17-07-2026, 09:22 AM
Please update
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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
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17-07-2026, 09:22 AM
Please update
17-07-2026, 10:14 AM
Please post a mega update
17-07-2026, 10:52 AM
This story has now become very slow. Please give updates fast.
17-07-2026, 11:09 AM
Masterpiece...
Waiting 4 Lovely new update..
17-07-2026, 09:39 PM
Waiting
18-07-2026, 08:16 AM
Please update
18-07-2026, 03:28 PM
I have started working on the next episode, maybe it will be ready by Sunday. In the meantime, enjoy the update given in my other story .
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
18-07-2026, 05:01 PM
18-07-2026, 08:23 PM
18-07-2026, 08:52 PM
Wonderful and absolutely master blaster writings!
18-07-2026, 09:06 PM
Too much hot and erotic writings to be read again and again. Hats off!
18-07-2026, 09:11 PM
gajam, garam aur behad hi kamuk kahaani hai yah, bahut achi writings!
19-07-2026, 01:23 PM
Bahot shaandaar mazedaar lajawab update dost
dekhte h aage kia hota h agla update jaldi dal do yaar
19-07-2026, 01:45 PM
Nice n fantastic update, bahut bahut mazadar writings
19-07-2026, 01:55 PM
लाजवाब update hai yaar, ekdom लाजवाब update
19-07-2026, 07:12 PM
ekdom kamaal ka update, lajawab,mast aur dhamaka writings
20-07-2026, 04:37 AM
अध्याय -19
सुबह जब आयशा अपने लहंगे और कुर्ती को आईने में ठीक कर रही थीं, तभी उनके फोन पर विशाल का नाम चमक उठा। उस नाम को देखते ही उनका पूरा वजूद एक बार फिर कल रात के उसी कामुक बवंडर में डूब गया। उन्होंने कांपते हाथों से फोन उठाया और कान से लगा लिया। विशाल (फोन पर, बेहद कामुक और दबी हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "गुड मॉर्निंग आयशा जी, कैसी हैं आप इस खिली हुई सुबह में?" आयशा (चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल होते हुए, सिर झुकाकर दबी आवाज़ में बोलीं): "हूँ..." विशाल (मन में कमीनी मुस्कान के साथ, उसके इस 'हूँ' का मज़ा लेते हुए): "रात को नींद तो ठीक से आई ना आपको?" आयशा (कल रात की अपनी नग्नता और पैन्टी के गीलेपन को याद करते हुए, और भी ज़्यादा शर्माते हुए): "हूँ..." विशाल (अपने लंड के उभार को पैंट के ऊपर से सहलाते हुए, बेहद सरसराती आवाज़ में): "कल रात की उस सर्द हवा के बाद... सोते वक्त किसी के गरम सपने तो नहीं आए आपको?" आयशा (चेहरे पर भयंकर लाली छा जाने और छाती पर भारी मम्मों के कसमसाने के बीच, अपनी उखड़ी सांसों को छुपाते हुए): "प्लीज विशाल ..." विशाल (फोन पर, अपनी आवाज़ में हवस की कशिश घोलते हुए): "कसम से आयशा जी, रात भर मेरे को नींद ही नहीं आई।" आयशा (कांपते होठों से, अपनी धड़कनों को संभालते हुए फुसफुसाई): "प्लीज विशाल जी, ऐसी बात मत बोलो..." विशाल (कमीनी मुस्कान के साथ अपने लंड को जींस के ऊपर से भींचते हुए): "बिस्तर पर लेटते ही आपके वो दोनों भारी मम्मे, आपके ऊपर वाले रसीले होठ और आपकी वह नीचे वाली मखमली चूत, बार-बार मेरी आँखों के सामने आ रहे थे।" आयशा (चेहरे पर भयंकर लाली और शर्म के बवंडर के बीच, मखमली कुर्ती के नीचे अपने कसमसाते स्तनों को भींचते हुए): "प्लीज विशाल जी..." विशाल (हवस से हाँफते हुए, बेबाकी से): "आपके उस मुकम्मल नंगे बदन की याद में मेरा लंड तो बैठने का नाम ही नहीं ले रहा था।" आयशा (मन में भयंकर कशमकश के साथ सोचते हुए: 'या खुदा! यह मर्द कितना बेशर्म है, कितनी गंदी बातें बोल रहा है... लेकिन मेरा अंग-अंग इसकी इस हवस के आगे पिघलता जा रहा है'): "प्लीज विशाल जी, ऐसी बात मत बोलो..." विशाल (अपनी आवाज़ को और धीमा और सरसराता हुआ रखते हुए): "रात को कसम से, दो बार मैंने आपका नाम लेकर आपके हुस्न को याद किया और अपना पानी निकाला, पर यह औज़ार अभी भी आपके लिए पूरा खड़ा है।" आयशा (मजबूरी, डर और चरम उत्तेजना के मारे अपनी आँखें कसकर भींचते हुए): "विशाल ..." विशाल (फोन पर, एक कमीनी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान के साथ): "आयशा जी, एक बात पूछूँ आपसे?" आयशा (अपनी धड़कनों को संभालते हुए, बेहद धीमी आवाज़ में): "क्या... क्या पूछना है?" विशाल (बेहद सरसराती और हवस से भरी आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "क्या रात को सोते वक्त मेरा यह १० इंच का लंड आपके ख्वाबों में आया था? सच-सच बताइए... क्या इसका यह भीमकाय आकार आपके शौहर के अंग से भी ज़्यादा बड़ा महसूस हुआ?" आयशा (खौफ और चरम शर्म के मारे पूरी तरह कांपते हुए, फोन को कान से और कसकर चिपकाकर बोलीं): "प्लीज़ विशाल जी... ऐसी गंदी बातें मत करिए, नहीं तो मैं अभी के अभी फोन काट दूँगी!" आयशा (लेकिन मन में वासना और आत्म-ग्लानि के भयंकर दलदल में डूबते हुए): "अब इसे क्या जवाब दूँ? कैसे कहूँ कि इस ज़ालिम के उसी अंग की छवि ने पूरी रात मेरी रातों की नींद हराम कर रखी थी... मैं तो अपनी बच्ची सायमा की आबरू को इसके चंगुल से बचाने निकली थी, पर खुद इस गैर मर्द की हवस के दलदल में दिन-ब-दिन और गहरी गिरती जा रही हूँ..." विशाल (फोन पर, एक गहरी और रहस्यमयी सांस लेते हुए): "अच्छा छोड़िए इन बातों को, आज तो बहुत बड़ा दिन है, आखिरकार सायमा का निकाह होने जा रहा है।" आयशा (हल्की सी राहत की सांस लेते हुए): "हूँ..." विशाल (कमीनी मुस्कान के साथ): "यह सब आपकी उस रात की मेहनत और कुर्बानी का ही फल है आयशा जी।" आयशा (भौहें सिकोड़ते हुए, उत्सुकता और डर के मिले-जुली आवाज़ में): "वह कैसे?" विशाल (हँसते हुए, सीधे मुद्दे पर आते हुए): "अगर आप उस रात छत पर मेरी बात मानकर अपने कपड़े न उतारतीं, तो मैं तो आज अकरम की जगह सायमा के साथ होता।" आयशा (शर्म और कल रात की नग्नता को याद कर कांपते हुए): "उफ़्फ़..." विशाल (अपनी आवाज़ में थोड़ी कड़वाहट और ज़िद लाते हुए): "लेकिन इस सब के चक्कर में मेरा बहुत बड़ा नुकसान हो गया है, सायमा जैसी कवारी कली मेरे हाथ से निकल गई।" आयशा (दिल की बढ़ती धड़कनों को दबाते हुए, डरकर): "ओह खुदा..." विशाल (लंड पर हाथ फेरते हुए, अपनी असली औकात दिखाते हुए): "तो इतना सब्र करने का और अपना इतना बड़ा नुकसान करवाने का, कुछ तो इनाम बनता है न मेरा?" आयशा (मन में भयंकर खौफ और चिंता के बवंडर में डूबते हुए): "या खुदा, इस दरिंदे की नीयत फिर से डोल रही है... अब यह आज इस निकाह के दिन मुझसे कौन सी नई और बेशरम मांग करने वाला है?" आयशा (कांपती हुई आवाज़ में, बात को टालने की नाकाम कोशिश करते हुए): "हूँ... प्लीज अभी नीचे सब इंतज़ार कर रहे हैं..." विशाल (फोन पर, अपनी आवाज़ में वही पुराना क्रूर लहजा लाते हुए): "आयशा जी, प्लीज यह मत भूलिएगा कि सायमा की वो नग्न तस्वीरें अभी भी मेरे इस फोन में महफ़ूज हैं।" आयशा (खौफ के मारे पूरी तरह टूटते हुए, लाचारी से बोलीं): "ठीक है... बोलो, अब और क्या चाहते हो तुम मुझसे?" विशाल (कमीनी मुस्कान के साथ, अपनी हवस की नई शर्त रखते हुए): "आज आप जोड़े के नीचे पीले रंग की ब्रा और पैन्टी पहनेंगी, क्योंकि लाल वाली तो कल रात ही पूरी तरह भीगकर खराब हो चुकी होगी।" आयशा (शर्म से अपनी आँखें बंद करते हुए, बेहद बेबसी से): "हूँ..." विशाल (उत्तेजना से हांफते हुए, अपनी बात की पुष्टि करने के लिए): "वैसे, आपके पास पीले रंग का वह सेट है तो सही ना?" आयशा (कांपते होठों से, अपनी इज्ज़त की नीलामी को स्वीकार करते हुए): "हूँ..." विशाल (हवस से अपनी आँखें मूंदते हुए, अपना घिनौना प्लान समझाते हुए): "ठीक है, तो जब आज बारात गेट पर आएगी, तब मैं किसी के कंधे पर हाथ रखूँगा और वही आपका इशारा होगा।" आयशा (दिल की बढ़ती धड़कनों के बीच, डरते हुए): "हूँ..." विशाल (चिल्लाते हुए लंड को सहलाते हुए): "जैसे ही मेरा हाथ उसके कंधे पर पड़े, आप हमारे सामने आगे की तरफ झुककर हमें अपने वो सुडौल मम्मे दिखाएंगी, जो उस पीली ब्रा के अंदर कसमसा रहे होंगे... कुर्ती के गहरे गले से आपके वो तीखे निपल्स तक दिखने चाहिए।" आयशा (दहशत से कांपते हुए, गिड़गिड़ाने वाले लहजे में): "नहीं... प्लीज ऐसा मत करो... सबके सामने इस तरह मुझे ज़लील मत करो..." विशाल (क्रूरता से हंसते हुए, सीधे धमकी पर उतर आते हुए): "आयशा जी, आप शायद भूल रही हैं कि अभी सायमा का निकाह होना बाकी है।" आयशा (मन में डूबते हुए वजूद के साथ, सुबकते हुए): "उफ़्फ़... विशाल, तुम बड़े कमीने हो।" विशाल (अपनी उसी चिर-परिचित बेशरम और कमीनी मुस्कान के साथ, फोन पर फुसफुसाते हुए): "कमीना तो मैं हूँ ही आयशा... पर साला मेरा यह लंड मेरे से भी बड़ा कमीना है। यह जिस किसी की भी चूत में जाता है ना, उसे फाड़ के रख देता है।" विशाल के मुँह से निकले इन बेहद गंदे शब्दों को सुनते ही आयशा के दिमाग में एक भयंकर विस्फोट हुआ। दिमाग चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाया और एक झटके में उनकी बंद आँखों के सामने विशाल का वो कालिया, नस-नस उभरा हुआ 10 इंच का मोटा लंड तैर गया। उन्होंने अपनी कल्पना में साफ़ देखा कि वह खौफनाक अंग उनकी अपनी नाज़ुक, गोरी और गुलाबी चूत के अंदर ज़बरदस्ती धंसता चला जा रहा