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Adultery है जवानी तो इश्क होना है: (हुस्न, जवानी और आशिकी)
#1
अनीता जी ने म्लान स्वर में कहा— "अरी मुनमुन बेटा, तू क्यों इन झंझटों में पड़ रही है? यहाँ बैठ। अविनाश ने मज़दूरों को बुला भेजा है, वे आकर यह सब असबाब नीचे खड़े ट्रक में लाद देंगे।"

मुनमुन चुपचाप अपनी सास, जो उसके लिए माँ के ही साये के समान थीं, उनके पास सोफे पर बैठ गई। अचानक उसकी दृष्टि अनीता जी के मुखमंडल पर पड़ी। वह चौंक उठी। सासू माँ की पलकें भीगी हुई थीं और आँखों के कोरों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी।

मुनमुन ने व्याकुल होकर पूछा— "अरे माँ जी! यह क्या? आपकी आँखों में आँसू? कुशल तो है?"

अनीता जी ने एक ठंडी साँस भरी और रुँधे हुए गले से बोलीं— "कुछ नहीं बहू, बस तुझे देखती हूँ तो हृदय भर आता है। बड़े अरमानों और मान-सम्मान के साथ तुझे इस घर की लक्ष्मी बनाकर लाई थी, पर क्या जानती थी कि भाग्य हमें ऐसे दिन दिखाएगा। तुझे इस कच्ची उम्र में इतनी कठिनाइयां झेलनी पड़ रही हैं... मुझे क्षमा कर देना बेटा!"

मुनमुन ने उनके होंठों पर हाथ रख दिया और मृदु स्वर में कहा— "बस माँ जी, बस! आपने तो मुझे कभी अपनी बेटी समझा ही नहीं।"

अनीता जी अचकचाकर बोलीं— "अरे नहीं बेटा! यह तू क्या कह रही है?"

मुनमुन ने मुस्कराते हुए उनकी आँखें पोंछीं और बड़े अधिकार से कहा— "और नहीं तो क्या? यदि अविनाश आपका बेटा है, तो क्या मैं आपकी बेटी नहीं? यह घर जितना उनका है, उतना ही मेरा भी है। विपत्ति के समय यदि एक बेटी अपनी माँ की ढाल न बने, तो धिक्कार है ऐसे संबंध पर। माँ जी, जो अनहोनी होनी थी, वह हो चुकी। अब अतीत को विदा कीजिए, आगे सब मंगल ही होगा।"

अनीता जी का वात्सल्य उमड़ पड़ा। उन्होंने गद्गद होकर कहा— "जिसकी बहू इतनी सुशील और संस्कारी हो, उसे भला किस बात का दुख? सच तो यह है कि तेरे ससुर के स्वर्गवास के बाद तूने ही इस टूटते हुए घर को संभाला है, वरना हम तो कब के बिखर गए होते।"

मुनमुन ने उनके कंधे थपथपाए— "ओहो माँ! अब पुरानी बातों की पोटली बाँधकर एक कोने में रख दीजिए। आने वाले सुनहरे भविष्य का हँसकर स्वागत कीजिए।"
तभी किवाड़ पर किसी ने दस्तक दी— 'खट-खट!'

अनीता जी ने झटपट अपने आँसू पोंछ डाले और बोलीं— "लगता है मज़दूर आ गए। चलो, यह सामान भी नीचे भिजवाना है।"

मुनमुन उठी— "जी माँ जी, मैं देखती हूँ।"

मुनमुन ने जैसे ही द्वार खोला, सामने घर का दुलारा और छोटा बेटा आयुष खड़ा था। उसे देखते ही मुनमुन के चेहरे पर रौनक आ गई। आयुष ने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए कहा— "अरे भाभी! कितनी देर लगाती हैं आप? मैं कब से द्वार पीट रहा हूँ!"

"अरे मेरा बच्चा!" मुनमुन ने वात्सल्य भाव से उसके गाल थपथपाए। "बता, वे लोग आ गए क्या?"

"हाँ भाभी, वही बताने आया हूँ। मज़दूर ऊपर ही आ रहे हैं। और अभी भैया का भी तार (फ़ोन) आया था, वे लोग भी गंतव्य के लिए निकल चुके हैं। अब हमें भी अविलंब प्रस्थान करना चाहिए।"

मुनमुन ने भीतर जाकर अनीता जी को सूचित किया— "माँ जी, आयुष आया है। अविनाश जी का भी संदेश आ गया है, वे निकल चुके हैं। चलिए, अब हमारी बारी है।"

अनीता जी ने मूक सहमति में सिर हिलाया और भारी कदमों से हॉल के बाहर निकलीं। द्वार की देहरी लांघते समय उन्होंने एक बार मुड़कर उस सूने घर को देखा। उस घर की ईंट-ईंट में उनके जीवन की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। आज एक युग का अंत हो रहा था और वह घर हमेशा के लिए पीछे छूटा जा रहा था।

सीढ़ियों पर मज़दूरों की पदचाप सुनाई दी। मुनमुन ने आँखों के इशारे से आयुष को समझा दिया कि वह सब देख लेगी। उसने मज़दूरों को शेष सामान के विषय में निर्देश दिए और ताकीद की कि सारा काम होने के बाद घर को ठीक से ताला लगा दें।

नीचे कार खड़ी थी। दो बड़े ट्रकों में गृहस्थी का सारा सामान लद चुका था। मुनमुन ने एक कुशल गृहिणी की भाँति ड्राइवरों को मार्ग और सावधानी के निर्देश दिए।

अंततः, वह पुरानी यादों को पीछे छोड़, नए जीवन की खोज में हवाई अड्डे की ओर प्रस्थान कर गए।


हवाई अड्डे के शोर-शराबे के बीच पहुँचते ही मुनमुन ने गृहस्थी की कमान अपने हाथ में ले ली। उसने मुझे (आयुष) माँ और असबाब का ध्यान रखने की ताकीद की और स्वयं भीड़ में अविनाश भैया को खोजने निकल पड़ी। वह फ़ोन कान से सटाए, नज़रों से जनसमूह को खंगालती हुई आगे बढ़ गई। इधर मैं और माँ बाहर खड़े सामान की रखवाली कर रहे थे।

मैंने गौर से माँ की ओर देखा; उनका चेहरा किसी मुरझाए हुए पुष्प के समान निस्तेज था। नीले रंग की साड़ी, गले में मोतियों का हार और हाथों में पड़े वही पुराने कंगन—यह सब उनके व्यक्तित्व को एक गरिमा तो दे रहे थे, पर आज उनके भीतर का उत्साह जैसे कहीं खो गया था। कुछ समय की प्रतीक्षा के बाद, मुनमुन भाभी आती दिखाई दीं। उनके साथ भैया भी थे। भैया ने आते ही बड़ी तत्परता से सारा सामान ठीक करवाया और आगे की व्यवस्था की। अब हम सभी हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश कर चुके थे।

चेकिंग और बोर्डिंग पास की औपचारिकताओं के बाद जब हम प्रतीक्षालय (वेटिंग एरिया) में पहुँचे, तो दूर से ही मुझे अपनी बड़ी बहन आयुषी दीदी दिखाई दीं। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर वसंत खिल उठा। वे दौड़कर आईं और मुझे गले लगा लिया, मानो सदियों बाद कोई बिछड़ा हुआ साथी मिला हो। माँ के पास जाकर उन्होंने बड़े स्नेह से उनका कुशल-क्षेम पूछा।

तभी माँ ने इधर-उधर देखते हुए भैया से पूछा— "अरे अविनाश, वंदना कहाँ है?" अविनाश भैया ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया— "मम्मी, मौसी प्रसाधन (वॉशरूम) गई हैं, अभी आती होंगी।"

नाना-नानी के देहावसान के बाद मौसी हमारे ही परिवार का अटूट हिस्सा बन गई थीं। कुंडली के किसी दोष ने उनके विवाह के मार्ग में ऐसी बाधा डाली थी कि वे आज तक अविवाहित थीं, पर उनके स्वभाव में वही चिर-परिचित वात्सल्य और ममता थी। तभी हवाई जहाज़ की रवानगी की घोषणा हुई। मैंने देखा, मौसी दूर से चली आ रही थीं। मैं दौड़कर उनके पास पहुँचा। मुझे देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गई। पीछे खड़े पूरे परिवार को देखकर वे निश्चिंत हुईं और फिर हम सब कतार में लग गए।

मौसी ने मेरा हाथ बड़े अधिकार से थाम रखा था। हमारे पीछे दीदी, फिर माँ-भाभी और अंत में अविनाश भैया थे। जैसे ही मैंने विमान के भीतर पैर रखा, मेरा सामना एक अत्यंत लावण्यमयी विमान परिचारिका (एयर-होस्टेस) से हुआ। वह मधुर मुस्कान के साथ सबका स्वागत कर रही थी। मैंने आज तक इतनी सुंदर युवती नहीं देखी थी। मेरी आँखें जैसे उस पर ठहर-सी गईं।

मौसी ने मेरी टकटकी ताड़ ली। शायद उस लड़की को भी भान हो गया था कि कोई उसे निहार रहा है, क्योंकि उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान रेंग गई। मौसी ने मुझे टोकते हुए चुटकी ली— "क्यों भाई साहब, अब आगे चलने का विचार है या यहीं टिके रहने का इरादा है?"

