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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
(15-05-2026, 02:29 PM)Hotgiri Wrote: If you pics and gif for each sexual act it will attract reader to story, your doing great job but add pic and gif more

Agree…..
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Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
Waiting…..
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Seems this story got over..
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Thats greattt.. now everyone lost interest in the story.. such big gap of update wont wirk…
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(10-05-2026, 03:00 PM)Progga Sarkar Wrote: Nice update

(10-05-2026, 05:29 PM)Shabaz123 Wrote: Awesome bhai excellent update

(11-05-2026, 02:04 AM)Rizzi1198 Wrote: Fabulous wonderful update

(13-05-2026, 09:18 PM)anushka Wrote: Update please….

(15-05-2026, 02:22 PM)anushka Wrote: Please share a big update in all of your 3 stories.. as weekend is coming.. make it weekend special.. waiting for big update with more gifs and pics alongwith exciting story

(15-05-2026, 02:29 PM)Hotgiri Wrote: If you pics and gif for each sexual act it will attract reader to story, your doing great job but add pic and gif more

(15-05-2026, 05:47 PM)BHOG LO Wrote: SHER

UPDATE PLEASE

(16-05-2026, 02:08 PM)anushka Wrote: Waiting…..

(21-05-2026, 07:59 AM)anushka Wrote: Seems this story got over..

(22-05-2026, 09:37 PM)anushka Wrote: Thats greattt.. now everyone lost interest in the story.. such big gap of update wont wirk…

Thanks For Your comments, likes, and feedback.  I am working on the next update. I was super busy last week. Hope to give one in a day or two. In the meantime, enjoy the update that I have given on one of my other stories. Link is in signature
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



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खौफ और साजिश
 
शाम के साये गहरे हो रहे थे, और शेर के दिल की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं। किचन में बर्तनों को साफ करते हुए उसके हाथ कांप रहे थे। उसका दिमाग चारों तरफ दौड़ रहा था, पर उसे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।
 
शेर रह-रहकर दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ देख रहा था। टिक-टिक करती सुइयां उसे चिढ़ा रही थीं।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'धत् तेरे की! सूरज ढल रहा है और मेरे पास अभी तक कोई तोड़ नहीं है। अगर कल सुबह मेमसाब उस डॉक्टर के पास पहुँच गईं, तो मेरा खेल खत्म है। वो खून की जाँच... वो रिपोर्ट... साला सीधा फांसी का फंदा है मेरे लिए।'
 
शेर [मन ही मन - गुस्से में]: 'मुझे उन्हें रोकना ही होगा। पर कैसे? अगर मैं बीमार होने का नाटक करूँ, तो वो गार्ड को भेज देंगी। अगर मैं फिर से उनके खाने में कुछ मिलाऊँ, तो वो शक करेंगी। उन्हें घर में कैद करने का कोई तो तरीका होगा... कोई ऐसी आफत जो उन्हें दहलीज लांघने न दे।'
 
शाम के 7 बज चुके थे, लेकिन शेर का शातिर दिमाग इस बार खाली हाथ था। वह हताशा में अपने बाल नोंचने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेमसाब का भरोसा दोबारा कैसे जीते और उस अपॉइंटमेंट को कैसे रद्द करवाए।
 
उधर अपने बेडरूम में, मीरा खिड़की के पास खड़ी होकर ढलते सूरज को देख रही थी। पिछले 24 घंटों से शेर ने उसे दवा की कोई नई खुराक नहीं दी थी, जिसकी वजह से उसके शरीर पर चढ़ा वह धुंधला सा नशा अब छंटने लगा था।
 
उसका जिस्म अब 80% सामान्य महसूस कर रहा था। वह जो बेतहाशा उत्तेजना और सुलगती हुई प्यास थी, वह अब मद्धम पड़ चुकी थी। जैसे-जैसे नशा उतर रहा था, मीरा की याददाश्त और भी साफ़ होने लगी थी।
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'अजीब है... अब मुझे वह बेचैनी महसूस नहीं हो रही। मेरा शरीर अब ठंडा पड़ रहा है।'
 
मीरा ने ठंडी सांस ली। दवा का असर कम होते ही उसके अंदर की नैतिकता फिर से जागने लगी। उसे कल रात के वे धुंधले पल याद आए—शेर का स्पर्श, उसकी वहशी बातें। अब उसे उन यादों से उत्तेजना नहीं, बल्कि गहरी घृणा और सिहरन महसूस हो रही थी।
 
मीरा [मन ही मन]: 'कल रात जो कुछ भी हुआ, वह भयानक था। भले ही शेर को लगा हो कि वह किसी चोरनी के साथ था, पर उसने जो शब्द इस्तेमाल किए... "काश मैं देख पाता"... वह डरावना है। मुझे कल सुबह हर हाल में डॉक्टर के पास जाना ही होगा। मुझे जानना है कि मेरे साथ क्या हो रहा है।'
 
रात गहराने लगी थी। सरताज घर लौट आए थे और डाइनिंग टेबल पर खाना लग चुका था।
 
शेर लंगड़ाते हुए खाना परोस रहा था, लेकिन उसका चेहरा पसीने से तर था। उसे पता था कि यह उसकी आख़िरी रात हो सकती है।
 
उसने देखा कि मीरा अब काफी सामान्य दिख रही थी।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'मेमसाब के चेहरे की ये चमक... ये मेरे लिए मौत का पैगाम है।
 
शेर ने मेमसाब की तरफ एक नज़र डाली, जो कल सुबह क्लिनिक जाने के बारे में सरताज से बात कर रही थीं।
 
मीरा: "सरताज, कल सुबह मुझे थोड़ा क्लिनिक जाना है। मैंने डॉक्टर से मिलने का समय ले लिया है।"
 
सरताज [चिंता जताते हुए]: "क्लिनिक? क्यों मीरा, सब ठीक तो है ना? तुम्हारी तबीयत तो खराब नहीं है?"
मीरा [बात को संभालते हुए मुस्कुराकर]: "हाँ, सब ठीक है। आप फिक्र मत कीजिए, बस एक रूटीन चेकअप के लिए जा रही हूँ। वो प्रेगनेंसी वाली दवाइयाँ चल रही हैं ना, तो डॉक्टर ने एक बार बुलाया है।"
 
अगली सुबह सूरज तो निकला, पर शेर की किस्मत के अंधेरे अभी छंटे नहीं थे। सरताज ऑफिस जा चुके थे और घर में खामोशी थी। शेर की पूरी रात जागते हुए कटी थी, उसका दिमाग बुरी तरह थक चुका था, फिर भी मीरा के डॉक्टर अपॉइंटमेंट को रोकने का कोई रास्ता उसे नहीं सूझा था।
 
तभी, उसकी नज़र बाहर गई। मीरा की छोटी बेटी, ज्योति, गेट के पास कॉलेज बस का इंतज़ार कर रही थी। बस अभी आई नहीं थी, और बच्ची अपनी ही धुन में सड़क के किनारे एक तितली के पीछे भागते हुए खेलने में मग्न थी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि वह गेट से बाहर सड़क की तरफ बढ़ रही है।
 
शेर [मन ही मन]: "धत् तेरे की! पूरी रात निकल गई पर मेमसाब को उस डॉक्टर के पास जाने से रोकने की कोई तरकीब दिमाग में नहीं आई। अगर वो क्लिनिक चली गईं और रिपोर्ट में कुछ आ गया, तो मेरा सारा खेल बिगड़ जाएगा।"
 
मीरा दरवाजे पर खड़ी थी, उसने अपनी वह नीली नाइटगाउन पहनी हुई थी। वह चाय की चुस्कियाँ लेते हुए एक आँख से ज्योति पर नज़र रखे हुए थी, पर उसे भी खतरे की गंभीरता का अहसास नहीं था।
 
तभी शेर लंगड़ाने का नाटक करते हुए धीरे-धीरे मीरा के पास आया और बेहद तमीज़ से सर झुकाकर खड़ा हो गया।
 
शेर: "प्रणाम मेमसाब। आज मौसम काफी अच्छा है ना? सुबह-सुबह ठंडी हवा चल रही है।"
 
मीरा [चाय की चुस्की लेते हुए बाहर की तरफ देखकर]: "हाँ शेर, मौसम तो वाकई आज बहुत अच्छा है। धूप भी अभी हल्की है।"
 
शेर [जानकारी लेने के इरादे से]: "जी मेमसाब, बहुत बढ़िया दिन है। वैसे आप डॉक्टर के पास कब जा रही हैं? अगर कहें तो निकलने से पहले आपका नाश्ता बना दूँ? खाली पेट जाना ठीक नहीं होगा।"
मीरा: "बस, ज्योति की कॉलेज बस आ जाए, उसे भेजकर मैं तैयार होने जाऊँगी। तुम नाश्ता तैयार करो, मैं आधे घंटे में..."
 
मीरा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि तभी दूर से एक तेज़ रफ्तार कार आती दिखाई दी। शेर ने यह मंज़र देखा। उसके पास पूरा मौका था कि वह चिल्लाकर ज्योति को आगाह कर दे या कार के पास आने से पहले ही उसे दौड़कर खींच ले। लेकिन उसके शैतानी दिमाग ने एक पल में बाजी पलट दी। वह चुपचाप खड़ा रहा, मौत और जिंदगी के उस फासले को कम होते देखकर देखता रहा।
 
शेर [मन ही मन]: "हाँ, आने दो... गाड़ी को और पास आने दो। मेमसाब अपनी चाय में खोई रहीं और वो बच्ची तितली के पीछे भागती रही। जैसे ही गाड़ी करीब आएगी, मैं ऐन वक्त पर कूदकर रक्षक बन जाऊँगा। इस बच्ची को थोड़ी चोट लगेगी तो डॉक्टर का अपॉइंटमेंट अपने आप कैंसिल हो जाएगा, और मेरा रास्ता साफ हो जाएगा!"
 
जैसे ही कार बिल्कुल करीब आई, शेर चीखते हुए झपटा।
 
शेर [दहाड़ते हुए]: "छोटी मेमसाब! हटिए!"
 
बिल्कुल आख़िरी सेकंड में, शेर ने ज्योति को अपनी गिरफ्त में लिया और अपनी ओर छलांग लगाकर उसे खींच लिया। कार सनसनाते हुए उनके ठीक बगल से निकल गई, पर सड़क पर ज़ोर से गिरने की वजह से दोनों ज़ख्मी हो गए।
 
ज्योति के पैरों से खून बहने लगा; हालाँकि वे सिर्फ खरोंचें थीं, पर वह डर के मारे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। लेकिन शेर की हालत इस बार वाकई खराब थी। वह कंक्रीट पर इस तरह गिरा था कि उसके पैरों से खून की धार निकल पड़ी।
 
मीरा के हाथ से चाय का कप छूटकर गिर गया। वह बदहवास होकर चिल्लाई, "ज्योति! शेर!"
 
मीरा  पागलों की तरह दौड़ती हुई सड़क की ओर भागी। उसका दिल हलक को आ गया था।
 
वह दौड़ती हुई सड़क पर आई। उसने देखा कि शेर दर्द से तड़प रहा था, लेकिन फिर भी उसने ज्योति को अपने सीने से लगा रखा था।
 
शेर [कराहते हुए और नाटक करते हुए]: "मेमसाब... देखिए... छोटी मेमसाब ठीक तो हैं? मुझे... मुझे कुछ भी हो जाए... पर इन्हें खरोंच नहीं आनी चाहिए थी... मैं मर भी जाता तो..."
 