है। आयशा (मन में, उस 10 इंच के खौफनाक उभार की कल्पना से बुरी तरह कांपते हुए): "या अल्लाह... 10 इंच का वो काला ज़ल्लाद! अगर वो सचमुच मेरी इस तंग और गुलाबी चूत के अंदर गया, तो मेरा क्या हाल होगा? मैं इतने बड़े और खौफनाक लंड को अपने वजूद के अंदर कैसे बर्दाश्त कर पाऊँगी? वो तो मुझे अंदर तक चीर कर रख देगा... उफ़्फ़, पर यह सोचकर भी मेरी चूत पानी क्यों छोड़ रही है?" उनकी सांसें बुरी तरह उखड़ चुकी थीं और जिस्म हवस की आग में तड़प रहा था, लेकिन अपनी संस्कारी मर्यादा को बचाने के लिए उन्होंने अपनी कांपती आवाज़ को बमुश्किल संभाला। आयशा (फोन पर अपनी उखड़ी सांसों को छुपाते हुए, गुस्से और घबराहट के नाटक के साथ): "विशाल... प्लीज! अगर आगे से ऐसी गंदी और बेहूदा बातें करोगे, तो मैं अभी इसी वक़्त फोन काट रही हूँ!" विशाल (फोन पर एक हल्की,कमीनी हँसी हँसते हुए): "आयशा... आप तो नाराज़ हो रही हैं! अच्छा, मैं आपकी बात मान रहा हूँ... आगे से ऐसा कुछ नहीं बोलूँगा। पर मेरी एक बात आप भी कान खोलकर सुन लीजिए—अगर आपने वहाँ मंडप के पास एक भी कदम पीछे हटाया, तो सायमा की वो नग्न तस्वीरें और कल रात की आपकी यह नंगी वीडियो, दोनों इसी वक़्त पूरे खानदान के फोन पर तैर रही होंगी!" ----------- अम्मी बिल्कुल सामने थीं, नजमा आंटी के पास। वो बहुत खूबसूरत लग रही थीं। उनका वह भारी डिज़ाइनर जोड़ा सुबह की उस साफ़ धूप में जगमगा रहा था। उनके कानों में सजे सोने और मोतियों के भारी झुमके, उनका चमकता हुआ चेहरा, और होठों पर सजी वही 'म्यूटेड बेरी' लिपस्टिक... वो बहुत प्यारी लग रही थीं। ढोल और पटाखों की आवाज़ अब बहुत करीब आ गयी थी। धुम! धुम! धुम! और फिर, बारात ने गेट में कदम रखा। सबसे आगे दूल्हा- अकरम था। उसने एक खूबसूरत, सफेद रंग की शेरवानी पहनी थी, जिसपर नफीस सुनहरा काम था। उसके चेहरे पर एक मोतियों का सेहरा था, जिसके पीछे से उसकी मुस्कुराहट झलक रही थी। "खुश आमदीद! खुश आमदीद!" सब औरतों ने, अम्मी समेत, उनपर फूल फेंकने शुरू कर दिए। गुलाब की पत्तियाँ अकरम के सफेद जोड़े पर, उसके सेहरे पर, गिरने लगीं। उसके ठीक पीछे उसके दोस्त थे। सब नौजवान लड़के, महंगे कुर्ता और सूट्स में। नाच रहे थे, शोर मचा रहे थे। मैं यह सब एक कोने से देख रहा था। दीवार से टिक कर। मैं अम्मी को देख रहा था, जो खुशी से अकरम के दोस्तों पर भी फूल बरसा रही थीं। उनकी हंसी सबसे ऊँची थी। दोस्तों के उस झुंड में विशाल भी था। उसने व्हाइट रंग का कुर्ता पायजामा और ब्राउन चमकती हुई कोटी पहनी हुई थी। उसे देखकर मेरा खून मेरी रगों में जम गया। ढोल की आवाज़, फूलों की महक, सब एक पल में गायब हो गया। मेरी निगाहें एक तीर की तरह अम्मी पर चली गयीं। अम्मी, जो अभी तक अकरम को देख कर मुस्कुरा रही थीं, उनकी नज़र अब दोस्तों के उस झुंड पर पड़ी जहाँ विशाल था, उस व्हाइट कुर्ते और ब्राउन कोटी में, नाचते हुए, शोर मचाते हुए। उनका चेहरा एक पल के लिए चमक उठा। अम्मी की मुस्कुराहट अब और गहरी हो गयी, जैसे कोई राज़ की हंसी हो। उनकी आँखें थोड़ी सी चमकीं, सिर्फ एक लम्हे के लिए, लेकिन मैंने देख लिया। उनके हाथ, जो फूल फेंक रहे थे, अब सीधे विशाल की तरफ मुड़ गए। उन्होंने एक मुस्कुराहट के साथ, जैसे मज़ाक में, एक मोटा सा गुच्छा गुलाब की पत्तियों का उस पर फेंक दिया। पत्तियाँ उसके कुर्ते पर गिरीं, उसके चेहरे पर, और वो हंस पड़ीं। ढोल की आवाज़, फूलों की महक, और लोगों का शोर... सब एक पिघले हुए शोर में बदल गया। मैं सिर्फ उन दो को देख रहा था। विशाल की नज़र, नाचते हुए, उस झुंड में से अम्मी पर पड़ी। उसके चेहरे पर वही... शरारती मुस्कुराहट फैल गयी। वो नाचते हुए... ... भीड़ से थोड़ा सा अलग हुआ और थोड़ा सा आगे बढ़ा। उस तरफ, जहाँ अम्मी खड़ी थीं। फिर उसने अपने हाथ को... एक 'आदाब' या 'सलाम' के अंदाज़ में उठाया... लेकिन यह सलाम नहीं था। उसकी उंगलियाँ... हल्के से... उसके अपने लिप्स को एक पल के लिए छू कर गुज़र गयीं। एक जेस्चर जो सिर्फ एक सेकंड के लिए था, लेकिन इशारा साफ़ था। मैंने अम्मी को देखा। उनकी सांसें एक पल के लिए रुक सी गयीं। उनके 'म्यूटेड बेरी' लिपस्टिक वाले होंठ थोड़े से खुल गए। और फिर विशाल ने अपना डांस और ज़्यादा बढ़ा दिया। उसने अम्मी को दिखाते हुए एक पूरा स्पिन लिया और ढोल की बीट पर अपनी बाहें फैलायीं, जैसे वो पूरी परफॉरमेंस सिर्फ उनके लिए हो। ------------- विशाल की इस दीवानगी और मर्दाना अदा को देखकर आयशा अंदर ही अंदर बेहद प्रभावित हो उठीं। उस भरे हुजूम में विशाल का इस तरह सिर्फ उनकी तरफ देखकर नाचना उनके बदन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर गया। आयशा (विशाल के उस गठीले जिस्म के लचीलेपन और उसकी मदहोश आँखों को देखते हुए, मन में): "या खुदा... इस मर्द का यह बेबाक अंदाज़ सीधे मेरे दिल को छू रहा है। काश... काश ऐसी दीवानगी, ऐसी दीवानों जैसी हरकत कभी मेरे शौहर ने मेरे लिए की होती।“ आयशा (मन में): "उन्होंने तो मुझे हमेशा सिर्फ चार दीवारों के पीछे एक शरीफ बीवी की तरह देखा, कभी मेरे हुस्न की इस तरह सरेआम सबके सामने सराहना करने की कोशिश ही नहीं की..."" और आयशा हंस पड़ीं (ना चाहते हुए भी)। यह एक... खनकती हुई, शोख हंसी थी। उन्होंने अपनी चांदी की थाली से और फूल उठाए और एक झटके से सीधे विशाल की तरफ फेंके। आयशा (फूल फेंकते हुए, अपने भीतर मचे मानसिक बवंडर और बेबसी के साथ मन में): "मैं यह क्या कर रही हूँ? मेरी रूह, मेरा दिमाग इस दरिंदे की नीचता और ब्लैकमेलिंग से भयंकर नफ़रत करता है... मुझे अच्छी तरह मालूम है कि कुछ ही देर में मुझे इसके सामने आगे झुककर अपनी उस पीली ब्रा में कसे भारी मम्मों और तीखे निपल्स की नुमाइश करनी होगी..." आयशा (विशाल की कातिलाना मुस्कान को देखकर, बदन में उठती वासना की सिहरन के साथ मन में): "लेकिन मैं चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रही। इसकी इस मर्दाना दीवानगी ने मेरे भीतर कैसी आग सुलगा दी है? मेरी बंदिशें टूट रही हैं... नफ़रत के बावजूद मेरा यह कमज़ोर मन इसकी हरकतों को अंदर ही अंदर पसंद करने लगा है। यह मर्द मुझे इस गुनाह के दलदल में और गहरे ढकेलता जा रहा है, और मैं बेबस होकर डूबती जा रही हूँ..." ------ और अम्मी हंस पड़ीं। यह एक... खनकती हुई, शोख हंसी थी। उन्होंने अपनी थाली से और फूल उठाए और एक झटके से सीधा विशाल की तरफ फेंके। "खुश आमदीद!" वो कहकहा लगा कर बोलीं। फूल विशाल के सफेद कुर्ते और चमकती कोटी पर गिरे। यह एक खेल था। एक बेहाया, सबके सामने... आँखों ही आँखों में खेला जाने वाला... खेल। फिर विशाल मुड़ा और अकरम का हाथ पकड़े हुए सीधे अम्मी की तरफ बढ़ा। अम्मी के ठीक आगे आकर उसने रुककर सीधे उनकी आँखों में देखा। अम्मी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं, उनका वो गोरा चेहरा खौफ और शर्म के मारे एकदम पीला पड़ गया। दीवार के पास खड़ा मैं थोड़ा और आगे बढ़ा ताकि मैं साफ़-साफ़ देख सकूँ कि इस भरे हुजूम में उन दोनों के बीच अब क्या होने वाला है। अम्मी की साँसें बुरी तरह उखड़ चुकी थीं और उनकी ब्रा के अंदर कसे उनके दोनों भारी मम्मे कुर्ती के नीचे तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगे थे। तभी विशाल ने कमीनी मुस्कान बिखेरी। उसने अकरम के कान में कुछ गुफ़्तगू करते हुए, बड़े आराम से अपना हाथ अकरम के कंधे पर रख दिया। ------- अकरम के कंधे पर विशाल का हाथ टिकते ही जैसे आयशा के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उनका पूरा वजूद खौफ और चरम उत्तेजना की एक मिली-जुली आग में झुलस उठा। उनके दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो चुकी थी कि उन्हें डर था कि कहीं पास खड़ी नज़मा आंटी को उसकी आवाज़ न सुनाई दे जाए। आयशा (अकरम की तरफ देखकर, खौफ और चरम शर्म से अंदर तक काँपते हुए मन में): "ओह मेरे खुदा... तो अब मुझे अपने जिस्म की यह मुकम्मल नुमाइश विशाल के साथ-साथ इस अकरम के सामने भी करनी होगी? यह लड़का... जो कुछ ही घंटों में सायमा का शौहर और मेरा दामाद बनने जा रहा है, आज वह अपनी इस खाला का यह बेशरम रूप देखेगा!" इस अहसास ने आयशा में डर का एक ऐसा करंट दौड़ाया कि उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। बात सिर्फ विशाल और अकरम की नहीं थी, सामने मेहमानों और रिश्तेदारों का पूरा हुजूम खड़ा था। आयशा (सामने खड़े हुजूम को देख, भीतर मचे मानसिक बवंडर से तड़पते हुए मन में): "अगर मैं आगे झुकी, तो कुर्ती के इस गहरे गले से मेरी वह पीली ब्रा और उत्तेजना के मारे तने हुए वो तीखे गुलाबी निपल्स साफ़ दिखाई देंगे। इन दोनों के अलावा अगर किसी और की प्यासी नज़र इस उभार पर पड़ गई, तो क्या होगा?" आयशा (कांपती हुई सांसों के साथ, अपनी बंद आँखों के पीछे छिपे डर के साथ मन में): "नहीं... अगर किसी और ने यह नज़ारा देख लिया, तो खानदान की इज़्ज़त एक सेकंड में मिट्टी में मिल जाएगी।