Thread Rating:
  • 280 Vote(s) - 4.77 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
गज़ब अपडेट हैं मित्र
Like Reply
Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
Badhiya kahaani hai yah, bahot hi garma garam writings
Like Reply
Bahot badhiya update bhai
Shaandaar mazedaar lajawab
Like Reply
(25-07-2026, 08:04 PM)Deepak.kapoor Wrote: I have started working on the next episode; it may be ready by Sunday night or Monday. In the meantime, read another story where I have recently given an update. The link is in my signature.

Update is not ready yet .  Still working on it . Will post it once it ready .( Maybe Wed or Thru)
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



Like Reply
(28-07-2026, 01:09 AM)Deepak.kapoor Wrote: Update is not ready yet .  Still working on it . Will post it once it ready .( Maybe Wed or Thru)

Take your time bro.
Like Reply
Waiting
Like Reply
Superb, blockbuster and dick blasting writings!
Like Reply
Waiting
Like Reply
(28-07-2026, 01:09 AM)Deepak.kapoor Wrote: Update is not ready yet .  Still working on it . Will post it once it ready .( Maybe Wed or Thru)

Waiting
Like Reply
(28-07-2026, 01:09 AM)Deepak.kapoor Wrote: Update is not ready yet .  Still working on it . Will post it once it ready .( Maybe Wed or Thru)

This week has been super Busy . really could not work on it . Hoping To get something done in weekend . Crossing fingers . 
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



[+] 1 user Likes Deepak.kapoor's post
Like Reply
अध्याय -20

और तभी, विशाल, जो अपने दोस्तों के साथ था,  रास्ता काटता हुआ, अम्मी और नानी के ठीक सामने आ गया।

"नानी! मुबारक हो!" उसने झुक कर, एक दिलकश मुस्कुराहट के साथ कहा।

"खैर मुबारक, बेटा!" नानी ने खुशी से उसके सर पर हाथ रखा।

फिर वो अम्मी की ओर मुड़ा और उसने अम्मी को... ऊपर से नीचे तक... देखा। यह एक सेकंड से भी कम वक्त के लिए हुआ।

"मुबारक हो... आयशा जी," उसने 'जी' लफ़्ज़ पर इतना ज़ोर दिया, जैसे मज़ाक उड़ा रहा हो।

"खैर मुबारक," अम्मी ने फौरन नज़रें चुराते हुए कहा।


"फाइनली अकरम और सायमा का निकाह हो गया," विशाल ने कहा। नानी यह सुन कर मुस्कुरा दीं।


लेकिन फिर वो थोड़ा आगे झुका और भीड़ के शोर में धीमी आवाज़ में अम्मी से कहा-
"एकदम माल लग रही हो इस जोड़े में।"

उसने एक पल का पॉज़ लिया, उसकी नज़रें अम्मी के होठों पर थीं।
"खास कर इस लिपस्टिक के साथ। इसका टेस्ट अभी तक याद है मुझे…।"

अम्मी की आँखें दहशत से फैल गयीं। उनका हाथ फौरन उनके होठों पर गया।

"क्या... क्या कह रहे हो?" नानी ने शोर में ठीक से सुना नहीं।

"मैं कह रहा था, नानी," विशाल ने फौरन नानी की तरफ मुड़ते हुए कहा, "अकरम एकदम कमाल लगा रहा है इस जोड़े में।"

और फिर उसने अम्मी की नज़रों में आँखें डालते हुए, अपनी निगाहें सीधे उनके सीने के उभार पर टिका दीं और कहा—

"खासकर यह जो... एम्ब्रॉयडरी का काम है... इसका उभार बहुत बढ़िया दिख रहा है... बिल्कुल परफेक्ट।"

नानी, जो विशाल की बातों को अकरम की शेरवानी के बारे में समझ रही थीं, अकरम की तरफ देखते हुए बोल पड़ीं, "हाँ-हाँ बेटा, बहुत नफ़ीस काम है।"

अम्मी का चेहरा शर्म, झिझक और एक अजीब सी शोख़ी की वजह से लाल हो गया था। उन्होंने विशाल की इस बेशरम चतुराई और दोहरे अर्थ वाले जुमले पर हवा में हाथ उठाया... जैसे वो  उसे थप्पड़ मारना चाहती हों।

तभी विशाल ने अपनी बात का रुख नानी की तरफ मोड़ते हुए कहा, "वैसे नानी... मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।"
नानी ने मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा, "क्या बात है बेटा?"

"नानी, आपकी इस बेटी ने बारातियों का वेलकम बहुत ही शानदार और अनोखे तरीके से किया है," विशाल ने अम्मी की तरफ एक कमीनी नज़र डालते हुए कहा, "जब यह हाथ में थाली लेकर अकरम का वेलकम करने के लिए आगे झुकी थीं ना... कसम से नानी, क्या कमाल का नज़ारा था!"

नानी के कुछ समझने से पहले ही विशाल ने अम्मी के करीब झुककर उनके कान में बेहद धीमी, हवस भरी आवाज़ में फुसफुसाया—

"कुर्ती के गहरे गले से झांकते आपकी उस पीली ब्रा के ऊपर दोनों नंगे मम्मे... और वो अंगूर की तरह तने हुए गुलाबी टिप्स... उफ़्फ़ आयशा! इतना कातिलाना नज़ारा था कि आपका होने वाला दामाद अकरम भी ऐसा वेलकम अपनी पूरी उम्र नहीं भूल पाएगा!"

"मारूँगी!" उनके होंठ  यह लफ़्ज़, बिना आवाज़ के, बोले।

"क्या हुआ?" नानी ने पलट कर उन्हें देखा।

अम्मी ने फौरन... अपने उस उठे हुए हाथ से... अपने सुनहरे दुपट्टे को ठीक किया... और खिलखिला कर हंस पड़ीं। "कुछ नहीं, माँ!!"

--------------

विशाल थोड़ा और आयशा के करीब सरक आया। उसकी सांसे आयशा के कान के पास थीं, जब उसने बेहद धीमी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा—
"आयशा जी, ज़रा मुड़कर देखिए तो सही... हमारा दूल्हा अकरम अभी भी स्टेज पर बैठा-बैठा आप ही को ताक रहा है।"

आयशा का दिल डर के मारे धक से रह गया। उन्होंने घबराकर अपनी गर्दन घुमाई और स्टेज की तरफ देखा। विशाल की बात सच थी—अकरम वाकई उन्हीं की तरफ टकटकी लगाए देख रहा था।

लेकिन उसकी नज़रें आयशा के चेहरे पर नहीं थीं। अकरम की नज़रों का एंगल सीधे आयशा के सीने पर, उस उभार और कुर्ती के गले पर टिका हुआ था, जहाँ कुछ देर पहले ही उसने वह बेपर्दा नज़ारा देखा था। अकरम मानो अभी भी उसी हादसे की यादों में खोया हुआ था।

आयशा ने खौफ और शर्म के मारे कांपते हुए अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। उनका चेहरा तपने लगा था। उन्होंने विशाल की तरफ बेहद दबी, फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, जिसमें नफ़रत और लाचारी साफ झलक रही थी—

आयशा (दांत भींचकर, धीमी फुसफुसाहट में): "हद दर्जे के कमीने हो तुम, विशाल... तुमने आज मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। अब मैं सारी ज़िंदगी अकरम के सामने अपना मुँह कैसे दिखा पाऊँगी?"

