Thread Rating:
  • 2 Vote(s) - 3 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery सुधा : एक प्यासी धरती - 1
#1
सूरज अपनी पूरी आब-ओ-ताब के साथ आसमान से आग उगल रहा था। बाज़ार की गलियां सुस्त थीं, और हवा में एक अजीब सी भारी उमस घुली हुई थी। सुधा उस गदराए हुए बदन और झलकती हुई भरी जवानी के साथ, सब्ज़ियों का झोला संभाले उस तंग और सुनसान गली से गुज़र रही थीं। उसके माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें किसी मोतियों की माला की तरह चमक रही थीं।
तभी, उस वीराने में एक पाशविक कोलाहल ने उसके कदमों को ज़ंजीर पहना दी।
सामने का नज़ारा किसी आदमखोर हकीकत जैसा था। एक हट्टा-कट्टा गधा, अपनी बेकाबू रगों में दौड़ती उस 'आग' को शांत करने के लिए एक गधी पर सवार होने की जद्दोजहद में था। उसका वह स्याह, नसों वाला और खूँखार अंग जो किसी ज़हरीले नाग की तरह फुफकार रहा था—गधी की उस 'तंग गुफा' का मुहाना ढूँढने को बेताब था।
पर कुदरत का खेल देखिए, वह गधी बार-बार अपनी देह को झटक देती, और वह फौलादी मूसल फिसल कर हवा में रह जाता।
सुधा,  जो एक आम शरीफ़ औरत की तरह वहाँ से नज़रें चुराकर निकल सकती थीं, आज वहीं बुत बनकर खड़ी रह गईं जब उसकी नज़र गधे का उस विशाल अंग पर पड़ी जो इतना लम्बा था की जमीन को छूने को बेताब था और किसी साँप की तरह बुरी तरह फूंकार रहा था ये नज़ारा देख के उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं। उसका पूरा वजूद उस अश्व-शक्ति के जादू में कैद हो चुका था।

वह खामोश थीं, पर उसके भीतर एक समंदर हिलोरे ले रहा था। वह मन ही मन उस बेजुबान जानवर की जीत की दुआ मांग रही थी जो अब भी अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए छटपटा रहा था 
"आह... बस ज़रा सा और... अबकी बार सही निशाना... अरे! ये कमबख्त फिर फिसल गई। काश... काश ये गधी ज़रा ठहर जाए और उस 'क़यामत' को अपने भीतर उतार ले!"
सुधा को महसूस होने लगा जैसे वह खुद उस दीवार का सहारा लिए खड़ी गधी हैं। उसकी कल्पना की ऊँचाइयों ने उसे उस गधे के नीचे ला खड़ा किया। उसे लगा जैसे वह खुरदरा और पसीने से भीगा भारी बदन उसकी अपनी दूधिया सफ़ेद पीठ पर लदा हुआ है। हर बार जब वह विशाल अंग गधी की देह से रगड़ खाता, सुधा के जिस्म में एक सिहरन दौड़ जाती। उसकी रसीली और भारी जाँघें आपस में ऐसे भिंच जातीं जैसे किसी अनजान हमले का इंतज़ार कर रही हों।
उसकी साँसों की रफ़्तार किसी बेकाबू घोड़े जैसी हो गई थी। उनकी लाल चोली उसके उन विशाल और गर्म पर्वतों के दबाव से टूटने को बेताब था।

और फिर, कुदरत ने अपना फैसला सुनाया। गधे ने अपनी पूरी हस्ती एक छलांग में झोंक दी और एक ही बर्बर झटके में अपना वह लंबा और काला साया गधी की गहराई मे  उतार दिया। सुधा का गला सुख गया उसके कानो मे गधी की वो भारी आवाज़ और गधे के जिस्म के टकराने का वो धप ..धप... का शोर गूंजने लगा 
वह मंजर इतना रफ और बेदर्द था की सुधा का पूरा बदन थरथराने लगा उसने अपनी साडी का पल्लू दांतो तले दबा लिया 
और ठीक उसी पल...
सुधा की आंखें मुँद गईं, सर पीछे की ओर झुक गया। उसके लबों से एक ऐसी मदहोश सिसकारी निकली जो बरसों की प्यास का ऐलान थी—"ओह्ह्ह... उफ़्फ़्फ..."। उसके जिस्म का रोम-रोम कांप उठा। उसे लगा जैसे वह फौलादी कील गधी के नहीं, बल्कि उसके अपनी उस तंग और रसीली गली' के सीने को चीर कर रूह तक उतर गई है।