मैं लज्जा के मारे पानी-पानी हो गया और गर्दन झुकाकर आगे बढ़ गया। विमान में हम कुल छह प्राणी थे। एक ओर मैं, दीदी और मौसी की सीट थी, तो दूसरी ओर माँ, भैया और भाभी। मैंने दीदी से अनुनय किया— "दीदी, क्या मुझे खिड़की वाली सीट मिल सकती है?"

दीदी का मन भी उस सीट के लिए ललचा रहा था, पर अनुज के प्रति उनके अगाध प्रेम ने उनकी इच्छा को दबा दिया। उन्होंने हंसकर मुझे वहाँ बैठने की अनुमति दे दी। मैं अभी अपनी सीट पर बैठ ही रहा था कि अविनाश भैया मौसी के पास आए और स्वर धीमा करके कुछ गंभीर मंत्रणा करने लगे। उनकी बातों का स्वर इतना धीमा था कि मुझे कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था कि आखिर माजरा क्या है।


अविनाश भैया के जाते ही मौसी और दीदी के बीच दबे स्वर में कुछ कानाफूसी होने लगी। दीदी बड़ी तन्मयता से मौसी की बातें सुन रही थीं, मानो कोई बड़ी गंभीर गुत्थी सुलझाई जा रही हो। कुछ देर बाद दीदी वापस मेरी बगल वाली सीट पर आकर बैठ गईं, किंतु मैंने देखा कि मौसी अपनी जगह पर नहीं थीं। दीदी के बगल वाली सीट खाली पड़ी थी।

मेरे भीतर उत्सुकता ने करवट ली। मैंने धीरे से पूछा— "दीदी, क्या बात हुई? मौसी कहाँ चली गईं?"

दीदी ने सारा माजरा विस्तार से समझाया। दरअसल, सीटों के आवंटन में कुछ ऐसा फेरबदल हुआ था कि मुनमुन भाभी की सीट आगे की ओर पड़ गई थी। वहाँ माँ और भैया के साथ भाभी को अकेले बैठना पड़ता, और उनके बगल वाली दो सीटों पर अपरिचित पुरुष विराजमान थे—एक नवयुवक और दूसरे अधेड़ आयु के व्यक्ति, जो संभवतः पिता-पुत्र थे। मुनमुन भाभी को उन बेगानों के बीच बैठने में संकोच हो रहा था। लोक-लाज और सहज झिझक के कारण उन्होंने भैया से अपनी असुविधा व्यक्त की।

अंततः भैया और भाभी ने उन सज्जनों से सविनय निवेदन किया। थोड़ी ऊहापोह के बाद वे मान गए। तय यह हुआ कि वह नवयुवक हमारी बगल वाली खाली सीट पर आकर बैठ जाएगा और मुनमुन भाभी एवं मौसी वहाँ आगे वाली सीट पर एक साथ बैठ सकेंगी। इस तरह वह युवक अब दीदी के बगल में आ बैठा था और भाभी अब मौसी के सान्निध्य में निश्चिंत थीं।

तभी विमान के गलियारे से वही लावण्यमयी परिचारिका (एयर-होस्टेस) गुजरी, जिसकी छवि मेरे मानस-पटल पर अंकित हो चुकी थी। वह पुनः हमारे समक्ष उपस्थित हुई और सुरक्षा संबंधी निर्देश देने लगी। उसकी सुरीली आवाज़ और सलीके ने मुझे जैसे मोहपाश में बाँध लिया था। वह बता रही थी कि सुरक्षा पेटी (सीट बेल्ट) कैसे बाँधी जाती है।

मैं तो बस उसे ही निहार रहा था, पर जैसे ही उसने निर्देश समाप्त किए, मैंने अपनी पेटी कस ली। तभी मेरी दृष्टि दीदी पर पड़ी; वे पेटी के बकसुए से जूझ रही थीं। लाख जतन करने पर भी उनसे वह पेटी ठीक से लग नहीं पा रही थी। मेरे मन में एक चतुर विचार कौंधा—क्यों न उसी सुंदर परिचारिका को सहायता के लिए पुकारा जाए? इससे दीदी की समस्या भी हल हो जाएगी और मुझे उसे करीब से देखने का एक स्वर्णिम अवसर भी मिल जाएगा।

अभी मैं पुकारने के लिए मुँह खोलने ही वाला था कि मेरी योजना धरी की धरी रह गई। दीदी की बगल में बैठे उस अज्ञात नवयुवक ने बड़ी शिष्टता से दीदी की ओर सहायता का हाथ बढ़ाया। उसने अपनी मधुर वाणी में सहायता की पेशकश की और दीदी ने भी सहज संकोच के साथ अपनी स्वीकृति दे दी। वह युवक अब दीदी की पेटी ठीक करने में उनकी मदद कर रहा था और मैं मन मसोस कर रह गया।


मेरे (आयुषी) मन में विचारों का एक बवंडर उठा हुआ था। शायद यह मेरी ही भूल थी कि जब वह विमान परिचारिका निर्देश दे रही थी, तब मेरा ध्यान अपने दूरभाष (फ़ोन) में अटका था। अब परिणाम सामने था—यह हतभागा बेल्ट मुझसे सध नहीं रहा था। मैंने कनखियों से देखा, छोटे भाई आयुष ने तो बड़ी कुशलता से अपनी पेटी बाँध ली थी। मुझे कुछ सूझ न रहा था। मन में आया कि आयुष से ही पूछ लूँ, आखिर भाई ही तो है, पर तभी मेरे बगल में बैठे उस अज्ञात युवक ने मेरी ओर झुककर बड़ी शिष्टता से पूछा— 

"क्या कोई समस्या है?"

जब मेरा ध्यान उसकी ओर गया, तो पाया कि वह युवक बड़ा ही सजीला और रूपवान था। काली कमीज और नीली जींस में उसका व्यक्तित्व निखरा हुआ था। मैं साधारणतया परायों पर इतना ध्यान नहीं देती, पर न जाने क्यों, जब से वह मेरी बगल में आकर बैठा था, मेरा अंतर्मन उसकी उपस्थिति से अनभिज्ञ न रह सका।
मैं हड़बड़ा गई। अब इसे कैसे बताऊँ कि मुझे एक साधारण सी पेटी बाँधने में कठिनाई हो रही है? न जाने वह मेरे विषय में क्या सोचेगा! मैंने सकपकाते हुए कहा— "जी नहीं, वह... कुछ नहीं।"

परंतु वह युवक चतुर था, वह मेरी स्थिति ताड़ गया। उसने वातावरण को हल्का करने के लिए एक ठहाका लगाया और बोला— "अरे, इसमें लज्जा की क्या बात है? जब मैं पहली बार विमान में बैठा था, तो मैंने तो गलती से बेल्ट की कुंडी ही निकाल दी थी!" उसकी इस बात ने मेरे मन के बोझ को थोड़ा कम कर दिया। उसका परिहासबोध (सेंस ऑफ ह्यूमर) प्रशंसनीय था।

उसने पुनः प्रस्ताव रखा— "यदि आप मेरी सहायता नहीं चाहतीं, तो मैं किसी परिचारिका को बुला देता हूँ।" मैंने जल्दी से कहा— "अरे नहीं, मैं स्वयं कर लूँगी, अधिक चिंता की बात नहीं है।" उसने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा— "यदि सच में चिंता की बात नहीं है, तो मुझे ही यह सेवा कर लेने दीजिए। आज्ञा हो तो मैं लगा दूँ?"

