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13-04-2026, 01:24 AM
(This post was last modified: 13-04-2026, 10:47 PM by Pramod_Bhasin. Edited 4 times in total. Edited 4 times in total.)
हल्लो दोस्तों
मैं बहुत टाइम से xossipy का fan रहा हूँ। अब सोचा के यहाँ एक स्टोरी पोस्ट करू। यह कहानी लिखने का मेरा पहला प्रयास है।
उम्मीद करता हूँ के आप सब को यह कहानी अच्छी लगेगी।
यह एक लम्बी कहानी होने वाली है।
प्लीज मुझे प्रोत्साहित करना और कहानी को कैसे रोमांचक बनाया जाए, इस पर सुझाव और विचार देना।
इस कहानी के सभी पत्र काल्पनिक हैं।
यह कहानी वास्तविक घटनाओं पर बिलकुल भी आधारित नहीं है।
इस कहानी के सभी पात्र 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के हैं।
............
इस कहानी के मुख्या पात्र:
कौशिक - एक युवा, लंबा, 18 वर्षीय, हट्टा-कट्टा लड़का जो कॉलेज में पढ़ता है।
श्रीमती मौशुमी दास - एक अधेड़ उम्र की सांवली रंगत वाली बंगाली महिला, जिसका शरीर सुडौल है। वह बेंगलुरु स्थित एक स्टार्टअप, ATI Systems मे ट्रेनिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं।
आलोक दास- मौशुमी के पति। वह पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं।
प्रकाश- मौशुमी के कार्यालय में काम करने वाला एक युवा इंटर्न।
दीपक- मौशुमी का सहकर्मी।
मनीशा- कौशिक की गर्ल फ्रेंड। वह एक एयरहोस्टेस हैं।
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तो बिना किसी देरी के, चलिए कहानी शुरू करते हैं।
बेंगलुरु की शाम, ढलते सूरज के साथ एक नारंगी रंग की चादर ओढ़ रही थी, जब मौशुमी और कौषिक अपने हाई-राइज अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स के पास के पार्क में टहलने के लिए निकले। मौशुमी, अपनी साड़ी में लिपटी, अपने काम के दिन की थकान को हवा में छोड़ रही थी। उसके माथे पर सिंदूर, लाल बिंदी, और कलाई में शंखा-पोला, एक पारंपरिक बंगाली गृहिणी की छवि गढ़ते थे। कौषिक, उसका अठारह वर्षीय बेटा, अपनी युवा ऊर्जा से भरपूर, माँ के बगल में चल रहा था। उसकी मजबूत काया उसके हर कदम में झलकती थी।
पार्क में हल्की चहल-पहल थी। बच्चे झूले पर झूल रहे थे, कुछ बुजुर्ग बेंचों पर बैठे गपशप कर रहे थे। एक कोने में, झाड़ियों के पीछे, कौषिक की नज़र पड़ी। उसका चेहरा एक पल के लिए बदल गया, कुछ उत्सुकता, कुछ शरारत। उसने मौशुमी को इशारा किया।
"माँ, उधर देखो।"
मौशुमी ने उसकी दिशा में देखा। उसकी आँखें पहले तो समझ नहीं पाईं, फिर एक अजीब सी उलझन उसके चेहरे पर छा गई। दो आवारा कुत्ते, एक-दूसरे से गुंथे हुए थे, एक प्राचीन नृत्य में, जिसमें कोई शर्म नहीं थी, केवल सहजता थी। उनका शरीर एक-दूसरे से चिपका हुआ था, नर कुत्ता मादा के ऊपर चढ़ा हुआ था, उसके हर धक्के के साथ एक धीमी, गति पैदा हो रही थी। मौशुमी की साँस अटक सी गई। उसके मन में एक अजीब सी हलचल हुई। उसकी आँखों में पहले असमंजस था, फिर एक गहरी, लगभग अनजानी, जिज्ञासा। वह उन्हें देखती रही"ये... ये क्या कर रहे हैं?" उसने काहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपन थी।
कौषिक ने अपनी नज़रें उन पर से हटाकर अपनी माँ के चेहरे पर डालीं। उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान तैर रही थी, मानो वह उसके भीतर की हलचल को समझ रहा हो।
"वे... बच्चे पैदा कर रहे हैं, माँ," उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में कोई शर्म नहीं थी, बस एक सीधा-सादा जवाब था।
मौशुमी ने उसकी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, उसकी आँखें अभी भी उन कुत्तों पर टिकी थीं। कुतिया की पीठ पर नर कुत्ते का दबाव, उसके हर धक्के के साथ उसकी कमर का ऊपर-नीचे होना, और फिर वह अजीब सी गाँठ जिसमें वे बँध गए थे। वह एकटक देखती रही, जैसे कोई रहस्य उसके सामने खुल रहा हो। उसके भीतर कुछ टूट रहा था, कुछ नया जागृत हो रहा था।
उसके हाथों ने अनजाने में कौषिक का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ कौषिक की हथेली में समा गईं, एक अजीब सी गर्मी का एहसास कराती हुई।
कौषिक ने उसके हाथ की पकड़ को महसूस किया। उसकी उँगलियों ने भी मौशुमी की हथेली को धीरे से सहलाया। दोनों चुपचाप खड़े रहे। कुछ मिनटों बाद, जब कुत्ते अलग हुए, तो मौशुमी ने एक गहरी साँस ली, जैसे वह अब तक अपनी साँस रोके हुए थी।
"चलो, कौषिक," उसने कहा, उसकी आवाज़ अब भी थोड़ी कांप रही थी। "बहुत देर हो गई।"