उसने तड़पकर अपनी बेटी को गोद में उठा लिया।
 
मीरा [रोते और हाँफते हुए]: "ज्योति! मेरी बच्ची! तुम ठीक तो हो ना? कहाँ चोट लगी है बेटा? ओ गॉड, यह क्या हो गया!"
 
ज्योति डर के मारे मीरा के गले से लिपट गई और हिचकियाँ लेते हुए रोने लगी। मीरा ने राहत की साँस ली कि उसकी बेटी की जान बच गई थी, लेकिन तभी उसकी नज़र ज़मीन पर तड़प रहे शेर पर पड़ी।
 
शेर का पैर कंक्रीट के नुकीले किनारे से टकराया था, और वहाँ से गाढ़ा लाल खून सड़क पर बहकर फैल रहा था। वह दर्द से कराह रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर कुटिल संतोष था।
 
मीरा [आँखों में आँसू लिए, घबराहट में]: "शेर! तुम... तुमने अपनी जान दांव पर लगा दी। देखो तुम्हारा पैर... कितना खून बह रहा है! गार्ड! कोई है? जल्दी आओ!"
 
मीरा ने खून से लथपथ शेर को देखा। उसके मन में शेर के प्रति जो घृणा और शक पैदा हो रहा था, वह इस 'बलिदान' को देखकर एक पल में मिट्टी में मिल गया। उसकी आँखों में आंसू आ गए।
 
मीरा [कांपती आवाज़ में]: "शेर! तुमने... तुमने अपनी जान की परवाह नहीं की? तुम पागल हो क्या? देखो कितनी चोट आई है!"
 
मीरा का दिल पिघल चुका था। उसे लगा कि जो आदमी उसकी बच्ची के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकता है, वह बुरा नहीं हो सकता। दवा के असर के बिना भी, अब हमदर्दी की एक नई लहर उसे शेर की ओर खींच रही थी।
 
शेर [मन ही मन - एक वहशी मुस्कान के साथ]: 'शिकार अब पूरी तरह जाल में है। अब डॉक्टर का अपॉइंटमेंट गया तेल लेने... अब तो मेमसाब खुद अपने हाथों से मेरे ज़ख्म धोएंगी।'
 
इसी बीच, शोर सुनकर गार्ड्स भी दौड़ते हुए वहां पहुंच गए। नजारा देखकर उनके भी हाथ-पांव फूल गए।
 
मीरा [घबराहट में]: "शेर, तुम हिलना मत! बहुत खून बह रहा है। ज्योति बेटा, चुप हो जाओ... देखो, शेर चाचा ने तुम्हें बचा लिया।"
 
मीरा [गार्ड्स पर चिल्लाते हुए]: "देख क्या रहे हो? जल्दी से शेर को उठाओ और अंदर ले चलो! इसकी हालत बहुत खराब है। और कोई गाड़ी निकालो, हमें फौरन डॉक्टर को बुलाना होगा या इसे अस्पताल ले जाना होगा!"
 
शेर ने दर्द से कराहते हुए गार्ड्स को अपने करीब आने से रोका। वह अच्छी तरह जानता था कि अगर गार्ड्स उसे उठाकर ले गए, तो मीरा से सीधे सहानुभूति पाने और उसके करीब आने का यह सुनहरा मौका हाथ से निकल जाएगा।
 
उसने अपने लहूलुहान पैर पर एक हाथ रखा और दूसरे हाथ से गार्ड को पीछे हटने का इशारा किया।
 
शेर [हाँफते और दर्द भरी आवाज़ में]: "हटो... मुझे छोड़ो तुम लोग! पहले तुम ज्योति बेटी को अंदर ले जाओ… देखो कैसे बेचारी घबराकर रो रही है। बच्चू का दिल दहल गया है, उसे पहले संभालो। मेरे को कुछ नहीं होगा... मैं मर भी जाऊँ तो कोई बात नहीं, पर छोटी बेबी ठीक रहनी चाहिए।"
 
गार्ड ने मीरा की तरफ देखा, और मीरा शेर की इस "निःस्वार्थ वफादारी" को देखकर अंदर तक हिल गई। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो आदमी खुद खून से लथपथ है, उसे इस हालत में भी उसकी बेटी की फिक्र थी।
 
मीरा [गार्ड से, रुआँसी आवाज़ में]: "हाँ, तुम ज्योति को अंदर ले जाओ और इसके पैरों पर फौरन डिटॉल लगाओ। मैं... मैं शेर को देखती हूँ।"
 
उनमें से एक गार्ड ने फुर्ती दिखाई और ज्योति को अपनी गोद में उठाकर तुरंत बंगले के अंदर ले गया ताकि उसके जख्मों को साफ किया जा सके।
 
मीरा ने शेर के ज़ख्म को दबाने की कोशिश करने लगी। उसके कांपते हाथों का स्पर्श शेर को एक अलग ही नशा दे रहा था।
 
पीछे सड़क पर अब मीरा, एक दूसरा गार्ड और जख्मी शेर रह गए थे। सुबह की हल्की धूप में मीरा का चेहरा घबराहट और आंसुओं से भीगा हुआ था।
 
जैसे ही मीरा शेर को सहारा देने के लिए नीचे झुकी, उसके ढीले नीले रेशमी नाइटगाउन के गले से शेर को एक बार फिर उसके भरे हुए स्तनों की गहरी झलक मिल गई। मीरा का गोरा बदन उस मखमली कपड़े के पीछे से झाँक रहा था, लेकिन मीरा इस समय लोक-लाज और अपने तन-बदन के होश से बिल्कुल बेखबर थी।
 
उसका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ शेर के गहरे घाव पर था, जिससे गाढ़ा लाल खून तेज़ी से बहकर कंक्रीट को भिगो रहा था।
 
शेर दर्द से बुरी तरह कराहने का नाटक कर रहा था, लेकिन उसकी भूखी और वहशी आँखें मीरा के झुके हुए शरीर का पूरा जायजा ले रही थीं। उसे अपनी जाँघों में उठते तेज़ दर्द से ज़्यादा मज़ा उस छुअन और नज़ारे में आ रहा था जो उसकी आँखों के ठीक सामने था।
शेर [मन ही मन - एक शैतानी संतोष के साथ]: 'वाह मेमसाब! आपकी इस ममता ने आपको मेरे इतना करीब ला खड़ा किया। इस बदन की खुशबू के लिए तो मैं अपना दूसरा पैर भी कटवाने को तैयार हो जाऊँ।'
 
शेर ने जानबूझकर लड़खड़ाते हुए अपना पूरा वजन मीरा और उस दूसरे गार्ड के कंधों पर डाल दिया। जैसे ही मीरा ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे सहारा दिया, शेर का चौड़ा और भारी शरीर मीरा के कोमल, सुडौल बदन से कसकर सट गया। उसकी कसी हुई छाती मीरा के कंधों और उरोजों से रगड़ खा रही थी।
 
मीरा [गार्ड से, हांफते हुए]: "जल्दी करो! इसे अंदर ले चलो, इसका खून रुक नहीं रहा है। शेर, हिम्मत मत हारना, बस हम अंदर पहुंच ही रहे हैं।"
 
मीरा ने पूरी ताकत लगा दी थी ताकि शेर को गिरने न दे। चलते वक्त मीरा का शरीर बार-बार शेर से टकरा रहा था, और शेर जानबूझकर लड़खड़ाने का नाटक करते हुए अपना दबाव मीरा की तरफ बढ़ा रहा था। उसे अपनी जांघों की जलन में भी एक अजीब सुकून मिल रहा था क्योंकि उसे पता था कि उसने अपनी बर्बादी को एक बड़ी जीत में बदल दिया है।
 
शेर [झूठी लाचारी और धीमी आवाज़ में]: "अहह… मेमसाब… मुझे यहीं छोड़ दीजिए… आप थक जाएँगी।"
 
मीरा [रोते हुए, शेर को और कसकर संभालते हुए]: "चुप रहो शेर! कैसी बातें कर रहे हो? तुमने मेरी बच्ची की जान बचाई है। इस वक्त तुम्हारी जान से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है। हिम्मत मत हारना, बस हम अंदर पहुंच ही रहे हैं।"
 
गार्ड ने शेर का हाथ अपने कंधे पर रखा और दूसरी तरफ से मीरा ने उसे मजबूती से थाम रखा था। मीरा की सांसें तेज चल रही थीं और शेर को अपने चेहरे के पास उसकी गर्म सांसों और इत्र की महक महसूस हो रही थी।
 
शेर [मन ही मन]: 'खेल अब पूरी तरह मेरे कब्जे में है। आज तो मेमसाब के आँसू मेरे लिए किसी अमृत से कम नहीं हैं।'
 
बंगले के अंदर दाखिल होते वक्त मीरा के चेहरे पर सिर्फ चिंता और अपने वफादार नौकर को बचाने की तड़प थी, जबकि शेर के दिमाग में अगली साजिश की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
 
अंदर जाते वक्त शेर ने अपनी पूरी मक्कारी झोंक दी थी। वह जानबूझकर इस तरह लड़खड़ा रहा था जैसे उसके पैरों में जान ही न बची हो। अपना संतुलन बनाए रखने के बहाने उसका हाथ बार-बार मीरा के भरे हुए उरोजों से टकरा रहा था।
 
एक वक्त तो ऐसा आया जब सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने अपना पूरा वजन मीरा की तरफ डाल दिया और उसका एक हाथ पूरी तरह से मीरा के बाएं स्तन पर जम गया। नाइटगाउन का रेशमी, पतला कपड़ा उस सख्त और वहशी छुअन को रोकने में नाकाम था। शेर अपनी उंगलियों को फैलाकर उस मखमली गर्माहट और मांसल उभार को अपनी हथेली में भींच रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर दर्द का एक मुखौटा चढ़ा हुआ था।
 
मीरा इस कामुक हमले से बिल्कुल बेखबर थी। उसका दिमाग अपनी बेटी के खौफ और शेर के बहते खून के बीच उलझा हुआ था। उसे तो बस यह दिख रहा था कि इस आदमी ने अपनी जान की बाजी लगाकर उसकी कोख उजड़ने से बचाई है।
 
मीरा [रोते हुए, हाँफते हुए और शेर के भारी बदन से रगड़ खाते हुए]: "शेर... तुम बस हिम्मत मत हारना। तुमने आज मेरी दुनिया बचा ली... अगर ज्योति को कुछ हो जाता तो मैं ज़िंदा नहीं बचती। मैं तुम्हारा यह अहसान कैसे उतारूँगी? मैं तुम्हारी कर्जदार हो गई हूँ शेर... तुम जैसा वफादार इंसान भगवान सबको दे। थोड़ा और संभलो।"
 
शेर ने जब मीरा के मुंह से 'कर्जदार' शब्द सुना, तो उसके अंदर एक वहशी खुशी दौड़ गई। वह मन ही मन मुस्कुराया कि अब अहसान का यह बोझ मीरा को कभी उसके खिलाफ जाने नहीं देगा।
 
शेर [धीमी आवाज़ में, दर्द का नाटक करते हुए]: "मेमसाब... अहसान कैसा? आप तो मेरी अन्नदाता हैं... छोटी मेमसाब के लिए तो मैं सौ बार जान दे दूँ। बस आप परेशान मत होइए..."
 