मेरा वजूद हमेशा के लिए बदनाम हो जाएगा।" अकरम के कंधे पर टिका विशाल का हाथ उन्हें याद दिला रहा था कि अगर उन्होंने अभी आगे झुककर अपने इन कसमसाते मम्मों का मुआयना नहीं कराया, तो सायमा की नग्न तस्वीरें और कल रात की उनकी खुद की नंगी वीडियो इस पूरी महफ़िल के फोन पर तैर रही होगी। आयशा ने अपनी उखड़ती सांसों और कांपते वजूद को किसी तरह संभाला। इस ज़िल्लत के बीच भी उनके दिमाग से काम किया। उन्होंने सामने खड़े अकरम और विशाल की तरफ दो कदम बढ़ाए। वह उनके इतने करीब आ गईं कि उन दोनों के चौड़े और गठीले जिस्म अब बाकी मेहमानों और रिश्तेदारों के लिए एक ढाल बन चुके थे। पीछे खड़े लोगों की नज़रों से खुद को महफूज़ पाकर, आयशा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उन्होंने अपने सुनहरे दुपट्टे को थोड़ा ढीला होने दिया और चांदी की थाली से कुछ रुपये जानबूझकर नीचे ज़मीन पर गिरा दिए, फिर उन रुपयों को उठाने के बहाने, पूरे अधिकार से आगे की तरफ झुक गईं। जैसे ही वह झुकीं, उनकी उस कसी हुई 'डीप गोल्डन' रेशमी कुर्ती का गहरा गला आगे की तरफ लटक गया। विशाल और अकरम के ठीक सामने उनके जिस्म का वह सबसे गुप्त और रसीला नज़ारा पूरी तरह बेपर्दा हो गया। उस आइवरी लहंगे और कुर्ती के नीचे, अम्मी के वो भारी, सुडौल और दूध जैसे सफेद मम्मे उस तंग, सुर्ख पीले रंग की ब्रा के कपों से बाहर उबलने को तड़प रहे थे। पीली ब्रा का वह बेशरम कपड़ा उनके उन भारी गोलों को पूरी तरह संभाल नहीं पा रहा था। सुबह की ठंडी हवा और फोन पर हुई विशाल की उन गंदी बातों की उत्तेजना के मारे, आयशा के वो तीखे गुलाबी निपल्स उस कुर्ती के गहरे गले से साफ़ बाहर झांक रहे थे, जो किसी अंगूर के दाने की तरह पूरी तरह तनकर कड़े हो चुके थे। विशाल और अकरम, दोनों की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनकी भूखी नज़रें सीधे आयशा के उस पीले कपड़े में कसमसाते हुस्न की गहराइयों को और उन तीखे निपल्स को अंदर तक स्कैन कर रही थीं। आयशा (वासना, शर्म और लाचारी के चरम बिंदु पर पहुँचकर, मन में): "ओह मेरे खुदा... मैंने आज खुद को पूरी तरह नीलाम कर दिया। मेरी पीली ब्रा और मेरे ये तने हुए निपल्स आज इस गैर मर्द और मेरी बच्ची के होने वाले शौहर के सामने पूरी तरह बेपर्दा हैं... यह अहसास मुझे अंदर तक पिघला रहा है... मेरी चूत का पानी मेरी जांघों से बहने को तैयार है..." वह कुछ सेकंड तक उसी हाल में झुकी रहीं, जबकि उन दोनों की हवस भरी सांसें आयशा के उन नंगे होते मम्मों की गर्मी को सीधे महसूस कर रही थीं। फिर कांपते हाथों से ज़मीन पर बिखरे रुपयों को समेटते हुए वह धीरे से ऊपर उठीं। आयशा ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू में किया और उन रुपयों को अकरम के सिर के चारों तरफ से वारकर (सदका उतारकर), पास ही खड़े बैंड वालों की तरफ बढ़ा दिया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आयशा ने अपनी नज़रें नीची ही रखीं, लेकिन उनके चेहरे की वो भयंकर लाली और दुपट्टे को वापस सीने पर कसने की वो छटपटाहट साफ़ बयां कर रही थी कि उसके अंदर शर्म और वासना का क्या तूफ़ान गुज़रा है। -------- अकरम की आँखें आयशा के उस कसमसाते हुस्न को देखकर फटी की फटी रह गईं। जो नज़ारा उसके ठीक सामने बेपर्दा हुआ था, उसकी उसने अपने ख्वाबों में भी उम्मीद नहीं की थी। अपनी होने वाली बीवी सायमा की सगी खाला और इस घर की सबसे बाइज़्ज़त और खूबसूरत औरत को इस तरह अपने ठीक सामने झुका देखकर उसका दिमाग सुन्न हो गया। अकरम (अम्मी के उन पीले कपड़े में उबलते भारी मम्मों और सीधे बाहर झांकते तीखे निपल्स पर अपनी नज़रें गड़ाए हुए, मन में): "या खुदा... यह मैं क्या देख रहा हूँ? यह तो सायमा की खाला हैं... इस हवेली की आन-बान और शान! कुर्ती के इस गहरे गले से इनके वो दूध जैसे सफेद, भारी मम्मे और उस पीली ब्रा के अंदर निपल्स सीधे मेरी आँखों के सामने नाच रहे हैं..." आयशा के जिस्म की वह कसमसाहट और उनके बदन से उठती हुई ताज़ा खुशबू ने अकरम के अंदर एक पल में वासना का भयंकर लावा फूंक दिया। शेरवानी के नीचे उसका अपना अंग लोहे की तरह सख्त होने लगा। अकरम (हवस और हैरत के मिले-जुली दीवानगी में हांफते हुए): "विशाल ठीक ही कहता था कल रात डांस पार्टी में... यह औरत अंदर से सचमुच बारूद का ढेर है। सायमा तो अभी कली है, पर उसकी यह खाला तो पूरा खिला हुआ रसीला बाग़ हैं। निकाह के इस पाक दिन पर, अपनी होने वाली सास जैसी औरत के इस नग्न उभार को इतने करीब से देखना... उफ़! इनकी इस पीली ब्रा के अंदर छिपी हवस तो सीधे मुझे दावत दे रही है। ऐसा लग रहा है जैसे यह खुद चाहती हैं कि आज रात सायमा से पहले मैं इनके इस जिस्म की आग को शांत करूँ..." अकरम आयशा को वापस उठते और सहजता से अपने सिर पर हाथ फेरकर सदका उतारते देख, एक पल के लिए सोच में पड़ गया। उसका नज़रिया थोड़ा बदला। अकरम (अम्मी को पूरी शालीनता से वापस दुपट्टा संभालते देख, मन ही मन): "ओह... तो क्या यह वाकई महज़ एक इत्तेफ़ाक़ था? थाली से रुपये गिर गए थे और यह बस उन्हें उठाने के लिए नीचे झुकी थीं?" अकरम (आयशा के उस शांत और गरिमामयी चेहरे को दोबारा निहारते हुए, वासना की गहरी गिरफ्त में): "चाहे जो भी हो... यह एक ऐसा खूबसूरत हादसा था जिसे मैं अपनी आख़िरी सांस तक नहीं भूल पाऊंगा। अब जब भी, जितनी बार भी मैं अपनी खाला को देखूँगा, मेरी आँखों के आगे रेशमी कुर्ती के नीचे कसमसाते वो भारी मम्मे और पीली ब्रा से झांकते वो तीखे, तने हुए निपल्स ही तैरेंगे।" ----------- विशाल (आयशा के उस गहरे गले से झांकते हुए पीले हुस्न को देखकर मन में, हवस और जीत के चरम उन्माद में डूबते हुए): "उफ़... साला, मज़ा ही आ गया! इस औरत का यह नज़ारा देखने के लिए तो मैं अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा सकता हूँ। देखो ज़रा इस संस्कारी और शरीफ़ खानदान की इज़्ज़त को... कैसे इस भरे बाज़ार में, अपने होने वाले दामाद अकरम के ठीक सामने अपनी पीली ब्रा और ये तने हुए तीखे निपल्स परोस रही है!" विशाल की आँखें आयशा के उन भारी मम्मों के गहरे उतार-चढ़ाव को स्कैन कर रही थीं, और उसकी पैंट के अंदर उसका कड़ा लंड फटने को तैयार हो रहा था। विशाल (अपनी इस ज़बरदस्त कामयाबी पर मन ही मन कमीनी मुस्कान बिखेरते हुए): "कल रात जब इसकी नंगी गांड और हेयरलेस चूत को मैंने अपने नीचे रगड़ा था, तब भी इसके चेहरे पर यही बेबसी थी। पर आज... आज तो खेल ही अलग है। आज मैंने इसके वजूद की धज्जियाँ उड़ा दी हैं।“ विशाल : “अकरम साला तो सायमा के ख्वाब देख रहा था, पर मैंने निकाह के मंडप पर चढ़ने से पहले ही इसे अपनी खाला का यह रसीला और बेशरम रूप दिखा दिया। बहुत जल्द तू हम दोनों के नीचे एक साथ लेटेगी और चीखेगी!” विशाल (आयशा को वापस उठते और अकरम का सदका उतारते देख मन ही मन उनकी इस चालाकी की दाद देते हुए): "मानना पड़ेगा बॉस... इस औरत का दिमाग तो चलता है! जिस शातिर तरीके से इस पूरे नज़ारे को सिर्फ हम दो लोगों के देखने लायक सीमित रखा, और जिस तरह चांदी की थाली से चालाकी से रुपये गिराकर नीचे झुकने को एक महज हादसा बना दिया... सचमुच काबिले-तारीफ़ है। भरे हुजूम के सामने अपनी इज़्ज़त भी नीलाम कर दी, मेरी शर्त भी पूरी कर दी और किसी को शक की भनक तक नहीं लगने दी।" -------- मुझे वहाँ से साफ़-साफ़ कुछ नज़र नहीं आ रहा था, क्योंकि विशाल और अकरम के चौड़े बदन ने अम्मी को पूरी तरह ढक रखा था। लेकिन जिस तरह से उन दोनों के मुँह खुले के खुले रह गए थे, उनकी आँखें फटी हुई थीं, और जिस तरह से अम्मी उनके ठीक सामने आगे झुकी हुई थीं... मैं बिना देखे भी बहुत अच्छी तरह समझ सकता था कि वो दोनों इस वक्त अम्मी के जिस्म का कौन सा नज़ारा देख रहे हैं। मेरा मन अंदर से बुरी तरह चीख रहा था, "अम्मी... आप यह क्या कर रही हैं? आप तो ऐसी नहीं थीं!" एक तरफ अम्मी की वह संस्कारी और पाकीज़ा छवि थी जिसे मैंने बचपन से देखा था, और दूसरी तरफ आँखों के सामने चलता यह घिनौना खेल।
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https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह- https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
20-07-2026, 04:39 AM
अपनी सगी अम्मी को इस तरह दो गैर मर्दों के सामने घुटने टेकते और अपने हुस्न की नुमाइश करते देख मेरा दिल दहल गया था। मैं लाचारी और गुस्से की आग में अंदर ही अंदर जल रहा था।