वे धीरे-धीरे पार्क से बाहर निकले, उनके कदम अपार्टमेंट की ओर बढ़ रहे थे। मौशुमी का हाथ अभी भी कौषिक के हाथ में था, और उसकी पकड़ पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत थी। रास्ते भर कोई बात नहीं हुई। दोनों के मन में उन कुत्तों का दृश्य घूम रहा था, जिसने उनके बीच एक अनकही भावना को जन्म दे दिया था। मौशुमी के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक ऐसी आग जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। कौषिक भी अपनी माँ के बदले हुए रूप को देखकर हैरान था। उसे लग रहा था, जैसे कुछ बदल गया है, उनके बीच की दीवारें टूट रही हैं।
घर पहुँचते ही, मौशुमी सीधे अपने कमरे में चली गई। उसने अपनी साड़ी भी नहीं बदली, बस बिस्तर पर बैठ गई, उसके दिमाग में विचारों का एक बवंडर चल रहा था। वह दृश्य, वह आदिम क्रिया, उसके मन में बार-बार कौंध रही थी। उसे लगा जैसे उसके शरीर में एक अजीब सी सनसनी दौड़ रही है, एक अनजानी इच्छा, जिसे वह समझ नहीं पा रही थी। वह अपनी आँखें बंद करती, तो उसे उन कुत्तों की गति दिखाई देती।
कुछ देर बाद, दरवाज़ा धीरे से खुला। कौषिक अंदर आया। उसने मौशुमी की ओर देखा, जो अभी भी अपनी ऑफिस की साड़ी में थी, उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी और उत्तेजना का मिश्रण था। वह धीरे-धीरे उसके पास आया और बिस्तर के किनारे बैठ गया।
"माँ, आप ठीक हैं?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ में चिंता थी, लेकिन आँखों में कुछ और थी।
मौशुमी ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में एक गहरा दर्द था, लेकिन साथ ही एक अनकही पुकार भी। उसने अपना हाथ बढ़ाया और धीरे से कौषिक के गाल को छुआ।
"मैं... मैं नहीं जानती, कौषिक," उसने काहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कमज़ोरी थी। "मुझे... मुझे अजीब लग रहा है।"
कौषिक ने उसके हाथ को अपने हाथ में लिया और उसे कसकर पकड़ लिया। उनकी आँखें मिलीं, और उस पल में, समय थम सा गया। उनके बीच की सारी दूरियाँ मिट गईं, केवल भावनाएँ बचीं – कच्ची, अनगढ़, और तीव्र।
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13-04-2026, 04:38 PM
(This post was last modified: 13-04-2026, 10:29 PM by Pramod_Bhasin. Edited 4 times in total. Edited 4 times in total.)
कौशिक ने कुछ देर तक उसे देखा, उसकी आँखें उसकी माँ के चेहरे पर टिकी थीं, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो। "माँ, मुझे कुछ पूछना था।"
मौशुमी ने अपनी साँस रोकी। उसे पता था कि वह क्या पूछने वाला था। "क्या, बेटा?"
"वो कुत्ते… वो ऐसा क्यों कर रहे थे?" उसकी आवाज़ धीमी थी, लगभग फुसफुसाहट।
मौशुमी ने उसे अपने पास बैठने का इशारा किया। कौशिक बिस्तर पर उसके बगल में बैठ गया, लेकिन थोड़ी दूरी बनाए रखी। मौशुमी ने अपनी उंगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू पर फिराईं।
"बेटा, वो… वो जानवरों का प्यार जताने का तरीका होता है," मौशुमी ने कहा, उसके शब्दों में एक हिचकिचाहट थी। "वे एक-दूसरे के साथ मिलकर नए बच्चे पैदा करते हैं।"
कौशिक ने ध्यान से सुना। "इंसान भी ऐसे करते हैं?" उसने पूछा, उसकी आँखें उसकी माँ की आँखों में गहराई से झाँक रही थीं।
मौशुमी को लगा जैसे किसी ने उसके पेट में मुक्का मारा हो। उसके गाल फिर से लाल हो गए। उसने अपनी नज़र हटाई। "कुछ-कुछ ऐसा ही, बेटा," उसने कहा, उसकी आवाज़ और भी धीमी हो गई थी। "लेकिन इंसानों में… यह थोड़ा अलग होता है।"
"कैसे अलग?" कौशिक ने जोर दिया, उसकी जिज्ञासा कम नहीं हुई थी।
मौशुमी ने एक गहरी साँस ली। उसे नहीं पता था कि उसे क्या कहना चाहिए। यह पहली बार था जब उसने अपने बेटे के साथ ऐसी बात की थी। उसने सोचा कि उसके पति को यह सब समझाना चाहिए था, लेकिन आलोक हमेशा इन बातों से बचते थे।
"बेटा, यह… यह बहुत निजी बात होती है," मौशुमी ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपकंपी थी। "जब दो लोग एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं, तो वे एक-दूसरे के बहुत करीब आते हैं।"
कौशिक ने अपनी नज़र उसकी माँ के शरीर पर डाली, उसके दिख रहे उभारों पर। मौशुमी को महसूस हुआ कि उसकी नज़र कहाँ है, और उसके शरीर में एक अजीब सी हलचल हुई।
"क्या तुम पापा से भी ऐसा करती हो?" कौशिक ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक नई सी आवाज़ थी, एक ऐसी आवाज़ जो मौशुमी ने पहले कभी नहीं सुनी थी।
मौशुमी का दिल ज़ोर से धड़का। यह सवाल अनपेक्षित था। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और उसके गालों पर और भी ज़्यादा गर्मी चढ़ गई। "बेटा, यह… यह ऐसी बातें नहीं हैं जो हमें अपने बच्चों से करनी चाहिए।"
"पर क्यों नहीं?" कौशिक ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची की। "तुमने ही तो कहा कि प्यार जताने का तरीका है। क्या तुम पापा से प्यार नहीं करती?"
