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01-02-2026, 12:04 PM
(This post was last modified: 01-02-2026, 12:09 PM by Namusa. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.
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(24-01-2026, 05:08 PM)Rajan Raghuwanshi Wrote: भाग ~ १८
अगली सुबह नाश्ता पानी कर के मैं और अनीता खेतों की तरफ जाने के लिए घर से निकले। मैंने मां से मांग कर दो रुपया ले लिया था। घर से निकलते ही मैं दौड़ते हुए लाला की दुकान पर गया और वहां से नमकीन गुड़ खरीद लाया।
"ये ले।" मैंने कागज में लिपटे नमकीन गुड़ को अनीता को पकड़ाया─"गहाई के समय जब भी हमें आराम करने का समय मिलेगा तो हम दोनों आमों की तरफ जा के इसे एक साथ खाएंगे।"
"हां ठीक है।" अनीता ने नमकीन गुड़ को अपने दुपट्टे में छुपाया और फिर दुपट्टे के बाकी सिरे को अपनी कमर में लपेट लिया। अब कोई नहीं जान सकता था कि उसने अपने दुपट्टे में कोई चीज कहां छुपा रखी है।
"कल रात मां कितना खुश थी न राजू।" मेरे साथ चलते हुए अनीता ने कहा─"और उसे हमारी उस बात का भरोसा ही नहीं हो रहा था..है न।"
"कैसे होता भरोसा...बात ही ऐसी थी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"खैर ये छोड़...आज नदी में नहाने चलेगी न मेरे साथ।"
"हां वो तो तू न भी कहता तब भी जाती।" अनीता ने कहा─"क्योंकि इस बारे में कल हमारी बात हो चुकी है। और सुन....नदी में आज मैं तुझे खूब नहलाऊंगी...हां।"
"ठीक है।" मैं मन ही मन जाने कैसी कैसी कल्पनाएं करने लगा─"अगर दोपहर के वक्त नदी पर कोई नहीं होगा तो हम खूब मस्ती भी करेंगे....क्या कहती है तू।"
"हां ठीक है।" अनीता मुस्कुराई─"बस तू मुझे ज्यादा तंग न करना। तेरी छोटी बहन हूं तो ये बात याद रखना...हां।"
"देख मस्ती में थोड़ा बहुत इधर उधर हो ही जाता है।" मैंने कहा─"अब इतने में तू तंग हो जाएगी क्या।"
"अच्छा ठीक है मैं नहीं तंग होऊंगी।" अनीता बोली─"जैसे तू करेगा वैसा मैं भी करूंगी।"
"हां ठीक है न।" मैंने कहा─"मैं तुझे किसी भी बात के लिए नहीं रोकूंगा...तू भी मत रोकना मुझे।"
"हां।"
"चल पहले मझले काका के घर चलते हैं।" मैंने कहा─"देखें तो सही कि सुनीता और रानी खेत जा रही हैं या नहीं।"
हम दोनों बातें करते हुए थोड़ी ही देर में दशरथ काका के घर पहुंच गए। मझले काका बाहर ही मिल गए। वो अपने बैलों को खूंटे से छोरने जा रहे थे ताकि उन्हें खेतों पर गहाई के लिए ले जाएं। उनके पास ही उनकी दोनों बेटियां खड़ी थीं। अनीता को मेरे साथ देखते ही दोनों के चेहरे खिल उठे।
"जीजी आज हम दोनों भी खेत जा रहे हैं।" सुनीता ने अपनी खुशी जताते हुए कहा─"बापू ने कहा है कि वहां हम दोनों तुम्हारे और राजू भैया के साथ गहाई में हाथ बटाएंगे।"
"ये तो बहुत अच्छी बात है सुनीता।" अनीता ने मुस्कुराते हुए कहा─"तुम दोनों के रहने से मुझे और राजू को काफी आराम मिलेगा।"
"अरे करेजा तू यहां।" काका की नजर जैसे ही हम पर पड़ी तो वो बोले─"इन दोनों को लेने आया है क्या।"
"हां काका।" मैंने कहा─"मैंने सोचा इन्हें अपने साथ ही ले जाऊं।"
"अच्छा ठीक है।" काका ने कहा─"इन्हें ले के जा अपने साथ। मैं जरा पान सुपाड़ी खा लूं...फिर बैलों को ले कर आता हूं और हां एक चक्कर आमों की तरफ भी लगा लेना। अमिया चोरों ने बहुत परेशान किया हुआ है इस समय।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा और फिर सुनीता और रानी को देखते हुए बोला─"चलो तुम दोनों हमारे साथ चलो। काका बाद में आ जाएंगे।"
वो दोनों खुशी खुशी हमारे साथ चल पड़ीं। वैसे अनीता ने कुछ महसूस किया हो या नहीं लेकिन मैंने ये महसूस किया था कि जैसे ही मैंने सुनीता और रानी को अपने साथ ले जाने की बात कही थी तो काका थोड़ा खुश हो गए थे। इतना ही नहीं...पान सुपाड़ी खाए होने के बाद भी उन्होंने कहा था कि वो पान सुपाड़ी खा के आते हैं कुछ देर में। मतलब साफ था कि दोनों बेटियों के हमारे साथ चले जाने से उन्हें मंजू काकी के साथ अकेला रहने का मौका मिल जाना था। कल काकी के साथ जो वो नहीं कर पाए थे वो अब कर सकते थे। बशर्ते काकी इसके लिए मान जाएं...अन्यथा कल की ही तरह काकी से गुस्सा हो कर काका को फिर से निराश हो जाना पड़ेगा।
ये सब सोच के मेरी इच्छा तो हुई कि कोई जुगाड़ बना कर काका काकी के बीच का ये खेल देखूं मगर चाह कर भी मैं ऐसा कोई जुगाड़ नहीं बना सका। अपनी बहनों के रहते ये संभव ही नहीं था। सुनीता और रानी को तो मैं किसी भी तरह बहला कर अकेले खेत जाने को कह देता मगर अनीता को बहलाना आसान नहीं था। वो कई सारे सवाल करने लगती कि मैं अचानक से किस काम से और कहां जा रहा हूं। जाहिर है मैं उसे कोई जवाब न दे पाता।
मुझे याद आया कि नमकीन गुड़ तो मैं पहले ही लाला की दुकान से खरीद लाया हूं...तो अब ये बहाना चल ही नहीं सकता। मुझे ये सोच के अफसोस हुआ और खुद पर थोड़ा गुस्सा भी आया कि क्यों मैंने नमकीन गुड़ लाने में इतनी जल्दबाजी कर दी। खैर अब क्या कर सकता था मैं। मजबूरन उन तीनों के साथ खेत जाना ही पड़ा।
मगर कहते हैं न कि अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे मिला देने में लग जाती है। ऐसा ही हुआ। क्योंकि तभी श्यामू काका अपने घर से बाहर निकल आए थे और मुझे देखते ही आवाज लगा दिया था उन्होंने। इधर मझले काका बैलों को छोड़ कर पहले ही घर के अंदर जा चुके थे।
"क्या हुआ काका।" मैंने श्यामू काका से पूछा।
"अरे थोड़ा रुक जा करेजा।" वो चलते हुए मेरे पास आए। फिर मेरी तरफ पांच का नोट बढ़ाते हुए बोले─"ये रुपए ले और लाला की दुकान तक चला जा थोड़ा। उससे सौ ग्राम सुपाड़ी, एक तोला लौंग, एक तोला कत्था और पचास ग्राम पत्ता वाली तंबाखू खरीद ला। तब तक मैं फटाफट नाश्ता कर लेता हूं।"
"ठीक है काका।" मैं मन ही मन बड़ा खुश हो गया था लेकिन प्रत्यक्ष में सामान्य भाव से अपनी तीनों बहनों की तरफ देख के बोला─"तुम लोग चलो...मैं काका के साथ आ जाऊंगा थोड़ी देर में।"
मेरी ये बात सुन कर अनीता ने कुछ कहना चाहा मगर काका की मौजूदगी में वो चुप रह गई। फिर सुनीता और रानी को ले कर जाने लगी। मैं समझ गया था कि अनीता की इच्छा मेरे बिना जाने की नहीं थी लेकिन काका की मौजूदगी में वो कुछ बोल न सकी थी।
खैर उन तीनों के जाते ही मैं फौरन लाला के दुकान की तरफ चल पड़ा। एकाएक ही मेरे मन में जाने कैसे कैसे विचार आने शुरू हो गए थे। मैं जल्द से जल्द काका का सारा सामान लाला के यहां से खरीद कर उन्हें दे देना चाहता था और फिर किसी तरह मझले काका के घर पहुंच जाना चाहता था। मैं देखना चाहता था कि वो दोनों इस मौके पर क्या करते हैं।
मैं भागते हुए लाला की दुकान पहुंचा था। उसके बाद उससे फटाफट सारा सामान खरीदा...फिर लाला को पैसे दे कर सरपट दौड़ पड़ा।
बहुत ही कम वक्त में मैं छोटे काका के घर पहुंच गया। उन्हें सामान पकड़ाया। उन्होंने नाश्ता करने को कहा तो मैंने ये कह कर मना कर दिया कि घर से खा के आया हूं। फिर वो बोले बैठ साथ में ही चलते हैं मगर मैंने उनसे कहा─नहीं काका...वो तीनों (अनीता, सुनीता और रानी) अकेले गईं हैं और अभी थोड़ी ही दूर पहुंची होंगी तो मैं जा के उन्हें पा जाऊंगा और उनके साथ ही खेत चला जाऊंगा। मेरी बात सुन काका ने कहा ठीक है।
श्यामू काका से छूटते ही मैं बिजली की रफ्तार से घर से बाहर आया और उसी रफ्तार से मझले काका के घर की तरफ पहुंच गया। एकाएक ही मेरी धड़कनें बढ़ गईं थी। काका काकी की करतूत देखने के लिए मैं उतावला हो चुका था। अंदर से घबरा भी रहा था कि अगर उन्होंने मुझे अपनी आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो क्या होगा। निश्चित ही तब कुछ अच्छा नहीं होगा मगर इसके बावजूद मैं उनके घर के अंदर ऐसे दाखिल हुआ जैसे बिल्ली घर में रखे दूध को पीने के लिए दबे पांव पूरे घर का मुआयना करती है।
घर ऐसा था कि बाहर वाली यानी मुख्य दीवार पर कोई दरवाजा नहीं था। उसके बाद अंदर बरोठ वाली दीवार थी जिसमें लकड़ी का दरवाजा लगा हुआ था मगर इस वक्त वो आधा खुला हुआ था। उसके आगे चार फीट चौड़ा गलियारा था। गलियारे के दोनों तरफ कमरों वाली दीवार थी। गलियारे से आगे अन्दर की ओसारी थी जिसे बरामदा या बैठका भी कहते हैं। उसके एक तरफ रसोई थी और आगे लंबा चौड़ा आंगन था। आंगन के आगे एकदम सामने एक कच्ची दीवार थी जिसमें दरवाजा लगा हुआ था। इसी दरवाजे से घर के पीछे तरफ वो कुआं था जिसके बारे में मंजू काकी ने अपनी कहानी में हमें बताया था। आंगन के बाएं तरफ तीन भीती(दीवार) का बरोठ और बरामदा था जिसमें दो कमरे थे....एक भंडार का कमरा था और दूसरा पूजा घर...यहां पूजा घर या कमरे का मतलब है वो कमरा जिसमें हमारे घर परिवार के कुल देवता और बाबा साहब वगैरह रहते हैं। इस कमरे में बिना नहाए कोई नहीं जाता। मतलब छुआ छूत और पवित्रता का बहुत ध्यान दिया जाता है।
खैर मैं बिल्ली के जैसे दबे पांव बरोठ वाले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ और फिर दबे पांव ही गलियारे से होते हुए अंदर वाली ओसारी की तरफ बढ़ा ही था कि तभी अंदर से काका की आवाज मेरे कानों में पड़ी।
"देख मेरा दिमाग न खराब कर।" काका की आवाज─"कल भी तूने नाटक किया था और मैं गुस्से में चला गया था मगर आज कोई नाटक बर्दाश्त नहीं करूंगा मैं।"
"मैंने कहा न मेरा मन नहीं है।" मंजू काकी की आवाज─"तुम समझते क्यों नहीं कि मैं भी इंसान हूं। दिन भर काम कर कर के थक जाती हूं।"
"सिर्फ तू ही काम नहीं करती है।" काका ने कहा─"बाकी सब भी काम करते हैं। मैं खुद भी दिन रात बैलों की तरह जुएं में नधा रहता हूं। चल अब मान जा न यार....कौन सा रोज रोज चोदने का मौका मिलता है। तू तो साली अभी से सठिया गई लगती है। तेरे उमर की औरतें तो रोज अपने मरद से चुदवाती हैं। वो जो मेरा सहनाव है न....वो रोज अपनी औरत को पेलता है और उसकी औरत भी हुमच हुमच के पेलवाती है उससे।"
"हां पर मेरे में इतनी जान नहीं है।" मंजू काकी ने कहा─"मुझसे अब नहीं होता ये।"
"देख फिर तू नाटक करने लगी।" काका की आवाज में इस बार गुस्सा झलका─"बोल रहा हूं न कि करने दे। चल अब जल्दी से अपना धोती साया उठा के लेट जा।"
काका के ऐसा कहने के बाद इस बार काकी के मुख से कोई आवाज नहीं सुनाई दी। शायद उन्होंने काका का कहना मान कर वही करने लगीं थी जो काका ने कहा था। इधर गलियारे के पास छुपे खड़े मेरी धड़कनें तेज तेज चलने लगीं थीं। अंदर हलचल मची हुई थी और मन बार बार ये कहते हुए उकसा रहा था कि आगे बढ़ और अपनी आंखों से देख कि काका काकी कैसे चुदाई करते हैं।
"थोड़ा खड़ा कर न इसे।" तभी काका की आवाज मेरे कानों में पड़ी।
मैं समझ कि वो अपने लंड को खड़ा करने के लिए काकी से बोल रहे हैं। मैं अब ये देखने के लिए उतावला हो उठा कि क्या सच में काकी ऐसा करती हैं। मैं अपनी घबराहट और डर को किसी तरह दबा कर आगे बढ़ा और उन दोनों को देखने की कोशिश की।
वो आंगन के बाएं तरफ वाले बरामदे में थे। वहीं एक खाट रखी हुई थी और काकी अपना धोती साया ऊपर जांघों तक उठाए काका के लंड को सहलाए जा रहीं थी।
ये दृश्य देखते ही मेरी आँखें फैल गईं। दिलो दिमाग में बिजली सी कौंध उठी। अंदर जो पहले ही हलचल मची हुई वो अब और बढ़ चली।
मैंने देखा काका का लंड मेरे वाले से छोटा था और काकी के सहलाने से अब थोड़ा खड़ा हो गया था। काका आँखें बंद किए जमीन पर खड़े थे। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी लुंगी पकड़ रखी थी जोकि उनकी कमर तक उठी हुई थी। उनके लिंग के आस पास कुछ ज्यादा ही घने बाल थे।
"चल छोड़ अब इसे।" तभी वो बोले─"और टांगे फैला कर लेट जा। बहुत नाटक कर रही थी न तू....अब जब हुमच हुमच के चोदूंगा तो तेरी अकल ठिकाने आ जाएगी।"
काका के ऐसा बोलने पर काकी कुछ न बोली। वो पीछे तरफ सरक कर खाट पर लेट गईं और फिर धोती साया को अपनी कमर तक चढ़ा कर अपनी टांगें फैला दी। जैसे ही उन्होंने टांगें फैलाईं तो काका एक हाथ से अपनी लुंगी पकड़े आगे बढ़े और खाट पर चढ़ गए। फिर अपने लिंग को उन्होंने काकी की चूत के मुहाने पर लगाया और अपनी कमर को जोर से आगे धक्का दिया। काका का लिंग काकी की चूत में एक ही बार में पूरा अंदर चला गया। काकी के मुख से हल्की सिसकी निकली जो मैंने साफ सुनी।
उसके बाद काका ने दोनों हाथों को काकी के पेट के अगल बगल खाट में रख कर धक्के लगाना शुरू कर दिया। इधर मेरे अपने लिंग ने ये सब देख कर जाने कब कच्छे में अपना सिर उठा लिया था। मैं अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों से अपलक काका को काकी की चुदाई करते देख रहा था। मैं ऐसे कोंड़ पर खड़ा था कि वो दोनों मुझे तभी देख सकते थे जब वो अपनी गर्दन को थोड़ा घुमाएं मगर मैं उन्हें अच्छे से देख पा रहा था। ये अलग बात है कि मुझे न काका का लिंग दिख रहा था और न ही काकी की चूत। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे बढ़ कर थोड़ा और अच्छे से देखूं क्योंकि ऐसा करने से मैं पकड़ा जा सकता था।