जब अम्मी ने नीचे गिरे हुए रुपये उठाए और उन्हें अकरम के सिर के ऊपर से घुमाकर सदका उतारा। मैं सोच में पड़ गया कि क्या यह सब वाकई सिर्फ एक हादसा था? मेरा तड़पता हुआ मन अपनी अम्मी की पाकीज़ाह छवि को बचाने के लिए इस बहाने को सच मान लेना चाहता था। मुझे लगा कि शायद थाली से रुपये सचमुच अचानक गिर गए थे, और अम्मी ने बस एक रस्म निभाने के लिए अकरम का सदका उतार दिया। ----------- आयशा (दुपट्टे को सीने पर अच्छी तरह दुरुस्त करते हुए, एक लंबी और कांपती हुई सांस लेकर मन में): "या खुदा, तेरा लाख-लाख शुक्र है कि इज़्ज़त बच गई... इस भरे हुजूम में से किसी तीसरे की नज़र उस पीली ब्रा और मेरे इन तने हुए निपल्स पर नहीं पड़ी।" आयशा (विशाल और अकरम से नज़रें चुराकर पीछे हटते हुए): "शुक्र है मेरा वो दिमाग काम कर गया... थाली से रुपये गिराकर मैंने उस बेशरम नुमाइश को महज़ एक हादसा बना दिया, वरना आज मेरा वजूद यही मिट्टी में मिल जाता।" आयशा (अकरम की तरफ दबी नज़र से देखते हुए, एक गहरी चिंता के साथ): "लेकिन अब इस अकरम के सामने जाना कितना दूभर हो जाएगा... आज के बाद जब भी यह दामाद बनकर मेरे सामने आएगा, मेरी रूह कांप उठेगी।" आयशा (अपने दिल को झूठी तसल्ली देते हुए, एक गहरी सांस लेकर): "पर कोई बात नहीं... वो इसे सिर्फ एक इत्तेफ़ाक़ ही समझ रहा है, निकाह के बाद सायमा के रंग में रंगकर वो कुछ ही दिनों में इस हादसे को भूल जाएगा... हाँ, वो ज़रूर भूल जाएगा।" आयशा खुद को ढाढस बंधा रही थीं, अपने इस झूठ के सहारे उस भयंकर आत्मग्लानि और ज़िल्लत के अहसास को दबाने की कोशिश कर रही थीं। उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अकरम के दिल में उस "हादसे" ने हवस की जो आग लगाई है, वह इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं थी। --------- बारात अंदर आ चुकी थी। दूल्हा अकरम और उसके अब्बू पूरे वक़ार के साथ स्टेज की तरफ बढ़ गए। बाकी सब बाराती, विशाल समेत, लॉन में मंडप के नीचे सजी मखमली कुर्सियों पर बैठ गए। चारों तरफ शहनाई की धुन और मेहमानों की चहल-पहल थी। "शरबत! शरबत लाओ!" नजमा आंटी ने पुकारा। अम्मी समेत, सब औरतें अब शरबत के गिलासों की ट्रे उठाने लगीं। उन्होंने ट्रे उठायी और उनकी निगाहों ने भीड़ में सीधा विशाल को ढूँढ लिया। वो उसी तरफ चली गयीं। मैं उनके पीछे-पीछे, थोड़ी दूरी पर... चलने लगा। अम्मी ने ट्रे आगे बढ़ायी। एक बाराती को गिलास दिया, फिर दूसरे को दिया। उनके चेहरे पर इस वक्त एक मुकम्मल और संस्कारी मेहमान-नवाज़ की मीठी मुस्कान थी, जैसे कुछ देर पहले गेट पर हुई उस घिनौनी ज़िल्लत का कोई साया भी उन पर न हो। और फिर... वो विशाल के ठीक सामने जाकर खड़ी हो गईं। विशाल आराम से कुर्सी पर पैर पर पैर रखे, पूरी ठसक के साथ बैठा था। उसने अम्मी को देखा—सर से लेकर पाँव तक, उसकी भूखी निगाहें अम्मी के उस चमकीले डिज़ाइनर जोड़े, कानों में झूलते भारी मोतियों के झुमकों और होठों पर सजी 'म्यूटेड बेरी' लिपस्टिक पर आकर टिक गईं। उसकी आँखें साफ़ कह रही थीं कि उसे उस ब्रा के अंदर कसमसाते मम्मों का वो नज़ारा अभी भी याद है। "शरबत?" अम्मी ने अपनी आवाज़ को बेहद मीठा और नर्म बनाते हुए कहा, पर उनकी उंगलियाँ ट्रे के किनारों पर कांप रही थीं। विशाल मुस्कुराया। उसकी वही चिर-परिचित कमीनी मुस्कान उभरी, जो मेरे अंदर गुस्से का सैलाब ला रही थी। उसने गिलास उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन उसने गिलास नहीं पकड़ा... बल्कि उसने जान-बूझकर, अपनी उंगलियों को अम्मी की उन मखमली, गोरी उंगलियों के ऊपर रख दिया। यह एक गहरा, धीमा और बेशरम अहसास था। वह अम्मी की नाज़ुक उंगलियों को अपनी उंगलियों के बीच सहला रहा था, जैसे सरेआम भरी महफ़िल में उनका हाथ पकड़कर अपनी हवस का दावा ठोक रहा हो। उन दोनों के हाथों की वो गर्मी मेरी नज़रों के सामने साफ़ फैल रही थी। वह हरकत इतनी डेलिब्रेट और सोची-समझी थी कि कोई शक की गुंजाइश ही नहीं बची थी; यह उन दोनों का एक नया सीक्रेट सिग्नल था। मेरा दिल तेज़ी से धड़का, जैसे कोई हैमर मेरे सीने पर मार रहा हो। अम्मी की सांसें एक पल के लिए रुक गयीं - मैं देख सका उनके चेहरे पर वो हल्की सी बेचैनी, उनकी आँखें थोड़ी सी बड़ी हो गयीं, लेकिन उन्होंने अपना हाथ वापस नहीं खींचा। बल्कि, उन्होंने उस टच को एक लम्हे के लिए होने दिया, जैसे वो उस गर्मी को एन्जॉय कर रही हों, उनकी उंगलियाँ हल्की सी हिल गयीं जैसे रिस्पॉन्स में। उनका चेहरा लाल हो गया था, धूप की वजह से या उस टच की वजह से। मैं वहीं खड़ा रहा, मेरा खून उबल रहा था, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सका। यह उनका खेल था, और मैं सिर्फ एक देखने वाला था। शेरवानी में, सिर झुकाए बैठा था। सायमा खाला को भी लाल जोड़े में, ज़ेवरों से लदी, स्टेज के एक तरफ बिठाया गया था। काज़ी साहब ने निकाह का खुतबा शुरू किया। उनकी गंभीर आवाज़ माइक्रोफोन में गूँजी। पूरे हॉल में एकदम... खामोशी छा गयी। सब लोग खामोशी से सुन रहे थे। बुज़ुर्ग आदमियों ने अपने सिर झुका लिए थे, उनकी निगाहें ज़मीन पर थीं, जैसे हर लफ़्ज़ को अपने अंदर उतार रहे हों। औरतें, जिन्होंने अभी तक अपने दुपट्टे शान से डाले हुए थे, उन्होंने... एहतरामन् ... अपने सर... थोड़े और ढक लिए थे। मैं एक पिलर से टेक लगाए खड़ा था। मुझे वहाँ से पूरा रोशन स्टेज और पूरा मंडप साफ़ नज़र आ रहा था। अम्मी तेज़ी से नजमा आंटी और दूसरी औरतों के बीच जा कर खड़ी हो गयीं। वो स्टेज के करीब, लेफ्ट साइड पर थीं। उन्होंने अपने सुनहरे दुपट्टे को 'एहतरामन्' अपने सर पर हल्का सा खींच लिया था। उनकी निगाहें सीधी स्टेज पर जमी थीं। एक मुकम्मल, शरीफ, दीन-दार औरत के जैसे। दूसरी तरफ, मर्दों के सेक्शन में, विशाल अपने दोस्तों के साथ खड़ा था। उसकी कमर स्टेज की तरफ थी। वो काज़ी को नहीं देख रहा था, जैसे वो इस सब से बेज़ार हो। हॉल में बैठे हर शख्स की तमाम तवज्जो काज़ी साहब पर थी। काज़ी साहब ने सायमा खाला के वकील से पूछना शुरू किया। उनकी आवाज़ हॉल की भारी खामोशी में गूँजी। सब लोग सांसें रोके, उस सवाल-ओ-जवाब को सुन रहे थे। और तभी, उस खामोशी के बीच, मैंने देखा। विशाल ने, जो अब तक बोर हो रहा था, अपनी जेब से अपना फोन निकाला। उसकी स्क्रीन रोशन हुई। उसकी चमक ने एक पल के लिए उसके चेहरे को नीला कर दिया। वो अपने दोस्तों के झुंड में थोड़ा पीछे हो गया, ताकि उसकी यह हरकत कोई देख ना सके। और ठीक। ठीक उसी पल। जैसे किसी ने कोई बटन दबाया हो, जैसे यह सब प्लान किया गया हो। हॉल के दूसरे कोने में, अम्मी के हाथ में, जो उन्होंने 'अदब' से सामने बाँध रखे थे, उनका फोन वाइब्रेट हुआ। यह वाइब्रेशन इतनी हल्की थी कि उनके आस-पास खड़ी औरतों को, जो निकाह में मग्न थीं, कुछ भी पता नहीं चला। लेकिन मैंने देख लिया। अम्मी ने फौरन एक पल के लिए इधर-उधर देखा। उनकी नज़र तेज़ी से भीड़ पर फिरी, मुझपर से बिना रुके गुज़र गयी, जैसे मैं वहाँ था ही नहीं। जब उन्हें तसल्ली हो गयी कि कोई उन्हें नहीं देख रहा, उन्होंने बहुत आहिस्ता से, अपने सुनहरे दुपट्टे की ओट में, अपने फोन की स्क्रीन को देखा। उनके चेहरे पर कोई तास्सुर नहीं था। वही 'दीन-दार' चेहरा जो काज़ी साहब को सुन रहा था। मगर, उस बे-तास्सुर चेहरे के नीचे, उनके अंगूठे चलने लगे। वो टाइप कर रही थीं। स्टेज पर काज़ी साहब की गंभीर आवाज़ गूँज रही थी, "...हक मेहर की रकम..." और यहाँ नीचे मेरी अम्मी अपने आशिक को मैसेज कर रही थीं। मैंने फौरन दूसरी तरफ विशाल को देखा। उसने अपना फोन देखा, और उसके होठों के कोने एक मुस्कुराहट में ऊपर उठ गए। यह वही गंदी, 'नोइंग' स्माइल थी। उसने फौरन तेज़ी से जवाब टाइप किया। और इधर, अम्मी के चेहरे पर, वही 'muted berry' लिपस्टिक वाले होंठ दब गए। ऐसा लगा जैसे वो एक हंसी, एक खुशी, ज़बरदस्ती रोक रही हों। "कबूल है।" जैसे ही सायमा खाला की आवाज़ मंडप में गूँजी, निकाह पूरा हो गया। काज़ी साहब ने दुआ के लिए हाथ उठाए। जैसे ही दुआ खत्म हुई, मंडप की खामोशी एकदम से टूटी। "मुबारक हो! मुबारक हो!" पूरी जगह एकदम से शोर, हंसी और आवाज़ों से ज़िंदा हो उठी। लोग अपनी जगहों से उठ खड़े हुए। हर कोई दूल्हा-दुल्हन को मुबारकबाद देने के लिए स्टेज की तरफ बढ़ने लगा। एक अराजकता का माहौल था। अम्मी, जिन्होंने अभी तक 'दीन-दार' चेहरा बना रखा था, उन्होंने फौरन अपना सुनहरा दुपट्टा सर से उतार कर वापस शान से कंधे पर डाल लिया। "अरे, मुबारक हो, नजमा मामी!" वो ज़ोर से हंसती हुईं, नजमा आंटी और दूसरी औरतों के साथ, स्टेज की तरफ बढ़ने लगीं। दूसरी तरफ, विशाल भी अपने दोस्तों के झुंड से निकला। वो भी, अकरम को मुबारकबाद देने, स्टेज की तरफ चल पड़ा। मैं पिलर के पास से हटा। मैं भी भीड़ के साथ हो लिया। मैं अम्मी और नानी के ठीक पीछे चलने लगा। इतना करीब कि मैं उनकी हर खुस-फुस सुन सकता था। इतना करीब कि अम्मी के महंगे परफ्यूम की महक मुझे घुटन दे रही थी। भीड़ में धक्का-मुक्की हो रही थी। मर्दों और औरतों के झुंड आपस में मिल रहे थे, सब स्टेज की तरफ बढ़ रहे थे।
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20-07-2026, 04:45 AM
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20-07-2026, 04:48 AM
Adhyay - 19
Subah jab Ayesha apne lehenge aur kurti ko aaine mein theek kar rahi thheen, tabhi unke phone par Vishal ka naam chamak utha.Us naam ko dekhte hi unka poora vajood ek baar phir kal raat ke usi kaamuk bavandar mein doob gaya. Unhone kaampte haathon se phone uthaya aur kaan se laga liya. Vishal (phone par, behad kaamuk aur dabi hui aawaaz mein phusphusaate hue): "Good morning Ayesha ji, kaisi hain aap is khili hui subah mein?" Ayesha (chehra sharm aur uttejana se laal hote hue, sir jhukaakar dabi aawaaz mein boleen): "Hoon..." Vishal (man mein kameeni muskaan ke saath, uske is 'hoon' ka maza lete hue): "Raat ko neend to theek se aai na aapko?" Ayesha (kal raat ki apni nagnata aur panty ke geelepan ko yaad karte hue, aur bhi zyaada sharmaate hue): "Hoon..." Vishal (apne lund ke ubhaar ko pant ke oopar se sahlaate hue, behad sarsaraati aawaaz mein): "Kal raat ki us sard hawa ke baad... sote waqt kisi ke garam sapne to nahi aaye aapko?" Ayesha (chehre par bhayankar laali chha jaane aur chhaati par bhaari mammon ke kasmasaane ke beech, apni ukhdi saanson ko chhupaate hue): "Please Vishal..." Vishal (phone par, apni aawaaz mein hawas ki kashish gholte