उसका यह अंदाज़ इतना सहज था कि मैं 'ना' न कह सकी और मूक सहमति में सिर हिला दिया। वह प्रसन्नता से मेरी ओर बढ़ा। वह अब मेरे इतना समीप था कि उसके वस्त्रों से आती सुगंध मेरे नथुनों को मदहोश करने लगी। उसने मेरे हाथों से वह बेल्ट थाम ली। उस क्षण हमारे हाथों का अनचाहा स्पर्श हुआ, जिससे मेरे भीतर एक अजीब सी कसमसाहट पैदा हुई। मैं संकोच के मारे अपनी दृष्टि नीचे झुकाए बैठी थी।

वह थोड़ा और झुका। उसका एक हाथ एक ओर की पेटी थामे था, तो दूसरा हाथ मेरी कमर के दूसरी ओर की कुंडी खोजने के लिए आगे बढ़ा। अचानक उसका हाथ मेरी कमर से स्पर्श कर गया। वह स्पर्श बिजली के झटके की तरह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया। मेरा हृदय जोरों से धड़कने लगा। उसने अत्यंत धीमे स्वर में 'क्षमा' मांगी और बड़ी सफाई से पेटी के दोनों सिरों को जोड़कर उसे कस दिया।

"ज़्यादा टाइट तो नहीं हुआ?" उसने पूछा। मैं इतनी लज्जित थी कि शब्द न फूटे, बस 'ना' में सिर हिला दिया। जब वह अपनी सीट पर वापस बैठा, तब मैंने साहस बटोरकर उसे 'धन्यवाद' कहा।

उसने मेरी ओर गहराई से देखते हुए पूछा— "आपके माथे पर यह पसीना कैसा?" मैंने बात टालते हुए कहा— "वह... बस ऐसे ही।" तभी उसने मेरे कान के पास झुककर 

अत्यंत धीमे स्वर में कहा— "वैसे धन्यवाद तो मुझे कहना चाहिए।" मैंने विस्मय से पूछा— "वह भला क्यों?"

उसने एक ही सांस में उत्तर दिया— "यदि मैं सहायता न करता, तो मुझे यह कैसे पता चलता कि आपकी त्वचा इतनी कोमल और सुकुमार है? आप स्वयं का बड़ा ध्यान रखती हैं।" मैं तो जैसे पानी-पानी हो गई। यह क्या अनर्थ था? यह युवक तो सरेआम मुझसे ठिठोली (फ्लर्ट) करने लगा था। हमें मिले अभी आधा घंटा भी न बीता था और वह ऐसी धृष्टता पर उतर आया! मन ही मन मैंने स्वयं को कोसा कि आखिर मैंने उससे सहायता माँगी ही क्यों?

अभी मैं सोच ही रही थी कि वह पुनः बोला— "कहाँ खो गईं? आप काफी लचीली (फ्लेक्सिबल) मालूम होती हैं, तभी तो यह पेटी इतनी जल्दी फिट हो गई। वैसे डरिये मत, यह आपकी पहली उड़ान है न? कभी-कभी आकाश में विमान हिचकोले खाने लगता है जिसे 'टर्बुलेंस' कहते हैं।"

विमान के हिलने की बात सुनते ही मेरे प्राण सूख गए। गला सूखने लगा और भय के मारे मैंने अपनी सीट के हत्थों को कसकर पकड़ लिया और आँखें मूंद लीं। तभी मुझे अपने हाथों पर किसी दूसरे हाथ की उष्णता महसूस हुई। मैंने आँखें खोलीं तो देखा कि उस युवक ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया था। उसके चेहरे पर एक आश्वस्त करने वाली मुस्कान थी।

उसने मेरे और करीब आकर फुसफुसाते हुए कहा— "घबराइए मत, यदि विमान अधिक हिचकोले ले, तो मेरा हाथ पकड़ लीजिएगा। मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगा।"


मोबाइल के कृत्रिम संसार से थककर जब मैंने कान से हेडफोन हटाए, तो दृश्य कुछ बदला हुआ था। बगल की सीट पर दीदी और वह अजनबी युवक किसी गंभीर चर्चा में मग्न थे। युवक के मुख से निकला वह 'लचीला' (फ्लेक्सिबल) शब्द मेरे कानों में पड़ा, तो मुझे अपनी मर्यादा और वहाँ की उपस्थिति बोझिल लगने लगी। लघुशंका (वॉशरुम) का बहाना कर मैं अपनी सीट से उठा। आगे की सीटों पर नज़र डाली तो पाया कि मुनमुन भाभी विश्राम कर रही थीं, किंतु मौसी बगल वाले सज्जन से बातों में लीन थीं।

मैं उतावली में शौचालय की ओर बढ़ा। दाहिनी ओर भैया और माँ निद्रा देवी की गोद में थे। उथल-पुथल भरे मन के साथ मैं जैसे ही शौचालय के भीतर प्रविष्ट हुआ, हड़बड़ाहट में द्वार की सिटकिनी चढ़ाना भूल गया। अभी मैं निवृत्त होकर पलटा ही था कि अचानक द्वार खुला और एक बिजली सी तड़पी। वही रूपवती विमान परिचारिका, जिसे मैं बाहर निहार रहा था, झटके से भीतर आ गई।

उसकी वेशभूषा पर संभवतः कोई पेय पदार्थ गिर गया था। वह अपनी सुध-बुध खोए, केवल उस धब्बे को मिटाने के लिए व्याकुल थी। एक हाथ से कपड़े को खींचकर वह दूसरे हाथ के महीन कागज़ (टिश्यू) से उसे रगड़ रही थी। उसे आभास तक न था कि भीतर कोई और भी है। उसने फुर्ती से द्वार बंद कर दिया और भीतर की कुंडी चढ़ा दी।

अब हम दोनों उस संकुचित स्थान में अकेले थे। तरल पदार्थ के गिरने से उसका वस्त्र वहाँ से भीगकर पारभासी (ट्रांसपेरेंट) हो गया था। सफाई की व्याकुलता में उसने अपने परिधान के ऊपरी बटन खोल दिए थे। अचानक उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ी। वह हक्की-बक्की रह गई। लज्जा से उसका गोरा मुखमंडल सिंदूरी हो उठा। वह हकलाकर बोली— "तु... तु... तुम यहाँ कैसे?"

बेचारी इस आकस्मिक संकट से अनजान थी। मेरी भी सिट्टी-पिट्टी गुम थी। लज्जा और अपराधबोध के मारे मेरा सिर झुक गया। मैंने चाहा कि तत्काल वहां से निकल जाऊं, पर जैसे ही मेरा हाथ द्वार की ओर बढ़ा, बाहर से 'खट-खट' की आवाज़ हुई।

बाहर किसी की उपस्थिति ने मेरे प्राण सुखा दिए। यदि इस अवस्था में कोई हमें साथ देख लेता, तो लोक-परलोक की मर्यादा धूल में मिल जाती। भय के मारे मेरा गला सूख गया। तभी मुझे अपने कंधे पर एक अत्यंत कोमल और ऊष्म स्पर्श का अनुभव हुआ। मैंने मुड़कर देखा, उस परिचारिका ने धैर्य न खोते हुए मेरे कंधे पर अपना सुकुमार हाथ रखा था और होंठों पर उंगली रखकर मुझे मौन रहने का संकेत किया।

वह अपने बाएं हाथ की लंबी उंगली के नाखून को दांतों तले दबाए कुछ सोच रही थी। इस विकट परिस्थिति में भी कामदेव का प्रभाव मुझ पर हावी था। वह मेरे समीप कुछ झुकी हुई थी, जिससे उसके खुले हुए बटनों के अंतराल से उसके कंठ की धवल आभा और वक्ष की वह सूक्ष्म रेखा दृष्टिगोचर हो रही थी, जो किसी सुरम्य घाटी की भांति प्रतीत होती थी।

प्रसाधन कक्ष (वॉशरूम) की उस कृत्रिम ठंडक में भी मुझे पसीने आ रहे थे। मेरी आँखें अपलक उस अनन्य सौंदर्य को निहार रही थीं, मानो कोई प्यासा मृग रेगिस्तान में जल की तलाश कर रहा हो। तभी पुनः किवाड़ पर दस्तक हुई। मेरा हृदय डूबने लगा। भय और उत्तेजना के उस भँवर में मैं जैसे चेतना खोने ही वाला था कि उस युवती ने मुझे झकझोरा।

उसने मंद स्वर में, पर दृढ़ता के साथ कहा— "सुनो! मेरी तरफ देखो... हे भगवान, होश में आओ!"