वह कल्पना करने लगी अगर वो उस जगह होती 
अगर वो पहाड़ जैसा सख्त और मोटा साया उसकी उस प्यासी और तंग गहराइयो को चिरता हुआ अंदर उतरता टफ क्या होता,  क्या वो उस जानवर की मर्दानगी को झेल पाती?  
वह उस अदृश्य चोट को अपने भीतर महसूस कर पा रही थी वह वहीं दीवार से सट गईं, उनकी हथेलियाँ दीवार पर जम गईं। बाज़ार का वह थैला उसके हाथ हाथ से छूट गया

गली के उस वीराने में वक्त जैसे ठहर गया था। वह गधा, किसी आदमखोर शिकारी की तरह गधी के ऊपर सवार होकर उसे अपनी मर्दानगी के बोझ तले कुचल रहा था। वह बेशर्म और जंगली धक्के इतने ज़ोरदार थे कि उनकी आवाज़ से सुधा के कानों में एक अजीब सी गूँज होने लगी। सुधा की आँखों में एक ऐसी वहशियत उतर आई थी जो उन्होंने आज तक महसूस नहीं की थी। वह चाहती थीं कि वह गधा और तेज़ी से, और बेहरमी से उस 'काले और फौलादी मूसल' की मार उस गधी की गहराइयों तक पहुँचाए।
सुधा का पूरा वजूद उस 'वाइल्ड ताकत' के सामने नतमस्तक हो चुका था। उनके बदन का एक-एक पोर पसीने से भीग कर उनकी साड़ी को उनके गदराए हुए जिस्म से चिपका चुका था।
तभी, उस खामोशी को चीरती हुई भारी जूतों की आहट सुनाई दी। जानवरों का मालिक, एक हट्टा-कट्टा और कसरती जवान, उन्हें ढूँढता हुआ वहाँ आ पहुँचा।
सुधा, जो अपनी ही हवस की उस नशीली दुनिया में खोई हुई थीं, अचानक आई इस आवाज़ से सहम गईं। जैसे ही उनकी नज़रें उस शख्स से मिलीं, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उस जवान की नज़रों में एक ऐसी कामुक चमक थी, जिसने एक ही पल में सुधा की उस चोरी को पकड़ लिया। उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह 'भले घर की औरत' यहाँ किस मंज़र का आनंद ले रही थी।
उसने सुधा की तरफ देख कर एक ऐसी 'टीजिंग स्माइल' दी, जैसे वह कह रहा हो—"मालकिन, गधे की जुताई देख कर प्यास लग गई क्या?"
सुधा घबरा गईं। उनके गाल शर्म और डर से सुर्ख हो गए। उसने जैसे ही झटके से नीचे झुक कर अपना वह गिरा हुआ झोला उठाना चाहा वह मखमली रेशमी साड़ी उनकी कमर पर तन गई। उनके विशाल और मांसल नितम्ब अपनी पूरी गोलाई लिए उस जवान की नज़रों के सामने फैल गए। वह दृश्य ऐसा था जैसे कोई 'पका हुआ रसीला फल' अपनी पूरी शान से सामने आ गया हो।
वह जवान (मालिक) तो जैसे पागल ही हो गया। उसकी नज़रों में वह हवस का दरिंदा जाग उठा। उसने आव देखा न ताव, वहीं खड़े-खड़े अपनी लुंगी के ऊपर से ही अपने उस 'खूँखार तम्बू' को बुरी तरह मसलना शुरू कर दिया, जो अब सुधा के उन भारी कुल्हों को देख कर फटने को बेताब था।
सुधा ने उस जवान की यह हरकत देख ली। उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह घबराहट और एक अनकही उत्तेजना में अपना झोला उठाकर वहाँ से तेज़ी के साथ निकल गईं। उनके कदमों की आहट के साथ उनकी भारी जाँघें आपस में रगड़ खा रही थीं, 