hue): "Kasam se Ayesha ji, raat bhar mere ko neend hi nahi aai." Ayesha (kaampte hothon se, apni dhadkanon ko sambhaaladte hue phusphusai): "Please Vishal ji, aisi baat mat bolo..." Vishal (kameeni muskaan ke saath apne lund ko jeans ke oopar se bheenchte hue): "Bistar par letate hi aapke wo dono bhaari mamme, aapke oopar wale raseele hoth aur aapki wah neeche wali makhamali choot, baar-baar meri aankhon ke saamne aa rahe the." Ayesha (chehre par bhayankar laali aur sharm ke bavandar ke beech, makhamali kurti ke neeche apne kasmasaate stanon ko bheenchte hue): "Please Vishal ji..." Vishal (hawas se haanfte hue, bebaaki se): "Aapke us mukammal nange badan ki yaad mein mera lund to baithne ka naam hi nahi le raha tha." Ayesha (man mein bhayankar kashmakash ke saath sochte hue: 'Ya Khuda! Yeh mard kitna besharm hai, kitni gandi baatein bol raha hai... lekin mera ang-ang iski is hawas ke aage pighalta ja raha hai'): "Please Vishal ji, aisi baat mat bolo..." Vishal (apni aawaaz ko aur dheema aur sarsaraata hua rakhte hue): "Raat ko kasam se, do baar maine aapka naam lekar aapke husn ko yaad kiya aur apna paani nikaala, par yeh auzaar abhi bhi aapke liye poora khada hai." Ayesha (majboori, dar aur charam uttejana ke maare apni aankhein kaskar bheenchte hue): "Vishal..." Vishal (phone par, ek kameeni aur madhosh kar dene wali muskaan ke saath): "Ayesha ji, ek baat poochhoon aapsey?" Ayesha (apni dhadkanon ko sambhaalte hue, behad dheemi aawaaz mein): "Kya... kya poochhna hai?" Vishal (behad sarsaraati aur hawas se bhari aawaaz mein phusphusaate hue): "Kya raat ko sote waqt mera yeh 10 inch ka lund aapke khwaabon mein aaya tha? Sach-sach bataiye... kya iska yeh bheemkaay aakaar aapke shauhar ke ang se bhi zyaada bada mehsoos hua?" Ayesha (khauf aur charam sharm ke maare poori tarah kaampte hue, phone ko kaan se aur kaskar chipkaakar boleen): "Please Vishal ji... aisi gandi baatein mat kariye, nahi to mein abhi ke abhi phone kaat doongi!" Ayesha (lekin man mein vaasana aur aatm-glaani ke bhayankar daldal mein doobte hue): "Ab ise kya jawaab doon? Kaise kahoon ki is zaalim ke usi ang ki chhavi ne poori raat meri raaton ki neend haraam kar rakhi thi... mein to apni bachhi Saima ki aabroo ko iske changul se bachaane nikli thhi, par khud is gair mard ki hawas ke daldal mein din-ba-din aur gahri girti ja rahi hoon..." Vishal (phone par, ek gahri aur rahasyamayi saans lete hue): "Achha chhoriye in baaton ko, aaj to bahut bada din hai, aakhirkaar Saima ka nikaah hone ja raha hai." Ayesha (halki si raahat ki saans lete hue): "Hoon..." Vishal (kameeni muskaan ke saath): "Yeh sab aapki us raat ki mehnat aur qurbaani ka hi phal hai Ayesha ji." Ayesha (bhauhein sikodte hue, utsukta aur dar ke mile-juli aawaaz mein): "Wah kaise?" Vishal (hanste hue, seedhe mudde par aate hue): "Agar aap us raat chhat par meri baat maankar apne kapde na utaarteen, to mein to aaj Akram ki jagah Saima ke saath hota." Ayesha (sharm aur kal raat ki nagnata ko yaad kar kaampte hue): "Ufff..." Vishal (apni aawaaz mein thodi kadvahat aur zid laate hue): "Lekin is sab ke chakkar mein mera bahut bada nuksaan ho gaya hai, Saima jaisi kawari kali mere haath se nikal gai." Ayesha (dil ki badhti dhadkanon ko dabaate hue, darkar): "Oh Khuda..." Vishal (lund par haath pherte hue, apni asli aukaat dikhaate hue): "To itna sabr karne ka aur apna itna bada nuksaan karwaane ka, kuchh to inaam banta hai na mera?" Ayesha (man mein bhayankar khauf aur chinta ke bavandar mein doobte hue): "Ya Khuda, is darinde ki neeyat phir se dol rahi hai... ab yeh aaj is nikaah ke day par mujhse kaun si nai aur besharm maang karne wala hai?" Ayesha (kaampti hui aawaaz mein, baat ko taalne ki naakaam koshish karte hue): "Hoon... please abhi neeche sab intazaar kar rahe hain..." Vishal (phone par, apni aawaaz mein wahi purana kroor lehja laate hue): "Ayesha ji, please yeh mat bhooliyega ki Saima ki wo nagna tasveerein abhi bhi mere is phone mein mehfooz hain." Ayesha (khauf ke maare poori tarah toot-te hue, laachaari se boleen): "Theek hai... bolo, ab aur kya chahte ho tum mujhse?" Vishal (kameeni muskaan ke saath, apni hawas ki nai shart rakhte hue): "Aaj aap jode ke neeche peele rang ki bra aur panty pehnenge, kyunki laal wali to kal raat hi poori tarah bheegkar kharaab ho chuki hogi." Ayesha (sharm se apni aankhein band karte hue, behad bebasi se): "Hoon..." Vishal (uttejana se haanfte hue, apni baat ki pushti karne ke liye): "Waise, aapke paas peele rang ka wah set hai to sahi na?" Ayesha (kaampte hothon se, apni izzat ki neelaami ko sweekar karte hue): "Hoon..." Vishal (hawas se apni aankhein moonde hue, apna ghinauna plan samjhaate hue): "Theek hai, to jab aaj baaraat gate par aayegi, tab mein kisi ke kandhe par haath rakhunga aur wahi aapka ishaara hoga." Ayesha (dil ki badhti dhadkanon ke beech, darte hue): "Hoon..." Vishal (chillaate hue lund ko sahlaate hue): "Jaise hi mera haath uske kandhe par pade, aap humare saamne aage ki taraf jhukkar humein apne wo sudaul mamme dikhaengi, jo us peeli bra ke andar kasmasa rahe honge... kurti ke gahre gale se aapke wo teekhe nipples tak dikhne chahiye." Ayesha (dahashat se kaampte hue, gidgidaane wale lehje mein): "Nahi... please aisa mat karo... sabke saamne is tyrannical mujhe zaleel mat karo..." Vishal (kroorta se hanste hue, seedhe dhamki par utar aate hue): "Ayesha ji, aap shayad bhool rahi hain ki abhi Saima ka nikaah hona baaki hai." Ayesha (man mein doobte hue vajood ke saath, subakte hue): "Ufff... Vishal, tum bade kameene ho." Vishal (apni usi chir-parichit besharm aur kameeni muskaan ke saath, phone par phusphusaate hue): "Kameena to mein hoon hi Ayesha... par saala mera yeh lund mere se bhi bada kameena hai. Yeh jis kisi ki bhi choot mein jaata hai na, use phaad ke rakh deta hai." Vishal ke munh se nikle in behad gande aur nagn shabdon ko sunte hi Ayesha ke dimaag mein ek bhayankar vishphot hua. Dimaag chaahkar bhi khud ko rok nahi paya aur ek jhatke mein unke band aankhon ke saamne Vishal ka wo kaaliya, nas-nas ubhra hua 10 inch ka mota lund tair gaya. Unhone apni kalpana mein saaf dekha ki wah khaufnaak ang unki apni naazuk, gori aur gulaabi choot ke andar zabardasti dhansta chala ja raha hai. Ayesha (man mein, us 10 inch ke khaufnaak ubhaar ki kalpana se boori tarah kaampte hue): "Ya ,.'... 10 inch ka wo kaala zallaad! Agar wo sachmuch meri is tang aur gulaabi choot ke andar gaya, to mera kya haal hoga? Mein itne bade aur khaufnaak lund ko apne vajood ke andar kaise bardaasht kar paungi? Wo to mujhe andar tak cheer kar rakh dega... ufff, par yeh sochkar bhi meri choot paani kyun chhor rahi hai?" Unki saansen boori tarah ukhad chuki thheen aur jism hawas ki aag mein tadap raha tha, lekin apni sanskaari maryada ko bachaane ke liye unhone apni kaampti aawaaz ko bamushkil sambhaala. Ayesha (phone par apni ukhdi saanson ko chhupaate hue, gusse aur ghabraahat ke naatak ke saath): "Vishal... please! Agar aage se aisi gandi aur behooda baatein karoge, to mein abhi isi waqt phone kaat rahi hoon!" Vishal (phone par ek halki, kameeni hansi hanste hue): "Ayesha... aap to naraaz ho rahi hain! Achha, mein aapki baat maan raha hoon... aage se aisa kuchh nahi bolunga. Par meri ek baat aap bhi kaan kholkar sun lijiye—agar aapne wahan mandap ke paas ek bhi kadam peeche hataya, to Saima ki wo nagna tasveerein aur kal raat ki aapki yeh nangi video, dono isi waqt poore khaandaan ke phone par tair rahi hongi!" Ammi bilkul saamne thheen, Najma aunty ke paas. Wo bahut khoobsurat lag rahi thheen. Unka wah bhaari designer joda subah ki us saaf dhoop mein jagmaga raha tha. Unke kaanon mein saje sone aur mootiyon ke bhaari jhumke, unka chamakta hua chehra, aur hothon par saji wahi 'muted berry' lipstick... wo bahut pyaari lag rahi thheen. Dhol aur phataakon ki