खैर काका अपने हिसाब से पूरा जोर लगा कर काकी को चोद रहे थे। काकी बीच बीच में कभी आहें भरती तो और सिसकियां निकालतीं। इधर मेरे अंदर अजीब सी सनसनी हो रही थी जो सीधा मेरे लिंग में चोट कर रही थी। वो कच्छे के अंदर बुरी तरह अकड़ गया था। न चाहते हुए भी मैं बार बार उसे सहलाने लगता था। जब भी मैं उसे मुठियाता तो मुझे अलग ही मजा आता। मतलब एक मजे की लहर दौड़ जाती बदन में।
मैं अपना लिंग मुठियाते हुए सोचने लगा अब क्या करूं। कैसे मैं काका काकी की चुदाई को और अच्छे से देखूं। घबराहट और डर के मारे आगे बढ़ने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उधर काका जोर जोर अपनी कमर को ऊपर नीचे किए जा रहे थे।
"चल अब घोड़ी बन जा।" तभी वो अचानक उठे और नीचे जमीन में खड़े हो कर काकी से बोले। काकी शायद समझ चुकीं थी कि आज उनकी कोई दाल गलने वाली नहीं है इस लिए वही करती जा रहीं थी जो काका बोल रहे थे। काका के उठते ही वो उठीं और खाट में ही घोड़ी बन गईं। उनका धोती साया उनके कमर में अटका हुआ था। इस कोड़ पर मैं उनकी बड़ी सी पोंद(नितंब) को अच्छे से देख पा रहा था और उधर काका के खड़े होने से उनके लिंग को।
काकी जैसे ही घोड़ी बनी तो काका खाट पर चढ़ गए और पीछे से अपना लिंग काकी की चूत पर डालने लगे। जैसे ही लिंग अंदर घुसा तो उन्होंने काकी की कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और फिर जोर जोर से उन्हें पेलने लगे।
"ले साली....बहुत नाटक कर रही थी न।" काका पेलते हुए बोले─"आज जी भर के चोदूंगा तुझे।"
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" न चाहते हुए भी काकी की आहें निकल पड़ीं─"थोड़ा और जोर से चोदो न।"
"और कितना जोर से चोदूं तुझे।" काका ने काकी के दाएं नितंब पर एक थप्पड़ मारा जिससे काकी उछल पड़ीं─"आज मजा नहीं आ रहा क्या तुझे।"
काका की इस बात से इधर अचानक मैं थोड़ा चौंक पड़ा। पलक झपकते ही मुझे बापू का खयाल आ गया। काकी कई बार बापू से पेलवा चुकी थीं और इस वक्त मस्ती में वो जोर से करने को बोल रहीं थी। जाहिर है काका का छोटा लिंग होने की वजह से उन्हें बापू जैसा मजा नहीं आ रहा था। और शायद इसी लिए जोर से करने को बोल रहीं थी उनसे।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् आ रहा है सुनीता के बापू।" काकी ने झट कहा─"बस ऐसे ही जोर जोर से करो।"
"अपना ब्लाउज तो खोल जरा।" काका ने धक्के लगाते हुए कहा─"कई दिन से तेरी चूचियां नहीं मसली मैंने।"
काकी ने झुके हुए किसी तरह एक हाथ से अपना बैलेंस बनाया और एक हाथ से ही ब्लाउज के बटन खोलने लगीं। थोड़ी देर में जब बटन खुल गए तो उन्होंने ब्लाउज को फैला दिया। मैंने साफ देखा...उनकी बड़ी बड़ी छातियां नीचे झूलने लगीं थी। काका के हर धक्के पर उनमें अजीब सी थिरकन होती थी। काका ने झट अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और उनकी एक चूची को मुट्ठी में पकड़ लिया।
"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् थोड़ा धीरे दबाओ न।" काकी सिसकी ले कर बोलीं─"दर्द होता है।"
"आज तो तुझे दर्द बर्दाश्त करना ही पड़ेगा।" काका ने धक्के लगाते हुए कहा─"आज तुझ पर रहम नहीं करूंगा मैं। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् अरे नहीं....लगता है मेरा छूटने का समय आ गया है।"
"आह्ह्ह्ह्ह् संभालो खुद को।" काकी ने आह भर के कहा─"मुझे हर बार की तरह बीच में मत छोड़ना....वरना इस बार से करने नहीं दूंगी...बताए देती हूं।"
काका जोर जोर काकी की छातियां मसलने लगे ताकि काकी के भी झड़ने का समय आ जाए। अपने धक्कों को उन्होंने कम कर दिया था। इधर मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा था। कच्छे के अंदर मेरा लिंग अब दर्द करने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। मजा भी आ रहा था, घबराहट भी हो रही थी, डर भी लग रहा था....बस समझ नहीं आ रहा था कि लिंग के दर्द को कैसे दूर करूं। एक बार तो खयाल आया कि कच्छे से लंड निकाल कर मुट्ठी लगाऊं मगर डर की वजह से ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई।
"अब नहीं रुका जाएगा रे।" उधर काका ने सिसकी ले कर कहा─"मेरा समय निकट आ गया है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हाय मैं तो गया रे।"
काका कहते हुए जोर जोर से झटका खाने लगे। उनका सारा पानी काकी की चूत में ही छूटता चला गया। जैसे ही झटके खत्म हुए तो वो असमर्थ से हो कर तथा अपना लिंग बाहर निकाल कर वहीं खाट पर ही लुढ़क गए।
"कर दिया न सत्यानाश।" काकी बुरी तरह किलस कर लगभग गुर्रा उठीं─"कहा था मैंने की बीच में न छोड़ना मुझे। खुद तो निपट गए और मुझे मझधार में छोड़ दिया।"
"मैं क्या करूं छूट गया तो।" काका अपनी उखड़ी सांसों को काबू करते हुए बोले─"कोशिश तो किया था मैंने लेकिन नहीं सम्हाल पाया। माफ कर दे अब।"
कहने के साथ ही वो खाट से नीचे उतरे और अपना कच्छा पहन कर लुंगी को अच्छे से कमर में बांध लिया।
"हां जाओ अब।" काकी अभी भी गुस्से में थीं─"अब दुबारा करने को कहा तो देखना।"
काका कुछ न बोले। बगल में ही दीवार पर टिकाया हुआ अपना लट्ठ उठाया और बाहर जाने के लिए मेरी तरफ आने लगे। ये देख एकदम से मैं घबरा गया। झट वहां से भागा और सीधा सड़क पर ही रुका।
कुछ देर में जब वो बाहर आए तो मैं खुद को सामान्य बनाए रखने का प्रयास करते हुए सड़क से उनके घर की तरफ बढ़ा। ऐसा इस लिए ताकि उन्हें यही लगे कि मैं अभी अभी ही आया हूं। शुक्र था कि श्यामू काका के घर के बाहर कोई नहीं था। अगर कोई होता तो मुझे मझले काका के घर के अंदर से इस तरह भागते हुए आता देख लेता। उसके बाद निश्चित ही उसे किसी बात का संदेह हो जाता।
"अरे करेजा तू....गया नहीं अभी।" काका ने थोड़ा चौंक कर पूछा।
"वो मैं जा ही रहा था कि तभी श्यामू काका ने मुझे सुपाड़ी वगैरह लाने के लिए लाला की दुकान भेज दिया। अभी दे कर ही आ रहा हूं मगर अब अचानक प्यास लग आई तो सोचा आपके घर में पानी पी लूं...फिर जाऊं।"
"ठीक है जा अंदर...पी ले पानी।" काका ने बैलों को खूंटों से छोरते हुए कहा─"तेरी काकी अन्दर ही है अभी।"
मेरे देखते ही देखते काका बैलों को ले कर चले गए। इधर मैं अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को किसी तरह काबू करते हुए अंदर की तरफ चल पड़ा। इस बार क्योंकि काका नहीं थे और काकी से तो मैं पूरी तरह खुल चुका था इस लिए अंदर जाने में मुझे कोई झिझक न हुई।
मैं जानता था कि काकी अभी भी उसी मुद्रा में खाट पर होंगी इस लिए तेजी से अंदर पहुंचा। मैंने देखा काकी खाट से उतर कर अपने ब्लाउज के बटन लगा रहीं थी। उनका साया तो धोती के अंदर ही था लेकिन धोती का पल्लू जमीन पर गिरा पड़ा था।
मुझे एकदम से आ गया देख वो बुरी तरह उछल पड़ीं। हड़बड़ाहट में उन्हें समझ ही न आया कि क्या करें। भौचक्की सी हो के मुझे ही देखने लगीं थी। उनके ब्लाउज में ऊपर के दो बटन अभी भी खुले हुए थे जिसके बीच मुझे उनकी छातियों की गोलाईयां साफ दिख रहीं थी।
"ये क्या कर रही हो काकी।" मैंने चौंक पड़ने का नाटक किया─"कपड़े पहन रही हो या उतार रही हो। अच्छा अच्छा...समझ गया।"
"क..क..क्या समझ गए तुम।" काकी एकदम से चौंक कर बोलीं और साथ ही फटाफट ब्लाउज के बटन लगाने लगीं।
"क्या खुल कर बताऊं।" मैं अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराया।
"क्या मतलब।" काकी के चेहरे पर एकाएक घबराहट के भाव उभर आए।
"मतलब ये कि काका अभी अभी यहां से बाहर निकले हैं।" मैंने कहा─"और तुम यहां इस हालत में हो तो पक्का तुम दोनों वही कर रहे थे जो उस दिन खेत वाले कमरे में तुम और बापू कर रहे थे।"
"र...राजू....क्या बोल रहे हो....चुप हो जाओ।" काकी बुरी तरह चौंक पड़ी─"किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जाएगा।"
"पर मैंने सही कहा न।"
काकी कुछ न बोलीं बस सिर हिला कर मूक सहमति दे दी। तभी अचानक मुझे शरारत सूझी।
"वैसे एक बात बताऊं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"मैंने अभी थोड़ी देर पहले अपनी आंखों से सब कुछ देखा है।"
"क..क्या??????" काकी का आश्चर्य से मुंह खुल गया।
"हां काकी।" मैं उनकी इस हालत पर मुस्कुरा उठा─"गलियारे से सब देख रहा था। मैं देख रहा था कि कैसे काका ने तुम्हें धोती साया ऊपर कर के लेट जाने को कहा और फिर जब तुम लेट गई तो कैसे वो तुम्हें चो...चोदने लगे। इतना ही नहीं फिर उन्होंने तुमसे कहा कि चल अब घोड़ी बन जा....आज तुझपे कोई रहम नहीं करूंगा।"
"बस करो राजू।" काकी का शर्म के मारे बुरा हाल हो गया─"कुछ तो शर्म करो।"
"और ये भी देखा कि अंत में जब काका जल्दी झड़ गए तो तुमने कैसे उन्हें खरी खोटी सुनाई।" मैं बेझिझक बोलता चला गया─"बेचारे...मेरे प्यारे काका...माफ कर दे बोल कर चुपचाप चले गए थे यहां से।"
"हाय दय्या....कितने खराब हो राजू।" काकी जो अब तक खुद को सम्हाल चुकीं थी, उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा─"ये सब देखते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं आई। कितना भोला समझती थी मैं तुम्हें....और तुम दो ही दिन में इतने शातिर हो गए।"
"मैं तो अभी भी भोला ही हूं काकी।" मैंने कहा─"पर इन दो दिनों से जो कुछ देख सुन रहा हूं उसकी वजह से कुछ तो बदलाव आएगा ही न मुझमें। मेरे लिए जो चीज नई होगी उसके बारे में जानने और समझने के लिए मन में उत्सुकता तो जागेगी ही न। तुमने बापू वाले किस्से को इस तरह सुनाया था कि उस सबको फिर से देखने के लिए मैं मजबूर तो हो ही जाऊंगा न।"
"अच्छा...और किस चीज के लिए मजबूर हो गए हो।" काकी ने अपनी धोती का पल्लू हाथ से पकड़े एकाएक मेरी तरफ आते हुए थोड़ा अजीब भाव से पूछा─"बताओ राजू...और किस चीज के लिए मजबूर हो तुम।"
मैं उनके पूछने के अंदाज पर एकदम से चौंक पड़ा। धड़कनें पलक झपकते ही तेज हो गईं। वो पल्लू पकड़े मेरी तरफ धीरे धीरे चली आ रहीं थी। पल्लू को उन्होंने अपने सीने में नहीं डाला था और न ही सीने को छुपाने का कोई उपक्रम किया था।
"ये...ये क्या पूछ रही हो काकी।" मैं घबरा सा गया।
"क्या हुआ....ठीक ही तो पूछ रही हूं।" काकी अब मेरे एकदम पास आ गईं─"तुम ही तो बोल रहे हो कि जो कुछ तुमने देखा और सुना है उसे फिर से देखने के लिए तुम मजबूर हो गए हो तो अब बताओ....और किस चीज के लिए मजबूर हो।"
"अ...और...और तो कुछ नहीं।" मैं बौखला सा गया।
"क्या तुम उसके लिए मजबूर नहीं हो।" काकी मेरे एकदम पास आ कर और एकदम मुझसे सट कर बड़े अजीब भाव से बोलीं─"बताओ न राजू...क्या तुम किसी के साथ चुदाई करने के लिए मजबूर नहीं हो।"
काकी के मुख से इस तरह खुल्लम खुल्ला चुदाई शब्द सुन कर मैं चकित रह गया। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पूरा बदन जूड़ी के मरीज की तरह कांप उठा। हालत ऐसी हो गई कि कुछ बोला ही न गया मुझसे।
तभी मैं बुरी तरह उछल पड़ा। अचानक मुझे अपने लिंग में उनके हाथ की छुअन महसूस हुई। मैं झट से पीछे हट गया और आश्चर्य से काकी को देखने लगा।
"क्या हुआ....आज मुझसे मुट्ठ नहीं लगवाओगे।" काकी ने उसी अजीब भाव से कहा─"देखो कैसे तुम्हारा ये खड़ा है।"
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि काकी को अचानक से ये क्या हो गया है। कुछ देर पहले तो वो मुझे शर्म करने की बात बोल रहीं थी और अब वो इस तरह का अजीब बर्ताव कर रही हैं।
मैं पीछे हटा तो काकी मेरी तरफ फिर से बढ़ीं और फिर से मेरे लंड को पैंट के ऊपर से पकड़ने लगीं। मैं बुरी तरह कांप गया और बुरी तरह असमंजस में भी पड़ गया। एक तो वैसे ही गर्मी का मौसम था दूसरे इस हालत में मैं पसीना पसीना हो गया था।
"चलो न राजू....आज फिर से तुम्हारी मुट्ठ लगा देती हूं।" काकी ने मेरे लिंग को सहलाते हुए कहा─"आज फिर से तुम अपना वीर्य मेरे चेहरे और मेरी छातियों पर गिरा देना।"
"क...क्या बोल रही हो काकी।" मैं बदहवास सा बोला─"किसी ने देख लिया तो आफत आ जाएगी। मुझे खेत जाना है....गहाई करना है वहां....और...और तुम्हें भी तो खेत जाना है न।"
"हां जाना तो है राजू।" काकी अभी भी अजीब बर्ताव ही कर रहीं थी─"पर पहले इस वक्त तुम्हारा मुट्ठ लगा दूं....ये भी तो अब जरूरी हो गया है...देखो कैसे खड़ा है तुम्हारा...लं..लंड।"
न...नहीं नहीं मुझे नहीं लगवाना मुट्ठ।" मैं घबरा कर फिर से पीछे हट गया─"पता नहीं अचानक से क्या हो गया है तुम्हें। जा रहा हूं मैं।"
कहने के साथ ही मैं जैसे ही पलट कर जाने को हुआ तो पीछे से काकी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी तरफ खींच लिया।
"रुक जाओ न राजू।" फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़े ही कहा─"जाने की इतनी जल्दी क्या है। कुछ देर अपनी काकी के पास रुको न।"
"न..नहीं मुझे जाना है....छोड़ो मुझे।"
"सुनो राजू।" काकी का बर्ताव थोड़ा सा बदला─"तुमने तो सब देख ही लिया है। ये भी जान गए हो कि तुम्हारे काका मुझे मझधार पर छोड़ कर चल गए हैं।"
"हां तो???"
