18-07-2026, 11:15 PM
यह कहानी मेरे परिवार की है जिसमें 5 लोग है है, मैं खुद अरविंद, मेरी पत्नी अलका , मेरी दो बहन और मम्मी जो आगे कहानी में आती जाएंगी । ये कहानी मेरे घर के सामने एक मीट शॉप के मालिक अल्ताफ की जुबानी चलेगी ।
**अल्ताफ़ का नज़रिया:**
सुबह के ७:३० बजे का समय है। दुकान के सामने वाली गली अभी शांत है। मैं सिर्फ़ सफ़ेद लुंगी पहने हुए बाहर खड़ा हूँ, ऊपर कुछ नहीं। मेरी अच्छी-खासी कसी हुई बॉडी — चौड़े कंधे, भारी बाइसेप्स और छाती — सुबह की धूप में चमक रही है। दाढ़ी ठीक से सँवारी हुई है, सर पर टोपी।
तभी अरविंद के घर का दरवाज़ा खुलता है और अलका बाहर निकलती है। आज वो हल्के हरे रंग की साड़ी पहने है। पल्लू कंधे पर लापरवाही से पड़ा है। झाड़ू लेकर वो आँगन और बाहर की तरफ़ साफ़ करने लगती है। जैसे ही वो झुकती है, उसकी कमर और गांड की शेप साड़ी के ऊपर से साफ़ नज़र आती है।
मैं मन ही मन सोचता हूँ:
*“अल्लाह की कसम... कितनी माल है ये रंडी। गोरी चिकनी कमर, मोटी गांड, और वो बड़े-बड़े स्तन जो साड़ी के ब्लाउज में फटने को तैयार हैं। एक दिन इसको दुकान के पीछे ले जाकर... ”*
लेकिन बाहर से मैं नॉर्मल मुस्कुराते हुए बोलता हूँ:
---
**अल्ताफ़:** अरे अलका भाभी! नमस्ते नमस्ते... रोज़ सुबह-सुबह इतनी मेहनत? आओ, थोड़ा आराम कर लो। पानी पियोगी?
**अलका:** (झाड़ू चलाते हुए हल्के से मुस्कुराकर) नमस्ते अल्ताफ़ भाई। नहीं, सुबह का काम निपटा लूँ तो अच्छा। घर में सब सो रहे हैं अभी।
**अल्ताफ़:** अरे वाह, अच्छा है। अरविंद भाई तो ऑफिस जाते होंगे ना? और बहनें? वो भी कॉलेज?
*(मैं उसकी झुकती हुई कमर को घूर रहा हूँ। लुंगी के अंदर मेरा लंड हल्का सा खड़ा हो रहा है।)*
**अलका:** हाँ, मिनी और अमिता दोनों कॉलेज जाती हैं। मम्मी भी अभी उठी नहीं हैं।
**अल्ताफ़:** (मुस्कुराते हुए पास आकर दीवार से टेक लगाकर) भाभी, आप रोज़ इतनी सुबह निकलती हो, अच्छा लगता है। गली साफ़-सुथरी रहती है। लेकिन अकेले मत करो, भारी काम है। अगर कभी मदद चाहिए तो बोलना... मैं मदद कर दूँगा।
**अलका:** (हँसते हुए) अरे नहीं भाई, आपकी दुकान का काम है। मीट वगैरह... मैं मैनेज कर लेती हूँ।
**अल्ताफ़:** (नज़रें उसके गले और स्तनों पर घुमाते हुए) हाँ, मैनेज तो आप बहुत अच्छा करती हो। देखो कितनी फिट हो... साड़ी में भी कितनी सुंदर लगती हो। अरविंद भाई बहुत भाग्यशाली हैं।
*(मन में: “कितनी रसीली चूत होगी इसकी... स्तन तो देखो, झुकते ही फट पड़ेंगे।”)*
**अलका:** (शरमाते हुए हल्का सा हँसकर) अरे छोड़ो ना... आप भी तो रोज़ लुंगी में ही दिखते हो। बॉडी तो अच्छी रखी है आपने। दुकान का काम करता है ना?