सुधा जब घबराहट में अपना झोला उठाकर उस तंग गली से तेज़ी से निकलीं, तो उनके जिस्म ने एक अजीब सी 'मदमस्त लचक' अख्तियार कर ली। उनकी रेशमी साड़ी, जो पसीने की नमी से उनके विशाल और मांसल नितम्बों पर किसी दूसरी खाल की तरह चिपक गई थी, अब उनकी हर हरकत का साथ दे रही थी।
जैसे ही वह अपने भारी कदमों को ज़मीन पर टिकातीं, उनके वह दो गोलाकार पहाड़ (नितम्ब) बेताबी से एक-दूसरे से टकराते और फिर मस्ती में अपनी जगह से हिल उठते। उनकी वह कामुक थरथराहट उस तंग गली की दीवारों को भी दहका रही थी। हर कदम के साथ उनके उन विशाल चूतड़ों की गोलाई साफ़ झलक रही थी, जैसे दो मतवाले हाथी अपनी ही मस्ती में झूम रहे हों। उनकी वह 'भारी और रसीली जुताई' की भूख अब उनकी चाल से साफ ज़ाहिर हो रही थी।
पीछे खड़ा वह जानवरों का मालिक, अपनी लुंगी के भीतर उस 'खूँखार और फन फैलाए अज़गर' को बेदर्दी से मसल रहा था। उसकी आँखें सुधा की उस 'हिलती हुई जवानी' पर गड़ी थीं, जैसे कोई भूखा भेड़िया अपने शिकार को देख रहा हो।
मालिक (मन ही मन, हवस की आग में जलते हुए):
"हाय रे... क्या कयामत की गाँड पाई है इस मेमसाब ने! कितनी भारी और कितनी लचकदार... जैसे अभी-अभी किसी ने इन्हें मक्खन और मलाई से तराशा हो। जब मेरा ये मोटा और काला मूसल इन गोश्त के दो भारी पहाड़ों के बीच की उस लाल और रसीली दरार को चीरता हुआ अंदर धँसेगा, तो ये मेमसाब अपनी सारी शराफत भूलकर उस गधी की तरह ही चीखें मारेंगी। ऐसी भारी और मांसल गांड़ को तो चबाने का मन करता है, एक-एक धक्का इनके जिस्म के जोड़ हिला देगा!"
वह अपनी मुट्ठी को और ज़ोर से भींचने लगा, उसकी साँसें उस 'उभरते हुए नज़ारे' को देखकर धौंकनी की तरह चलने लगीं। वह सुधा की ऊपर निचे होती भारी गांड को तब तक देखता रहा ज़ब तक सुधा वहाँ से ओझल नहीं हो गयी
[+] 4 users Like Edggy's post
Like Reply
Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
#2
सूरज अपनी पूरी आब-ओ-ताब के साथ आसमान से आग उगल रहा था। बाज़ार की गलियां सुस्त थीं, और हवा में एक अजीब सी भारी उमस घुली हुई थी। सुधा उस गदराए हुए बदन और झलकती हुई भरी जवानी के साथ, सब्ज़ियों का झोला संभाले उस तंग और सुनसान गली से गुज़र रही थीं। उसके माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें किसी मोतियों की माला की तरह चमक रही थीं।
तभी, उस वीराने में एक पाशविक कोलाहल ने उसके कदमों को ज़ंजीर पहना दी।
सामने का नज़ारा किसी आदमखोर हकीकत जैसा था। एक हट्टा-कट्टा गधा, अपनी बेकाबू रगों में दौड़ती उस 'आग' को शांत करने के लिए एक गधी पर सवार होने की जद्दोजहद में था। उसका वह स्याह, नसों वाला और खूँखार अंग जो किसी ज़हरीले नाग की तरह फुफकार रहा था—गधी की उस 'तंग गुफा' का मुहाना ढूँढने को बेताब था।
पर कुदरत का खेल देखिए, वह गधी बार-बार अपनी देह को झटक देती, और वह फौलादी मूसल फिसल कर हवा में रह जाता।
सुधा,  जो एक आम शरीफ़ औरत की तरह वहाँ से नज़रें चुराकर निकल सकती थीं, आज वहीं बुत बनकर खड़ी रह गईं जब उसकी नज़र गधे का उस विशाल अंग पर पड़ी जो इतना लम्बा था की जमीन को छूने को बेताब था और किसी साँप की तरह बुरी तरह फूंकार रहा था ये नज़ारा देख के उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं। उसका पूरा वजूद उस अश्व-शक्ति के जादू में कैद हो चुका था।