"क..क्या....क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अपने काका का अधूरा काम तुम पूरा कर दो।" काकी ने ये कह कर जैसे मेरे ऊपर बंब ही फोड़ दिया।
"क...क्या???"
मैं उछल पड़ा। आश्चर्य से मेरी आँखें फट पड़ीं। यकीन ही न हुआ कि ऐसी बात काकी कह सकती हैं।
"मुझे पता है कि ये बहुत गलत बात है राजू।" फिर वो एकाएक संजीदा हो के बोलीं─"मगर फिर भी मैं खुद ऐसा करने को कह रही हूं तुमसे।"
"नहीं नहीं....ये गलत है।" मैं हैरान परेशान के साथ साथ घबराहट और दुविधा में बोला─"मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।"
"तो अब सोच लो राजू।" काकी ने एकदम से मेरा चेहरा थाम लिया─"भूल जाओ कि इस वक्त तुम्हारे सामने तुम्हारी काकी खड़ी है....ये सोचो कि मैं एक ऐसी औरत हूं जो तुम्हें अपनी खुशी से वो काम करने को कह रही हूं जिसे करने के लिए तुम्हारी उम्र के लड़के जाने कहां कहां भटकते हैं और जाने क्या क्या जुगाड़ लगाते हैं।"
मैं अवाक सा देखता रह गया उन्हें। अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा मेरी काकी कह रही हैं। मेरे अंदर बड़ा तेज तूफान उठा हुआ था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे वक्त पर मैं क्या करूं। काकी से जो रिश्ता था उसका एक डर था, दूसरे...किसी को पता चल जाने का डर....और सबसे बड़ा डर ये कि मैंने ऐसा काम कभी किया ही नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरी जगह कोई और होता तो ऐसा सुनहरा मौका किसी कीमत पर नहीं छोड़ता। मगर मैं अपनी हालत से बेबस था। समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या करूं।
काकी का अचानक से रंग बदलना और फिर मुझसे इस तरह का काम करने को कहना मेरी कल्पना में ही नहीं था। मुझे ये भी डर सता रहा था कि कहीं वो मेरे साथ कोई खेल तो नहीं खेल रही हैं। अभी तो ये है कि उनकी कमजोर नस मेरे हाथ में है लेकिन ऐसा कुछ हो जाने से क्या पता मैं खुद किसी मुसीबत में फंस जाऊं।
जारी है...................
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(01-02-2026, 12:09 PM)Namusa Wrote: New update
नए अपडेट की अपेक्षा मत कीजिये, कहानी में अधिक पाठक न होने के कारण लेखक महोदय ने आगे लिखने का विचार त्याग दिया है !
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(25-01-2026, 07:20 PM)rajeev13 Wrote: इस कहानी के इस भाग में टेंशन और उत्तेजना दोनों पीक पर पहुँच गई है। काकी में अचानक परिवर्तन आना (पहले शर्म, फिर सीधे प्रपोज करना) बहुत अच्छा twist है। राजू की घबराहट, डर और लालच का मिक्सचर बहुत रियल लग रहा है, वो जो inner conflict दिखा रहे हो, वो पढ़ने में काफी मजा देता है।
कुछ पॉइंट्स जो मुझे खास पसंद आए:
- काका-काकी की चुदाई सीन डिटेल में अच्छा लिखा है, लेकिन over-described नहीं लगा – बैलेंस ठीक रखा।
- काकी का "सुनीता के बापू" वाला स्लिप – ? ये लाइन कमाल की है, पूरा मूड चेंज कर देती है।
- राजू का वो डर कि "कहीं खेल तो नहीं, खेल रही" ये सोच बहुत natural है, 99% लड़के ऐसे ही सोचेंगे।
- क्लाइमेक्स पर काकी का direct "अधूरा काम पूरा कर दो" ओ भाई साहब, दिल की धड़कन बढ़ा दी!
अब आगे क्या होने वाला है, ये suspense kill कर रहा है:
- राजू मानेगा या भागेगा?
- अगर माना तो first time का सीन कैसा होगा – nervous, awkward या suddenly wild?
- कहीं बाकी सब महिलाएं न आ जाएँ!
- काकी सच में desperate है या राजू को trap करने की कोशिश?
प्लीज अगला भाग जल्दी डालो भाई।
इंतज़ार नहीं हो रहा – राजू का जवाब क्या होगा?
काकी आगे क्या करेगी अगर राजू मना कर देगा?
Is story me aage bahut kuch tha brother but now nothing will be happen, Apni job and personal life me busy ho gaya hu. so I can't write anything in this time. let's see what happens in the future
It's Rajan 
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भाग ~ १९
"क्या सोचने लगे राजू?"
"आं...नहीं नहीं कुछ नहीं।"
"क्या तुम्हें डर लग रहा है?"
मैं कुछ न बोला।
"क्या तुम घबरा रहे हो?"
मैं अब भी कुछ न बोला। अंदर बड़ी तेज हलचल मची हुई थी और मैं घोर दुविधा में था।
"चिंता मत करो राजू।" काकी ने कहा─"मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगी। हम दोनों का ये राज मरते दम तक हमारे सीने में दफन रहेगा।"
"और किसी को पता चल गया तो?"
"नहीं पता चलेगा।" काकी ने दृढ़ता से कहा─"मेरा भरोसा करो राजू....किसी को कभी कुछ पता नहीं चलेगा। न तुम किसी को कुछ बताओगे और न ही मैं।"
"पर तुम मेरे साथ ये क्यों करना चाहती हो?"
"अब तुमसे क्या छिपाऊं राजू।" काकी ने एकाएक संजीदा हो कर कहा─"बस ये समझ लो कि मेरी एक मजबूरी है। वरना तुम खुद सोचो कि क्या मैं इतनी गिरी हुई औरत हूं जो जेठ जैसे रिश्ते के साथ ऐसा कर के कलंक लगाऊंगी। क्या मैं इतनी चरित्रहीन हूं जो अपने बेटे की उम्र के लड़के से कहूंगी कि आओ बेटा...मुझे चोदो। नहीं राजू...मैं ऐसी वैसी औरत नहीं हूं...लेकिन मेरी एक मजबूरी है जिसके कारण मैं ऐसा करने के लिए इतना ज्यादा मजबूर हो गई हूं।"
कहने के साथ ही काकी की आँखें छलक पड़ीं। ये देख मैं धक्क से रह गया। समझ ही न आया कि क्या बोलूं। ये अलग बात है कि उनकी मजबूरी वाली बात पर मैं ये सोचने लगा था कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी होगी उनकी।
"म..मुझे बताओ काकी।" मैंने हिम्मत कर के पूछा─"ऐसी क्या मजबूरी है तुम्हारी जो तुमने बापू के साथ ऐसा किया और अब मेरे साथ करना चाहती हो। इतना ही नहीं तुमने उस दिन तो ऐसी किसी मजबूरी का जिक्र नहीं किया था...फिर आज क्यों?"
"क्योंकि मैं और ज्यादा मजबूर नहीं होना चाहती थी राजू।" काकी ने सिसकते हुए कहा─"मैं खुद को और ज्यादा नीचे नहीं गिराना चाहती थी तुम्हारी नजरों में। हां राजू...इसी लिए उस दिन अपनी ऐसी किसी मजबूरी का जिक्र नहीं किया था।"
"पर ऐसी वो मजबूरी है क्या?" मैंने पूछा─"तुम्हारी ऐसी कौन सी मजबूरी थी काकी जो तुमने मेरे बापू के साथ वैसा नाजायज संबंध बनाया और अब आज मुझसे भी बनाने पर तुल गई हो....मुझे सब कुछ साफ साफ बताओ काकी।"
"ठीक है तुम्हें सब कुछ बताती हूं।" काकी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा─"देखो बात ऐसी है कि तुम्हारे काका को एक बेटा चाहिए था और उन्हें ही बस क्यों...बल्कि मुझे भी चाहिए राजू था। मेरी भी इच्छा है कि मेरे एक बेटा हो। दो दो बेटियां तो हैं...लेकिन ये जब बड़ी हो जाएंगी तो ब्याह के बाद दूसरे के घर चली जाएंगी। उसके बाद क्या??? उसके बाद तो मैं और तुम्हारे काका अकेले ही रह जाएंगे न। मानती हूं कि मेरा इतना बड़ा परिवार है....जेठ जेठानी हैं...देवर देवरानी हैं...तुम हो। मतलब तुम सबके रहते किसी तरह जीवन गुजर ही जाएगा लेकिन उस मलाल का क्या राजू....जो जीवन भर हमारे अंदर रहेगा कि काश हमारे भी एक बेटा होता। मेरा दो दो बार पेट खराब हो चुका था और मैं मरने वाली हालत में पहुंच गई थी। शहर के डॉक्टर ने कहा था कि कुछ समय तक सम्बन्ध बनाने से परहेज रखना। हमने परहेज रखा भी....उसके बाद जब हमने संबंध बनाया तो कुछ न हुआ। मैं कभी पेट से हुई ही नहीं। तुम्हारे काका को कई बार कहा कि शहर जा कर डॉक्टर को दिखाने चलें मगर वो नहीं माने। फिर जब मैंने एक बार बहुत ज्यादा गुस्सा किया तब वो गए...मुझे ले कर फिर भी नहीं गए। शहर में उन्होंने खुद को दिखाया। बाद में पता चला कि तुम्हारे काका अब बच्चा पैदा ही नहीं कर सकते। जब उन्होंने मुझे ये बताया तो मैं धक्क से रह गई। ऐसा लगा जैसे मेरे सिर पर पूरा आसमान ही गिर पड़ा हो। हम दोनों इस बात से बहुत दुखी हो गए थे मगर अपना ये दुख घर परिवार में किसी को बता नहीं सकते थे....बताने की हिम्मत ही नहीं थी। हालांकि मैंने जीजी को बताने का सोचा भी लेकिन तुम्हारे काका ने ये कह कर मुझे रोक दिया कि वो क्या सोचेंगी उनके बारे में कि उमर में अपने भाई से छोटा होने के बाद भी बच्चा पैदा करने की क्षमता नहीं है मुझमें। बस तब से यही चलता रहा। फिर लगभग दो महीना पहले उन्होंने एक रात मुझसे कहा कि क्या मैं उनके कहने पर किसी और से बच्चा पैदा कर सकती हूं। मैं तो उनकी इस बात को सुन के सन्न ही रह गई थी। फिर एकदम गुस्से में आ कर बोली कि ऐसा वो सोच भी कैसे सकते हैं....मतलब क्या मैं कोई गिरी हुई और चरित्रहीन औरत हूं जो किसी के भी सामने अपनी टांगें फैला कर लेट जाऊंगी। तब उन्होंने कहा कि किसी और के सामने नहीं बल्कि उनके बड़े भाई के सामने।"
"क...क्या सच में काका ने ऐसा कहा।" मैंने चकित भाव से पूछा।
"हां राजू।" काकी ने कहा─"उन्होंने कहा कि घर की बात घर में ही रहेगी। किसी को पता भी नहीं चलेगा....तुम्हारे बापू भी न जान सकेंगे कि उनके द्वारा मैं पेट से हो गई हूं।"
"इसका मतलब तुमने बापू के साथ जो संबंध बनाया उसके मुख्य सूत्रधार मझले काका थे।" मैं इस रहस्योद्घाटन से आश्चर्य चकित था─"फिर तो उस दिन खेत में जब तुम बापू के साथ वो सब कर रही थी उसके बारे में काका को भी पता रहा होगा...है न।"
"नहीं।" काकी ने कहा─"उस दिन का उन्हें पता नहीं था। उन्होंने ये कभी नहीं कहा था कि मैं तुम्हारे बापू के साथ कहीं भी जा के संबंध बनाने लग जाऊं। उन्होंने उनसे संबंध बनाने के लिए सिर्फ घर में कहा था। इसी लिए तो उन्होंने महीना भर पहले सुनीता और रानी को भी उनके मामा के साथ आसानी से भेज दिया था। मेरे भाई के आने से उन्हें आसानी हो गई थी....और फिर उन्होंने सुनीता और रानी को भेजने में एक बार भी न नुकुर नहीं की थी। बेटियों के जाने के बाद उन्होंने साफ शब्दों में मुझसे कहा था कि अब मेरे पास मौका ही मौका है उनके बड़े भाई को इस काम के लिए फंसाने का। उन्होंने ये भी कहा था कि वो खेतों में रह कर मुझे इस काम के लिए पूरा मौका देंगे।"
"तो फिर आपने बापू को फंसाया कैसे इसके लिए।" मैंने पूछा।
"उनको फंसाने की नौबत ही नहीं आई थी राजू।" काकी ने कहा─"वो तो इत्तेफाक से उस दिन वो घर आ गए थे और मुझे घर के पीछे कुएं में नहाते हुए देख लिया था। उसी समय शायद उनके मन में मेरे प्रति हवस जाग गई थी। अब क्योंकि वो भी समझते थे कि हवस के साथ अगर वो मेरे साथ कुछ उल्टा सीधा करने की कोशिश करेंगे तो मैं शोर मचा दूंगी। इस लिए उन्होंने मुझे फंसाने के लिए प्रेम का नाटक रचा था। राजू.....दुनिया में हर मरद ऐसा ही होता है। वो हर औरत को सिर्फ हवस की नजर से ही देखता है। औरत को भोगने के लिए वो हर तरह का तरीका अपनाता है।"
"इसका मतलब ये हुआ कि बापू ने ऐसा कर के खुद ही तुम्हारा काम आसान कर दिया था।" मैंने कहा─"मतलब जो काम तुम उनके साथ करना चाहती थी वैसा उन्होंने खुद ही आ के कर दिया था।"
"हां सही कहा तुमने।"
"फिर क्या तुमने इस बारे ने काका को भी बताया था।" मैंने पूछा।
"हां.... उन्हें सब कुछ बताया था।" काकी ने कहा─"फिर वो कहने लगे कि जो भी करो जल्दी करो....और थोड़ा एहतियात भी बरतो। मतलब मैं हमेशा ये याद रखूं कि ऐसे सम्बन्ध का किसी को भी पता न चल सके।"
"चलो ये तो समझ गया मैं।" मैंने गहरी सांस ली─"लेकिन अब ये नहीं समझ पा रहा कि जब काका ने ही बापू के साथ तुम्हें ऐसा करने की अनुमति दे रखी है तो अब बापू को छोड़ कर मुझसे ऐसा करने को क्यों कह रही हो? मतलब तुम तो अभी भी बड़े आराम से बापू के साथ सम्बन्ध बना सकती हो...फिर मुझसे क्यों कह रही हो? मुझे तो ऐसा करने का कोई अनुभव भी नहीं है। मैंने आज तक किसी लड़की या औरत की बु...बुर नहीं देखी...चुदाई करने की तो बहुत दूर की बात है।"
"क्या सच में??? काकी को जैसे यकीन न हुआ तो पूछ पड़ीं।
"मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूंगा काकी।"
"हां ये भी सही कहा तुमने।" काकी ने कहा─"देखो बात ये है कि तुम्हारे बापू से अब मैं ऐसा करना ही नहीं चाहती।"
"क्यों??"