मौशुमी ने अपनी आँखें खोलीं और अपने बेटे की ओर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चुनौती थी, एक ऐसी चीज़ जो उसे परेशान कर रही थी। "मैं करती हूँ, बेटा," उसने फुसफुसाया। "मैं करती हूँ।"
"तो फिर तुम मुझे क्यों नहीं बता सकती?" कौशिक ने उसके करीब आकर पूछा। उसकी साँसें मौशुमी के चेहरे पर पड़ रही थीं, और मौशुमी को महसूस हुआ कि उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ रही है।
मौशुमी को लगा जैसे वह एक जाल में फँस गई हो। उसे पता था कि उसे अपने बेटे को कुछ बताना चाहिए, लेकिन उसे यह भी पता था कि वह क्या नहीं बताना चाहती थी। उसने अपने हाथ से कौशिक के बालों को सहलाया। उसके बाल नरम और घुंघराले थे, और उसकी उंगलियों को छूने पर उसे एक अजीब सी सनसनी हुई।
"बेटा, यह एक बहुत ही… अंतरंग बात होती है," मौशुमी ने कहा, उसके होंठ काँप रहे थे। "जब दो लोग एक-दूसरे के बहुत करीब आते हैं, तो उनके शरीर भी एक-दूसरे के बहुत करीब आते हैं। वे एक-दूसरे को छूते हैं, गले लगाते हैं, और… और प्यार करते हैं।"
"जैसे कुत्ते कर रहे थे?" कौशिक ने पूछा, उसकी आँखें अब भी उसकी माँ के चेहरे पर टिकी थीं।
मौशुमी ने अपनी नज़र हटाई। "कुछ-कुछ वैसा ही, बेटा। लेकिन हम इंसान… हम इसे और भी खूबसूरती से करते हैं।" उसने अपने शब्दों को चुना, जैसे वह एक पतली रस्सी पर चल रही हो।
कौशिक ने मौशुमी के हाथ को पकड़ा। उसकी उंगलियाँ मौशुमी की उंगलियों पर फँस गईं। मौशुमी को लगा जैसे बिजली का एक झटका उसके शरीर में दौड़ गया हो। कौशिक का हाथ गर्म था, और उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"माँ, क्या तुम मुझे दिखा सकती हो?" कौशिक ने पूछा, उसकी आवाज़ अब केवल फुसफुसाहट थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी दृढ़ता थी।
मौशुमी का दिल उसके सीने में पागलों की तरह धड़कने लगा। उसे लगा जैसे उसकी साँसें अटक गई हों। यह क्या था जो उसका बेटा पूछ रहा था? यह क्या था जो उसके मन में चल रहा था? उसके शरीर में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक ऐसी बेचैनी जिसे वह दबाने की कोशिश कर रही थी।
"कौशिक, यह… यह सही नहीं है," मौशुमी ने कहा, उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तुम मेरे बेटे हो।"
"तो क्या हुआ?" कौशिक ने कहा, उसकी आँखें अब और भी ज़्यादा चमकदार थीं। "तुमने ही तो कहा कि प्यार जताने का तरीका है। क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती?"
मौशुमी को लगा जैसे वह एक गहरे कुएँ में गिर रही हो। उसके बेटे की बातें उसके दिल को छू रही थीं, लेकिन उसके दिमाग को डरा रही थीं। उसे पता था कि यह गलत है, यह बहुत गलत है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी इच्छा जागृत हो रही थी, एक ऐसी इच्छा जिसे वह वर्षों से दबाए हुए थी।
कौशिक ने मौशुमी के हाथ को और कसकर पकड़ा, और धीरे से उसे अपने करीब खींचा। मौशुमी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसका शरीर भारी था, लेकिन वह अपने बेटे की ओर झुक गई। कौशिक ने अपना दूसरा हाथ मौशुमी के गाल पर रखा। उसका स्पर्श गर्म और नरम था।
"माँ," कौशिक, "मैं बस समझना चाहता हूँ।"
मौशुमी की आँखें बंद हो गईं। उसे महसूस हुआ कि उसके होंठ काँप रहे हैं। उसे पता था कि यह एक गलती थी, एक भयानक गलती, लेकिन वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ रही थी, एक ऐसी गर्मी जो उसे पिघला रही थी।
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13-04-2026, 08:42 PM
(This post was last modified: 13-04-2026, 10:31 PM by Pramod_Bhasin. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
धीरे-धीरे, कौषिक उसके और करीब आया। उसने अपना दूसरा हाथ मौशुमीके गाल पर रखा, और उसे अपनी ओर झुकाया। मौशुमीने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी ओर और झुक गई। उनके होंठ एक-दूसरे से मिले, पहले हल्के से, फिर एक तीव्र आवेग के साथ। यह एक साधारण चुंबन नहीं था; यह एक प्यास थी, एक भूख थी। मौशुमी के होंठों पर कौषिक के होंठों का दबाव बढ़ा, और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस पल में पूरी तरह डूब जाना चाहती हो।
कौषिक ने उसके ऊपरी होंठ को अपने होंठों में भर लिया, उसे धीरे से चूसा, फिर नीचे वाले होंठ पर अपनी जीभ फेरी। मौशुमी ने अपने होंठ खोल दिए, और कौषिक की जीभ उसके मुँह में अंदर चली गई। उनकी जीभें एक-दूसरे से टकराईं, एक उत्तेजक नृत्य में उलझ गईं। मौशुमी ने भी अपनी जीभ से कौषिक की जीभ को छूना शुरू किया, उसकी हर हरकत का जवाब देती हुई। उनके मुँह में लार का आदान-प्रदान हो रहा था, एक मीठा, नमकीन स्वाद जो उनके हर रोम को झकझोर रहा था।