वह खामोश थीं, पर उसके भीतर एक समंदर हिलोरे ले रहा था। वह मन ही मन उस बेजुबान जानवर की जीत की दुआ मांग रही थी जो अब भी अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए छटपटा रहा था 
"आह... बस ज़रा सा और... अबकी बार सही निशाना... अरे! ये कमबख्त फिर फिसल गई। काश... काश ये गधी ज़रा ठहर जाए और उस 'क़यामत' को अपने भीतर उतार ले!"
सुधा को महसूस होने लगा जैसे वह खुद उस दीवार का सहारा लिए खड़ी गधी हैं। उसकी कल्पना की ऊँचाइयों ने उसे उस गधे के नीचे ला खड़ा किया। उसे लगा जैसे वह खुरदरा और पसीने से भीगा भारी बदन उसकी अपनी दूधिया सफ़ेद पीठ पर लदा हुआ है। हर बार जब वह विशाल अंग गधी की देह से रगड़ खाता, सुधा के जिस्म में एक सिहरन दौड़ जाती। उसकी रसीली और भारी जाँघें आपस में ऐसे भिंच जातीं जैसे किसी अनजान हमले का इंतज़ार कर रही हों।
उसकी साँसों की रफ़्तार किसी बेकाबू घोड़े जैसी हो गई थी। उनकी लाल चोली उसके उन विशाल और गर्म पर्वतों के दबाव से टूटने को बेताब था।

और फिर, कुदरत ने अपना फैसला सुनाया। गधे ने अपनी पूरी हस्ती एक छलांग में झोंक दी और एक ही बर्बर झटके में अपना वह लंबा और काला साया गधी की गहराई मे  उतार दिया। सुधा का गला सुख गया उसके कानो मे गधी की वो भारी आवाज़ और गधे के जिस्म के टकराने का वो धप ..धप... का शोर गूंजने लगा 
वह मंजर इतना रफ और बेदर्द था की सुधा का पूरा बदन थरथराने लगा उसने अपनी साडी का पल्लू दांतो तले दबा लिया 
और ठीक उसी पल...
सुधा की आंखें मुँद गईं, सर पीछे की ओर झुक गया। उसके लबों से एक ऐसी मदहोश सिसकारी निकली जो बरसों की प्यास का ऐलान थी—"ओह्ह्ह... उफ़्फ़्फ..."। उसके जिस्म का रोम-रोम कांप उठा। उसे लगा जैसे वह फौलादी कील गधी के नहीं, बल्कि उसके अपनी उस तंग और रसीली गली' के सीने को चीर कर रूह तक उतर गई है।

वह कल्पना करने लगी अगर वो उस जगह होती 
अगर वो पहाड़ जैसा सख्त और मोटा साया उसकी उस प्यासी और तंग गहराइयो को चिरता हुआ अंदर उतरता टफ क्या होता,  क्या वो उस जानवर की मर्दानगी को झेल पाती?  
वह उस अदृश्य चोट को अपने भीतर महसूस कर पा रही थी वह वहीं दीवार से सट गईं, उनकी हथेलियाँ दीवार पर जम गईं। बाज़ार का वह थैला उसके हाथ हाथ से छूट गया

गली के उस वीराने में वक्त जैसे ठहर गया था। वह गधा, किसी आदमखोर शिकारी की तरह गधी के ऊपर सवार होकर उसे अपनी मर्दानगी के बोझ तले कुचल रहा था। वह बेशर्म और जंगली धक्के इतने ज़ोरदार थे कि उनकी आवाज़ से सुधा के कानों में एक अजीब सी गूँज होने लगी। सुधा की आँखों में एक ऐसी वहशियत उतर आई थी जो उन्होंने आज तक महसूस नहीं की थी। वह चाहती थीं कि वह गधा और तेज़ी से, और बेहरमी से उस 'काले और फौलादी मूसल' की मार उस गधी की गहराइयों तक पहुँचाए।
सुधा का पूरा वजूद उस 'वाइल्ड ताकत' के सामने नतमस्तक हो चुका था। उनके बदन का एक-एक पोर पसीने से भीग कर उनकी साड़ी को उनके गदराए हुए जिस्म से चिपका चुका था।
तभी, उस खामोशी को चीरती हुई भारी जूतों की आहट सुनाई दी। जानवरों का मालिक, एक हट्टा-कट्टा और कसरती जवान, उन्हें ढूँढता हुआ वहाँ आ पहुँचा।
सुधा, जो अपनी ही हवस की उस नशीली दुनिया में खोई हुई थीं, अचानक आई इस आवाज़ से सहम गईं। जैसे ही उनकी नज़रें उस शख्स से मिलीं, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उस जवान की नज़रों में एक ऐसी कामुक चमक थी, जिसने एक ही पल में सुधा की उस चोरी को पकड़ लिया। उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह 'भले घर की औरत' यहाँ किस मंज़र का आनंद ले रही थी।
उसने सुधा की तरफ देख कर एक ऐसी 'टीजिंग स्माइल' दी, जैसे वह कह रहा हो—"मालकिन, गधे की जुताई देख कर प्यास लग गई क्या?"
सुधा घबरा गईं। उनके गाल शर्म और डर से सुर्ख हो गए। उसने जैसे ही झटके से नीचे झुक कर अपना वह गिरा हुआ झोला उठाना चाहा वह मखमली रेशमी साड़ी उनकी कमर पर तन गई। उनके विशाल और मांसल नितम्ब अपनी पूरी गोलाई लिए उस जवान की नज़रों के सामने फैल गए। वह दृश्य ऐसा था जैसे कोई 'पका हुआ रसीला फल' अपनी पूरी शान से सामने आ गया हो।
वह जवान (मालिक) तो जैसे पागल ही हो गया। उसकी नज़रों में वह हवस का दरिंदा जाग उठा। उसने आव देखा न ताव, वहीं खड़े-खड़े अपनी लुंगी के ऊपर से ही अपने उस 'खूँखार तम्बू' को बुरी तरह मसलना शुरू कर दिया, जो अब सुधा के उन भारी कुल्हों को देख कर फटने को बेताब था।
सुधा ने उस जवान की यह हरकत देख ली। उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह घबराहट और एक अनकही उत्तेजना में अपना झोला उठाकर वहाँ से तेज़ी के साथ निकल गईं। उनके कदमों की आहट के साथ उनकी भारी जाँघें आपस में रगड़ खा रही थीं, 