"एक तो तुम्हारे सामने हमारा भेद खुल चुका है जिसकी वजह से अब शायद वो भी ऐसा करने की इतना जल्दी हिम्मत न करें।" काकी ने कहा─"दूसरे कई बार मेरे मन में ये खयाल आया है कि क्या पता अब वो खुद भी बच्चा पैदा करने की क्षमता न रखते हों। मतलब उमर में वो काफी बड़े हैं तुम्हारे काका से। जब उनसे छोटा होने के कारण तुम्हारे काका बच्चा पैदा नहीं कर पा रहे तो वो कैसे ऐसा कर लेंगे।"
"काका में कोई अंदरूनी खराबी होगी।" मैंने कहा─"शायद इस लिए वो बच्चा पैदा करने की क्षमता खो चुके हैं लेकिन बापू के पास शायद वो क्षमता अभी भी हो।"
"मानती हूं कि होगी।" काका ने कहा─"लेकिन ये एक संभावना ही है न। मान लो उनके पास भी बच्चा पैदा करने की क्षमता न हो तो??? ऐसे में तो बेमतलब ही मैं उनके नीचे हर बार लेटती रहूंगी न और वो भी यही समझेंगे कि मैं हवस में अंधी हो के उनसे बार बार चु..चुदवाए जा रही हूं।"
"हां ये भी सही बात है।"
"इसी लिए आज इस वक्त अचानक मुझे खयाल आया कि क्यों न मैं ऐसा काम तुम्हारे साथ करूं।" काकी ने कहा─"तुमने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा है राजू। मतलब कि तुम अभी नए नए जवान हुए हो और ऊपर वाले की कृपा से तुम्हारे पास दमदार हथियार भी है। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर तुम मेरे साथ करोगे तो निश्चित ही मैं पेट से हो सकती हूं।"
मैं काकी की इस बात पर हैरान रह गया। मेरे अंदर अजीब सी गुड़मुड़ होने लगी थी। मन में एकाएक सवाल कौंधा कि क्या सच में मैं काकी को चोद कर उन्हें पेट से कर सकता हूं। इस सवाल से मेरे बदन में अजीब सी झुरझुरी हुई। मन में कल्पनाओं का समंदर उभर आया।
"क...क्या सच में तुम्हें भरोसा है काकी कि मैं तुम्हें पेट से कर सकता हूं।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"हां राजू....मुझे इस बात का पूरा भरोसा है।" काकी ने पूरे आत्मविश्वास से कहा─"इसी लिए अचानक मैं तुम्हें ऐसा करने को कहने लगी थी। अगर तुम्हें बापू के साथ मेरे संबंध वाली बात का पता न चलता तो शायद मैं इस दोराहे पर न आ पाती और न ही कभी ये कल्पना कर सकती थी कि मुझे तुम्हारे साथ ऐसा करने को कहना पड़ेगा। अब तो ऐसा लगता है जैसे ऊपर वाला खुद चाहता है कि ऐसा ही हो....तभी तो इन चार दिनों में हमारे बीच इतना कुछ हो चुका है। क्या तुमने कल्पना की थी ऐसा होने की।"
"न..नहीं।"
"मैंने भी नहीं की थी राजू।" काकी ने गंभीरता से कहा─"पर हर कल्पना से परे ऐसा हुआ। जाहिर है मेरे नसीब में यही होना लिखा है। हां राजू....शायद तुम्हारे ही बच्चे की मां बनना लिखा है।"
"ये...ये क्या कह रही हो तुम??" मैं बुरी तरह चौंक पड़ा।
"हां राजू....अगर तुमसे मुझे बच्चा होगा तो तुम ही तो उसके बापू कहलाओगे।" काकी ने कहा─"और मैं तुम्हारे उस बेटे की मां। एक तरह से मैं तुम्हारी काकी नहीं बल्कि बीवी ही बन जाऊंगी....हाय दय्या ये क्या क्या बोले जा रही हूं मैं।"
काकी ने बुरी तरह शर्मा कर अपना चेहरा दोनों हाथों से छुपा लिया। इधर उनकी इस बात से मुझे अलग ही तरह का एहसास होने लगा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है। न चाहते हुए भी मैं सोचने लगा कि क्या सच में मैं काकी के बच्चे का बापू हो जाऊंगा। इस खयाल ने मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ा दी।
"ज्यादा मत सोचो राजू।" तभी काकी ने कहा─"मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं....भगवान के लिए मुझे एक बेटे की मां बना दो।"
काकी ने सच में हाथ जोड़ लिए। उनकी आंखों में एकाएक आंसू झलकने लगे। बेटे की चाह ने उन्हें क्या क्या करने के लिए मजबूर कर दिया था। मुझे समझ न आया कि अब क्या करूं और क्या बोलूं उन्हें।
"ह..हाथ मत जोड़ो काकी।" मैंने आगे बढ़ कर उनके हाथ अलग किए─"मुझे ये अच्छा नहीं लग रहा।"
"तो फिर मान जाओ न।" काकी ने भारी गले से कहा─"बाकी तुम काका की चिंता मत करो। मैं उन्हें अच्छे से सब कुछ समझा दूंगी।"
"न..नहीं नहीं।" मैं बुरी तरह हड़बड़ा गया─"काका से इस बारे में कुछ मत कहना। मैं काका से नजरें नहीं मिला सकूंगा।"
"ठीक है।" काकी ने कहा─"मैं उन्हें ये नहीं बताऊंगी। तुम्हारे द्वारा अगर मैं पेट से हो जाती हूं तो उनसे यही कहूंगी कि ये जेठ जी से हुआ है।"
"तो क्या बापू को इस बारे में पता नहीं चलेगा।"
"तुम्हारे बापू को कैसे पता चल जाएगा भला।" काकी ने कहा─"उनकी नजर में मैं और वो जो कर रहे हैं वो बस एक दूसरे की जिस्मानी जरूरत है। उन्हें कभी पता ही नहीं चलेगा कि असल में इस सबके पीछे मैं क्या कर रही थी। तुम्हारे काका भी यही समझेंगे कि मैं उनके बड़े भाई के द्वारा गर्भवती हुई। ऐसे में तुम्हें भी कभी उनके सामने अपनी नजरें नहीं झुकाना पड़ेगा। अब तो ठीक है न राजू।"
"ठीक तो है।" मैं अजीब दुविधा में पड़ गया था─"पर मुझे सोचने के लिए समय चाहिए। बात ये है कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं और क्या न करूं।"
"क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारी ये अभागन काकी एक बेटे का सुख पाए।" काकी ने अधीरता से कहा─"क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे जो काका अपने दिल पर पत्थर रख कर अपनी औरत को किसी गैर मर्द के नीचे लेटने को कहा है उनकी एक बेटा पाने की हसरत पूरी हो जाए।"
"च...चाहता हूं काकी।" मैं झट बोला─"भला मैं ये कैसे चाह सकता हूं कि मेरे काका काकी किसी बात से दुखी रहें।"
"तो फिर बस।" काकी ने कहा─"सब कुछ भूल जाओ राजू....अपने मन से हर दुविधा को निकाल दो और अपनी इस काकी को मां बना दो।"
"मुझे सोच लेने दो काकी।" मैं लड़खड़ाते स्वर में बोला─"तुम्हें अंदाजा ही नहीं है कि इस बात से मेरे अंदर क्या क्या चलने लगा है।"
"हां मैं समझती हूं राजू।" काकी ने सिर हिलाया─"मैं समझ सकती हूं कि अचानक इस बात से तुम किस हद तक सोच में पड़ गए होगे। मैं समझ सकती हूं कि इस बात के कारण तुम्हारे अंदर उथल पुथल मच गई होगी। तो ठीक है फिर....मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूंगी। तुम्हें जितना सोचना है सोच लो लेकिन भगवान के लिए मुझे....अपनी इस अभागन काकी को निराश मत करना।"
"ठीक है।" मैंने कहा─"अच्छा अब मैं जा रहा हूं। सब लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे।"
"ठीक है जाओ।" काकी ने खुद को सम्हालते हुए कहा─"मैं भी थोड़ी देर में आती हूं।"
उसके बाद मैं मन में हजारों तरह के खयाल लिए चल पड़ा वहां से। खेत तक मैं इसी सबके बारे में सोचते हुए आया था। मेरे अंदर की उथल पुथल शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
*********
करीब एक डेढ़ घंटे बाद जब मुझे और अनीता को फुर्सत मिली तो हम दोनों ने अपना अपना डंडा सुनीता और रानी को पकड़ा दिया। वो दोनों हमारी जगह बैलों के पीछे चलने लगीं। सुनीता तो खैर अनीता से बस एक ही साल छोटी थी लेकिन रानी अभी छोटी थी। जब वो बैलों के पीछे डंडा ले कर उन्हें हांकते हुए चलने लगी तो हम सब हंसने लगे थे जिससे वो बुरी तरह झेंपते हुए शर्मा गई थी। फिर मां ने एकदम से हमें ये कहते हुए डांट दिया कि─क्यों मेरी बच्ची पर हंस रहे हो तुम सब। खबरदार अगर किसी ने उसे सताया।
उसके बाद मैं और अनीता आमों की तरफ आ गए। पहले आमों का अच्छे से मुआयना किया उसके बाद एक पेड़ के नीचे बैठ के सुस्ताने लगे।
"अब जा के राहत मिली है।" अनीता दुपट्टे से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए बोली─"कितनी मस्त हवा लग रही है न यहां।"
"हां सही कहा।" मैं बोला─"ला अपना दुपट्टा दे न...मैं भी पसीना पोंछ लूं। मेरी साफी शायद खलिहान में ही रह गई है।"
अनीता ने दुपट्टे को कमर से छोरा। उसमें नमकीन गुड़ छुपा हुआ था जिसे उसने निकाल कर अपने पास रखा और दुपट्टा मुझे पकड़ा दिया।
"नमकीन गुड़ खाने का मन है कि नहीं।" उसने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा।
"तू प्यार से खिलाएगी तो खा लूंगा।" मैं बोला।
"अच्छा....और अगर नहीं खिलाऊंगी तो नहीं खाएगा।" उसने तिरछी नजरों से देख मुस्कुराते हुए पूछा।
"हां...फिर नहीं खाऊंगा।" मेरा दिल एकाएक तेज तेज धड़कने लगा। पता नहीं उसके साथ रहने से क्यों मेरा दिल धड़कनें लगता था।
"ऐसा क्यों।" उसने पूछा─"सच सच बता न राजू....मैं अगर नहीं खिलाऊंगी तो क्यों नहीं खाएगा तू।"
"बस ऐसे ही।" मैं बोला।
"अरे...बता न।"
"सच्ची बताऊं।"
"हां।"
"देख...मेरा मन ये कहता है कि जब तू खिलाएगी तो उसे बहुत अच्छा लगेगा।" मैंने कहा─"उसी तरह मैं तुझे खिलाऊंगा तब भी उसे अच्छा लगेगा।"
"अच्छा ऐसा क्या।" अनीता मुस्कुराई─"पर मैं तो आज न खिलाऊंगी तुझे।"
"ठीक है जैसी तेरी मर्जी।" मैं थोड़ा मायूस हो गया─"मैं तुझे मजबूर नहीं कर सकता।"
"क्यों नहीं कर सकता मजबूर।" उसने फिर तिरछी नजरों से देखा।
"क्योंकि......क्योंकि मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"और मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुझे कोई तकलीफ हो। तुझे मजबूर करूंगा तो तुझे तकलीफ ही तो होगी।"
"कितना अजीब है न राजू।" अनीता ने कहा─"दो दिन में हमारे बीच कितना बदलाव आ गया है। पहले हम दोनों एक दूसरे की तकलीफ के बारे में तनिक भी नहीं सोचते थे और अब....बहुत ज्यादा सोचते हैं। क्या सच में भाई बहन के प्यार में ऐसा होता है।"
"हां शायद।" मैं खुद उलझ सा गया।
"चल मुंह खोल अपना।" उसने नमकीन गुड़ मेरे मुंह के पास ला कर कहा─"मैं तो ऐसे ही कह रही थी कि नहीं खिलाऊंगी आज। सच ये है कि मैं ऐसा कर ही नहीं पाऊंगी।"
"क्यों??" मैं मन ही मन थोड़ा चौंक पड़ा।
"पता नहीं।" अनीता ने मेरे मुंह में नमकीन गुड़ डाल कर कहा─"बस इतना पता है कि अगर नहीं खिलाऊंगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"
मैंने भी मुस्कुराते हुए उसके मुख की तरफ नमकीन गुड़ बढ़ाया जिसे उसने हल्के से मुस्कुरा कर मुंह में लपक लिया।
"मतलब...जैसे मुझे ऐसा करने से अच्छा नहीं लगता वैसे ही तुझे अच्छा नहीं लगता...है न।" मैंने पूछा।
"हां।" अनीता ने कहा फिर सहसा उसे कुछ याद आया तो पूछा─"अच्छा ये बता..उस समय तू इतनी देर से क्यों आया था। श्यामू काका के लिए पान सुपाड़ी लेने जाने में क्या इतना समय लगता है।"
उसकी ये बात सुन मैं अंदर ही अंदर घबरा उठा। मन ही मन ये भी सोचा कि कितना जल्दी ये चीजों को समझ कर उसे पकड़ लेती है। इतना ही नहीं इस तरह पूछने लगती है जैसे कोई शक्की बीवी अपने मरद से पूछती है।
"क्या सोचने लगा।" मुझे सोचता देख वो बोल पड़ी─"बता न....इतना समय कहां लगा दिया था तूने। कहीं तू...बबलू के साथ खेलने तो नहीं चला गया था।"
"नहीं यार।" मैंने फटाफट बहाना बनाया─"बात ये है कि मैं थोड़ी देर काका के यहां ही बैठ गया था। वो बोले कि साथ में ही चलते हैं।"
"पर तू तो उनके साथ नहीं आया था।" अनीता ने फिर से मेरे मुंह में नमकीन गुड़ डाला─"वो और छोटी काकी तो साथ ही आए थे....मगर तू बहुत बाद में आया था। आखिर कहां रह गया था तू।"
"तू पूरी बात बताने देगी तब न बताऊंगा।" मैं थोड़ा चिढ़ कर बोला─"मैं मझले काका के यहां मंजू काकी के पास रुक गया था। हुआ ये कि...छोटे काका के घर से बाहर आया तो मझले काका अपने घर के बाहर दिख गए। वो पूछने लगे कि अभी तक नहीं गया क्या तो मैंने उन्हें बताया कि छोटे काका के लिए पान सुपाड़ी लेने लाला की दुकान चला गया था। उसी समय अचानक प्यास लग आई तो वहीं से घर के अंदर चला गया। काकी से मांग के पानी पिया और फिर वहीं थोड़ी देर बैठे उनसे दरबार करने लगा। ऐसे में समय का ध्यान ही नहीं रहा मुझे। फिर जब ध्यान आया तो सरपट भागते हुए यहां आया।"
"अच्छा तो इस लिए तू इतनी देर से आया था।" अनीता ने सब कुछ जान लेने के बाद सिर हिलाया। इस बीच मैंने भी फिर से उसके मुख में नमकीन गुड़ डाल दिया।
"वैसे एक बात कहूं तुझसे।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"बुरा तो नहीं मानेगी न।"
"हां कह न।" उसने मुंह चलाते हुए कहा─"और बुरा क्यों मानूंगी भला।"
"तू न कभी कभी ऐसा बर्ताव कर जाती है जैसे कोई शक्की बीवी अपने मरद से करती है।" मैंने एक झटके में और एक ही सांस में बोल दिया।
"हाय दय्या।" अनीता बुरी तरह उछल पड़ी। आश्चर्य से आँखें फाड़ कर बोली─"ये तू क्या बोल रहा है....मैंने कब तुझसे ऐसे बर्ताव किया।"
"अभी जिस तरह तू मेरे देर से आने की बात पूछ रही थी न।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"उससे तो यही लगा था। तू एक शक्की बीवी की तरह ही तो पूछ रही थी कि मैं इतनी देर से क्यों आया था...कहां रह गया था...छोटे काका काकी के साथ तो मैं आया ही नहीं था।"
"हां तो ऐसा पूछने से मैं बीवी बन गई तेरी।" अनीता ने हैरान नजरों से देखते हुए कहा।
"अरे मैंने कब कहा कि तू मेरी बीवी बन गई।" मैं हंस पड़ा─"मैं तो बस बता रहा हूं कि तू एक शक्की बीवी की तरह ऐसे कुरेद कुरेद के पूछ रही थी मुझसे।"
"बहुत खराब है तू।" अनीता ने बुरा सा मुंह बना लिया─"जाने क्या क्या बोलता रहता है....गंदा कहीं का।"
"ले अब मैं गंदा हो गया।" मैं मुस्कुरा उठा─"और तू जो शक्की बीवी की तरह कुरेद कुरेद के मेरे देर से आने की बात पूछ रही थी...उसका क्या...हां।"
"हां तो क्या मैं नहीं पूछ सकती तुझसे।" अनीता ने घूरा─"क्या एक बहन अपने भाई से ऐसे नहीं पूछ सकती।"
"यार तू तो बात का पतंगड़ बनाने लगी।" मैंने कहा─"जबकि मैंने तो बस मजाक में ऐसा कहा है।"
"ऐसा मजाक करता है क्या कोई।" उसने फिर से मुंह बनाया।
"पर मैं तो अपनी प्यारी बहन से ऐसा ही मजाक करूंगा।" मैंने नमकीन गुड़ हाथ में ले कर उसकी तरफ बढ़ाया और मुस्कुराते हुए बोला─"हां तुझे बुरा लगा हो तो बोल दे...कान पकड़ के माफी मांग लूंगा तुझसे। भला अपनी प्यारी बहन को कैसे नाराज कर दूंगा मैं....हां।"
ये सुनते ही अनीता अनायास ही मुस्कुराने लगी और झट से मुंह खोल कर मेरे हाथ का नमकीन गुड़ मुंह में लपक लिया। थोड़ी देर उसने चबाया फिर बोली─"चल अब बातें न बना तू....सब समझती हूं तेरी शैतानी को।"
"अच्छा...सच में??" मैं मुस्कुरा उठा।
"हां...इतनी बुद्धू न समझ मुझे।" उसने फिर से तिरछी नजरों से देखा और मुस्कुराने लगी।
इस बार मैं उसके तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्कुराने को नजरअंदाज न सका। जब वो तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्कुराती थी तो वो अलग ही दिखने लगती थी। एक अदा सी दिखने लगती थी उसमें।
जारी है..........