विशाल के चेहरे पर वही शातिर मुस्कान तैर गई। उसने बड़े इत्मीनान से आयशा की आँखों में देखा और बिल्कुल धीमे से उनके कान के पास झुककर कहा—

विशाल (कमीनी हँसी के साथ): "वह तो मैं हूँ ही आयशा जी... पर वैसे, मुझे नहीं लगता कि अब अकरम की निगाहें कभी आपके मुँह की तरफ जाएँगी। उनका निशाना तो हमेशा कहीं और ही रहेगा!"
विशाल के मुँह से यह बेशरम बात सुनते ही आयशा का गोरा चेहरा शर्म, झिझक और बदन में दौड़ती वासना की सिहरन से एकदम लाल हो गया। उनका वजूद अंदर तक कांप उठा और वह एक शब्द भी आगे नहीं बोल सकीं।

--------------


मैं उन दोनों के इतने करीब खड़े होने की वजह से पूरी बात तो ठीक से नहीं सुन पाया, पर दूर से ही विशाल की उस नीच मुस्कान और अम्मी के चेहरे पर छाती लाली को देखकर मेरा पूरा बदन गुस्से और जलन से खौल रहा था।

उन दोनों की इस नज़दीकी ने मेरे जिस्म में आग लगा दी थी, और मेरा दिल चाह रहा था कि अभी जाकर उस कमीने का गिरेबान पकड़ लूँ।

"ह-हमें... अब स्टेज पर जाना चाहिए," अम्मी ने किसी तरह अपनी आवाज़ को संभाला और नानी का हाथ पकड़कर तेज़ी से आगे बढ़ गईं।

मैं भी अपने अंदर सुलगती आग को दबाए उनके पीछे-पीछे चलने लगा।

विशाल वहीं अपनी जगह पर खड़ा रहा।

जैसे ही अम्मी आगे बढ़ीं, उसकी नज़रें मुड़कर मुझसे टकराईं। हमारी नज़रें सिर्फ एक पल के लिए मिलीं, और उसने मुझे देखते हुए ... आँख मार दी।

और फिर... वो अकरम को पुकारता हुआ, स्टेज की तरफ बढ़ गया।

मेरा खून खौल उठा। मेरी मुट्ठियाँ कस गईं और बदन गुस्से से कांपने लगा।

मैंने भारी कदमों से चलते हुए विशाल को देखा। वो बड़ी शान से स्टेज पर चढ़ा, अकरम से हँस-हँसकर गले मिला जैसे कितना पुराना और वफादार दोस्त हो।

-----------

स्टेज पर पहुँचते ही विशाल की बेशरमी बढ़ गई। उसने बड़े हक से अकरम को अपने गले लगाया, उसे निकाह की मुबारकबाद दी और फिर अकरम की पीठ थपथपाते हुए थोड़ा करीब होकर फुसफुसाया।

"मुबारक हो अकरम भाई! पर सच बताना... आज का वेलकम देखा तुमने?" विशाल ने एक आँख मारते हुए चुटकी ली, "क्या कातिलाना नज़ारा था भाई! तुम्हारी सायमा की खाला आयशा तो सचमुच पूरी आग हैं..."

अकरम का चेहरा एक पल के लिए झेंप और हैरानी से भर गया। उसने इधर-उधर देखते हुए खुद को संभालने की कोशिश की, "क्या... क्या मतलब है तुम्हारा विशाल?"

"अरे अकरम भाई! अब तुम मुझसे भी छुपाओगे क्या?" विशाल ने कमीनी मुस्कान के साथ उसके कंधे पर हाथ रखा, "मैं अच्छी तरह देख रहा था कि मंडप के पास जब आयशा जी तुम्हारे सामने झुकी थीं, तो तुम्हारी आँखें कहाँ टिकी हुई थीं। उनकी उस कुर्ती के गहरे गले में झांकते ब्रा और मम्मों पर से तुम्हारी नज़र हट ही नहीं रही थी।"

अकरम की रंगत उड़ गई, पर विशाल की इस बेबाक बात ने उसके अंदर की हवस को भी हवा दे दी थी। उसने झेंपते हुए बेहद धीमी आवाज़ में अपने दिल का हाल उगल दिया—
"साला... सच कहूँ तो उस नज़ारे को देखकर मेरा भी लंड एकदम टाइट हो गया था। अब तो सायमा के बहाने आयशा जी से मुलाकात होती ही रहेगी, पर हर बार जब भी वो सामने आएँगी, मुझे तो उनके वही सुडौल मम्मे और वो गुलाबी टिप्स ही याद आएँगे।"

विशाल ने अकरम की बात सुनकर एक ज़ोरदार ठहाका दबाया और उसके कान के पास झुककर हँसते हुए कहा, "देखा! मैं तो पहले ही कह रहा था... वैसे भाई, खाला का यह जलवा देखने के बाद तो मुझे पूरा यकीन है कि आज रात तुम्हारी दुल्हन सायमा की खैर नहीं!"

--------------------

फिर उसने सायमा खाला की तरफ देखा और दूर से ही बड़ी शराफत का नाटक करते हुए उन्हें 'आदाब' अर्ज किया।

लेकिन फिर... वो स्टेज पर रुका नहीं।

उसने अकरम के कान में कुछ कहा, हंसा, और स्टेज की दूसरी तरफ से, जहाँ रोशनी कम थी, उतर गया और भीड़ में गायब हो गया।

हम लोग स्टेज पर चढ़े। स्टेज पर सायमा खाला को घेर कर बहुत सारी औरतें और रिश्तेदार खड़ी थीं। सब उनको बारी-बारी से गले लगा रही थीं और मुबारकबाद देने के साथ-साथ लिफाफा या गिफ्ट भी दे रही थीं।

उसको देख कर नानी भी पीछे मुड़ीं और जैसे अचानक कुछ याद आया हो ऐसे कहा-

“अरे आयशा… हमारा लिफाफा तो निकालो बेटा..”

"ओह! हाँ माँ!" अम्मी एकदम से घबरा गयीं।

उनके एक हाथ में उनका छोटा सा सुनहरा क्लच था। दूसरे हाथ में उनका फोन।

मैं उनके बिल्कुल पीछे खड़ा था। वो अपने क्लच में से दो लिफाफा निकालते हुए मेरी ओर मुड़ीं और कहा-

"साहिल! इसे पकड़ो ज़रा। हम सायमा को यह दे कर आते हैं,"

और उन्होंने, बिना सोचे, अपना क्लच और फोन... मेरे हाथ में थमा दिया।

"मैं बस दो मिनट में आयी!"