जैसे-जैसे चुंबन गहरा होता गया, कौषिकका हाथ मौशुमी की कमर की ओर बढ़ा। उसने धीरे से उसकी साड़ी के पल्लू को हटाया, और उसकी कमर को अपनी उँगलियों से सहलाया। मौशुमी ने एक गहरी आह भरी, उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपने हाथ कौषिक के बालों में फँसा दिए, उसकी उँगलियाँ उसके घने बालों में उलझ गईं, उसे और करीब खींचती हुईं।
कौषिक ने चुंबन तोड़ दिया, उसकी साँसें तेज़ी से चल रही थीं। उसकी आँखें मौशुमी की आँखों में गहराई से झाँक रही थीं, उनमें एक आग जल रही थी। मौशुमी का चेहरा लाल हो चुका था, उसके होंठ सूजे हुए थे, और उसकी आँखें चमक रही थीं।
"माँ..." कौषिक ने काहा, उसकी आवाज़ भारी हो चुकी थी।
मौशुमी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसकी आँखों में देखती रही। उसके भीतर की आग अब पूरी तरह से भड़क चुकी थी। कौषिक का हाथ उसकी साड़ी के ऊपर से, उसके ब्लाउज के बटनों की ओर बढ़ा। उसकी उँगलियों ने पहला बटन खोला, फिर दूसरा, फिर तीसरा। मौशुमी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। कौषिकने धीरे से उसके ब्लाउज के फांकों को अलग किया, और फिर उसके साधारण सूती ब्रा के कप्स को निचे की तरफ खींचा। ब्रा के हटते ही, मौशुमी के भरे हुए बूब्स आज़ाद हो गए, हवा में साँस लेते हुए।
कौषिक ने एक गहरी साँस ली, उसकी नज़रें उसके बूब्स पर टिकी थीं। वे गोल, भारी, और हल्के सांवले रंग के थे, उनके निप्पल गहरे भूरे रंग के थे और और उसके निप्पल्स उत्तेजना से कड़े हो चुके थे। उसने धीरे से अपना मुँह उसके एक बूब्स पर रखा, और उसके निप्पल को अपने होंठों में भर लिया। उसने धीरे-धीरे उसे चूसना शुरू किय। मौशुमी ने एक ज़ोरदार आह भरी, उसकी कमर बिस्तर पर से थोड़ी ऊपर उठ गई। उसने अपने हाथ कौषिक के सिर पर रखे, उसे अपने बूब्स पर और कसती हुई।
कौषिक ने निप्पल को अपनी जीभ से गोल-गोल घुमाया, फिर उसे अपने दाँतों से धीरे से काटा। मौशुमी की साँसें तेज़ी से चलने लगीं, उसके मुँह से धीमी, उत्तेजित आवाज़ें निकल रही थीं। कौषिकने एक बूब्स को चूसना बंद किया, और दूसरे पर अपना मुँह रखा, उसे भी उसी शिद्दत से चूसने लगा। उसके मुँह में मौशुमी के बूब्स का कोमल मांस और उसके निप्पल का कड़ापन, एक अद्भुत एहसास पैदा कर रहा था। उसकी जीभ की हर हरकत, उसके होंठों का हर दबाव, मौशुमी के शरीर में बिजली दौड़ा रहा था।
"आह... मागो..." मौशुमी ने काहा, उसकी आवाज़ में दर्द और आनंद का मिश्रण था।
कौषिक ने उसके बूब्स को छोड़ दिया, उसके होंठ गीले और चमकीले थे। उसने मौशुमी की ओर देखा, उसकी आँखों में एक जंगलीपन था। उसने धीरे से उसे बिस्तर पर घुटनों के बल आने का इशारा किया। मौशुमी ने बिना किसी सवाल के उसकी बात मानी। वह धीरे से बिस्तर पर घुटनों के बल आ गई, उसकी पीठ कौषिक की ओर थी।
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13-04-2026, 10:45 PM
(This post was last modified: 17-04-2026, 09:38 PM by Pramod_Bhasin. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
कौषिक ने धीरे से उसकी साड़ी को ऊपर उठाया, फिर उसके पेटीकोट को भी ऊपर खींचा। मौशुमी की पैंटी, उसके चूतड़ों के बीच से झाँक रही थी। कौषिक ने अपने हाथ से उसकी पैंटी को एक तरफ सरकाया, उसकी उँगलियाँ मौशुमी की चूत के द्वार पर आ गईं। मौशुमी ने एक गहरी साँस ली, उसके शरीर में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक उम्मीद।
कौषिक ने अपनी उँगलियाँ धीरे से उसकी चूत के द्वार पर रखीं। मौशुमी की चूत गीली होने लगी थी, उसकी गर्मी कौषिक की उँगलियों पर महसूस हो रही थी। उसने अपनी पहली उंगली धीरे से अंदर डाली। मौशुमी ने एक हल्की सी सिसकी भरी, उसके शरीर में एक अजीब सी सनसनी दौड़ गई। कौषिक ने अपनी उंगली को धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया, उसकी चूत की दीवारों को सहलाता हुआ। मौशुमी ने अपनी कमर को थोड़ा पीछे धकेला, उसकी चूत कौषिक की उंगलियों पर और कस रही थी।
"आह... धीरे... कौषिक... मा गो " मौशुमी ने काहा।
कौषिक ने अपनी दूसरी उंगली भी अंदर डाली। मौशुमी की चूत थोड़ी तंग थी, लेकिन उसकी गीलापन ने उंगलियों को अंदर जाने दिया। दो उंगलियाँ अब उसकी चूत के अंदर थीं, एक गति में अंदर-बाहर हो रही थीं। मौशुमी के मुँह से धीमी, उत्तेजित आवाज़ें निकल रही थीं, उसकी साँसें तेज़ हो चुकी थीं। उसकी चूत के अंदर की माँसपेशियाँ सिकुड़ और फैल रही थीं, कौषिक की उंगलियों को कसकर पकड़ रही थीं। हर धक्के के साथ एक धीमी, मीठी आह निकल रही थी।