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(25-01-2026, 07:20 PM)rajeev13 Wrote: इस कहानी के इस भाग में टेंशन और उत्तेजना दोनों पीक पर पहुँच गई है। काकी में अचानक परिवर्तन आना (पहले शर्म, फिर सीधे प्रपोज करना) बहुत अच्छा twist है। राजू की घबराहट, डर और लालच का मिक्सचर बहुत रियल लग रहा है, वो जो inner conflict दिखा रहे हो, वो पढ़ने में काफी मजा देता है।
कुछ पॉइंट्स जो मुझे खास पसंद आए:
- काका-काकी की चुदाई सीन डिटेल में अच्छा लिखा है, लेकिन over-described नहीं लगा – बैलेंस ठीक रखा।
- काकी का "सुनीता के बापू" वाला स्लिप – ? ये लाइन कमाल की है, पूरा मूड चेंज कर देती है।
- राजू का वो डर कि "कहीं खेल तो नहीं, खेल रही" ये सोच बहुत natural है, 99% लड़के ऐसे ही सोचेंगे।
- क्लाइमेक्स पर काकी का direct "अधूरा काम पूरा कर दो" ओ भाई साहब, दिल की धड़कन बढ़ा दी!
अब आगे क्या होने वाला है, ये suspense kill कर रहा है:
- राजू मानेगा या भागेगा?
- अगर माना तो first time का सीन कैसा होगा – nervous, awkward या suddenly wild?
- कहीं बाकी सब महिलाएं न आ जाएँ!
- काकी सच में desperate है या राजू को trap करने की कोशिश?
प्लीज अगला भाग जल्दी डालो भाई।
इंतज़ार नहीं हो रहा – राजू का जवाब क्या होगा?
काकी आगे क्या करेगी अगर राजू मना कर देगा?
New update posted brother
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(01-02-2026, 12:09 PM)Namusa Wrote: New update
Thanks
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Nice update bro keep it up
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(27-05-2026, 09:03 AM)Rajan Raghuwanshi Wrote: New update posted brother
Good to see you come back, Will read soon
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31-05-2026, 04:04 PM
(This post was last modified: 31-05-2026, 04:04 PM by rajeev13. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
मेरे अनुसार यह भाग कहानी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ केवल घटनाएँ नहीं घटतीं, बल्कि कई पात्रों की सोच और मानसिकता भी खुलकर सामने आती है। काकी की मजबूरी, उसकी इच्छाएँ, उसका डर और राजू की उलझन को विस्तार से दिखाया गया है। आपने संवादों के माध्यम से स्थिति को समझाने की कोशिश की है, जिससे हम जैसे पाठक को पात्रों के निर्णयों के पीछे के कारण जानने का अवसर मिलता है।
राजू का चरित्र इस भाग में पहले की तुलना में अधिक गहराई वाला लगता है। वह तुरंत कोई फैसला नहीं लेता बल्कि बार-बार सोचता है, सवाल करता है और अपने मन में चल रहे संघर्ष से जूझता है। यह बात उसके चरित्र को अधिक विश्वसनीय बनाती है। वहीं काकी भी केवल एकतरफा पात्र नहीं लगती, बल्कि उसकी भावनाएँ, उसकी निराशा और उसकी उम्मीदें कहानी में स्पष्ट दिखाई देती हैं।
भाग के दूसरे हिस्से में अनीता और राजू के बीच के संवाद कहानी की गंभीरता को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। दोनों की बातचीत सहज, हल्की-फुल्की और पढ़ने में रोचक लगती है। नमकीन गुड़ वाला दृश्य और उनके बीच की नोकझोंक कहानी में एक अलग तरह की गर्माहट जोड़ती है। यही कारण है कि यह हिस्सा पढ़ते समय बनावटी नहीं लगता बल्कि स्वाभाविक महसूस होता है।
लेखन शैली की बात करें तो आपकी सबसे बड़ी ताकत आपकी संवाद लेखन क्षमता है। पात्रों की बोली, ग्रामीण माहौल और उनके आपसी रिश्तों को आप बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत करते है। पढ़ते समय दृश्य आसानी से मन में बन जाते हैं और यही किसी भी कथाकार की सफलता मानी जाती है।
कुल मिलाकर यह भाग कहानी के भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को मजबूत करता है। इसमें बड़े खुलासे भी हैं, चरित्र विकास भी है और आगे आने वाली घटनाओं के लिए आधार भी तैयार किया गया है। कुछ संपादन और संवादों में कसावट लाई जाती तो यह भाग और अधिक प्रभावशाली बन सकता था, लेकिन फिर भी यह पाठक की रुचि बनाए रखने में सफल रहता है।
अगले अपडेट की प्रतीक्षा रहेगी...
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(27-05-2026, 07:27 PM)Xkingthakur Wrote: Nice update bro keep it up
Thanks
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(31-05-2026, 04:04 PM)rajeev13 Wrote: मेरे अनुसार यह भाग कहानी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ केवल घटनाएँ नहीं घटतीं, बल्कि कई पात्रों की सोच और मानसिकता भी खुलकर सामने आती है। काकी की मजबूरी, उसकी इच्छाएँ, उसका डर और राजू की उलझन को विस्तार से दिखाया गया है। आपने संवादों के माध्यम से स्थिति को समझाने की कोशिश की है, जिससे हम जैसे पाठक को पात्रों के निर्णयों के पीछे के कारण जानने का अवसर मिलता है।
राजू का चरित्र इस भाग में पहले की तुलना में अधिक गहराई वाला लगता है। वह तुरंत कोई फैसला नहीं लेता बल्कि बार-बार सोचता है, सवाल करता है और अपने मन में चल रहे संघर्ष से जूझता है। यह बात उसके चरित्र को अधिक विश्वसनीय बनाती है। वहीं काकी भी केवल एकतरफा पात्र नहीं लगती, बल्कि उसकी भावनाएँ, उसकी निराशा और उसकी उम्मीदें कहानी में स्पष्ट दिखाई देती हैं।
भाग के दूसरे हिस्से में अनीता और राजू के बीच के संवाद कहानी की गंभीरता को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। दोनों की बातचीत सहज, हल्की-फुल्की और पढ़ने में रोचक लगती है। नमकीन गुड़ वाला दृश्य और उनके बीच की नोकझोंक कहानी में एक अलग तरह की गर्माहट जोड़ती है। यही कारण है कि यह हिस्सा पढ़ते समय बनावटी नहीं लगता बल्कि स्वाभाविक महसूस होता है।
लेखन शैली की बात करें तो आपकी सबसे बड़ी ताकत आपकी संवाद लेखन क्षमता है। पात्रों की बोली, ग्रामीण माहौल और उनके आपसी रिश्तों को आप बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत करते है। पढ़ते समय दृश्य आसानी से मन में बन जाते हैं और यही किसी भी कथाकार की सफलता मानी जाती है।
कुल मिलाकर यह भाग कहानी के भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को मजबूत करता है। इसमें बड़े खुलासे भी हैं, चरित्र विकास भी है और आगे आने वाली घटनाओं के लिए आधार भी तैयार किया गया है। कुछ संपादन और संवादों में कसावट लाई जाती तो यह भाग और अधिक प्रभावशाली बन सकता था, लेकिन फिर भी यह पाठक की रुचि बनाए रखने में सफल रहता है।
अगले अपडेट की प्रतीक्षा रहेगी...
Thanks bro for your beautiful feedback and appreciation.
Time ki bahut jyada shortness hai bro..is liye site visit nahi kar pata aur na hi story ki taraf dhyaan de pata. Well, socha yahi hai ki jab bhi story ka next update complete hoga to post kar diya karuga.
Sath banaye rakhe...
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भाग ~ २०
"अब ऐसे क्यों देख रहा है तू।" मुझे अपनी तरफ अपलक देखते देख उसने अपनी भौंहों को ऊपर कर के पूछा। इस बार भी अदा वही थी उसकी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा।
"देख रहा हूं कि तू कितनी सुंदर और प्यारी है।" मैं अनायास ही बोल गया।
"क...क्या???" वो एकदम से सीधा हुई और शर्मा गई।
"मैंने कल तुझसे कहा था न कि जब तू ऐसे शर्माती है तो और भी सुंदर और प्यारी दिखती है।" मैंने कहा।
"क्या...कुछ भी बोलता है तू।" उसने शर्माते हुए झूठी नाराजगी दिखाई।
"अच्छा चल...अब से ऐसा कभी नहीं बोलूंगा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"क..क्यों नहीं बोलेगा?" वो चौंकी।
"तुझे अच्छा नहीं लगता न इस लिए।"
"मैंने कब कहा कि मुझे अच्छा नहीं लगता?"
"तो क्या तुझे सच में अच्छा लगता है?"
"ह..हां।" वो बोली और फिर शर्मा गई।
"एक बात बता।" मैंने वो पूछा जो मेरे मन में एकाएक सवाल के रूप में उभर आया था─"तू बार बार ऐसे शर्माने क्यों लगती है।"
"मैं कहां शर्माती हूं।" वो एकदम से सकपका गई।
"झूठ मत बोल।" मैंने कहा─"सब दिखता है मुझे। मैंने साफ साफ देखा है कि तू मेरी बात पर कई बार शर्मा जाती है।"
"हां तो तू बात ही ऐसी कर देता है कि मुझे शर्म आ जाती है।" उसने मासूमियत से कहा।
"अच्छा...बता भला...मैंने कौन सी ऐसी बात कह दी जिससे तुझे शर्म आ जाती है?"
"रहने दे।" अनीता के चेहरे पर लाज की सुर्खी उभर आई─"मैं कुछ नहीं बताऊंगी।"
"यार अब ये क्या बात हुई?" मैंने कहा─"अब क्या मुझसे कोई बात छुपाएगी तू? क्या भूल गई कि हमारे बीच क्या फैसला हुआ था?"
"भूली नहीं हूं।" उसने कहा─"लेकिन राजू...कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भी बहन अपने भाई को नहीं बता सकती।"
"पर मैं तो तुझे अपनी हर बात बता सकता हूं।"
"हां तो मैं तेरी तरह बेशर्म नहीं हूं...समझा।"
"यार ऐसे न कर न।" मैंने मनुहार सा किया─"बता न...मेरी कौन सी बात से शर्म आ जाती है तुझे?"
अनीता अपलक देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए।
"अब बता भी दे न।"
"अच्छा ठीक है बताती हूं।" वो कागज से नमकीन गुड़ ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाते हुए बोली─"गांव में मेरी एक सखी है...गुंजा नाम है उसका। तू जानता है उसे...वो मुझे कई ऐसी बातें बताया करती है जो हम लड़कियों या औरतों वाली होती हैं। उसी से मुझे पता चला था कि लड़का और लड़की में सबसे बड़ा अंतर ये होता है कि लड़के किसी बात से शर्माते नहीं हैं और हम लड़कियां शर्माती हैं...क्योंकि ऊपर वाले ने हमें बनाया ही ऐसा है। उसने ये भी बताया था कि जब हम लड़कियां बड़ी हो जाती हैं तो कई बातों के लिए हमें शर्म आती है। लड़के जो बात बिना झिझक के बोल देते हैं वहीं बात हम लड़कियां शर्म की वजह से नहीं बोल पातीं।"
"अच्छा...और क्या बताया उसने?" मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
"सब कुछ नहीं बता सकती तुझे।" अनीता हल्के से मुस्कुराई─"बाकी तेरी किस बात पर शर्मा जाती हूं तो उसका जवाब यही है कि तू जब मेरी तारीफ करता है तो अनायास ही शर्म लगने लगती है मुझे। माना कि हम भाई बहन हैं...लेकिन इसके अलावा लड़का लड़की भी तो हैं। गुंजा बताया करती है कि जब कोई लड़का किसी लड़की की इस तरह तारीफें करता है तो लड़की ऐसे ही शर्माती है और पता है....लड़का क्यों लड़की की तारीफ करता है?"
"क..क्यों करता है?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"गुंजा के अनुसार वो उस लड़की को पटाने की फिराक में होता है।" अनीता ने शर्माते हुए कहा─"मतलब वो ऐसा उसके प्रेम में करता है...और लड़की जब ये समझ जाती है तो उसे अनायास ही शर्म आने लगती है।"
"अच्छा??? क्या सच में ऐसा होता है?" मैं हैरान रह गया।
"मुझे क्या पता।" अनीता ने कहा─"ऐसा तो गुंजा ही कहती है।"
"इसका मतलब मैं तेरी तारीफ कर रहा हूं तो क्या तुझे पटा रहा हूं??" मैं इस खयाल मात्र से ही सिहर उठा─"पर ऐसा कैसे हो सकता है? मतलब...मेरे मन में तो ऐसा कुछ नहीं है। वैसे भी तू मेरी बहन है तो ऐसा तो मैं सोच ही नहीं सकता।"
अनीता को भी समझ न आया इस लिए वो कुछ न बोली। मैं कुछ देर तक इस बारे में सोचता रहा।
"बड़ी अजीब बात है न अनीता।" फिर मैंने कहा─"कुछ बातें होती तो हैं लेकिन समझ नहीं आतीं।"
"हम्म्म्म।" अनीता ने सिर हिलाया─"जाने दे...तू ज्यादा मत सोच इस बारे में...ले मुंह खोल अपना।"
अनीता के कहने पर मैंने अपना मुंह खोला तो उसने नमकीन गुड़ मेरे मुंह में डाल दिया। फिर मैंने भी उसे खिलाया।
"अच्छा ये बता...क्या तूने गुंजा से प्रेम के बारे में पूछा है कभी?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे पूछा।
"नहीं।" उसने झट इंकार किया─"पर तू ये क्यों पूछ रहा है?"
"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"मतलब मुझे और तुझे नहीं पता इस बारे में तो शायद उसे पता हो। मुझे लगता है तुझे पूछना चाहिए उससे इसके बारे में।"
"धत्त पागल है क्या?" अनीता ने मुझे घूरा─"मैं क्यों पूछूं इसके बारे में?"
"यार पता तो चलना ही चाहिए कि सब इसके बारे में इस तरह क्यों बोलते हैं?" मैंने कहा─"आखिर लोग इसके बारे में क्यों इतनी अजीब अजीब बातें बताते हैं। पता तो चलना ही चाहिए कि सच में ये प्रेम क्या होता है...कैसे होता है और....और प्रेमी लोग क्या करते हैं प्रेम में?"
"तू न एकदम पागल है।" अनीता ने कहा─"भला क्या जरूरत है तुझे ये सब जानने की? क्या तुझे भी अब किसी से प्रेम करने का मन है?"
"म...मैं भला किससे प्रेम करूंगा??" मैं चौंक पड़ा।
"ऐ...ऐसा क्यों कहता है?" अनीता की आँखें फैलीं─"गांव में कितनी लड़कियां हैं जिनसे तू प्रेम कर सकता है।"
"हट...मैं किसी लड़की की तरफ ऐसे नहीं देखता।" मैंने भोली शक्ल बना के कहा─"तेरे सिवा मैं गांव की किसी लड़की से बात ही नहीं करता।"
"अच्छा...क्या सच में???"
"हां...सच में।"
"ऐसा क्यों??"