उसके शब्द मेरे कानों में पड़े, पर मेरी दृष्टि तो उस अलौकिक दृश्य पर जमी थी जिसने मेरी विचार-शक्ति का हरण कर लिया था।

जैसे-तैसे मेरी चेतना वापस आई। मैंने देखा, वह सुंदरी बड़े गौर से मेरे चेहरे के भावों को पढ़ रही थी। उसके मस्तिष्क में इस भंवर से निकलने की कोई युक्ति चल रही थी। तभी अचानक बाहर से होने वाली वह दस्तक़ बंद हो गई। शायद बाहर खड़ा व्यक्ति धैर्य खोकर लौट गया था। मन का बोझ कुछ हल्का तो हुआ, परंतु भय का पसीना अब भी कपोलों पर बह रहा था।

मैंने देखा, उसके अधरों पर एक शरारत भरी मुस्कान खेल रही थी। उसने अपनी जेब से एक रेशमी और सुगंधित रुमाल निकाला और मेरे अत्यंत समीप आ गई। मेरे माथे पर आए पसीने की बूंदों को वह बड़ी कोमलता से पोंछने लगी। उस क्षण मेरी दृष्टि उसकी कजरारी आँखों में उलझकर रह गई। उस रुमाल की भीनी-भीनी सुगंध और उसके शरीर से उठने वाली मादक इत्र की खुशबू ने शौचालय के उस संकुचित स्थान को जैसे किसी स्वप्नलोक में बदल दिया था।

उसने अत्यंत धीमे और मादक स्वर में कहा— "आप तो बड़े चतुर निकले मिस्टर! विमान में कदम रखते ही आप मुझे निहार रहे थे और अभी... अभी तो आपने मुझे उस नज़र से देख लिया, जिससे केवल मेरा प्रियतम (बॉयफ्रेंड) ही मुझे देख सकता है। तो क्या अब मैं आपको अपना प्रियतम समझूँ? बोलिए, बनेंगे मेरे प्रियतम?"

मेरे कानों में विश्वास ही नहीं हो रहा था। क्या यह सत्य था या मेरी इंद्रियाँ मुझे धोखा दे रही थीं? मेरे शब्द गले में ही सूख गए। लज्जा और संकोच के मारे मेरा चेहरा और कान तवे की भाँति लाल हो उठे। उसके लाल सुर्ख होंठ, जिन पर लिपस्टिक की चमक थी, किसी रसीले फल की भाँति प्रतीत हो रहे थे। मैं घबराकर पीछे हटा, पर उसने दृढ़ता से मेरा कंधा थाम लिया।

"ठहरो!" वह फुसफुसायी। "पहले मुझे देख लेने दो कि बाहर कोई है तो नहीं।"

वह मुड़ी और उसने बड़ी शालीनता से अपने परिधान के वे दो खुले हुए बटन बंद किए। मेरी अपराधी आँखें एक बार फिर उसी ओर उठ गईं, पर इस बार उसने मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया। उसकी पारखी नज़रों ने देख लिया कि मेरी दृष्टि कहाँ अटकी है। मैंने झट से गर्दन झुका ली।

उसने द्वार को थोड़ा सा खोलकर बाहर की स्थिति का जायजा लिया। गलियारा सूना था। उसने पीछे मुड़कर मेरी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा— "जाओ, मार्ग निष्कंटक है। पर संभलकर जाना। विदा (बाय)!"

मुझे तो बस इसी अवसर की प्रतीक्षा थी। जैसे ही द्वार खुला, मैं वहाँ से किसी तीर की भाँति निकला और बिना पीछे मुड़े सीधा अपनी सीट की ओर भागा, मानो कोई कैदी जेल की सलाखों से आज़ाद हुआ हो।

जब मैं बदहवास सा अपनी सीट की ओर भागा, तो देखा कि मुनमुन भाभी की निद्रा टूट चुकी थी। मेरी व्याकुलता और माथे पर मोतियों की भांति चमकते पसीने को देखकर वे चिंतित हो उठीं। उन्होंने ममता भरे स्वर में पूछा— "यह क्या हाल बना रखा है आयुष? तबीयत तो ठीक है?" मैंने किसी तरह शब्दों को बटोरकर उत्तर दिया कि मैं ठीक हूँ, पर भाभी की पारखी नज़रों से भला क्या छिप सकता था। वे हल्का सा मुस्कुराईं और बोलीं— "जाओ बैठो, अब विमान उतरने ही वाला है।"

जाते-जाते मेरी दृष्टि मौसी पर पड़ी। वे कंबल ओढ़े निद्रा में मग्न थीं, किंतु एक विचित्र बात ने मेरा ध्यान खींचा। उनके बगल वाली सीट पर बैठे उस अज्ञात वृद्ध का शरीर भी उसी कंबल के भीतर सिमटा हुआ था। संशय तो हुआ, पर समय और परिस्थिति ऐसी न थी कि मैं वहाँ रुककर छानबीन करता।

मैं अपनी सीट पर पहुँचा तो देखा दीदी सो रही थीं, और वह अजनबी युवक किसी भूखे भेड़िये की भांति उन्हें निहार रहा था। मेरे पहुँचते ही वह सकपका गया और बनावटी गंभीरता से अपने फोन में उलझ गया। दीदी की आँखें खुलीं, तो उन्होंने बड़े स्नेह से मेरा हाथ थाम लिया और मेरे कंधे पर सिर रख दिया। उनके चेहरे पर बिखरी लटों को जब मैंने हटाया, तो उनके मासूम चेहरे ने मेरा हृदय जीत लिया। पर तभी मैंने देखा कि वह युवक हमें घृणास्पद मुस्कान के साथ देख रहा था। उसकी वह मुस्कुराहट मुझे चुभ गई, मानो वह मेरे और दीदी के पवित्र संबंध को किसी और ही दृष्टि से देख रहा हो।

अचानक उस युवक ने दीदी को पुकारा और उनका फोन लौटाते हुए कहा— "यह लीजिए, काम हो गया।" मेरा माथा ठनका। दीदी ने एक अजनबी को अपना फोन क्यों दिया? क्या उन्हें आज के छल-कपट का ज्ञान नहीं?

जैसे ही विमान की भूमि से छुअन हुई, यात्रियों में उतरने की आपाधापी मच गई। मैंने चतुराई से दीदी को खिड़की वाली सीट दे दी और स्वयं उस युवक और दीदी के बीच की दीवार बन गया। उस युवक के चेहरे पर छाई मायूसी देख मुझे आत्मिक संतोष हुआ।

विमान से बाहर निकलते समय भीड़ का रेला आया। माँ, भैया और भाभी आगे निकल गए। मौसी के पीछे वही वृद्ध चल रहा था, जो न जाने क्या फुसफुसा रहा था। इसी बीच, न जाने किस प्रेरणा वश मैं पुनः शौचालय की ओर मुड़ा। जब बाहर निकला, तो द्वार पर वही परिचारिका खड़ी थी। उसने अब वेशभूषा बदल ली थी। जैसे ही उसकी और मेरी नज़रें मिलीं, उसने एक गुलाब का फूल मेरी ओर बढ़ाया।

वह मेरे कान के पास झुकी, उसकी उष्ण साँसें मेरे रोम-रोम में सिहरन पैदा कर गईं। उसने धीमे से कहा— "विदा, मेरे नए प्रियतम! मुझे भूलना मत।" और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उसके रसीले और कोमल होंठों ने मेरे गालों पर अपनी छाप छोड़ दी। मैं जड़वत खड़ा रह गया और वह लजाकर मुस्कुरा दी। मैं बिना पीछे मुड़े बाहर की ओर भागा।

बाहर भैया सामान के साथ प्रतीक्षारत थे। हम सब एक स्थान पर एकत्र हुए। दीदी अपने फोन में मग्न थीं। मुझसे रहा न गया, मैंने उलाहना देते हुए कहा— "दीदी, आप अजनबियों पर इतना विश्वास कैसे कर लेती हैं? उसे फोन देने की क्या आवश्यकता थी?"