aawaaz ab bahut kareeb aa gayi thhi. Dhum! Dhum! Dhum! Aur phir, baaraat ne gate mein kadam rakha. Sabse aage doolha- Akram tha. Usne ek khoobsurat, safed rang ki sherwani pehni thhi, jispar nafees sunahra kaam tha. Uske chehre par ek mootiyon ka sehra tha, jiske peeche se uski muskuraahat jhalak rahi thhi. "Khush aamdeed! Khush aamdeed!" Sab auraton ne, Ammi samet, unpar phool phenkne shuru kar diye. Gulaab ki pattiyaan Akram ke safed jode par, uske sehre par, girne lageen. Uske theek peeche uske dost the. Sab naujawaan ladke, mehnge kurta aur suits mein. Naach rahe the, shor macha rahe the. Mein yeh sab ek kone se dekh raha tha. Deewar se tik kar. Mein Ammi ko dekh raha tha, jo khushi se Akram ke doston par bhi phool barsa rahi thheen. Unki hansi sabse oonchi thhi. Doston ke us jhund mein Vishal bhi tha. Usne white rang ka kurta pyjama aur brown chamakti hui koti pehni hui thhi. Use dekhkar mera khoon meri ragon mein jam gaya. Dhol ki aawaaz, phoolon ki mehak, sab ek pal mein gaayab ho gaya. Meri nigaahein ek teer ki tarah Ammi par chali gayeen. Ammi, jo abhi tak Akram ko dekh kar muskura rahi thheen, unki nazar ab doston ke us jhund par padi jahan Vishal tha, us white kurte aur brown koti mein, naachte hue, shor machaate hue. Unka chehra ek pal ke liye chamak utha. Ammi ki muskuraahat ab aur gahri ho gayi, jaise koi raaz ki hansi ho. Unki aankhein thodi si chamkeen, sirf ek lamhe ke liye, lekin maine dekh liya. Unke haath, jo phool phenk rahe the, ab seedhe Vishal ki taraf mud gaye. Unhone ek muskuraahat ke saath, jaise mazaak mein, ek mota sa guchha gulaab ki pattiayan ka us par phenk diya. Pattiyaan uske kurte par gireen, uske chehre par, aur wo hans padeen. Dhol ki aawaaz, phoolon ki mehak, aur logon ka shor... sab ek pighle hue shor mein badal gaya. Mein sirf un do ko dekh raha tha. Vishal ki nazar, naachte hue, us jhund mein se Ammi par padi. Uske chehre par wahi... sharaarati muskuraahat phail gayi. Wo naachte hue... bhayd se thoda sa alag hua aur thoda sa aage badha. Us taraf, jahan Ammi khadi thheen. Phir usne apne haath ko... ek 'aadaab' ya 'salaam' ke andaaz mein uthaya... lekin yeh salaam nahi tha. Uski ungliyaan... halke se... uske apne lips ko ek pal ke liye chhoo kar guzar gayeen. Ek gesture jo sirf ek second ke liye tha, lekin ishaara saaf tha. Maine Ammi ko dekha. Unki saansen ek pal ke liye ruk si gayeen. Unke 'muted berry' lipstick wale honth thode se khul gaye. Aur phir Vishal ne apna dance aur zyaada badha diya. Usne Ammi ko dikhaate hue ek poora spin liya aur dhol ki beat par apni baahein phailaayeen, jaise wo poori performance sirf unke liye ho. Vishal ki is deewangi aur mardaana ada ko dekhkar Ayesha andar hi andar behad prabhaavit ho utheen. Us bhare hujoom mein Vishal ka is tarah sirf unki taraf dekhkar naachna unke badan mein ek ajeeb si siharan paida kar gaya. Ayesha (Vishal ke us gatheele jism ke lachilepan aur uski madhosh aankhon ko dekhte hue, man mein): "Ya Khuda... is mard ka yeh bebaak andaaz seedhe mere dil ko chhoo raha hai. Kaash... kaash aisi deewangi, aisi deewano jaisi harkat kabhi mere shauhar ne mere liye ki hoti." Ayesha (man mein): "Unhone to mujhe hamesha sirf chaar deewaron ke peeche ek shareef beewi ki tarah dekha, kabhi mere husn ki is tarah sareaam sabke saamne saraahana karne ki koshish hi nahi ki..." Aur Ayesha hans padeen (na chaahte hue bhi). Yeh ek... khanakti hui, shokh hansi thhi. Unhone apni chaandi ki thaali se aur phool uthaye aur ek jhatke se seedhe Vishal ki taraf phenke. Ayesha (phool phenkte hue, apne bheetar mache maanasik bavandar aur bebasi ke saath man mein): "Mein yeh kya kar rahi hoon? Meri rooh, mera dimaag is darinde ki neechta aur blackmailing se bhayankar nafrat karta hai... mujhe achhi tarah maalum hai ki kuchh hi der mein mujhe iske saamne aage jhukkar apni us peeli bra mein kase bhaari mammon aur teekhe nipples ki numaish karni hogi..." Ayesha (Vishal ki kaatilaana muskaan ko dekhkar, badan mein uththi vaasana ki siharan ke saath man mein): "Lekin mein chaahkar bhi khud ko rok nahi pa rahi. Iski is mardaana deewangi ne mere bheetar kaisi aag sulga di hai? Meri bandishein toot rahi hain... nafrat ke baavajood mera yeh kamzoor man iski harkaton ko andar hi andar pasand karne laga hai. Yeh mard mujhe is gunaah ke daldal mein aur gahre dhakelta ja raha hai, aur mein bebas hokar doobti ja rahi hoon..." Aur Ammi hans padeen. Yeh ek... khanakti hui, shokh hansi thhi. Unhone apni thaali se aur phool uthaye aur ek jhatke se seedha Vishal ki taraf phenke. "Khush aamdeed!" wo kahkaha laga kar boleen. Phool Vishal ke safed kurte aur chamakti koti par gireen. Yeh ek khel tha. Ek behaya, sabke saamne... aankhon hi aankhon mein khela jaane wala... khel. Phir Vishal muda aur Akram ka haath pakde hue seedhe Ammi ki taraf badha. Ammi ke theek aage aakar usne rukkar seedhe unki aankhon mein dekha. Ammi ke chehre par hawaiyaan udne lageen, unka wo gora chehra khauf aur sharm ke maare ekdam peela pad gaya. Deewar ke paas khada mein thoda aur aage badha taaki mein saaf-saaf dekh sakoon ki is bhare hujoom mein unkon dono ke beech ab kya hone wala hai. Ammi ki saansen boori tarah ukhad chuki thheen aur unki bra ke andar kase unke dono bhaari mamme kurti ke neeche tezi se oopar-neeche hone lage the. Tabhi Vishal ne kameeni muskaan bikheri. Usne Akram ke kaan mein kuchh guftgoo karte hue, bade aaram se apna haath Akram ke kandhe par rakh diya. Akram ke kandhe par Vishal ka haath tikte hi jaise Ayesha ke pairon ke neeche se zameen khisak gai. Unka poora vajood khauf aur charam uttejana ki ek mili-juli aag mein jhulas utha. Unke dil ki dhadkan itni tez ho chuki thhi ki unhein dar tha ki kahin paas khadi Najma aunty ko uski aawaaz na sunai de jaaye. Ayesha (Akram ki taraf dekhkar, khauf aur charam sharm se andar tak kaampte hue man mein): "Oh mere Khuda... to ab mujhe apne jism ki yeh mukammal numaish Vishal ke saath-saath is Akram ke saamne bhi karni hogi? Yeh ladka... jo kuchh hi ghanton mein Saima ka shauhar aur mera daamaad banne ja raha hai, aaj wah apni is khaala ka yeh besharm roop dekhega!" Is ahsaas ne Ayesha mein dar ka ek aisa current daudaya ki uski aankhon ke aage andhera chhaane laga. Baat sirf Vishal aur Akram ki nahi thhi, saamne mehmaanon aur rishtedaaron ka poora hujoom khada tha. Ayesha (saamne khade hujoom ko dekh, bheetar mache maanasik bavandar se tadapte hue man mein): "Agar mein aage jhuki, to kurti ke is gahre gale se meri wah peeli bra aur uttejana ke maare tane hue wo teekhe gulaabi nipples saaf dikhai denge. In dono ke alaawa agar kisi aur ki pyaasi nazar is ubhaar par pad gai, to kya hoga?" Ayesha (kaampti hui saanson ke saath, apni band aankhon ke peeche chhipe dar ke saath man mein): "Nahi... agar kisi aur ne yeh nazaara dekh liya, to khaandaan ki izzat ek second mein mitti mein mil jaayegi. Mera vajood hamesha ke liye badnaam ho jaayega." Akram ke kandhe par tika Vishal ka haath unhein yaad dila raha tha ki agar unhone abhi aage jhukkar apne in kasmasaate mammon ka muaayna nahi karaya, to Saima ki nagna tasveerein aur kal raat ki unki khud ki nangi video is poori mehfil ke phone par tair rahi hogi. Ayesha ne apni ukhadti saanson aur kaampte vajood ko kisi tarah sambhaala. Is zillat ke beech bhi unke dimaag ne kaam kiya. Unhone saamne khade Akram aur Vishal ki taraf do kadam badhaye. Wah unke itne kareeb aa gayeen ki un dono ke chaude aur gatheele jism ab baaki mehmaanon aur rishtedaaron ke liye ek dhaal ban chuke the. Peeche khade logon ki nazron se khud ko mehfooz paakar, Ayesha ne apni aankhein kaskar band kar leen. Unhone apne sunahre dupatta ko thoda dheela hone diya aur chaandi ki thaali se kuchh rupaye jaanboojhkar neeche zameen par gira diye, phir un rupayon ko uthaane ke bahaane, poore adhikaar se aage ki taraf jhuk gayeen. Jaise