"मुझे नहीं पता।" मैंने भोलेपन में कहा─"मेरी कभी हिम्मत ही नहीं होती किसी लड़की से बात करने की। मुझे लगा करता है कि कहीं वो गलत न समझ ले और फिर मुझे कुछ उल्टा सीधा बोलने लग जाए। इस लिए मैं किसी से मतलब ही नहीं रखता।"
"पर कोई लड़की ऐसे कैसे तुझे कुछ बोल देगी?" अनीता ने कहा─"तू अगर किसी से अच्छे से बात करेगा तो वो भी तो अच्छे से बात करेगी तुझसे।"
"मुझे नहीं करना किसी से बात।" मैंने कहा─"मैं तुझसे बात कर लेता हूं यही काफी है।"
"अच्छा।"
"हां।"
अनीता एकटक देखने लगी मुझे। एक बार फिर उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए। तभी हमारे कानों में श्यामू काका की आवाज पड़ी। वो हमारा नाम ले के पुकार रहे थे।
"र..राजू चल।" अनीता हड़बड़ाते हुए बोली─"छोटे काका बुला रहे हैं हमें। लगता है हमें आए काफी देर हो गई है।"
"हां चल जल्दी।" मैं झट से उठ कर खड़ा हो गया।
अनीता ने बाकी का नमकीन गुड़ वापस कागज में लपेटा और फिर उसे अपने दुपट्टे में छुपा कर दुपट्टे को कमर में बांध लिया। दुपट्टे का बाकी हिस्सा उसने अपने सीने पर फैला कर उसका एक छोर पीठ से घुमा कर कमर में खोंस लिया।
हम दोनों जल्दी ही वहां से खलिहान तरफ आ गए। हमें देखते ही श्यामू काका ने कहा कि सुनीता और रानी थक गई हैं इस लिए अब बैलों को हांकने की बारी हमारी है। काका की बात सुन कर हमने डंडा ले कर अपना अपना पाला सम्हाल लिया।
**********
दोपहर होने से पहले ही काका के कहने पर हमने गहाई करना रोका। मां ने आ कर अनीता से कहा कि वो मेरे साथ घर जाए और नहा धो कर फटाफट खाना बना ले। मां की बात सुन अनीता मन ही मन ये सोच के खुश हो गई कि अब वो मेरे साथ आज नदी में नहाने आसानी से जा सकेगी।
असल में गहाई के बाद गेहूं को भूसे से निकालने का काम अभी बाकी था। आज हवा अच्छी चल रही थी जिसके कारण मझले काका ने कहा कि गेहूं को ओसाने में आसानी होगी और साथ ही काम भी जल्दी हो सकता है।
खैर मैं और अनीता चल पड़े। दोनों काकी एवं सुनीता और रानी उनके साथ पहले ही चली गईं थी। खेत में अब मां बापू के अलावा दोनों काका ही थे।
"तो आज मौका मिल ही गया नदी में नहाने का..है न।" रास्ते में मैंने मुस्कुराते हुए अनीता से कहा।
"हां...अच्छा हुआ जो मां साथ नहीं आई।" अनीता खुशी से मुस्कुराते हुए बोली─"नहीं तो उसके साथ सीधा घर ही जाना पड़ता और फिर कुएं में ही नहाना पड़ता।"
"तो क्या हुआ अगर कुएं में ही नहाना पड़ता हमें।" मैंने कहा─"मैं कुएं में भी तुझे जी भर के नहलाता।"
"नहीं राजू...मुझे अच्छा नहीं लगता जब तू मुझे नहलाने के लिए इतना सारा पानी कुएं से खींचता है।" अनीता ने कहा─"और ये भी अच्छा नहीं लगता जब तू मुझे कुएं से पानी नहीं खींचने देता।"
"देख तू मुझसे छोटी है...ऊपर से लड़की है तो ज्यादा पानी खींचने से थक जाएगी तू।" मैंने उसे समझाया─"इसी लिए मैं तुझे इसके लिए मना करता हूं। दूसरी बात...मैं तुझसे प्यार करता हूं तो मेरा दिल नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतनी मेहनत करे...हां।"
अनीता गर्दन घुमा कर एकटक देखने लगी मुझे। उसके पसीने से भीगे चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए।
"पर मैं भी तो तुझसे प्यार करती हूं।" फिर उसने बड़ी मासूमियत से कहा─"मेरा भी तो दिल नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतना ज्यादा कुएं से पानी खींचे।"
अब मैं उसे एकटक देखने लगा। मेरी धड़कनें तो कब से तेज तेज चल रहीं थी। उसकी बातें सुन कर मैं सोचने लगा कि हम दोनों एक जैसा ही एक दूसरे के लिए सोचने लगे हैं। मुझे समझ न आया कि अब मैं उससे क्या कहूं।
"अब ऐसे क्यों देख रहा है?" जब मैं उसकी तरफ देखता ही रहा तो वो थोड़ा लजाते हुए बोली─"क्या मैंने कुछ गलत कहा?"
"न..नहीं..कुछ गलत नहीं कहा तूने।" मैंने हड़बड़ा कर कहा─"मैं जानता हूं कि तू भी मुझसे बहुत प्यार करती है और जैसे मैं नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतनी मेहनत करे वैसे ही तू भी नहीं चाहती कि मैं तेरे लिए इतनी मेहनत करूं...लेकिन...फिर भी मैं लड़का हूं तो इतने से मैं नहीं थक सकता पर तू लड़की है तो जल्दी थक जाएगी। इस लिए मेहनत का काम मुझे करने दे।"
"बातें बनाना खूब आने लगा है तुझे।" उसने आँखें फैला कर कहा।
"बात नहीं बना रहा मैं।" मैं थोड़ा सकपका सा गया─"मैं तो सच कह रहा हूं तुझसे। दूसरी बात...मुझे अच्छा लगता है तेरे लिए इतनी मेहनत करना। तू भले ही ऐसा न करे...फिर भी मुझे अच्छा ही लगेगा।"
"अच्छा जाने दे।" उसने कहा─"पर मैं नदी में तुझे अपने से नहलाऊंगी और मेरा जैसे मन होगा वैसे नहलाऊंगी। तू मुझे बिल्कुल नहीं रोकेगा...बताए देती हूं...हां।"
"हां ठीक है...नहीं रोकूंगा।" मैं मुस्कुरा उठा।
कुछ ही देर में हम दोनों नदी किनारे पहुंच गए। दोपहर हो ही गई थी क्योंकि आसमान में आग उगल रहा सूरज एकदम सिर पर ही था। मैंने आस पास दूर दूर तक निगाह दौड़ाई। इस वक्त कोई नहीं था यहां। होता भी कैसे...ज्यादातर लोग दोपहर होने से पहले ही नहा के और कपड़े धो के चले जाते थे।
"हमारे अलावा यहां दूर दूर तक कोई नहीं है अनीता।" मैंने कहा─"अब तू कपड़े उतार के आराम से नहा सकती है नदी में।"
"हां तू तो चाहता ही है कि मैं कपड़े उतार कर नंगी हो जाऊं।" अनीता मुस्कुराते हुए बोली और फिर एकदम से जाने क्या सोच के शर्मा गई।
"ऐसा क्यों कह रही है तू।" मैंने चौंक कर उससे कहा─"मैं भला क्यों ऐसा चाहूंगा। मैं तो ऐसा इस लिए कह रहा हूं ताकि तू अच्छे से माटी लगा के नहा सके जिससे गर्मी भी दूर हो जाए। बाकी तेरी जैसी इच्छा हो वैसे नहा...मैं नहीं बोलूंगा।"
"बुद्धू...मजाक कर रही थी मैं।" उसने हल्के से मेरी बाजू पर मारा फिर मुस्कुराते हुए बोली─"मैं तो सच में कुर्ता उतार के ही नहाऊंगी।"
"ठीक है।" मैं अपनी शर्ट उतारते हुए बोला─"अब चल बातें करना छोड़ और जल्दी से नहाते हैं...नहीं तो अगर घर जाने में देर हो गई तो मां बापू के आने से पहले तू खाना भी नहीं बना पाएगी और फिर तुझे मां से डांट सुननी पड़ेगी।"
"हां ये तो तूने सही कहा राजू।" उसने हड़बड़ा कर कहा─"चल जल्दी से नहा लेते हैं।"
कहने के साथ ही उसने आस पास निगाह घुमाई। जब उसे कोई न दिखा तो झट नदी किनारे रखे पत्थर के चौड़े पाट पर जा कर बैठ गई। उसके बाद वो बैठे बैठे ही अपना कुर्ता उतारने लगी। ये देख मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं।
यूं तो कल कुएं में मैं उसे कमीज पहने देख चुका था लेकिन यहां खिली धूप में पहली बार ही देखने वाला था। न मैंने और ना ही अनीता ने कभी ये सोचा होगा कि एक दिन उसे इस तरह खुले में अपना कुर्ता उतार कर सिर्फ कमीज पहन के नहाना होगा।
खैर जल्दी ही उसने कुर्ता उतार लिया और उसे नदी के पानी में डुबा कर धोने लगी। कुर्ता उतर जाने के बाद अब वो ऊपर सिर्फ कमीज में थी जो उसकी आधी पीठ और आधे पेट तक ही थी...जबकि नीचे उसने सलवार पहन रखी थी।
इधर मैं अपने कपड़े उतार चुका था और अब सिर्फ कच्छे में था। मैं झट आगे बढ़ा और नदी में उतर गया। ठंडे ठंडे पानी का स्पर्श होते ही बदन में झुरझुरी दौड़ गई। नदी में उतर कर मैं अनीता के सामने आ कर खड़ा हो गया। मुझे देख वो मुस्कुराई और थोड़ा लजाई भी।
उसके घुटने क्योंकि कमीज के ऊपर से उसकी छातियों पर सटे थे इस लिए जब वो नदी के पानी में अपने कुर्ते को धोने लगती तो घुटनों का दबाव उसकी छातियों पर पड़ जाता जिससे उसके सीने की गोलाईयां ऊपर की तरफ उभर कर दिखने लगती थीं। खिली धूप में मैं उसके उन उभारों की चमक स्पष्ट देख सकता था। एकाएक ही मेरा हलक सूखने लगा था।
"अब देखता ही रहेगा या नहाएगा भी।" अनीता ने हल्के से शर्माते हुए कहा तो मेरा ध्यान भंग हुआ।
"अरे...मैं ये देख रहा हूं कि तूने कुर्ता तो उतार लिया है।" मैंने फटाफट बहाना बना कर कहा─"लेकिन सलवार तो अभी भी तूने पहन रखा है।"
"हाय दय्या...तो क्या मैं सलवार भी उतार दूं?" वो एकदम से चौंक कर बोली─"र..राजू ये क्या बोल रहा है तू?"
"हां तो क्या गलत बोला मैंने?" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"जब तू कुर्ता उतार सकती है तो भला सलवार उतारने में क्या समस्या हो सकती है तुझे। तूने सलवार के अंदर कच्छी तो पहन ही रखी होगी न।"
"राजू चुप कर जा।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"क्या क्या बोले जा रहा है तू।"
"ले अब मैंने क्या गलत बोल दिया?" मैंने भोली शक्ल बना ली।
वो एकटक मुझे देखने लगी। उसके चेहरे पर एकाएक अजीब से भाव उभर आए थे।
"क्या हुआ...ऐसे क्यों देख रही है मुझे।" मैंने धड़कते दिल से पूछा─"नहीं उतारना तो मत उतार...पर नहाएगी नहीं क्या? भूल मत ज्यादा देर करेगी तो मां से डांट सुनने को मिलेगी। अगर मां ने तुझे डांटा तो तुझसे ज्यादा मुझे बुरा लगेगा।"
"तु..तुझे क्यों बुरा लगेगा भला?" अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा।
"ले अब ये भी समझाऊं तुझे?" मैंने कहा─"अरे बताया था न कि अगर तुझे किसी तरह की तकलीफ होगी तो मुझे भी होगी। मुझे ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा कि तुझे कोई डांटे या तुझे कोई बुरा भला कहे।"
ये सुन कर अनीता हैरानी से देखने लगी मुझे। इधर मेरी धड़कनें एकाएक फिर से तेज हो गईं।
"तू न सच में बहुत अजीब बातें करता है।" फिर उसने कहा─"मुझे तेरी बातें समझ ही नहीं आतीं।"
"तो तू समझने की कोशिश ही न कर।" मैंने कहा─"पर अगर तुझे मेरी बातें बुरी लगें तो बोल दे....नहीं करूंगा ऐसी बातें।"
"ऐसी बात नहीं है राजू।" अनीता ने कहा─"मुझे तेरी सारी बातें बहुत अच्छी लगती हैं...बस कभी कभी समझ नहीं पाती हूं।"
"चल जाने दे।" मैंने कहा─"और आ जा फटाफट नदी में।"
अनीता ने अपने कुर्ते को पाट पर रखा और खड़ी हो गई। उसके खड़े होते ही मेरी नजर सीधा उसकी चूचियों पर जा पड़ी। कमीज का निचला सिरा उसके आधे पेट तक ही था। पेट के बीच उसकी छोटी सी मगर खूबसूरत नाभी साफ दिख रही थी मुझे। नाभी के बिल्कुल नीचे उसकी सलवार बंधी हुई थी।
मुझे खुद को यूं देखते देख उसके चेहरे पर शर्म के भाव उभर आए। फिर हल्के से मुस्कुराते हुए वो बड़ी सावधानी से नदी के पानी में उतरने लगी। मैं सांसें रोके उसे ही देखे जा रहा था।
थोड़ी ही देर में वो नदी के पानी में उतर कर मेरे करीब आ गई। नदी का पानी हमारी कमर तक था। उसे सिर्फ कमीज पहने मैं पहली बार खिली धूप में इतना करीब से देख रहा था।
"ऐसे न देख मुझे...नहीं तो वापस चली जाऊंगी मैं।" अनीता शर्माते हुए मुस्कुराई─"गंदा कहीं का।"
"अनीता...तू..तू सच में बहुत सुंदर है।" मैं एकदम मंत्रमुग्ध सा हो कर बोला─"मैने पहले कभी तुझे इतना ध्यान से नहीं देखा।"
"न कर न ऐसी बात।" वो बुरी तरह शर्मा गई।
"अरे शर्मा क्यों रही है तू?" मैं मुस्कुराया─"तू न....मुझसे शर्माया न कर। जैसे मैं बिना शर्माए तुझसे हर बात कह देता हूं वैसे ही तू भी बिना शर्माए कह दिया कर।"
"नहीं कह सकती मैं।" उसने मुस्कुराते हुए कहा─"मुझे शरम आने लगती है...फिर मुझसे कुछ बोला ही नहीं जाता।"
"अच्छा...क्या सच में???" मुझे हैरानी हुई।
"हां...पता नहीं तुझे क्यों नहीं शर्म आती कुछ भी बोलने में?" वो फिर से लजाते हुए बोली।
"क्योंकि जो मेरे अंदर होता है उसे बोलने में मैं संकोच नहीं करता।" मैंने कहा─"अगर संकोच करता तो इस तरह खुल के तेरी तारीफ न करता...और...और जब तेरी तारीफ न करता तो तुझे अच्छा कहां लगता...बता भला?"
"हां ये तो तूने सही कहा।" अनीता ने कहा।
"मैं सब कुछ सही ही कहता हूं।" मैंने कहा─"और बिना संकोच के कहता हूं ताकि मेरी सुंदर और प्यारी बहन खुश हो जाए।"
"अच्छा...मेरी खुशी का इतना खयाल है तुझे?" अनीता तिरछी नजर से देख मुस्कुराई। इस बार उसके चेहरे पर वही अदा दिखी जो पहले भी कई बार दिखी थी।
"हां...बहुत ज्यादा खयाल है।" मैं थोड़ा उसके करीब सरका─"मेरा मन करता है कि तेरी खुशी के लिए पता नहीं क्या क्या कर डालूं।"
"क..क्या सच में???" अनीता की आँखें हैरानी से फैल गईं।
"हां...पता नहीं क्यों एकाएक मुझे लगने लगा है?" मैंने सोचने वाले अंदाज में सिर खुजाया─"पर सच यही कि मेरा मन यही करता है। क्या तेरा मन ऐसा कुछ नहीं करता?"
"प..पता नहीं।" अनीता बोली─"मैंने इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं।"
"वाह फिर तो बड़ी मतलबी है तू।" मैंने उसे घूरा─"मतलब मैं तेरे बारे में इतना सोचता हूं और तू मेरे बारे में कुछ नहीं सोचती?"