"ओह... माग... और..." मौशुमी ने काहा, उसकी आवाज़ में अजीब सी बेताबी थी।
कौषिकने अपनी तीसरी उंगली भी अंदर डाली। अब तीन उंगलियाँ उसकी चूत के अंदर थीं, उसे पूरी तरह से भर रही थीं। मौशुमी ने एक ज़ोरदार आह भरी, उसकी कमर तेज़ी से हिलने लगी। उसकी चूत की दीवारों पर उंगलियों का दबाव, उसके अंदरूनी अंगों को छू रहा था, एक अद्भुत आनंद पैदा कर रहा था। कौषिक ने अपनी उंगलियों को तेज़ी से अंदर-बाहर करना शुरू किया, मौशुमी की चूत के अंदर से एक गीली, ‘’श्लिक-श्लिक’’ की आवाज़ आ रही थी। उसकी चूत से निकलने वाला रस, कौषिक की उंगलियों को चिकना बना रहा था।
मौशुमी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके शरीर में एक तीव्र उत्तेजना दौड़ रही थी। उसकी चूत के अंदर की गर्मी, कौषिक की उंगलियों की हर हरकत, उसे पागल कर रही थी। उसने अपनी कमर को और तेज़ी से हिलाना शुरू किया, अपनी चूत को कौषिक की उंगलियों पर रगड़ती हुई। उसके मुँह से गहरी, उत्तेजित साँसें निकल रही थीं, जो कमरे की शांति को भंग कर रही थीं।
कौषिक ने अपनी उंगलियों को बाहर निकाला। मौशुमी की चूत से एक गीली आवाज़ निकली। उसकी उंगलियाँ गीली और चमकीली थीं, मौशुमी के रस से सनी हुई। उसने धीरे से अपने शॉर्ट्स उतारे, और उसका बड़ा भरी लण्ड बाहर आ गया। वह पूरी तरह से खड़ा था, गुलाबी रंग का, और मौशुमी की चूत की ओर इशारा कर रहा था। मौशुमी ने एक पल के लिए पीछे मुड़कर देखा, और उसकी आँखों में एक गहरी लालसा थी। कौषिक ने उसे फिर से अपनी ओर घुमाया, और उसके पीछे घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने लण्ड को मौशुमी की चूत के द्वार पर रखा, उसकी नोक उसके गीले होंठों को छू रही थी।
वह अंदर जाने की तैयारी कर ही रहा था, जब अचानक दरवाज़े पर एक आवाज़ आई।
"मौशुमी! क्या कर रही हो अंदर?"
यह आलोक की आवाज़ थी, मौशुमी के पति और कौषिक के पिता। दोनों के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। मौशुमी की आँखें दहशत से फैल गईं। कौषिक ने तुरंत अपना लण्ड पीछे खींच लिया, और तेज़ी से बिस्तर के नीचे घुस गया। मौशुमीने जल्दी से अपनी साड़ी और पेटीकोट नीचे किया, और ब्लाउज के बटन बंद करने लगी, उसके हाथ काँप रहे थे।
दरवाज़ा खुला, और आलोक अंदर आया। उसने मौशुमीकी ओर देखा, जो अभी भी अपनी साड़ी ठीक कर रही थी, और उसके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट थी।
"क्या हुआ? इतनी देर क्यों लग गई?" आलोक ने पूछा, उसकी आवाज़ में हल्की झुंझलाहट थी।
"कुछ नहीं... बस... कपड़े बदल रही थी," मौशुमीने मुश्किल से कहा, उसकी आवाज़ काँप रही थी।
आलोक ने एक पल के लिए कमरे में चारों ओर देखा, उसकी नज़रें बिस्तर के नीचे से गुज़रीं, लेकिन उसने कुछ नहीं देखा। कौषिक बिस्तर के नीचे, अपनी साँस रोके हुए पड़ा था, उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
"ठीक है," आलोक ने कहा। "मैं बाथरूम जा रहा हूँ। फिर खाना खाते हैं।"
वह कमरे से बाहर निकल गया, और बाथरूम की ओर चला गया। बाथरूम का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आते ही, कौषिक धीरे से बिस्तर के नीचे से अपना सिर निकाला। मौशुमीने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में अभी भी दहशत थी। कौषिक बिस्तर के नीचे से बाहर निकला। उसने मौशुमीकी ओर देखा, और उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी।
"मैं चलता हूँ," कौषिक ने कहा।
मौशुमी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसे देखती रही। कौषिक धीरे से कमरे से बाहर निकला, और अपने कमरे की ओर चला गया।
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17-04-2026, 09:40 PM
उस रात, मौशुमी और कौषिक दोनों को नींद नहीं आई। मौशुमी अपने बिस्तर पर लेटी रही, उसकी आँखें खुली थीं। उसके शरीर में अभी भी कौषिक के स्पर्श की गर्मी महसूस हो रही थी, उसकी उंगलियों का एहसास, उसके होंठों का स्वाद। उसके मन में वह पल बार-बार घूम रहा था, जब आलोक ने दरवाज़ा खटखटाया था। वह डर से काँप उठी, यह सोचकर कि अगर वे पकड़े जाते तो क्या होता। लेकिन डर के साथ-साथ, एक अजीब सी निराशा भी थी, कि उनका मिलन अधूरा रह गया।
कौषिक अपने कमरे में बेचैन था। उसकी आँखों के सामने मौशुमी का चेहरा घूम रहा था, उसके खुले हुए बूब्स, उसकी गीली चूत। उसका लंड अभी भी उत्तेजित था, और उसे शांत करना मुश्किल हो रहा था। उसने अपने शरीर में एक अजीब सी आग महसूस की। वह जानता था कि उसने कुछ गलत किया है, लेकिन उसे कोई पछतावा नहीं था, बस एक अधूरी इच्छा का दर्द था।