दीदी ने कान से 'इयरपॉड' निकालते हुए सहज भाव से कहा— "अरे पगले, उसे कोई गुप्त जानकारी नहीं दी। उसके पास एक नई कहानियों की श्रृंखला (सीरीज) थी, बस वही ली है।" मैंने शंका व्यक्त की तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोलीं— "तेरी दीदी इतनी नादान नहीं है। उसने मेरा नाम, पता और परिचय सब जानना चाहा, पर मैंने उसे ठेंगा दिखा दिया। अपना काम निकल गया, बस काफी है।"

तभी भैया और भाभी प्रसन्नचित्त मुद्रा में आए और बोले— "माँ, सारा सामान गाड़ी में लद चुका है। चलिए, अब अपने नए घर, अपनी नई दुनिया की ओर कदम बढ़ाते हैं।"

विमान तल से बाहर निकलते हुए मेरे मन में एक ओर उस परिचारिका का स्पर्श था, तो दूसरी ओर नए घर की उत्सुकता। स्मृतियों का एक अध्याय पीछे छूट रहा था और नियति हमें एक नए मोड़ पर ले जा रही थी।
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#2
1. मुनमुन (भाभी)
मुनमुन इस परिवार की धुरी है। वह न केवल एक आदर्श बहू है, बल्कि अपनी सास (अनीता जी) के लिए बेटी और आयुष के लिए माँ जैसा साया है। वह शांत, समझदार और स्थिति को संभालने में माहिर है। उसमें ममता भी है और अनुशासन भी। घर के मुश्किल वक्त में उसने खुद को एक मजबूत ढाल की तरह पेश किया है।

2. आयुष (छोटा भाई)
आयुष परिवार का सबसे लाडला और चंचल सदस्य है। वह दिल का साफ है और अपनी दीदी व भाभी से बहुत जुड़ा हुआ है। उसकी उम्र ऐसी है जहाँ आकर्षण और जिज्ञासाएं उसे घेरती हैं (जैसे एयर होस्टेस वाला किस्सा), लेकिन उसके मन में अपने परिवार और दीदी की सुरक्षा को लेकर हमेशा एक फिक्र बनी रहती है।

3. अनीता जी (माँ/सासू माँ)
अनीता जी उस पुराने दौर की महिला हैं जिनके लिए उनका घर ही उनकी दुनिया थी। घर छोड़ते वक्त उनका भावुक होना उनके गहरे लगाव को दर्शाता है। वह स्वभाव से थोड़ी नरम हैं और अपने बच्चों (खासकर बहू मुनमुन) पर बहुत भरोसा करती हैं। पति के जाने के बाद वे थोड़ी सहमी सी रहने लगी हैं।

4. आयुषी (बड़ी बहन)
आयुषी आज के जमाने की सुलझी हुई लड़की है। वह जितनी अपनी माँ और भाइयों से प्यार करती है, उतनी ही व्यवहारिक (Practical) भी है। वह जानती है कि दुनिया से अपना काम कैसे निकलवाना है। उसका आत्मविश्वास उसे दूसरों से अलग बनाता है, जैसा कि उसने उस अजनबी लड़के को हैंडल किया।

5. अविनाश (बड़ा भाई)
अविनाश घर का जिम्मेदार पुरुष है। पिता के बाद पूरे परिवार और सामान की शिफ्टिंग का जिम्मा उसी के कंधों पर है। वह ज्यादा बातें नहीं करता, लेकिन उसकी मौजूदगी सबको सुरक्षा का एहसास कराती है। वह हर काम को योजनाबद्ध तरीके से करने में विश्वास रखता है।

6. वंदना (मौसी)
मौसी एक रहस्यमयी पर ममतामयी पात्र हैं। वे अविवाहित हैं और अपने भाई (अनीता जी के पति) के चले जाने के बाद से इसी परिवार का हिस्सा हैं। वे सरल स्वभाव की लगती हैं, लेकिन सफर के दौरान उनका व्यवहार (जैसे कंबल वाला हिस्सा) कहानी में एक नया पहलू जोड़ता है।
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#3
हवाई अड्डे से निकलने के बाद शहर की चकाचौंध के बीच हमारी गाड़ी एक पॉश सोसाइटी के सामने रुकी। ऊँची इमारतें, दूधिया रोशनी और ठंडी हवा का झोंका—सब कुछ वैसा नहीं था जैसा हमारा पुराना मोहल्ला था। भैया ने सामान उतारने के लिए गार्ड्स को निर्देश दिए।

गाड़ी से सारा सामान उतर चुका था। जैसे ही हम अपने नए फ्लैट के अंदर दाखिल हुए, वहां की आधुनिकता (modernity) ने सबको चकित कर दिया। मुनमुन भाभी सबसे पहले अंदर गईं। नई सोसाइटी के इस ऊंचे फ्लैट में सामान की पेटियां बिखरी पड़ी थीं। रात के 11 बज रहे थे और सफर की थकान सबकी आंखों में साफ दिख रही थी।

अविनाश भैया ने भारी मन से कहा, "आज बहुत रात हो गई है, सामान कल सुबह सेट करेंगे। अभी बस ज़रूरी चीज़ें निकाल लो और सब आराम करो।"

अनीता जी (माँ) सबसे ज़्यादा थकी हुई थीं। मुनमुन भाभी ने बड़ी कोमलता से उनका हाथ पकड़ा और उन्हें उनके कमरे तक ले गईं। "माँ जी, आप हाथ-मुँह धोकर लेट जाइए, मैं आपके लिए दूध गर्म कर देती हूँ," भाभी ने शांत स्वर में कहा। माँ ने बस थकी हुई मुस्कान दी और बेड पर बैठ गईं। भाभी का चेहरा भी थका हुआ था, उनकी आँखों के नीचे हल्के घेरे आ गए थे, पर उनकी ममता वैसी ही बनी हुई थी।

आयुषी दीदी अपने कमरे में जाकर बेड पर सीधे लेट गईं। उन्होंने अपना फोन साइड टेबल पर रख दिया था। विमान में उस अजनबी से हुई बातचीत और फोन के 'ट्रांसफर' वाले वाकये ने उन्हें थोड़ा सोच में डाल दिया था, पर अभी उनके पास सोचने की ताकत नहीं थी। उन्होंने बस अपनी आँखें मूंद लीं। कमरे की नई दीवारें और अजनबी गंध उन्हें थोड़ा असहज कर रही थी, पर नींद का गलबा ज़्यादा भारी था।

मौसी अपने कमरे की खिड़की से बाहर की पीली रोशनी देख रही थीं। वह जो कंबल वाला वाकया था, उसने उनके मन में एक अजीब सी झिझक पैदा कर दी थी। वह सोच रही थीं कि क्या उन्होंने उस अजनबी को कुछ ज़्यादा ही छूट दे दी थी? उन्होंने ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया और आईने में खुद को देखा। उनकी सादगी अब भी वैसी ही थी, पर शहर की इस पहली रात ने उनके मन में एक अनजाना सा डर और कौतूहल भर दिया था।

मैं (आयुष) हॉल में खड़ा होकर इन सबको देख रहा था। भैया बाहर बालकनी में खड़े होकर शायद अगले दिन की प्लानिंग कर रहे थे। घर में सन्नाटा था, बस एसी की हल्की सी आवाज़ गूँज रही थी।

तभी मुनमुन भाभी रसोई से दूध का गिलास लेकर निकलीं। मुझे वहां खड़ा देखकर वे रुकीं और मेरे सिर पर हाथ रखकर बोलीं, "आयुष, तू अभी तक सोया नहीं? जा, अपने कमरे में जा। आज का दिन बहुत लंबा था।"