और वो, नानी के साथ, लिफाफा हाथ में लिए, खुशी से मुस्कुराती हुई... सायमा खाला की तरफ बढ़ गयीं।

और मैं स्टेज की तेज़ रोशनी में वहीं खड़ा रहा। मेरे इर्द-गिर्द लोगों का हुजूम था जो अकरम और सायमा खाला को मुबारकबाद देने के लिए अपने टर्न की राह देख रहे थे।

मैं अम्मी का क्लच और फोन ले कर स्टेज से उतर गया और मंडप में एक खाली चेयर पर बैठ गया।

अम्मी का फोन तो लॉक था लेकिन मैं उनका पासवर्ड जानता था। एक आसान सा 'L' शेप।

मेरा दिल मेरी छाती में एक हथौड़े  की तरह बजने लगा। मैंने स्टेज की तरफ देखा। अम्मी अभी भी सायमा खाला से मिलने के लिए औरतों के बीच खड़ी थीं। फोटोग्राफर उनकी तस्वीरें ले रहा था।

मेरे हाथ कांप रहे थे। मैंने... स्क्रीन पर... वो 'L' शेप... बना दिया और फोन अनलॉक हो गया।

मैंने उनका व्हाट्स-ऐप खोला-
V: बड़ा बोरिंग लग रहा है यार।
अम्मी: हमारी शादियाँ तो ऐसी ही होती हैं।
V: But एक बात तो है..दुल्हन से ज़्यादा हॉट तो तुम लग रही हो…
अम्मी: बकवास नहीं..
V: "सच में… और गारंटी के साथ कह रहा हूँ, सब सालों का टाइट हो गया होगा। खासकर अकरम का! उस नज़ारे को देखकर लंड एकदम टाइट हो गया था… क्या कातिलाना नज़ारा था आपके उन सुडौल मम्मों और गुलाबी टिप्स का!"
अम्मी: "बस हाँ… बहुत हो रहा है… विशाल, अब बस करो!"
इतनी गंदी और बेबाक चैट पढ़ते ही मेरे तो जैसे होश ही उड़ गए, ऐसा लगा मानो मुझे साँप सूँघ गया हो।
V: "बहुत ही तो करना है तुम्हारे साथ.."
अम्मी: "चुप करो विशाल। लोग आसपास हैं। माँ देख लेगी।"
V: "देखने दो। मैं तो बस तुम्हारे सेक्सी होठों को देख रहा हूँ। यह कल रात वाली ही लिपस्टिक है ना?"
अम्मी: "हाँ… पर अब चुप।"
V: "शेड का नाम तो बताओ। कल रात टेस्ट किया था, आज नाम भी जान लूँ।"
अम्मी: "पागल हो? निकाह चल रहा है, तमीज़ से बात करो।"
V: "तमीज़ से ही तो कह रहा हूँ—आज तुम सबसे ज़्यादा चमक रही हो।"
अम्मी: "ड्रामा बंद करो, विशाल।"
V: "ठीक है, लेकिन एक बात… तुमने कान के पीछे हल्का सा परफ्यूम लगाया है ना? वही जो मुझे पागल कर देता है?"
अम्मी: "तुम ज़्यादा नोटिस करते हो।"
V: "इतनी हसीन जो हो। मेरी नज़र कहीं और जाती ही नहीं—खासकर तुम्हारे मम्मों की गोलाई। नेकलाइन से हल्का सा क्लीवेज दिख रहा है, कमीज़ के नीचे का भरा हुआ उभार बिल्कुल पागल कर रहा है।"
अम्मी: "बस, अब बस! माँ यहीं खड़ी है।"
V: "माँ को बोलो, उनकी बेटी को ज़रा हवा चाहिए। मैं हवा हूँ।"
अम्मी: "तुम बहुत बदमाश हो।"
V: "और तुम बहुत खूबसूरत।"
अम्मी: "विशाल, कंट्रोल।"
V: "कंट्रोल कैसे करूँ?"
अम्मी: "काज़ी साहब दुआ माँग रहे हैं... मैं फोन बंद करती हूँ..."
V: "नहीं... नहीं.... रुको...."
V: "कल रात से मैं सिर्फ तुम्हारे बारे में ही सोच रहा हूँ।"
अम्मी: "विशाल प्लीज... स्टॉप... कोई नोटिस कर लेगा..."
V: "ठीक है बाबा.... सुनो.... दो मिनट के लिए किचन के पीछे वाले कॉरिडोर में आ जाओ। भीड़ भी नहीं होती वहाँ।"
अम्मी: "अभी नामुमकिन।"
V: "तो फिर एक सेल्फी भेज दो। सिर्फ लिप्स… बस लिपस्टिक की...."
अम्मी: "बिल्कुल नहीं।"

मैं स्टेज से थोड़ा दूर, उस खाली कुर्सी पर बैठकर यह सब पढ़ रहा था। मेरा दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। अम्मी का फोन मेरे हाथों में था, और व्हाट्सएप की स्क्रीन पर उनके और विशाल के बीच हुई यह घिनौनी बातचीत खुली हुई थी।

यह सब पढ़कर मेरा सिर घूम रहा था। यह सिर्फ साधारण मैसेजेस नहीं थे—यह उनकी वो अश्लील बातें थीं, जो वो पवित्र निकाह के दौरान भी बेधड़क कर रहे थे, मानो उनके लिए पूरी दुनिया रुक गई हो।

मैंने कांपती उंगलियों से स्क्रीन को नीचे स्क्रॉल किया, तो चैट और आगे बढ़ी। यह सिलसिला अभी ख़त्म नहीं हुआ था; वे दोनों आगे की बातें कर रहे थे और किसी चीज़ का प्लान बना रहे थे। यह देखकर मेरा खून और तेज़ी से उबलने लगा।

V: "प्लीज यार, एक सेल्फी... बस लिप्स की। मैं यहाँ अकेले बोर हो रहा हूँ।"

अम्मी: "नहीं विशाल! लोग हर तरफ हैं। फोटोग्राफर भी चारों तरफ घूम-घूम कर तस्वीरें ले रहा है।"
V: "तो ठीक है, मत भेजो। लेकिन सुनो... अभी स्टेज पर जाकर अकरम और सायमा को मुबारकबाद दे दो। उसके बाद, थोड़ा टाइम निकाल लेना। हवेली के पीछे वाला स्टोर रूम याद है ना? जो खाली पड़ा रहता है..."

अम्मी: "क्या?! अभी?! पागल हो गए हो क्या विशाल? सब लोग यहीं मौजूद हैं।"

V: "अरे वही तो! सब लोग यहाँ मंडप और शादी के ड्रामे में बिजी हैं। कोई नोटिस नहीं करेगा। बस 5 मिनट... मैं पहले पहुँचकर स्टोर रूम के अंदर तुम्हारा वेट करूँगा। डोर अंदर से लॉक कर लेंगे... बिल्कुल कल रात की तरह... बस एक क्विक किस।"

अम्मी: "विशाल... प्लीज! साहिल भी यहीं घूम रहा है और माँ भी। अगर किसी ने देख लिया तो?"

V: "साहिल अपने दोस्तों के साथ बिजी होगा और नानी तो अभी सायमा के पास खड़ी हैं। कम ऑन आयशा... तुम्हारे महक अभी तक मेरे दिमाग में चढ़ी हुई है। प्लीज यार, अब मना मत करो…"

अम्मी: "तुम बहुत ज़्यादा जिद कर रहे हो विशाल... लेकिन... ठीक है। मैं मुबारकबाद देकर आने की कोशिश करती हूँ। लेकिन याद रखना, सिर्फ 2 मिनट... और कुछ नहीं!"

V: "प्रॉमिस? मैं अभी निकल रहा हूँ और स्टोर रूम में तुम्हारा वेट करूँगा। जल्दी आ जाओ।"

अम्मी: "हाँ... बस थोड़ा संभल कर रहना।"
चैट यहीं ख़त्म हो गई थी। आख़िरी मैसेज अम्मी का ही था, जो कुछ ही मिनट पहले भेजा गया था। यह सब देखकर मेरा हाथ फोन पर ही जम गया।

यह... यह सब अभी, इसी वक्त हो रहा था? विशाल इस वक्त हवेली के उस सुनसान स्टोर रूम में अम्मी का इंतज़ार कर रहा होगा? और अम्मी... वो अभी स्टेज पर थीं, पर किसी भी पल वहाँ से निकलने वाली थीं?