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अगली सुबह, नाश्ते की मेज पर एक अजीब सी चुप्पी थी। आलोक अख़बार पढ़ रहा था, और मौशुमी नाश्ता बना रही थी। कौषिक अपने कमरे से आया और मेज पर बैठ गया। उसने मौशुमी की ओर देखा, और उनकी आँखें मिलीं। उस पल में, उनके बीच एक अनकहा संवाद हुआ, एक चोरी की हुई नज़र, जिसमें रात की अधूरी इच्छा और सुबह की शर्मिंदगी दोनों झलक रही थीं। मौशुमी ने जल्दी से अपनी नज़रें हटा लीं, और कौषिक ने भी अपनी प्लेट में देखना शुरू कर दिया।
"मौशुमी, चाय कहाँ है?" आलोक ने पूछा, अख़बार से अपनी नज़रें हटाए बिना।
"अभी लाती हूँ," मौशुमी ने कहा, और किचन की ओर चली गई।
कौषिक ने एक पल का इंतज़ार नहीं किया। वह तुरंत अपनी कुर्सी से उठा और मौशुमी के पीछे किचन में चला गया। किचन में घुसते ही, उसने मौशुमी को अपनी ओर खींचा। मौशुमी ने एक पल के लिए विरोध किया, लेकिन फिर उसकी बाहों में ढीली पड़ गई। कौषिक ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया, और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह एक फ्रेंच किस था, तीव्र और भावुक। उनकी जीभें एक-दूसरे से उलझ गईं, एक पल की भी देरी किए बिना। मौशुमी ने भी उतनी ही शिद्दत से उसका जवाब दिया, उसकी जीभ कौषिक की जीभ को चूस रही थी, उसके मुँह में एक अजीब सी उत्तेजना पैदा कर रही थी।
उनके बीच की दूरी मिट गई, उनके शरीर एक-दूसरे से चिपक गए, और उस पल में, दुनिया में केवल वे दोनों थे। उनकी साँसें तेज़ी से चलने लगीं, और उनके मुँह से धीमी, उत्तेजित आवाज़ें निकल रही थीं। वे एक-दूसरे को चूमते रहे, जैसे वे रात की अधूरी इच्छा को पूरा करना चाहते हों।
तभी, आलोक की आवाज़ आई।
"मौशुमी! कौषिक! क्या कर रहे हो किचन में? नाश्ता ठंडा हो रहा है I"
दोनों एक झटके में एक-दूसरे से अलग हो गए। मौशुमी का चेहरा लाल हो चुका था, और कौषिक की साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा, उनकी आँखों में एक अजीब सी लालसा और डर का मिश्रण था। उन्होंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए, और किचन से बाहर निकलकर नाश्ते की मेज पर बैठ गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन उनके भीतर की आग अभी भी जल रही थी, और उनके बीच की दूरी, अब पहले से कहीं ज़्यादा कम हो चुकी थी।
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17-04-2026, 11:49 PM
(This post was last modified: 17-04-2026, 11:55 PM by Pramod_Bhasin. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
नाश्ता खत्म होने के बाद, आलोक अपने ऑफिस के लिए निकल गए। मौशुमी ने अपनी चाबियाँ उठाईं। "चलो, कौशिक। मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ देती हूँ।"
कौशिक का चेहरा खिल उठा। "हाँ।"
वे दोनों अपार्टमेंट से बाहर निकले और लिफ्ट की तरफ बढ़े। लिफ्ट के अंदर घुसते ही, कौशिक ने मौशुमी का हाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ मौशुमी की नरम हथेली पर धीरे से सरकीं। मौशुमी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने एक पल के लिए कौशिक की आँखों में देखा, जहाँ एक गहरी, अनबुझी प्यास तैर रही थी।
कौशिक ने धीरे से उसके चेहरे को अपनी ओर खींचा, उसके होंठों की ओर झुक रहा था। उसकी साँसों की गर्मी मौशुमी के गालों पर महसूस हुई।
"कौशिक!" मौशुमी फुसफुसाई, उसकी आवाज़ में चेतावनी थी। उसकी आँखें ऊपर, लिफ्ट के कोने में लगे छोटे, चमकदार लेंस पर गईं। "सीसीटीवी है।"
कौशिक ने आँखें घुमाईं, लेकिन उसका हाथ मौशुमी की कमर पर चला गया, साड़ी के कपड़े के नीचे से उसकी त्वचा को छू रहा था। मौशुमी ने एक गहरी साँस ली, उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल गई।
लिफ्ट नीचे रुकी, और वे बाहर निकल आए, उनके बीच एक तनाव था।
कार पार्किंग में, मौशुमी अपनी मारुति रिट्ज की तरफ बढ़ी। कौशिक उसके पीछे-पीछे आया। मौशुमी ड्राइवर की सीट पर बैठकर चाबी घुमाई, और इंजन एक हल्की गुनगुनाहट के साथ चालू हो गया। कौशिक बगल वाली सीट पर बैठ गया। जैसे ही कार पार्किंग से बाहर निकली, बेंगलुरु की सड़कों पर गाड़ियों का शोर और धुएँ का गुबार उन्हें घेरने लगा।
मौशुमी ने कार को भीड़ भरी सड़क पर आगे बढ़ाया। उसकी आँखें सामने थीं, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। कौशिक की हरकतें, उसकी आँखों की प्यास, उसके हाथों का स्पर्श – ये सब उसके दिमाग में घूम रहे थे।