शेर [दर्द से कराहने का नाटक करते हुए, अपनी उंगलियों को मीरा के स्तन पर और कसते हुए]: "अहह... मेमसाब... मुझे माफ़ कर देना... मेरा हाथ आपके... आपके इस पवित्र बदन पर लग रहा है... पर मुझसे अपना वजन संभाला नहीं जा रहा… आऽऽह! कसम से मेमसाब, बेबी जी के लिए मैं अपनी जान भी दे देता… अहह, बहुत तेज़ दर्द हो रहा है मेमसाब!"
 
मीरा [शेर के हाथ की कसी हुई पकड़ को बिना गलत समझे, घबराहट में]: "कोई बात नहीं शेर, तुम पकड़ कर रखो मुझे! गिरने मत देना खुद को। मेरा सहारा लो। गार्ड, जल्दी से पैर उठाओ इसका, सीढ़ियों पर खून फैल रहा है!"
 
शेर [मन ही मन - हवस के गहरे उन्माद में]: 'वाह मेमसाब, क्या मखमली बदन है तुम्हारा! यह हाथ यहाँ से अब तक नहीं हटेगा जब तक मैं तुम्हारे इस उरोज की पूरी नरमी को निचोड़ न लूँ। तुम रोती जा रही हो और तुम्हारी हर साँस के साथ यह गाउन मेरे हाथ के नीचे और कसता जा रहा है। आज तुमने खुद मुझे अपने इस जिस्म को भींचने का हक दे दिया है। तुम कर्ज उतारने की बात करती हो ना? यह ७ इंच का शेर तुम्हारा ऐसा कर्ज उतारेगा कि तुम्हारी रूह भी काँप उठेगी।'
 
शेर ने जानबूझकर एक गहरी साँस ली और अपना चेहरा मीरा की गर्दन के पास ला दिया, जहाँ से उसके पसीने और महँगे परफ्यूम की मिली-जुली मादक खुशबू शेर के नथुनों में समा रही थी।
 
मीरा ने उसे और भी मजबूती से थाम लिया, जिससे उसका सीना शेर के हाथ पर और भी कस गया। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिसे वह वफादारी समझ रही थी, वह दरिंदगी की एक सोची-समझी चाल थी। वह बस बार-बार यही दोहरा रही थी कि वह शेर का यह कर्ज कभी नहीं चुका पाएगी।
 
घर के अंदर पहुँचते ही अफरा-तफरी का माहौल था। मीरा ने तुरंत फर्स्ट-एड बॉक्स मंगाया। उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने एक गार्ड को निर्देश दिया कि वह ज्योति के ज़ख्मों को साफ करे, क्योंकि वे मामूली खरोंचें थीं और बच्ची अब धीरे-धीरे शांत हो रही थी।
 
लेकिन शेर की हालत चिंताजनक थी। उसके पैर में एक गहरा घाव हो गया था, जिससे खून का फव्वारा सा छूट रहा था। शेर को सोफे पर लिटाया गया। घाव इतना गहरा था कि खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था। मीरा घुटनों के बल उसके पास बैठ गई। इस दौरान, शेर का बहता हुआ गर्म खून मीरा के नीले रेशमी नाइटगाउन पर भी गिर गया। वह गहरा लाल खून नीले कपड़े पर फैलकर एक वीभत्स और डरावना दाग बना रहा था, लेकिन मीरा को इसकी कोई परवाह नहीं थी।
 
मीरा [घबराहट में काँपते हाथों से पट्टियाँ निकालते हुए]: "ओह गॉड! शेर, यह तो बहुत गहरा है। कितना खून बह रहा है... तुम्हें फौरन अस्पताल ले जाना होगा। गार्ड, गाड़ी निकालो जल्दी!"
 
शेर ने नीचे देखा कि कैसे उसका गर्म खून मीरा के जांघों पर फैले नीले रेशमी कपड़े को भिगोकर अंदर उसकी गोरी त्वचा से सट रहा है। उसे इस मंज़र में एक अजीब सा वहशी सुकून मिल रहा था। वह जानता था कि यह खून का दाग अब मीरा के दिमाग से उसके प्रति सारा शक हमेशा के लिए हटा देगा। पर मन ही मन उसके अंदर वासना का एक और तूफान उबल रहा था।
 
शेर [मन ही मन - एक गहरी हवस के साथ]: 'वाह मेमसाब, आज तो आपका यह कीमती गाउन मेरे खून से रंग गया। पर काश... काश इस लाल खून की बजाय मेरा गाढ़ा, सफ़ेद वीर्य आपकी इस छाती और इस नीले रेशमी गाउन पर गिरा होता। मज़ा आ जाता है जब आप मेरी उन चिपचिपी बूंदों को अपने इन गोरे हाथों से साफ कर रही होतीं।'
 
अपनी इस गंदी सोच को छुपाते हुए उसने चेहरे पर दर्द और लाचारी का एक और मुखौटा ओढ़ लिया।
 
शेर [धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ में]: "नहीं मेमसाब... अस्पताल मत ले जाइए। बेकार में साहब परेशान होंगे। बस आप अपने इन हाथों से इसे बांध दीजिए... मैं ऐसे ही ठीक हो जाऊंगा।"
 
मीरा [आँसू पोंछते हुए]: "तुम पागल हो क्या शेर? तुम्हारी जान जा सकती है! पर ठीक है, पहले मैं इसे रोकने की कोशिश करती हूँ।"
 
मीरा ने थरथराते हाथों से एंटीसेप्टिक लिया और शेर की नंगी जाँघ के पास बने उस गहरे घाव को साफ करने के लिए आगे झुकी। जैसे ही वह झुकी, उसका गाउन और ढीला हो गया, जिससे उसके जिस्म की मदहोश करने वाली खुशबू सीधे शेर के नथुनों में समा गई। जैसे ही मीरा ने रुई ज़ख्म पर लगाई, शेर ने दर्द का एक ज़ोरदार नाटक किया।
 
शेर [ज़ोर से 'आह' भरते हुए]: "उफ़्फ़... मेमसाब... आऽऽह!"
 
कराहते ही शेर ने झटके से मीरा का नाजुक हाथ मजबूती से पकड़ लिया।
 
मीरा [चौंककर, पर उसकी पकड़ को दर्द की छटपटाहट समझकर]: "शेर! छोड़ो... दर्द हो रहा है मैं जानती हूँ, पर मुझे दवा लगाने दो। थोड़ा सहन करो, वरना सेप्टिक हो जाएगा।"
 
शेर [मीरा की उंगलियों को अपनी कलाई के नीचे और भींचते हुए, आँखों में झूठे आँसू लाकर]: "मेमसाब... बहुत जानलेवा दर्द है... "
 
मीरा इस वक्त पूरी तरह उसके करीब थी। उसके नाइटगाउन का गला और भी ढीला हो गया था और शेर का हाथ मीरा की कलाई पर था। खून की महक और मीरा के जिस्म की खुशबू मिलकर शेर के दिमाग में एक खतरनाक नशा पैदा कर रही थी। उसने देखा कि मीरा की आँखों में उसके लिए अब सिर्फ और सिर्फ ममता और अहसान का भाव था।
 
शेर [मन ही मन]: 'खेल शुरू हो चुका है मेमसाब। अब न आप उस डॉक्टर के पास जाएंगी, न ही मुझसे दूर भाग पाएंगी। ये जो आपके गाउन पर मेरे खून के दाग लगे हैं, ये मुझे आपके और करीब लाएंगे।'
 
मीरा अपने हाथों से शेर के पैर को थामे हुए थी, और शेर का खून उसके हाथों के जरिए उसकी बाहों तक चढ़ रहा था। वह अनजाने में उस दरिंदे से और भी करीब आ रही थी, जिसे वह अपना रक्षक समझ बैठी थी।
 
एक बार जब खून का बहाव थमा, तो मीरा ने राहत की सांस ली। उसने बाहर खड़े गार्ड्स को वापस गेट पर अपनी ड्यूटी पर भेज दिया।
 
अब उस बड़े से दीवान (सोफे) पर एक अजीब सी खामोशी और गर्माहट छाई थी। एक तरफ छोटी ज्योति निढाल होकर सो गई थी, दूसरी तरफ शेर लेटा हुआ था।
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
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खौफ और साजिश

Shaam ke saaye gehre ho rahe the, aur Sher ke dil ki dhadkanein kisi nagaade ki tarah baj rahi thien. Kitchen mein bartano ko saaf karte hue uske haath kaamp rahe the. Uska dimaag chaaro taraf daud raha tha, par use bach nikalne ka koi raasta nahi soojh raha tha.

Sher reh-rehkar deewar par tangi ghadi ki taraf dekh raha tha. Tik-tik karti suiyaan use chidha rahi thien.

Sher [Aantrik samvaad]: 'Dhat tere ki! Sooraj dhal raha hai aur mere paas abhi tak koi tod nahi hai. Agar kal subah Memsaab us doctor ke paas pahunch gaeen, to mera khel khatam hai. Wo khoon ki jaanch... wo report... saala seedha phaansi ka phanda hai mere liye.'

Sher [Man hi man - gusse mein]: 'Mujhe unhein rokna hi hoga. Par kaise? Agar main bimaar hone ka naatak karoon, to wo guard ko bhej dengi. Agar main phir se unke khaane mein kuch milaaoon, to wo shak karengi. Unhein ghar mein qaid karne ka koi to tareeqa hoga... koi aisi aafat jo unhein dehleez laanghne na de.'

Shaam ke 7 baj chuke the, lekin Sher ka shaatir dimaag is baar khaali haath tha. Vah hataasha mein apne baal nonchne laga. Use samajh nahi aa raha tha ki vah Memsaab ka bharosa dobaara kaise jeete aur us appointment ko kaise radd karwaaye.

Udhar apne bedroom mein, Meera khidki ke paas khadi hokar dhalte sooraj ko dekh rahi thi. Pichle 24 ghanto se Sher ne use dava ki koi nayi khooraak nahi di thi, jiski wajah se uske shareer par chadha vah dhundhla sa nasha ab chhantne laga tha.

Uska jism ab 80% saamaanya mehsoos kar raha tha. Vah jo bethaasha uttejna aur sulagti hui pyaas thi, vah ab maddham pad chuki thi. Jaise-jaise nasha utar raha tha, Meera ki yaaddaasht aur bhi saaf hone lagi thi.

Meera [Aantrik samvaad]: 'Ajeeb hai... ab mujhe vah bechaini mehsoos nahi ho rahi. Mera shareer ab thanda pad raha hai.'

Meera ne thandi saans lee. Dava ka asar kam hote hi uske andar ki naitikta phir se jaagne lagi. Use kal raat ke ve dhundhle pal yaad aaye—Sher ka sparsh, uski vahshi baatein. Ab use un yaado se uttejna nahi, balki gehri ghrina aur sihran mehsoos ho rahi thi.