मैंने कांपते हाथों से जल्दी से फोन बंद किया और उसे लॉक कर दिया। मेरा दिमाग बुरी तरह घूम रहा था।

मैंने तुरंत स्टेज की तरफ देखा। अम्मी अभी भी वहीं थीं, सायमा खाला से गले मिल रही थीं और नानी के साथ मुस्कुराकर बातें कर रही थीं।

मेरी नज़र अचानक अकरम पर पड़ी। अकरम की निगाहें अम्मी के ऊपर ही गड़ी हुई थीं—और खासकर उनके सीने के उभार की तरफ। मैं अंदर तक कांप गया... क्या अकरम भी विशाल की तरह ही नीच है? क्या उसकी शराफत का यह नकाब भी अब उतर रहा था?

तभी स्टेज अकरम ने पहले नानी को गले लगाया और उनसे दुआएं लीं। तुरंत बाद, वो अम्मी की तरफ बढ़ा।

अकरम ने अम्मी को जिस तरह से गले लगाया, वो किसी दामाद का अपनी दुल्हन की बड़ी बहन को गले लगाना बिल्कुल नहीं था। उसने अम्मी को बहुत ही ज़ोर से और कसकर अपने सीने से लगा लिया—एक ऐसा बेहद टाइट हग, जिसमें ऐसा लग रहा था मानो अम्मी के वो सुडौल, भारी मम्मे अकरम की चौड़ी छाती पर बुरी तरह पिस रहे हों।
अम्मी इस अचानक हुए शारीरिक स्पर्श से बुरी तरह हड़बड़ा गईं। उन्हें अपने नए दामाद से इस हद तक बेबाक हरकत की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।

उनके जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने घबराकर, थोड़ी मशक्कत के साथ खुद को अकरम के जिस्म से पीछे खींचकर दूर किया। अम्मी का चेहरा शर्म और अनजाने डर से लाल हो चुका था।

उनकी नज़रें बार-बार इधर-उधर भटक रही थीं, जैसे वो जाने के लिए सही वक्त और मौका तलाश रही हों।

मेरा खून खौल उठा। पहले विशाल और अब अकरम भी... अम्मी यह सब चुपचाप कैसे होने दे रही थीं?

मैं वहीं बुत बना खड़ा रहा, मेरी छाती में दिल किसी हथौड़े की तरह धड़क रहा था। थोड़ी देर में अम्मी स्टेज से नीचे उतरीं और भीड़ को चीरती हुई तेज़ी से मेरी तरफ आने लगीं।

उनका चेहरा एकदम खिला हुआ था, जैसे कुछ हुआ ही न हो... लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और जल्दीबाज़ी साफ़ दिख रही थी।

वो मेरे पास पहुँचीं और मुझे देखकर एक बनावटी मुस्कान बिखेरी, "अरे साहिल... यह लो, मैं आ गई। मेरा क्लच और फोन दे दो बेटा।"

मेरा हाथ गुस्से और डर से कांप रहा था, लेकिन मैंने बिना कुछ कहे खामोशी से उनका क्लच और फोन उन्हें थमा दिया।

उन्होंने झटपट क्लच खोला, फोन को उसके अंदर डाला और मेरी तरफ देखा, "बेटा, मैं ज़रा वॉशरूम होकर आती हूँ... थोड़ा फ्रेश होना है। तुम यहीं रुको और जाकर नानी के पास बैठो, ठीक है?"

वॉशरूम? मैं जानता था यह झूठ था। स्टोर रूम वॉशरूम से बिल्कुल अलग तरफ था। लेकिन मैंने सिर्फ सर हिला दिया, कुछ नहीं कहा।

गुस्सा अंदर ही अंदर उबल रहा था, लेकिन मैं अभी कुछ नहीं कर सकता था। वो मुस्कुरा कर पलटी, और भीड़ में घुल-मिल गयी, हवेली के पीछे वाले हिस्से की तरफ बढ़ती हुई।

मैं वहीं खड़ा रहा, उस झूठ की कड़वाहट मेरे गले में उतर रही थी। "वॉशरूम"।

अम्मी का सुनहरा दुपट्टा भीड़ में एक लहर की तरह गायब हो रहा था। वो उस सुनसान, धूल-भरे कॉरिडोर की तरफ मुड़ गयी थीं जो हवेली के पिछले हिस्से और पुराने स्टोर रूम की तरफ जाता था।

दोपहर के 12:30 बज रहे थे। बाहर सूरज सर पर था, लेकिन हवेली के इस हिस्से में शैडोज़ लंबी हो रही थीं।

मैंने 10 तक गिनती गिनी।

1... 2... 3...

मैंने इधर-उधर देखा। नानी अभी भी स्टेज पर सायमा खाला के साथ बिजी थीं। अकरम दोस्तों से घिरा हुआ था। किसी का ध्यान मुझ पर नहीं था।

मैंने अपनी कुर्सी छोड़ी और भीड़ के किनारे-किनारे चलता हुआ, उसी दिशा में बढ़ गया जहाँ अम्मी गयी थीं।

जैसे-जैसे मैं मंडप से दूर होता गया, ढोल की आवाज़ धीमी होती गयी। यहाँ कॉरिडोर में सूरज की रोशनी सिर्फ ऊँची खिड़कियों से 'बीम्स' की शक्ल में आ रही थी, जिसमें धूल के कण नाच रहे थे। हवा में पुरानी लकड़ी और नमी की बू थी।

मैंने अपने कदम हल्का कर लिए। बिल्कुल दबे पाँव।

कॉरिडोर के आखिर में, मैंने अम्मी को देखा। वो स्टोर रूम के दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उनका सुनहरा जोड़ा इस धूप-छाँव में चमक रहा था। उन्होंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। उनका चेहरा डर और बेताबी से लाल था।

उन्होंने दरवाज़े पर हाथ रखा ही था कि दरवाज़ा अंदर से खुला। अंदर अंधेरा था, लेकिन सूरज की एक तीखी किरण सीधा अंदर जा रही थी।

विशाल ने अंदर से हाथ निकाल कर अम्मी की नंगी कलाई पकड़ी और उन्हें एक झटके से अंदर खींच लिया।

"आह!" अम्मी की हल्की सी सिसकी निकली।

थक।

दरवाज़ा बंद हुआ। लेकिन कुंडी लगने की आवाज़ नहीं आयी। शायद पुराना लॉक खराब था, या उन्हें इतनी जल्दी थी कि ध्यान नहीं रहा।

मैं सांस रोके, दीवार से चिपक कर, आगे बढ़ा।

मैं दरवाज़े के बिल्कुल बाहर आ गया। लकड़ी का दरवाज़ा पुराना था, और पैनल्स के बीच में हल्की दरारें थीं।

मैंने अपनी आँख उस दरार के पास लगायी। अंदर का मंज़र देख कर मेरी सांसें अटक गयीं।

कमरे में धूल और पुराने सामान की बू थी, लेकिन अम्मी के परफ्यूम ने उसे डुबा दिया था। सूरज की एक मोटी किरण सीधा उन पर पड़ रही थी, जैसे किसी स्पॉटलाइट की तरह।

कमरा बहुत बड़ा था और हर तरफ पुराने संदूक और टूटा फर्नीचर पड़ा था जिन पर धूल की मोटी परत जमी थी। सूरज की एक मोटी किरण रोशनदान से सीधा कमरे के बीच में पड़ रही थी, जैसे किसी स्पॉटलाइट की तरह।