**अल्ताफ़:** (मुस्कुराकर अपनी बाँहें दिखाते हुए) हाँ भाभी, रोज़ भारी-भारी मीट उठाना पड़ता है। वरना लुंगी में ही घूमता हूँ घर में। गर्मी भी बहुत है।
(थोड़ा पास आकर) आज मौसम भी अच्छा है। आपकी साड़ी का कलर भी अच्छा लग रहा है। हरा रंग आपकी गोरी स्किन पे फबता है।
**अलका:** (झाड़ू रोककर थोड़ा सीधे खड़ी होकर) थैंक यू भाई। आप भी रोज़ नई-नई बातें करते हो।
**अल्ताफ़:** (हँसते हुए) अरे भाभी, बातें तो दिल से निकलती हैं। आप जैसे अच्छे लोग सामने हों तो मन करता है बातें करता रहूँ।
(अंदर से: “बस एक मौका मिल जाए, तेरी साड़ी खींच के तुझे यहीं दीवार से चोद दूँ।”)
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**अल्ताफ़ का नज़रिया:**
सुबह के ७:३० बजे का समय है। दुकान के सामने वाली गली अभी शांत है। मैं सिर्फ़ सफ़ेद लुंगी पहने हुए बाहर खड़ा हूँ, ऊपर कुछ नहीं। मेरी अच्छी-खासी कसी हुई बॉडी — चौड़े कंधे, भारी बाइसेप्स और छाती — सुबह की धूप में चमक रही है। दाढ़ी ठीक से सँवारी हुई है, सर पर टोपी।
तभी अरविंद के घर का दरवाज़ा खुलता है और अलका बाहर निकलती है। आज वो हल्के हरे रंग की साड़ी पहने है। पल्लू कंधे पर लापरवाही से पड़ा है। झाड़ू लेकर वो आँगन और बाहर की तरफ़ साफ़ करने लगती है। जैसे ही वो झुकती है, उसकी कमर और गांड की शेप साड़ी के ऊपर से साफ़ नज़र आती है।
मैं मन ही मन सोचता हूँ:
*“अल्लाह की कसम... कितनी माल है ये रंडी। गोरी चिकनी कमर, मोटी गांड, और वो बड़े-बड़े स्तन जो साड़ी के ब्लाउज में फटने को तैयार हैं। एक दिन इसको दुकान के पीछे ले जाकर... ”*
लेकिन बाहर से मैं नॉर्मल मुस्कुराते हुए बोलता हूँ:
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**अल्ताफ़:** अरे अलका भाभी! नमस्ते नमस्ते... रोज़ सुबह-सुबह इतनी मेहनत? आओ, थोड़ा आराम कर लो। पानी पियोगी?
**अलका:** (झाड़ू चलाते हुए हल्के से मुस्कुराकर) नमस्ते अल्ताफ़ भाई। नहीं, सुबह का काम निपटा लूँ तो अच्छा। घर में सब सो रहे हैं अभी।
**अल्ताफ़:** अरे वाह, अच्छा है। अरविंद भाई तो ऑफिस जाते होंगे ना? और बहनें? वो भी कॉलेज?
*(मैं उसकी झुकती हुई कमर को घूर रहा हूँ। लुंगी के अंदर मेरा लंड हल्का सा खड़ा हो रहा है।)*
**अलका:** हाँ, मिनी और अमिता दोनों कॉलेज जाती हैं। मम्मी भी अभी उठी नहीं हैं।
**अल्ताफ़:** (मुस्कुराते हुए पास आकर दीवार से टेक लगाकर) भाभी, आप रोज़ इतनी सुबह निकलती हो, अच्छा लगता है। गली साफ़-सुथरी रहती है। लेकिन अकेले मत करो, भारी काम है। अगर कभी मदद चाहिए तो बोलना... मैं मदद कर दूँगा।
**अलका:** (हँसते हुए) अरे नहीं भाई, आपकी दुकान का काम है। मीट वगैरह... मैं मैनेज कर लेती हूँ।
**अल्ताफ़:** (नज़रें उसके गले और स्तनों पर घुमाते हुए) हाँ, मैनेज तो आप बहुत अच्छा करती हो। देखो कितनी फिट हो... साड़ी में भी कितनी सुंदर लगती हो। अरविंद भाई बहुत भाग्यशाली हैं।
*(मन में: “कितनी रसीली चूत होगी इसकी... स्तन तो देखो, झुकते ही फट पड़ेंगे।”)*
**अलका:** (शरमाते हुए हल्का सा हँसकर) अरे छोड़ो ना... आप भी तो रोज़ लुंगी में ही दिखते हो। बॉडी तो अच्छी रखी है आपने। दुकान का काम करता है ना?
**अल्ताफ़:** (मुस्कुराकर अपनी बाँहें दिखाते हुए) हाँ भाभी, रोज़ भारी-भारी मीट उठाना पड़ता है। वरना लुंगी में ही घूमता हूँ घर में। गर्मी भी बहुत है।
(थोड़ा पास आकर) आज मौसम भी अच्छा है। आपकी साड़ी का कलर भी अच्छा लग रहा है। हरा रंग आपकी गोरी स्किन पे फबता है।
**अलका:** (झाड़ू रोककर थोड़ा सीधे खड़ी होकर) थैंक यू भाई। आप भी रोज़ नई-नई बातें करते हो।
**अल्ताफ़:** (हँसते हुए) अरे भाभी, बातें तो दिल से निकलती हैं। आप जैसे अच्छे लोग सामने हों तो मन करता है बातें करता रहूँ।
(अंदर से: “बस एक मौका मिल जाए, तेरी साड़ी खींच के तुझे यहीं दीवार से चोद दूँ।”)
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