Meera [Man hi man]: 'Kal raat jo kuch bhi hua, vah bhayaanak tha. Bhale hi Sher ko laga ho ki vah kisi chorni ke saath tha, par usne jo shabd istemaal kiye... "Kaash main dekh paata"... vah daraavna hai. Mujhe kal subah har haal mein doctor ke paas jaana hi hoga. Mujhe jaanna hai ki mere saath kya ho raha hai.'

Raat gehrane lagi thi. Sartaj ghar laut aaye the aur dining table par khaana lag chuka tha.

Sher langdaate hue khaana paros raha tha, lekin uska chehra paseene se tar tha. Use pata tha ki yeh uski aakhri raat ho sakti hai.

Usne dekha ki Meera ab kaafi saamaanya dikh rahi thi.

Sher [Aantrik samvaad]: 'Memsaab ke chehre ki ye chamak... ye mere liye maut ka paigaam hai.'

Sher ne Memsaab ki taraf ek nazar daali, jo kal subah clinic jaane ke baare mein Sartaj se baat kar rahi thien.

Meera: "Sartaj, kal subah mujhe thoda clinic jaana hai. Maine doctor se milne ka samay le liya hai."

Sartaj [Chinta jataate hue]: "Clinic? Kyon Meera, sab theek to hai na? Tumhari tabiyat to kharaab nahi hai?"

Meera [Baat ko sambhaalte hue muskuraakar]: "Haan, sab theek hai. Aap fikr mat kijiye, bas ek routine checkup ke liye ja rahi hoon. Wo pregnancy wali davaiyaan chal rahi hain na, to doctor ne ek baar bulaaya hai."

Agli subah sooraj to nikla, par Sher ki kismat ke andhere abhi chhante nahi the. Sartaj office ja chuke the aur ghar mein khaamoshi thi. Sher ki poori raat jaagte hue kati thi, uska dimaag buri tarah thak chuka tha, phir bhi Meera ke doctor appointment ko rokne ka koi raasta use nahi soojha tha.

Tabhi, uski nazar baahar gayi. Meera ki chhoti beti, Jyoti, gate ke paas college bus ka intazaar kar rahi thi. Bus abhi aayi nahi thi, aur bacchi apni hi dhun mein sadak ke kinaare ek titli ke peechhe bhaagte hue khelne mein magan thi. Use andaaza bhi nahi tha ki vah gate se baahar sadak ki taraf badh rahi hai.

Sher [Man hi man]: "Dhat tere ki! Poori raat nikal gayi par Memsaab ko us doctor ke paas jaane se rokne ki koi tarkeeb dimaag mein nahi aayi. Agar wo clinic chali gaeen aur report mein kuch aa gaya, to mera saara khel bigad jaayega."

Meera darwaje par khadi thi, usne apni vah neeli nightgown pehni hui thi. Vah chai ki chuskiyaan lete hue ek aankh se Jyoti par nazar rakhe hue thi, par use bhi khatre ki gambheerta ka ehsaas nahi tha.

Tabhi Sher langdaane ka naatak karte hue dheere-dheere Meera ke paas aaya aur behad tameez se sar jhukaakar khada ho gya.

Sher: "Pranaam Memsaab. Aaj mausam kaafi achha hai na? Subah-subah thandi hawa chal rahi hai."

Meera [Chai ki chuski lete hue baahar ki taraf dekhkar]: "Haan Sher, mausam to waakai aaj bahut achha hai. Dhoop bhi abhi halki hai."

Sher [Jaankari lene ke iraade se]: "Ji Memsaab, bahut badiya din hai. Waise aap doctor ke paas kab ja rahi hain? Agar kahein to nikalne se pehle aapka naashta bana doon? Khaali pet jaana theek nahi hoga."

Meera: "Bas, Jyoti ki college bus aa jaaye, use bhejkar main taiyaar hone jaaongi. Tum naashta taiyaar karo, main aadhe ghante mein..."

Meera apni baat poori bhi nahi kar paayi thi ki tabhi door se ek tez raftaar car aati dikhai dee. Sher ne yeh manzar dekha. Uske paas poora mauka tha ki vah chillaakar Jyoti ko aaghaah kar de ya car ke paas aane se pehle hi use daudkar kheench le. Lekin uske shaitaani dimaag ne ek pal mein baazi palat di. Vah chupchaap khada raha, maut aur zindagi ke us faasle ko kam hote dekhkar dekhta raha.

Sher [Man hi man]: "Haan, aane do... gaadi ko aur paas aane do. Memsaab apni chai mein khoi rahein aur wo bacchi titli ke peechhe bhaagti rahi. Jaise hi gaadi kareeb aayegi, main ain waqt par koodkar rakshak ban jaaonga. Is bacchi ko thodi chot lagegi to doctor ka appointment apne aap cancel ho jaayega, aur mera raasta saaf ho jaayega!"

Jaise hi car bilkul kareeb aayi, Sher cheekhte hue jhapta.

Sher [Dahaadte hue]: "Chhoti Memsaab! Hatiye!"

Bilkul aakhri second mein, Sher ne Jyoti ko apni giraft mein liya aur apni oor chhalaang lagaakar use kheench liya. Car sansanaate hue unke theek bagal se nikal gayi, par sadak par zor se girne ki wajah se dono zakhmi ho gaye.

Jyoti ke pairon se khoon behne laga; haalaanki ve sirf kharonchein thien, par vah dar ke maare zor-zor se rone lagi. Lekin Sher ki haalat is baar waakai kharaab thi. Vah concrete par is tarah gira tha ki uske pairon se khoon ki dhaar nikal padi.

Meera ke haath se chai ka cup chhootkar gir gaya. Vah badhavaas hokar chillaayi, "Jyoti! Sher!"

Meera paaglo ki tarah daudti hui sadak ki oor bhaagi. Uska dil halak ko aa gaya tha.

Vah daudti hui sadak par aayi. Usne dekha ki Sher dard se tadap raha tha, lekin phir bhi usne Jyoti ko apne seene se laga rakha tha.

Sher [Karaahte hue aur naatak karte hue]: "Memsaab... dekhiye... chhoti Memsaab theek to hain? Mujhe... mujhe kuch bhi ho jaaye... par inhein kharonch nahi aani chahiye thi... main mar bhi jaata to..."

Usne tadapkar apni beti ko god mein utha liya.

Meera [Rote aur haanfte hue]: "Jyoti! Meri bacchi! Tum theek to ho na? Kahan chot lagi hai beta? Oh God, yeh kya ho gaya!"

Jyoti dar ke maare Meera ke gale se lipat gayi aur hichkiyaan lete hue rone lagi. Meera ne raahat ki saans lee ki uski beti ki jaan bach gayi thi, lekin tabhi uski nazar zameen par tadap rahe Sher par padi.

Sher ka pair concrete ke nukeele kinaare se takraya tha, aur wahan se gaadha laal khoon sadak par behkar phail raha tha. Vah dard se karaah raha tha, lekin uske chehre par kutil santosh tha.

Meera [Aankhon mein aansoo liye, ghabrahat mein]: "Sher! Tum... tumne apni jaan daon par laga di. Dekho tumhara pair... kitna khoon beh raha hai! Guard! Koi hai? Jaldi aao!"

Meera ne khoon se lathpath Sher ko dekha. Uske man mein Sher ke prati jo ghrina aur shak paida ho raha tha, vah is 'balidaan' ko dekhkar ek pal mein mitti mein mil gaya. Uski aankhon mein aansoo aa gaye.

Meera [Kaamptee aawaaz mein]: "Sher! Tumne... tumne apni jaan ki parwaah nahi ki? Tum pagal ho kya? Dekho kitni chot aayi hai!"

Meera ka dil pighal chuka tha. Use laga ki jo aadmi uski bacchi ke liye apni jaan daon par laga sakta hai, vah bura nahi ho sakta. Dava ke asar ke bina bhi, ab hamdardi ki ek nayi lahar use Sher ki oor kheenchi rahi thi.

Sher [Man hi man - ek vahshi muskaan ke saath]: 'Shikaar ab poori tarah jaal mein hai. Ab doctor ka appointment gaya tel lene... ab to Memsaab khud apne haatho se mere zakhm dhoyengi.'

Isi beech, shor sunkar guards bhi daudte hue wahan pahunch gaye. Nazaara dekhkar unke bhi haath-paon phool gaye.

Meera [Ghabrahat mein]: "Sher, tum hilna mat! Bahut khoon beh raha hai. Jyoti beta, chup ho jao... dekho, Sher chacha ne tumhe bacha liya."

Meera [Guards par chillaate hue]: "Dekh kya rahe ho? Jaldi se Sher ko uthao aur andar le chalo! Iski haalat bahut kharaab hai. Aur koi gaadi nikaalo, humein phauran doctor ko bulaana hoga ya ise aspatal le jaana hoga!"

Sher ne dard se karaahte hue guards ko apne kareeb aane se roka. Vah achhi tarah jaanta tha ki agar guards use uthaakar le gaye, to Meera se seedhe sahaanubhooti paane aur uske kareeb aane ka yeh sunhera mauka haath se nikal jaayega.

Usne apne lahuluhan pair par ek haath rakha aur doosre haath se guard ko peechhe hatne ka ishaara kiya.

Sher [Haanfte aur dard bhari aawaaz mein]: "Hato... mujhe chhodo tum log! Pehle tum Jyoti beti ko andar le jao… dekho kaise bechaari ghabraakar ro rahi hai. Bacchu ka dil dahal gaya hai, use pehle sambhaalo. Mere ko kuch nahi hoga... main mar bhi jaaoon to koi baat nahi, par chhoti baby theek rehni chahiye."

Guard ne Meera ki taraf dekha, aur Meera Sher ki is "nihswaarth wafadaari" ko dekhkar andar tak hil gayi. Use yaqeen hi nahi ho raha tha ki jo aadmi khud khoon se lathpath hai, use is haalat mein bhi uski beti ki fikr thi.

Meera [Guard se, ruaansi aawaaz mein]: "Haan, tum Jyoti ko andar le jao aur iske pairon par phauran Dettol lagaao. Main... main Sher ko dekhti hoon."

Unmein se ek guard ne phurti dikhaayi aur Jyoti ko apni god mein uthaakar turant bungle ke andar le gaya taaki uske zakhmo ko saaf kiya ja sake.

Meera ne Sher ke zakhm ko dabaane ki koshish karne lagi. Uske kaampte haatho ka sparsh Sher ko ek alag hi nasha de raha tha.

Peechhe sadak par ab Meera, ek doosra guard aur zakhmi Sher reh gaye the. Subah ki halki dhoop mein Meera ka chehra ghabrahat aur aansuon se bheega hua tha.

Jaise hi Meera Sher ko sahaara dene ke liye neeche jhuki, uske dheele neele reshmi nightgown ke gale se Sher ko ek baar phir uske bhare hue stano ki gehri jhalak mil gayi. Meera ka gora badan us makhmali kapde ke peechhe se jhaank raha tha, lekin Meera is samay lok-laaj aur apne tan-badan ke hosh se bilkul bekhabar thi.