अम्मी और विशाल कमरे के बिल्कुल बीच में खड़े थे, किसी भी गंदी दीवार या फर्नीचर से दूर, ताकि अम्मी का महंगा जोड़ा खराब ना हो।

विशाल अम्मी के सामने खड़ा था। उसने अम्मी के बाज़ुओं को अपनी मज़बूत पकड़ में ले रखा था।

उसकी उंगलियाँ अम्मी के टाइट, सुनहरे स्लीव्स में धँस रही थीं। उसने उन्हें इस तरह जकड़ रखा था जैसे कोई मालिक अपनी सबसे कीमती चीज़ को पकड़ता है - सख्त, लेकिन जिस्म की गर्मी को महसूस करते हुए।

"पागल हो तुम..." अम्मी की आवाज़ आयी, जो घबराहट कम और नशा ज़्यादा लग रही थी। उनका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे उनकी नेकलाइन से उनका गोरा, भरा हुआ क्लीवेज साफ़ झलक रहा था।

"बाहर लोग हैं, विशाल! और यहाँ कितनी धूल भी है।"

"धूल को भूल जाओ," विशाल ने उनके बाज़ुओं को अपनी तरफ खींचा, जिससे अम्मी का भरा हुआ जिस्म सीधा उसके सीने से आ टकराया। "तुम्हारी खुशबू ने इस पूरे कमरे को महका दिया है।"

अम्मी ने अपने हाथ विशाल के सीने पर रख दिए, लेकिन उसे धक्का देने के बजाय, उनकी उंगलियाँ उसके कुर्ते के कपड़े को मसलने लगीं। "तुम्हें चैन नहीं है? वहाँ सब इंतज़ार कर रहे हैं।"

"चैन? तुमने सुबह से मेरा चैन छीन रखा है," विशाल फुसफुसाया। उसकी नज़रें अम्मी के चेहरे से फिसल कर नीचे गयीं, उनके उभरे हुए सीने पर, जो उस टाइट गोल्डन सूट में कैद थे।

"वहाँ स्टेज पर सब 'कबूल है' बोल रहे थे, और मैं बस यही सोच रहा था कि कब तुम्हें यहाँ ला कर, इन कपड़ों के अंदर छुपे पहाड़ को महसूस करूँगा।"
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



Like Reply
[Image: 0a1ba4a35bf41b4f5d260b415ebd5189.jpg]

saima Picture
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



Like Reply
Aur tabhi, Vishal, jo apne doston ke saath tha, rasta kaat-ta hua, Ammi aur Naani ke theek saamne aa gaya.

"Naani! Mubaarak ho!" Usne jhuk kar, ek dilkash muskuraahat ke saath kaha.

"Khair mubaarak, beta!" Naani ne khushi se uske sir par haath rakha.

Phir wo Ammi ki oor muda aur usne Ammi ko... oopar se neeche tak... dekha. Yeh ek second se bhi kam waqt ke liye hua.

"Mubaarak ho... Ayesha ji," usne 'ji' lafz par itna zor diya, jaise mazaak uda raha ho.

"Khair mubaarak," Ammi ne fauran nazarein churaate hue kaha.

"Finally Akram aur Saima ka nikaah ho gaya," Vishal ne kaha. Naani yeh sun kar muskura deen.

Lekin phir wo thoda aage jhuka aur bheed ke shor mein dheemi aawaaz mein Ammi se kaha— "Ekdam maal lag rahi ho is jode mein."

Usne ek pal ka pause liya, uski nazarein Ammi ke hothon par thheen. "Khaas kar is lipstick ke saath. Iska taste abhi tak yaad hai mujhe…."

Ammi ki aankhein dahashat se phail gayeen. Unka haath fauran unke hothon par gaya.

"Kya... kya keh rahe ho?" Naani ne shor mein theek se suna nahi.

"Mein keh raha tha, Naani," Vishal ne fauran Naani ki taraf mudte hue kaha, "Akram ekdam kamaal laga raha hai is jode mein."

Aur phir usne Ammi ki nazron mein aankhein daalte hue, apni nigaahein seedhe unke seene ke ubhaar par tika deen aur kaha—

"Khaaskaskar yeh jo... embroidery ka kaam hai... iska ubhaar bahut badhiya dikh raha hai... bilkul perfect."

Naani, jo Vishal ki baaton ko Akram ki sherwani ke baare mein samajh rahi thheen, Akram ki taraf dekhte hue bol padeen, "Haan-haan beta, bahut nafees kaam hai."

Ammi ka chehra sharm, jhijhak aur ek ajeeb si shokhi ki wajah se laal ho gaya tha. Unhone Vishal ki is besharm chaatulaai aur dohre arth wale jumle par hawa mein haath uthaya... jaise wo use thappad maarna chahti hon.

Tabhi Vishal ne apni baat ka rukh Naani ki taraf modte hue kaha, "Waise Naani... mein aapse ek baat kehna chahta hoon."
Naani ne muskuraakar uski taraf dekha, "Kya baat hai beta?"

"Naani, aapki is beti ne baaraatiyon ka welcome bahut hi shaandaar aur anokhe tareeqe se kiya hai," Vishal ne Ammi ki taraf ek kameeni nazar daalte hue kaha, "Jab yeh haath mein thaali lekar Akram ka welcome karne ke liye aage jhuki thheen na... kasam se Naani, kya kamaal ka nazaara tha!"

Naani ke kuchh samajhne se pehle hi Vishal ne Ammi ke kareeb jhukkar unke kaan mein behad dheemi, hawas bhari aawaaz mein phusphusaya—

"Kurti ke gahre gale se jhaankte aapki us peeli bra ke oopar dono nange mamme... aur wo angoor ki tarah tane hue gulaabi tips... ufff Ayesha! Itna kaatilaana nazaara tha ki aapka hone wala daamaad Akram bhi aisa welcome apni poori umr nahi bhool paayega!"

"Maarungi!" Unke honth yeh lafz, bina aawaaz ke, bole.

"Kya hua?" Naani ne palat kar unhein dekha.

Ammi ne fauran... apne us uthe hue haath se... apne sunahre dupatta ko theek kiya... aur khilkhila kar hans padeen. "Kuchh nahi, Maa!!"

------------

Vishal thoda aur Ayesha ke kareeb sarak aaya. Uski saansen Ayesha ke kaan ke paas thheen, jab usne behad dheemi aawaaz mein phusphusaate hue kaha—
"Ayesha ji, zara mudkar dekhiye to sahi... humara doolha Akram abhi bhi stage par baitha-baitha aap hi ko taak raha hai."

Ayesha ka dil dar ke maare dhak se reh gaya. Unhone ghabraakar apni gardan ghumai aur stage ki taraf dekha. Vishal ki baat sach thhi—Akram vaakai unhi ki taraf takataki lagaaye dekh raha tha.

Lekin uski nazarein Ayesha ke chehre par nahi thheen. Akram ki nazron ka angle seedhe Ayesha ke seene par, us ubhaar aur kurti ke gale par tika hua tha, jahan kuchh der pehle hi usne wah beparda nazaara dekha tha. Akram maano abhi bhi usi haadse ki yaadon mein khoya hua tha.