hi wah jhukeen, unki us kasi hui 'deep golden' reshami kurti ka gahra gala aage ki taraf latak gaya. Vishal aur Akram ke theek saamne unke jism ka wah sabse gupt aur raseele nazaara poori tarah beparda ho gaya. Us ivory lehenge aur kurti ke neeche, Ammi ke wo bhaari, sudaul aur doodh jaise safed mamme us tang, surkh peele rang ki bra ke capon se baahar ubalne ko tadap rahe the. Peeli bra ka wah besharm kapda unke un bhaari golon ko poori tarah sambhaal nahi pa raha tha. Subah ki thandi hawa aur phone par hui Vishal ki un gandi baaton ki uttejana ke maare, Ayesha ke wo teekhe gulaabi nipples us kurti ke gahre gale se saaf baahar jhaank rahe the, jo kisi angoor ke daane ki tarah poori tarah tankar kade ho chuke the. Vishal aur Akram, dono ki aankhein phati ki phati reh gayeen. Unki bhookhi nazarein seedhe Ayesha ke us peele kapde mein kasmasaate husn ki gahraaiyon ko aur unke teekhe nipples ko andar tak scan kar rahi thheen. Ayesha (vaasana, sharm aur laachaari ke charam bindu par pahunchkar, man mein): "Oh mere Khuda... maine aaj khud ko poori tarah neelaam kar diya. Meri peeli bra aur mere ye tane hue nipples aaj is gair mard aur meri bachhi ke hone wale shauhar ke saamne poori tarah beparda hain... yeh ahsaas mujhe andar tak pighla raha hai... meri choot ka paani meri jaanghon se behne ko taiyaar hai..." Wah kuchh second tak usi haal mein jhuki raheen, jabki un dono ki hawas bhari saansen Ayesha ke un nange hote mammon ki garmi ko seedhe mehsoos kar rahi thheen. Phir kaampte haathon se zameen par bikhre rupayon ko samet-te hue wah dheere se oopar utheen. Ayesha ne apni ukhdi hui saanson ko qaaboo mein kiya aur un rupayon ko Akram ke sir ke chaaron taraf se vaarkar (sadqa utaarkar), paas hi khade band waalon ki taraf badha diya. Is poori prakriya ke dauraan Ayesha ne apni nazarein neechi hi rakheen, lekin unke chehre ki wo bhayankar laali aur dupatta ko waapas seene bur kasne ki wo chhatpataahat saaf bayaan kar rahi thhi ki uske andar sharm aur vaasana ka kya toofaan guzra hai. Akram ki aankhein Ayesha ke us kasmasaate husn ko dekhkar phati ki phati reh gayeen. Jo nazaara uske theek saamne beparda hua tha, uski usne apne khwaabon mein bhi ummeed nahi ki thhi. Apni hone wali beewi Saima ki sagi khaala aur is ghar ki sabse baaizzat aur khoobsurat aurat ko is tarah apne theek saamne jhuka dekhkar uska dimaag sunn ho gaya. Akram (Ammi ke un peele kapde mein ubalte bhaari mammon aur seedhe baahar jhaankte teekhe nipples par apni nazarein gadaaye hue, man mein): "Ya Khuda... yeh mein kya dekh raha hoon? Yeh to Saima ki khaala hain... is haveli ki aan-baan aur shaan! Kurti ke is gahre gale se inke wo doodh jaise safed, bhaari mamme aur us peeli bra ke andar nipples seedhe meri aankhon ke saamne naach rahe hain..." Ayesha ke jism ki wah kasmasaahat aur unke badan se uththi hui taaza khushboo ne Akram ke andar ek pal mein vaasana ka bhayankar laava phoonk diya. Sherwani ke neeche uska apna ang lohe ki tarah sakht hone laga. Akram (hawas aur hairat ke mile-juli deewangi mein haanfte hue): "Vishal theek hi kehta tha kal raat dance party mein... yeh aurat andar se sachmuch baarood ka dher hai. Saima to abhi kali hai, par uski yeh khaala to poora khila hua raseela baag hain. Nikaah ke is paak day par, apni hone wali saas jaisi aurat ke is nagn ubhaar ko itne kareeb se dekhna... uff! Inki is peeli bra ke andar chhipi hawas to seedhe mujhe daawat de rahi hai. Aisa lag raha hai jaise yeh khud chaahti hain ki aaj raat Saima se pehle mein inke is jism ki aag ko shaant karoon..." Akram Ayesha ko waapas uthhte aur sahajta se apne sir par haath pherkar sadqa utaarte dekh, ek pal ke liye soch mein pad gaya. Uska nazariya thoda badla. Akram (Ammi ko poori shaalenta se waapas dupatta sambhaalte dekh, man hi man): "Oh... to kya yeh vaakai mahaz ek ittefaaq tha? Thaali se rupaye gir gaye the aur yeh bas unhein uthaane ke liye neeche jhuki thheen?" Akram (Ayesha ke us shaant aur garimaamayi chehre ko dobaara nihaarte hue, vaasana ki gahri giraft mein): "Chaahye jo bhi ho... yeh ek aisa khoobsurat haadsa tha jise mein apni aakhiri saans tak nahi bhool paunga. Ab jab bhi, jitni baar bhi mein apni khaala ko dekhunga, meri aankhon ke aage reshami kurti ke neeche kasmasaate wo bhaari mamme aur peeli bra se jhaankte wo teekhe, tane hue nipples hi tairenge." Vishal (Ayesha ke us gahre gale se jhaankte hue peele husn ko dekhkar man mein, hawas aur jeet ke charam unmaad mein doobte hue): "Uff... saala, maza hi aa gaya! Is aurat ka yeh nazaara dekhne ke liye to mein apni poori zindagi daanv par laga sakta hoon. Dekho zara is sanskaari aur shareef khaandaan ki izzat ko... kaise is bhare baazaar mein, apne hone wale daamaad Akram ke theek saamne apni peeli bra aur ye tane hue teekhe nipples paros rahi hai!" Vishal ki aankhein Ayesha ke un bhaari mammon ke gahre utaar-chadhava ko scan kar rahi thheen, aur uski pant ke andar uska kada lund phatne ko taiyaar ho raha tha. Vishal (apni is zabardast kaamyabi par man hi man kameeni muskaan bikherte hue): "Kal raat jab iski nangi gaand aur hairless choot ko maine apne neeche ragda tha, tab bhi iske chehre par yehi bebasi thhi. Par aaj... aaj to khel hi alag hai. Aaj maine iske vajood ki dhajjiyaan uda di hain." Vishal: "Akram saala to Saima ke khwaab dekh raha tha, par maine nikaah ke mandap par chadhne se pehle hi ise apni khaala ka yeh raseela aur besharm roop dikha diya. Bahut jald tu hum dono ke neeche ek saath letegi aur cheekhegi!" Vishal (Ayesha ko waapas uthhte aur Akram ka sadqa utaarte dekh man hi man unki is chaalaaki ki daad dete hue): "Maanna padega boss... is aurat ka dimaag to chalta hai! Jis shaatir tareeqe se is poore nazaare ko sirf hum do logon ke dekhne laayak seemit rakha, aur jis tarah chaandi ki thaali se chaalaaki se rupaye giraakar neeche jhukne ko ek mahaz haadsa bana diya... sachmuch kaabile-taareef hai. Bhare hujoom ke saamne apni izzat bhi neelaam kar di, meri shart bhi poori kar di aur kisi ko shak ki bhanak tak nahi lagne di." Mujhe wahan se saaf-saaf kuchh nazar nahi aa raha tha, kyunki Vishal aur Akram ke chaude badan ne Ammi ko poori tarah dhak rakha tha. Lekin jis tarah se un dono ke munh khule ke khule reh gaye the, unki aankhein phati hui thheen, aur jis tarah se Ammi unke theek saamne aage jhuki hui thheen... mein bina dekhe bhi bahut achhi tarah samajh sakta tha ki wo dono is waqt Ammi ke jism ka kaun sa nazaara dekh rahe hain. Mera man andar se boori tarah cheekh raha tha, "Ammi... aap yeh kya kar rahi hain? Aap to aisi nahi thheen!" Ek taraf Ammi ki wah sanskaari aur paakeeza chhavi thhi jise maine bachpan se dekha tha, aur doosri taraf aankhon ke saamne chalta yeh ghinauna khel. Apni sagi Ammi ko is tarah do gair mardon ke saamne ghutne tekte aur apne husn ki numaish karte dekh mera dil dahal gaya tha. Mein laachaari aur gusse ki aag mein andar hi andar jal raha tha. Jab Ammi ne neeche gire hue rupaye uthaye aur unhein Akram ke sir ke oopar se ghumaakar sadqa utaara. Mein soch mein pad gaya ki kya yeh sab vaakai sirf ek haadsa tha? Mera tadapta hua man apni Ammi ki paakeezah chhavi ko bachaane ke liye is bahaane ko sach maan lena chahta tha. Mujhe laga ki shayad thali se rupaye sachmuch achanak gir gaye the, aur Ammi ne bas ek rasm nibhaane ke liye Akram ka sadqa utaar diya. Ayesha (dupatta ko seene par achhi tarah durust karte hue, ek lambi aur kaampti hui saans lekar man mein): "Ya Khuda, tera laakh-laakh shukr hai ki izzat bach gai... is bhare hujoom mein se kisi teesre ki nazar us peeli bra aur mere in tane hue nipples par nahi padi." Ayesha (Vishal aur Akram se nazarein churaakar peeche hatte hue): "Shukr hai mera wo dimaag kaam kar gaya... thaali se rupaye giraakar maine us besharm numaish ko mahaz ek haadsa bana diya, warna aaj mera vajood yehi mitti mein mil