Uska poora dhyaan sirf aur sirf Sher ke gehre ghaav par tha, jisse gaadha laal khoon tezi se behkar concrete ko bhigo raha tha.

Sher dard se buri tarah karaahne ka naatak kar raha tha, lekin uski bhookhi aur vahshi aankhein Meera ke jhuke hue shareer ka poora jaayza le rahi thien. Use apni jaangho mein utthe tez dard se zyaada maza us chhuand aur nazaare mein aa raha tha jo uski aankhon ke theek saamne tha.

Sher [Man hi man - ek shaitaani santosh ke saath]: 'Wah Memsaab! Aapki is mamta ne aapko mere itna kareeb la khada kiya. Is badan ki khushboo ke liye to main apna doosra pair bhi katvaane ko taiyaar ho jaaoon.'

Sher ne jaanboojhkar ladkhadaate hue apna poora wajan Meera aur us doosre guard ke kandho par daal diya. Jaise hi Meera ne apni poori taaqat lagaakar use sahaara diya, Sher ka chauda aur bhaari shareer Meera ke komal, sudaul badan se kaskar sat gaya. Uski kasi hui chhaati Meera ke kandho aur urojo se ragad kha rahi thi.

Meera [Guard se, haanfte hue]: "Jaldi karo! Ise andar le chalo, iska khoon ruk nahi raha hai. Sher, himmat mat haarna, bas hum andar pahunch hi rahe hain."

Meera ne poori taaqat laga di thi taaki Sher ko girne na de. Chalte waqt Meera ka shareer baar-baar Sher se takra raha tha, aur Sher jaanboojhkar ladkhadaane ka naatak karte hue apna dabaav Meera ki taraf badha raha tha. Use apni jaangho ki jalan mein bhi ek ajeeb sukoon mil raha tha kyunki use pata tha ki usne apni barbaadi ko ek badi jeet mein badal diya hai.

Sher [Jhoothi laachaari aur dheemi aawaaz mein]: "Ahhh… Memsaab… mujhe yahin chhodo dijiye… aap thak jaayengi."

Meera [Rote hue, Sher ko aur kaskar sambhaalte hue]: "Chup raho Sher! Kaisi baatein kar rahe ho? Tumne meri bacchi ki jaan bachaayi hai. Is waqt tumhari jaan se badhkar mere liye kuch nahi hai. Himmat mat haarna, bas hum andar pahunch hi rahe hain."

Guard ne Sher ka haath apne kandhe par rakha aur doosri taraf se Meera ne use majbooti se thaam rakha tha. Meera ki saansein tez chal rahi thien aur Sher ko apne chehre ke paas uski garm saanso aur itr ki mahak mehsoos ho rahi thi.

Sher [Man hi man]: 'Khel ab poori tarah mere kabze mein hai. Aaj to Memsaab ke aansoo mere liye kisi amrit se kam nahi hain.'

Bungle ke andar daakhil hote waqt Meera ke chehre par sirf chinta aur apne wafadaar naukar ko bachaane ki tadap thi, jabki Sher ke dimaag mein agli saazish ki taiyaari shuru ho chuki thi.

Andar jaate waqt Sher ne apni poori makkaari jhonk di thi. Vah jaanboojhkar is tarah ladkhada raha tha jaise uske pairon mein jaan hi n bachi ho. Apna santulan banaaye rakhne ke bahaane uska haath baar-baar Meera ke bhare hue urojo se takra raha tha.

Ek waqt to aisa aaya jab seedhiyaan chadhte hue usne apna poora wajan Meera ki taraf daal diya aur uska ek haath poori tarah se Meera ke baayein stan par jam gaya. Nightgown ka reshmi, patla kapda us sakht aur vahshi chhuand ko rokne mein naakaam tha. Sher apni ungliyon ko phailaakar us makhmali garmaahat aur maansal ubhaar ko apni hatheli mein bheench raha tha, lekin uske chehre par dard ka ek mukhauta chadha hua tha.

Meera is kaamuk hamle se bilkul bekhabar thi. Uska dimaag apni beti ke khauf aur Sher ke behte khoon ke beech uljha hua tha. Use to bas yeh dikh raha tha ki is aadmi ne apni jaan ki baazi lagaakar uski kokh ujadne se bachaayi hai.

Meera [Rote hue, haanfte hue aur Sher ke bhaari badan se ragad khaate hue]: "Sher... tum bas himmat mat haarna. Tumne aaj meri duniya bacha lee... agar Jyoti ko kuch ho jaata to main zinda nahi bachti. Main tumhara yeh ehsaan kaise utaarongi? Main tumhari karzdaar ho gayi hoon Sher... tum jaisa wafadaar insaan bhagwan sabko de. Thoda aur sambhlo."

Sher ne jab Meera ke munh se 'karzdaar' shabd suna, to uske andar ek vahshi khushi daud gayi. Vah man hi man muskuraaya ki ab ehsaan ka yeh bojh Meera ko kabhi uske khilaaf jaane nahi dega.

Sher [Dheemi aawaaz mein, dard ka naatak karte hue]: "Memsaab... ehsaan kaisa? Aap to meri anndaata hain... chhoti Memsaab ke liye to main sau baar jaan de doon. Bas aap pareshaan mat hoiye..."

Sher [Dard se karaahne ka naatak karte hue, apni ungliyon ko Meera ke stan par aur kaste hue]: "Ahhh... Memsaab... mujhe maaf kar dena... mera haath aapke... aapke is pavitra badan par lag raha hai... par mujhse apna wajan sambhaala nahi ja raha… Aaah! Kasam se Memsaab, baby ji ke liye main apni jaan bhi de deta… ahhh, bahut tez dard ho raha hai Memsaab!"

Meera [Sher ke haath ki kasi hui pakad ko bina galat samjhe, ghabrahat mein]: "Koi baat nahi Sher, tum pakad kar rakho mujhe! Girne mat dena khud ko. Mera sahaara lo. Guard, jaldi se pair uthao iska, seedhiyon par khoon phail raha hai!"

Sher [Man hi man - havas ke gehre unmaad mein]: 'Wah Memsaab, kya makhmali badan hai tumhara! Yeh haath yahan se ab nahi hatega jab tak main tumhari is uroj ki poori narmi ko nichod na loon. Tum roti ja rahi ho aur tumhari har saans ke saath yeh gown mere haath ke neeche aur kasta ja raha hai. Aaj tumne khud mujhe apne is jism ko bheenchne ka haq de diya hai. Tum karz utaarne ki baat karti ho na? Yeh 7 inch ka Sher tumhara aisa karz utaarega ki tumhari rooh bhi kaamp uthegi.'

Sher ne jaanboojhkar ek gehri saans lee aur apna chehra Meera ki gardan ke paas la diya, jahan se uske paseene aur mehnge perfume ki mili-juli maadak khushboo Sher ke nathuno mein sama rahi thi.

Meera ne use aur bhi majbooti se thaam liya, jisse uska seena Sher ke haath par aur bhi kas gaya. Use andaaza bhi nahi tha ki jise vah wafadaari samajh rahi thi, vah darindagi ki ek sochi-samjhi chaal thi. Vah bas baar-baar yahi dohra rahi thi ki vah Sher ka yeh karz kabhi nahi chuka paayegi.

Ghar ke andar pahunchte hi afra-tafri ka mahaul tha. Meera ne turant first-aid box mangaaya. Uska dil abhi bhi zor-zor se dhadak raha tha. Usne ek guard ko nirdesh diya ki vah Jyoti ke zakhmo ko saaf kare, kyunki ve maamooli kharonchein thien aur bacchi ab dheere-dheere shaant ho rahi thi.

Lekin Sher ki haalat chintajanak thi. Uske pair mein ek gehra ghaav ho gaya tha, jisse khoon ka favvaara sa chhoot raha tha. Sher ko sofa par litaaya gaya. Ghaav itna gehra tha ki khoon rukne ka naam nahi le raha tha. Meera ghutno ke bal uske paas baith gayi. Is dauraan, Sher ka behta hua garm khoon Meera ke neele reshmi nightgown par bhi gir gaya. Vah gehra laal khoon neele kapde par phailkar ek veebhats aur daraavna daag bana raha tha, lekin Meera ko iski koi parwaah nahi thi.

Meera [Ghabrahat mein kaampte haatho se pattiyaan nikaalte hue]: "Oh God! Sher, yeh to bahut gehra hai. Kitna khoon beh raha hai... tumhe phauran aspatal le jaana hoga. Guard, gaadi nikaalo jaldi!"

Sher ne neeche dekha ki kaise uska garm khoon Meera ki jaangho par phaile neele reshmi kapde ko bhigokar andar uski gori tvacha se sat raha hai. Use is manzar mein ek ajeeb sa vahshi sukoon mil raha tha. Vah jaanta tha ki yeh khoon ka daag ab Meera ke dimaag se uske prati saara shak hamesha ke liye hata dega. Par man hi man uske andar vaasna ka ek aur toofaan ubal raha tha.

Sher [Man hi man - ek gehri havas ke saath]: 'Wah Memsaab, aaj to aapka yeh qeemti gown mere khoon se rang gaya. Par kaash... kaash is laal khoon ki bajaaye mera gaadha, safed veerya aapki is chhaati aur is neele reshmi gown par gira hota. Maza aa jaata jab aap meri un chipchipi boondo ko apne in gore haatho se saaf kar rahi hoteen.'

Apni is gandi soch ko chhupaate hue usne chehre par dard aur laachaari ka ek aur mukhauta odh liya.

Sher [Dheemi aur ladkhadaati aawaaz mein]: "Nahi Memsaab... aspatal mat le jaaiye. Bekaar mein sahab pareshaan honge. Bas aap apne in haatho se ise baandh dijiye... main aise hi theek ho jaaoonga."

Meera [Aansoo ponchthe hue]: "Tum pagal ho kya Sher? Tumhari jaan ja sakti hai! Par theek hai, pehle main ise rokne ki koshish karti hoon."

Meera ne thartharaate haatho se antiseptic liya aur Sher ki nangi jaangh ke paas bane us gehre ghaav ko saaf karne ke liye aage jhuki. Jaise hi vah jhuki, uska gown aur dheela ho gaya, jisse uske jism ki madhosh karne wali khushboo seedhe Sher ke nathuno mein sama gayi. Jaise hi Meera ne rui zakhm par lagaayi, Sher ne dard ka ek zordaar naatak kiya.

Sher [Zor se 'aah' bharte hue]: "Ufff... Memsaab... aaah!"

Karaahte hi Sher ne jhatke se Meera ka naazuk haath majbooti se pakad liya.

Meera [Chaunkkar, par uski pakad ko dard ki chhatpataahat samajhkar]: "Sher! Chhodo... dard ho raha hai main jaanti hoon, par mujhe dava lagaane do. Thoda sahan karo, warna septic ho jaayega."

Sher [Meera ki ungliyon ko apni kalai ke neeche aur bheenchte hue, aankhon mein jhoothe aansoo laakar]: "Memsaab... bahut jaanleva dard hai... "

Meera is waqt poori tarah uske kareeb thi. Uske nightgown ka gala aur bhi dheela ho gaya tha aur Sher ka haath Meera ki kalai par tha. Khoon ki mahak aur Meera ke jism ki khushboo milkar Sher ke dimaag mein ek khatarnaak nasha paida kar rahi thi. Usne dekha ki Meera ki aankhon mein uske liye ab sirf aur sirf mamta aur ehsaan ka bhaav tha.