Ayesha ne khauf aur sharm ke maare kaampte hue apni nazarein neeche jhuka leen. Unka chehra tapne laga tha. Unhone Vishal ki taraf behad dabi, phusphusaati hui aawaaz mein kaha, jismein nafrat aur laachaari saaf jhalak rahi thhi—

Ayesha (daant bheenchte hue, dheemi phusphusaahat mein): "Had darje ke kameene ho tum, Vishal... tumne aaj mujhe kahin ka nahi chhora. Ab mein saari zindagi Akram ke saamne apna munh kaise dikha paungi?"

Vishal ke chehre par wahi shaatir muskaan tair gai. Usne bade itmeenaan se Ayesha ki aankhon mein dekha aur bilkul dheeme se unke kaan ke paas jhukkar kaha—

Vishal (kameeni hansi ke saath): "Wah to mein hoon hi Ayesha ji... par waise, mujhe nahi lagta ki ab Akram ki nigaahein kabhi aapke munh ki taraf jaaengi. Unka nishaana to hamesha kahin aur hi rahega!"

Vishal ke munh se yeh besharm baat sunte hi Ayesha ka gora chehra sharm, jhijhak aur badan mein daudti vaasana ki siharan se ekdam laal ho gaya. Unka vajood andar tak kaamp utha aur wah ek shabd bhi aage nahi bol sakeen.

-----------

Mein un dono ke itne kareeb khade hone ki wajah se poori baat to theek se nahi sun gaya, par door se hi Vishal ki us neech muskaan aur Ammi ke chehre par chhaati laali ko dekhkar mera poora badan gusse aur jalan se khaul raha tha.

Un dono ki is nazdeeki ne mere jism mein aag laga di thhi, aur mera dil chaah raha tha ki abhi jaakar us kameene ka girebaan pakad loon.

"H-humein... ab stage par jaana chahiye," Ammi ne kisi tarah apni aawaaz ko sambhaala aur Naani ka haath pakadkar tezi se aage badh gayeen.

Mein bhi apne andar sulagti aag ko dabaaye unke peeche-peeche chalne laga.

Vishal waheen apni jagah par khada raha.

Jaise hi Ammi aage badheen, uski nazarein mudkar mujhse takraayeen. Humari nazarein sirf ek pal ke liye mileen, aur usne mujhe dekhte hue... aankh maar di.

Aur phir... wo Akram ko pukaarta hua, stage ki taraf badh gaya.

Mera khoon khaul utha. Meri mutthiyaan kas gayeen aur badan gusse se kaampne laga.

Maine bhaari kadmon se chalte hue Vishal ko dekha. Wo badi shaan se stage par chadha, Akram se hans-hanskar gale mila jaise kitna purana aur wafaadaar dost ho.

---------------

Stage par pahunchte hi Vishal ki besharmi badh gai. Usne bade haq se Akram ko apne gale lagaya, use nikaah ki mubaarakbaad di aur phir Akram ki peeth thapthapaate hue thoda kareeb hokar phusphusaya.

"Mubaarak ho Akram bhai! Par sach bataana... aaj ka welcome dekha tumne?" Vishal ne ek aankh maarte hue chutki li, "Kya kaatilaana nazaara tha bhai! Tumhari Saima ki khaala Ayesha to sachmuch poori aag hain..."

Akram ka chehra ek pal ke liye jhenp aur hairani se bhar gaya. Usne idhar-udhar dekhte hue khud ko sambhaalne ki koshish ki, "Kya... kya matlab hai tumhara Vishal?"

"Are Akram bhai! Ab tum mujhse bhi chhupaoge kya?" Vishal ne kameeni muskaan ke saath uske kandhe par haath rakh, "Mein achhi tarah dekh raha tha ki mandap ke paas jab Ayesha ji tumhare saamne jhuki thheen, to tumhari aankhein kahan tiki hui thheen. Unki us kurti ke gahre gale mein jhaankte bra aur mammon par se tumhari nazar hat hi nahi rahi thhi."

Akram ki sangat ud gai, par Vishal ki is bebaak baat ne uske andar ki hawas ko bhi hawa de di thhi. Usne jhenpte hue behad dheemi aawaaz mein apne dil ka haal ugal diya—
"Saala... sach kahoon to us nazaare ko dekhkar mera bhi lund ekdam tight ho gaya tha. Ab to Saima ke bahaane Ayesha ji se mulaqaat hoti hi rahegi, par har baar jab bhi wo saamne aaengi, mujhe to unke wahi sudaul mamme aur wo gulaabi tips hi yaad aaenge."

Vishal ne Akram ki baat sunkar ek zordaar thahaaka dabaaya aur uske kaan ke paas jhukkar hanste hue kaha, "Dekha! Mein to pehle hi keh raha tha... waise bhai, khaala ka yeh jalwa dekhne ke baad to mujhe poora yakeen hai ki aaj raat tumhari dulhan Saima ki khair nahi!"

------------

Phir usne Saima khaala ki taraf dekha aur door se hi badi sharaafat ka naatak karte hue unhein 'aadaab' arz kiya.

Lekin phir... wo stage par roka nahi.

Usne Akram ke kaan mein kuchh kaha, hansa, aur stage ki doosri taraf se, jahan roshni kam thhi, utar gaya aur bheed mein gaayab ho gaya.

Hum log stage par chadhe. Stage par Saima khaala ko gher kar bahut saari auratein aur rishtedaar khadi thheen. Sab unko baari-baari se gale laga rahi thheen aur mubaarakbaad dene ke saath-saath lifafa ya gift bhi de rahi thheen.

Usko dekh kar Naani bhi peeche moodeen aur jaise achanak kuchh yaad aaya ho aise kaha—

“Are Ayesha… humara lifafa to nikaalo beta..”

"Oh! Haan Maa!" Ammi ekdam se ghabra gayeen.

Unke ek haath mein unka chhota sa sunahra clutch tha. Doosre haath mein unka phone.

Mein unke bilkul peeche khada tha. Wo apne clutch mein se do lifafa nikaalte hue meri oor moodeen aur kaha—

"Sahil! Ise pakdo zara. Hum Saima ko yeh de kar aate hain,"

Aur unhone, bina soche, apna clutch aur phone... mere haath mein thama diya.

"Mein bas do minute mein aayi!"

Aur wo, Naani ke saath, lifafa haath mein liye, khushi se muskuraati hui... Saima khaala ki taraf badh gayeen.

Aur mein stage ki tez roshni mein waheen khada raha. Mere ird-gird logon ka hujoom tha jo Akram aur Saima khaala ko mubaarakbaad dene ke liye apne turn ki raah dekh rahe the.

Mein Ammi ka clutch aur phone le kar stage se utar gaya aur mandap mein ek khaali chair par baith gaya.

Ammi ka phone to lock tha lekin mein unka password jaanta tha. Ek aasaan sa 'L' shape.

Mera dil meri chhaati mein ek hathode ki tarah bajne laga. Maine stage ki taraf dekha. Ammi abhi bhi Saima khaala se milne ke liye auraton ke beech khadi thheen. Photographer unki tasveerein le raha tha.

Mere haath kaamp rahe the. Maine... screen par... wo 'L' shape... bana diya aur phone unlock ho gaya.

