गुड़गांव के ब्लू बेल्स मॉडल कॉलेज का विशाल प्रांगण रंगों और उमंग से सराबोर था। होली से ठीक एक दिन पहले, कॉलेज ने एक भव्य पार्टी का आयोजन किया था, जहाँ शिक्षकों और छात्रों के बीच का औपचारिक पर्दा कुछ देर के लिए हट गया था। ढोल की थाप पर थिरकते कदम, हवा में उड़ते गुलाल के रंग और बच्चों की खिलखिलाहट से पूरा माहौल जीवंत हो उठा था।
कॉलेज की रिसेप्शनिस्ट, श्रीमती चैताली घोष, आज अपनी होंडा एक्टिवा पर आई थीं, उसका मन भी इस उत्सव में डूबने को बेताब था। छत्तीस साल की चैताली, अपनी घघरा-चोली में बेहद आकर्षक लग रही थीं। गहरे लाल रंग की चोली उसके सुडौल शरीर पर कसकर बैठी थी, जिससे उसके भरी हुई चूची साफ झलक रही थीं। सुनहरे धागों से कढ़ी चोली की पतली पट्टियाँ उसके कंधों पर टिकी थीं, और कमर पर बंधा घाघरा हर कदम के साथ लहरा रहा था। उसके लहराती काली जुल्फें, उसके कमर तक पहुँचती थीं और हर मोड़ पर उसके चाल में एक खास नज़ाकत भर देती थीं। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जो उसके आँखों में चमक भर रही थी।
उसने अपनी एक्टिवा पार्किंग में खड़ी की, हेलमेट उतारा और अपनी उंगलियों से बालों को संवारा। कॉलेज के गलियारे में कदम रखते ही, रंगों की बौछार उसका स्वागत करने को तैयार थी।
"चैताली मैम! होली है!" एक शरारती छात्र की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, और इससे पहले कि वह कुछ समझ पातीं, एक गुब्बारा उसके कंधे से टकराया। पानी से भीगा गुलाल उसके चोली पर फैल गया, लेकिन चैताली हँसी।
"अरे! इतनी जल्दी शुरू हो गए?" उसने बनावटी गुस्सा दिखाया, लेकिन उसके आँखों में ख़ुशी थी।


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