"न..नहीं नहीं...ऐसी बात नहीं है राजू।" वो एकदम से हड़बड़ा गई─"मैं...मैं भी सोचती हूं तेरे बारे में...पर तेरे जैसे नहीं...शायद मैं तेरे जितना समझदार नहीं हूं।"
ये कहते ही उसके चेहरे पर एकाएक मायूसी छा गई। जैसे उसे इस बात का अब अफसोस होने लगा हो।
"कोई बात नहीं।" मैंने उसका चेहरा थाम लिया फिर उसकी आंखों में देखते हुए बोला─"तुझे कुछ सोचने की जरूरत भी नहीं है। मैं चाहता हूं कि तू बस खुश रह...चल अब नहाते हैं।"
"नहीं राजू...मैं भी तेरी तरह सोचना चाहती हूं।" अनीता ने मासूमियत से कहा─"जैसे तू मेरे बारे में इतना कुछ सोचता है...मैं भी ऐसे ही तेरे बारे में सोचना चाहती हूं...पर मुझे समझ नहीं आता कि मैं कैसे सोचूं। तू ही बता...तू कैसे मेरे बारे में इतना कुछ सोच लेता है?"
उसके यूं मासूमियत से पूछने पर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मुझे उस पर बहुत ज्यादा प्यार आने लगा। जी किया कि झपट कर उसे अपने सीने से लगा लूं...पर हिम्मत न हुई।
"बता न राजू...कैसे सोच लेता है तू इतना कुछ?" उसने उसी मासूमियत से पूछा।
"मुझे खुद नहीं पता।" मैंने कहा─"बस वही करता हूं जो मेरा दिल कहता है...जो मैं तेरे लिए महसूस करता हूं।"
"तो...तो क्या महसूस करता है मेरे लिए?"
"देख मैं ढंग से इस बारे में कुछ नहीं बता सकता...क्योंकि मैं खुद नहीं जानता।" मैंने कहा─"पर हां इतना कह सकता हूं कि मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं। तू मेरी छोटी बहन है तो मेरा दिल यही कहता है कि मैं तुझे खूब प्यार और दुलार दूं। तेरा हर तरह से खयाल रखूं। ऐसा कुछ भी न करूं जिससे तुझे दुख हो या जिससे तेरे चेहरे पर उदासी आ जाए। बस...इतनी सी ही बात महसूस करता हूं मैं।"
मेरी बात खत्म होने पर अनीता कुछ न बोली। वो बस एकटक देखे जा रही थी मुझे। मेरी धड़कनें पहले से ही तेज तेज चल रहीं थी। अंदर कहीं उथल पुथल भी मची हुई थी।
"मुझे ज्यादा तो नहीं पता...पर गांव के दूसरे भाई बहनों को देख के जो समझ आया है उससे यही कह सकती हूं कि हमारे बीच जो प्यार है वैसा प्यार गांव के किसी भी भाई बहन के बीच नहीं देखा मैंने।" अनीता ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा─"मैं इतना जानती हूं कि भाई बहन में बहुत प्यार होता है लेकिन जिस तरह तू कर रहा है या जिस तरह मैं तुझसे कर रही हूं...वैसा शायद ही कोई करता होगा।"
"मतलब??" मैं अंदर ही अंदर चौंका─"तू ये क्या बोल रही है?"
"र..राजू...सुन...अब से पहले तक मैं यही समझती थी कि हमारे बीच जो प्यार है वो भाई बहन का ही है।" अनीता एकाएक कुछ ज्यादा ही गंभीर दिखने लगी─"मुझे इस बात से खुशी भी हो रही थी कि तू मुझसे झगड़ता नहीं है बल्कि अब प्यार करने लगा है। पर तेरी कुछ बातें मुझे अजीब भी लगती थीं। तुझसे कहती भी थी कि मुझे तेरी बातें समझ नहीं आती हैं। अब इस वक्त जब तू इतना कुछ बोल रहा था तो एकदम से मुझे ये लगने लगा कि हमारे बीच का ये प्यार भाई बहन वाला नहीं है....बल्कि...बल्कि शायद प्रे..प्रेमियों वाला है।"
"ये...ये क्या कह रही है तू??" मैं बुरी तरह उछल पड़ा। एकाएक ऐसा लगा जैसे मेरे सिर पर आसमान गिर पड़ा हो। धड़कनें जो अब तक तेज तेज चल रहीं थी वो एकदम रुक सी गईं।
"ह..हां राजू।" अनीता की आवाज लड़खड़ा गई─"मेरी सखी गुंजा अक्सर प्रेम के बारे में मुझे बताती थी। उस समय मुझे उसकी बातें समझ नहीं आती थीं...मगर अब समझ आ रही हैं। हां राजू...मुझे अच्छे से समझ आ रही हैं कि वो सच कहती थी। प्रेम सच में ऐसा ही होता है।"
"पता नहीं क्या क्या बोले जा रही है तू।" मैं बदहवास सा बोल पड़ा।
"मैं हैरान हूं कि तुझे इतनी सी बात कैसे समझ नहीं आई राजू?" अनीता ने कहा─"जबकि तू मुझसे उमर में बड़ा है। तुझे तो अब तक समझ जाना चाहिए था कि तू जो कुछ मेरे बारे में महसूस करता है वो हकीकत में एक बहन के लिए प्यार या स्नेह नहीं बल्कि एक प्रेमिका के लिए प्रेम है। मतलब....मतलब....तू मुझे अपनी बहन नहीं....प्रेमिका समझता है....है न???"
अंकिता की इस बात से मैं हतप्रभ सा रह गया। आश्चर्य से आँखें तो पहले ही फटी पड़ीं थी। धड़कनें तो पहले ही रुक गईं थी और अब ऐसा झटका लगा मानो अचानक की नदी के अंदर का तल मेरे पांवों के नीचे से गायब हो गया हो और मैं पलक झपकते ही नीचे पानी में डूबता चला जाने वाला हूं। मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला।
"न..नहीं..नहीं...ये सच नहीं है...ऐसा नहीं हो सकता।" मैं हैरान परेशान सा बोल पड़ा─"तू मेरी बहन है...मैं तुझे अपनी प्रेमिका कैसे समझ सकता हूं। नहीं नहीं...ये गलत है....गलत बात है अनीता। मैं तुझे बहन ही समझता हूं और....और हमारे बीच भाई बहन वाला ही प्यार है....है न....कह दे अनीता कि यही सच है...बोल..चुप क्यों है तू??"
"अब कुछ मत बोल राजू।" अनीता पीछे होते हुए बोली─"और न ही मुझसे कुछ पूछ। अगर तुझे इस बात का एहसास नहीं हो रहा तो अकेले में खुद सोच इस बारे में। तब शायद तुझे समझ आ जाए कि मैं सच कह रही हूं या झूठ।"
उसके बाद वो नहीं रुकी। नदी से बाहर निकल कर उसने फटाफट अपना गीला कुर्ता पहन लिया। पत्थर के पाट पर बैठ कर ही उसने थोड़ा बहुत खुद को भिगोया और फिर अकेले ही घर की तरफ जाने लगी।
मैं ठगा सा नदी के पानी में ही खड़ा रह गया था और अब उसे जाते देख रहा था। दिलो दिमाग में हड़कंप सा मच गया था। दिमाग ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। मैंने कल्पना तक नहीं की थी दो पल में ऐसा कुछ हो जाएगा। अनीता को इस तरह अकेले जाता देख मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर कुछ टूट गया हो। ऐसा लगा जैसे अब कुछ भी इस दुनिया में नहीं बचा। कुछ देर पहले तक उसके साथ में रहने से जो खुशी महसूस कर रहा था वो खुशी एकाएक गहरे दुख में बदल गई थी।
अजीब तो मुझे भी लगा करता था कभी कभी। मैं इस सबके बारे में सोचता भी था लेकिन प्रेम के ज्ञान से पूरी तरह परिचित नहीं था और शायद इसी लिए समझ भी नहीं पाया था कि हम दोनों के बीच जो प्यार है वो भाई बहन वाला है या प्रेमियों वाला।
मेरे देखते ही देखते अनीता मेरी आंखों से दूर चली गई और कुछ देर बाद मुझे नजर आना भी बंद हो गई। तब...अचानक मुझे होश आया और मैं हड़बड़ा गया। एकाएक अंदर से ऐसा एहसास हुआ कि अब जाने क्या कर डालूं खुद के साथ। मन में अपने लिए बड़े जोर का गुस्सा आने लगा था। अपने बाल नोचने का मन करने लगा था। नदी किनारे रखे पत्थर के पाट पर सिर पटकने का मन करने लगा था।
आखिर मैंने खुद को किसी तरह सम्हाला और अपने अंदर उठे तूफान को शांत करने लगा। मुझे कामयाबी तो नहीं मिली लेकिन फिर किसी तरह दो तीन डुबकी लगा कर नहाया और फिर नदी से बाहर आ गया। नदी किनारे रखे अपने कपड़े लिए और चल दिया घर की तरफ।
जारी है.....
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(08-06-2026, 10:41 PM)Rajan Raghuwanshi Wrote: Thanks bro for your beautiful feedback and appreciation.
Time ki bahut jyada shortness hai bro..is liye site visit nahi kar pata aur na hi story ki taraf dhyaan de pata. Well, socha yahi hai ki jab bhi story ka next update complete hoga to post kar diya karuga.
Sath banaye rakhe...
Don't worry... We will wait
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भाग ~ २१
सारे रास्ते मैं अनीता की बातों के बारे में ही सोचता आया था और अब मुझे भी एहसास होने लगा था कि उसने सच कहा था। मतलब सच में हमारे बीच का प्यार भाई बहन वाला नहीं बल्कि प्रेमियों वाला था। मुझे समझ आ गया था कि क्यों अनीता से बातें करने पर मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो जाती थीं। जाहिर है...मैं भले ही पूरी तरह उस एहसास से परिचित नहीं था लेकिन सीने के जिस हिस्से में प्रेम और नफरत का ही जन्म होता है वो तो पहले ही उस चीज का एहसास कर चुका था। उसने इस एहसास को मुझे जताया भी होगा मगर मैं नासमझ था जो नजरअंदाज कर गया और उसे ठीक से समझ नहीं पाया था।
खैर अब भला क्या हो सकता था? इंसान अपने भाग्य...नसीब..या नियति के खिलाफ भला कैसे जा सकता है। उसमें इतना सामर्थ्य ही नहीं है कि वो विधाता की इच्छा के विरुद्ध जाने का सोच भी ले।
अब जबकि मैं समझ चुका था कि ये प्रेमियों वाला ही प्यार है तो बड़ा अजीब महसूस होने लगा था मुझे। बार बार खुद से यही कहता कि ऐसा कैसे कर सकता हूं मैं। अनीता मेरी छोटी बहन है....फिर भी वो इस बात को मुझसे पहले समझ गई और मैं समझ न सका था। जाने क्या सोच रही होगी अब वो मेरे बारे में? वो एकाएक नदी से बाहर चली गई थी...इसका मतलब यही हुआ कि अब वो मेरे करीब नहीं रहना चाहती है। या ये कहें कि वो मेरी प्रेमिका नहीं बनना चाहती है। मां की कोख से जन्म लेने पर जो रिश्ता हमारे बीच बन गया था वो उसी रिश्ते को बनाए रखना चाहती है।
यही सब सोचते हुए मैं घर पहुंचा। घर में दाखिल होते ही एकाएक मुझे अजीब सा एहसास होने लगा। धड़कनें ये सोच कर तेज हो गईं कि अब अनीता के सामने कैसे जाऊंगा? उससे नजरें कैसे मिलाऊंगा? उससे बात कैसे कर सकूंगा? मेरे जैसा ही हाल उसका भी तो होगा।
मैं धड़कते दिल के साथ चुपचाप आंगन से होते हुए कमरे में चला गया। दिलो दिमाग में फिर से तूफान खड़ा हो गया था जिसे काबू करने का प्रयास करते हुए मैं तेल कंघी कर के कपड़े पहनने लगा था। इस बीच कई बार मेरे मन में खयाल आया कि अनीता के पास जाऊं...उससे इस बारे में बात करूं मगर जाने क्यों अनीता के पास जाने की हिम्मत न हुई।
इस सबके बीच कई बार ऐसा हुआ कि मैं बहुत ज्यादा दुखी हुआ और मेरी आंखों में आंसू भर आए। ऐसा शायद इस लिए कि जो कुछ हुआ था उससे भाई बहन के रिश्ते की जीत हुई थी और अंदर का प्रेम या प्रेमी वाला रिश्ता जो अंजाने में खुद ही बनता जा रहा था वो एक ही पल में टूट गया था। अब क्योंकि दिलो में कोमल जज़्बात पलते हैं तो जब जज़्बात आहत होते हैं तो पीड़ा होना स्वाभाविक ही है। यही वजह थी कि मैं दुखी हो जाता था और मेरी आंखों में आंसू भर आते थे।
कपड़े पहन कर मैं कमरे से बाहर निकला। आंगन में पहुंचा तो अनायास ही मेरी नजर रसोई में खाना बना रही अनीता पर पड़ गई। उसे देखते ही दिल धक्क से रह गया। अंदर का तूफान तेज हो गया। शायद उसे भी मेरे वहां पर होने का एहसास हो गया था इस लिए न चाहते हुए भी वो एक नजर मुझे देखने के लिए मजबूर हो गई थी।
हमारी नजरें मिलीं तो मेरे जज्बात मचल उठे। अंदर एक हूक सी उठी जिसके कारण मेरा पूरा बदन हिल सा गया। तभी उसने अपनी नजरें फेर ली। मुझे ऐसा लगा जैसे खिले हुए गुलिस्तां में अचानक खिजां(पतझड़) ने अपनी दृष्टि डाल दी हो।
मेरा दिल पूरा जोर लगा के कह रहा था कि मैं रसोई में उसके पास जाऊं और उससे बात करूं लेकिन दिमाग मुझे जाने की इजाजत नहीं दे रहा था। अंदर से वो साहस ही नहीं हो रहा था कि मैं उसके पास जाऊं मगर....जज्बात जब प्रबल रूप धारण कर लेते हैं तो इंसान मजबूर हो जाता है। वही मेरे साथ हुआ।
मैं धड़कते दिल के साथ रसोई की तरफ बढ़ चला। उधर अनीता को भी पता चल गया कि मैं उसी की तरफ आ रहा हूं। उसने कनखियों से एक बार मेरी तरफ देखा। उसके हाव भाव में बदलाव साफ नजर आया। ऐसा लगा जैसे अचानक ही उसे मुझसे संकोच अथवा घबराहट होने लगी हो।
"तु..तुझसे बात करना है मुझे।" रसोई के पास पहुंचते ही मैंने हिम्मत कर के उससे कहा।
"प..पर मुझे नहीं करना।" उसने दो टूक लहजे में कहा─"तू...तू चला जा यहां से।"
"वाह...कितना जल्दी बदल गई न तू।" उसके बर्ताव से मुझे दुख हुआ─"दो ही पल में भाई बहन का प्यार भूल गई तू।"
"वो..वो भाई बहन का प्यार नहीं है।" उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा─"क्या अभी तक तुझे समझ नहीं आया है?"
"तू तो जानती है कि मैं बुद्धू हूं।" मैंने रसोई के पास ही खड़े खड़े कहा─"थोड़ा देर से समझ आया..पर हां समझ आ गया है...तो क्या??"
"तो...तो..क्या??" उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा─"तू सोच भी कैसे सकता है ऐसा?"
"मैंने तो ऐसा कुछ नहीं सोचा।" मैंने कहा─"पहले मुझे पता ही नहीं था मगर अब समझ आ गया है इस लिए ऐसा सोचने का सवाल ही नहीं है लेकिन...।"
उसने सवालिया निगाह से देखा मुझे।
"लेकिन क्या इससे भाई बहन के बीच का प्यार मिट जाएगा?" मैंने कहा─"तू अच्छे से जानती है कि हम दोनों ही प्रेमी वाले प्रेम के बारे में कुछ नहीं जानते थे। इसके बावजूद एक दूसरे से प्रेम तो कर रहे थे न...यही समझ कर कि हमारा ये प्यार भाई बहन वाला है? क्या मैंने या तूने कभी ये खुल के कहा है कि हम दोनों प्रेमी हैं...नहीं न? तो फिर कैसे अचानक हमारे बीच इस तरह का मन मुटाव पैदा हो सकता है?"
"मुझे पता है कि तू सही कह रहा है।" उसने चूल्हे में टंगी दाल की गंजी के मुंह को कटोरी से बंद करते हुए कहा─"लेकिन सच का पता चल जाने के बाद क्या तुझे लगता है कि अब हमारे बीच भाई बहन वाला प्यार हो सकता है? पहले हम दोनों भले ही इस बारे में नहीं जानते थे लेकिन वो प्यार प्रेमियों वाला ही था न। इस सच के उजागर हो जाने से भी तो वैसा ही प्रेम चलने लगेगा। क्या तुझे लगता है कि अचानक से अब उस तरह का प्यार मिटा कर हम भाई बहन वाला प्यार रख पाएंगे?"