Maine unka WhatsApp khola—
V: Bada boring lag raha hai yaar.
Ammi: Humari shaadiyaan to aisi hi hoti hain.
V: But ek baat to hai..dulhan se zyaada hot to tum lag rahi ho…
Ammi: Bakwaas nahi..
V: "Sach mein… aur guarantee ke saath keh raha hoon, sab saalon ka tight ho gaya hoga. Khaas kar Akram ka! Us nazaare ko dekhkar lund ekdam tight ho gaya tha… kya kaatilaana nazaara tha aapke un sudaul mammon aur gulaabi tips ka!"
Ammi: "Bas haan… bahut ho raha hai… Vishal, ab bas karo!"
Itni gandi aur bebaak chat padhte hi mere to jaise hosh hi ud gaye, aisa laga maano mujhe saamp soongh gaya ho.
V: "Bahut hi to karna hai tumhare saath.."
Ammi: "Chup karo Vishal. Log aas-paas hain. Maa dekh legi."
V: "Dekhne do. Mein to bas tumhare sexy hothon ko dekh raha hoon. Yeh kal raat wali hi lipstick hai na?"
Ammi: "Haan… par ab chup."
V: "Shed ka naam to batao. Kal raat test kiya tha, aaj naam bhi jaan loon."
Ammi: "Paagal ho? Nikaah chal raha hai, tameez se baat karo."
V: "Tameez se hi to keh raha hoon—aaj tum sabse zyaada chamak rahi ho."
Ammi: "Drama band karo, Vishal."
V: "Theek hai, lekin ek baat… tumne kaan ke peeche halka sa perfume lagaya hai na? Wahi jo mujhe paagal kar deta hai?"
Ammi: "Tum zyaada notice karte ho."
V: "Itni haseen jo ho. Meri nazar kahin aur jaati hi nahi—khaas kar tumhare mammon ki golai. Neckline se halka sa cleavage dikh raha hai, kameez ke neeche ka bhara hua ubhaar bilkul paagal kar raha hai."
Ammi: "Bas, ab bas! Maa yeheen khadi hai."
V: "Maa ko bolo, unki beti ko zara hawa chahiye. Mein hawa hoon."
Ammi: "Tum bahut badmaash ho."
V: "Aur tum bahut khoobsurat."
Ammi: "Vishal, control."
V: "Control kaise karoon?"
Ammi: "Qaazi sahab dua maang rahe hain... mein phone band karti hoon..."
V: "Nahi... nahi.... ruko...."
V: "Kal raat se mein sirf tumhare baare mein hi soch raha hoon."
Ammi: "Vishal please... stop... koi notice kar lega..."
V: "Theek hai baba.... suno.... do minute ke liye kitchen ke peeche wale corridor mein aa jaao. Bheed bhi nahi hoti wahan."
Ammi: "Abhi naamumkin."
V: "To phir ek selfie bhej do. Sirf lips… bas lipstick ki...."
Ammi: "Bilkul nahi."

Mein stage se thoda door, us khaali kursi par baithkar yeh sab padh raha tha. Mera dil abhi bhi zor-zor se dhadak raha tha. Ammi ka phone mere haathon mein tha, aur WhatsApp ki screen par unke aur Vishal ke beech hui yeh ghinauni baatcheet khuli hui thhi.

Yeh sab padhkar mera sir ghoom raha tha. Yeh sirf saadhaaran messages nahi the—yeh unki wo ashleel baatein thheen, jo wo pavitra nikaah ke dauraan bhi bedhadak kar rahe the, maano unke liye poori duniya ruk gai ho.

Maine kaampti ungliyon se screen ko neeche scroll kiya, to chat aur aage badhi. Yeh silsila abhi khatam nahi hua tha; ve dono aage ki baatein kar rahe the aur kisi cheez ka plan bana rahe the. Yeh dekhkar mera khoon aur tezi se ubalne laga.

V: "Please yaar, ek selfie... bas lips ki. Mein yahan akele bore ho raha hoon."

Ammi: "Nahi Vishal! Log har taraf hain. Photographer bhi chaaron taraf ghoom-ghoom kar tasveerein le raha hai."
V: "To theek hai, mat bhejo. Lekin suno... abhi stage par jaakar Akram aur Saima ko mubaarakbaad de do. Uske baad, thoda time nikaal lena. Haveli ke peeche wala store room yaad hai na? Jo khaali pada rehta hai..."

Ammi: "Kya?! Abhi?! Paagal ho gaye ho kya Vishal? Sab log yeheen maujood hain."

V: "Are wahi to! Sab log yahan mandap aur shaadi ke drame mein busy hain. Koi notice nahi karega. Bas 5 minute... mein pehle pahunchkar store room ke andar tumhara wait karunga. Door andar se lock kar lenge... bilkul kal raat ki tarah... bas ek quick kiss."

Ammi: "Vishal... please! Sahil bhi yeheen ghoom raha hai aur Maa bhi. Agar kisi ne dekh liya to?"

V: "Sahil apne doston ke saath busy hoga aur Naani to abhi Saima ke paas khadi hain. Come on Ayesha... tumhare mehak abhi tak mere dimaag mein chadhi hui hai. Please yaar, ab mana mat karo…"

Ammi: "Tum bahut zyaada zid kar rahe ho Vishal... lekin... theek hai. Mein mubaarakbaad dekar aane ki koshish karti hoon. Lekin yaad rakhna, sirf 2 minute... aur kuchh nahi!"

V: "Promise? Mein abhi nikal raha hoon aur store room mein tumhara wait karunga. Jaldi aa jaao."

Ammi: "Haan... bas thoda sambhal kar rehna."
Chat yeheen khatam ho gai thhi. Aakhiri message Ammi ka hi tha, jo kuchh hi minute pehle bheja gaya tha. Yeh sab dekhkar mera haath phone par hi jam gaya.

Yeh... yeh sab abhi, isi waqt ho raha tha? Vishal is waqt haveli ke us sunsaan store room mein Ammi ka intazaar kar raha hoga? Aur Ammi... wo abhi stage par thheen, par kisi bhi pal wahan se nikalne wali thheen?

Maine kaampti haathon se jaldi se phone band kiya aur use lock kar diya. Mera dimaag boori tarah ghoom raha tha.

Maine turant stage ki taraf dekha. Ammi abhi bhi waheen thheen, Saima khaala se gale mil rahi thheen aur Naani ke saath muskuraakar baatein kar rahi thheen.

Meri nazar achanak Akram par padi. Akram ki nigaahein Ammi ke oopar hi gadai hui thheen—aur khaas kar unke seene ke ubhaar ki taraf. Mein andar tak kaamp gaya... kya Akram bhi Vishal ki tarah hi neech hai? Kya uski sharaafat ka yeh naqaab bhi ab utar raha tha?

Tabhi stage Akram ne pehle Naani ko gale lagaya aur unse duaayein leen. Turant baad, wo Ammi ki taraf badha.

Akram ne Ammi ko jis tarah se gale lagaya, wo kisi daamaad ka apni dulhan ki badi behen ko gale lagaana bilkul nahi tha. Usne Ammi ko bahut hi zor se aur kaskar apne seene se laga liya—ek aisa behad tight hug, jismein aisa lag raha tha maano Ammi ke wo sudaul, bhaari mamme Akram ki chaudi chhaati par boori tarah pis rahe hon.
Ammi is achanak hue shaareerik sparsh se boori tarah hadbada gayeen. Unhein apne naye daamaad se is had tak bebaak harkat ki ummeed bilkul nahi thhi.

Unke jism mein ek siharan daud gai aur unhone ghabraakar, thodi mashaqqat ke saath khud ko Akram ke jism se peeche kheenchkar door kiya. Ammi ka chehra sharm aur anjaane dar se laal ho chuka tha.