मौशुमी ने गाड़ी सड़क पर दौड़ाई। "कॉलेज में कोई दिक्कत तो नहीं?" उसने एक सामान्य सवाल पूछा।
कौशिक ने सिर हिलाया। "नहीं, सब ठीक है।", उसकी आवाज़ में भी बेचैनी थी।
वे कॉलेज के गेट पर पहुँचे। मौशुमी ने गाड़ी रोकी। "अच्छे से पढ़ना।" उसने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसके होंठों पर कँपकँपी थी।
कौशिक ने बैग उठाया, दरवाज़ा खोला। एक पल के लिए वह रुका, फिर उसने पलटकर मौशुमी को देखा। उसकी आँखें फिर से मौशुमी की आँखों से मिलीं। इस बार कोई कैमरा नहीं था, सिर्फ खुली सड़क और सुबह की रोशनी थी। उनकी नज़रें एक-दूसरे में उलझ गईं, एक गहरा, अनकहा संवाद उनके बीच शुरू हो गया। कौशिक के मन में हजारों शब्द उमड़ रहे थे, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाया। मौशुमी ने अपनी उंगली से स्टीयरिंग व्हील को धीरे से थपथपाया, लेकिन वह भी चुप रही।
कौशिक कार से उतरा, और कॉलेज के गेट की ओर चल पड़ा। उसने एक बार फिर पलटकर देखा। मौशुमी की गाड़ी वहीं खड़ी थी, और वह उसे देख रही थी। जब तक वह कॉलेज के गेट के अंदर नहीं चला गया, मौशुमी ने गाड़ी नहीं बढ़ाई।
मौशुमी ने एक गहरी साँस ली। उसने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और अपनी ऑफिस की ओर चल पड़ी।
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मौशुमी की आँखें सामने थीं, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। कौशिक की हरकतें, उसकी आँखों की प्यास, उसके हाथों का स्पर्श – ये सब उसके दिमाग में घूम रहे थे। ऑफिस पहुँचकर, वह अपनी कुर्सी पर बैठ गई। सामने कंप्यूटर स्क्रीन पर आंकड़ों और प्रेजेंटेशन की भरमार थी, लेकिन उसकी आँखें उन पर टिक नहीं पा रही थीं। उसका दिमाग बार-बार कौशिक की तरफ जा रहा था।
उसे याद आया कि कैसे आज सुबह लिफ्ट में कौशिक ने उसका हाथ पकड़ा था, कैसे उसके होंठ उसके होंठों के करीब आ गए थे। एक अजीब सी गर्मी उसकी नसों में दौड़ गई। वह अपनी कुर्सी पर हिल गई, खुद को सामान्य करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन कौशिक का युवा, गठीला शरीर उसके दिमाग में बार-बार कौंध रहा था। वह कल्पना करने लगी कि कौशिक उसे कैसे अपनी बाहों में भरता, कैसे उसके होंठ उसके होठों पर उतरते, कैसे उसके हाथ उसकी साड़ी को हटाते हुए उसके शरीर पर सरकते। उसकी चूत में एक हल्की सी गुदगुदी महसूस हुई, और वह अपनी जांघों को एक साथ दबाने लगी।
उधर, कॉलेज में कौशिक की हालत भी कुछ अलग नहीं थी। लेक्चर हॉल में प्रोफेसर की आवाज़ उसके कानों में पड़ रही थी, लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ मौशुमी का चेहरा घूम रहा था। उसकी सांवली रंगत, उसके बड़े-बड़े मम्मे, उसके होंठ, उसकी गहरी आँखें – सब कुछ उसे पागल कर रहा था। उसे याद आया कि कैसे आज सुबह लिफ्ट में मौशुमी ने सीसीटीवी का बहाना बनाया था, लेकिन उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी उत्तेजना थी। उसे लगा जैसे मौशुमी भी उसे चाहती है, बस सामाजिक बंधनों की वजह से वह खुलकर सामने नहीं आ पा रही है।
उसने कल्पना की कि मौशुमी उसके सामने बिलकुल नंगी खड़ी है, उसके विशाल बूब्स उसके सामने उछल रही है, उसके निप्पल्स कड़े और गहरे भूरे रंग के। उसके हाथ उसके शरीर पर सरक रहे हैं, उसकी चूत को छू रहे हैं, जहाँ से रस टपक रहा है। वह अपनी पैंट के भीतर अपने लण्ड की बढ़ती हुई कठोरता को महसूस कर रहा था, और उसे दबाने की कोशिश कर रहा था। दिन भर दोनों इसी कशमकश में उलझे रहे, काम और पढ़ाई में उनका मन बिल्कुल नहीं लग रहा था।
शाम को, मौशुमी अपनी कार लेकर कौशिक को लेने कॉलेज पहुँची। जैसे ही उसने कौशिक को कॉलेज गेट पर देखा, उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई। कौशिक कार में आकर बैठा, और मौशुमी ने उसकी ओर एक पल के लिए देखा।
"कैसा रहा दिन?" मौशुमी ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक उत्सुकता थी।
"ठीक था," कौशिक ने जवाब दिया, उसकी आँखें मौशुमी के होंठों पर टिकी हुई थीं।
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18-04-2026, 12:44 AM
(This post was last modified: 18-04-2026, 12:48 AM by Pramod_Bhasin. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
बेंगलुरु की शाम की भीड़भाड़ वाली सड़कें, गाड़ियों का धीमा रेंगना, हॉर्न का लगातार बजना – यह सब उनके बीच की बेचैनी को और बढ़ा रहा था। कार ट्रैफिक में फंसी हुई थी, मुश्किल से आगे बढ़ रही थी। मौशुमी ने स्टीयरिंग व्हील पर हाथ रखे हुए थे, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी महसूस हो रही थी।