"तू पता नहीं क्या क्या सोच रही है।" मैंने कहा─"अरे ये सब कुछ नहीं है अनीता। किसी के कुछ कह देने से थोड़ी न कोई बात मान्य हो जाती है। लोग कितना दूसरों को गंदी गंदी गालियां देते हैं...तो क्या गालियां देने से सामने वाला वैसा ही बन जाता है। मादरचोद कह देने से क्या सामने वाला सच में मादरचोद बन जाता है? बहिनचोद की गाली देने से क्या सामने वाला सच में बहिनचोद बन जाता है???"
"राजू...कैसी गंदी गंदी बातें कर रहा है तू?" अनीता मेरे मुख से गालियां सुन के असहज हो गई─"कुछ तो शर्म कर।"
"मैं ऐसी गालियों का नाम ले कर बस एक उदाहरण दे रहा हूं अनीता।" मैंने कहा─"मैं तुझे समझा रहा हूं कि किसी के कुछ कह देने से कोई बात मान्य नहीं हो जाती। उसी तरह हम भले ही अब जान गए हैं कि हमारा वो प्यार प्रेमियों वाला था तो उससे हम सच में प्रेमी प्रेमिका नहीं बन जाएंगे। हम भाई बहन थे और भाई बहन ही रहेंगे...इस हकीकत को न तू...न मैं और न ही कोई और बदल सकता है। इस लिए इस बारे में हम दोनों को बेकार में कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोचना चाहिए।"
अनीता कुछ न बोली। कुछ पलों तक मुझे अपलक देखती रही फिर वापस रोटी सेंकने लगी।
"देख..मैं तो कुछ नहीं सोच रहा।" मैंने पुनः कहा─"तू भी मत सोच....बस यही सोच के जैसे अब तक हम अंजान बने रहे थे वैसे ही आगे भी बने रहते हैं। कम से कम इससे हमारे भाई बहन के बीच का प्यार तो बना रहेगा। वरना खुद सोच कि ऐसा न होने पर क्या होगा? याद कर...कल रात मां हमारे इस प्यार के बारे में सुन के कितना खुश हो गई थी। ऊपर वाले को धन्यवाद दे रही थी वो। ये भी कहा था उसने कि अब से हम ऐसे ही एक दूसरे के साथ मिलजुल के रहें। अब अगर हम अचानक फिर से पहले जैसा बर्ताव करने लगेंगे तो सोच मां को कितना धक्का लगेगा।"
"अ..और अगर मां को ये पता चल गया कि हमारा प्यार प्रेमियों जैसा है तो??" अनीता ने कहा─"अगर मां को पता चल गया कि वो जैसा समझती है वैसा नहीं है तो??"
"यार मां को कैसे पता चल जाएगा भला?" अनीता को वापस सामान्य होता देख मैं अंदर ही अंदर थोड़ा खुश हुआ─"और वैसे भी दूसरा कोई ये सोच ही नहीं सकता कि हमारे बीच इस तरह का...मतलब प्रेमियों वाला प्यार हो सकता है...या हम प्रेमी प्रेमिका हो सकते हैं। हर कोई इसी सच को मानेगा कि हमारा प्यार भाई बहन वाला ही है। न तू किसी को बताएगी और न ही मैं...फिर कैसे भला कोई ये जान सकेगा?"
"अ...और वो जो...हम ऐसे नहाते हैं उसका क्या??" अनीता ने मासूम सी शक्ल बना के पूछा।
"मतलब???"
"म..मतलब मैं तेरे सामने अपना कुर्ता उतार के नहाने लग जाती हूं।" अनीता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा─"ऐसा भी तो भाई बहन के बीच नहीं होता न तो उसका क्या??"
"ये तेरी इच्छा पर निर्भर करता है कि तुझे कैसे नहाना है मेरे सामने।" मैंने कहा─"अगर तुझे लगता है कि मेरे सामने तेरा कुर्ता उतार के नहाना गलत है तो मत नहा ऐसे। मैं तुझसे पहले ही बोल चुका हूं कि मैं तुझे किसी बात के लिए मजबूर नहीं करूंगा..क्योंकि मैं तुझे...मतलब अपनी बहन को बहुत प्यार करता हूं। मैं बस तुझे खुश देखना चाहता हूं।"
अनीता अपलक देखने लगी मुझे। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि क्या मैं फिर से प्रेमियों जैसा प्यार दिखाने लगा हूं या ये सिर्फ भाई वाला प्यार है।
"यार...कितना सोचती है तू।" मैंने कहा─"मत सोच न कुछ। क्यों बेमतलब हमारे बीच दूरियां बनाने पर तुली है? प्यार भाई बहन का हो या प्रेमियों वाला...प्यार तो प्यार ही होता है न। कोई बात गलत तब होती है जब वो रिश्ते की मर्यादा को पार कर के की जाए। तू खुद सोच...क्या हमने कभी कुछ गलत किया है...क्या हमने रिश्ते की कोई मर्यादा तोड़ी है?"
"हां...ऐसा तो हमने कभी नहीं किया।" अनीता ने धीरे से कहा─"पर मैंने तेरे सामने कुर्ता भी तो उतारा है। क्या ऐसा कोई बहन अपने भाई के सामने करती है? ये भी तो गलत ही है न?"
"अगर ये तुझे सच में गलत लगता है तो अब से तू मेरे सामने मत उतारना अपना कुर्ता।" मैंने कहा─"मैं वैसे भी तुझे किसी बात के लिए मजबूर करने का नहीं सोच सकता। मैं सिर्फ तेरी खुशी चाहता हूं। बाकी गलत सिर्फ कुर्ता उतार देने बस से नहीं हो जाता बल्कि किसी बात को गलत तब माना जाता है जब किसी की इच्छा के बिना हम कोई गलत काम करने लग जाएं। या किसी के साथ कोई जोर जबरदस्ती करने लगें....गलत इसे कहा जाता है। अगर कोई अपनी इच्छा से...खुशी से कुछ भी करे और सामने वाला भी उसकी खुशी का सम्मान कर के उसका साथ दे तो वो गलत नहीं होता। आदमी की नीयत साफ होनी चाहिए अनीता....आदमी के इरादे गंदे नहीं होने चाहिए।"
"ठीक है अब तू जा।" अनीता ने कहा─"मुझे सोचने दे इस बारे में।"
मैंने भी इस वक्त उस पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं समझा इस लिए वहां से चल पड़ा और बरामदे में रखी खाट पर लेट गया।
इतनी सारी बातों के बाद इतना तो हो गया था कि वो मुझसे बातें करने लगी थी और हम थोड़ा सहज हो गए थे। उसके बर्ताव ने मुझे ये भी एहसास करवा दिया था कि वो मुझसे नाराज नहीं है और हमारे बीच जो भी बातें हुई हैं उनके बारे में सोच कर निश्चित ही वो पूरी तरह सामान्य हो जाएगी। उसके बाद शायद फिर से हमारे बीच सब कुछ ठीक हो जाएगा और हम फिर से वैसे ही हंसी खुशी एक दूसरे के साथ रहने लगेंगे जैसे इन दो दिनों से रहते आए हैं।
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कुछ देर में मां बापू आ गए थे।
उसके बाद ऐसा कोई मौका नहीं मिला जिससे मैं अनीता से बात कर सकूं। मुझे थोड़ी चिंता तो थी लेकिन अब इस बात का भरोसा भी था कि जल्द ही हम दोनों फिर से पहले जैसे घुल मिल जाएंगे।
घर के बाहर नीम के पेड़ के पास चारपाई पर लेटा मैं इसी सब के बारे में सोच रहा था कि सहसा तभी मुझे मंजू काकी का खयाल आ गया।
मुझे याद आया कि सुबह के वक्त उनसे क्या क्या बातें हुई थीं। मेरे समूचे जिस्म में ये सोच के झुरझुरी दौड़ गई कि वो मुझसे एक बेटा चाहती हैं। महज बेटे की चाह के लिए ही उन्होंने मझले काका के कहने पर मेरे बापू से अनैतिक अथवा अवैध संबंध बनाया था।
मैं सोचने लगा कि इस दुनिया में इंसान क्या क्या कर गुजरता है। कभी अपनी खुशी से तो कभी मजबूरी से। मंजू काकी भी एक बेटे के लिए मजबूर थी, तभी तो वो इस हद तक गुजर गईं थी और अभी आगे भी गुजर जाने का सोचे बैठी थीं।
मुझे याद आया कि इसके लिए मैंने उनसे सोचने के लिए समय मांगा था। इसका मतलब मुझे सचमुच इस बारे में सोचना होगा और फिर उन्हें बताना होगा कि मैं उनकी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूं या नहीं।
अगले ही पल मैं सचमुच सोचने लगा कि मुझे क्या करना चाहिए? क्या सच में काकी की इच्छा पूरी करने के लिए मुझे उनके साथ वही सब करना चाहिए जो एक पति अपनी पत्नी के साथ करता है? इस खयाल ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी दौड़ा दी। मेरी धडकनें भी थोड़ा तेज हो गईं। मन में अजीब अजीब से खयाल आने लगे।
एकाएक मैंने सोचा कि कहीं वो मुझे किसी मुसीबत में तो नहीं फंसा देना चाहती हैं? मतलब कि हो सकता है कि वो मुझे इस तरीके से फंसा कर एक तरह से हमेशा के लिए मेरा मुंह बंद करा देना चाहती होंगी। ऐसा इस लिए क्योंकि उनकी कमजोरी और उनकी पोल पट्टी मैं जानता हूं जिससे वो हमेशा यही सोच के डरी हुई रहेंगी कि कहीं किसी दिन मैं उनका ये राज किसी को बता न दूं। ऐसे हालात से बचने का उनके पास फिलहाल यही एक उपाय हो सकता है कि वो मुझे भी ऐसे किसी जाल में फांस लें। ताकि मेरी कमजोरी भी उनके हाथ लग जाए और उनकी तरह मैं भी किसी के सामने अपना ये राज खुल जाने के डर से मुंह बंद किए रहूं।
मुझे अपना ये खयाल काफी हद तक जंचा लेकिन तभी मैं ये भी सोचने लगा कि क्या सचमुच ऐसा ही हो सकता है? मतलब कि क्या सच में वो मुझे किसी मुसीबत में डाल देना चाहती हैं? ऐसा भी तो हो सकता है कि वो सचमुच बेटे की चाह में पहले भी बापू से अवैध संबंध बना रहीं थी और अब मुझसे बनाना चाहती हैं।
अगर ऐसा न होता तो मुझे किसी जाल में फांसने के लिए उन्हें इस हद तक गिरने की क्या जरूरत थी? मतलब वो किसी और तरीके से भी तो मुझे किसी मुसीबत में फांस सकती थीं जिससे मैं अपना मुंह बंद किए रहता। इसके बावजूद अगर वो मेरे साथ इस हद तक जाना चाहती हैं तो साफ है कि उन्होंने बेटे की चाह का जो भावुक किस्सा सुनाया था वो सच ही था। यानी सचमुच उन्हें और काका को एक बेटा चाहिए।
चारपाई पर पड़े पड़े मैंने एक गहरी सांस ली और सोच लिया कि मुझे क्या करना है। मैंने फैसला कर लिया कि मैं मंजू काकी को अपने बेटे की मां बनाऊंगा। मुझे बखूबी एहसास था कि ये कदम बड़ा ही जोखिम भरा है लेकिन कहीं न कहीं मेरे अंदर ये चाह भी थी कि किसी औरत के साथ चुदाई करने में किस तरह का मजा मिलता है? अपने मित्रों से बहुत किस्से सुने थे मैंने लेकिन अब इसमें मिलने वाले मजे का अनुभव करना चाहता था मैं।
मंजू काकी को चोदने का सोच कर ही जिस्म में रोमांच की लहर दौड़ने लगी। धडकनें अलग ही अंदाज में धड़कने लगीं। एकाएक ही अंदर तीव्र इच्छा होने लगी कि फटाफट मंजू काकी के पास पहुंच जाऊं और मझले काका की तरह उनको चोदना शुरू कर दूं। ये सोचते हुए अनायास ही मेरा हाथ मेरे लन्ड पर पहुंच गया। अगले ही पल मैं ये महसूस कर के चौंक पड़ा कि मेरा लन्ड एकदम से खड़ा है।
मैं हड़बड़ा कर उठा और इधर उधर नजरें घुमाई। आस पास कोई नहीं था। घर के खुले दरवाजे के पार खाली आंगन दिखा तो मैंने ये सोच कर राहत की सांस ली कि किसी ने मेरे खड़े लन्ड के उभार को नहीं देखा।
चारपाई पर वापस लेट कर मैं सोचने लगा कि क्या करूं? बार बार यही इच्छा हो रही थी कि मंजू काकी के घर जाऊं मगर वहां मझले काका भी होंगे और उनकी दोनों बेटियां भी जिसकी वजह से ऐसा कुछ होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
कुछ देर इसी बारे में सोचते सोचते जब मुझसे न रहा गया तो मैं एक झटके से उठ बैठा। एक बार पलट कर घर के खुले दरवाजे पर नजर डाली और फिर चारपाई से उतर कर मंजू काकी के घर की तरफ चल पड़ा। दिल की धड़कनें एकाएक ही तेज तेज चलने लगीं थी। मन में तरह तरह के विचार उभरने लगे थे।
कुछ ही देर में मैं मझले काका के घर के बाहर पहुंच गया। दोपहर के वक्त ज्यादातर लोग घर के अंदर ही होते थे या फिर अपने खेतों पर। जैसे ही मैंने सड़क से उतर कर मझले काका के घर की तरफ मुड़ा तो मेरी धडकनें और भी ज्यादा तेज तेज चलने लगीं।
मन में अब ये सवाल उठने लगे कि क्या मझले काका घर पर ही होंगे? मतलब हो सकता है कि वो खा पी कर खेत तरफ चले गए हों। हवा चल रही थी तो ओसाने का काम आसानी से हो सकता है। मैं यही दुआ कर रहा था कि मझले काका खेत तरफ ही चले गए हों। फिर खयाल आया कि उनकी दोनों बेटियां भी तो घर में ही होंगी। वैसे तो सुनीता और रानी अभी छोटी थीं लेकिन फिर भी उनकी मौजूदगी में इस तरह का कोई काम करना ठीक नहीं था।
अभी मैं घर के दरवाजे के पास ही पहुंचा था कि तभी मझले काका एकदम से दरवाजा खोल कर बाहर निकले। एक पल के लिए तो मैं उन्हें ऐसे निकल आया देख चौंक ही पड़ा था लेकिन फिर जल्दी ही खुद को सम्हाल लिया।
"अरे...करेजा तू यहां??" काका ने मुझे देखते ही एकदम से कहा─"क्या खेत तरफ जाने वाला है तू?"
"वो..वो काका मैं...।"
"नहीं नहीं, अभी बहुत तेज धूप है।" मेरी बात पूरी होने से पहले ही वो बोल पड़े─"अभी तेरा खेत तरफ जाना ठीक नहीं है। बड़ी जोर की लू बह रही है। ऐसे में तुझे लू लग गई तो बीमार हो जाएगा। एक काम कर थोड़ी देर अंदर जा कर आराम कर ले। बाद में अपनी काकी को ले कर आ जाना, ठीक है?"
"ठी..ठीक है काका।" मैं उनकी इस बात से मन ही मन बड़ा खुश हो गया।
"अच्छा, मैं जा रहा हूं।" फिर उन्होंने कहा─"आज हवा बढ़िया चल रही है इस लिए गेहूं ओसाने में सहूलियत होगी।"
उनकी बात पर मैंने सिर हिलाया। उसके बाद जैसे ही वो बाहर तरफ चल पड़े तो मैं भी पलट कर दरवाजे से अंदर की तरफ चल पड़ा। मन में यही खयाल था कि अच्छा हुआ काका के रूप में एक बाधा टल गई। अब मुझे सिर्फ सुनीता और रानी की ही चिंता थी। मैं दुआ करने लगा कि काश उनका भी कोई ऐसा इंतजाम हो जाए जिससे मंजू काकी के साथ खुल कर कुछ भी करने में आसानी हो जाए।
जारी है...........
It's Rajan 
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Sorry dear friends job me workload zyada hai is liye update likhne ka time hi nahi milta. Anyway jaise hi time milega update post karne ka try karuga
It's Rajan 
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