Unki nazarein baar-baar idhar-udhar bhatak rahi thheen, jaise wo jaane ke liye sahi waqt aur mauka talaash rahi hon.

Mera khoon khaul utha. Pehle Vishal aur ab Akram bhi... Ammi yeh sab chupchaap kaise hone de rahi thheen?

Mein waheen but bana khada raha, meri chhaati mein dil kisi hathode ki tarah dhadak raha tha. Thodi der mein Ammi stage se neeche utreen aur bheed ko cheerti hui tezi se meri taraf aane lageen.

Unka chehra ekdam khila hua tha, jaise kuchh hua hi na ho... lekin unki aankhon mein ek ajeeb si hadbadaahat aur jaldibaazi saaf dikh rahi thhi.

Wo mere paas pahuncheen aur mujhe dekhkar ek banaavati muskaan bikheri, "Are Sahil... yeh lo, mein aa gai. Mera clutch aur phone de do beta."

Mera haath gusse aur dar se kaamp raha tha, lekin maine bina kuchh kahe khaamoshi se unka clutch aur phone unhein thama diya.

Unhone jhatpat clutch khola, phone ko uske andar daala aur meri taraf dekha, "Beta, mein zara washroom hokar aati hoon... thoda fresh hona hai. Tum yeheen ruko aur jaakar Naani ke paas baitho, theek hai?"

Washroom? Mein jaanta tha yeh jhooth tha. Store room washroom se bilkul alag taraf tha. Lekin maine sirf sir hila diya, kuchh nahi kaha.

Gussa andar hi andar ubal raha tha, lekin mein abhi kuchh nahi kar sakta tha. Wo muskura kar meenti, aur bheed mein ghul-mil gai, haveli ke peeche wale hisse ki taraf badhti hui.

Mein waheen khada raha, us jhooth ki kadvahat mere gale mein utar rahi thhi. "Washroom".

Ammi ka sunahra dupatta bheed mein ek lahar ki tarah gaayab ho raha tha. Wo us sunsaan, dhool-bhare corridor ki taraf mud gayeen thheen jo haveli ke pichhle hisse aur purane store room ki taraf jaata tha.

Dopehar ke 12:30 baj rahe the. Baahar Sooraj sar par tha, lekin haveli ke is hisse mein shadows lambi ho rahi thheen.

Maine 10 tak ginti gini.

1... 2... 3...

Maine idhar-udhar dekha. Naani abhi bhi stage par Saima khaala ke saath busy thheen. Akram doston se ghira hua tha. Kisi ka dhyaan mujh par nahi tha.

Maine apni kursi chhori aur bheed ke kinaare-kinaare chalte hua, usi disha mein badh gaya jahan Ammi gayeen thheen.

Jaise-jaise mein mandap se door hota gaya, dhol ki aawaaz dheemi hoti gai. Yahan corridor mein Sooraj ki roshni sirf oonchi khidkiyon se 'beams' ki shaqal mein aa rahi thhi, jismein dhool ke kan naach rahe the. Hawa mein purani lakdi aur nami ki boo thhi.

Maine apne kadam halka kar liye. Bilkul dabe paanv.

Corridor ke aakhir mein, maine Ammi ko dekha. Wo store room ke darwaaze ke paas khadi thheen. Unka sunahra joda is dhoop-chhaanv mein chamak raha tha. Unhone ek baar peeche mudkar dekha. Unka chehra dar aur betaabi se laal tha.

Unhone darwaaze par haath rakha hi tha ki darwaaza andar se khula. Andar andhera tha, lekin Sooraj ki ek teekhi kiran seedha andar ja rahi thhi.

Vishal ne andar se haath nikaal kar Ammi ki nangi kalai pakdi aur unhein ek jhatke se andar kheench liya.

"Aah!" Ammi ki halki si siski nikli.

Thak.

Darwaaza band hua. Lekin kundi lagne ki aawaaz nahi aayi. Shayad purana lock kharaab tha, ya unhein itni jaldi thhi ki dhyaan nahi raha.

Mein saans roke, deewar se chipak kar, aage badha.

Mein darwaaze ke bilkul baahar aa gaya. Lakdi ka darwaaza purana tha, aur panels ke beech mein halki daraarein thheen.

Maine apni aankh us daraar ke paas lagayi. Andar ka manzar dekh kar meri saansen atak gayeen.

Kamre mein dhool aur purane saamaan ki boo thhi, lekin Ammi ke perfume ne use dooba diya tha. Sooraj ki ek moti kiran seedha un par pad rahi thhi, jaise kisi spotlight ki tarah.

Kamra bahut bada tha aur har taraf purane sandook aur toota furniture pada tha jin par dhool ki moti parat jami thhi. Sooraj ki ek moti kiran roshandaan se seedha kamre ke beech mein pad rahi thhi, jaise kisi spotlight ki tarah.

Ammi aur Vishal kamre ke bilkul beech mein khade the, kisi bhi gandi deewar ya furniture se door, taaki Ammi ka mehnaga joda kharaab na ho.

Vishal Ammi ke saamne khada tha. Usne Ammi ke baazuon ko apni mazboot pakad mein le rakha tha.

Uski ungliyaan Ammi ke tight, sunahre sleeves mein dhans rahi thheen. Usne unhein is tarah jakad rakha tha jaise koi maalik apni sabse keemti cheez ko pakadta hai - sakht, lekin jism ki garmi ko mehsoos karte hue.

"Paagal ho tum..." Ammi ki aawaaz aayi, jo ghabraahat kam aur nasha zyaada lag rahi thhi. Unka seena tezi se oopar-neeche ho raha tha, jisse unki neckline se unka gora, bhara hua cleavage saaf jhalak raha tha.

"Baahar log hain, Vishal! Aur yahan kitni dhool bhi hai."

"Dhool ko bhool jaao," Vishal ne unke baazuon ko apni taraf kheencha, jisse Ammi ka bhara hua jism seedha uske seene se aa takraya. "Tumhari khushboo ne is poore kamre ko mahka diya hai."

Ammi ne apne haath Vishal ke seene par rakh diye, lekin use dhakka dene ke bajaaye, unki ungliyaan uske kurte ke kapde ko masalne lageen. "Tumhein chain nahi hai? Wahan sab intazaar kar rahe hain."

"Chain? Tumne subah se mera chain chheen rakha hai," Vishal phusphusaya. Uski nazarein Ammi ke chehre se phisal kar neeche gayeen, unke ubhre hue seene par, jo us tight golden suit mein qaid the.

"Wahan stage par sab 'qabool hai' bol rahe the, aur mein bas yehi soch raha tha ki kab tumhein yahan la kar, in kapdon ke andar chhupe pahaad ko mehsoos karunga."
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



[+] 236 users Like Deepak.kapoor's post
Like Reply
Both Versions are posted. Sorry for the delay. The last few days have been pretty busy. Please leave your comments like and rating on how story is going so far .
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



[+] 5 users Like Deepak.kapoor's post
Like Reply
Aise situation me aake rok diya ...
Agle update kab dogi bro
Like Reply
Wow! Just wow! You are really a tricky writer! You ends the updates in such a situation that we become very much thirsty for the next update.
Like Reply
Aur ek chamatkar, blockbuster, faadu update
Like Reply
Ekdum rocking update
Like Reply
Wonderful update. Really sensual and dick blasting writing ✍️. Hats off.
Like Reply
Manpasand kahaani yah!
Like Reply




Users browsing this thread: 5 Guest(s)