Sher [Man hi man]: 'Khel shuru ho chuka hai Memsaab. Ab na aap us doctor ke paas jaayengi, na hai mujhse door bhaag paayengi. Ye jo aapke gown par mere khoon ke daag lage hain, ye mujhe aapke aur kareeb laayenge.'

Meera apne haatho se Sher ke pair ko thaame hue thi, aur Sher ka khoon uske haatho ke zariye uski baahon tak chadh raha tha. Vah anjaane mein us darinde se aur bhi kareeb aa rahi thi, jise vah apna rakshak samajh baithi thi.

Ek baar jab khoon ka bahaav thama, to Meera ne raahat ki saans lee. Usne baahar khade guards ko waapas gate par apni duty par bhej diya.

Ab us bade se deewan (sofe) par ek ajeeb si khaamoshi aur garmaahat chhaayi thi. Ek taraf chhoti Jyoti nidhaal hokar so gayi thi, doosri taraf Sher leta hua tha.
Deepak Kapoor
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Both Versions are posted. Please rate, like, and leave comments on how you are enjoying the story so far .Feedback loop is important  as it tell how involved fans are with story . 
Deepak Kapoor
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Wow great update
Such a great twist

Socha nahi tha kaise handle ho payega

But write is a genius

Bahut hi badiya tarike se sambhala hai

Cat and mouse game jaise maja aaraha hai

Let's see his next move .
Bahut hi bhadiya likh rahe ho bro

Ab toh marzi se daba diya but how can he continue
[+] 1 user Likes Crazy007's post
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Wow nice turning point
[+] 1 user Likes Rizzi1198's post
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Great superb update
[+] 1 user Likes Shabaz123's post
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I am not getting feedback from the users, which makes me think the user may not like the way the story is going.

If you can not take few min to comment out on stories , it leaves author in dark .
Deepak Kapoor
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bhai, its too good...
dont get discouraged...
pls continue...
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Really extraordinary and interesting writing ✍️
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Sorry, guys, I've been totally busy this week and haven't been able to write. The next four days look busy. You might have to wait longer for the next update.

Just wanted to put in an update for fans.
Deepak Kapoor
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Erotic story
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Superb
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So hot story..good job
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Read my story
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खौफ और साजिश--1
 
मीरा दोनों के बीच बैठी थी, उसका नीला रेशमी नाइटगाउन जगह-जगह से शेर के गाढ़े लाल खून से भीगा हुआ था। गीला होने की वजह से रेशम का वह कपड़ा मीरा के जिस्म से बुरी तरह चिपक गया था, जिससे उसके भारी स्तनों और उभरे हुए नितंबों की बनावट शेर की आँखों के सामने बिल्कुल साफ़ झलक रही थी।
 
शेर वहां लेटा हुआ मीरा के शरीर की हर हरकत का लुत्फ ले रहा था। जब मीरा पट्टियाँ ठीक करने के लिए झुकती, तो उसके नाइटगाउन के ढीले गले से उसके उरोजों की गहरी खाई शेर की आँखों के ठीक सामने आ जाती। शेर को अपनी जांघ के जख्म में भी एक वहशी लहर महसूस हो रही थी।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'आह... मेमसाब! आपके इस भीगे हुए नीले लिबास के नीचे जो खजाना छिपा है, उसे देखकर मेरा खून उबल रहा है। आपको लग रहा है कि आप अपने जख्मी वफादार की सेवा कर रही हैं, पर आप नहीं जानतीं कि आपका यह झुका हुआ बदन मेरे अंदर कैसी तबाही मचा रहा है।'
 
मीरा का दिमाग अभी भी सदमे में था। वह पूरी तरह बेखबर थी कि उसका लिबास और उसकी स्थिति कितनी उत्तेजक हो चुकी हैं। वह तो बस अहसान के बोझ तले दबी हुई थी।
 
मीरा [धीमी और कांपती आवाज़ में]: "शेर... आज तुमने जो किया, उसके बाद मैं तुम्हें किस नज़र से देखूँ, मुझे समझ नहीं आ रहा। तुमने मेरी कोख उजड़ने से बचा ली। तुम कह रहे थे न कि अहसान कैसा... पर सच तो ये है कि आज से मेरी ये जान, सब तुम्हारी कर्जदार है।"
 
मीरा ने भावुक होकर अपना कोमल हाथ शेर के तपते हुए हाथ पर रख दिया।
 
करीम ने धीरे से आगे बढ़कर उसके कांपते हुए हाथ को अपने दोनों हाथों की ओट में ले लिया। उसकी हथेलियों का खुरदरापन मीरा की मखमली त्वचा को छू रहा था। उसने सीधे मीरा की उन आँखों में देखा, जिनमें अभी भी डर और कृतज्ञता के आँसू तैर रहे थे।
करीम [भरी हुई, आवाज़ में]: "ऐसा मत बोलिए मीरा मैडम... हम तो आपके पैर की धूल भी नहीं हैं। हमारी क्या औकात जो आप पर कोई अहसान करें?"
 
करीम [भरी हुई आवाज़ में]: ये तो मेरा फर्ज था, मैडम जी, इसमें अहसान कैसा? बस रोना बंद कीजिए; आपके इन आँसूओं का बोझ मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।
 
शेर ने बात आगे बढ़ाते हुए अपना हाथ धीरे से आगे बढ़ाया और अपनी खुरदरी उंगलियों से मीरा के गालों पर ढलक आए आँसू पोंछने लगा। ऊपर से तो उसका यह कदम सिर्फ एक सांत्वना देने वाला, ढाढस बंधाने वाला इशारा लग रहा था, लेकिन उसके भीतर की मंशा कुछ और ही थी। आँसू पोंछने के बहाने, उसका असली मकसद मीरा की मखमली, नर्म त्वचा को छूना और उसे महसूस करना था।
 
शेर अब शिकार को अपनी गिरफ्त में लेने के लिए बेताब था। वह जानता था कि ऊपर पहने हुए भारी नाइटगाउन रोब के नीचे मीरा ने एक बेहद छोटी और महीन नाइटी पहन रखी है, जो उसकी सुराहीदार जांघों को बमुश्किल ढक पा रही होगी।
 
उसने देखा कि मीरा का नीला रोब उसके खून से जगह-जगह से लथपथ हो चुका है और गीला होने के कारण उसके बदन के उभारों से चिपका हुआ है। शेर ने अपनी आँखों में एक बनावटी फिक्र और लाचारी भरी और मीरा के चेहरे की ओर देखा।
 
शेर [मद्धम और भर्राई हुई आवाज़ में]: "मेमसाब... देखिए तो सही, मेरे इस गंदे खून ने आपके इस कीमती लिबास का क्या हाल कर दिया है। ये जगह-जगह से भीग गया है और आपके बदन पर चिपक रहा है... इससे आपको ठंड लग जाएगी या इन्फेक्शन हो सकता है।"
 
मीरा ने अपने गाउन की तरफ देखा, जो वाकई शेर के गाढ़े खून से सन चुका था और अब भारी होकर उसके जिस्म पर बोझ बन रहा था।
 
शेर [हौले से फुसफुसाते हुए, अपनी नज़रों को मीरा के सीने पर टिकाते हुए]: "मेमसाब... आप... आप इसे क्यों नहीं उतारतीं? ये बहुत गंदा हो चुका है। इसे उतारकर अलग रख दीजिए, वरना ये खून आपके जिस्म को सुखा देगा।"
 
मीरा हिचकिचाई। उसकी नैतिकता उसे एक पल के लिए रोक रही थी, लेकिन शेर के उस 'बलिदान' और उसकी मासूमियत भरे लहजे ने उसकी झिझक को कम कर दिया। उसे लगा कि शेर तो घायल है, वह तो ठीक से उठ भी नहीं पा रहा है, तो उससे पर्दा कैसा?
 
शेर की भूखी आँखें मीरा के कांपते हाथों को देख रही थीं जो धीरे-धीरे अपने रोब की बेल्ट की ओर बढ़ रहे थे। शेर के दिल की धड़कन बढ़ गई थी; वह बस उस पल का इंतज़ार कर रहा था जब वह रेशमी परदा हटेगा और मीरा का वह मदमस्त बदन, जो केवल उस छोटी सी नाइटी में कैद था, उसकी नज़रों के सामने नंगा हो जाएगा।
 
शेर [मन ही मन - एक क्रूर संतोष के साथ]: 'उतारिए मेमसाब...आज मैं देखना चाहता हूँ कि उस नीले रेशम के नीचे जन्नत का कौन सा खजाना छिपा है, जिसे पूरी तरह निचोड़ने के लिए मैंने आज सड़क पर अपना खून बहाया है। याद है मुझे वो रातें... जब मैंने उस चोरनी को पकड़ने के बहाने आपके इस जिस्म को दबोचा था। याद है मुझे वो दोपहर... जब मैंने दवा के नशे में आपको बिस्तर पर पूरी तरह नंगा करके आपके एक-एक अंग का दीदार किया था। लेकिन आज... आज का मज़ा कुछ अलग ही होगा मेमसाब! क्योंकि आज आपके ऊपर कोई नशा हावी नहीं है… आज आप पूरे होश-हवास में, खुद अपने इन गोरे हाथों से अपने कपड़े उतार रही हैं। इससे बड़ा सुख एक मर्द के लिए और क्या होगा!'
 
मीरा ने, बिना ज्यादा सोचे-समझे, अपने भारी नाइटगाउन के रोब की बेल्ट खोल दी और उसे अपने कंधों से सरका दिया। जैसे ही वह रेशमी गाउन फर्श पर गिरा, शेर की आँखों के सामने जन्नत का दरवाज़ा खुल गया।
 
मीरा के बदन पर अब सिर्फ एक बेहद छोटी, पारभासी  काली नाइटी थी, जो उसकी दूधिया जाँघों के ऊपरी हिस्से तक भी बमुश्किल पहुँच पा रही थी। उस महीन कपड़े के नीचे उसके भारी उरोजों की गोलाई और निप्पल्स के उभार साफ़ झलक रहे थे।
 
शेर की साँसें अटक गईं। उसने देखा कि मीरा अब पास पड़े पानी के जग और तौलिए से अपने बदन पर लगे खून के धब्बों को साफ करने लगी थी।
 
मीरा [बेखबरी में फुसफुसाते हुए]: "उफ़, ये खून तो सूखने लगा है..."
 