कौशिक ने अपना हाथ धीरे से बढ़ाया और मौशुमी की जांघ पर रख दिया। मौशुमी का शरीर सिहर उठा, लेकिन उसने हाथ हटाया नहीं। कौशिक ने अपनी उंगलियाँ धीरे से उसकी साड़ी के कपड़े पर सरकाईं, फिर धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ीं, उसकी साड़ी के भीतर उसकी नरम जांघों को छूने लगीं।
मौशुमी ने एक गहरी साँस ली, उसकी नज़रें सामने थीं, लेकिन उसका पूरा ध्यान कौशिक के स्पर्श पर था। उसकी चूत में एक हलचल शुरू हो गई थी।
"ट्रैफिक में फँस गए," मौशुमी ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी।
"अच्छा ही है," कौशिक ने कहा, उसकी आवाज़ गहरी और कामुक थी। उसने अपना हाथ ऊपर बढ़ाया और मौशुमी के गालों को थपथपाया, फिर उसके चेहरे को अपनी ओर खींचा।
मौशुमी ने विरोध नहीं किया। उसके होंठ कौशिक के होंठों पर उतर आए। एक गर्म, तीव्र चुंबन शुरू हुआ। कौशिक के होंठ मौशुमी के होंठों को चूस रहे थे, उसकी जीभ मौशुमी के मुँह के भीतर घुस गई, उसकी जीभ से लिपट गई। मौशुमी ने भी उतनी ही तीव्रता से जवाब दिया, उसकी जीभ कौशिक की जीभ से खेल रही थी, उसके मुँह में एक अजीब सा स्वाद फैल गया था, उसके होंठों से लार टपक रही थी।
चुंबन गहरा होता गया। कौशिक ने अपना हाथ मौशुमी की साड़ी के पल्लू पर रखा और धीरे से उसे खींचकर एक तरफ कर दिया। मौशुमी की ब्लाउज के ऊपर उसकी छाती का उभार अब उसकी आँखों के सामने था। कौशिक ने अपनी उंगलियों से ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। मौशुमी ने एक पल के लिए अपनी आँखें खोलीं, उसकी नज़रें सामने भीड़ भरी सड़क पर थीं, लेकिन उसके शरीर में एक आग लगी हुई थी।
ब्लाउज के बटन खुलते ही, कौशिक ने उसे एक तरफ सरका दिया। मौशुमी की सफेद ब्रा अब सामने थी, उसके भीतर उसके भरे हुए बूब्स कैद थे। कौशिक ने एक गहरी साँस ली, उसकी आँखें लाल हो रही थीं। उसने अपने हाथ से ब्रा के कप को ऊपर उठाया, और मौशुमी का एक बूब्स बाहर निकल आया। उसका निपल कौशिक की आँखों के सामने था, कड़ा और उत्तेजित।
कौशिक ने अपना मुँह नीचे किया और सीधे मौशुमी के बूब्स पर टूट पड़ा। वह उसके निप्पल को अपने मुँह में भरकर चूसने लगा, जैसे कोई भूखा बच्चा माँ का दूध पीता है। मौशुमी के मुँह से एक हल्की आह निकली, उसके शरीर में एक तीव्र सिहरन दौड़ गई। वह स्टीयरिंग व्हील को कसकर पकड़े हुए थी, उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं। कौशिक उसके निप्पल को खींच रहा था, चूस रहा था, उसकी जीभ से चारों ओर चाट रहा था। मौशुमी की आँखें बंद हो गईं, उसके मुँह से हल्की-हल्की सिसकियाँ निकल रही थीं।
तभी, कार के शीशे पर एक हल्की सी दस्तक हुई। मौशुमी ने अपनी आँखें खोलीं, डर से उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। एक ट्रैफिक सिक्युरिटीकर्मी कार के बगल में खड़ा था, उसकी वर्दी और टोपी साफ दिख रही थी।
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मौशुमी ने तुरंत कौशिक को धक्का दिया। "जल्दी!" उसने फुसफुसाया, और तेजी से अपने बूब्स को ब्रा के भीतर धकेला, और साड़ी के पल्लू को ठीक किया। यह सब एक झटके में हुआ। सिक्युरिटीकर्मी ने शीशे पर फिर से दस्तक दी।
मौशुमी ने शीशा नीचे किया। "जी?" उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मैडम, आप यहाँ ट्रैफिक रोक रही हैं। थोड़ा आगे बढ़ाएँ," सिक्युरिटीकर्मी ने कहा, उसकी नज़रें कार के भीतर एक पल के लिए घूमीं, लेकिन उसने कुछ खास देखा नहीं।
"ओह, हाँ, हाँ, सॉरी," मौशुमी ने कहा, और तुरंत कार को आगे बढ़ाया। उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे, और उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। कौशिक बगल में बैठा हुआ था, उसका चेहरा लाल था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि और बेचैनी दोनों थीं।
वे दोनों चुपचाप घर पहुँचे। जैसे ही मौशुमी ने अपार्टमेंट का दरवाज़ा खोला, कौशिक ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। "और इंतज़ार नहीं कर सकता," उसकी आवाज़ में एक तीव्र कामुकता थी।
मौशुमी ने भी उसे कसकर जकड़ लिया, उसके होंठों पर एक गहरी चुंबन दी। कौशिक ने एक झटके में मौशुमी की साड़ी का पल्लू खींचा, और उसे कंधे से नीचे गिरा दिया। फिर उसने तेजी से उसके ब्लाउज के बटन खोले, और ब्लाउज को उसके शरीर से अलग कर दिया। मौशुमी की सफेद ब्रा अब उसकी आँखों के सामने थी, उसके भीतर उसके भरे हुए बूब्स उछल रहे थे।
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