मैंने भाभी की ओर देखा। उनके चेहरे पर वही पुरानी सौम्यता थी। वह 'एयर होस्टेस' वाला वाकया मेरे दिमाग में अब भी एक धुंधली याद की तरह था, पर भाभी की मौजूदगी ने मुझे फिर से सुरक्षित महसूस कराया।

"जी भाभी, जा रहा हूँ," कहकर मैं अपने कमरे की ओर बढ़ा।

सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। घर शांत था, पर इस शांति के पीछे एक नया अहसास था। यह शहर, यह सोसाइटी और यह नया फ्लैट—सब कुछ नया था। पुराने घर की यादें पीछे छूट गई थीं और एक नई सुबह का इंतज़ार था, जो शायद अपने साथ कुछ नए बदलाव लेकर आने वाली थी।

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की के पर्दों को चीरती हुई कमरे में आई, तो नींद और भारीपन का एक मिला-जुला अहसास था। नए शहर की सुबह पुराने घर जैसी नहीं थी—यहाँ पक्षियों की चहचहाहट की जगह गाड़ियों के हॉर्न और दूर से आती लिफ्ट की आवाज़ थी।

सबसे पहले मुनमुन भाभी की आँख खुली। सालों की आदत थी, सूरज ढलने से पहले जागना और घर को संभालना। उन्होंने उठकर अपनी साड़ी ठीक की और रसोई की ओर बढ़ीं। नया घर था, हर डिब्बा, हर बर्तन ढूँढना एक चुनौती थी।

अनीता जी (माँ) भी जल्दी उठ गई थीं। वे रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। भाभी ने उन्हें देखते ही मुस्कुराकर कहा— "माँ जी, सो तो ली थीं न आप? जगह बदलने पर अक्सर नींद देर से आती है।"

माँ ने एक ठंडी साँस भरी— "हाँ बहू, नींद तो आई पर बार-बार पुराने घर का आँगन याद आ जाता था। खैर, अब यही अपना बसेरा है।"
भाभी ने चाय का पतीला चढ़ाते हुए कहा— "धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा माँ जी। आप चाय पीजिये, मैं नाश्ते का कुछ प्रबंध करती हूँ।"

अविनाश भैया सुबह-सुबह ही फ़ोन पर लग गए थे। सामान के कुछ डब्बे अभी भी नीचे थे और बिजली वाले (इलेक्ट्रीशियन) को भी आना था। तभी डोरबेल बजी।

दरवाज़े पर सोसाइटी का सुपरवाइजर खड़ा था। भैया उससे बात करने लगे। तभी बगल वाले फ्लैट का दरवाज़ा खुला और एक महिला बाहर निकलीं। उन्होंने सभ्य तरीके से नमस्ते किया— "नमस्ते, मैं मिसेज खन्ना हूँ, आपकी पड़ोसन। अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बेझिझक कहियेगा।"

भैया ने शिष्टता से जवाब दिया— "जी शुक्रिया, बस अभी घर सेट कर रहे हैं।"

आयुषी दीदी और मौसी अभी भी अपने कमरों में थीं। सफर की थकान लड़कियों और बुजुर्गों पर ज़रा ज़्यादा असर करती है। मैंने (आयुष) देखा कि दीदी अपने बेड पर बैठीं अंगड़ाई ले रही थीं। उनका चेहरा सुबह की धूप में बहुत भोला लग रहा था। उन्होंने खिड़की खोली और नीचे बने स्विमिंग पूल को देखकर चौंक गईं— "अरे आयुष, देख तो सही! नीचे कितना बड़ा पूल है।"

मौसी भी बगल वाले कमरे से बाहर आईं। उनके बाल बिखरे हुए थे और आँखों में अभी भी नींद थी। उन्होंने बस इतना कहा— "बड़ी ऊंची जगह ले ली है अविनाश ने, नीचे देखने पर तो चक्कर आता है।"

नाश्ते के बाद भैया ने ऐलान किया— "चलो भाई, अब कमर कस लो। आज दोपहर तक सारा सामान अपनी जगह पर होना चाहिए।"

मज़दूर और कुछ बिजली वाले घर के अंदर आने लगे। घर में अजीब सी हलचल मच गई। मुनमुन भाभी हॉल में सोफे के कवर बिछा रही थीं, तभी एक युवा बिजली वाला (इलेक्ट्रीशियन) उनके पास आया। उसने बड़े अदब से पूछा— "मैडम जी, इस झूमर को कहाँ टाँगना है?"

भाभी ने ऊपर छत की ओर इशारा किया। झूमर काफी भारी था और ऊपर हुक तक हाथ नहीं पहुँच रहा था। वह लड़का सीढ़ी लगाकर चढ़ा, पर संतुलन बिगड़ने लगा। भाभी ने अनजाने में सीढ़ी को सहारा देने के लिए उसे थाम लिया। उस समय भाभी का पूरा ध्यान सीढ़ी पर था, पर उस लड़के की नज़रें नीचे झुककर भाभी की ओर देख रही थीं। भाभी के माथे पर मेहनत की वजह से पसीने की छोटी-छोटी बूंदें आ गई थीं और उनकी साड़ी का पल्लू काम के चक्कर में बार-बार कंधे से फिसल रहा था।

मैंने दूर खड़े होकर देखा कि वह लड़का झूमर कम और भाभी को ज़्यादा देख रहा था। पर भाभी अपनी सहजता में उसे बस हिदायत दे रही थीं— "ज़रा ध्यान से, कहीं गिर न जाओ।"

दोपहर ढलते-ढलते घर का हुलिया थोड़ा बदलने लगा था। चारों तरफ गत्ते के डिब्बे, सुतली और पैकिंग वाले कागज बिखरे हुए थे। घर को व्यवस्थित करने की इस जद्दोजहद में पसीने और धूल ने सबको बेहाल कर रखा था।

हॉल में झूमर लग चुका था, लेकिन अभी भी बहुत सा काम बाकी था। अविनाश भैया बाहर सोसाय़टी के दफ्तर गए थे कुछ कागजी कार्रवाई पूरी करने। घर में मैं (आयुष), माँ, भाभी, दीदी और मौसी थे, और साथ में वे दो-तीन बाहरी कामगार जो सामान सेट कर रहे थे।

मुनमुन भाभी रसोई में डिब्बे सेट कर रही थीं। गर्मी और थकान की वजह से उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया था ताकि काम करने में आसानी हो। तभी वही बिजली वाला लड़का, जो झूमर लगा रहा था, रसोई के पास आया और बोला— "मैडम जी, वाटर प्यूरीफायर का प्लग चेक करना है, ज़रा रास्ता देंगे?"

रसोई काफी संकरी थी। जैसे ही वह लड़का अंदर दाखिल हुआ, भाभी को एक तरफ दबकर उसे जगह देनी पड़ी। भाभी ऊपर वाले कैबिनेट में मसाले के डिब्बे रख रही थीं, जिससे उनका हाथ ऊपर की ओर तना हुआ था। उस लड़के ने झुककर प्लग ठीक करने का बहाना किया, लेकिन उसकी नज़रें तिरछी होकर भाभी के खुले हुए पेट और कमर के उस हिस्से पर टिकी थीं जो साड़ी के सरकने से साफ़ दिख रहा था। भाभी अपनी धुन में काम कर रही थीं, पर उस लड़के की सांसें तेज़ हो रही थीं। वह जानबूझकर भाभी के पैरों के पास झुककर काम को लंबा खींच रहा था।

तभी डोरबेल बजी। भैया बाहर थे, इसलिए मैंने दरवाज़ा खोला। सामने एक लम्बा, गठीला युवक खड़ा था। उसने जिम वाली टी-शर्ट पहनी थी जिससे उसके बाजू साफ़ झलक रहे थे। उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराते हुए कहा— "नमस्ते, मैं बगल वाले फ्लैट से हूँ, राहुल। भैया (अविनाश) ने मुझे कुछ सामान सेट करवाने के लिए कहा था।"

जैसे ही वह अंदर आया, घर का माहौल अचानक बदल गया। मुनमुन भाभी हॉल में आईं, उनका पल्लू अभी भी थोड़ा ढीला था। जब राहुल की नज़र भाभी पर पड़ी और भाभी की राहुल पर, तो पल भर के लिए वहां सन्नाटा छा गया।