वह सोफे के किनारे झुक गई ताकि अपने पैरों पर लगे खून को धो सके। जैसे ही वह झुकी, उसकी छोटी नाइटी ऊपर की ओर सरक गई, जिससे उसके भारी, चिकने कूल्हों का निचला हिस्सा और उसकी गोरी जाँघों का पूरा विस्तार शेर की आँखों के ठीक सामने आ गया।
 
मीरा अपने हाथों से पानी लेकर अपनी जाँघों और बाहों को मल रही थी। पानी की बूंदें उसके गोरे बदन पर टपकती हुई उसकी नाइटी को और भी गीला और पारदर्शी बना रही थीं।
 
उसका हाथ जब उसके सीने के पास के खून को साफ करने के लिए ऊपर उठा, तो उसकी नाइटी का गला और भी नीचे लटक गया। शेर वहीं लेटा हुआ, अपनी आँखों को फाड़कर मीरा के बदन के हर उतार-चढ़ाव को पी रहा था। मीरा की पीठ शेर की तरफ थी, और जब वह झुककर अपने पैरों को साफ कर रही थी, तो उसकी पीठ की सुडौल बनावट और नाइटी के नीचे छिपे उसके अंगों की थरथराहट शेर के अंदर एक वहशी तूफान पैदा कर रही थी।
 
मीरा को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि उसका यह सफाई करना, शेर के लिए दुनिया का सबसे कामुक  नज़ारा बन चुका है। वह पूरी तरह अपनी सफाई में मग्न थी, जबकि शेर की उंगलियाँ सोफे की चादर को मज़बूती से भींच रही थीं, उसकी आँखों में हवस और जीत की एक साथ चमक थी।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'वाह मेमसाब... क्या कयामत बदन है? ये पानी की बूंदें आपके जिस्म पर नहीं, मेरे कलेजे पर गिर रही हैं।'
 
मीरा इस वक्त पूरी तरह अपनी ही दुनिया में थी। उसने देखा कि शेर का गाढ़ा खून उसकी सफेद, मखमली जांघों पर जम गया है। उस खून के लाल धब्बों को अपनी गोरी त्वचा से हटाने के लिए वह सोफे के बिल्कुल किनारे पर आकर झुक गई।
 
जैसे ही मीरा अपनी उन नंगी, सुडौल जांघों को साफ करने के लिए नीचे की ओर झुकी, उसकी बेहद छोटी नाइटी का ढीला गला पूरी तरह से आगे की ओर लटक गया। शेर, जो ठीक उसके सामने लेटा हुआ था, उसकी आँखों के सामने अब कोई पर्दा नहीं था। मीरा के वे भारी और रसीले स्तन नाइटी की कैद से लगभग बाहर आ चुके थे।
 
झुकने की वजह से उनके बीच की गहरी दरार  और उनके भारीपन का अहसास शेर की रगों में बिजली दौड़ा रहा था। मीरा अपने हाथों में पानी लेकर अपनी जांघों को मल रही थी, जिससे उसके शरीर में एक हल्की थरथराहट हो रही थी। उस हलचल के साथ ही उसके वे नंगे चूचे उसकी नज़रों के सामने किसी मतवाले झूले की तरह डोल रहे थे।
 
शेर की आँखें उन गुलाबी निप्पल्स को ढूंढ रही थीं जो उस पतले कपड़े के किनारे से बस झांकने ही वाले थे। मीरा के झुकने से उसकी नाइटी पीछे से इतनी ऊपर चढ़ गई थी कि उसकी जांघों का ऊपरी हिस्सा और उसके कूल्हों की गोलाई शेर की पहुंच से बस चंद इंच दूर थी।
 
शेर [मन ही मन - वहशी तड़प के साथ]: 'उफ़... मेमसाब! क्या कयामत ढा रही हैं आप? ये सफेद संगमरमर जैसी जांघें और ये भारी उरोज... आज तो मेरा ये ज़ख्म भी आपकी इस खूबसूरती पर कुर्बान है। मन कर रहा है कि इसी वक्त झपट पड़ूँ और इन मखमली अंगों को अपनी मुट्ठी में भर लूँ।'
 
मीरा बेखबर होकर अपनी जांघों पर पानी छिड़क रही थी, और हर बार जब वह झुकती, शेर को जन्नत का नज़ारा और भी साफ़ दिखाई देता। उसके बदन की खुशबू और पानी की नमी ने कमरे का माहौल बेहद कामुक बना दिया था।
 
शेर को लगा कि अब दांव खेलने का सही वक्त आ गया है। मीरा को अपने और करीब खींचने के लिए उसने अचानक दर्द से कराहने का नाटक किया और एक ज़ोरदार चीख मारी।
 
शेर [ज़ोर से कराहते हुए]: "आह्ह्ह... मेमसाब! ... बहुत तेज़ जलन हो रही है!"
 
शेर की आवाज़ सुनते ही मीरा बदहवास हो गई। वह अपनी अधनंगी हालत को पूरी तरह भूल चुकी थी। वह फौरन घुटनों के बल सोफे के पास शेर की ओर झपटी। जैसे ही वह शेर के चेहरे के पास झुकी, उसकी छोटी सी नाइटी का गला पूरी तरह से जवाब दे गया।
 
अब शेर की आँखों के ठीक सामने मीरा के वे भारी और रसीले स्तन अपनी पूरी चमक में थे। झुकने की वजह से वे नाइटी से लगभग बाहर आ चुके थे और उनकी लाल सुर्ख चोटियाँ  उत्तेजना और कमरे की ठंडक से अकड़कर साफ़ झलक रही थीं। शेर को महसूस हो रहा था कि अगर वह ज़रा सा भी हिले, तो उसका चेहरा सीधे उन मखमली उरोजों के बीच धँस जाएगा।
 
मीरा ने घबराहट में शेर के कंधे को पकड़ा और उसके चेहरे के करीब अपना चेहरा रखकर पूछा।
 
मीरा [बेचैनी में]: "शेर! क्या हुआ? बहुत दर्द हो रहा है क्या? डॉक्टर को बुलाऊँ? बताओ मैं क्या करूँ?"
 
शेर ने अपनी आँखें मूंद लीं और अपना चेहरा मीरा के उन भारी अंगों की तरफ थोड़ा ऊपर उठाया। नाइटगाउन के पतले रेशम के आर-पार से मीरा के जिस्म की अत्यधिक उत्तेजक गर्माहट सीधे शेर के चेहरे को छू रही थी।
 
शेर [मन ही मन]: 'आह... यह जन्नत! अब बस एक कदम और... और ये मेमसाब मेरी बांहों में होंगी। इनकी ये नंगी जांघें... यह उबलता हुआ बदन...।'
 
शेर ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उसकी नज़रों के सामने मीरा के नंगे अंगों का सैलाब था।
 
तभी अचानक मीरा को एक अजीब सी असहजता का अहसास हुआ। उसे महसूस हुआ कि शेर की साँसें उसके चेहरे पर नहीं, बल्कि कहीं और थिरक रही हैं। उसने ध्यान दिया कि शेर की आँखें उसके चेहरे को नहीं देख रही थीं। मीरा ने तुरंत शेर की नज़रों की दिशा का पीछा किया और एक झटके में उसे अपनी इस बेसुध अवस्था का अहसास हुआ।
 
वह घुटनों के बल इस तरह झुकी हुई थी कि उसका गाउन पूरी तरह आगे लटक चुका था और उसके दोनों स्तन लगभग पूरी तरह बाहर आ चुके थे। अपनी इस निर्वस्त्र हालत को देखकर मीरा का खून जम गया। मीरा ने पीछे हटने के लिए ज़ोर लगाया, लेकिन शेर ने उसकी कलाई को थाम रखा था।
 
शेर की आँखों में लाचारी का मुखौटा अभी भी लगा रहा, लेकिन उसकी बातों में एक गहरा, वहशी सम्मोहन था। उसने अपनी नज़रें मीरा के उभरे हुए वक्ष पर टिकाए रखीं और बेहद कामुक, भारी आवाज़ में फुसफुसाया।
 
शेर [मदमस्त होकर]: "खूबसूरत... माशाअल्लाह! क्या नज़ारा है मेमसाब... इस रूप को देखने के बाद तो अगर जान भी चली जाए, तो कोई मलाल नहीं।"
 
मीरा [घबराकर, हाँफते हुए और खुद को छुड़ाने की नाकाम कोशिश करते हुए]: "शेर! यह क्या कर रहे हो? छोड़ो मुझे... होश में आओ! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? कोई है..."
 
शेर [गिड़गिड़ाते हुए, पर नज़रों से मीरा के अंगों को चूसते हुए]: "मेमसाब... प्लीज... बस थोड़ा देखने दो ना। आपको क्या पता कि अपनी बीवी से दूर रहते हुए कितने साल हो गए... इस परदेस में तड़पते हुए। और आप... आप तो इतनी गोरी और इतनी खूबसूरत हो कि कोई भी मर्द अपनी सुध-बुध खो बैठे। आज बस अपनी प्यासी आँखों को सुकून दे लेने दो मेमसाब…"
 
मीरा [गुस्से और खौफ से काँपते हुए, अपने गाउन के पल्लू को समेटने की कोशिश में]: "नहीं शेर... यह पाप है, यह बिल्कुल गलत है! अपनी हद पार मत करो! छोड़ो मुझे!"
 
शेर [एक गहरी आह भरते हुए, मीरा के और करीब खिसकते हुए]: "मेमसाब... प्लीज! क्या आपको अंदाज़ा भी है कि मैं आपसे कितना प्यार करता हूँ? इस दिल में आपकी क्या मूरत बसी है? अगर प्यार न होता... तो क्या मैं आज अपनी जान की बाज़ी लगाकर ज्योति बेटी को बचाता? उस तेज़ रफ्तार कार के आगे अपनी छाती अड़ा देता? मैंने अपनी परवाह नहीं की मेमसाब, क्योंकि मैं आपकी कोख उजड़ते नहीं देख सकता था। क्या मेरी इस वफादारी, इस मोहब्बत की इतनी भी कीमत नहीं है कि मैं आपकी इस जन्नत जैसी खूबसूरती का दीदार कर सकूँ?"
 
शेर के इन शब्दों ने मीरा के दिमाग में एक पल के लिए गहरा भ्रम पैदा कर दिया।
 
वह एक तरफ उसके इस खुले कामुक हमले से खौफज़दा थी, तो दूसरी तरफ उसका मन यह सोचने पर मजबूर हो रहा था कि इसी आदमी ने अभी-अभी उसकी बेटी के लिए अपना खून बहाया है।
 
मीरा ने खौफ और अहसानमंदी के दोराहे पर खड़े होकर अपनी भीगी आँखों से शेर की ओर देखा। उसका दिल अंदर से चीख रहा था कि वह यहाँ से भाग जाए, लेकिन शेर की लहूलुहान जाँघ और उसकी दर्द भरी आँखें उसे एक कदम भी पीछे नहीं हटने दे रही थीं।
 
मीरा [काँपती हुई आवाज़ में]: "शेर... मैं तुम्हारी ता  उम्र अहसानमंद रहूँगी, तुमने मेरी गोदी सूनी होने से बचाई है। पर... पर यह जो तुम कर रहे हो, वो बहुत गलत है। मर्यादा मत लांघो शेर, मैं किसी और की पत्नी हूँ।"
 
शेर ने चेहरे पर एक गहरी निराशा और चोट खाए हुए आशिक का भाव ओढ़ा, जैसे मीरा की बातों ने उसके दिल के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हों। उसने धीरे से अपनी पकड़ ढीली करने का नाटक किया, पर उसकी आँखें मीरा के वक्ष से हटी नहीं थीं।
 
शेर [निराशा और झूठे दर्द भरे लहजे में]: "अभी तो आप कह रही थीं मेमसाब, कि आप मेरी सारी उम्र कर्ज़दार रहेंगी... मेरी वफादारी के आगे नतमस्तक थीं। पर लगता है वो सब झूठ था... एक गरीब नौकर को बहलाने के लिए सिर्फ मीठे बोल थे। जैसे ही काम निकल गया, आपने मुझे फिर से वही अछूत नौकर बना दिया।"
 
शेर के इन शब्दों ने मीरा के सीने में एक गहरा खंजर घोंप दिया। वह अपराधबोध के गहरे दलदल में धँसने लगी। उसे लगा कि वह वाकई उस आदमी का दिल दुखा रही है जिसने अभी-अभी अपनी जान दांव पर लगाई थी।
 
मीरा [गहरे मानसिक तनाव और तड़प में]: "नहीं शेर! नहीं... मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था। भगवान गवाह है, मैं तुम्हें कोई मामूली नौकर नहीं समझती। तुमने जो आज किया है, उसकी कोई कीमत नहीं चुका सकता..."
 