jaata." Ayesha (Akram ki taraf dabi nazar se dekhte hue, ek gahri chinta ke saath): "Lekin ab is Akram ke saamne jaana kitna doobhar ho jaayega... aaj ke baad jab bhi yeh daamaad bankar mere saamne aayegi, meri rooh kaamp uthegi." Ayesha (apne dil ko jhoothi tasalli dete hue, ek gahri saans lekar): "Par koi baat nahi... wo ise sirf ek ittefaaq hi samajh raha hai, nikaah ke baad Saima ke rang mein rangkar wo kuchh hi dinon mein is haadse ko bhool jaayega... haan, wo zaroor bhool jaayega." Ayesha khud ko dhaadhhas bandha rahi thheen, apne is jhooth ke sahaare us bhayankar aatmglani aur zillat ke ahsaas ko dabaane ki koshish kar rahi thheen. Unhein is baat ka bilkul andaaza nahi tha ki Akram ke dil mein us "haadse" ne hawas ki jo aag lagai hai, wah itni jaldi bujhne wali nahi thhi. Baaraat andar aa chuki thhi. Doolha Akram aur uske abboo poore vaqaar ke saath stage ki taraf badh gaye. Baaki sab baaraati, Vishal samet, lawn mein mandap ke neeche saji makhamali kursiyon par baith gaye. Chaaron taraf shehnaai ki dhun aur mehmaanon ki chahal-pahal thhi. "Sharbat! Sharbat lao!" Najma aunty ne pukaara. Ammi samet, sab auratenei ab sharbat ke gilason ki tray uthaane lageen. Unhone tray uthaayi aur unki nigaahon ne bheed mein seedha Vishal ko dhoondh liya. Wo usi taraf chali gayeen. Mein unke peeche-peeche, thodi doori par... chalne laga. Ammi ne tray aage badhaayi. Ek baaraati ko gilas diya, phir doosre ko diya. Unke chehre par is waqt ek mukammal aur sanskaari mehmaan-nawaaz ki meethi muskuraahat thhi, jaise kuchh der pehle gate par hui us ghinauni zillat ka koi saaya bhi un par na ho. Aur phir... wo Vishal ke theek saamne jaakar khadi ho gayeen. Vishal aaram se kursi par pair par pair rakhe, poori thasak ke saath baitha tha. Usne Ammi ko dekha—sar se lekar paanv tak, uski bhookhi nigaahein Ammi ke us chamkile designer jode, kaanon mein jhoolte bhaari mootiyon ke jhumkon aur hothon par saji 'muted berry' lipstick par aakar tik gayeen. Uski aankhein saaf keh rahi thheen ki use us bra ke andar kasmasaate mammon ka wo nazaara abhi bhi yaad hai. "Sharbat?" Ammi ne apni aawaaz ko behad meethi aur narm banaate hue kaha, par unki ungliyaan tray ke kinaaron par kaamp rahi thheen. Vishal muskuraaya. Uski wahi chir-parichit kameeni muskuraahat ubhri, jo mere andar gusse ka sailaab la rahi thhi. Usne gilas uthaane ke liye apne haath badhaya, lekin usne gilas nahi pakda... balki usne jaan-boojhkar, apni ungliyon ko Ammi ki un makhamali, gori ungliyon ke oopar rakh diya. Yeh ek gahra, dheema aur besharm ahsaas tha. Wah Ammi ki naazuk ungliyon ko apni ungliyon ke beech sahla raha tha, jaise sareaam bhari mehfil mein unka haath pakdarkar apni hawas ka daawa thok raha ho. Unkon dono ke haathon ki wo garmi meri nazron ke saamne saaf phail rahi thhi. Wah harkat itni deliberate aur sochi-samjhi thhi ki koi shak ki gunjaish hi nahi bachi thhi; yeh un dono ka ek naya secret signal tha. Mera dil tezi se dhadka, jaise koi hammer mere seene par maar raha ho. Ammi ki saansen ek pal ke liye ruk gayeen - mein dekh saka unke chehre par wo halki si bechaini, unki aankhein thodi si badi ho gayeen, lekin unhone apna haath waapas nahi kheencha. Balki, unhone us touch ko ek lamhe ke liye hone diya, jaise wo us garmi ko enjoy kar rahi hon, unki ungliyaan halki si hil gayeen jaise response mein. Unka chehra laal ho gaya tha, dhoop ki wajah se ya us touch ki wajah se. Mein waheen khada raha, mera khoon ubal raha tha, lekin mein kuchh nahi kar saka. Yeh unka khel tha, aur mein sirf ek dekhne wala tha. Sherwani mein, sir jhukaaye baitha tha. Saima khaala ko bhi laal jode mein, zevaron se ladi, stage ke ek taraf bithaaya gaya tha. Qaazi sahab ne nikaah ka khutba shuru kiya. Unki gambheer aawaaz microphone mein goonji. Poore hall mein ekdam... khaamoshi chha gayi. Sab log khaamoshi se sun rahe the. Buzurg aadmiyon ne apne sir jhuka liye the, unki nigaahein zameen par thheen, jaise har lafz ko apne andar utaar rahe hon. Auratein, jinhone abhi tak apne dupatta shaan se daale hue the, unhone... aehtaraaman... apne sar... thode aur dhak liye the. Mein ek pillar se take lagaaye khada tha. Mujhe wahan se poora roshan stage aur poora mandap saaf nazar aa raha tha. Ammi tezi se Najma aunty aur doosri auraton ke beech ja kar khadi ho gayeen. Wo stage ke kareeb, left side par thheen. Unhone apne sunahre dupatta ko 'aehtaraaman' apne sar par halka sa kheench liya tha. Unki nigaahein seedhi stage par jami thheen. Ek mukammal, shareef, deen-daar aurat ke jaise. Doosri taraf, mardon ke section mein, Vishal apne doston ke saath khada tha. Uski kamar stage ki taraf thhi. Wo qaazi ko nahi dekh raha tha, jaise wo is sab se bezaar ho. Hall mein baithe har shakhs ki tamaam tavajjo Qaazi sahab par thhi. Qaazi sahab ne Saima khaala ke vakeel se poochhna shuru kiya. Unki aawaaz hall ki bhaari khaamoshi mein goonji. Sab log saansen roke, us sawaal-o-jawaab ko sun rahe the. Aur tabhi, us khaamoshi ke beech, maine dekha. Vishal ne, jo ab tak bore ho raha tha, apni jeb se apna phone nikaala. Uski screen roshan hui. Uski chamak ne ek pal ke liye uske chehre ko neela kar diya. Wo apne doston ke jhund mein thoda peeche ho gaya, taaki uski yeh harkat koi dekh na sake. Aur theek. Theek usi pal. Jaise kisi ne koi button dabaaya ho, jaise yeh sab plan kiya gaya ho. Hall ke doosre kone mein, Ammi ke haath mein, jo unhone 'adab' se saamne baandh rakhe the, unka phone vibrate hua. Yeh vibration itni halki thhi ki unke aas-paas khadi auraton ko, jo nikaah mein magn thheen, kuchh bhi pata nahi chala. Lekin maine dekh liya. Ammi ne fauran ek pal ke liye idhar-udhar dekha. Unki nazar tezi se bheed par phiri, mujhpar se bina ruke guzar gai, jaise mein wahan tha hi nahi. Jab unhein tasalli ho gayi ki koi unhein nahi dekh raha, unhone bahut aahista se, apne sunahre dupatta ki oat mein, apne phone ki screen ko dekha. Unke chehre par koi taassur nahi tha. Wahi 'deen-daar' chehra jo Qaazi sahab ko sun raha tha. Magar, us be-taassur chehre ke neeche, unke angoothe chalne lage. Wo type kar rahi thheen. Stage par Qaazi sahab ki gambheer aawaaz goonji rahi thhi, "...haq mehar ki raqam..." Aur yahan neeche meri Ammi apne aashiq ko message kar rahi thheen. Maine fauran doosri taraf Vishal ko dekha. Usne apna phone dekha, aur uske hothon ke kone ek muskuraahat mein oopar uth gaye. Yeh wahi gandi, 'knowing' smile thhi. Usne fauran tezi se jawaab type kiya. Aur idhar, Ammi ke chehre par, wahi 'muted berry' lipstick wale honth dab gaye. Aisa laga jaise wo ek hansi, ek khushi, zabardasti rok rahi hon. "Qabool hai." Jaise hi Saima khaala ki aawaaz mandap mein goonji, nikaah poora ho gaya. Qaazi sahab ne dua ke liye haath uthaye. Jaise hi dua khatam hui, mandap ki khaamoshi ekdam se footi. "Mubaarak ho! Mubaarak ho!" Poori jagah ekdam se shor, hansi aur aawaazon se zinda ho uthi. Log apni jagahon se uth khade hue. Har koi doolha-dulhan ko mubaarakbaad dene ke liye stage ki taraf badhne laga. Ek araajakta ka mahaul tha. Ammi, jinhone abhi tak 'deen-daar' chehra bana rakha tha, unhone fauran apna sunahra dupatta sar se utaar kar waapas shaan se kandhe par daal liya. "Are, mubaarak ho, Najma maami!" wo zor se hansti hueen, Najma aunty aur doosri auraton ke saath, stage ki taraf badhne lageen. Doosri taraf, Vishal bhi apne doston ke jhund se nikala. Wo bhi, Akram ko mubaarakbaad dene, stage ki taraf chal pada. Mein pillar ke paas se hata. Mein bhi bheed ke saath ho liya. Mein Ammi aur naani ke theek peeche chalne laga. Itna kareeb ki mein unki har khus-phus sun sakta tha. Itna kareeb ki Ammi ke mehnge perfume ki mehak mujhe ghutan de rahi thhi. Bheed mein dhakka-mukki ho rahi thhi. Mardon aur auraton ke jhund aapas mein mil rahe the, sab stage ki taraf badh rahe the.
Deepak Kapoor
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