राहुल ने भाभी की ओर देखते हुए बड़े सलीके से कहा— "भाभी जी, आप फिक्र मत कीजिये, मैं सब संभाल लूँगा। आप बस मुझे निर्देश दीजिये।"

भाभी ने एक गहरी सांस ली और बड़े धीमे स्वर में कहा— "शुक्रिया राहुल, सच में हमें मदद की बहुत ज़रूरत थी।"

दूसरी ओर, आयुषी दीदी और मौसी अपने कमरे की अलमारियां ठीक कर रही थीं। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। राहुल हाथ में कुछ जूस के गिलास लेकर खड़ा था। "नमस्ते! मम्मी ने भेजा है, आप लोग सुबह से काम में जुटे हैं, थोड़ा फ्रेश हो जाइए," उसने बड़ी सहजता से कहा।

दीदी ने मुस्कुराकर गिलास थाम लिया। राहुल अंदर आ गया और सामान उठाने में मदद करने लगा। वह दीदी से बातें कर रहा था और बार-बार उनके करीब जाकर भारी सूटकेस उठाने की पेशकश कर रहा था। मैंने गौर किया कि राहुल की नज़रें दीदी के गले और उनके झुके हुए कंधों पर फिसल रही थीं। दीदी हँस-हँसकर उससे बातें कर रही थीं, उन्हें राहुल की मदद अच्छी लग रही थी, पर शायद वे उस 'शिकारी' नज़र को नहीं देख पा रही थीं जो राहुल की आँखों में तैर रही थी।

मौसी बेड पर बैठीं चादरें तह कर रही थीं। राहुल ने एक भारी संदूक उठाते हुए मौसी की ओर देखा और बोला— "मौसी जी, आप थक गई होंगी, लाइये मैं ये ऊपर रख देता हूँ।" राहुल जब संदूक रखने के लिए मौसी के पास से गुज़रा, तो उसका हाथ 'गलती' से मौसी के घुटने से रगड़ गया। मौसी ने एक पल के लिए अपनी आँखें ऊपर उठाईं, उनके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच और चौंकने का भाव आया, पर राहुल ने तुरंत "ओह सॉरी" कहकर बात संभाल ली। मौसी कुछ नहीं बोलीं, बस अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और कस लिया।

मैं हॉल में बैठकर इन सब दृश्यों को देख रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये बाहरी लोग मदद के बहाने मेरे घर की औरतों के इतने करीब कैसे पहुँच रहे हैं। वह बिजली वाला लड़का रसोई से बाहर ही नहीं निकल रहा था, और राहुल अब दीदी के कमरे में पूरी तरह जम चुका था।

तभी माँ ने आवाज़ दी— "आयुष, ज़रा भाभी की मदद कर दे रसोई में।"

मैं जैसे ही रसोई की तरफ बढ़ा, मैंने देखा कि वह बिजली वाला लड़का प्यूरीफायर ठीक कर चुका था, लेकिन वह अभी भी भाभी के पीछे खड़ा होकर उन्हें कुछ समझा रहा था। उसका शरीर भाभी से बस कुछ इंच की दूरी पर था। भाभी जैसे ही पीछे मुड़ीं, वे लगभग उससे टकराते-टकराते बचीं। वह लड़का मुस्कुराते हुए बोला— "ध्यान से मैडम जी, जगह कम है न!"

भाभी के चेहरे पर एक हल्की सी लाली छा गई। वे बस "जी, शुक्रिया" कहकर बाहर निकल आईं, पर मैंने देखा कि उनके हाथों में एक हल्की सी कंपन थी।

दोपहर के दो बज चुके थे। बाहर सूरज की तपिश तेज़ थी, लेकिन फ्लैट के अंदर उमस और धूल ने सबका बुरा हाल कर रखा था। घर अब भी पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हुआ था, पर रहने लायक शक्ल लेने लगा था।

रसोई में मुनमुन भाभी अब अकेली थीं। वह बिजली वाला लड़का काम खत्म करके हॉल में जा चुका था, पर भाभी के मन में अब भी एक अजीब सी हलचल थी। उन्होंने एक गिलास ठंडा पानी पिया और अपनी हथेलियों को देखा, जो काम की वजह से लाल हो गई थीं। तभी उन्होंने महसूस किया कि उनकी पीठ पर पसीने की एक बूंद धीरे से सरक रही है। उन्होंने पल्लू से उसे सुखाना चाहा, पर उनके हाथ वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहे थे।

तभी उन्होंने देखा कि वही बिजली वाला लड़का रसोई के दरवाज़े के पास खड़ा अपना औज़ार ढूँढ रहा है। उनकी नज़रें मिलीं—भाभी ने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं और साड़ी के पल्लू को ठीक करने का बहाना करने लगीं। उस लड़के ने कुछ कहा नहीं, बस एक गहरी साँस ली और अपना सामान उठाकर चला गया। वह पल छोटा था, पर भाभी के चेहरे पर चढ़ी लाली ने बता दिया कि वह पल कितना भारी था।

उधर आयुषी दीदी के कमरे में राहुल अभी भी मदद करवा रहा था। वह बहुत चतुराई से बात कर रहा था। "आयुषी जी, आप शहर की लड़कियों जैसी बिल्कुल नहीं लगतीं, आपकी सादगी में ही असली चमक है।" दीदी ने बस एक हल्की सी मुस्कान दी, पर उनके कान थोड़े लाल हो गए थे।

राहुल जब भारी अलमारी को दीवार से सटा रहा था, तो उसने दीदी से कहा— "ज़रा उस तरफ से हाथ लगाइएगा?" दीदी ने जैसे ही हाथ बढ़ाया, राहुल का हाथ दीदी की उंगलियों के ठीक ऊपर था। स्पर्श मात्र एक सेकंड का था, पर दीदी ने तुरंत अपना हाथ खींच लिया। राहुल ने ऐसा जताया जैसे उसे कुछ पता ही न चला हो, पर उसने अपनी नज़रों से दीदी को ऊपर से नीचे तक एक बार फिर नाप लिया। दीदी के मन में एक अजीब सा संकोच पैदा हो गया था, पर वे उसे 'दोस्ताना मदद' समझकर नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रही थीं।

अनीता जी और मौसी अब हॉल के सोफे पर बैठी थीं। मौसी का ध्यान बार-बार अपने पैरों की ओर जा रहा था, जहाँ राहुल का स्पर्श हुआ था। वे बार-बार अपनी साड़ी को नीचे खींच रही थीं, मानो उस स्पर्श की याद को मिटाना चाह रही हों। मौसी ने अनीता जी से कहा— "दीदी, शहर के लोग बड़े मददगार होते हैं न? देखो, वह लड़का राहुल कितनी मेहनत कर रहा है।"

अनीता जी ने बस सिर हिलाया। उनके मन में पुराने घर की यादें थीं, पर मौसी की आँखों में इस नए शहर को लेकर एक नई चमक और थोड़ा सा खौफ, दोनों साथ-साथ तैर रहे थे।

मैं (आयुष) सब देख रहा था। मुझे राहुल का बार-बार दीदी के पास जाना और उस बिजली वाले लड़के का भाभी को छिप-छिप कर देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। पर मैं क्या कर सकता था? वे सब तो मदद ही कर रहे थे।

तभी भाभी रसोई से बाहर आईं। उनके चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी। उन्होंने मुझसे कहा— "आयुष, जा देख तो भैया आए क्या? और राहुल को भी बोल दे कि अब बहुत काम हो गया, बाकी हम देख लेंगे।"

भाभी की आवाज़ में एक घबराहट थी, जो शायद उन्होंने खुद भी महसूस की थी। वे अब और अधिक 'मदद' लेने के पक्ष में नहीं थीं, क्योंकि अजनबियों की वह करीबी अब धीरे-धीरे मर्यादा की सीमाओं को छूने लगी थी।

शाम के पाँच बज रहे थे। खिड़की से आती धूप अब सुनहरी पड़ चुकी थी। घर का काफी सामान अपनी जगह पहुँच चुका था, पर थकान अब चेहरों पर साफ झलक रही थी। राहुल अभी भी वहीं था, वह थकावट के बावजूद जाने का नाम नहीं ले रहा था।