शेर ने देखा कि पासा पूरी तरह उसके पक्ष में पलट चुका है। उसने मौके का फायदा उठाया और अपनी कलाई को फिर से कसते हुए मीरा को अपनी तरफ से थोड़ा और खींचा। उसकी गर्म और वहशी साँसें मीरा के स्तनों के बीच की घाटी को छू रही थीं।
 
शेर [कामुक और याचना भरे लहजे में फुसफुसाते हुए]: "तो फिर देखने दीजिए ना मेमसाब... अपनी इस प्यासी आँखों को तृप्त कर लेने दीजिए। प्लीज... थोड़ा और झुक जाइए ना मेरे ऊपर... बस थोड़ा और..."
 
मीरा का दिमाग पूरी तरह सुन्न हो चुका था। शेर के शब्दों का मायाजाल ने मीरा की सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह पंगु बना दिया था। वह न तो पूरी तरह हाँ कह पा रही थी और न ही उसमें पीछे हटने की हिम्मत बची थी।
 
मीरा का चेहरा शर्म, खौफ और एक अजीब सी बेबसी से पूरा लाल हो चुका था। अपराधबोध के उस गहरे दलदल में फँसकर, वह ना चाहते हुए भी शेर के ऊपर थोड़ा और झुक गई।
 
शेर की साँसें अब भारी हो चुकी थीं और उसकी आँखों में एक अजीब सी भूख तैर आई थी। उसके ठीक सामने, नाईटगाउन के उस ढीले गले से सरक कर मीरा की देह का वह हिस्सा पूरी तरह अनावृत हो चुका था। उनके दोनों सुडौल स्तन, जो इतने बेदाग़ और सफ़ेद थे कि मानो हाथ लगाने भर से मैले हो जाएँ, अब सीधे शेर की नज़रों के निशाने पर थे।
 
उसकी आँखें उस गोरेपन को देखकर जैसे पूरी तरह पी जाने के लिए व्याकुल हो उठी थीं। उस ढीले गले से झाँकता वह निथरा हुआ रूप देखकर शेर की राल टपकने लगी थी। वह अपनी आँखें वहाँ से हटा ही नहीं पा रहा था, और उसका पूरा वजूद उस छुअन की अगली कगार पर पहुँचने के लिए मचलने लगा था।
 
शेर [हवस से हांफते हुए और अपनी उंगलियों से मीरा की कलाई को सहलाते हुए]: "कितने खूबसूरत हैं मेमसाब... माशाअल्लाह! ये लाल-लाल निपल्स तो ऐसे लग रहे हैं जैसे चीख-चीख कर मुझे ही अपने पास बुला रहे हों... मुझे चूसने के लिए कह रहे हों।"
 
शेर के मुँह से इतनी गंदी और अश्लील बात सुनकर मीरा अंदर तक काँप उठी। मर्यादा की आख़िरी दीवार को ढहते देख उसने हिम्मत जुटाई।
 
मीरा [कमज़ोर और थरथराती आवाज़ में]: "बस शेर... बहुत हो गया। प्लीज..."
 
शेर ने सीधे मीरा की आँखों में देखा।
 
शेर [अधिकारपूर्ण आवाज़ में]: "नहीं मेमसाब... इतनी जल्दी कैसे? मेरी प्यास अभी नहीं बुझी है। अभी तो सिर्फ दीदार हुआ है।"
 
शेर [मन ही मन - चरम आनंद और शैतानी जीत की खुशी में]: 'वाह रे किस्मत! मज़ा आ गया। यह पहली बार है जब मैं मेमसाब के इन झूलते हुए उरोजों को इतनी नज़दीक से देख रहा हूँ, और वो भी तब जब वह पूरे होश-हवास में हैं। इस वक्त उनके जिस्म पर किसी दवा का कोई नशा नहीं है, ना ही मेरे पास उस चोरनी को पकड़ने का कोई झूठा बहाना है। यह कोई सपना या भ्रम नहीं है… यह हकीकत में सिर्फ और सिर्फ मीरा मेमसाब हैं, जो आज इस नौकर की आँखों की भूख मिटाने के लिए खुद मेरे ऊपर झुकी हुई हैं।'
 
मीरा बेबसी से अपनी आँखें बंद किए खड़ी थी, और उसके आँसू शेर के सीने पर गिर रहे थे। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस वफादारी के बदले वह अपनी आबरू का सौदा कर रही थी, वह शेर की एक सोची-समझी खूनी साजिश का हिस्सा थी।
 
मीरा जब उस बेबस मुद्रा में उसके ऊपर झुकी हुई थी, तब शेर की बर्दाश्त का बांध पूरी तरह टूट गया। उसने अपनी आँखों के सामने झूलते हुए उन गोरे अंगों को सिर्फ देखना गँवारा नहीं किया।
 
अपने दोनों बड़े हाथों को तेज़ी से ऊपर उठाया और सीधे मीरा के नाइटगाउन के खुले हुए गले के अंदर डाल दिया। बिना किसी हिचकिचाहट के, उसने मीरा के उन दोनों नंगे, सुडौल और भारी उरोजों को अपनी मजबूत हथेलियों के शिकंजे में दबोच लिया।
 
रेशमी गाउन के अंदर शेर की कड़क उँगलियों ने जैसे ही उस मखमली, अछूते बदन को भींचा, मीरा के हलक से एक तीखी चीख निकल गई।
 
मीरा [तड़पकर और काँपते हुए]: "आह्हऽऽऽ! शेर..."
 
उसके पूरे शरीर में मानो बिजली की एक तेज़ लहर दौड़ गई। वह सिहरन इतनी तीव्र थी कि डर के बावजूद उसके मुँह से एक बेहद कामुक कराह  निकल पड़ी। उसका पूरा बदन उस छुअन से काठ की तरह कड़ा हो गया।
 
मीरा [हाँफते हुए, अपनी आँखें बंद किए सिसकने लगी]: "नहीं शेर... मत करो... प्लीज छोड़ो मुझे... आऽऽह, यह बहुत गलत है... "
 
शेर के बड़े और खुरदरे हाथ मीरा के मखमली जिस्म की टोह ले रहे थे। शुरुआत में उसकी हरकतें धीमी और बेहद शातिर थीं; उसकी उँगलियाँ गाउन के अंदर मीरा की मखमली और नाज़ुक त्वचा को इस तरह सहला रही थीं मानो वह किसी नए इलाके का नक्शा तैयार कर रहा हो, उसकी सीमाओं को नाप रहा हो। वह मीरा के जिस्म के हर एक उभार, हर एक सिहरन को अपनी हथेलियों में दर्ज कर रहा था।
 
मीरा उस थरथराहट से पूरी तरह सुन्न पड़ चुकी थी, उसकी साँसें तेज़ और भारी हो रही थीं। लेकिन जैसे ही शेर को लगा कि उसने मीरा के पूरे बदन की कशिश को अपनी मुट्ठी में ले लिया है, उसके सब्र का बांध टूट गया।
 
उसने अपने बाएं हाथ की पकड़ को अचानक कड़ा किया और पूरी वहशी ताकत के साथ मीरा के बाएं स्तन को अपनी मुट्ठी में भींचकर पूरी तरह मसल दिया।
 
मीरा [तड़पकर, दर्द और तीखी उत्तेजना के एक मिले-जुले झटके से चीख उठी]: "ऊँऽऽऽह! शेर... आऽऽह... छोड़ो... बहुत... बहुत दर्द हो रहा है!"
 
उस अचानक और क्रूर दबाव से मीरा की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। नाइटगाउन के पतले रेशम के अंदर उसका गोरा वक्ष शेर की कड़क उँगलियों के बीच पूरी तरह पिचक चुका था। शेर की उँगलियों के नाखून मीरा की नाज़ुक त्वचा में धँस रहे थे, जिससे वहाँ गहरे लाल निशान उभरने लगे थे।
 
शेर [हवस से पूरी तरह अंधा होकर]: "कसम से मेमसाब... इतनी कड़क और रसीली चीज़ मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं छुई। चिल्लाओ मत... दबाने दो इसे... अभी तो इस दर्द का असली मज़ा आना बाकी है।"
 
शेर [मन ही मन - चरम कामुक उन्माद में]: 'हाँ... तड़पो मेमसाब! इसी तड़प को देखने के लिए तो मैंने अपनी जान दांव पर लगाई थी। यह तुम्हारा भरा हुआ बदन आज मेरी इस मुट्ठी से बचकर कहीं नहीं जा सकता।'
 
मीरा ने अपने दोनों हाथ शेर के मजबूत कंधों पर टिका दिए और खुद को ऊपर ढकेलने की आख़िरी कोशिश करने लगी, लेकिन शेर का दूसरा हाथ अब उसकी पतली कमर को नीचे से पकड़कर उसे अपने और करीब खींच रहा था, जिससे उसका पूरा वक्षस्थल शेर के मुँह के और नज़दीक आता जा रहा था।
 
लेकिन शेर के हाथ अब थमने वाले नहीं थे। उसने अपनी उँगलियाँ और फैलाकर उन मांसल उभारों को बेरहमी से दबाने लगा। नाइटगाउन के अंदर छिपे उन लाल निपल्स को उसने अपनी उँगलियों के बीच भींच दिया।
 
शेर [हवस के गहरे उन्माद में]: "कैसे छोड़ दूँ मेमसाब? इन चीज़ों को तो सिर्फ दबाने और चूसने के लिए ही ऊपर वाले ने बनाया है। देखो तो सही, हाथ में लेते ही कैसे ये गर्म हो रहे हैं।"
 
शेर [मन ही मन]: 'ओह माय गॉड! क्या मलाई जैसा जिस्म है? यह कड़कपन, यह गर्माहट... इसके सामने तो दुनिया की हर औरत फीकी है। आज तो इन चीज़ों को मसलकर इनका सारा रस पी जाऊँगा।'
 
मीरा का बदन खौफ और उस अनचाही उत्तेजना के बीच झूल रहा था। उसके मुँह से बार-बार 'नहीं' निकल रहा था, लेकिन शेर की छाती से सटकर उसके झूलते हुए अंग अब पूरी तरह उस भूखे नौकर की मुट्ठियों में कैद हो चुके थे।


 
Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
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