ki 'Sher, mere in sudaul mammon ko bhi chhoo aur unse bhi utna hi pyaar karo jitna mere pet se kiya hai... ve tadap rahe hain Sher ke haathon mein aane ke liye!'"
Meera (ghor apmaan se buri tarah cheekhne lagi, uska sir chakraane laga tha): "Nahi... nahi Sher... aisa mat karwaao... main barbaad ho jaaungi... Sartaj mujhe jaan se maar denge... please... apni kasam ka itna bada fayda mat uthaao..."
Sher (apni jaanghon ke beech uski nangi taangon ko aur kaskar bheenchte hue): "Are-are memsab! Sahab ka naam beech mein laakar mood mat kharaab kijie. Is waqt is rasoi mein aapke sahab nahi, sirf yeh naukar hai aur aap hain!"
Meera ke kaampte hue, doodh jaise gore haath jab Sher ki hatheliyon se chhue, to uske poore wajood mein ghrina ka ek tez current dauda.
Lekin Sher ki jaanghon ke beech phansi uski apni nangi taangen aur dimaag par mandraata Jyoti ki kasam ka saaya... in dono ne milkar uski bachi-kuchi ichhaashakti ko poori tarah pangu bana diya tha.
Meera ne roote hue, apni uungliyon se Sher ki kalai ko pakda. Usne dheere-dheere Sher ke dono bhaari haathon ko apni geeli naabhi aur pet ke uupar se sarkate hue uupar ki taraf kheenchna shuru kiya.
Sher ne apne haathon ko poori tarah dheela chhod diya tha; vah is pal ka poora aanand lena chahta tha jahaan maalkin khud ek daasi ki tarah uske haathon ko apni chhati ki taraf le ja rahi thi.
Jaise hi Meera ne Sher ki hatheliyon ko apne gahre neele rang ke sleeveless blouse ke theek uupar rakha, Sher ke muunh se ek gahri, santusht aah nikal gayi.
Sher (apni hatheliyon ko Meera ke vakshasthal par jamaate hue, aankhen moondehue hansi hansta hai): "Aahh memsab... kya makhmali cheez hai! Par apni zubaan mat bhooliye... !"
Meera (glaani aur ghor apmaan ke charam par, thartharaate swar mein booli): "Sher... me... mere in mammon ko... bhi chhoo..."
Sher (apni aankhen khoolkar, muskuraate hue uski chhati par thoda dabaav badhaata hai): "Are memsab, aadhi line se is naukar ka dil nahi bharta! Poori baat booliye!"
Meera (apni aankhen band, apni aatma ka gala ghongte hue kahti hai): "...aur... aur inse bhi... utna hi pyaar karo... jitna... jitna mere pet se kiya hai... ve tadap rahe hain Sher ke haathon mein aane ke liye"
In shabdon ka Meera ke muunh se nikalna tha ki Sher ke haathon ki uungliyan harkat mein aa gayiin. Usne Meera ke dono bhare-poore angon ko apni hatheliyon mein berahmi se masalna shuru kar diya.
Sher (uski chhati ko daboochte hue): "Yeh hui na baat memsab! Aapki yeh aawaz sunkar to is Sher ka seena aur chauda ho gaya!"
Blouse ki tang cutting ke bheetar Meera ka badan is teekhe hamle se tadap utha. Sher ka muunh ab dobaara aage badha aur vah Meera ke pet ko apni laar se bhigootes hue uupar ki taraf aane laga, taaki vah seedhe uske vakshasthal par apne daant gada sake.
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