मुनमुन भाभी रसोई में चाय बनाने गईं। सुबह से काम करते-करते उनके बाल बिखर गए थे और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें फिर से चमकने लगी थीं। तभी राहुल रसोई के दरवाज़े पर आकर रुक गया।

"भाभी जी, एक गिलास पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है।" राहुल की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।

भाभी ने जैसे ही पलटकर देखा, राहुल ठीक उनके पीछे खड़ा था। रसोई में जगह कम थी, और राहुल का कद ऊँचा था। भाभी ने घबराकर एक गिलास पानी भरा और उसकी ओर बढ़ाया। जब राहुल ने गिलास पकड़ा, तो उसकी उँगलियों का स्पर्श भाभी के हाथ से थोड़ा ज़्यादा देर तक रहा। भाभी ने तुरंत अपना हाथ खींच लिया, जिससे पानी की कुछ बूंदें उनकी साड़ी के पल्लू और राहुल के हाथ पर गिर गईं।

"ओह, माफ़ कीजियेगा..." राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी नज़रें भाभी के चेहरे पर टिकी थीं, जो संकोच से गुलाबी पड़ गया था। भाभी ने बस एक हल्की सी गर्दन हिलाई और चाय के कप सेट करने में व्यस्त हो गईं। वह स्पर्श छोटा था, पर भाभी को अपने हाथ में अब भी एक अजीब सी सिहरन महसूस हो रही थी।

हॉल में आयुषी दीदी और मौसी सोफे पर बैठी थीं। राहुल पानी पीकर वापस आया और उनके सामने वाले स्टूल पर बैठ गया। दीदी ने राहुल की ओर देखते हुए कहा— "राहुल, तुमने आज बहुत मदद की, सच में हम अकेले नहीं कर पाते।"

राहुल ने दीदी की आँखों में आँखें डालकर कहा— "पड़ोसी ही पड़ोसी के काम न आए, तो फिर क्या फायदा? और वैसे भी, आपकी मदद करने में थकान का पता ही नहीं चला।" दीदी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उन्हें राहुल की ये बेबाकी थोड़ी अजीब लग रही थी, पर साथ ही एक अनजाना सा रोमांच भी महसूस हो रहा था।

मौसी चुपचाप यह सब देख रही थीं। उन्हें राहुल का बार-बार घर में रुकना थोड़ा खटक रहा था, पर उसकी मदद को नज़रअंदाज़ करना भी मुश्किल था। तभी मौसी के पैर में हल्का सा खिंचाव (cramp) आया और वे धीरे से कराह उठीं। दीदी घबरा गईं— "क्या हुआ मौसी?"

"कुछ नहीं बेटा, बस नस चढ़ गई शायद," मौसी ने पैर मलते हुए कहा। राहुल तुरंत आगे बढ़ा— "मौसी जी, मैं दबा दूँ? मुझे एक्यूप्रेशर का थोड़ा पता है।" मौसी ने हड़बड़ाकर अपना पैर पीछे खींच लिया और साड़ी ठीक करते हुए बोलीं— "अरे नहीं-नहीं बेटा, ठीक है, तू बैठ।" मौसी के इनकार में एक डर था, पर राहुल की नज़रों में अब भी वही बेतकल्लुफी थी।

मैं (आयुष) कोने में खड़ा होकर चाय के कप उठा रहा था। मैंने देखा कि भाभी रसोई से बाहर आईं, तो उनकी साड़ी का वह हिस्सा जहाँ पानी गिरा था, शरीर से चिपका हुआ था। वे बार-बार उसे ठीक करने की कोशिश कर रही थीं, पर राहुल की नज़रें वहीं जमी हुई थीं।

चाय पीते वक्त भी घर में एक भारी सन्नाटा था। कोई कुछ बोल नहीं रहा था, पर हर किसी के मन में कुछ न कुछ चल रहा था। दीदी बार-बार अपने फोन को देख रही थीं, शायद उस अजनबी लड़के का कोई मैसेज आया हो। मौसी संकोच में डूबी हुई थीं, और भाभी की नज़रें फर्श से उठ ही नहीं रही थीं।

राहुल ने चाय का कप मेज़ पर रखा और उठते हुए बोला— "ठीक है, अब मैं चलता हूँ। रात को अगर किसी और चीज़ की ज़रूरत हो, तो मेरा फ्लैट ठीक बगल में ही है। झिझकियेगा मत।"

उसके जाने के बाद घर में जैसे हवा फिर से बहने लगी। पर वह जो एक 'अजनबियत' और 'करीबी' का मिला-जुला अहसास राहुल छोड़ गया था, वह घर की हवाओं में घुल चुका था।

दिन भर की भागदौड़ और राहुल के जाने के बाद घर में फिर से वही शांति छा गई थी, जो एक नई जगह पर अक्सर महसूस होती है। रात के नौ बज रहे थे। सामान लगभग लग चुका था, पर घर के कोनों में अभी भी कुछ खालीपन बाकी था।

आयुषी दीदी अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थीं। बाहर सोसायटी की ऊंची इमारतों की रोशनियाँ टिमटिमा रही थीं। उनके हाथ में उनका फोन था। वह बार-बार उसे खोलतीं और फिर बंद कर देतीं। वह जो अजनबी लड़का विमान में मिला था, उसने जो डेटा ट्रांसफर किया था, उसमें सिर्फ सीरीज नहीं थी, बल्कि उसका नाम और एक छोटा सा 'नोट' भी था। दीदी उसे पढ़ रही थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो वह खुद से भी छिपाना चाह रही थीं। वह अजनबी अब उनके ख्यालों में अपनी जगह बना रहा था, पर दीदी अभी भी संकोच की दीवार के पीछे थीं।

मुनमुन भाभी कमरे में अलमारी सेट कर रही थीं। अविनाश भैया लैपटॉप पर कुछ ऑफिस का काम कर रहे थे। भाभी का ध्यान बार-बार अपने उस हाथ पर जा रहा था जहाँ राहुल का स्पर्श हुआ था। उन्हें राहुल की वह बेबाक नज़रें याद आ रही थीं। उन्होंने आईने में खुद को देखा—चेहरे पर थकान थी, पर न जाने क्यों, उस अजनबी की तारीफ ने उनके भीतर एक दबी हुई स्त्री को जगा दिया था। वह अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए गहरी सोच में डूबी थीं। क्या वह स्पर्श सच में अनजाने में हुआ था या उसमें कोई और बात थी? यह सवाल उनके मन में एक सिहरन पैदा कर रहा था।

मौसी अपने बिस्तर पर लेटी थीं, पर नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी। वह राहुल का वह "मौसी जी, मैं दबा दूँ?" कहना और उनके पैर की ओर बढ़ता उसका हाथ बार-बार उनकी बंद आँखों के सामने आ रहा था। सालों से एकाकी जीवन जी रही मौसी के लिए किसी जवान लड़के का ऐसा जुड़ाव अजीब और डरावना, पर कहीं न कहीं चौंकाने वाला भी था। वे अपनी साड़ी को और कसकर ओढ़ लेतीं, मानो खुद को उन ख्यालों से बचाना चाह रही हों।

मैं (आयुष) हॉल में सोफे पर लेटा हुआ था। घर के हर कमरे से आती मद्धम रोशनी और खामोशी मुझे बहुत कुछ कह रही थी। मुझे महसूस हो रहा था कि घर की औरतें आज कुछ बदली-बदली सी हैं। वह पुराना शहर और पुराने घर की मर्यादा यहाँ आकर थोड़ी सी शिथिल (loose) पड़ने लगी थी।

तभी मैंने देखा कि भाभी रसोई की ओर जा रही हैं, शायद पानी पीने। उनके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। उसी समय बालकनी की ओर से राहुल के फ्लैट से संगीत की धीमी आवाज़ सुनाई दी। वह धुन बहुत ही मदहोश कर देने वाली थी। भाभी रसोई की खिड़की के पास रुक गईं और कुछ पल के लिए उस संगीत को सुनने लगीं।

अचानक भैया ने आवाज़ दी— "मुनमुन, वो मेरी नीली फ़ाइल कहाँ रखी है?"

भाभी चौंककर ख्यालों से बाहर आईं और हड़बड़ाहट में बोलीं— "जी, अभी लाई!"
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