सुधा जब घबराहट में अपना झोला उठाकर उस तंग गली से तेज़ी से निकलीं, तो उनके जिस्म ने एक अजीब सी 'मदमस्त लचक' अख्तियार कर ली। उनकी रेशमी साड़ी, जो पसीने की नमी से उनके विशाल और मांसल नितम्बों पर किसी दूसरी खाल की तरह चिपक गई थी, अब उनकी हर हरकत का साथ दे रही थी।
जैसे ही वह अपने भारी कदमों को ज़मीन पर टिकातीं, उनके वह दो गोलाकार पहाड़ (नितम्ब) बेताबी से एक-दूसरे से टकराते और फिर मस्ती में अपनी जगह से हिल उठते। उनकी वह कामुक थरथराहट उस तंग गली की दीवारों को भी दहका रही थी। हर कदम के साथ उनके उन विशाल चूतड़ों की गोलाई साफ़ झलक रही थी, जैसे दो मतवाले हाथी अपनी ही मस्ती में झूम रहे हों। उनकी वह 'भारी और रसीली जुताई' की भूख अब उनकी चाल से साफ ज़ाहिर हो रही थी।
पीछे खड़ा वह जानवरों का मालिक, अपनी लुंगी के भीतर उस 'खूँखार और फन फैलाए अज़गर' को बेदर्दी से मसल रहा था। उसकी आँखें सुधा की उस 'हिलती हुई जवानी' पर गड़ी थीं, जैसे कोई भूखा भेड़िया अपने शिकार को देख रहा हो।
मालिक (मन ही मन, हवस की आग में जलते हुए):
"हाय रे... क्या कयामत की गाँड पाई है इस मेमसाब ने! कितनी भारी और कितनी लचकदार... जैसे अभी-अभी किसी ने इन्हें मक्खन और मलाई से तराशा हो। जब मेरा ये मोटा और काला मूसल इन गोश्त के दो भारी पहाड़ों के बीच की उस लाल और रसीली दरार को चीरता हुआ अंदर धँसेगा, तो ये मेमसाब अपनी सारी शराफत भूलकर उस गधी की तरह ही चीखें मारेंगी। ऐसी भारी और मांसल गांड़ को तो चबाने का मन करता है, एक-एक धक्का इनके जिस्म के जोड़ हिला देगा!"
वह अपनी मुट्ठी को और ज़ोर से भींचने लगा, उसकी साँसें उस 'उभरते हुए नज़ारे' को देखकर धौंकनी की तरह चलने लगीं। वह सुधा की ऊपर निचे होती भारी गांड को तब तक देखता रहा ज़ब तक सुधा वहाँ से ओझल नहीं हो गयी
Like Reply
#3
shandaar shuruaat...
Like Reply
#4
वाह, जितनी कामुक कहानी उतने ही कामुक संवाद ?

पढ़कर मजा आ गया ?
Like Reply




Users browsing this thread: 1 Guest(s)